महाभारतम्-12-शांतिपर्व-351

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वेदव्यासः
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श्रीकृष्णेनार्जुनंप्रति सृष्टिप्रकारकथनम्।। 1।।
तथा ब्राह्मणमहिमानुवर्णनम्।। 2।।

महाभारतम्/शांतिपर्व
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अर्जुन उवाच॥
अग्नीषोमौ कथं पूर्वमेकयोनी प्रवर्तितौ ।
एष मे संशयो जातस्तं छिन्धि मधुसूदन ॥१॥
श्रीभगवानुवाच॥
हन्त ते वर्तयिष्यामि पुराणं पाण्डुनन्दन ।
आत्मतेजोद्भवं पार्थ शृणुष्वैकमना मम ॥२॥
सम्प्रक्षालनकालेऽतिक्रान्ते चतुर्थे युगसहस्रान्ते
अव्यक्ते सर्वभूतप्रलये स्थावरजङ्गमे
ज्योतिर्धरणिवायुरहितेऽन्धे तमसि जलैकार्णवे लोके
तम इत्येवाभिभूतेऽसञ्ज्ञकेऽद्वितीये प्रतिष्ठिते
नैव रात्र्यां न दिवसे न सति नासति न व्यक्ते नाव्यक्ते व्यवस्थिते
एतस्यामवस्थायां नारायणगुणाश्रयादक्षयादजरादनिन्द्रियादग्राह्यादसम्भवात्सत्यादहिंस्राल्ललामाद्विविधप्रवृत्तिविशेषात्
अक्षयादजरामरादमूर्तितः सर्वव्यापिनः सर्वकर्तुः
शाश्वतात्तमसः पुरुषः प्रादुर्भूतो हरिरव्ययः ॥३॥
निदर्शनमपि ह्यत्र भवति
नासीदहो न रात्रिरासीत्
न सदासीन्नासदासीत्
तम एव पुरस्तादभवद्विश्वरूपम्
सा विश्वस्य जननीत्येवमस्यार्थोऽनुभाष्यते ॥४॥
तस्येदानीं तमःसम्भवस्य पुरुषस्य पद्मयोनेर्ब्रह्मणः प्रादुर्भावे स पुरुषः प्रजाः सिसृक्षमाणो नेत्राभ्यामग्नीषोमौ ससर्ज
ततो भूतसर्गे प्रवृत्ते प्रजाक्रमवशाद्ब्रह्मक्षत्रमुपातिष्ठत्
यः सोमस्तद्ब्रह्म यद्ब्रह्म ते ब्राह्मणाः
योऽग्निस्तत्क्षत्रं क्षत्राद्ब्रह्म बलवत्तरम्
कस्मादिति लोकप्रत्यक्षगुणमेतत्तद्यथा
ब्राह्मणेभ्यः परं भूतं नोत्पन्नपूर्वम्
दीप्यमानेऽग्नौ जुहोतीति कृत्वा ब्रवीमि
भूतसर्गः कृतो ब्रह्मणा भूतानि च प्रतिष्ठाप्य त्रैलोक्यं
धार्यत इति ॥५॥
मन्त्रवादोऽपि हि भवति
त्वमग्ने यज्ञानां होता विश्वेषाम्
हितो देवेभिर्मानुषे जने इति
निदर्शनं चात्र भवति
विश्वेषामग्ने यज्ञानां होतेति
हितो देवैर्मानुषैर्जगत इति
अग्निर्हि यज्ञानां होता कर्ता
स चाग्निर्ब्रह्म ॥६॥
न ह्यृते मन्त्राद्धवनमस्ति
न विना पुरुषं तपः सम्भवति
हविर्मन्त्राणां सम्पूजा विद्यते देवमनुष्याणामनेन त्वं होतेति नियुक्तः
ये च मानुषा होत्राधिकारास्ते च
ब्राह्मणस्य हि याजनं विधीयते न क्षत्रवैश्ययोर्द्विजात्योः
तस्माद्ब्राह्मणा ह्यग्निभूता यज्ञानुद्वहन्ति
यज्ञा देवांस्तर्पयन्ति देवाः पृथिवीं भावयन्ति ॥७॥
शतपथे हि ब्राह्मणं भवति
अग्नौ समिद्धे स जुहोति यो विद्वान्ब्राह्मणमुखे दानाहुतिं जुहोति
एवमप्यग्निभूता ब्राह्मणा विद्वांसोऽग्निं भावयन्ति
अग्निर्विष्णुः सर्वभूतान्यनुप्रविश्य प्राणान्धारयति
अपि चात्र सनत्कुमारगीताः श्लोका भवन्ति ॥८॥
विश्वं ब्रह्मासृजत्पूर्वं सर्वादिर्निरवस्करम् ।
ब्रह्मघोषैर्दिवं तिष्ठन्त्यमरा ब्रह्मयोनयः ॥९॥
ब्राह्मणानां मतिर्वाक्यं कर्म श्रद्धा तपांसि च ।
धारयन्ति महीं द्यां च शैत्याद्वार्यमृतं यथा ॥१०॥
नास्ति सत्यात्परो धर्मो नास्ति मातृसमो गुरुः ।
ब्राह्मणेभ्यः परं नास्ति प्रेत्य चेह च भूतये ॥११॥
नैषामुक्षा वर्धते नोत वाहा; न गर्गरो मथ्यते सम्प्रदाने ।
अपध्वस्ता दस्युभूता भवन्ति; येषां राष्ट्रे ब्राह्मणा वृत्तिहीनाः ॥१२॥
वेदपुराणेतिहासप्रामाण्यान्नारायणमुखोद्गताः सर्वात्मानः सर्वकर्तारः सर्वभावनाश्च ब्राह्मणाः
वाक्समकालं हि तस्य देवस्य वरप्रदस्य ब्राह्मणाः प्रथमं प्रादुर्भूता ब्राह्मणेभ्यश्च शेषा वर्णाः प्रादुर्भूताः
इत्थं च सुरासुरविशिष्टा ब्राह्मणा यदा मया ब्रह्मभूतेन पुरा
स्वयमेवोत्पादिताः सुरासुरमहर्षयो भूतविशेषाः स्थापिता निगृहीताश्च ॥१३॥
अहल्याधर्षणनिमित्तं हि गौतमाद्धरिश्मश्रुतामिन्द्रः प्राप्तः
कौशिकनिमित्तं चेन्द्रो मुष्कवियोगं मेषवृषणत्वं चावाप
अश्विनोर्ग्रहप्रतिषेधोद्यतवज्रस्य पुरंदरस्य च्यवनेन स्तम्भितो बाहुः
क्रतुवधप्राप्तमन्युना च दक्षेण भूयस्तपसा चात्मानं संयोज्य नेत्राकृतिरन्या ललाटे रुद्रस्योत्पादिता ॥१४॥
त्रिपुरवधार्थं दीक्षामभ्युपगतस्य रुद्रस्योशनसा शिरसो जटा उत्कृत्य प्रयुक्ताः
ततः प्रादुर्भूता भुजगाः
तैरस्य भुजगैः पीड्यमानः कण्ठो नीलतामुपनीतः
पूर्वे च मन्वन्तरे स्वायम्भुवे नारायणहस्तबन्धग्रहणान्नीलकण्ठत्वमेव वा ॥१५॥
अमृतोत्पादने पुरश्चरणतामुपगतस्याङ्गिरसो बृहस्पतेरुपस्पृशतो न प्रसादं गतवत्यः किलापः
अथ बृहस्पतिरपां चुक्रोध
यस्मान्ममोपस्पृशतः कलुषीभूता न प्रसादमुपगतास्तस्मादद्यप्रभृति झषमकरमत्स्यकच्छपजन्तुसङ्कीर्णाः कलुषीभवतेति
तदाप्रभृत्यापो यादोभिः सङ्कीर्णाः संवृत्ताः ॥१६॥
विश्वरूपो वै त्वाष्ट्रः पुरोहितो देवानामासीत्स्वस्रीयोऽसुराणाम्
स प्रत्यक्षं देवेभ्यो भागमददत्परोक्षमसुरेभ्यः ॥१७॥
अथ हिरण्यकशिपुं पुरस्कृत्य विश्वरूपमातरं स्वसारमसुरा वरमयाचन्त
हे स्वसरयं ते पुत्रस्त्वाष्ट्रो विश्वरूपस्त्रिशिरा देवानां पुरोहितः प्रत्यक्षं देवेभ्यो भागमददत्परोक्षमस्माकम्
ततो देवा वर्धन्ते वयं क्षीयामः
तदेनं त्वं वारयितुमर्हसि तथा यथास्मान्भजेदिति ॥१८॥
अथ विश्वरूपं नन्दनवनमुपगतं मातोवाच
पुत्र किं परपक्षवर्धनस्त्वं मातुलपक्षं नाशयसि
नार्हस्येवं कर्तुमिति
स विश्वरूपो मातुर्वाक्यमनतिक्रमणीयमिति मत्वा सम्पूज्य हिरण्यकशिपुमगात् ॥१९॥
हैरण्यगर्भाच्च वसिष्ठाद्धिरण्यकशिपुः शापं प्राप्तवान्
यस्मात्त्वयान्यो वृतो होता तस्मादसमाप्तयज्ञस्त्वमपूर्वात्सत्त्वजाताद्वधं प्राप्स्यसीति
तच्छापदानाद्धिरण्यकशिपुः प्राप्तवान्वधम् ॥२०॥
विश्वरूपो मातृपक्षवर्धनोऽत्यर्थं तपस्यभवत्
तस्य व्रतभङ्गार्थमिन्द्रो बह्वीः श्रीमत्योऽप्सरसो नियुयोज
ताश्च दृष्ट्वा मनः क्षुभितं तस्याभवत्तासु चाप्सरःसु नचिरादेव सक्तोऽभवत्
सक्तं चैनं ज्ञात्वाप्सरस ऊचुर्गच्छामहे वयं यथागतमिति ॥२१॥
तास्त्वाष्ट्र उवाच
क्व गमिष्यथ आस्यतां तावन्मया सह श्रेयो भविष्यतीति
तास्तमब्रुवन्
वयं देवस्त्रियोऽप्सरस इन्द्रं वरदं पुरा प्रभविष्णुं वृणीमह इति ॥२२॥
अथ ता विश्वरूपोऽब्रवीदद्यैव सेन्द्रा देवा न भविष्यन्तीति
ततो मन्त्राञ्जजाप
तैर्मन्त्रैः प्रावर्धत त्रिशिराः
एकेनास्येन सर्वलोकेषु द्विजैः क्रियावद्भिर्यज्ञेषु सुहुतं सोमं पपावेकेनाप एकेन सेन्द्रान्देवान्
अथेन्द्रस्तं विवर्धमानं सोमपानाप्यायितसर्वगात्रं दृष्ट्वा चिन्तामापेदे ॥२३॥
देवाश्च ते सहेन्द्रेण ब्रह्माणमभिजग्मुरूचुश्च
विश्वरूपेण सर्वयज्ञेषु सुहुतः सोमः पीयते
वयमभागाः संवृत्ताः
असुरपक्षो वर्धते वयं क्षीयामः
तदर्हसि नो विधातुं श्रेयो यदनन्तरमिति ॥२४॥
तान्ब्रह्मोवाच ऋषिर्भार्गवस्तपस्तप्यते दधीचः
स याच्यतां वरं यथा कलेवरं जह्यात्
तस्यास्थिभिर्वज्रं क्रियतामिति ॥२५॥
देवास्तत्रागच्छन्यत्र दधीचो भगवानृषिस्तपस्तेपे
सेन्द्रा देवास्तमभिगम्योचुर्भगवंस्तपसः कुशलमविघ्नं चेति
तान्दधीच उवाच स्वागतं भवद्भ्यः किं क्रियताम्
यद्वक्ष्यथ तत्करिष्यामीति
ते तमब्रुवञ्शरीरपरित्यागं लोकहितार्थं भगवान्कर्तुमर्हतीति
अथ दधीचस्तथैवाविमनाः सुखदुःखसमो महायोगी आत्मानं
समाधाय शरीरपरित्यागं चकार ॥२६॥
तस्य परमात्मन्यवसृते तान्यस्थीनि धाता सङ्गृह्य वज्रमकरोत्
तेन वज्रेणाभेद्येनाप्रधृष्येण ब्रह्मास्थिसम्भूतेन विष्णुप्रविष्टेनेन्द्रो विश्वरूपं जघान
शिरसां चास्य छेदनमकरोत्
तस्मादनन्तरं विश्वरूपगात्रमथनसम्भवं त्वष्ट्रोत्पादितमेवारिं वृत्रमिन्द्रो जघान ॥२७॥
तस्यां द्वैधीभूतायां ब्रह्मवध्यायां भयादिन्द्रो देवराज्यं परित्यज्य अप्सु सम्भवां शीतलां मानससरोगतां नलिनीं प्रपेदे
तत्र चैश्वर्ययोगादणुमात्रो भूत्वा बिसग्रन्थिं प्रविवेश ॥२८॥
अथ ब्रह्मवध्याभयप्रनष्टे त्रैलोक्यनाथे शचीपतौ जगदनीश्वरं बभूव
देवान्रजस्तमश्चाविवेश
मन्त्रा न प्रावर्तन्त महर्षीणाम्
रक्षांसि प्रादुरभवन्
ब्रह्म चोत्सादनं जगाम
अनिन्द्राश्चाबला लोकाः सुप्रधृष्या बभूवुः ॥२९॥
अथ देवा ऋषयश्चायुषः पुत्रं नहुषं नाम देवराजत्वेऽभिषिषिचुः
नहुषः पञ्चभिः शतैर्ज्योतिषां ललाटे ज्वलद्भिः सर्वतेजोहरैस्त्रिविष्टपं पालयां बभूव
अथ लोकाः प्रकृतिमापेदिरे स्वस्थाश्च बभूवुः ॥३०॥
अथोवाच नहुषः
सर्वं मां शक्रोपभुक्तमुपस्थितमृते शचीमिति
स एवमुक्त्वा शचीसमीपमगमदुवाच चैनाम्
सुभगेऽहमिन्द्रो देवानां भजस्व मामिति
तं शची प्रत्युवाच
प्रकृत्या त्वं धर्मवत्सलः सोमवंशोद्भवश्च
नार्हसि परपत्नीधर्षणं कर्तुमिति ॥३१॥
तामथोवाच नहुषः
ऐन्द्रं पदमध्यास्यते मया
अहमिन्द्रस्य राज्यरत्नहरो नात्राधर्मः कश्चित्त्वमिन्द्रभुक्तेति
सा तमुवाच
अस्ति मम किञ्चिद्व्रतमपर्यवसितम्
तस्यावभृथे त्वामुपगमिष्यामि कैश्चिदेवाहोभिरिति
स शच्यैवमभिहितो नहुषो जगाम ॥३२॥
अथ शची दुःखशोकार्ता भर्तृदर्शनलालसा नहुषभयगृहीता बृहस्पतिमुपागच्छत्
स च तामभिगतां दृष्ट्वैव ध्यानं प्रविश्य भर्तृकार्यतत्परां ज्ञात्वा बृहस्पतिरुवाच
अनेनैव व्रतेन तपसा चान्विता देवीं वरदामुपश्रुतिमाह्वय
सा तवेन्द्रं दर्शयिष्यतीति ॥३३॥
साथ महानियममास्थिता देवीं वरदामुपश्रुतिं मन्त्रैराह्वयत्
सोपश्रुतिः शचीसमीपमगात्
उवाच चैनामियमस्मि त्वयोपहूतोपस्थिता
किं ते प्रियं करवाणीति
तां मूर्ध्ना प्रणम्योवाच शची भगवत्यर्हसि मे भर्तारं दर्शयितुं त्वं सत्या मता चेति
सैनां मानसं सरोऽनयत्
तत्रेन्द्रं बिसग्रन्थिगतमदर्शयत् ॥३४॥
तामिन्द्रः पत्नीं कृशां ग्लानां च दृष्ट्वा चिन्तयां बभूव
अहो मम महद्दुःखमिदमद्योपगतम्
नष्टं हि मामियमन्विष्योपागमद्दुःखार्तेति
तामिन्द्र उवाच कथं वर्तयसीति
सा तमुवाच
नहुषो मामाह्वयति
कालश्चास्य मया कृत इति ॥३५॥
तामिन्द्र उवाच
गच्छ
नहुषस्त्वया वाच्योऽपूर्वेण मामृषियुक्तेन यानेन त्वमधिरूढ उद्वहस्व
इन्द्रस्य हि महान्ति वाहनानि मनसः प्रियाण्यधिरूढानि मया
त्वमन्येनोपयातुमर्हसीति
सैवमुक्ता हृष्टा जगाम
इन्द्रोऽपि बिसग्रन्थिमेवाविवेश भूयः ॥३६॥
अथेन्द्राणीमभ्यागतां दृष्ट्वोवाच नहुषः पूर्णः स काल इति
तं शच्यब्रवीच्छक्रेण यथोक्तम्
स महर्षियुक्तं वाहनमधिरूढः शचीसमीपमुपागच्छत् ॥३७॥
अथ मैत्रावरुणिः कुम्भयोनिरगस्त्यो महर्षीन्विक्रियमाणांस्तान्नहुषेणापश्यत्
पद्भ्यां च तेनास्पृश्यत
ततः स नहुषमब्रवीदकार्यप्रवृत्त पाप पतस्व महीम्
सर्पो भव यावद्भूमिर्गिरयश्च तिष्ठेयुस्तावदिति
स महर्षिवाक्यसमकालमेव तस्माद्यानादवापतत् ॥३८॥
अथानिन्द्रं पुनस्त्रैलोक्यमभवत्
ततो देवा ऋषयश्च भगवन्तं विष्णुं शरणमिन्द्रार्थेऽभिजग्मुः
ऊचुश्चैनं भगवन्निन्द्रं ब्रह्मवध्याभिभूतं त्रातुमर्हसीति
ततः स वरदस्तानब्रवीदश्वमेधं यज्ञं वैष्णवं शक्रोऽभियजतु
ततः स्वं स्थानं प्राप्स्यतीति ॥३९॥
ततो देवा ऋषयश्चेन्द्रं नापश्यन्यदा तदा शचीमूचुर्गच्छ सुभगे इन्द्रमानयस्वेति
सा पुनस्तत्सरः समभ्यगच्छत्
इन्द्रश्च तस्मात्सरसः समुत्थाय बृहस्पतिमभिजगाम
बृहस्पतिश्चाश्वमेधं महाक्रतुं शक्रायाहरत्
ततः कृष्णसारङ्गं मेध्यमश्वमुत्सृज्य वाहनं तमेव कृत्वा इन्द्रं मरुत्पतिं बृहस्पतिः स्वस्थानं प्रापयामास
ततः स देवराड्देवैरृषिभिः स्तूयमानस्त्रिविष्टपस्थो निष्कल्मषो बभूव
ब्रह्मवध्यां चतुर्षु स्थानेषु वनिताग्निवनस्पतिगोषु व्यभजत्
एवमिन्द्रो ब्रह्मतेजःप्रभावोपबृंहितः शत्रुवधं कृत्वा
स्वस्थानं प्रापितः ॥४१॥
आकाशगङ्गागतश्च पुरा भरद्वाजो महर्षिरुपास्पृशंस्त्रीन्क्रमान्क्रमता विष्णुनाभ्यासादितः
स भरद्वाजेन ससलिलेन पाणिनोरसि ताडितः सलक्षणोरस्कः
संवृत्तः ॥४२॥
भृगुणा महर्षिणा शप्तोऽग्निः सर्वभक्षत्वमुपनीतः ॥४३॥
अदितिर्वै देवानामन्नमपचदेतद्भुक्त्वासुरान्हनिष्यन्तीति
तत्र बुधो व्रतचर्यासमाप्तावागच्छत्
अदितिं चावोचद्भिक्षां देहीति
तत्र देवैः पूर्वमेतत्प्राश्यं नान्येनेत्यदितिर्भिक्षां नादात्
अथ भिक्षाप्रत्याख्यानरुषितेन बुधेन ब्रह्मभूतेन विवस्वतो द्वितीये जन्मन्यण्डसञ्ज्ञितस्याण्डं मारितमदित्याः
स मार्तण्डो विवस्वानभवच्छ्राद्धदेवः ॥४४॥
दक्षस्य वै दुहितरः षष्टिरासन्
ताभ्यः कश्यपाय त्रयोदश प्रादाद्दश धर्माय दश मनवे सप्तविंशतिमिन्दवे
तासु तुल्यासु नक्षत्राख्यां गतासु सोमो रोहिण्यामभ्यधिकां प्रीतिमकरोत्
ततस्ताः शेषाः पत्न्य ईर्ष्यावत्यः पितुः समीपं गत्वेममर्थं शशंसुः
भगवन्नस्मासु तुल्यप्रभावासु सोमो रोहिणीमधिकं भजतीति
सोऽब्रवीद्यक्ष्मैनमावेक्ष्यतीति ॥४५॥
दक्षशापात्सोमं राजानं यक्ष्माविवेश
स यक्ष्मणाविष्टो दक्षमगमत्
दक्षश्चैनमब्रवीन्न समं वर्तस इति
तत्रर्षयः सोममब्रुवन्क्षीयसे यक्ष्मणा
पश्चिमस्यां दिशि समुद्रे हिरण्यसरस्तीर्थम्
तत्र गत्वात्मानमभिषेचयस्वेति
अथागच्छत्सोमस्तत्र हिरण्यसरस्तीर्थम्
गत्वा चात्मनः स्नपनमकरोत्
स्नात्वा चात्मानं पाप्मनो मोक्षयामास
तत्र चावभासितस्तीर्थे यदा सोमस्तदाप्रभृति तीर्थं तत्प्रभासमिति नाम्ना ख्यातं बभूव
तच्छापादद्यापि क्षीयते सोमोऽमावास्यान्तरस्थः
पौर्णमासीमात्रेऽधिष्ठितो मेघलेखाप्रतिच्छन्नं वपुर्दर्शयति
मेघसदृशं वर्णमगमत्तदस्य शशलक्ष्म विमलमभवत् ॥ ४६॥
स्थूलशिरा महर्षिर्मेरोः प्रागुत्तरे दिग्भागे तपस्तेपे
तस्य तपस्तप्यमानस्य सर्वगन्धवहः शुचिर्वायुर्विवायमानः शरीरमस्पृशत्
स तपसा तापितशरीरः कृशो वायुनोपवीज्यमानो हृदयपरितोषमगमत्
तत्र तस्यानिलव्यजनकृतपरितोषस्य सद्यो वनस्पतयः
पुष्पशोभां न दर्शितवन्त इति स एताञ्शशाप न सर्वकालं पुष्पवन्तो
भविष्यथेति ॥४७॥
नारायणो लोकहितार्थं वडवामुखो नाम महर्षिः पुराभवत्
तस्य मेरौ तपस्तप्यतः समुद्र आहूतो नागतः
तेनामर्षितेनात्मगात्रोष्मणा समुद्रः स्तिमितजलः कृतः
स्वेदप्रस्यन्दनसदृशश्चास्य लवणभावो जनितः
उक्तश्चापेयो भविष्यसि
एतच्च ते तोयं वडवामुखसञ्ज्ञितेन पीयमानं मधुरं भविष्यति
तदेतदद्यापि वडवामुखसञ्ज्ञितेनानुवर्तिना तोयं सामुद्रं पीयते ॥४८॥
हिमवतो गिरेर्दुहितरमुमां रुद्रश्चकमे
भृगुरपि च महर्षिर्हिमवन्तमागम्याब्रवीत्कन्यामुमां मे देहीति
तमब्रवीद्धिमवानभिलषितो वरो रुद्र इति
तमब्रवीद्भृगुर्यस्मात्त्वयाहं कन्यावरणकृतभावः प्रत्याख्यातस्तस्मान्न रत्नानां भवान्भाजनं भविष्यतीति
अद्यप्रभृत्येतदवस्थितमृषिवचनम् ॥४९॥
तदेवंविधं माहात्म्यं ब्राह्मणानाम्
क्षत्रमपि शाश्वतीमव्ययां पृथिवीं पत्नीमभिगम्य बुभुजे
तदेतद्ब्रह्माग्नीषोमीयम्
तेन जगद्धार्यते ॥५०॥ 12,342,65


अर्जुन उवाच। 12-351-1x
अग्नीषोमौ कथं पूर्वमेकयोनी प्रकीर्तितौ।
एष मे संशयो वीर तं छिन्धि मधुसूदन।।
12-351-1a
12-351-1b
श्रीभगवानुवाच। 12-351-2x
हन्त ते वर्तयिष्यामि पुराणं पाण्डुनन्दन।
आत्मतेजोद्भवं पार्थ शृणुष्वैकमना नृप।।
12-351-2a
12-351-2b
संप्रक्षालनकालेऽतिक्रान्ते चतुर्युगसहस्रान्ते।
अव्यक्ते सर्वभूतप्रलये सर्वभूतस्थावरजङ्गमे।
ज्योतिर्धरणिवायुरहिते अन्धे तमसि जलैकार्णवेलोके।।
12-351-3a
12-351-3b
12-351-3c
ममायमित्यविदितभूतसंज्ञकेऽद्वितीये प्रतिष्ठिते।। 12-351-4a
न वै रात्र्यां न दिवसे न सति नासति न व्यक्ते नचाप्यव्यक्ते व्यवस्थिते।। 12-351-5a
एतस्यामवस्थायां नारायणगुणाश्रयादजरामरादतीन्द्रियादग्राह्यादसंभवात्सत्यादहिंस्याल्लवादिभिरद्वितीयादप्रवृत्तिविशेषादवैरादक्षयादमरादजरादमूर्तितः सर्वव्यापिनः सर्वकर्तुः शाश्वतात्तमसः परात्पुरुषः प्रादुर्भूतोस्य पुरुषस्य ब्रह्मयोनेर्ब्रह्मणः प्रादुर्भावे हरिरव्ययः।। 12-351-6a
निदर्शनमपि ह्यत्र भवति।। 12-351-7a
नासीदहो न रात्रिरासीन्न सदासीन्नासदासीत्तम एव पुरस्तादभवद्विश्वरूपम्। सा विश्वरूपस्य रजनी हि एवमस्यार्थोऽनुभाष्यते।। 12-351-8a
तस्येदानीं तमः संभवस्य पुरुषस्य ब्रह्मयोनेर्ब्रह्मणः प्रादुर्भावे स पुरुषः प्रजाः सिसृक्षमाणो नेत्राभ्यामग्नीषोमौ ससर्ज। ततो भूतसर्गेषु सृष्टेषु प्रजाः क्रमवशाद्ब्रह्मक्षत्रमुपातिष्ठन्। यः सोमस्तद्ब्रह्म यद्ब्रह्म ते ब्राह्मणा योऽग्निस्तत्क्षत्रं क्षत्राद्ब्रह्मबल 12-351-9a
त्वमग्ने यज्ञानां होता विश्वेषां हितो देवानां मानुषाणां च जगत इति।। 12-351-10a
निदर्शनं चात्र भावति विश्वेपामग्ने यज्ञानां त्वं होतेति। त्वं हितो देवैर्मनुष्यैर्जगत इति।। 12-351-11a
अग्निर्हि यज्ञानां होता कर्ता स चाग्निर्ब्रह्म।। 12-351-12a
न ह्यृते मन्त्राणां हवनमस्ति न विना पुरुषं तपः संभवति। हविर्मन्त्राणां संपूजा विद्यते देवमानुपऋषीणामनेन त्वं होतेति नियुक्तः। ये च मानुषहोत्राधिकारास्ते चक्रुर्ब्राह्मणस्य हि याजनं विधीयते न क्षत्रवैश्ययोर्द्विजात्योस्तस्माद्ब्राह्मणा ह्यग्निभूता यज्ञानुद्वहन्ति। 12-351-13a
अग्नौ समिद्धे स जुहोति यो विद्वान् ब्राह्मणमुखेनाहुतिं जुहोति।। 12-351-14a
एवमप्यग्निभूता ब्राह्मणा विद्वांसोऽग्निं भावयन्ति अग्निर्विष्णुः सर्वभूतान्यनुप्रविश्य प्राणान्धारयति।। 12-351-15a
अपिचात्र सनत्कुमारगीताः श्लोका भवन्ति।
ब्रह्मा विश्वं सृजत्पूर्वं सर्वादिर्निरवस्करः।
ब्रह्मघोषैर्दिवं तिष्ठन्त्यमरा ब्रह्मयोनयः।।
12-351-16a
12-351-16b
12-351-16c
ब्राह्मणानामृतं वाक्यं कर्मश्रद्धातपांसि च।
धारयन्ति महीं द्यां च शैत्याद्वाय्वमृतं तथा।।
12-351-17a
12-351-17b
नास्ति सत्यात्परो धर्मो नास्ति मातृसमो गुरुः।
ब्राह्मणेभ्यः परं नास्ति प्रेत्य चेह च भूतये।।
12-351-18a
12-351-18b
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ते च पुराणेतिहासप्रामाण्यान्नारायणमुखोद्गताः।
सर्वात्मानः सर्वकर्तारः सर्वभावाश्च ब्राह्मणाश्च।।
12-351-20a
12-351-20b
वाक्संयमकाले हि तस्य वरप्रदस्य देवदेवस्य ब्राह्मणाः प्रथमं प्रादुर्भूता ब्राह्मणेभ्यश्च शेषा वर्णाः प्रादुर्भूताः।। 12-351-21a
इत्थं च सुरासुरविशिष्टा ब्राह्मणा वेदमया ब्रह्मभूतेन पुरा स्वयमेवोत्पादिताः सुरासुरमहर्षयो भूतविशेषाः स्थापिता निगृहीताश्च तेषां प्रभावः श्रूयताम्।। 12-351-22a
अहल्याधर्षणनिमित्तं हि गौतमाद्धरिश्मश्रुतामिन्द्रः प्राप्तः। गौतमनिमित्तं चेन्द्रो मुष्कवियोगं मेपवृषणत्वं चावाप।। 12-351-23a
अश्विनोर्ग्रहप्रतिषेधोद्यतवज्रस्य पुरन्दरस्य च्यवनेन स्तम्भितौ वाहू।। 12-351-24a
ऋतुवधप्राप्तमन्युना च दक्षेण भूयस्तपसा चात्मानं संयोज्य त्रिनेत्राकृतिरन्या ललाटे रुद्रस्योत्पादिता।। 12-351-25a
त्रिपुरवधार्थं दीक्षामुपगतस्य रुद्रस्य उशनसाजटाः शिरस उत्कृत्याग्नौ प्रयुक्तास्ततः प्रादुर्भूता भुजगास्तैरस्य भुजगैः पीड्यमानः कण्ठो नीलतामुपगतः। पूर्वे च मन्वन्तरे स्वायंभुवे नारायणहस्तबन्धग्रहणान्नीलकण्ठत्वमुपनीतः।। 12-351-26a
अमृतोत्पादने पुनर्भक्षणतां वायुसमीकृतस्य विषस्योपगतश्च तद्भक्षणमिति तन्निमित्तमेव चन्द्रकला ब्रह्मणा निहिता। आङ्गिरसबृहस्पतेरुपस्पृशतो न प्रसादं गतवत्यः किलापः। अथ बृहस्पतिरद्भ्यश्चुक्रोध यस्मान्ममोपस्पृशतः कलुपीभूता नच प्रसादमुपगतास्ततस्मादद्यप्रभृति झषमकरमत्स्य 12-351-27a
विश्वरूपो हि वै त्वाष्ट्रः पुरीहितो देवानामासीत्। स्वस्त्रीयोसुराणां स प्रत्यक्षं देवेभ्यो भागमदात्परोक्षमसुरेभ्यः।। 12-351-28a
अथ हिरण्यकशिषुं पुरस्कृत्य विश्वरूपमातरं स्वसारमसुरा वरमयाचन्त हे स्वसरयं ते पुत्रस्त्वाष्ट्रो विश्वरूपस्त्रिशिरा देवानां पुरोहितः प्रत्यक्षं देवेभ्योभागमदात् परोक्षमस्माकं ततो देवा वर्धन्ते वयं क्षीयामस्तदेनं त्वं वारयितुमर्हसि तथा यथाऽस्मान्भजेदिति।। 12-351-29a
अथ विश्वरूपं नन्दनवनमुपगतं मातोवाच पुत्र किं परपक्षवर्धनस्त्वं मातुलपक्षं नाशयसि। नार्हस्येवं कर्तुमिति स विश्वरूपो मातुर्वाक्यमनतिक्रमणीयमिति मत्वा संपूज्य हिरण्यकशिपुमगात्।। 12-351-30a
हैरण्यगर्भाच्च वसिष्ठाद्धिरण्यकशिषुः शापं प्राप्तवान्यस्मात्त्वयाऽन्यो वृतो होता तस्मादसमाप्तयज्ञस्त्वमपूर्वात्सत्वजाताद्वधं प्राप्स्यसीति तच्छापदानाद्धिरण्यकशिषुः प्राप्तवान्वधम्।। 12-351-31a
अथ विश्वरूपो मातृपक्षवर्धनोत्यर्थं तपस्व्यभवत्तस्य व्रतभङ्गार्थमिन्द्रो बह्नीः श्रीमत्योऽप्सरसो नियुयोज ताश्च दृष्ट्वा मनः क्षुभितं तस्याभवत्तासु चाप्सरःसु नचिरादेव सक्तोऽभवत्सक्तं चैनं ज्ञात्वा अप्सरस ऊचुर्गच्छामहे वयं यथागतमिति।। 12-351-32a
तास्त्वाष्ट्र उवचा। क्व गमिष्यथास्यतां तावन्मया सह श्रेयो भविष्यतीति तास्तमब्रुवन्वयं देवस्त्रियोऽप्सरस इन्द्रं देवं वरदं पुरा प्रभविष्णुं वृणीमह इति।। 12-351-33a
अथ ता विश्वरूपोऽब्रवीदद्यैव सेन्द्रा देवा नभविष्यन्तीति ततो मन्त्राञ्जजाप तैर्मन्त्रैरवर्धतत्रिशिरा एकेनास्येन सर्वलोकेषु यथावद्द्विजैः क्रियावद्भिर्यज्ञेषु सुहृतं सोमं पपौ एके(1)नान्नमेकेन सेन्द्रान्देवानथेन्द्रस्तं विवर्धमानं सोमपानाप्यायितसर्वगात्रं दृष्ट्वा च 12-351-34a
ते देवाः सेन्द्रा ब्रह्माणमभिजग्मुस्त ऊचुर्विश्वरूपेण सर्वयज्ञेषु सुहुतः सोमः पीयते वयमभागाः संवृत्ता असुरपक्षो वर्धते वयं क्षीयामस्तदर्हसि नो विधातुं श्रेयोऽनन्तरमिति।। 12-351-35a
तान्ब्रह्मोवाच ऋषिर्भार्गवस्तपस्तप्यते दधीचः स याच्यतां वरं स यथा कलेवरं जह्यात् तस्यास्थिभिर्वज्रं क्रियतामिति।। 12-351-36a
ततो देवास्तत्रागच्छन्यत्र दधीचो भगवानृषिस्तपस्तेपे सेन्द्रा देवास्तमभिगम्योचुर्भगवंस्तपसा कुशलमविघ्नं चेति।। 12-351-37a
तान्दधीच उवाच स्वागतं भवतां उच्यतां किं क्रियतां यद्वक्ष्यथ तत्करिष्यामि।। 12-351-38a
ते तमब्रुवञ्शरीपरित्यागं लोकहितार्थं भगवान्कर्तुमर्हतीति।। 12-351-39a
`एवमुक्तो दधीचस्तानब्रवीत्। सहस्रं वर्षाणामैन्द्रं पदमवाप्यते मया यदि जह्याम्। तथेत्युक्त्वेन्द्रः स्वस्थानं दत्वा तपस्व्यभवत्। इन्द्रो दधीचोऽभवत्। तावत्पूर्वेण सेन्द्रा देवा आगमन्कालोऽयं देहन्यासायेति। ' अथ दधीचस्तथैवा विमनाः सुखदुःखसमो महायोगी आत्मनि परमात्मानं 12-351-40a
`श्रुतिरप्यत्र भवति इन्द्रो दधीचोस्थिभिकृतमिति' तस्य परमात्मन्यपसृते तान्यस्थीति विधाता संगृह्य वज्रमकरोत्तेन वज्रेणाभेद्येनामधृष्येण ब्रह्मास्थिसंभूतेन विष्णुप्रविष्टेनेन्द्रो विश्वरूपं जघान शिरसां चास्य च्छेदनमकरोत्तक्ष्ण यज्ञपशोः शिरस्ते ददानीत्युक्त्वा। तस्मा 12-351-41a
(2)तस्यां द्वैधीभूतानां ब्रह्मवध्यायां भयादिन्द्रो देवराज्यं पर्यत्यजदप्सु संभवां च शीतलां मानससरोगतां नलिनीं प्रतिपेदे तत्र चैश्वर्ययोगादणुमात्रो भूत्वा विसग्रन्थिं प्रविवेश।। 12-351-42a
अथ ब्रह्मवध्याकृते प्रनष्टे त्रैलोक्यनाथे शचीपतौ जगदनीश्वरं बभूव देवान् रजस्तमश्चाविवेशमन्त्रा न प्रावर्तन्त महार्षीणां रक्षांसि प्रादुरभवन् ब्रह्म चोत्सादनं जगामानिन्द्राश्चाबलालोकाः सुप्रधृष्या बभूवुः ।। 12-351-43a
अथ देवा ऋषयश्चायुषः पुत्रं नहुषं नाम देवराज्येऽभिषिपिचुर्नहुषः पञ्चभिः शतैर्ज्योतिषां ललाटे ज्वलद्भिः सर्वतेजोहरैस्त्रिविष्टपं पालयांबभूव।। 12-351-44a
अथ लोकाः प्रकृतिमापेदिरे स्वस्थाश्च हृष्टाश्च बभूवुः।। 12-351-45a
अथोवाच नहुषः सर्वं मां शक्रोपभोग्यमुपस्थितमृते शचीमिति स एवमुक्त्वा शचीसमीपमगमद्वृहस्पतिगृहे चासीनामुवाचनां सुभगेऽहमिन्द्रो देवानां भजस्व मामिति तं शचीप्रत्युवाच प्रकृत्या त्वं धर्मवत्सलः सोमवंशोद्भवश्च नार्हसि परपत्नीधर्षणं कर्तुमिति।। 12-351-46a
तामथोवाच नहुष ऐन्द्रं पदमध्यास्यते मयाऽहमिन्द्रस्य राज्यरत्नहरो नात्राधर्मः कश्चित्त्वमिन्द्रोपभुक्तेति सा तमुवाचास्ति मम किंचिद्ब्रतमपर्यवसितं तस्यावभृथे त्वामुपगमिष्यामि कैश्चिदेवाहोभिरिति स शच्यैवमभिहितो जगाम।। 12-351-47a
अथ शची दुःखशोकार्ता भर्तृदर्शनलालसानहुषभयगृहीता बृहस्पतिमुपागच्छत्स च तामत्युद्विग्नां दृष्ट्वैव ध्यानं प्रविश्य भर्तृकार्यतत्परां ज्ञात्वा बृहस्पतिरुवाचानेनैव व्रतेन तपसा चान्विता देवीं वरदामुपश्रुतिमाह्वय तदा सा ते इन्द्रं दर्शयिष्यतीति साऽथ महानियमस्थिता देवीं 12-351-48a
तामथ पत्नीं शचीं कृशां रलानां चेन्द्रो दृष्ट्वा चिन्तयांबभूव अहो मम दुःखमिदमुपगतं नष्टं हि मामियमन्विष्य यत्पत्न्यभ्यगमद्दुःस्वार्तेति तामिन्द्र उवाच (1)कथं वर्यसीति सा तमुवाच नहु(2)पो मामाह्वयति पत्नीं कर्तुं कालश्चास्य मया कृत इति तामिन्द्र उवाच गच्छ नहुषस्त्वय 12-351-49a
अथेन्द्राणीमभ्यागतां दृष्ट्वा तामुवाच नहुषो `यन्मे त्वया कालः परिकल्पितः' पूर्णः स काल इति तं शच्यब्रवीच्छक्रेण यथोक्तं स महर्षियुक्तं बाहनमधिरूढः शचीसमीपमुपागच्छत्।। 12-351-50a
अथ मैत्रावरुणिः कुम्भयोनिरगस्त्य ऋषिवरो महर्षीन् धिक्‌क्रियमाणांस्तान्नहुषेणापश्यत् तद्दुष्करमिति स्वयमपि गृहीतः पद्भ्यां चास्पृश्यत ततः स नहुषमब्रवीदकार्यप्रवृत्त पाप पतस्व महीं सर्पो भव यावद्भूमिर्गिरयश्च तिष्ठेयुस्तावदिति समहर्षिवाक्यसमकालमेव तस्माद्यानादवापतत 12-351-51a
अथानिन्द्रं पुनस्त्रैलोक्यमभवत् ततो देवा ऋषयश्च भगवन्तं विष्णुं शरणमिन्द्रार्थेऽभिजग्मुरूचुश्चैनं भगवन्निन्द्रं ब्रह्महत्याभिभूतं त्रातुमर्हसीति ततः स वरदस्तानब्रवीदश्वमेधं यज्ञं वैष्णवं शक्रोऽभियजतां ततः स्वस्थानं प्राप्स्यतीति ततो देवा ऋषयश्चेन्द्रं नापश्यन्यदा 12-351-52a
ततः स देवराट् देवैर्ऋषिभिः स्तूयमानस्त्रिविष्टपस्थो निष्कल्मषो बभूव ह ब्रह्मवध्यां चतुर्षु स्थानेषु व्यभजत् वनितावृक्षगिर्यवनिषु।' वनितासु रजः। वृक्षेषु निर्यासः। गिरिषु शिम्बः पृथिव्यामूषरः तेऽस्पृश्याः। तस्माद्धविरलवणं पच्यते, एवमिन्द्रो ब्रह्मतेजः प्रभावोपवृंह 12-351-53a
`नहुषस्य शापमोक्षार्थं देवैर्ऋषिभिश्च याच्यमानोऽगस्त्यः प्राह।
यावत्स्वकुलजः श्रीमान्धर्मराड्‌भ्रातृभिर्युतः।
भीमस्तस्यानुजस्तं त्वं ग्रहीता तु युधिष्ठरः।
कथयित्वा स्वकान्प्रश्नांस्त्वां च तं च विमोक्ष्यति।।'
12-351-54a
12-351-54b
12-351-54c
12-351-54d
आकाशगङ्गागतश्च पुरा भरद्वाजो महर्षिरुपास्पृशत्रीन्क्रमान्क्रमता विष्णुनाऽभ्यासादित स भरद्वाजेन सलक्षणेन पाणिनोरसि ताडितः सलक्षणोरस्कः संवृत्तः।। 12-351-55a
भृगुणा महर्षिणा शप्तोऽग्निः सर्वभक्षत्वमुपानीतः।। 12-351-56a
अदितिर्वै देवानामन्नमपचदेतद्भुक्त्वा सुरा असुरान्हनिष्यन्तीति तत्र बुधो व्रतचर्यारामाप्तावागच्छददितिं चायाचद्भिक्षां देहीति तत्र देवैः पूर्वमेतत्प्राश्यं नान्येनेत्यदितिर्भिक्षां नादादथ भिक्षाप्रत्याख्यानरूषितेन बुधेन ब्रह्मभूतेनादितिः शप्ता अदिरेरुदरे भविष्यति व 12-351-57a
दक्षस्य या दै दुहितरः षष्टिरासंस्तासां कश्यपारय त्रयोदश प्रादाद्दश धर्माय दश मनवे सप्तविँशतिमिन्दवे तासु तुल्यासु नक्षत्राख्यां गतासु सोमो रोहिण्यामभ्यधिकं प्रीतिमान भूत्ततस्ताः शिष्टाः पत्न्य इर्ष्याव्रत्यः पितुः समीपं गत्वेममर्थं शशंसुर्भगवन्नस्मासु तुल्यप्रभाव 12-351-58a
तच्छापादद्यापि क्षीयते सोमोऽमावास्यान्तरस्थः पौर्णमासीमात्रेऽधिष्ठितो मेघलेखाप्रतिच्छन्नं बपुर्दर्शयति मेघसदृशं वर्णमगमत्तदस्य शशलक्ष्मविमलमभवत्।। 12-351-59a
स्थूलशिरा महर्षिर्मेरोः प्रागुत्तरे दिग्विभागे तपस्तेपे ततस्तस्य तपस्तप्यमानस्य सर्वगन्धवहः शुचिर्वायुर्वायमानः शरीरमस्पृशत्स तपसा तापितशरीरः कृशो वायुनोपवीज्यमानो हृदये परितोषमगमत्तत्र किल तस्यानिलव्यजनकृतपरितोषस्य सद्यो वनस्पतयः पुष्पशोभां निदर्शितवन्त इति स एत 12-351-60a
नारायणो लोकहितार्थं व़डवामुखो नाम पुरा महर्षिर्बभूव तस्य मेरौ तपस्तप्यतः समुद्र आहूतो नागतस्तेनामर्षितेनात्मगात्रोष्मणाः समुद्रः स्तिमितजलः कृतः स्वेदप्रस्यन्दनसदृशश्चास्य लवणभावो जनितः।। 12-351-61a
उक्तश्चाप्यपेयो भविष्यस्तेतच्च ते तोयं बडवामुखसंज्ञितेन पेपीयमानं मधुरं भविष्यति तदेतदद्यापि बडवामुखसंज्ञितेनानुवर्तिना तोयं समुद्रात्पीयते। `पुनरुमा दक्षकोपाद्धिमवतो गिरेर्दुहिता बभूव।।' 12-351-62a
हिमवतो गिरेर्दुहितरमुमां कन्यां रुद्रश्चकमे भृगुरपि च महर्षिर्हिमवन्तमागत्याब्रवीत् कन्यामिमां मे देहीति तमब्रवीद्धिमवानभिलषितो वरो दुहितुर्हि रुद्र इति तमब्रवीद्भृगुर्यस्मात्त्वयाऽहं कन्यावरणकृतभावः प्रत्याख्यातस्तस्मान्न रत्नानां भवान्भाजनं भविष्यतीति।। 12-351-63a
अद्यप्रभृत्येतदवस्थितमृषिवचनं तदेवंविधं माहात्म्यं ब्राह्मणानाम्।। 12-351-64a
क्षत्रमपि च ब्राह्मणप्रसादादेव शाश्वतीमव्ययां च पृथिवीं पत्नीमभिगम्य बुभुजे।। 12-351-65a
तदेतद्ब्रह्मक्षत्रग्नीषोमीयं तेन जगद्धार्यरते।। 12-351-66a
।। इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि
मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
एकपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः।। 351।।

[सम्पाद्यताम्]

12-351-11 देवानां मानुषे जन इति ध. पाठः।। 12-351-17 वाक्यं मन्त्रश्रद्धामनांसि चेति ट. पाठः।। 12-351-18 नास्ति मन्त्रात्समाश्रयमिति ट. पाठः।। 12-351-19 गर्गरः दधीक्षुतैलादिनिपीडनयन्त्रम्।। 12-351-34 एकेनापः सुरामेकेन। 12-351-42 तस्मिन्द्विधाभूते तद्ब्रह्मवध्याभयात् इति ट. ध. पाठः। 12-351-49 कथं कर्तासीतीति ध. पाठः। नहुषो मां दुष्टस्तर्कयतीति थ. ध. पाठः।।

शांतिपर्व-350 पुटाग्रे अल्लिखितम्। शांतिपर्व-352