महाभारतम्-13-अनुशासनपर्व-131

विकिस्रोतः तः
Jump to navigation Jump to search
← अनुशासनपर्व-130 महाभारतम्
त्रतयोदशपर्व
महाभारतम्-13-अनुशासनपर्व-131
वेदव्यासः
अनुशासनपर्व-132 →
  1. 001
  2. 002
  3. 003
  4. 004
  5. 005
  6. 006
  7. 007
  8. 008
  9. 009
  10. 010
  11. 011
  12. 012
  13. 013
  14. 014
  15. 015
  16. 016
  17. 017
  18. 018
  19. 019
  20. 020
  21. 021
  22. 022
  23. 023
  24. 024
  25. 025
  26. 026
  27. 027
  28. 028
  29. 029
  30. 030
  31. 031
  32. 032
  33. 033
  34. 034
  35. 035
  36. 036
  37. 037
  38. 038
  39. 039
  40. 040
  41. 041
  42. 042
  43. 043
  44. 044
  45. 045
  46. 046
  47. 047
  48. 048
  49. 049
  50. 050
  51. 051
  52. 052
  53. 053
  54. 054
  55. 055
  56. 056
  57. 057
  58. 058
  59. 059
  60. 060
  61. 061
  62. 062
  63. 063
  64. 064
  65. 065
  66. 066
  67. 067
  68. 068
  69. 069
  70. 070
  71. 071
  72. 072
  73. 073
  74. 074
  75. 075
  76. 076
  77. 077
  78. 078
  79. 079
  80. 080
  81. 081
  82. 082
  83. 083
  84. 084
  85. 085
  86. 086
  87. 087
  88. 088
  89. 089
  90. 090
  91. 091
  92. 092
  93. 093
  94. 094
  95. 095
  96. 096
  97. 097
  98. 098
  99. 099
  100. 100
  101. 101
  102. 102
  103. 103
  104. 104
  105. 105
  106. 106
  107. 107
  108. 108
  109. 109
  110. 110
  111. 111
  112. 112
  113. 113
  114. 114
  115. 115
  116. 116
  117. 117
  118. 118
  119. 119
  120. 120
  121. 121
  122. 122
  123. 123
  124. 124
  125. 125
  126. 126
  127. 127
  128. 128
  129. 129
  130. 130
  131. 131
  132. 132
  133. 133
  134. 134
  135. 135
  136. 136
  137. 137
  138. 138
  139. 139
  140. 140
  141. 141
  142. 142
  143. 143
  144. 144
  145. 145
  146. 146
  147. 147
  148. 148
  149. 149
  150. 150
  151. 151
  152. 152
  153. 153
  154. 154
  155. 155
  156. 156
  157. 157
  158. 158
  159. 159
  160. 160
  161. 161
  162. 162
  163. 163
  164. 164
  165. 165
  166. 166
  167. 167
  168. 168
  169. 169
  170. 170
  171. 171
  172. 172
  173. 173
  174. 174
  175. 175
  176. 176
  177. 177
  178. 178
  179. 179
  180. 180
  181. 181
  182. 182
  183. 183
  184. 184
  185. 185
  186. 186
  187. 187
  188. 188
  189. 189
  190. 190
  191. 191
  192. 192
  193. 193
  194. 194
  195. 195
  196. 196
  197. 197
  198. 198
  199. 199
  200. 200
  201. 201
  202. 202
  203. 203
  204. 204
  205. 205
  206. 206
  207. 207
  208. 208
  209. 209
  210. 210
  211. 211
  212. 212
  213. 213
  214. 214
  215. 215
  216. 216
  217. 217
  218. 218
  219. 219
  220. 220
  221. 221
  222. 222
  223. 223
  224. 224
  225. 225
  226. 226
  227. 227
  228. 228
  229. 229
  230. 230
  231. 231
  232. 232
  233. 233
  234. 234
  235. 235
  236. 236
  237. 237
  238. 238
  239. 239
  240. 240
  241. 241
  242. 242
  243. 243
  244. 244
  245. 245
  246. 246
  247. 247
  248. 248
  249. 249
  250. 250
  251. 251
  252. 252
  253. 253
  254. 254
  255. 255
  256. 256
  257. 257
  258. 258
  259. 259
  260. 260
  261. 261
  262. 262
  263. 263
  264. 264
  265. 265
  266. 266
  267. 267
  268. 268
  269. 269
  270. 270
  271. 271
  272. 272
  273. 273
  274. 274

तारकासुरबाधितैर्देवैर्ब्रह्माणं प्रति स्वेषां पार्वतीशापेनानपत्यत्वकथनपूर्वकमसुरवधोपायकथनप्रार्थना।। 1 ।। ब्रह्मणां देवान्प्रति अग्नेरसन्निहितत्वेन देवीशापाविषयतया देवेन स्ववीर्यनिरोधकाले भुवि प्रस्कन्नकिञ्चिद्वीर्यांशस्य तस्मिन्संसृष्टतया च तेन गङ्गायां कुमारोत्पादनकथनेनाग्न्यन्वेषणचोदना।। 2 ।। अग्निना देवानां प्रार्थनया गङ्गायां स्वयंसृष्टरुद्रवीर्याधानम्।। 3 ।। गङ्ग्याऽग्निता स्वस्मिन्नाहितगर्भस्य मेरुगिरौ समुत्सर्जने तदीयतेजोव्याप्तयावद्वस्तूनां काञ्चनीभावप्राप्तिः।। 4 ।। एवं भीष्मेण सुवर्णोत्पत्तिप्रकारकथनम्।। 5 ।।

देवा ऊचुः। 13-131-1x
असुरस्तारको नाम त्वया दत्तवरः प्रभो।
सुरानृषींश्च क्लिश्नाति वधस्तस्य विधीयताम्।।
13-131-1a
13-131-1b
तस्माद्भयं समुत्पन्नमस्माकं वै पितामह।
परित्रायस्व नो देव न ह्यन्या गतिरस्ति नः।।
13-131-2a
13-131-2b
ब्रह्मोवाच। 13-131-3x
समोहं सर्वभूतानामधर्मं नेह रोचये।
हन्यतां तारकः क्षिप्र सुरर्षिगणबाधिता।।
13-131-3a
13-131-3b
वेदा धर्माश्च नोच्छेदं गच्छेयुः सुरसत्तमाः।
विहितं पूर्वमेवात्र मया वै व्येतु वो ज्वरः।।
13-131-4a
13-131-4b
देवा ऊचुः। 13-131-5x
वरदानाद्भगवतो दैतेयो बलगर्वितः।
देवैर्न शक्यते हन्तु स कथं प्रशमं व्रजेत्।।
13-131-5a
13-131-5b
स हि नैव स्म देवानां नासुराणां न रक्षसाम्।
वध्यः स्यामिति जग्राह वरं त्वत्तः पितामह।।
13-131-6a
13-131-6b
देवाश्च शप्ता रुद्राण्या प्रजोच्छेदे पुरा कृते।
न भविष्यति वोऽपत्यमिति सर्वे जगत्पते।।
13-131-7a
13-131-7b
ब्रह्मोवाच। 13-131-8x
हुताशनो न तत्रासीच्छापकाले सुरोत्तमाः।
स उत्पादयिताऽपत्यं वधाय त्रिदशद्विषाम्।।
13-131-8a
13-131-8b
तद्वै सर्वानतिक्रम्य देवदानवराक्षसान्।
मानुषानथ गन्धर्वान्नागानथ च पक्षिणः।।
13-131-9a
13-131-9b
अस्त्रेणामोघपातेन शक्त्या तं घातयिष्यति।
यतो वो भयपुत्पन्नं ये चान्ये सुरशत्रवः।।
13-131-10a
13-131-10b
सनातनो हि सङ्कल्पः काम इत्यभिधीयते।
रुद्रस्य तेजः प्रस्कन्नमग्नौ निपतितं च यत्।।
13-131-11a
13-131-11b
तत्तजोऽग्निर्महद्भूतं द्वितीयमिव पावकम्।
वधार्थं देवशत्रूणां गङ्गायां जनयिष्यति।।
13-131-12a
13-131-12b
स तु नावाप तं शापं नष्टः स हुतभुक्तदा।
तस्माद्वो भयहृद्देवाः समुत्पत्स्यति पावकिः।।
13-131-13a
13-131-13b
अन्विष्यतां वै ज्वलनस्तथा चाद्य नियुज्यताम्।
तारकस्य वधोपायः कथितो वै मयाऽनघाः।।
13-131-14a
13-131-14b
न हि तेजस्विनां शापास्तेजःसु प्रभवन्ति वै।
बलान्यतिबलं प्राप्य दुर्बलानि भवन्ति वै।।
13-131-15a
13-131-15b
हन्यादवध्यान्वरदानपि चैव तपस्विनः।
सङ्कल्पाभिरुचिः कामः सनातनतमोऽभवत्।।
13-131-16a
13-131-16b
जगत्पतिरनिर्देश्य सर्वगः सर्वभावनः।
हृच्छयः सर्वभूतानां ज्येष्ठो रुद्रादपि प्रभुः।।
13-131-17a
13-131-17b
अन्विष्यतां स तु क्षिप्रं तेजोराशिर्हुताशनः।
स वो मनोगतं कामं देवः सम्पादयिष्यति।।
13-131-18a
13-131-18b
एतद्वाक्यमुपश्रुत्य ततो देवा महात्मनः।
जग्मु- संसिद्धसङ्कल्पाः पर्येषन्तो विभावसुम्।।
13-131-19a
13-131-19b
ततस्त्रैलोक्यमृषयो व्यचिन्वन्त सुरैः सह।
काङ्क्षन्तो दर्शनं वह्नेः सर्वे तद्गतमानसाः।।
13-131-20a
13-131-20b
परेण तपसा युक्ताः श्रीमन्तो लोकविश्रुताः।
लोकानन्वचरन्सिद्धाः सर्व एव भृगूत्तम।
नष्टमात्मनि संलीनं नाभिजग्मुर्हुताशनम्।।
13-131-21a
13-131-21b
13-131-21c
ततः संजातसंत्रासानग्निदर्शनलालसान्।
जलेचरः क्लान्तमनास्तेजसाऽग्नेः प्रदीपितः।
उवाच देवान्मण्डूको रसातलतलोत्थितः।
13-131-22a
13-131-22b
13-131-22c
रसातलतले देवा वसत्यग्निरिति प्रभो।
सन्तापादिह सम्प्राप्तः पावकप्रभवादहम्।।
13-131-23a
13-131-23b
स संसुप्तो जले देवा भगवान्हव्यवाहनः।
अपः संसृज्य तेजोभिस्तेन सन्तापिता वयम्।।
13-131-24a
13-131-24b
तस्य दर्शनमिष्टं वो यदि देवा विभावसोः।
तत्रैवमधिगच्छध्वं कार्यं वो यदि वह्निना।।
13-131-25a
13-131-25b
गम्यतां साधयिष्यामो वयं ह्यग्निभयात्सुराः।
एतावदुक्त्वा मण्डूकस्त्वरितो जलमाविशत्।।
13-131-26a
13-131-26b
हुताशनस्तु बुबुधे मण्डूकस्य च पैशुनम्।
शशाप स तमासाद्य न रसान्वेत्स्यसीति वै।।
13-131-27a
13-131-27b
तं वै संयुज्य शापेन मण्डूकं त्वरितो ययौ।
अन्यत्र वासाय विभुर्न चात्मानमदर्शयत्।।
13-131-28a
13-131-28b
देवास्त्वनुग्रहं चक्रुर्मण्डूकानां भृगूत्तम।
यत्तच्छृणु महाबाहो गदतो मम सर्वशः।।
13-131-29a
13-131-29b
देवा ऊचुः। 13-131-30x
अग्निशापादजिह्वाऽपि रसज्ञानबहिष्कृताः।
सरस्वतीं बहुविधां यूममुच्चारयिष्यथ।।
13-131-30a
13-131-30b
बिलवासं गतांश्चैव निराहारानचेतसः।
गतासूनपि वः शुष्कान्भूमिः सन्धारयिष्यति।।
13-131-31a
13-131-31b
तमोघनायामपि वै निशायां विचरिष्यथ।
इत्युक्त्वा तांस्ततो देवाः पुनरेव महीमिमाम्।।
13-131-32a
13-131-32b
परीयुर्ज्वलनस्यार्थे न चाविन्दन्हुताशनम्।
अथ तान्द्विरदः कश्चित्सुरेन्द्रद्विरदोपमः।।
13-131-33a
13-131-33b
अश्वत्थस्थोऽग्निरित्येवमाह देवान्भृगूद्वह।
शशाप ज्वलनः सर्वान्द्विरदान्क्रोधमूर्च्छितः।।
13-131-34a
13-131-34b
प्रतीपा भवतां जिह्वा भवित्रीति भृगूद्वह।
इत्युक्त्वा निःसृतोऽश्वत्थादग्निर्वारणसूचितः।
प्रविवेश शमीगर्भमथ वह्निः सुषुप्सया।।
13-131-35a
13-131-35b
13-131-35c
अनुग्रहं तु नागानां यं चक्रुः शृणु तं प्रभो।
देवा भृगुकुलश्रेष्ठ प्रीत्या सत्यपराक्रमाः।।
13-131-36a
13-131-36b
देवा ऊचुः। 13-131-37x
प्रतीपया जिह्वयाऽपि सर्वाहारान्हरिष्यथ।
वाचं चोच्चारयिष्यध्वमुच्चैरव्यञ्जिताक्षराम्।
इत्युक्त्वा पुनरेवाग्निमनुसस्रुर्दिवौकसः।।
13-131-37a
13-131-37b
13-131-37c
अश्वत्थान्निःसृतश्चाग्निः शमीगर्भमुपाविशत्।
शुकेन ख्यापितो विप्र तं देवाः समुपाद्रवन्।।
13-131-38a
13-131-38c
शशाप सुकमग्निस्तु वाग्विहीनो भविष्यसि।
जिह्वामावर्तयामास तस्यापि हुतभुक्तदा।।
13-131-39a
13-131-39b
दृष्ट्वा तु ज्वलनं देवाः शुकमूचुर्दयान्विताः।
भविता न त्वमत्यन्तं शुकत्वे नष्टवागिति।।
13-131-40a
13-131-40b
आवृत्तजिह्वस्य सतो वाक्यं कान्तं भविष्यति।
बालस्येव प्रवृद्धस्य कलमव्यक्तमद्भुतम्।।
13-131-41a
13-131-41b
इत्युक्त्वा तं शमीगर्भे वह्निमालक्ष्य देवताः।
तदेवायतनं चक्रुः पुण्यं सर्वक्रियास्वपि।।
13-131-42a
13-131-42b
तदाप्रभृति चाप्यग्निः शमीगर्भेषु दृश्यते।
उत्पादने तथोपायमभिजग्मुश्च मानवाः।।
13-131-43a
13-131-43b
आपो रसातले यास्तु संस्पृष्टाश्चित्रभानुना।
ताः पर्वतप्रस्रवणैरूष्मां मुञ्चन्ति भार्गव।
पावकेनाधिशयता सन्तप्तास्तस्य तेजसा।।
13-131-44a
13-131-44b
13-131-44c
अथाग्निर्देवता दृष्ट्वा बभूव व्यथितस्तदा।
किमागमनमित्येवं तानपृच्छत पावकः।।
13-131-45a
13-131-45b
तमूचुर्विबुधाः सर्वे ते चैव परमर्षयः।
त्वां नियोक्ष्यामहे कार्ये तद्भवान्कर्तुमर्हति।
कृते च तस्मिन्भविता तवापि सुमहान्गुणः।।
13-131-46a
13-131-46b
13-131-46c
अग्निरुवाच। 13-131-47x
ब्रूत यद्भवतां कार्यं कर्तास्मि तदहं सुराः।
भवतां तु नियोज्योस्मि मावोत्रास्तु विचारणा।।
13-131-47a
13-131-47b
देवा ऊचुः। 13-131-48x
असुरस्तारको नाम ब्रह्मणो वरदर्पितः।
अस्मान्प्रबाधते वीर्याद्वधस्तस्य विधीयताम्।।
13-131-48a
13-131-48b
इमान्देवगणांस्तात प्रजापतिगणांस्तथा।
ऋषींश्चापि महाभाग परित्रायस्व पावक।।
13-131-49a
13-131-49b
अपत्यं तेजसा युक्तं प्रवीरं जनयक प्रभो।
यद्भयं नोऽसुरात्तस्मान्नाशयेद्धव्यवाहन।।
13-131-50a
13-131-50c
शप्तानां नो महादेव्या नान्यदस्ति परायणम्।
अन्यत्र भवतो वीर तस्मात्त्रायस्व नः प्रभो।।
13-131-51a
13-131-51b
इत्युक्तः स तथेत्युक्त्वा भगवान्हव्यवाहनः।
जगामाथ दुराधर्षो गङ्गां भागीरथीं प्रति।।
13-131-52a
13-131-52b
तया चाप्यभवन्मिश्रो गर्भं चास्यां दधे तदा।
ववृधे स तदा गर्भः कक्षे कृष्णगतिर्यथा।।
13-131-53a
13-131-53b
तेजसा तस्य देवस्य गङ्गा विह्वलचेतना।
सन्तापमगमत्तीव्रं वोढुं सा न शशाक ह।।
13-131-54a
13-131-54b
आहिते ज्वलनेनाथ गर्भे तेजःसमन्विते।
गङ्गायामसुरः कश्चिद्भैरवं नादमानदत्।।
13-131-55a
13-131-55b
अबुद्धिपतितेनाथ नादेन विपुलेन सा।।
वित्रस्तोद्धान्तनयना गङ्गा विप्लुतलोचना।।
13-131-56a
13-131-56b
विसंज्ञा नाशकद्गर्भं वोढुमात्मानमेव च।
सा तु तेजःपरीताङ्गी कम्पमाना च जाह्नवी।।
13-131-57a
13-131-57b
उवाच ज्वलनं विप्र तदा गर्भबलोद्धुता।
नते शक्ताऽस्मि भगवंस्तेजसोऽस्य विधारणे।।
13-131-58a
13-131-58b
विमूढाऽस्मि कृताऽनेन न मे स्वास्ध्यं यथा पुरा।
विह्वला चास्मि भगवंश्चेतो नष्टं च मेऽनघ
13-131-59a
13-131-59b
धारणे नास्य शक्ताऽहं गर्भस्य तपतांवर।
उत्स्रक्ष्येऽहमिमं दुःखान्न तु कामात्कथञ्चन।।
13-131-60a
13-131-60b
न तेजसाऽस्ति संस्पर्शो मम देव विभावसो।
आपदर्थे हि सम्बन्धः सुसूक्ष्मोऽपि महाद्युते।।
13-131-61a
13-131-61b
यदत्र गुणसम्पन्नमितरद्वा हुताशन।
त्वय्येव तदहं मन्ये धर्माधर्मौ च केवलौ।।
13-131-62a
13-131-62b
तामुवाच ततो वह्निर्धार्यतां धार्यतामिति।
गर्भो मत्तेजसा युक्तो महागुणफलोदयः।।
13-131-63a
13-131-63b
शक्ता ह्यसि महीं कृत्स्नां वोढुं धारयितुं तथा।
न हि ते किञ्चिदप्राप्यमन्यतो धारणादृते।।
13-131-64a
13-131-64b
`एवमुक्ता तु सा देवी तत्रैवान्तरधीयत।
पावकश्चापि तेजस्वी कृत्वा कार्यं दिवौकसाम्।
जगामेष्टं तदा देशं ततो भार्गवनन्दन।।'
13-131-65a
13-131-65b
13-131-65c
सा वह्निना वार्यमाणा देवैरपि सरिद्वरा।
समुत्ससर्ज तं गर्भं मेरौ गिरिवेर तदा।।
13-131-66a
13-131-66b
समर्था धारणे चापि रुद्रतेजःप्रधर्षिता।
नाशकत्सा तदा गर्भं सन्धारयितुमोजसा।
समुत्ससर्ज तं दुःखाद्दीप्तवैश्वानरप्रभम्।।
13-131-67a
13-131-67b
13-131-67c
दर्शयामास चाग्निस्तां तदा गङ्गां भृगूद्वह।
पप्रच्छ सरितां श्रेष्ठां कच्चिद्गर्भः सुखोदयः।।
13-131-68a
13-131-68b
कीदृग्गुणोपि वा देवि कीदृग्रूपश्च दृश्यते।
तेजसा केन वा युक्तः सर्वमेतद्ब्रवीहि मे।।
13-131-69a
13-131-69b
गङ्गोवाच। 13-131-70x
जातरूपः स गर्भो वै तेजसा त्वमिवानघ।
सुवर्णो विमलो दीप्तः पर्वतं चावभासयन्।।
13-131-70a
13-131-70b
पद्मोत्पलविमिश्राणां ह्रदानामिव शीतलः।
गन्धोस्य स कदम्बानां तुल्यो वै तपतांवर।।
13-131-71a
13-131-71b
तेजसा तस्य गर्भस्य भास्करस्येव रश्मिभिः।
यद्द्रव्यं परिसंसृष्टं पृथिव्यां पर्वतेषु च।
तत्सर्वं काञ्चनीभूतं समन्तात्प्रत्यदृश्यत।।
13-131-72a
13-131-72b
13-131-72c
पर्यधावत शैलांश्च नदीः प्रस्रवणानि च।
व्यादीपयत्तेजसा च त्रैलोक्यं सचराचरम्।।
13-131-73a
13-131-73b
एवंरूपः स भगवान्पुत्रस्ते हव्यवाहन।
सूर्यवैश्वानरसमः कान्त्या सोम इवापरः।।
13-131-74a
13-131-74b
वसिष्ठ उवाच। 13-131-75x
एवमुक्त्वा तु सा देवी तत्रैवान्तरधीयत।
पावकश्चापि तेजस्वी कृत्वा कार्यं दिवौकसाम्।
जगामेष्टं ततो देशं तदा भार्गवनन्दन।।
13-131-75a
13-131-75b
13-131-75c
एतैः कर्मगुणैर्लोके नामाग्नेः परिगीयते।
हिरण्यरेता इति वै ऋषिभिर्विबुधैस्तथा।
पृथिवी च तदा देवी ख्याता वसुमतीति वै।।
13-131-76a
13-131-76b
13-131-76c
स तु गर्भो महातेजा गाङ्गेयः पावकोद्भवः।
दिव्यं शरवणं प्राप्य ववृधेऽद्भुतदर्शनः।।
13-131-77a
13-131-77b
ददृशुः कृत्तिकास्तं तु बालार्कसदृशद्युतिम्।
जातस्नेहास्तु तं बालं पुपुषुः स्तन्यविस्रवैः।।
13-131-78a
13-131-78b
ततः स कार्तिकेयत्वमवाप परमद्युतिः।
स्कन्नत्वात्स्कन्दतां चापि गुहावासाद्गुहोऽभवत्।।
13-131-79a
13-131-79b
एवं सुवर्णमुत्पन्नमपत्यं जातवेदसः।
तत्र जाम्बूनदं श्रेष्ठं देवानामपि भूषणम्।।
13-131-80a
13-131-80b
ततःप्रभृति चाप्येतञ्जातरूपमुदाहृतम्।
रत्नानामुत्तमं रत्नं भूषणानां तथैव च।।
13-131-81a
13-131-81b
पवित्रं च पवित्राणां मङ्गलानां च मङ्गलम्।
यत्सुवर्णं स भगवानग्निरीशः प्रजापतिः।।
13-131-82a
13-131-82b
पवित्राणां पवित्रं हि कनकं द्विजसत्तमाः।
अग्नीषोमात्मकं चैव जातरूपमुदाहृतम्।।
13-131-83a
13-131-83b
।। इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि
दानधर्मपर्वणि एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः।। 131 ।।

[सम्पाद्यताम्]

13-131-13 नष्टः अदर्शं गतः।।
13-131-16 कामः काम्यमानो वह्निः।।
13-131-21 नष्टं अदर्शनं गतम्। आत्मनि जले जलस्य तेजोजन्यत्वात्।।
13-131-26 मृग्यतां साधयिष्याम इति थ.ध.पाठः।।
13-131-27 न रसानिति। रसनेन्द्रियहीनो भविष्यसीत्यर्थः।।
13-131-28 नच देवानदर्शयदिति थ.ध.पाठः।।
13-131-30 अजिह्वा अपीति च्छेदः।।
13-131-39 जिह्वां च कर्तयामासेति ड.पाठः।।
13-131-41 बालस्येव प्रवृत्तस्येति ड.थ.ध.पाठः।।
13-131-44 ऊष्मा ऊष्माणम्। अदिशयता अधिशयानेन। पावकेनाधिशयिता इति ट.ध.पाठः।।
13-131-53 दधे आदधे। गर्भश्वास्याभवत्तदेति थ.पाठः।।
13-131-54 सोढुं सा न शशाक हेति थ.पाठः।।
13-131-56 अबुद्धिपतितेन अकस्माज्जातेन।।
13-131-61 न चेतसास्ति संस्पर्श इति थ.पाठः।।
13-131-71 कदम्बानां कदम्बपुष्पाणाम्।।
13-131-83 अग्निष्टोमात्मकं चैवेति थ.ध.पाठः।।

अनुशासनपर्व-130 पुटाग्रे अल्लिखितम्। अनुशासनपर्व-132