महाभारतम्-01-आदिपर्व-129

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धर्मात्कुन्त्यां युधिष्ठिरोत्पत्तिः।। 1 ।।
कुन्त्याः पुत्रोत्पत्तिश्रवणेन दुःखितया गान्धार्यां घातितात्स्वोदरान्मांसपेशीजननम्।। 2 ।।
मांसपेशीं एकोत्तरशतधा विभज्य पृथक्पृथक्कुण्डेषु निधाय रक्षणम्।। 3 ।।
वने स्थितस्य पाण्डोः कुन्त्यां वायोर्भीमसेन्नोत्पत्तिः।। 4 ।।
मातुरङ्कात्पतितेन भीमेन शैलशिलासंचूर्णनम्।। 5 ।।
दुर्योधनोत्पत्तिः।। 6 ।।
ततो मासेन धृतराष्ट्रस्य पुत्रशतोत्पत्तिः। दुःशलाजननं च।। 7 ।।


कुन्त्युवाच।
अपत्यकाम एवं स्यान्ममापत्यं भवेदिति।
विप्रं वा गुणसंपन्नं सर्वभूतहिते रतम्।। 1-129-1a
अनुजानीहि भद्रं ते दैवतं हि पतिः स्त्रियः।
यं त्वं वक्ष्यसि धर्मज्ञ देवं ब्राह्मणमेव च।। 1-129-2a
यथोद्दिष्टं त्वया वीर तत्कर्तास्मि महाभुज।
देवात्पुत्रफलं सद्यो विप्रात्कालान्तरे भवेत्।। 1-129-3a
आवाहयामि कं देवं कदा वा भरतर्षभ।
त्वत्त आज्ञां प्रतीक्षन्तीं विद्ध्यस्मिन्कर्मणीप्सिते।। 1-129-4a
पाण्डुरुवाच।
धन्योऽञस्म्यनुगृहीतोऽस्मि त्वं नो धात्री कुलस्य हि।
नमो महर्षये तस्मै येन दत्तो वरस्तव।। 1-129-5a
न चाधर्मेण धर्मज्ञे शक्याः पालयितुं प्रजाः।
तस्मात्त्वं पुत्रलाभाय सन्तानाय ममैव च।। 1-129-6a
प्रवरं सर्वदेवानां धर्ममावाहयाबले। 1-129-7a
वैशंपायन उवाच।
पाण्डुना समनुज्ञाता भारतेन यशस्विना।
मतिं चक्रे महाराज धर्मस्यावाहने तदा।।' 1-129-7b
पाण्डुरुवाच।
अद्यैव त्वं वरारोहे प्रयतस्व यथाविधि।
धार्मिकश्च कुरूणां हि भविष्यति न संशयः।। 1-129-8a
दत्तस्य तस्य धर्मेण नाधर्मे रंस्यते मनः।
धर्मादिकं हि धर्मज्ञे धर्मान्तं धर्ममध्यमम्।। 1-129-9a
अपत्यमिष्टं लोकेषु यशःकीर्तिविवर्धनम्।
तस्माद्धर्मं पुरस्कृत्य नियता त्वं शुचिस्मिते।। 1-129-10a
आकाराचारसंपन्ना भजस्वाराधय स्वयम्।। 1-129-11a
वैशंपायन उवाच।
सा तथोक्ता तथेत्युक्त्वा तेन भर्त्रा वराङ्गना।
अभिवाद्याभ्यनुज्ञाता प्रदक्षिणमथाकरोत्।। 1-129-12a
संवत्सरोषिते गर्भे गान्धार्या जनमेजय।
आजुबहाव ततो धर्मं कुन्ती गर्भार्थमच्युतम्।। 1-129-13a
सा बलिं त्वरिता देवी धर्मायोपजहार ह।
जजाप विधिवज्जप्यं दत्तं दुर्वाससा पुरा।। 1-129-14a
जानन्ती धर्ममग्र्यं वै धर्मं वशमुपानयत्।
आहूतो नियमात्कुन्त्या सर्वभूतनमस्कृतः।। 1-129-15a
आजगाम ततो देवीं धर्मो मन्त्रबलात्ततः।
विमाने सूर्यसङ्काशे कुन्ती यत्र जपस्थिता।। 1-129-16a
ददृशे भगवान्धर्मः सन्तानार्थाय पाण्डवे।
विहस्य तां ततो ब्रूयाः कुन्ति किं ते ददाम्यहम्।
सा तं विहस्यमानापि पुत्रं देह्यब्रवीदिदम्।। 1-129-17a
तस्मिन्बहुमृगेऽरण्ये शतशृङ्गे नगोत्तमे।
पाण्डोरर्थे महाभागा कुन्ती धर्ममुपागमत्।। 1-129-18a
ऋतुकाले शुचिः स्नाता शुक्लवस्त्रा यशस्विनी।
शय्यां जग्राह सुश्रोणी सह धर्मेण सुव्रता।।' 1-129-19a
धर्मेण सह संगम्य योगमूर्तिधरेण सा।
लेभे पुत्रं महाबाहुं सर्वप्राणभृतां वरम्।। 1-129-20a
ऐन्द्रे चन्द्रमसा युक्ते मुहूर्तेऽभिजितेऽष्टमे।
दिवा मध्यगते सूर्ये तिथौ पूर्णे हि पूजिते।। 1-129-21a
समृद्धयसशं कुन्ती सुषाव प्रवरं सुतम्।
जातमात्रे सुते तस्मिन्वागुवाचाशरीरिणी।। 1-129-22a
एष धर्मभृतां श्रेष्ठो भविष्यति नरोत्तमः।
विक्रान्तः सत्यवाक्चैव राजा पृथ्व्यां भविष्यति।। 1-129-23a
युधिष्ठिर इति ख्यातः पाण्डोः प्रथमजः सुतः।
भविता प्रथितो राजा त्रिषु लोकेषु विश्रुतः।
यशसा तेजसा चैव वृत्तेन च समन्वितः।। 1-129-24a
संवत्सरे द्वितीये तु गान्धार्या उदरं महत्।
न च प्राजायत तदा ततस्तां दुःखमाविशत्।। 1-129-25a
श्रुत्वा कुन्तीसुतं जातं बालार्कसमतेजसम्।
उदस्यात्मनः स्थैर्यमुपालभ्य च सौबली।। 1-129-26a
कौरवस्यापरिज्ञातं यत्नेन महता स्वयम्।
उदरं घातयामास गान्धारी शोकमूर्छिता।। 1-129-27a
ततो जज्ञे मांसपेशी लोहाष्ठीलेव संहता।
द्विवर्षसंभृता कुक्षौ तामुत्स्रष्टुं प्रचक्रमे।। 1-129-28a
अथ द्वैपायनो ज्ञात्वा त्वरितः समुपागमत्।
तां स मांसमयीं पेशीं ददर्श जपतां वरः।। 1-129-29a
ततोऽवदत्सौबलेयीं किमिदं ते चिकीर्षितम्।
सा चात्मनो मतं सर्वं शशंस परमर्षये।। 1-129-30a
गान्धार्युवाच।
ज्येष्ठं कुन्तीसुतं जातं श्रुत्वा रविसमप्रभम्।
दुःखेन परमेणेदमुदरं घातितं मया।। 1-129-31a
शतं च किल पुत्राणां वितीर्णं मे त्वया पुरा।
इयं च मे मांसपेशी जाता पुत्रशताय वै।। 1-129-32a
व्यास उवाच।
एवमेतत्सौबलेयि नैतज्जात्वन्यथा भवेत्।
वितथं नोक्तपूर्वं मे स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा।। 1-129-33a
घृतपूर्णं कुण्डशतं क्षिप्रमेव विधीयताम्।
सुगुप्तेषु च देशेषु रक्षा चैव विधीयताम्।। 1-129-34a
शीताभिरद्भिरष्ठीलामिमां च परिषिञ्चय।। 1-129-35a
वैशंपायन उवाच।
सा सिच्यमाना ह्यष्ठीला ह्यभवच्छतधा तदा।
अङ्गुष्ठपर्वभात्राणां गर्भाणां तत्क्षणं तथा।। 1-129-36a
एकाधिकशतं पूर्णं यथायोगं विशांपते।
ततः कुण्डशतं तत्र आनाय्य तु महानृषिः।। 1-129-37a
मांसपेश्यास्तदा राजन्क्रमशः कालपर्ययात्।
ततस्तांस्तेषु कुण्डेषु गर्भान्सर्वान्समादधत्।। 1-129-38a
स्वनुगुप्तेषु देशेषु रक्षां चैषां व्यधापयत्।
शशास चैव कृष्णो वै गर्भाणां रक्षणं तथा।। 1-129-39a
उवाच चैनां भगवान्कालेनैतावता पुनः।
स्फुटमानेषु कुण्डेषु जाताञ्जानीहि शोभने।। 1-129-40a
उद्धाटनीयान्येतानि कुण्डानीति च सौबलीम्।
इत्युक्त्वा भगवान्व्यासस्तथा प्रतिविधाय च।। 1-129-41a
जगाम तपसे धीमान्हिमवन्तं शिलोच्चयम्।
अह्नोत्तराः कुमारस्ते कुण्डेभ्यस्तु समुत्थिताः।। 1-129-42a
तेनैवैषां क्रमेणासीज्ज्योष्ठानुज्येष्ठता तदा।
जन्मतश्च प्रमाणेन ज्येष्ठः कुन्तीसुतोऽभवत्।। 1-129-43a
धार्मिकं च सुतं दृष्ट्वा पाण्डुः कुन्तीमथाऽब्रवीत्।
प्राहुः क्षत्रं बलज्येष्ठं बलज्येष्ठं सुतं वृणु।। 1-129-44a
ततः कुन्तीमभिक्रम्य शशासातीव भारत।
वायुमावाहयस्वेति स देवो बलवत्तरः।। 1-129-45a
अश्वमेधः क्रतुश्रेष्ठो ज्योतिःश्रेष्ठो दिवाकरः।
ब्राह्मणो द्विपदां श्रेष्ठो देवश्रेष्ठश्च मारुतः।। 1-129-46a
मारुतं मरुतां श्रेष्ठं सर्वप्राणिभिरीडितम्।
आवाहय त्वं नियमात्पुत्रार्थं वरवर्णिनि।। 1-129-47a
स नो यं दास्यति सुतं स प्राणबलवान्नृषु।
भविष्यति वरारोहे बलज्येष्ठा हि भूमिपाः।। 1-129-48a
वैशंपायन उवाच। 1-129-49x
तथोक्तवति सा काले वायुमेवाजुहाव ह।
द्वितीयेनोपहारेण तेनोक्तविधिना पुनः।। 1-129-49a
तैरेव नियमैः स्थित्वा मन्त्रग्राममुदैरयत्।
आजगाम ततो वायुः किं करोमीति चाब्रवीत्।। 1-129-50a
लज्जान्विता ततः कुन्ती पुत्रमैच्छन्महाबलम्।
तथास्त्विति च तां वायुः समालभ्य दिवं गतः।। 1-129-51a
तस्यां जज्ञे महावीर्यो भीमो भीमपराक्रमः।
तमप्यतिबलं जातं वागुवाचाशरीरिणी।। 1-129-52a
सर्वेषां बलिनां श्रेष्ठो जातोऽयमिति भारत।
जातमात्रे कुमारे तु सर्वलोकस्य पार्थिवाः।। 1-129-53a
मूत्रं प्रसुस्रुवुः सर्वे व्यथां चापि प्रपेदिरे।
वाहनानि व्यशीर्यन्त व्यमुञ्चन्नश्रुबिन्दवः।। 1-129-54a
यथाऽनिलः समुद्भूतः समर्थः कम्पने भुवः।
तथा ह्युपचिताङ्गो वै भीमो भीमपराक्रमः।। 1-129-55a
इदं चाद्भुतमत्रासीज्जातमात्रे वृकोदरे।
यदऱ्कात्पतितो मातुः शिलां गात्रैरचूर्णयत्।। 1-129-56a
कुन्ती तु सह पुत्रेण याता सुरुचिरं सरः।
स्नात्वा च सुतमादाय दशमेऽहनि यादवी।। 1-129-57a
दैवतान्यर्चयिष्यन्ती निर्जगामाश्रमात्पृथा।
शैलाभ्याशेन गच्छन्त्यास्तदा भरतसत्तम।। 1-129-58a
निश्चक्राम महाव्याघ्रो जिघांसुर्गिरिगह्वरात्।
तमापतन्तं शार्दूलं विकृष्य धनुरुत्तमम्।। 1-129-59a
निर्बिभेद शरैः पाण्डुस्त्रिभिस्तिरदशविक्रमः।
नादेन महता तां तु पूरयन्तं गिरेर्गुहाम्।। 1-129-60a
दृष्ट्वा शैलमुपारोढुमैच्छत्कुन्ती भयात्तदा।
त्रासात्तस्याः सुतस्त्वङ्कात्पपात भरतर्षभ।। 1-129-61a
पर्वतस्योपरिस्थायामधस्तादपतच्छिशुः।
स शिलां चूर्णयामास वज्रवद्वज्रिचोदितः।। 1-129-62a
पुत्रस्नेहात्ततः पाण्डुरभ्यधावद्गिरेस्तटम्।
पतता तेन शतधा शिला गात्रैर्विचूर्णिता।। 1-129-63a
शिलां च चूर्णितां दृष्ट्वा परं विस्मयमागमत्।
स तु जन्मनि भीमस्य विनदन्तं विनादितम्।। 1-129-64a
ददर्श गिरिशृङ्गस्थं व्याघ्रं व्याघ्रपराक्रमः।
दारसंरक्षणार्थाय पुत्रसंरक्षणाय च।। 1-129-65a
सदा बाणधनुष्पाणिरभवत्कुरुनन्दनः।
मघे चन्द्रमसा युक्ते सिंहे चाभ्युदिते गुरौ।। 1-129-66a
दिवा मध्यगते सूर्ये तिथौ पुण्ये त्रयोदशे।
पित्र्ये मुहूर्ते सा कुन्ती सुषुवे भीममच्युतम्।। 1-129-67a
यस्मिन्नहनि भमस्तु जज्ञे भीमपराक्रमः।
तामेव रात्रिं पूर्वां तु जज्ञे दुर्योधनो नृपः।। 1-129-68a
स जातमात्र एवाथ धृतराष्ट्रसुतो नृप।
रासभारावसदृशं रुराव च ननाद च।। 1-129-69a
तं खराः प्रत्यभाषन्त गृध्रगोमायुवायसाः।
क्रव्यादाः प्राणदन्घोराः शिवाश्चाशिवनिस्वनाः।। 1-129-70a
वाताश्च प्रववुश्चापि दिग्दाहश्चाभवत्तदा।
ततस्तु भीतवद्राजा धृतराष्ट्रोऽब्रवीदिदम्।। 1-129-71a
समानीय बहून्विप्रान्भीष्मं विदुरमेव च।
अन्यांश्च सुहृदो राजन्कुरून्सर्वांस्तथैव च।। 1-129-72a
युधिष्ठिरो राजपुत्रो ज्येष्ठो नः कुलवर्धनः।
प्राप्तः स्वगुणतो राज्यं न तस्मिन्वाच्यमस्तिनः।। 1-129-73a
अयं त्वनन्तरस्तस्मादपि राजा भविष्यति।
एतद्विब्रूत मे तथ्यं यदत्र भविता ध्रुवम्।। 1-129-74a
अस्मिञ्जाते निमित्तानि शंसन्ती हाशिवं महत्।
अतो ब्रवीमि विदुर द्रुतं मां भयमाविशत्।।' 1-129-75a
वाक्यस्यैतस्य निधेन दिक्षु सर्वासु भारत।
क्रव्यादाः प्राणदन्घोराः शिवाश्चाशिवनिस्वनाः।। 1-129-76a
लक्षयित्वा निमित्तानि तानि घोराणि सर्वशः।
तेऽब्रुवन्ब्राह्मणा राजन्विदुरश्च महामतिः।। 1-129-77a
यथेमानि निमित्तानि घोराणि मनुजाधिप।
उत्थितानि सुते जाते ज्येष्ठे ते पुरुषर्षभ।। 1-129-78a
व्यक्तं कुलान्तकरणो भवितैष सुतस्तव।
तस्य शान्तिः परित्यागे गुप्तावपनयो महान्।। 1-129-79a
एष दुर्योधनो राजा मधुपिङ्गललोचनः।
न केवलं कुलस्यान्तं क्षत्रियान्तं करिष्यति।।' 1-129-80a
शतमेकोनमप्यस्तु पुत्राणां ते महीपते।
त्यजैनमेकं शान्तिं चेत्कुलस्येच्छसि भारत।। 1-129-81a
एकेन कुरु वै क्षेमं कुलस्य जगतस्तथा।
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।। 1-129-82a
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्।
स तथा विदुरेणोक्तस्तैश्च सर्वैर्द्विजोत्तमैः।। 1-129-83a
न चकार तथा राजा पुत्रस्नेहसमन्वितः।
ततः पुत्रशतं पूर्ण धृतराष्ट्रस्य पार्थिव।। 1-129-84a
अह्नांशतेन संजज्ञे कन्या चैका शताधिका।
गान्धार्यां क्लिश्यमानायामुदरेण विवर्धता।। 1-129-85a
वैश्या सा त्वम्बिकापुत्रं कन्या परिचचार ह।
तया समभवद्राजा धृतराष्ट्रो यदृच्छया।।' 1-129-86a
तस्मिन्संवत्सरे राजन्धृतराष्ट्रान्महायशाः।
जज्ञे धीमांस्ततस्तस्यां युयुत्सुः करमो नृप।
एवं पुत्रशतं जज्ञे धृतराष्ट्रस्य धीमतः।। 1-129-87a
महारथानां वीराणां कन्या चैका शताधिका।
युयुत्सुश्च महातेजा वैश्यापुत्रः प्रतापवान्।। 1-129-88a

।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः।। 129 ।।


1-129-21 ऐन्द्रे ज्येष्ठानक्षत्रे। अष्टमे अभिजितेऽभिजिति त्रिंशन्मुहूर्तस्याह्नोऽष्टमे मुहूर्ते। दिवा शुक्लपक्षे। मध्यगते तुलायनगते। तिथौ पूर्णे पूर्णायां पञ्चम्याम्। अयं योगः प्रायेणास्विनशुक्लपञ्चम्याम्।।
1-129-28 लोहाष्ठीला लोहपिण्डिका।।
1-129-62 वज्रवद्वज्रिचोदितः वज्रिचोदितवज्रवदित्यर्थः।।
1-129-64 विनादितं नादं। विनन्दं कुर्वाणम्।।
1-129-69 रुराव च ननाद च व्यक्तमव्यक्तं च शब्दं खरसदृशमेवाकरोत्।।
1-129-87 करण इव करणः क्षत्रियाद्वैश्यायां जातत्वान्न तु वैश्याच्छूद्रायाम्।।
एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः।। 129 ।।
    

आदिपर्व-128 पुटाग्रे अल्लिखितम्। आदिपर्व-130
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