महाभारतम्-13-अनुशासनपर्व-254

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वैशम्पायन उवाच। 13-254-1x
श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः।
युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत।।
13-254-1a
13-254-1b
किमेकं दैवतं लोके किं वाऽप्येकं परायणम्।
स्तुवन्तः कं कर्मर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम्।।
13-254-2a
13-254-2b
को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः।
किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात्।।
13-254-3a
13-254-3b
भीष्म उवाच। 13-254-4x
जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम्।
स्तुवन्नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः।।
13-254-4a
13-254-4b
तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम्।
ध्यायन्स्तुवन्नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च।।
13-254-5a
13-254-5b
अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम्।
लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःकातिगो भवेत्।।
13-254-6a
13-254-6b
ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम्।
लोकनाथं महद्भूतं सर्वबूतभवोद्भवम्।।
13-254-7a
13-254-7b
एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः।
यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा।।
13-254-8a
13-254-8b
परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः।
परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम्।।
13-254-9a
13-254-9b
पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम्।
दैवतं देवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता।।
13-254-10a
13-254-10b
यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे।
यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये।।
13-254-11a
13-254-11b
तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते।
विष्णोर्नामसहस्रं मे शृणु पापभयापहम्।।
13-254-12a
13-254-12b
यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः।
ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये।।
13-254-13a
13-254-13b
`ऋषिर्नाम्नां सहस्रस्य देवव्यासो महामुनिः।
छन्दोनुष्टुप्तथा देवो भगवान्देवकीसुतः।।
13-254-14a
13-254-14b
अमुतांशूद्भवो बीजं शक्तिर्देवकिनन्दनः।
त्रिसाम हृदयं तस्य शान्त्यर्थे विनियुज्यते।।'
13-254-15a
13-254-15b
ओं विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः।
भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः।।
13-254-16a
13-254-16b
पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च।।
13-254-17a
13-254-17b
योगो योगविदांनेता प्रधानपुरुषेश्वरः।
नरसिंहवपुः श्रीमान्केशवः पुरुषोत्तमः।।
13-254-18a
13-254-18b
सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः।
सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः।।
13-254-19a
13-254-19b
स्वयंभूः शंभुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः।
अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः।।
13-254-20a
13-254-20b
अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः।।
13-254-21a
13-254-21b
अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः।
प्रभूतस्त्रिककुद्धाम पवित्रं मङ्गलं परम्।।
13-254-22a
13-254-22b
ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः।
हिरण्यगर्भो भूगर्भो माघवो मधुसूदनः।।
13-254-23a
13-254-23b
ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान्।।
13-254-24a
13-254-24b
सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः।
अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः।।
13-254-25a
13-254-25b
अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः।
वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः।।
13-254-26a
13-254-26b
वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्मा सम्मितः समः।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः।।
13-254-27a
13-254-27b
रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः।
अमृतः शाश्वतः स्थापुर्वरारोहो महातपाः।।
13-254-28a
13-254-28b
सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः।
वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित्कविः।।
13-254-29a
13-254-29b
लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः।
चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः।।
13-254-30a
13-254-30b
भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः।
अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसु।।
13-254-31a
13-254-31b
उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः।
अतीन्द्रः सङ्ग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमोयमः।।
13-254-32a
13-254-32b
वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः।
अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः।।
13-254-33a
13-254-33b
महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः।
अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक्।।
13-254-34a
13-254-34b
महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सताङ्गतिः।
अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदाम्पतिः।।
13-254-35a
13-254-35b
मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः।
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः।।
13-254-36a
13-254-36b
अमृत्युः सर्वदृक्सिंहः सन्धाता सन्धिमान्स्थिरः।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा।।
13-254-37a
13-254-37b
गुरुर्गरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः।
निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः।।
13-254-38a
13-254-38b
अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान्न्यायो नेता समीरणः।
सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात्।।
13-254-39a
13-254-39b
आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः।
अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः।।
13-254-40a
13-254-40b
सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वदृग्विश्वभुग्विभुः।
सत्कर्ता सत्कृतिः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः।।
13-254-41a
13-254-41b
असंख्येयोप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः।
सिद्धार्थः सिद्धसङ्कल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः।।
13-254-42a
13-254-42b
वृषाहिर्वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः।।
13-254-43a
13-254-43b
सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः।
नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः।।
13-254-44a
13-254-44b
ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः।
ऋद्धः स्पृष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः।।
13-254-45a
13-254-45b
अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः।
औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः।।
13-254-46a
13-254-46b
भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः।
कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः।।
13-254-47a
13-254-47b
युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः।
अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित्।।
13-254-48a
13-254-48b
इष्टो विशिष्टः शिष्टेष्ट शिखण्डी नहुषो वृषः।
क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः।।
13-254-49a
13-254-49b
अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः।
अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः।।
13-254-50a
13-254-50b
स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः।
वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरंदरः।।
13-254-51a
13-254-51b
अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः।
अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः।।
13-254-52a
13-254-52b
पद्मनाबोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत्।
महर्द्धिर्ऋद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वक्षः।।
13-254-53a
13-254-53b
अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः।
सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान्समितिंजयः।।
13-254-54a
13-254-54b
विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः।
महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः।।
13-254-55a
13-254-55b
उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः।
करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः।।
13-254-56a
13-254-56b
व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः।
परर्द्धिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः।।
13-254-57a
13-254-57b
रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयोऽनयः।
वीरः शक्तिमतांश्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः।।
13-254-58a
13-254-58b
वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः।
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः।।
13-254-59a
13-254-59b
ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः।
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः।।
13-254-60a
13-254-60b
विस्तारः स्थावरः स्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम्।
अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः।।
13-254-61a
13-254-61b
अनिर्विण्णः स्थविष्ठो भूर्धर्मयूपो महामखः।
नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः।।
13-254-62a
13-254-62b
यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सताङ्गतिः।
सर्वदर्शी वमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम्।।
13-254-63a
13-254-63b
सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत्।
मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः।।
13-254-64a
13-254-64b
स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत्।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः।।
13-254-65a
13-254-65b
धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम्।
अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः।।
13-254-66a
13-254-66b
गभस्तिनेमिः सत्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः।।
13-254-67a
13-254-67b
उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः।
शरीरी भूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः।।
13-254-68a
13-254-68b
सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः।
विनयोज्यः सत्यसन्धो दाशार्हः सात्वतांपतिः।।
13-254-69a
13-254-69b
जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः।
अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः।।
13-254-70a
13-254-70b
अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः।
आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः।।
13-254-71a
13-254-71b
महर्षिः कपिलाचार्य कृतज्ञो मेदिनीपतिः।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत्।।
13-254-72a
13-254-72b
महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी।
गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः।।
13-254-73a
13-254-73b
वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः सङ्कर्षणोच्युतः।
वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः।।
13-254-74a
13-254-74b
भगवान्भगहा नन्दी वनमाली हलायुधः।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः।।
13-254-75a
13-254-75b
सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः।
दिवस्पृक्सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः।।
13-254-76a
13-254-76b
त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक्।
संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम्।।
13-254-77a
13-254-77b
शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः।
गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः।।
13-254-78a
13-254-78b
अनिवर्ती निवृत्तात्मा संक्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतांवरः।।
13-254-79a
13-254-79b
श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः।
श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः।।
13-254-80a
13-254-80b
स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः।
विजितात्मा विधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः।।
13-254-81a
13-254-81b
उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतः स्थिरः।
भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः।।
13-254-82a
13-254-82b
अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः।
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः।।
13-254-83a
13-254-83b
कालनेमिनिहा वीरः शौरिः सूरजनेश्वरः।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः।।
13-254-84a
13-254-84b
कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनञ्जयः।।
13-254-85a
13-254-85b
ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः।
ब्रह्मविद्ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः।।
13-254-86a
13-254-86b
महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः।।
13-254-87a
13-254-87b
स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिःस्तोता रणप्रियः।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः।।
13-254-88a
13-254-88b
मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः।।
13-254-89a
13-254-89b
सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः।।
13-254-90a
13-254-90b
भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः।
दर्पहा दर्पहो दृप्तो दुर्धरोऽद्धाऽपराजितः।।
13-254-91a
13-254-91b
विश्वमूर्तिर्महमूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान्।
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः।।
13-254-92a
13-254-92b
एको नैकः सवः कः किं यत्तत्पदमनुत्तमम्।
लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः।।
13-254-93a
13-254-93b
सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी।
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः।।
13-254-94a
13-254-94b
अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृत्।
सुमेधा मेघजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः।।
13-254-95a
13-254-95b
तेजो वृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतांवरः।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः।।
13-254-96a
13-254-96b
चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः।
चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वदविदेकपात्।।
13-254-97a
13-254-97b
समावर्तो निवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः।
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा।।
13-254-98a
13-254-98b
शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः।
इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः।।
13-254-99a
13-254-99b
उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः।
अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी।।
13-254-100a
13-254-100b
सुवर्णिबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः।
महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः।।
13-254-101a
13-254-101b
कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पवनोऽनिलः।
अमृतांशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः।।
13-254-102a
13-254-102b
सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः।
न्यग्रोधोदुम्बरोश्वत्थश्चापूरान्ध्रनिषूदनः।।
13-254-103a
13-254-103b
सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः।
अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः।।
13-254-104a
13-254-104b
अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्नर्गुणो महान्।
अधृतः स्वधृतः स्वास्थ्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः।।
13-254-105a
13-254-105b
भारभृत्कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः।
आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः।।
13-254-106a
13-254-106b
धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः।
अपराजितः सर्वसहो नियन्ता नियमो यमः।।
13-254-107a
13-254-107b
सत्ववान्सात्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः।
अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हःऋ प्रियकृत्प्रीतिवर्धनः।।
13-254-108a
13-254-108b
विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः।।
13-254-109a
13-254-109b
अन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकदोऽग्रजः।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः।।
13-254-110a
13-254-110b
सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरप्ययः।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक् स्वस्तिदक्षिणः।।
13-254-111a
13-254-111b
अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः।
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः।।
13-254-112a
13-254-112b
अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणांवरः।
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः।।
13-254-113a
13-254-113b
उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःखप्ननाशनः।
वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः।।
13-254-114a
13-254-114b
अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः।
चतुरस्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः।।
13-254-115a
13-254-115b
अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः।
जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः।।
13-254-116a
13-254-116b
आधारनिलयो धाता पुष्पहासः प्रजागरः।
ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः।।
13-254-117a
13-254-117b
प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः।
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः।।
13-254-118a
13-254-118b
भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः।
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः।।
13-254-119a
13-254-119b
यज्ञभृद्यज्ञकृद्यज्ञी यज्ञभुग्यज्ञसाधनः।
यज्ञान्तकृद्यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च।।
13-254-120a
13-254-120b
आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः।
देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः।।
13-254-121a
13-254-121b
शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः।
रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः।
सर्वप्रहारणायुध ओंनम इति।।
13-254-122a
13-254-122b
13-254-122c
इतीदं कीर्तनीयस्यि केशवस्य महात्मनः।
नाम्नां सहस्रं दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम्।।
13-254-123a
13-254-123b
य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत्।
नाशुभं प्राप्नुयात्किञ्चित्सोमुत्रेह च मानवः।।
13-254-124a
13-254-124b
वेदान्तो ब्राह्मणः स्यात्क्षत्रियो विजयी भवेत्।
वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात्।।
13-254-125a
13-254-125b
धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात्।
कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी प्राप्नुयात्प्रजाम्।।
13-254-126a
13-254-126b
भक्तिमान्यः सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः।
सहस्रं वासुदेवस्य नाम्नातेमत्प्रकीर्तयेत्।।
13-254-127a
13-254-127b
यशः प्राप्नोति विपुलं ज्ञातिप्राधान्यमेव च।
अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम्।।
13-254-128a
13-254-128b
न भयं क्वचिदाप्नोति वीर्यं तेजश्च विन्दति।
भवत्ययोगो द्युतिमान्बलरूपगुणान्वितः।।
13-254-129a
13-254-129b
रोगार्तो मुच्यते रोगाद्बद्धो मुच्येत बन्धनात्।
भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येदापन्न आपदः।।
13-254-130a
13-254-130b
दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम्।
स्तुवन्नामसहस्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः।।
13-254-131a
13-254-131b
वासुदेवाश्रयो मर्त्यो वासुदेवपरायणः।
सर्वपापविशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम्।।
13-254-132a
13-254-132b
न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित्।
जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते।।
13-254-133a
13-254-133b
इमं स्तवमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः।
युज्येतात्मसुखक्षान्तिश्रीधृतिस्मृतिकीर्तिभिः।।
13-254-134a
13-254-134b
न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः।
भन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां पुरुषोत्तमे।।
13-254-135a
13-254-135b
द्यौः सचन्द्रार्कनक्षत्रा खं दिशो भूर्महोदधिः।
वासुदेवस्य वीर्येण विधृतानि महात्मनः।।
13-254-136a
13-254-136b
ससुरासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम्।
जगद्वशे वर्ततेदं कृष्णस्य सचराचरम्।।
13-254-137a
13-254-137b
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सत्वं तेजो बलं धृतिः।
वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च।।
13-254-138a
13-254-138b
सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्प्यते।
आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः।।
13-254-139a
13-254-139b
ऋषयः पितरो देवा महाभूतानि धातवः।
जङ्गमाजङ्गमं चेदं जगन्नारयणोद्भवम्।।
13-254-140a
13-254-140b
योगो ज्ञानं तथा साङ्ख्यं विद्याः शिल्पादिकर्म च।
वेदाः सास्त्राणि विज्ञानमेतत्सर्वं जनार्दनात्।।
13-254-141a
13-254-141b
एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः।
त्रींल्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः।।
13-254-142a
13-254-142b
इमं स्तवं भगवतो विष्णोर्व्यासेन कीर्तितम्।
पठेद्य इच्छेत्पुरुषः श्रेयः प्राप्तुं सुखानि च।।
13-254-143a
13-254-143b
विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभवाप्ययम्।
भजन्ति ये पुष्कराक्षं न ते यान्ति पराभवम्।
`न ते यान्ति पराभवम् ओं नम इति।।
13-254-144a
13-254-144b
13-254-144c
अर्जुन उवाच। 13-254-145x
पद्मपत्रविशालक्ष पद्मनाभ सुरोत्तम।
भक्तानामनुरक्तानां त्राता भव जनार्दन।।
13-254-145a
13-254-145b
भगवानुवाच। 13-254-146x
यो मां नामसहस्रेण स्तोतुमिच्छति पाण्डव।
सोहमेकेन श्लोकेन स्तुत एव न संशयः।
स्तुत एव न संशय ओं नम इति।।
13-254-146a
13-254-146b
13-254-146c
वासनाद्वासुदेवः स्या वासितं ते जगत्त्रयम्।
सर्वभूतनिवासोसि वासुदेव् नमोस्तु ते।।
13-254-147a
13-254-147b
नमोस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये
सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे।
सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते
सहस्रकोटियुगधारिणे नमः।
श्रीसहस्रकोटियुगधारिणे नम इति।।'
13-254-148a
13-254-148b
13-254-148c
13-254-148d
13-254-148e

[सम्पाद्यताम्]

13-254-41 विश्वधृगिति झ.पाठ. सत्कृतः साधुरिति च।। 13-254-58 विरमो विरमः इति क.पाठः,विरतः इति थ.पाठः।। 13-254-64 सुघोषः सुहृदः सुहृदिति क.थ.पाठः।। 13-254-68 शरीरभूतभृद्भोक्तेति क.ङ.झ.थ.पाठः।। 13-254-69 विनयो जयः सत्यसन्धः इति क.ङ.झ.पाठः।। 13-254-74 कालनेमिनिहा शौरिर्वीरः शूरजनेश्वरः इति क.पाठः। कालनेमिनिहा वीरः शूरः शौरिर्जनेश्वरः इति थ.पाठः।। 13-254-100 अर्को वाजसनिः शृङ्गी इति थ.पाठः।। 13-254-102 अमृताशोऽमृतवपुरिति झ.थ.पाठः।। 13-254-110 अनन्तहुतभुग्भोक्तेति क.थ.पाठः।। 13-254-119 सपिता प्रपितामहः इति झ.पाठ।। 13-254-128 विपुलं याति प्राधान्यमेव चेति क.पाठः।।

अनुशासनपर्व-253 पुटाग्रे अल्लिखितम्। अनुशासनपर्व-255