महाभारतम्/आदिपर्व

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महाभारतस्य पर्वाणि
  1. आदिपर्व
  2. सभापर्व
  3. आरण्यकपर्व
  4. विराटपर्व
  5. उद्योगपर्व
  6. भीष्मपर्व
  7. द्रोणपर्व
  8. कर्णपर्व
  9. शल्यपर्व
  10. सौप्तिकपर्व
  11. स्त्रीपर्व
  12. शान्तिपर्व
  13. अनुशासनपर्व
  14. आश्वमेधिकपर्व
  15. आश्रमवासिकपर्व
  16. मौसलपर्व
  17. महाप्रस्थानिकपर्व
  18. स्वर्गारोहणपर्व
अध्यायाः


अनुक्रमणिका


पाठान्तराः

101अ/९५

[सम्पाद्यताम्]

टिप्पणी

जावाक्षेत्रे चण्डीसुकुह मन्दिरे भित्तिःचित्रः। वामभागे भीमः अयस्कारः अस्ति, दक्षिणे अर्जुनः भस्रायाः ध्माकारः अस्ति, मध्ये गणेशः अस्ति।

भीमः

भीमः कथं अयस्कारः भवितुं शक्यते, अस्मिन् संदर्भे भीमोपरि टिप्पणी द्रष्टव्यमस्ति। संक्षेपेण - वैदिक साहित्य में भीम प्रायः एक विशेषण के रूप में प्रकट हुआ है जबकि पौराणिक साहित्य में भीम को एक व्यक्ति विशेष का रूप दे दिया गया है । भीम शब्द के अर्थ का अनुमान लगाने के लिए वैदिक साहित्य में कुछ कुंजियां प्राप्त होती हैं । ऋग्वेद १.१५४.२, तैत्तिरीय ब्राह्मण २.४.३.४ आदि में 'प्र तद्विष्णु: स्तवते वीर्येण मृगो न भीम: कुचरो गिरिष्ठा: । यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेषु अधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा ।।' ऋचा प्रकट हुई है । इस से संकेत मिलता है कि कोई भीम मृग ऐसा है जो विचरण तो कु अर्थात् पृथिवी पर करता है लेकिन उसकी पहुंच गिरि तक, ऊपर तक है(ग्री - विज्ञाने : डा. फतहसिंह) । भीम का अर्थ होता है भय देने वाला । हमारे जीवन में भय देने वाला क्या हो सकता है ? हमारे जीवन को मृत्यु से भय है । यदि हम क्षुधाग्रस्त हैं तो जीवन की मृत्यु से रक्षा के लिए तुरन्त भोजन की खोज करते हैं । मृग का अर्थ है जो (अपने अस्तित्व का आधार) खोज रहा है - सबसे निचले स्तर पर भोजन आदि । फिर ज्ञान आदि (मृग - मृज, प्रक्षालने)। प्रश्न उठता है कि मृगो न भीम: कहने से वैदिक साहित्य का क्या तात्पर्य हो सकता है ? यह कहा जा सकता है कि हमारे जीवन में जो भीम है, हमारे लिए भय उत्पन्न कर रहा है, उसका उपयोग एक मृग के रूप में किया जा सकता है । यदि हम क्षुधाग्रस्त हुए हैं तो एक उपाय तो यह है कि संसार में उपलब्ध व्यञ्जनों का उपभोग करके तृप्त हो जाएं । यह भीष्म - भी - शम् की श्रेणी में आएगा । दूसरा उपाय यह है कि जब भूख लगी है तो हम जाग्रत हों कि यह भूख कहां से उत्पन्न हुई है । यह झूठी भूख तो नहीं है । शिव सूत्र, विज्ञान भैरव आदि तन्त्रों में शिव - पार्वती संवाद में एक सूत्र यही है कि भूख लगने पर जाग्रत होओ । यही भीम को मृग बनाना होगा । और वैदिक ऋचा आगे कहती है कि वह मृग ऐसा होना चाहिए जो पृथिवी पर भी विचरण करता हो और गिरि पर भी रहता हो । मनुष्य में यह विशेषता है कि वह पृथिवी पर रहकर भी अपने व्यक्तित्व के उच्च स्तरों तक पहुंच बना सकता है । यह साधना की एकान्तिक स्थिति है, व्यष्टिगत साधना है । ऋचा की दूसरी पंक्ति कहती है कि उस विष्णु की ऊरुओं में इतनी क्षमता है कि वह तीन क्रमणों में पूरे ब्रह्माण्ड का मापन कर सकता है । यह सार्वत्रिक साधना का संकेत है । ऋग्वेद की कईं ऋचाओं में उच्च स्तर वाले, गिरि पर रहने वाले भीम का उल्लेख विशेषण के रूप में किया गया है । ऋग्वेद १.१४०.६ में अग्नि के शृङ्गों के भीम होने का उल्लेख है । ऋग्वेद १.३६.२० में अग्नि की अमवन्त अर्चियों के भीम होने का उल्लेख है । ऋग्वेद ७.१९.१ में एक तिग्मशृङ्ग भीम वृषभ का उल्लेख है । यहां शृङ्ग से अभिप्राय अतिमानसिक शक्तियों से लेना चाहिए ।


अर्जुनः कथं भस्रायाः ध्माकारः भवितुं शक्यते -

इध्मः

ध्मा प्रपूरणशब्दो य इध्मा नाम प्रकीर्त्यते ।

पूरितस्यागतिर्येन तेनेध्मस्त्वं भविष्यसि ।। वराहपुराणम् १८.२६ ।।

आप्रीसूक्तस्य निरुक्तिः

ध्मा शब्दस्य विनियोजनं प्रायः अयसः ध्मानाय एव भवति। किन्तु अत्र प्रपूरणे अस्ति। यथा उल्लिखितमस्ति, इध्मस्य उन्नतं रूपं समित् अस्ति। समित् अर्थात् समिति। अस्मिन् जगते सममितेः ह्रासं अस्ति, येन कारणेन सममितेः प्रपूरणाय वयं भोजनं कुर्वामः। सममितेः आधुनिकं व्याख्या श्री गोवान कृतमस्ति। विष्णु पुराणस्य कथनमस्ति - लक्ष्मी इध्मा, विष्णुः कुशः। कुशोपरि टिप्पणी

भगवद्गीतायां उल्लेखमस्ति - पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजयः। धनंजयेन अर्जुनेन यः शङ्खः ध्मातमस्ति, तस्य संज्ञा देवदत्त, परोक्षरूपेण दैवदत्तमस्ति। यः दैवदत्तमस्ति, तस्य पूरणं पुरुषार्थेन करणीयं एव अर्जुनस्य कृत्यं भवितुं प्रतीयते।

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