महाभारतम्-13-अनुशासनपर्व-043

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  272. 272
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  274. 274

बदरीनारायणेन गरुडंप्रति स्वमहिमोक्तिः।। 1 ।। गरुडेन मुनिगणान्प्रति स्वानुभूतनारायणमहिमोक्तिः।। 2 ।।

`भगवानुवाच। 13-43-1x
मां न देवा न गन्धर्वा नासुरा न व राक्षसाः।
विदुस्तत्वेन सत्वस्थं सूक्ष्मात्मानमवस्थितम्।।
13-43-1a
13-43-1b
चतुर्धाऽहं विभक्तात्मा लोकानां हितकाम्यया।
भूतभव्यभविष्यादिरनादिर्विश्वकृत्तमः।।
13-43-2a
13-43-2b
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम्।
मनो बुद्धिश्च चेतश्च तमः सत्वं रजस्तथा।।
13-43-3a
13-43-3b
प्रकृतिर्विकृतिश्चैव विद्याविद्ये शुभाशुभे।
मत्त एतानि जायन्ते नाहमेभ्यः कथञ्चन।।
13-43-4a
13-43-4b
यत्किंचिच्छ्रेयसा युक्तं श्रेयस्करमनुत्तमम्।
धर्मयुक्तं च पुण्यं च सोऽहमस्मि निरामयः।।
13-43-5a
13-43-5b
यत्स्वभावात्मतत्वज्ञैः कारणैरुपलक्ष्यते।
अनादिमध्यनिधनः सोन्तरात्माऽस्मि शाश्वतः।।
13-43-6a
13-43-6b
यत्तु मे परमं गुह्यं रूपं सूक्ष्मार्थदर्शिभिः।
गृह्यते सूक्ष्मभावज्ञैः सोऽविभाव्योस्मि शाश्वतः।।
13-43-7a
13-43-7b
तत्तु मे परमं गुह्यं येन व्याप्तमिदं जगत्।
सोहङ्गतः सर्वसत्वः सर्वस्य प्रभवोऽव्ययः।।
13-43-8a
13-43-8b
मत्तो जायन्ति भूतानि मया धार्यन्त्यहर्निशम्।
मय्येव विलयं यान्ति प्रलये पन्नगाशन।।
13-43-9a
13-43-9b
यो मां यथा वेदयति तथा तस्यास्मि काश्यप।
मनोबुद्धिगतः श्रेयो विदधामि विहङ्गम।।
13-43-10a
13-43-10b
मां तु ज्ञातुं कृता बुद्धिर्भवता पक्षिसत्तम।
शृणु योऽहं यतश्चाहं यदर्थश्चाहमुद्यतः।।
13-43-11a
13-43-11b
ये केचिन्नियतात्मानस्त्रेताग्निपरमार्चिताः।
अग्निकार्यपरा नित्यं जपहोमपरायणाः।।
13-43-12a
13-43-12b
आत्मन्यग्नीन्समाधाय नियता नियतेन्द्रियाः।
अनन्यमनसस्ते मां सर्वे वै समुपासते।।
13-43-13a
13-43-13b
यजन्तो जपयज्ञैर्मां मानसैश्च सुसंयताः।
अग्नीनभ्युद्ययुः शश्वदग्निष्वेवाभिसंश्रिताः।।
13-43-14a
13-43-14b
अनन्यकार्याः शुचयो नित्यमग्निपरायणाः।
य एवंबुद्ध्यो धीरास्ते मां गच्छन्ति तादृशाः।।
13-43-15a
13-43-15b
अकामहतसङ्कल्पा ज्ञाने नित्यं समाहिताः।
आत्मन्यग्निं समाधाय निराहारा निराशिषः।।
13-43-16a
13-43-16b
विषयेषु निरारम्भा विमुक्ता ज्ञानचक्षुषः।
अनन्यमनसो धीराः स्वभावनियमान्विताः।।
13-43-17a
13-43-17b
यत्तद्वियति दृष्टं तत्सरः पद्मोत्पलायुतम्।
तत्राग्नयः सन्निहिता दीप्यन्ते स्म निरिन्धनाः।।
13-43-18a
13-43-18b
ज्ञानामलाशयास्तस्मिन्ये च चन्द्रांशुनिर्मलाः।
उपासीना गृणन्तोऽग्निमस्पष्टाक्षरभाषिणः।
आकाङ्क्षमाणाः शुचयस्तेष्वग्रिषु विहङ्गम।।
13-43-19a
13-43-19b
13-43-19c
ये मया भावितात्मानो मय्येवाभिरताः सदा।
उपासते च मामेव ज्योतिर्भूता निरामयाः।।
13-43-20a
13-43-20b
तैर्हि तत्रैव वस्तव्यं नीरागादिभिरच्युतैः।
निराहारा ह्यनिष्पन्दाश्चन्द्रांशुसदृशप्रभाः।।
13-43-21a
13-43-21b
निर्मला निरहङ्कारा निरालम्बा निराशिषः।
मद्भक्ताः सततं तेवै भक्तांस्तानपि चाप्यहम्।।
13-43-22a
13-43-22b
चतुर्धाऽहं विभक्तात्मा चरामि जगतो हितः।
लोकानां धारणार्थाय विधानं विदधामि च।।
13-43-23a
13-43-23b
यथावत्तदशेषेण श्रोतुमर्हति मे भवान्।। 13-43-24a
एका मूर्तिर्निर्गुणाख्या योगं परममास्थिता।
द्वितीया सृजते तात भूतग्रामं चराचरम्।।
13-43-25a
13-43-25b
सृष्टं संहरते चैका जगत्स्थावरजङ्गमम्।
ज्ञातात्मनिष्ठा क्षपयन्मोहयन्तीव मायया।
क्षपयन्ती मोहयति आत्मनिष्ठा स्वमायया।।
13-43-26a
13-43-26b
13-43-26c
चतुर्थी मे महामूर्तिर्जगद्वृद्धिं ददाति सा।
रक्षते चापि नियता सोहमस्मि नभश्वरः।।
13-43-27a
13-43-27b
मया सर्वमिदं व्याप्तं मयि सर्वं प्रतिष्ठितम्।
अहं सर्वजगद्बीजं सर्वत्रगतिरव्ययः।।
13-43-28a
13-43-28b
यानि तान्यग्निहोत्राणि ये च चन्द्रांशुराशयः।
गृणन्ति वेदं सततं तेष्वग्निषु विहङ्गम।।
13-43-29a
13-43-29b
क्रमेण मां समायान्ति सुखिनो ज्ञानसंयुताः।
तेषामहं तपो दीप्तं तेजः सम्यक्समाहितम्।
नित्यं ते मयि वर्तन्ते तेषु चाहमतन्द्रितः।।
13-43-30a
13-43-30b
13-43-30c
सर्वतो मुक्तसङ्गेन मय्यनन्यसमाधिना।
शक्यः समासादयितुमहं वै ज्ञानचक्षुषा।।
13-43-31a
13-43-31b
मां स्थूलदर्शनं विद्धि जगतः कार्यकारणम्।
मत्तश्च सम्प्रसूतान्वै विद्धि लोकान्सदैवतान्।।
13-43-32a
13-43-32b
मया चापि चतुर्धात्मा विभक्तः प्राणिषु स्यिथः।
आत्मभूतो वासुदेवो ह्यनिरुद्धो मतौ स्यितः।।
13-43-33a
13-43-33b
सङ्कर्षणोऽहङ्कारे च प्रद्युम्नो मनसि स्यितः।
अन्यथा च चतुर्दा यत्सम्यक्त्वं श्रोतुमर्हसि।।
13-43-34a
13-43-34b
यत्तत्पद्ममभूत्पूर्वं तत्र ब्रह्मा व्यजायत।
ब्राह्मणश्चापि सम्भूतः शिव इत्यवधार्यताम्।।
13-43-35a
13-43-35b
शिवात्स्कन्दः संवभूव एतत्सृष्टिचतुष्टयम्।
दैत्यदानवदर्पघ्नमेवं मां विद्धि नित्यशः।।
13-43-36a
13-43-36b
दैत्यदानवरक्षोभिर्यदा धर्मः प्रपीड्यते।
तदाऽहं धर्मवृद्ध्यर्थं मूर्तिमान्भविताऽऽशुग।।
13-43-37a
13-43-37b
वेदव्रतपरा ये तु धीरा निश्चितबुद्ध्यः।
योगिनो योगयुक्ताश्च ते मां पश्यन्ति नान्यथा।।
13-43-38a
13-43-38b
पञ्चभिः सम्प्रयुक्तोऽहं विप्रयुक्तश्च पञ्चभिः।
वर्तमानश्च तेष्वेवं निवृत्तश्चैव तेष्वहम्।।
13-43-39a
13-43-39b
ये विदुर्जातसङ्कल्पास्ते मां पश्यन्ति तादृशाः।। 13-43-40a
स्वं वायुरापो ज्योतिश्च पृथिवी चेति पञ्चमम्।
तदात्मकोऽस्मि विज्ञेयो न चान्योस्मीति निश्चितम्।
13-43-41a
13-43-41b
वर्तमानमतीतं च पञ्चवर्गेषु निश्चलम्।
शब्दस्पर्शेषु रूपेषु रसगन्धेषु चाप्यहम्।।
13-43-42a
13-43-42b
रजस्तमोभ्यामाविष्टा येषां बुद्धिरनिश्चिता।
ते न पश्यन्ति मे तत्वं तपसा महता ह्यपि।।
13-43-43a
13-43-43b
नोपवासैर्न नियमैर्न व्रतैर्विविधैरपि।
द्रष्टुं वा वेदितुं वाऽपि न शक्या परमा गतिः।।
13-43-44a
13-43-44b
महामोहार्थपङ्के तु निमग्रानां गतिर्हरिः।
एकान्तिनो ध्यानपरा यतिभावाद्ब्रजन्ति माम्।।
13-43-45a
13-43-45b
सत्वयुक्ता मतिर्येषां केवलाऽऽत्मविनिश्चिता।
ते पश्यन्ति स्वमात्मानं परमात्मानमव्ययम्।।
13-43-46a
13-43-46b
अहिंसा सर्वभूतेषु तेष्ववस्तितमार्जवम्।
तेष्वेव च समाधाय सम्यगेति च मामजम्।।
13-43-47a
13-43-47b
यदेतत्परमं गुह्यमाख्यानं परमाद्भुतम्।
यत्तेन तदशेषेण यथावच्छ्रोतुमर्हसि।।
13-43-48a
13-43-48b
ये त्वग्निहोत्रनियता जपयज्ञपरायणाः।
ते मामुपासते शश्वद्यांस्तांस्त्वं दृष्टवानसि।।
13-43-49a
13-43-49b
शास्त्रदृष्टविधानज्ञा असक्ताः क्वचिदन्यथा।
शक्योऽहं वेदितुं तैस्तु यन्मे परममव्ययम्।।
13-43-50a
13-43-50b
ये तु सांख्यं च योगं च ज्ञात्वाऽप्यधृतनिश्चयाः।
न ते गच्छन्ति कुशलाः परां गतिमनुत्तमाम्।।
13-43-51a
13-43-51b
तस्माज्ज्ञानेन शुद्धेन प्रसन्नात्माऽऽन्मविच्छुचिः।
आसादयति तद्ब्रह्म यत्र गत्वा न शोचति।।
13-43-52a
13-43-52b
शुद्धाभिजनसम्पन्नाः श्रद्धायुक्तेन चेतसा।
मद्भक्त्या च द्विजश्रेष्ठा गच्छन्ति परमां गतिं।।
13-43-53a
13-43-53b
यद्गह्यं परमं बुद्धेरलिङ्गग्रहणं च यत्।
तत्सूक्ष्मं गृह्यते विप्रैर्यतिभिस्तत्त्वदर्शिभिः।।
13-43-54a
13-43-54b
न वायुः पवते तत्र न तस्मिञ्ज्योतिषां गतिः।
न चापः पृथिवी चैव नाकाशं न मनोगतिः।।
13-43-55a
13-43-55b
तस्माच्चैतानि सर्वाणि प्रजायन्ते विहङ्गम।
सर्वेभ्यश्च स तेभ्यश्च प्रभवत्यमलो विभुः।।
13-43-56a
13-43-56b
स्थूलदर्शनमेतन्मे यद्दृष्टं भवताऽनघ।
एतत्सूक्ष्मस्य तद्द्वारं कार्याणां कारणं त्वहम्।।
13-43-57a
13-43-57b
दृष्टो वै भवता तस्मात्सरस्यमितविक्रम।
ब्रह्मणो यदहोरात्रसङ्ख्याभिज्ञैर्विभाव्यते।।
13-43-58a
13-43-58b
एष कालस्त्वया तत्र सरस्यहमुपागतः।
मां यज्ञमाहुर्यज्ञज्ञा वेदं वेदविदो जनाः।
मुनयश्चापि मामेव जपयज्ञं प्रचक्षते।।
13-43-59a
13-43-59b
13-43-59c
वक्ता मन्ता रसयिता घ्राता द्रष्टा प्रदर्शकः।
बोद्धा बोधयिता चाहं गन्ता श्रोता चिदात्मकः।।
13-43-60a
13-43-60b
मामिष्ट्वा स्वर्गमायान्ति तथा चाप्नुवते महत्।
ज्ञात्वा मामेव चैवान्ते निःसङ्गेनान्तरात्मना।।
13-43-61a
13-43-61b
अहं तेजो द्विजातीनां मम तेजो द्विजातयः।
मम यस्तेजसो देहः सोग्निरित्यवगम्यताम्।।
13-43-62a
13-43-62b
प्राणपालः शरीरेऽहं योगिनामहमीश्वरः।
सांख्यानामिदमेवाग्रे मयि सर्वमिदं जगत्।।
13-43-63a
13-43-63b
धर्ममर्तं च कामं च मोक्षं चैवार्जवं जपम्।
तमः सत्वं रजश्चैव कर्मजं च भवाप्ययम्।।
13-43-64a
13-43-64b
स तदाऽहं तथारूपस्त्वया दृष्टः सनातनः।
ततस्त्वहं परतरः शक्यः कालेन वेदितुम्।।
13-43-65a
13-43-65b
मम यत्परमं गुह्यं शाश्वतं ध्रुवमव्ययम्।
तदेवं परमो गुह्यो देवो नारायणो हरिः।
न तच्छक्यं भुजङ्गारे वेत्तुमभ्युदयान्वितैः।।
13-43-66a
13-43-66b
13-43-66c
निरारम्भनमस्कारा निराशीर्बन्धनास्तथा।
गच्छन्ति तं महात्मानः परं ब्रह्म सनातनम्।।
13-43-67a
13-43-67b
स्थूलोऽहमेवं विहग त्वया दृष्टस्तथाऽनघ।
एतच्चापि न वेत्त्यन्यस्त्वामृते पन्नगाशन।।
13-43-68a
13-43-68b
मा मतिस्तव गान्नाशमेषा गतिरनुत्तमा।
मद्भक्तो भव नित्यं त्वं ततो वेत्स्यसि मे पदम्।।
13-43-69a
13-43-69b
एतत्ते सर्वमाख्यातं रहस्यं दिव्यमानुषम्।
एतच्छ्रेयः परं चैतत्पन्थानं विद्धि मोक्षिणाम्।।
13-43-70a
13-43-70b
एवमुक्त्वा स भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत।
पश्यतो मे महायोगी जगामात्मगतिर्गतिम्।।
13-43-71a
13-43-71b
एतदेवंविधं तस्य महिमानं महात्मनः।
अच्युतस्याप्रमेयस्य दृष्टवानस्मि यत्पुरा।।
13-43-72a
13-43-72b
एतद्वः सर्वमाख्यातं चेष्टितं तस्य धीमतः।
मयाऽनुभूतं प्रत्यक्षं दृष्ट्वा चाद्भुतकर्मणः।।'
13-43-73a
13-43-73b
।। इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि
दानधर्मपर्वणि त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः।। 43 ।।
अनुशासनपर्व-042 पुटाग्रे अल्लिखितम्। अनुशासनपर्व-044