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महाभारतम्/आदिपर्व/००१

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  255. 255
  256. 256
  257. 257
  258. 258
  259. 259
  260. 260

आदौ मङ्गलाचरणं।। 1 ।। नैमिशारण्ये दीर्घसत्रे शौनकादीन्प्रति सौतेरागमनम्।। 2 ।। तत्र शौनकादिभिः सौतिं प्रति भारतकथनचोदना।। 3 ।। सौतिना श्रीमन्नारायणनमस्कारपूर्वकं व्यासस्य भारतनिर्माणकथनम्।। 4 ।। पर्वानुक्रमणिका।। 5 ।।

।। श्रीवेदव्यासाय नमः।।

1-1-1x

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं चैव(व्यासं) ततो जयमुदीरयेत् ।।

1-1-1a
1-1-1b

`नारायणं सुरगुरुं जगदेकनाथं'
भक्तप्रियं सकललोकनमस्कृतं च।
त्रैगुण्यवर्जितमजं विभुमाद्यमीशं
वन्दे भवघ्नममरासुरसिद्धवन्द्यम्'।।

1-1-2a
1-1-2b
1-1-2c
1-1-2d

`नमो धर्माय महते नमः कृष्णाय वेधसे।
ब्राह्मणेभ्यो नमस्कृत्य धर्मान्वक्ष्यामि शाश्वतान्'।।

1-1-3a
1-1-3b

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमः पितामहाय। ॐ नमः प्रजापतिभ्यः।
ॐ नमः कृष्णद्वैपायनाय।
ॐ नमः सर्वविघ्नविनायकेभ्यः।।

1-1-4a
1-1-4b
1-1-4c
1-1-4d

रोमहर्षणपुत्र उग्रश्रवाः सौतिः पौराणिको
नैमिशारण्ये शौनकस्य कुलपतेर्द्वादशवार्षिके सत्रे

1-1-5a
1-1-5b

सुखासीनानभ्यगच्छद्ब्रह्मर्षीन्संशितव्रतान्।
विनयावनतो भूत्वा कदाचित्सूतनन्दनः।।

1-1-6a
1-1-6b

तमाश्रममनुप्राप्य नैमिशारण्यवासिनः।
`उवाच तानृषीन्सर्वान्धन्यो वोऽस्म्यद्यदर्शनात्

1-1-7a
1-1-7b

वेद वैयासिकीः सर्वाः कथा धर्मार्यैसंहिताः।
वक्ष्यामि वो द्विजश्रेष्ठाः शृण्वन्त्वद्य तपोधनाः

1-1-8a
1-1-8b

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा नैमिशारण्यवासिनः।
चित्रा श्रोतुं कथास्तत्र परिव्रुस्तपस्विनः।।

1-1-9a
1-1-9b

अभिवाद्य मुनींस्तांस्तु सर्वानेव कुताञ्जलिः।
अपृच्छत्स तपोवृद्धिं सद्भिश्चैवाभिपूजितः।।

1-1-10a
1-1-10b

अथ तेषूपविष्टेषु सर्वेष्वेव तपस्विषु।
निर्दिष्टमासनं भेजे विनयाद्रौमहर्षणिः।।

1-1-11a
1-1-11b

सुखासीनं ततस्तं तु विश्रान्तमुपलक्ष्य च।
अथापृच्छदृषिस्तत्र कश्चित्प्रस्तावयन्कथाः।।

1-1-12a
1-1-12b

कुत आगम्यते सौते क्वचायं विहृतस्त्वया।
कालः कमलपत्राक्ष शंसैतत्पृच्छतो मम।।

1-1-13a
1-1-13b

एवं पृष्टोऽब्रवीत्सम्यग्यथावद्रौमहर्षणिः।
वाक्यं वचनसंपन्नस्तेषां च चरिताश्रयम्।।

1-1-14a
1-1-14b

तस्मिन्सदसि विस्तीर्णे मुनीनां भावितात्मनाम्।

1-1-15a

सौतिरुवाच।

1-1-15x

जनमेजयस्य राजर्षेः सर्पसत्रे महात्मनः।।

1-1-15b

समीपे पार्थिवेन्द्रस्य सम्यक्पारिक्षितस्य च।
कृष्णद्वैपायनप्रोक्ताः सुपुण्या विविधाः कथाः

1-1-16a
1-1-16b

कथिताश्चापि विधिवद्या वैशंपायनेन वै।
श्रुत्वाऽहं ता विचित्रार्था महाभारतसंश्रिताः।।

1-1-17a
1-1-17b

वहूनि संपरिक्रम्य तीर्थान्यायतनानि च।
समन्तपञ्चकं नाम पुण्यं द्विजनिषेवितम्।।

1-1-18a
1-1-18b

गतवानस्मि तं देशं युद्धं यत्राभवत्पुरा।
कुरूणां पाण्डवानां च सर्वेषां चहीक्षिताम्।।

1-1-19a
1-1-19b

दिदृक्षुंरागतस्तस्मात्समीपं भावतामिह।
आयुष्मन्तः सर्व एव ब्रह्मभाता हि मे मताः।।
अस्मिन्यज्ञे महाभङ्गाः सूर्यपावकवर्चसः।।

1-1-20a
1-1-20b
1-1-20c

कृताभिषेकाः शुचयः कृतजप्या हुताग्नयः।
भवन्त आसते स्वस्था ब्रवीमि किमहं द्विजाः

1-1-21a
1-1-21b

पुराणसंहिताः पुण्याः कथा धर्मार्थसंश्रिताः।
इतिवृत्तं नरेन्द्राणामृषीणां च महात्मनाम्।।

1-1-22a
1-1-22b

ऋषय ऊचुः।

1-1-23x

द्वैपायनेन यत्प्रोक्तं पुराणं परमर्षिणा।
सुरैर्ब्रह्मर्षिभिश्चैव श्रुत्वा यदभिपूजितम्।।

1-1-23a
1-1-23b

तस्याख्यानवरिष्ठस्य विचित्रपदपर्वणः।
सूक्ष्मार्थन्याययुक्तस्य वेदार्थैर्भूषितस्य च।।

1-1-24a
1-1-24b

भारतस्येतिहासस्य पुण्यां ग्रन्थार्थसंयुताम्।
संस्कारोपगतां ब्राह्मीं नानाशास्त्रोपबृंहिताम्।।

1-1-25a
1-1-25b

जनमेजयस्य यां राज्ञो वैशंपायन उक्तवान्।
यथावत्स ऋषिः पृष्टः सत्रे द्वैपायनाज्ञया।।

1-1-26a
1-1-26b

वेदैश्चतुर्भिः सयुक्तां व्यासस्याद्भुतकर्मणः।
संहितां श्रोतुमिच्छामः पुण्यां पापभयापहाम्।।

1-1-27a
1-1-27b

सौतिरुवाच।

1-1-28x

आद्यं पुरुषमीशानं पुरुहूतं पुरुष्टुतम्।
ऋतमेकाक्षरं ब्रह्म व्यक्ताव्यक्तं सनातनम्।।

1-1-28a
1-1-28b

असच्च सच्चैव च यद्विश्वं सदसतः परम्
परावराणां स्रष्टारं पुराणं परमव्ययम्।।

1-1-29a
1-1-29b

मङ्गल्यं मङ्गलं विष्णुं वरेण्यमनघं शुचिम्।
नमस्कृत्य हृषीकेशं चराचरगुरुं हरिम्।।

1-1-30a
1-1-30b

महर्षेः पूजितस्येह सर्वलोकैर्महात्मनः।
प्रवक्ष्यामि मतं पुण्यं व्यासस्याद्भुतकर्मणः।।

1-1-31a
1-1-31b

`नमो भगवते तस्मै व्यासायामिततेजसे।
यस्य प्रसादाद्वक्ष्यामि नारायणकथामिमाम्।।

1-1-32a
1-1-32b

सर्वाश्रमाभिशमनं सर्वतीर्थावगाहनम्।
न तथा फलद सूते नारायणकथा यथा।।

1-1-33a
1-1-33b

नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति।
एतेन सत्यवाक्येन सर्वार्थान्साधयाम्यहम्'।।

1-1-34a
1-1-34b

आचख्युः कवयः केचित्संप्रत्याचक्षते परे।
आख्यास्यन्ति तथैवान्य इतिहासमिमं भुवि।।

1-1-35a
1-1-35b

इदं तु त्रिषु लोकेषु महज्ज्ञानं प्रतिष्ठितम्।
विस्तरैश्च समासैश्च धार्यते यद्द्विजातिभिः।।

1-1-36a
1-1-36b

अलङ्कृतं शुभैः शब्दैः समयैर्दिव्यधनुषैः।
छन्दोवृत्तैश्च विविधैरन्वितं विदुषांप्रियम्।।

1-1-37a
1-1-37b

तपसा ब्रह्मचर्येण व्यस्य वेदं सनातनम्।
इतिहासमिमं चक्रे पुण्यं सत्यवतीसुतः।।

1-1-38a
1-1-38b

`पुण्ये हिमवतः पादे मेध्ये गिरिगुहालये।
विशोध्य देहं धर्मात्मा दर्भसंस्तरमाश्रितः।।

1-1-39a
1-1-39b

शुचिः सनियमो व्यासः शान्तात्मातपसि स्थितः
भारतस्येतिहासस्य धर्मेणान्वीक्ष्य तां गतिम्।।

1-1-40a
1-1-40b

प्रविश्य योगं ज्ञानेन सोऽपश्यत्सर्वमन्ततः।।

1-1-41a

निष्प्रभेऽस्मिन्निरालोके सर्वतस्तमसा वृते।
बृहदण्डमभूदेकं प्रजानां बीजमव्ययम्।।

1-1-42a
1-1-42b

युगस्यादिनिमित्तं तन्महद्दिव्यं प्रचक्षत।
व्यस्मिंस्तच्छ्रूयते सत्यंज्योतिर्ब्रह्म सनातनम्।।

1-1-43a
1-1-43b

अद्भुतं चाप्यचिन्त्यं च सर्वत्र समतां मतम्।
अव्यक्तं कारणं सूक्ष्मं यत्तत्सदसदात्मकम्।।

1-1-44a
1-1-44b

यस्मिन्पितामहो जज्ञे प्रभुरेकः प्रजापतिः।
ब्रह्मा सुरगुरुः स्थाणुर्मनुः कः परमेष्ठ्यथ।।

1-1-45a
1-1-45b

प्राचेतसस्तथा दक्षो दक्षपुत्राश्च सप्तवै।
ततः प्रजानां पतयः प्राभवन्नेकविंशतिः।।

1-1-46a
1-1-46b

पुरुषश्चाप्रमेयात्मा यं सर्वऋषयो विदु।
विश्वेदेवास्तथाऽऽदित्या वसवोऽथाश्विनावपि।।

1-1-47a
1-1-47b

यक्षाः साध्याः पिशाचाश्च गुह्यकाः पितरस्तथा।
ततः प्रसूता विद्वांसः शिष्टा ब्रह्मर्षिसत्तमाः।।

1-1-48a
1-1-48b

महर्षयश्च बहवः सर्वैः समुदिता गुणैः।
आतो द्यौः पृथिवी वायुरन्तरिक्षं दिशस्तया।।

1-1-49a
1-1-49b

संवत्सरर्तवो मासाः पक्षाहोरात्रयः क्रमात्।
यच्चान्यदपि तत्सर्वं संभूतं लोकसाक्षिकम्।।

1-1-50a
1-1-50b

यदिदं दृश्यते किंचिद्बूतं स्थावरजङ्गमम्।
पुनःसंक्षिप्यते सर्वं जगत्प्राप्ते युगक्षये।।

1-1-51a
1-1-51b

यथर्तुष्वृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्यये।
दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा भावा युगादिषु।।

1-1-52a
1-1-52b

एवमेतदनाद्यन्तं भूतसंघातकारकम्।
अनादिनिधनं लोके चक्रं संपरिवर्तते।।

1-1-53a
1-1-53b

त्रयस्त्रिंशत्सहस्राणि त्रयस्त्रिंशच्छतानि च।
त्रयस्त्रिंशच्च देवनां सृष्टिः संक्षेपलक्षणा।।

1-1-54a
1-1-54b

दिवः पुत्रो बृहद्भानुश्चक्षुरात्मा विभावसुः।
सविता स ऋचीकोऽर्को भानुराशावहो रविः।।

1-1-55a
1-1-55b

पुत्रा विवस्वतः सर्वे मनुस्तेषां तथाऽवरः।
देवभ्राट् तनयस्तस्य सुभ्राडिति ततः स्मृतः।।

1-1-56a
1-1-56b

सुभ्राजस्तु त्रयः पुत्राः प्रजावन्तो बहुश्रुताः।
दशज्योतिः शतज्योतिः सहस्रज्योतिरेव च।।

1-1-57a
1-1-57b

दशपुत्रसहस्राणि दशज्योतेर्महात्मनः।
ततो दशगुणाश्चान्ये शतज्योतेरिहात्मजाः।।

1-1-58a
1-1-58b

भूयस्ततो दशगुणाः सहस्रज्योतिषः सुताः।
तेभ्योऽयं कुरुवंशश्च यदूनां भरतस्य च।।

1-1-59a
1-1-59b

ययातीक्ष्वाकृवंशश्च राजर्षीणां च सर्वशः।
संभूता बहवो वंशा भूतसर्गाः सुविस्तराः।।

1-1-60a
1-1-60b

भूतस्थानानि सर्वाणि रहस्यं त्रिविधं च यत्।
वेदा योगः सविज्ञानो धर्मोऽर्थः काम एव च।।

1-1-61a
1-1-61b

धर्मार्थकामयुक्तानि शास्त्राणि विविधानि च।
लोकयात्राविधान च सर्व तद्दृष्टवानृषिः।।

1-1-62a
1-1-62b

`नीतिर्भरतवंशस्य विस्तारश्चैव सर्वशः।'
इतिहासाः सहव्याख्या विविधाश्रुतयोऽपि च।।

1-1-63a
1-1-63b

इह सर्वमनुक्रान्तमुक्तं ग्रन्थस्य लक्षणम्।
`संक्षेपेणेतिहासस्य ततो वक्ष्यति विस्तरम्।।'

1-1-64a
1-1-64b

विस्तीर्यैतन्महज्ज्ञानमृषिः संक्षिप्य चाब्रवीत्।
इष्टं हि विदुषां लोके समासव्यासधारणम्।।

1-1-65a
1-1-65b

मन्वादि भारतं केचिदास्तीकादि तथाऽपरे।
तथोपरिचराद्यन्ये विप्राः सम्यगधीयिरे।।

1-1-66a
1-1-66b

विविधं संहिताज्ञानं दीपयन्ति मनीषिणः।
व्याख्यातुं कुशलाः केचिद्ग्रन्थान्धारयितुं परे।।

1-1-67a
1-1-67b

तपसा ब्रह्मचर्येण व्यस्य वेदं सनातनम्।
इतिहासमिमं चक्रे पुण्यं सत्यवतीत्सुतः।।

1-1-68a
1-1-68b

पराशरात्मजो विद्वान्ब्रह्मर्षिः संशितव्रतः।
मातुर्नियोगाद्धर्मात्मा गाङ्गेयस्य च धीमतः।।

1-1-69a
1-1-69b

क्षेत्रे विचित्रवीर्यस्य कृष्णद्वैपायनः पुरा।
त्रीनग्नीनिव कौरव्याञ्जनयामास वीर्यवान्।।

1-1-70a
1-1-70b

उत्पाद्य धृतराष्ट्रं च पाण्डुं विदुरमेव च।
जगाम तपसे धीमान्पुनरेवाश्रमं प्रति।।

1-1-71a
1-1-71b

तेषु जातेषु वृद्धेषु गतेषु परमां गतिम्।
अब्रवीद्भारतं लोके मानुषेऽस्मिन्महानृषिः।।

1-1-72a
1-1-72b

जनमेजयेन पृष्टः सन्ब्राह्मणैश्च सहस्रशः।
शशास शिष्यमासीनं वैशंपायनमन्तिके।।

1-1-73a
1-1-73b

स सदस्यैः सहासीनं श्रावयामास भारतम्।
कर्मान्तरेषु यज्ञस्य चोद्यमानः पुनः पुनः।।

1-1-74a
1-1-74b

विस्तारं कुरुवंशस्य गान्धार्या धर्मशीलताम्।
क्षत्तुः प्रज्ञां धृतिं कुन्त्याः सम्यग्द्वैपायनोब्रवीत्।।

1-1-75a
1-1-75b

वासुदेवस्य माहात्म्यं पाण्डवानां च सत्यताम्।
दुर्वृत्तं धार्तराष्ट्राणामुक्तवान्भगवानृषिः।।

1-1-76a
1-1-76b

इदं शतसहस्रं तु श्लोकानां पुण्यकर्मणाम्।
उपाख्यानैः सह ज्ञेयं श्राव्यं भारतमुत्तमम्।।

1-1-77a
1-1-77b

चतुर्विंशतिसाहस्रीं चक्रे भारतसंहिताम्।
उपाख्यानैर्विना तावद्भारतं प्रोच्यते बुधैः।।

1-1-78a
1-1-78b

ततोऽध्यर्धशतं भूयः संक्षेपं कृतवानृषिः।
अनुक्रमणिकाध्यायं वृत्तान्तं सर्वपर्वणाम्।।

1-1-79a
1-1-79b

तस्याख्यानवरिष्ठस्य कृत्वा द्वैपायनः प्रभुः।
कथमध्यापयानीह शिष्यानित्यन्वचिन्तयत्।।

1-1-80a
1-1-80b

तस्य तच्चिन्तितं ज्ञात्वा ऋषेर्द्वैपायनस्य च।
तत्राजगाम भगवान्ब्रह्मा लोकगुरुः स्वयम्।।

1-1-81a
1-1-81b

प्रीत्यर्थं तस्य चैवर्षेर्लोकानां हितकाम्यया।
तं दृष्ट्वा विस्मितो भूत्वा प्राञ्जलिः प्रणतः स्थितः।।

1-1-82a
1-1-82b

आसनं कल्पयामास सर्वैर्मुनिगणैर्वृतः।।

1-1-83a

हिरण्यमर्भमासीनं तस्मिंस्तु परमासने।
परिवृत्यासनभ्याशे वासवेयः स्थितोऽभवत्।।

1-1-84a
1-1-84b

अनुज्ञातोऽथ कृष्णस्तु ब्रह्मणा परमेष्ठिना।
निषसादासनाभ्याशे प्रीयमाणः शुचिस्मितः।।

1-1-85a
1-1-85b

उवाच स महातेजा ब्रह्माणं परमेष्ठिनम्।
कृतं मयेदं भगवन्काव्यं परमपूजितम्।।

1-1-86a
1-1-86b

ब्रह्मन्वेदरहस्य च यच्चान्यत्स्थापितं मया।
साङ्गोपनिषदां चैव वेदानां विस्तरक्रिया।।

1-1-87a
1-1-87b

इतिहासपुरापानामुन्मेषं निमिषं च यत्।
भूतं भव्यं भविष्यच्च त्रिविधं कालसंज्ञितम्।।

1-1-88a
1-1-88b

जरामृत्युभयव्याधिभावाभावविनिश्चयः।
विविधस्य च धर्मस्य ह्याश्रमाणां च लक्षणम्।।

1-1-89a
1-1-89b

चातुर्वर्ण्यविधानं च पुराणानां च कृत्स्नशः।
तपसो ब्रह्मचर्यस्य पृथिव्याश्चन्द्रसूर्ययोः।।

1-1-90a
1-1-90b

ग्रहनक्षत्रताराणां प्रमाणं च युगैः सह।
ऋचो यजूषि सामानि वेदाध्यात्मं तथैव च।।

1-1-91a
1-1-91b

न्यायशिक्षा चिकित्सा च दानं पाशुपतं तथा।
इति नैकाश्रयं जन्म दिव्यमानुषसंज्ञितम्।।

1-1-92a
1-1-92b

तीर्थानां चैव पुण्यानां देशानां चैव कीर्तनम्।
नदीनां पर्वतानां च वनानां सागरस्य च।।

1-1-93a
1-1-93b

पुराणां चैव दिव्यानां कल्पानां युद्धकौशलम्।
वाक्यजातिविशेषाश्च लोकयात्राक्रमश्च यः।।

1-1-94a
1-1-94b

यच्चापि सर्वगं वस्तु तच्चैव प्रतिपादितम्।
परं न लेखकः कश्चिदेतस्य भुवि विद्यते।।

1-1-95a
1-1-95b

ब्रह्मोवाच।

1-1-96x

तपोविशिष्टदपि वै वसिष्ठान्मुनिपुंगवात्।
मन्ये श्रेष्ठव्यं त्वां वै रहस्यज्ञानवेदनात्।।

1-1-96a
1-1-96b

जन्मप्रभृति सत्यां ते वेद्मि गां ब्रह्मवादिनीम्।
त्वयाच काव्यमित्युक्तं तस्मात्काव्यं भविष्यति।।

1-1-97a
1-1-97b

अस्य काव्यस्य कवयो न समर्था विशेषणे।
विशेषणे गृहस्थस्य शेषास्त्रय इवाश्रमाः।।

1-1-98a
1-1-98b

`जडान्धबधिरोन्मत्तं तमोभूतं जगद्भवेत्।
यदि ज्ञानहुताशेन त्वया नोज्ज्वलियं भवेत्।।

1-1-99a
1-1-99b

तमसान्धस्य लोकस्य वेष्टितस्य स्वकर्मभिः।
ज्ञानाञ्जनशलाकाभिर्बुद्धिनेत्रोत्सवः कृतः'।।

1-1-100a
1-1-100b


त्वया भारतसूर्येण नृणां विनिहतं तमः।।

1-1-101a
1-1-101b

पुराणपूर्णचन्द्रेण श्रुतिज्योत्स्नाप्रकाशिना।
नृणां कुमुदसौम्यानां कृतं बुद्धिप्रसादनम्।।

1-1-102a
1-1-102b

इतिहासप्रदीपेन मोहावरणघातिना।
लोकगर्भगृहं कृत्स्नं यथावत्संप्रकाशितम्।।

1-1-103a
1-1-103b

संग्रहाध्यायबीजो वै पौलोमास्तीकमूलवान्।
संभवस्कन्धविस्तारः सभापर्वविटङ्कवान्।।

1-1-104a
1-1-104b

आरण्यपर्वरूपाढ्यो विराटोद्योगसारवान्।
भीष्मपर्वमहाशाखो द्रोणपर्वपलाशवान्।।

1-1-105a
1-1-105b

कर्णपर्वसितैः पुष्पैः शल्यपर्वसुगन्धिभिः।
स्त्रीपर्वैषीकविश्रामः शान्तिपर्वमहाफलः।।

1-1-106a
1-1-106b

अश्वमेधामृतसस्त्वाश्रमस्थानसंश्रयः।
मौसलश्रुतिसंक्षेपः शिष्टद्विजनिषेवितः।।

1-1-107a
1-1-107b

सर्वेषां कविमुख्यानामुपजीव्यो भविष्यति।
पर्जन्यइव भूतानामक्षयो भारद्रुमः।।

1-1-108a
1-1-108b

काव्यस्य लेखनार्थाय गणेशः स्मर्यतां मुने।

1-1-109a

सौतिरुवाच।

1-1-110x

एवमाभाष्य तं ब्रह्मा जगाम स्वं निवेशनम्।
भगवान्स जगत्स्रष्टा ऋषिदेवगणैः सह।।

1-1-110a
1-1-110b

ततः सस्मार हेरम्बं व्यासः सत्यवतीसुतः।।

1-1-111a

स्मृतमात्रो गणेशानो भक्तचिन्तितपूरकः।
तत्राजगाम विघ्नेशो वेदव्यासो यतः स्थितः।।

1-1-112a
1-1-112b

पूजितश्चोपविष्टश्च व्यासेनोक्तस्तदानघ।
लेखको भारतस्यास्य भव त्वं गणनायक।।
मयैव प्रोच्यमानस्य मनसा कल्पितस्य च।।

1-1-113a
1-1-113b
1-1-113c

श्रुत्वैतत्प्राह विघ्नेशो यदि मे लेखनी क्षणम्।
लिखतो नावतिष्ठेत तदा स्यां लेखको ह्यहम्।।

1-1-114a
1-1-114b

व्यासोऽप्युवाच तं देवमबुद्ध्वा मा लिख क्वचित्।
ओमित्युक्त्वा गणेशोपि बभूव किल लेखकः।।

1-1-115a
1-1-115b

ग्रन्थग्रन्थिं तदा चक्रे मुनिर्गूढं कुतूहलात्।
यस्मिन्प्रतिज्ञया प्राह मुनिर्द्वैपायनस्त्विदम्।।

1-1-116a
1-1-116b

अष्टौ श्लोकसहस्राणि अष्टौ श्लोकशतानि च।
अहं वेद्मि शुको वेत्ति संजयो वेत्ति वा न वा।।

1-1-117a
1-1-117b

तच्छ्लोककूटमद्यापि ग्रथितं सुदृढं मुने।
भेत्तुं न शक्यतेऽर्थस्यं गूढत्वात्प्रश्रितस्य च।।

1-1-118a
1-1-118b

सर्वज्ञोपि गणेशो यत्क्षणमास्ते विचारयन्।
तावच्चकार व्यासोपि श्लोकानन्यान्बहूनपि।।

1-1-119a
1-1-119b

तस्य वृक्षस्य वक्ष्यामि शाखापुष्पफलोदयम्।
स्वादुमेध्यरसोपेतमच्छेद्यममरैरपि।।

1-1-120a
1-1-120b

अनुक्रमणिकाध्यायं वृत्तान्तं सर्वपर्वणाम्।
इदं द्वैपायनः पूर्वं पुत्रमध्यापयच्छुकम्।।

1-1-121a
1-1-121b

ततोऽन्येभ्योऽनुरूपेभ्यः शिष्येभ्यः प्रददौ प्रभु
षष्टिं शतसहस्राणि चकारान्यां स संहिताम्।
त्रिंशच्छतसहस्रं च देवलोके प्रतिष्ठितम्।।

1-1-122a
1-1-122b
1-1-122c

पित्र्ये पञ्चदश प्रोक्तं रक्षोयक्षे चतुर्दश।
एकं शतसहस्रं तु मानुषेषु प्रतिष्ठितम्।।

1-1-123a
1-1-123b

नारदोऽश्रावयद्देवानसितो देवलः पितृन्।
गन्धर्वयक्षरक्षांसि श्रावयामास वै शुकः।।

1-1-124a
1-1-124b

`वैशंपायनविप्रर्षिः श्रावयामास पार्थिवम्।
पारिक्षितं महात्मानं नाम्ना तु जनमेजयम्'।।

1-1-125a
1-1-125b

अस्मिंस्तु मानुषे लोके वैशंपायन उक्तवान्।
शिष्यो व्यासस्य धर्मात्मा सर्ववेदविदां वरः।।

1-1-126a
1-1-126b

एकं शतसहस्रं तु मयोक्तं वै निबोधत।।

1-1-127a

दुर्योधनो मन्युमयो महाद्रुमः
कर्णः स्कन्धः शकुनिस्तस्य शाखाः।
दुश्शासनः पुष्पफले समृद्धे
मूलं राजा धृतराष्ट्रोऽमनीषि।

1-1-128a
1-1-128b
1-1-128c
1-1-128d

युधिष्ठिरे धर्ममयो महाद्रुमः
स्कन्धोऽर्जुनो भीमसेनोऽस्य शाखाः।
माद्रीसुतौ पुष्पफले समृद्धे
मूलं कृष्णो ब्रह्म च ब्राह्मणाश्च।।

1-1-129a
1-1-129b
1-1-129c
1-1-129d

पाण्डुर्जित्वा बहून्देशान्युधा विक्रमणेन च।
अरण्ये मृगयाशीलो न्यवसत्सजनस्तथा।।

1-1-130a
1-1-130b

मृगव्यवायनिधनात्कृच्छ्रां प्राप स आपदम्।
जन्मप्रभृति पार्थानां तत्राचारविधिक्रमः।।

1-1-131a
1-1-131b

मात्रोरभ्युपपत्तिश्च धर्मोपनिषदं प्रति।
धर्मानिलेन्द्रांस्ताभिः साऽऽजुहाव सुतवाञ्छया।।

1-1-132a
1-1-132b

`ततो धर्मोपनिषदं भूत्वा भर्तुः प्रिया पृथा।
धर्मानिलेन्द्रांस्ताभिः साऽऽजुहाव सुतवाञ्छया।।

1-1-133a
1-1-133b

तद्दत्तोपनिषन्माद्री चाश्विनावाजुहाव च।
जाताः पार्थास्ततः सर्वे कुन्त्या माद्र्याश्च मन्त्रतः।'
तापसैः सह संवृद्धा मातृभ्यां परिरक्षिताः।।

1-1-134a
1-1-134b
1-1-134c

मेध्यारण्येषु पुण्येषु महतामाश्रमेषु च।
`तेषु जातेषु सर्वेषु पाण्डवेषु महात्मसु।।

1-1-135a
1-1-135b

माद्र्या तु सह संगम्य ऋषिशापप्रभावतः।
मृतः पाण्डुर्महापुण्ये शतशृङ्गे महागिरौ।।'

1-1-136a
1-1-136b

ऋषिभिश्च समानीता धार्तराष्ट्रान्प्रति स्वयम्।
शिशवश्चाभिरूपाश्च जटिला ब्रह्मचारिणः।।

1-1-137a
1-1-137b

पुत्राश्च भ्रातरश्चेमे शिष्याश्च सुहृदश्च वः।
पाण्डवा एत इत्युक्त्वा मुनयोऽन्तर्हितास्ततः।।

1-1-138a
1-1-138b

तांस्तैर्निवेदितान्दृष्ट्वा पाण्डवान्कौरवास्तदा।
शिष्टाश्च वर्णाः पौरा ये ते हर्षाच्चुक्रुशुर्भृशम्।।

1-1-139a
1-1-139b

आहुः केचिन्न तस्यैते तस्यैत इति चापरे।
यदा चिरमृतः पाण्डुः कथं तस्येतदि चापरे।।

1-1-140a
1-1-140b

स्वागतं सर्वथा दिष्ट्या पाण्डोः पश्याम सन्ततिम्।
उच्यतां स्वागतमिति वाचोऽश्रूयन्त सर्वशः।।

1-1-141a
1-1-141b

तस्मिन्नुपरते शब्दे दिशः सर्वा निनादयन्।
अन्तर्हितानां भूतानां निःस्वनस्तुमुलीऽभवत्।।

1-1-142a
1-1-142b

पुष्पवृष्टिः शुभा गन्धाः शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनाः।
आसन्प्रवेशे पार्थानां तदद्भुतमिवाभवत्।।

1-1-143a
1-1-143b

तत्प्रीत्या चैव सर्वेषां पौराणां हर्षसंभवः।
शब्द आसीन्महांस्तत्र दिवस्पृक्कीर्तिवर्धनः।।

1-1-144a
1-1-144b

तेऽधीत्य निखिलान्वेदाञ्शास्त्राणि विविधानि च।
न्यवसन्पाण्डवास्तत्र पूजिता अकुतोभयाः।।

1-1-145a
1-1-145b

युधिष्ठिरस्य शौचेन प्रीताः प्रकृतयोऽभवन्।
धृत्या च भीमसेनस्य विक्रमेणार्जुनस्य च।।

1-1-146a
1-1-146b

गुरुशुश्रूषया कुन्त्या यमयोर्विनयेन च।
तुतोष लोकः सकलस्तेषां शौर्यगुणेन च।।

1-1-147a
1-1-147b

समवाये ततो राज्ञां कन्यां भर्तृस्वयंवराम्।
प्राप्तवानर्जुनः कृष्णां कृत्वा कर्म सुदुष्करम्।।

1-1-148a
1-1-148b

ततः प्रभृति लोकेऽस्मिन्पूज्यः सर्वधनुष्मताम्।
आदित्य इव दुष्प्रेक्ष्यः समरेष्वपि चाभवत्।।

1-1-149a
1-1-149b

स सर्वान्पार्थिवाञ्जित्वा सर्वांश्च महतो गणान्।
आजहारार्जुनो राज्ञो राजसूयं महाक्रतुम्।।

1-1-150a
1-1-150b


युधिष्ठिरेण संप्राप्तो राजसूयो महाक्रतुः।।

1-1-151a
1-1-151b

सुनयाद्वासुदेवस्य भीमार्जुनबलेन च।
घातयित्वा जरासन्धं चैद्यं च बलगर्वितम्।।

1-1-152a
1-1-152b

दुर्योधनं समागच्छन्नर्हणानि ततस्ततः।
मणिकाञ्चनरत्नानि गोहस्त्यश्वधनानि च।।

1-1-153a
1-1-153b

विचित्राणि च वासांसि प्रावारावरणानि च।
कम्बलाजिनरत्नानि राङ्कवास्तरणानि च।।

1-1-154a
1-1-154b

समृद्धां तां तथा दृष्ट्वा पाण्डवानां तदा श्रियम्।
ईर्ष्यासमुत्थः सुमहांस्तस्य मन्युरजायत।।

1-1-155a
1-1-155b

विमानप्रतिमां तत्र मयेन सुकृतां सभाम्।
पाण्डवानामुपहृतां स दृष्ट्वा पर्यतप्यत।।

1-1-156a
1-1-156b

तत्रावहसितश्चासीत्प्रस्कन्दन्निव संभ्रमात्।
प्रत्यक्षं वासुदेवस्य भीमेनानभिजातवत्।।

1-1-157a
1-1-157b

स भोगान्विविधान्भुञ्जन्रत्नानि विविधानि च।
कथितो धृतराष्ट्रस्य विवर्णो हरिणः कृशः।।

1-1-158a
1-1-158b

अन्वजानात्ततो द्यूतं धृतराष्ट्रः सुतप्रियः।
तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य कोपः समभवन्महान्।।

1-1-159a
1-1-159b

नातिप्रीतमनाश्चासीद्विवादांश्चान्वमोदत।
द्यूतादीननयान्घोरान्विविधांश्चाप्युपैक्षत।।

1-1-160a
1-1-160b

निरस्य विदुरं भीष्मं द्रोणं शारद्वतं कृपम्।
विग्रहे तुमुले तस्मिन्दहन्क्षत्रं परस्परम्।।

1-1-161a
1-1-161b

जयत्सु पाण्डुपुत्रेषु श्रुत्वा सुमहदप्रियम्।
दुर्योधनमतं ज्ञात्वा कर्णस्य शकुनेस्तथा।।

1-1-162a
1-1-162b

धृतराष्ट्रश्चिरं ध्यात्वा संजयं वाक्यमब्रवीत्।
शृणु संजय सर्वं मे नचासूयितुमर्हसि।।

1-1-163a
1-1-163b

श्रुतवानसि मेधावी बुद्धिमान्प्राज्ञसंमतः।
न विग्रहे मम मतिर्न च प्रीये कुलक्षये।।

1-1-164a
1-1-164b

न मे विशेषः पुत्रेषु स्वेषु पाम्डुसुतेषु वा।
वृद्धं मामभ्यसूयन्ति पुत्रा मन्युपरायणाः।।

1-1-165a
1-1-165b

अहं त्वचक्षुः कार्पण्यात्पुत्रप्रीत्या सहामि तत्।
मुह्यन्तं चानुमुह्यामि दुर्योधनमचेतनम्।।

1-1-166a
1-1-166b

राजसूये श्रियं दृष्ट्वा पाण्डवस्य महौजसः।
तच्चावहसनं प्राप्य सभारोहणदर्शने।।

1-1-167a
1-1-167b

अमर्षितः स्वयं जेतुमशक्तः पाण्डवान्रणे।
निरुत्साहश्च संप्राप्तुं सुश्रियं क्षत्रियोऽपि सन्।।

1-1-168a
1-1-168b

गान्धारराजसहितश्छद्मद्यूतममन्त्रयत्।
तत्र यद्यद्यथा ज्ञातं मयां संजय तच्छृणु।।

1-1-169a
1-1-169b

श्रुत्वा तु मम वाक्यानि बुद्धियुक्तानि तत्त्वतः।
ततो ज्ञास्यसि मां सौते प्रज्ञाटचक्षुषमित्युत।।

1-1-170a
1-1-170b

यदाऽश्रौषं धनुरायम्य चित्रं
विद्धं लक्ष्यं पातितं वै पृथिव्याम्।
कृष्णां हृतां प्रेक्षतां सर्वराज्ञां
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-171a
1-1-171b
1-1-171c
1-1-171d

यदाऽश्रौषं द्वारकायां सुभद्रां
प्रसह्योढां माधवीमर्जुनेन।
इन्द्रप्रस्थं वृष्णिवीरौ च यातौ
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-172a
1-1-172b
1-1-172c
1-1-172d

यदाऽश्रौषं देवराजं प्रवृष्टं
शरैर्दिव्यैर्वारितं चार्जुनेन।
अग्निं तथा तर्पितं खाण्डवे च
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-173a
1-1-173b
1-1-173c
1-1-173d

यदाऽश्रौषं जातुषाद्वेश्मनस्ता-
न्मुक्तान्पार्थान्पञ्च कुन्त्या समेतान्।
युक्तं चैषां विदुरं स्वार्थसिद्ध्यै
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-174a
1-1-174b
1-1-174c
1-1-174d

यदाऽश्रौषं द्रौपदीं रङ्गमध्ये
लक्ष्यं भित्त्वा निर्जितामर्जुनेन।
शूरान्पञ्चालान्पाण्डवेयांश्च युक्तां-
स्तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-175a
1-1-175b
1-1-175c
1-1-175d

यदाऽश्रौषं मागधानां वरिष्ठं
जरासन्धं क्ष्वमध्ये ज्वलन्तम्।
दोर्भ्यां हतं भीमसेनेन गत्वा
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-176a
1-1-176b
1-1-176c
1-1-176d

यदाऽश्रौषं दिग्जये पाण्डुपुत्रै-
र्वशीकृतान्भूमिपालान्प्रसह्य।
महाक्रतुं राजसूयं कृतं च
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-177a
1-1-177b
1-1-177c
1-1-177d

यदाऽश्रौषं द्रौपदीमश्रुकण्ठीं
सभां नीतां दुःखितामेकवस्त्राम्।
रजस्वलां नाथवतीमनाथव-
त्तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-178a
1-1-178b
1-1-178c
1-1-178d

यदाऽश्रौषं वाससां तत्र राशिं
समाक्षिपत्कितवो मन्दबुद्धिः।
दुःशासनो गतवान्नैवं चान्तं
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-179a
1-1-179b
1-1-179c
1-1-179d

यदाऽश्रौषं हृतराज्यं युधिष्ठिरं
पराजितं सौबलेनाक्षवत्याम्।
अन्वागतं भ्रातृभिरप्रमेयै-
स्तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-180a
1-1-180b
1-1-180c
1-1-180d

यदाश्रौषं विविधास्तत्र चेष्टा
धर्मात्मनां प्रस्थितानां वनाय।
ज्येष्ठप्रीत्या क्लिश्यतां पाण्डवानां
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-181a
1-1-181b
1-1-181c
1-1-181d

यदाऽ?श्रौषं स्नातकानां सहस्रै-
रन्वागतं धर्मराजं वनस्थम्।
भिक्षाभुजां ब्राह्मणानां महात्मनां
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-182a
1-1-182b
1-1-183c
1-1-183d

`यदाऽश्रौषं वनवासेन पार्था-
न्समागतान्महर्षिभिः पुराणैः।
उपास्यमानान्सगणैर्जातसख्यां-
स्तदा नाशंसे विजयाय संजर्य।।'

1-1-184a
1-1-184b
1-1-184c
1-1-184d

यदाश्रौषं त्रिदिवस्थं धनंजयं
शक्रात्साक्षाद्दिव्यमस्त्रं यथावत्।
अधीयानं शंसितं सत्यसन्धं
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-185a
1-1-185b
1-1-185c
1-1-185d

यदाऽश्रोषं कालकेयास्ततस्ते
पौलोमानो वरदानाच्च दृप्ताः।
देवैरजेया निर्जिताश्चार्जुनेन
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-186a
1-1-186b
1-1-186c
1-1-186d

यदाऽश्रौषमसुराणां वधार्थे
किरीटिनं यान्तममित्रकर्शनम्।
कृतार्थं चाप्यागतं शक्रलोका-
त्तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-187a
1-1-187b
1-1-187c
1-1-187d

`यदाऽश्रौषं तीर्थयात्राप्रवृत्तं
पाण्डोः सुतं सहितं लोमशेन।
बृहदश्वादक्षहृदयं च प्राप्तं
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।'

1-1-188a
1-1-188b
1-1-188c
1-1-188d

यदाऽश्रौषं वैश्रवणेन सार्धं
समागतं भीमन्यांश्च पार्थान्।
तस्मिन्देशे मानुषाणामगम्ये
तदा नाशंसि विजयाय संजया।।

1-1-189a
1-1-189b
1-1-189c
1-1-189d

यदाऽश्रौषं घोषयात्रागतानां
बन्धं गन्धर्वैर्मोक्षणं चार्जुनेन।
स्वेषां सुतानां कर्णबुद्धौ रतानां
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-190a
1-1-190b
1-1-190c
1-1-190d

यदाऽश्रौषं यक्षरूपेण धर्मं
समागतं धर्मराजेन सूत।
प्रश्नान्कांश्चिद्विब्रुवाणं च सम्यक्
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-191a
1-1-191b
1-1-191c
1-1-191d

यदाऽश्रौषं न विदुर्मामकास्तान्
प्रच्छन्नरूपान्वसतः पाण्डवेयान्।
विराटराष्ट्रे सह कृष्णया च
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-192a
1-1-192b
1-1-192c
1-1-192d

`यदाऽश्रौषं कीचकानां वरिष्ठं
निषूदितं भ्रातृशतेन सार्धम्।
द्रौपद्यर्थे भीमसेनेन सङ्ख्ये
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।'

1-1-193a
1-1-193b
1-1-193c
1-1-193d

यदाऽश्रौषं मामकानां वरिष्ठा-
न्धनंजयेनैकरथेन भग्नान्।
विराटराष्ट्रे वसता महात्मना
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-194a
1-1-194b
1-1-194c
1-1-194d

यदाऽश्रौषं सत्कृतं मत्स्यराज्ञा
सुतां दत्तामुत्तरामर्जुनाय।
तां चार्जुनः प्रत्यगृह्णात्सुतार्थे
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-195a
1-1-195b
1-1-195c
1-1-195d

यदाऽश्रौषं निर्जितस्याधनस्य
प्रव्राजितस्य स्वजनात्प्रच्युतस्य।
अक्षौहिणीः सप्त युधिष्ठिरस्य
तदा नाशंसे विजयाय संजय।। 196 ।।

1-1-196a
1-1-196b
1-1-196c
1-1-196d

यदाऽश्रौषं माधवं वासुदेवं
सर्वात्मना पाण्डवार्थे निविष्टम्।
यस्येमां गां विक्रममेकमाहु-
स्तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-197a
1-1-197b
1-1-197c
1-1-197d

यदाऽश्रौषं नरनारायणौ तौ
कृष्णार्जुनौ वदतो नारदस्य।
अहं द्रष्टा ब्रह्मलोके च सम्यक्
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-198a
1-1-198b
1-1-198c
1-1-198d

यदाऽश्रौषं लोकहिताय कृष्णं
शमार्थिनमुपयातं कुरूणाम्।
शमं कुर्वाणमकृतार्थं च यातं
तदा नाशंसे विजयाय संजय।। 199 ।।

1-1-199a
1-1-199b
1-1-199c
1-1-199d


बुद्धिं कृतां निग्रहे केशवस्य।
तं चात्मानं बहुधा दर्शयानं
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-200a
1-1-200b
1-1-200c
1-1-200d

यदाऽश्रौषं वासुदेवे प्रयाते
रथस्यैकामग्रतस्तिष्ठमानाम्।
आर्तां पृथां सान्त्वितां केशवेन
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-201a
1-1-201b
1-1-201c
1-1-201d

यदाऽश्रौषं मन्त्रिणं वासुदेवं
तथा भीष्मं शान्तनवं च तेषाम्।
भारद्वाजं चाशिषोऽनुब्रुवाणं
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-202a
1-1-202b
1-1-202c
1-1-202d

यदा कर्णो भीष्ममुवाच वाक्यं
नाहं योत्स्ये युध्यमाने त्वयीति।
हित्वा सेनामपचक्राम चापि
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-203a
1-1-203b
1-1-203c
1-1-203d

यदाऽश्रौषं वासुदेवार्जुनौ तौ
तथा धनुर्गाण्डिवमप्रमेयम्।
त्रीण्युग्रवीर्याणि समागतानि
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-204a
1-1-204b
1-1-204c
1-1-204d

यदाऽश्रौषं कश्ललेनाभिपन्ने
रथोपस्थे सीदमानेऽर्जुने वै।
कृष्णं लोकान्दर्शयानं शरीरे
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-205a
1-1-205b
1-1-205c
1-1-205d

यदाऽश्रौषं भीष्ममित्रकर्शनं
निघ्नन्तमाजावयुतं रथानाम्।
नैषां कश्चिद्वध्यते ख्यातरूप-
स्तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-206a
1-1-206b
1-1-206c
1-1-206d

यदाऽश्रौषं चापगेयेन सङ्ख्ये
स्वयं मृत्युं विहितं धार्मिकेण।
तच्चाकार्षुः पाण्डवेयाः प्रहृष्टा-
स्तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-207a
1-1-207b
1-1-207c
1-1-207d

यदाऽश्रौषं भीष्ममत्यन्तशूरं
हतं पार्थेनाहवेष्वप्रधृष्यम्।
शिखण्डिनं पुरतः स्थापयित्वा
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-208a
1-1-208b
1-1-208c
1-1-208d

यदाऽश्रौषं शरतल्पे शयानं
वृद्धं वीरं सादितं चित्रपुङ्खैः।
भीष्मं कृत्वा सोमकानल्पशेषां-
स्तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-209a
1-1-209b
1-1-209c
1-1-209d

यदाऽश्रौषं शान्तनवे शयाने
पानीयार्थे चोदितेनार्जुनेन।
भूमिं भित्त्वा तर्पितं तत्र भीष्मं
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-210a
1-1-210b
1-1-210c
1-1-210d

यदाश्रौषं शुक्रसूर्यौ च युक्तौ
कौन्तेयानामनुलोमौ जयाय।
नित्यं चास्माञ्श्वापदा भीषयन्ति
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-211a
1-1-211b
1-1-211c
1-1-211d

यदा द्रोणो विविधानस्त्रमार्गा-
न्निदर्शयन्समरे चित्रयोधी।
न पाण्डवाञ्श्रेष्ठतरान्निहन्ति
तदा नाशंसे विजयायं संजय।।

1-1-212a
1-1-212b
1-1-212c
1-1-212d

यदाऽश्रौषं चास्मदीयान्महारथा-
न्व्यवस्थितानर्जुनस्यान्तकाय।
संशप्तकान्निहतानर्जुनेन
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-213a
1-1-213b
1-1-213c
1-1-213d

यदाऽश्रौषं व्यूहमभेद्यमन्यै-
र्भारद्वाजेनात्तशस्त्रेण गुप्तम्।
भित्त्वा सौभद्रं वीरमेकं प्रविष्टं
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-214a
1-1-214b
1-1-214c
1-1-214d

यदाऽभिमन्युं परिवार्य बालं
सर्वे हत्त्वा हृष्टरूपा बभूवुः।
महारथाः पार्थमशक्नुवन्त-
स्तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-215a
1-1-215b
1-1-215c
1-1-215d

यदाऽश्रौषमभिमन्युं निहत्य
हर्षान्मूढान्क्रोशतो धार्तराष्ट्रान्।
क्रोधादुक्तं सैन्धवे चार्जुनेन
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-216a
1-1-216b
1-1-216c
1-1-216d

यदाऽश्रौषं सैन्धवार्थे प्रतिज्ञां
प्रतिज्ञातां तद्वधायार्जुनेन।
सत्यां तीर्णां शत्रुमध्ये च तेन
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-217a
1-1-217b
1-1-217c
1-1-217d

यदाऽश्रौषं श्रान्तहये धनंजये
मुक्त्वा हयान्पाययित्वोपवृत्तान्।
पुनर्युक्त्वा वासुदेवं प्रयातं
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-218a
1-1-218b
1-1-218c
1-1-218d

यदाऽश्रौषं वाहनेष्वक्षमेषु
रथोपस्थे तिष्ठता पाण्डवेन।
सर्वान्योधान्वारितानर्जुनेन
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-219a
1-1-219b
1-1-219c
1-1-219d

यदाऽश्रौषं नागबलैः सुदुःसहं
द्रोणानीकं युयुधानं प्रमथ्य।
यातं वार्ष्णेयं यत्र तौ कृष्णपार्थौ
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-220a
1-1-220b
1-1-220c
1-1-220d

यदाऽश्रौषं कर्णमासाद्य मुक्तं
वधाद्भीमं कुत्सयित्वा वचोभिः।
धनुष्कोट्याऽऽतुद्य कर्णेन वीरं
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-221a
1-1-221b
1-1-221c
1-1-221d

यदा द्रोणः कृतवर्मा कृपश्च
कर्णो द्रौणिर्मद्रराजश्च शूरः।
अमर्षयन्सैन्धवं वध्यमानं
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-222a
1-1-222b
1-1-222c
1-1-222d

यदाऽश्रौषं देवराजेन दत्तां
दिव्यां शक्तिं व्यंसितां माधवेन।
घटोत्कचे राक्षसे घोररूपे
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-223a
1-1-223b
1-1-223c
1-1-223d

यदाऽश्रौषं कर्णघटोत्कचाभ्यां
युद्धे मुक्तां सूतपुत्रेण शक्तिम्।
यया वध्यः समरे सव्यसाची
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-224a
1-1-224b
1-1-224c
1-1-224d

यदाऽश्रौषं द्रोणमाचार्यमेकं
धृष्टद्युम्नेनाभ्यतिक्रम्य धर्मम्।
रथोपस्थे प्रायगतं विशस्तं
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-225a
1-1-225b
1-1-225c
1-1-225d

यदाऽश्रौषं द्रौणिना द्वैरथस्थं
माद्रीसुतं नकुलं लोकमध्ये।
समं युद्धे मण्डलेभ्यश्चरन्तं
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-226a
1-1-226b
1-1-226c
1-1-226d

यदा द्रोणे निहते द्रोणपुत्रो
नारायणं दिव्यमस्त्रं विकुर्वन्।
नैषामन्तं गतवान्पाण्डवानां
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-227a
1-1-227b
1-1-227c
1-1-227d

यदाऽश्रौषं भीमसेनेन पीतं
रक्तं भ्रातुर्युधि दुःशासनस्य।
निवारितं नान्यतमेन भीमं
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-228a
1-1-228b
1-1-228c
1-1-228d

यदाऽश्रौषं कर्णमत्यन्तशूरं
हतं पार्थेनाहवेष्वप्रधृष्यम्।
तस्मिन्भ्रातृणां विग्रहे देवगुह्ये
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-229a
1-1-229b
1-1-229c
1-1-229d

यदाऽश्रौषं द्रोणपुत्रं च शूरं
दुःशासनं कृतवर्माणमुग्रम्।
युधिष्टिरं धर्मराजं जयन्तं
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-230a
1-1-230b
1-1-230c
1-1-230d

यदाऽश्रौषं निहतं मद्रराजं
रणे शूरं धर्मराजेन सूत।
सदा सङ्ग्रामे स्प्रधते यस्तु कृष्णं
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-231a
1-1-231b
1-1-231c
1-1-231d

यदाऽश्रौषं कलहद्यूतमूलं
मायाबलं सौबलं पाण्डवेन।
हतं सङ्ग्रामे सहदेवेन पापं
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-232a
1-1-232b
1-1-232c
1-1-232d

यदाऽश्रौषं श्रान्तमेकं शयानं
ह्रदं गत्वा स्तम्भयित्वा तदम्भः।
दुर्योधनं विरथं भग्नशक्तिं
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-233a
1-1-233b
1-1-233c
1-1-233d

यदाऽश्रौषं पाण्डवांस्तिष्ठमानान्
गत्वा ह्रदे वासुदेवेन सार्धम्।
अमर्षणं धर्षयतः सुतं मे
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-234a
1-1-234b
1-1-234c
1-1-234d

यदाऽश्रौषं विविधांश्चित्रमार्गान्
गदायुद्धे मण्डलशश्चरन्तम्।
मिथ्या हतं वासुदेवस्य बुद्ध्या
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-235a
1-1-235b
1-1-235c
1-1-235d

यदाऽश्रौषं द्रोणपुत्रादिभिस्तै-
र्हतान्पञ्चालान्द्रौपदेयांश्च सुप्तान्।
कृतं बीभत्समयशस्यं च कर्म
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-236a
1-1-236b
1-1-236c
1-1-236d

यदाऽश्रौषं भीमसेनानुयाते-
नाश्वत्थाम्ना परमास्त्रं प्रयुक्तम्।
क्रुद्धेनैषीकमवधीद्येन गर्भं
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-237a
1-1-237b
1-1-237c
1-1-237d

यदाऽश्रौषं ब्रह्मशिरोऽर्जुनेन
स्वस्तीत्युक्त्वाऽस्त्रमस्त्रेण शान्तम्।
अश्वत्थाम्ना मणिरत्नं च दत्तं
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-238a
1-1-238b
1-1-238c
1-1-238d

यदाऽश्रौषं द्रोणपुत्रेण गर्भे
वैराट्या वै पात्यमाने महास्त्रैः।
संजीवयामीति हरेः प्रतिज्ञां
तदा नाशंसे विजयाय संजय।।

1-1-239a
1-1-239b
1-1-239c
1-1-239d

द्वैपायनः केशवो द्रोणपुत्रं
परस्पेरणाभिशापैः शशाप।
बुद्ध्वा चाहं बुद्धिहीनोऽद्य सूत
संतप्ये वै पुत्रपौत्रैश्च हीनः।।

1-1-240a
1-1-240b
1-1-240c
1-1-240d

शोच्या गान्धारी पुत्रपौत्रैर्विहीना
तथा वध्वा पितृभिर्भ्रातृभिश्च।
कृतं कार्यं दुष्करं पाण्डवेयैः
प्राप्तं राज्यमसपत्नं पुनस्तैः।।

1-1-241a
1-1-241b
1-1-241c
1-1-241d

कष्टं युद्धे दश शेषाः श्रुता मे
त्रयोऽस्माकं पाण्डवानां च सप्त।
द्व्यूना विंशतिराहताऽक्षौहिणीनां
तस्मिन्सङ्ग्रामे भैरवे क्षत्रियाणाम्।।

1-1-242a
1-1-242b
1-1-242c
1-1-242d

तमस्त्वतीव विस्तीर्णं मोह आविशतीव माम्।
संज्ञां नोपलभे सूत मनो विह्वलतीव मे।।

1-1-243a
1-1-243b

सौतिरुवाच।

1-1-244x

इत्युक्त्वा धृतराष्ट्रोऽथ विलप्य बहु दुःखितः।
मूर्च्छितः पुनराश्वस्तः संजयं वाक्यमब्रवीत्।।

1-1-244a
1-1-244b

धृतराष्ट्र उवाच।

1-1-245x

संजयैवं गते प्राणांस्त्यक्तुमिच्छामि मा चिरम्।
स्तोकं ह्यपि न पश्यामि फलं जीवितधारणे।।

1-1-245a
1-1-245b

सौतिरुवाच।

1-1-246x

तं तथा वादिनं दीनं विलपन्तं महीपतिम्।
निःश्वसन्तं यथा नागं मुह्यमानं पुनः पुनः।।

1-1-246a
1-1-246b

गावल्गणिरिदं धीमान्महार्थं वाक्यमब्रवीत्।

1-1-247a

संजय उवाच।

1-1-247x

श्रुतवानसि वै राजन्महोत्साहान्महाबलान्।।

1-1-247b

द्वैपायनस्य वदतो नारदस्य च धीमतः।
महत्सु राजवंशेषु गुणैः समुदितेषु च।।

1-1-248a
1-1-248b

जातान्दिव्यास्त्रविदुषः शक्रप्रतिमतेजसः।
धर्मेण पृथिवीं जित्वा यज्ञैरिष्ट्वाप्तदक्षिणैः।।

1-1-249a
1-1-249b

अस्मिँल्लोके यशः प्राप्य ततः कालवशं गतान्।
शैब्यं महारथं वीरं सृंजयं जयतां वरम्।। 250 ||

1-1-250a
1-1-250b


बाह्लीकं दमनं चैद्यं शर्यातिमजितं नलम्।।

1-1-251a
1-1-251b

विश्वामित्रममित्रघ्नमम्बरीषं महाबलम्।
मरुत्तं मनुमिक्ष्वाकुं गयं भरतमेव च।।

1-1-252a
1-1-252b

रामं दाशरथिं चैव शशबिन्दुं भगीरथम्।
कृतवीर्यं महाभागं तथैव जनमेजयम्।।

1-1-253a
1-1-253b

ययातिं शुभकर्माणं देवैर्यो याजितः स्वयम्।
`चैत्ययूपाङ्किता भूमिर्यस्येयं सवनाकरा।।

1-1-254a
1-1-254b

इति राज्ञां चतुर्विंशन्नारदेन सुरर्षिणा।
पुत्रशोकाभितप्ताय पुरा श्वैत्याय कीर्तितम्।।

1-1-255a
1-1-255b

तेभ्यश्चान्ये गताः पूर्वं राजानो बलवत्तराः।
महारथा महात्मानः सर्वैः समुदिता गुणैः।।

1-1-256a
1-1-256b

पूरुः कुरुर्यदुः शूरो विष्वगश्वो महाद्युतिः।
अणुहो युवनाश्वश्च ककुत्स्थो विक्रमी रघुः।।

1-1-257a
1-1-257b

विजयो वीतिहोत्रोऽह्गो भवः श्वेतो बृहद्गुरुः।
उशीनरः शतरथः कङ्को दुलिदुहो द्रुमः।।

1-1-258a
1-1-258b

दम्भोद्भवः परो वेनः सगरः संकृतिर्निमिः।
अजेयः परशुः पुण्ड्रः शंभुर्देवावृधोऽनघः।।

1-1-259a
1-1-259b

देवाह्वयः सुप्रतिमः सुप्रतीको बृहद्रथः।
महोत्साहो विनीतात्मा सुक्रतुर्नैषधो नलः।।

1-1-260a
1-1-260b

सत्यव्रतः शान्तभयः सुमित्रः सुबलः प्रभुः।
जानुजङ्घोऽनरण्योऽर्कः प्रियभृत्यः शुचिव्रतः।।

1-1-261a
1-1-261b

बलबन्धुर्निरामर्दः केतुशृङ्गो बृहद्बलः।
धृष्टकेतुर्बृहत्केतुर्दीप्तकेतुर्निरामयः।।

1-1-262a
1-1-262b

अविक्षिच्चपलो धूर्तः कृतबन्धुर्दृढेषुधिः।
महापुराणसंभाव्यः प्रत्यङ्गः परहा श्रुतिः।।

1-1-263a
1-1-263b

एते चान्ये च राजानः शतशोऽथ सहस्रशः।
श्रूयन्ते शतशश्चान्ये सङ्ख्याताश्चैव पद्मशः।।

1-1-264a
1-1-264b

हित्वा सुविपुलान्भोगान्बुद्धिमन्तो महाबलाः।
राजानो निधनं प्राप्तास्तव पुत्रैर्महत्तरः।।

1-1-265a
1-1-265b

येषां दिव्यानि कर्माणि विक्रमस्त्याग एव च।
माहात्म्यमपि चास्तिक्यं सत्यं शौचं दयाऽर्जवम्।।

1-1-266a
1-1-266b

विद्वद्भिः कथ्यते लोके पुराणैः कविसत्तमैः।
सर्वर्द्धिगुणसंपन्नास्ते चापि निधनं गताः।।

1-1-267a
1-1-267b

तव पुत्रा दुरात्मानः प्रतप्ताश्चैव मन्युना।
लुब्धा दुर्वृत्तभूयिष्ठा न ताञ्छोचितुमर्हसि।।

1-1-268a
1-1-268b

श्रुतवानसि मेधावी बुद्धिमान्प्राज्ञसंमतः।
येषां शास्त्रानुगा बुद्धिर्न ते मुह्यन्ति भारत।।

1-1-269a
1-1-269b

निग्रहानुग्रहौ चापि विदितौ ते नराधिप।
नात्यन्तमेवानुवृत्तिः कार्या ते पुत्ररक्षणे।।

1-1-270a
1-1-270b

भवितव्यं तथा तच्च नानुशोचितुमर्हसि।
दैवं पुरुषकारेण को निवर्तितुमर्हति।।

1-1-271a
1-1-271b

विधातृविहितं मार्गं न कश्चिदतिवर्तते।
कालमूलमिदं सर्वं भावाभावौ सुखासुखे।।

1-1-272a
1-1-272b

कालः सृजति भूतानि कालः संहरते प्रजाः।
संहरन्तं प्रजाः कालं कालः शमयते पुनः।।

1-1-273a
1-1-273b

कालो विकुरुते भावान्सर्वांल्लोके शुभाशुभान्।
कालः संक्षिपते सर्वाः प्रजा विसृजते पुनः।।

1-1-274a
1-1-274b

कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः।
कालः सर्वेषु भूतेषु चरत्यविधतः समः।।

1-1-275a
1-1-275b

अतीतानागता भावा ये च वर्तन्ति सांप्रतम्।
तान्कालनिर्मितान्बुद्ध्वा न संज्ञां हातुमर्हसि।।

1-1-276a
1-1-276b

सौतिरुवाच।

1-1-277x

इत्येवं पुत्रशोकार्तं धृतराष्ट्रं जनेश्वरम्।
आश्वास्य स्वस्थमकरोत्सूतो गावल्गणिस्तदा।।

1-1-277a
1-1-277b

धृतराष्ट्रोऽपि तच्छ्रुत्वा धृतिमेव समाश्रयत्।
दिष्ट्येदमागतमिति मत्त्वा स प्राज्ञसत्तमः।।

1-1-278a
1-1-278b

लोकानां च हितार्थाय कारुण्यान्मुनिसत्तमः।
अत्रोपनिषदं पुण्यां कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत्।।

1-1-279a
1-1-279b

विद्वद्भिः कथ्यते लोके पुराणे कविसत्तमैः।
भारताध्ययनं पुण्यमपि पादमधीयतः।
श्रद्दधानस्य पूयन्ते सर्वपापान्यशेषतः।।

1-1-280a
1-1-280b
1-1-280c

देवा देवर्षयो ह्यत्र तथा ब्रह्मर्षयोऽमलाः।
कीर्त्यन्ते शुमकर्माणस्तथा यक्षा महोरगाः।।

1-1-281a
1-1-281b

भगवान्वासुदेवश्च कीर्त्यतेऽत्र सनातनः।
स हि सत्यमृतं चैव पवित्रं पुण्यमेव च।।

1-1-282a
1-1-282b

शाश्वतं ब्रह्म परमं ध्रुवं ज्योतिः सनातनम्।
यस्य दिव्यानि कर्माणि कथन्ति मनीषिणः।।

1-1-283a
1-1-283b

असत्सत्सदसच्चैव यस्माद्विश्वं प्रवर्तते।
सन्ततिश्च प्रवृत्तिश्च जन्ममृत्युपुनर्भवाः।।

1-1-284a
1-1-284b

अध्यात्मं श्रूयतें यत्र पञ्चभूतगुणात्मकम्।
अव्यक्तादि परं यच्च स एव परिगीयते।।

1-1-285a
1-1-285b

यं ध्यायन्ति सदा मुक्ता ध्यानयोगबलान्विताः।
प्रतिबिम्बमिवादर्शे पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्।।

1-1-286a
1-1-286b

श्रद्दधानः सदा युक्तः सदा धर्मपरायणः।
आसेवन्निममध्यायं नरः पापात्प्रमुच्यते।।

1-1-287a
1-1-287b

अनुक्रमणिकाध्यायं भारतस्येममादितः।
आस्तिकः सततं शृण्वन्न कृच्छ्रेष्ववसीदति।।

1-1-288a
1-1-288b

उभे सन्ध्ये जपन्किंचित्सद्यो मुच्येत किल्बिषात्।
अनुक्रमण्या यावत्स्यादह्नारात्र्या च संचितम्।।

1-1-289a
1-1-289b

भारतस्य वपुर्ह्येतत्सत्यं चामृतमेव च।
नवनीतं यथा दध्नो द्विपदां ब्राह्मणो यथा।।

1-1-290a
1-1-290b

आरण्यकं च वेदेभ्य ओषधिभ्योऽमृतं यथा।
ह्रदानामुदधिः श्रेष्ठो गौर्वरिष्ठा चतुष्पदाम्।।

1-1-291a
1-1-291b

यथैतानीतिहासानां तथा भारतमुच्यते।
यश्चैनं श्रावयेच्छ्राद्धे ब्राह्मणान्पादमन्ततः।।

1-1-292a
1-1-292b

अक्षय्यमन्नपानं वै पितृंस्तस्योपतिष्ठते।
इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत्।।

1-1-293a
1-1-293b

बिभेत्यल्पश्रुताद्वेदो मामयं प्रतरिष्यति।
कार्ष्णं वेदमिमं विद्वाञ्श्रावयित्वार्थमश्नुते।।

1-1-294a
1-1-294b

भ्रूणहत्यादिकं चापि पापं जह्यादसंशयम्।
य इमं शुचिरध्यायं पठेत्पर्वणि पर्वणि।।

1-1-295a
1-1-295b

अधीतं भारतं तेन कृत्स्नं स्यादिति मे मतिः।
यश्चैनं शृणुयान्नित्यमार्षं श्रद्धासमन्वितः।।

1-1-296a
1-1-296b

स दीर्घमायुः कीर्तिं च स्वर्गतिं चाप्नुयान्नरः।
एकतश्चतुरो वेदा भारतं चैतदेकतः।।

1-1-297a
1-1-297b

पुरा किल सुरैः सर्वैः समेत्य तुलया धृतम्।
चतुर्भ्यः सरहस्येभ्यो वेदेभ्यो ह्यधिकं यदा।।

1-1-298a
1-1-298b

तदाप्रभृति लोकेऽस्मिन्महाभारतमुच्यते।
महत्त्वे च गुरुत्वे च ध्रियमाणं यतोऽधिकम्।।

1-1-299a
1-1-299b

महत्त्वाद्भारवत्त्वाच्च महाभारतमुच्यते।
निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते।।

1-1-300a
1-1-300b

तपो नकल्कोऽध्ययनं नकल्कः
स्वाभाविको वेदविधिर्नकल्कः।
प्रसह्य वित्ताहरणं नकल्क-
स्तान्येव भावोपहतानि कल्कः।।

1-1-301a
1-1-301b
1-1-301c
1-1-301d

इति श्रीमन्माहाभारते आदिपर्वणि
अनुक्रमणिकापर्वणि प्रथमोऽध्यायः।। 1 ।।

।। अनुक्रमणिकापर्व समाप्तम् ।।

1-1-1 श्रीलक्ष्मीनृसिंहाय नमः।। श्रीहयग्रीवाय नमः।। श्रीवेदव्यासाय नमः।। इह खलु भगवान्पाराशर्यः परमकारुणिको मन्दमतीननुग्रहीतुं चतुर्दशविद्यास्थानान्येकत्र दिदर्शयिषुर्महाभारताख्यमितिहासं प्रणेष्यन्प्रारिप्सितस्य निष्प्रत्यूहारिपूरणाय प्रचयगमनाय च मङ्गलं रचयन् शिष्यशिक्षायै लोकरूपेम निबघ्नन्नर्यात्तत्र प्रेक्षावत्प्रवृत्त्यङ्गमभिधेयादि दर्शयति।। नारायणमिति।। नरोत्तमं पुरुषोत्तमं नारायणं नरं देवी सरस्वतीं (व्यासं) चैव नमस्कृत्य जयं भारताख्यमितिहासं उदीरयेत्।। 1-1-2 लक्षालङ्कारव्याख्यानरीत्यायमाद्यः श्लोकः।। 1-1-3 कतिपयकोशरीत्यायस्पद्यः।। 3 ।। 1-1-5 रोमहर्षणपुत्रः रोमाणि हर्षयाञ्चके श्रोतॄणा यः स्वभाषितैः। कर्मणा प्रथितस्तेन रोमहर्षणसंज्ञया। इति कौर्मे निरुक्तार्थनाम्नः पुत्रः। अग्रश्रवाः उग्रस्य नृसिंहस्य श्रवः श्रवणं यस्य सः। पौराणिकः पुराणे कृतश्रमः। नैमिशारण्ये वायवीये। एतन्मनोमयं चक्रं मया सृष्टं विसृज्यते। यत्रास्य शीर्यते नेमिः स देशस्तपसः शुभः। इत्युक्त्वा सूर्यसंकाशं चक्रं सृष्ट्वा मनोमयम्। प्रणिपत्य महादेवं विससर्ज पितामहः। तेपि हृष्टतरा विप्राः प्रणम्य जगतां प्रभुम्. प्रययुस्तस्य चक्रस्य यत्र नेमिर्व्यशीर्यत। तद्वनं तेन विख्यातं नैमिशं मुनिपूजितम्। इति उक्तरूपे। नैमिषेति पाठे तु वाराहे। एवं कृत्वा ततो देवो मुनि गौरमुखं तदा। उवाच निमिषेणेदं निहतं दानवं बलं। अरण्येऽस्मिंस्ततस्त्वेतन्नैमिषारण्यसंज्ञितं। इति निर्वचनं द्रष्टव्यं। शुनकस्य मुनेरपत्यं शौनकः। कुलपतेः। एको दशसहस्राणि योऽन्नदानादिना भरेत्। स वै कुलपतिः इत्युक्तलक्षणस्य। सत्रे ये यजमानास्तएव ऋत्विजो यस्मिन्बहुकर्तृके क्रतौ स सत्रसंज्ञ तस्मिन्।। 5 ।। 1-1-7 नैमिशारण्यवासिनः तान्सर्वानृषीनुवाचेत्यन्वयः।। 7 ।। 1-1-8 अहं तपोधनाः सिकीः सर्वाः कथा वेद जानामि।। 8 ।। 1-1-11 निर्दिष्टं इहोपविश्यतामिति दर्शितम्।। 11 ।। 1-1-12 प्रस्तावयन् उपोद्धातयन्।। 12 ।। 1-1-13 विहृतः नीतः।। 13 ।। 1-1-14 तेषां मुनीनां चादन्येषां राजादीनां च यानि चरितानि तेषामाश्रयभूतम्। भावितात्मनां शोधितचित्तानाम्।। 14 ।। 1-1-18 समन्तपञ्चकं समन्तात् पञ्चकं परशुरामकृतहृदपञ्चकं यस्मिंस्तत्। स्यमन्तपञ्चकमित्यपि पाठो दृश्यते।। 18 ।। 1-1-21 ब्रवीमि किमहं द्विजाः अहं च पुराणादिष्वन्यतमं किं ब्रवीमि तदाज्ञापयतेति शेषः।। 21 ।। 1-1-25 संस्कारोपगतां पदादिव्युत्पत्तिमतीम्। ब्राह्मो वाचं। ब्राह्मी तु भारती भाषेत्यमरः।। 25 ।। 1-1-28 मङ्गलाचरणपूर्वकं मुनिभिः प्रार्थितमर्थं वक्तुं प्रतिजानीते आद्यमित्यदिचतुर्भिः। हरिं नमस्कृत्य महर्षेर्मतं प्रवक्ष्यामीत्यन्वयः। पुरुहूतं पुरुभिर्बहुभिर्होतृभिः हूतं आहूतं। पुरुभिः सामगैः स्तुतं। ऋतं सत्यं। एकश्चासावक्षरश्च तं। एकं अद्वितीयं समाधिकरहितमिति वा। अक्षरं नाशरहितं। व्यख्यव्यक्तं रामकृष्णादिरूपेण दृश्यं। ज्ञानानन्दादिरूपेण मन्देरदृश्यं।। 28 ।। 1-1-30 मङ्गल्यं मङ्गलप्रदं।। 30 ।। 1-1-36 ज्ञानं ज्ञानसाधनं इदं भारत त्रिषु लोकेषु प्रतिष्ठितम्।। 36 ।। 1-1-37 समयैः संकेतैः। छन्दोवृत्तैः त्रिष्टुबादिछन्दोन्तीतैरिन्द्रवज्रादिभिर्वृत्तैः।। 37 ।। 1-1-45 यस्मिन् ब्रह्माण्डे।। 45 ।। 1-1-52 प्रतिकल्पं सृष्टेः समाननामरूपत्वमाह यथेति।। 52 ।। 1-1-53 कल्पानामानन्त्यमाह एवमिति।। 53 ।। 1-1-54 एवं जडसृष्टिमुक्त्वा चेतनसृष्टिमाह त्रयन्निंशदिति।। 54 ।। 1-1-61 भूतस्थानानि नृणां वासस्थानानि नगरादीनि।। 61 ।। 1-1-64 इह सर्वमनुकान्तं अनुकमेण उक्तं।। 64 ।। 1-1-65 समासः सङ्क्षेपः। व्यासो विस्तारः।। 65 ।। 1-1-66 भारतारम्भे मतभेदमाह मन्वादीति। मन्वादि मनुर्मन्त्रः नारायणं नमस्कृत्येति। ॐ नमो भगवते वासुदेवायेति वा तदादि। प्रस्तीकं आस्तीकचरितं तदादि। उपरिचरो वसुः तच्चरितादि वा।। 66 ।। 1-1-67 बह्वर्थत्वाद्विविधं संहिताज्ञानं दीपयन्ति प्रकाशयन्ति।। 67 ।। 1-1-69 महुः सत्यवत्याः। गाङ्गेयस्य भीष्मस्य।। 69 ।। 1-1-70 क्षत्र भार्यासु अम्बिकादिषु।। 70 ।। 1-1-71 परमां गतिं मृत्युं।। 71 ।। 1-1-73 शशासं त्वममन् भारतं श्रावयेत्याज्ञापितवान्।। 73 ।। 1-1-84 वसोः अपत्यं स्त्री वास्त्री तस्याः अपत्यं वासवेयो व्यासः।। 84 ।। 1-1-85 कृष्णो व्यासः।। 85 ।। 1-1-98 विशेषणे अतिशायने।। 98 ।। 1-1-104 विटङ्काः पक्ष्युपवेशनस्थानानि।। 104 ।। 1-1-105 सारो मज्जा।। 105 ।। 1-1-106 विश्रामः छाया।। 106 ।। 1-1-108 आश्रमस्थानसंश्रयः आश्रमवासिकस्यण्डिलः। मौसलश्रुतिसंक्षेपः मौसलादिग्रन्थः श्रुतिस्थानीयदीर्घशाखान्तः।। 108 ।। 1-1-112 यतः यत्र देशे।। 112 ।। 1-1-115 अबुद्ध्वा अर्थमिति शेषः। ओमित्यङ्गीकारे।। 115 ।। 1-1-116 अन्थग्रन्थिं ग्रन्थे दुर्भेद्यस्थानं।। 116 ।। 1-1-131 कृच्छ्रां आपदं व्यवायकाले मरिष्यसीत्येवं शापरूपां। तत्र आपदि एवं सत्यामपि पार्थानां पाण्डवानां जन्मप्रभृति आचारविधिक्रमः अभूदिति शेषः।। 131 ।। 1-1-132 आचारविधिक्रममेवाह। मात्रोरिति। मात्रोः कुन्तीमाद्योः। धर्मोपनिषदं प्रति आपदि अपत्यार्थे विशिष्टः पुमान्प्रार्थनीय इत्येवरूपं धर्मरहस्यं प्रति। अभ्युपपत्तिः अङ्गीकारः।। 132 ।। 1-1-137 धार्तराष्ट्रान्धृतराष्ट्रसंबन्धिगृहान्।। 137 ।। 1-1-142 अन्तर्हितानां भूतानां निःस्वनः पाण्डुपुत्रा एवैते इत्येवंरूपा अशरीरवाक्।। 142 ।। 1-1-148 भर्तारं स्वयमेव वृणुत इति भर्तृस्वयंवरां।। 148 ।। 1-1-150 राज्ञो युधिष्ठिरस्य।। 150 ।। 1-1-157 अनभिजातवत् ग्रामीणवत्।। 157 ।। 1-1-160 धृतराष्ट्रो यद्विवादानन्वमोदत यच्चानयानुपैक्षत तस्माद्वासुदेवस्य कोपः समभवत्।। 160 ।। 1-1-161 दहन् अदहत्।। 161 ।। 1-1-173 प्रवृष्टं वर्षणे प्रवृत्तं।। 173 ।। 1-1-181 चेष्टाः बाहुवीक्षणाद्याः।। 181 ।। 1-1-182 स्नातकानां समापितविद्याव्रतानां ब्राह्मणानां।। 182 ।। 1-1-185 शंसितं प्रशस्यं।। 185 ।। 1-1-197 इमां गां पृथिवीं यस्य वासुदेवस्य एकं विक्रमं पदमात्रमाहुः।। 197 ।। 1-1-198 यौ नरनारायणौ ब्रह्मलोके अहं द्रष्टा अद्राक्षं तौ कृष्णार्जुनौ अर्जुनकृष्णौ इति वदतो नारदस्य नारदात्।। 198 ।। 1-1-200 बहुधा विश्वरूपत्वेन।। 200 ।। 1-1-202 तेषां पाण्डवानां।। 202 ।। 1-1-209 सोमकानेव अल्पशेषान्कृत्वा।। 209 ।। 1-1-210 चोदितमर्जुनं च। गां भित्त्वाम्बो वारुणेनाददाने इति पाठान्तरं।। 210 ।। 1-1-223 व्यंसितां व्यर्थीकृतां।। 223 ।। 1-1-237 क्रुद्धेनैषीकं चावधीद्यन्न गर्भं इति पाठान्तरम्।। 1-1-280 पूयन्ते नश्यन्ति।। 280 ।। 1-1-294 कार्ष्णं कृष्णेन व्यासेन प्रोक्तं।। 294 ।। 1-1-301 ननु वेदेभ्यः कथमिदमधिकं अत्र युद्धप्रधानानां कर्मणां बन्धनहेतूनां कथनादुपनिषदि तावन्मोक्षसाधनानां धर्माणां ब्रह्मणश्च प्रतिपादनादिति चेत्तत्राह। तप इति। तपः कृच्छ्रचान्द्रायणादि नकल्कः पापनाशकं। स्वाभाविकः स्वस्ववर्णाश्रमादिपुरस्कारेण विहितः। वेदविधिः वेदोक्तो विधिः सन्ध्योपासनादिः। प्रसह्य प्रकर्षेण सोढ्वा क्षुधादिदुःखमपि सोढ्वा। वित्तस्य आहरणं शिलोञ्छादिना अर्जनं। तान्येव तपआदीन्येव भावेन फलानुसन्धानेन उपहतानि प्रतिषिद्धानि। कल्कः पापहेतुः। तथाचात्रापि मोक्षधर्मादिषु तत्रतत्र निष्कामकर्मणां प्रतिपादनं ब्रह्मनिरूपणं चास्त्येव। अतो वेदादप्युत्तमं भारतं।। 301 ।। इति टिप्पणे प्रथमोऽध्यायः।। 1 ।।

आदिपर्व अध्यायाः पुटाग्रे अल्लिखितम्। आदिपर्व-002