महाभारतम्-13-अनुशासनपर्व-143

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  270. 270
  271. 271
  272. 272
  273. 273
  274. 274

सम्भूय तीर्थयात्रां कुर्वद्भिर्द्विजर्षिभी राजर्षिभिश्च क्रमेण ब्रह्मसरःप्रति गमनम्।। 1 ।। तत्रागस्त्येन ह्रदात्समुद्धृतपद्मस्य धर्मशुश्रूषुणेन्द्रेण गूढमपहारे ऋषिभी राजभिश्च स्वेषु पुष्करस्तेयं शङ्कमानमगस्त्यंप्रति प्रत्येकशो नानाशपथकरणम्।। 2 ।।

पश्चादिन्द्रेण स्वस्वरूपप्रकाशनपूर्वकं स्वेन पुष्करापहारस्य प्रयोजननिवेदनेन तत्प्रसादनम्।। 3

भीष्म उवाच। 13-143-1x
अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
यद्वृत्तं तीर्थयात्रायां शपथं प्रति तच्छृणु।।
13-143-1a
13-143-1b
पुष्करार्थं कृतं स्तैन्यं पुरा भरतसत्तम।
राजर्षिभिर्महाराज तथैव च द्विजर्षिभिः।।
13-143-2a
13-143-2b
पुरा प्रभासे ऋषयः समग्राः
समेता वै मन्त्रममन्त्रयन्त।
चराम सर्वां पृथिवीं पुण्यतीर्थां
तन्नः कामं हन्त गच्छाम सर्वे।।
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शुक्रोऽङ्गिराश्चैव कविश्च विद्वां-
स्तथा ह्यगस्त्यो नारदपर्वतौ च।
भृगुर्वसिष्ठः कश्यपो गौतमश्च
विश्वामित्रो जमदग्निश्च राजन्।।
13-143-4a
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ऋषिस्तथा गालवोऽथाष्टकश्च
भरद्वाजोऽरुन्धती वालखिल्याः।
शिबिर्दिलीपो नहुषोऽम्बरीषो
राजा ययातिर्धुन्धुमारोऽथ पूरुः।।
13-143-5a
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जग्मुः पुरस्कृत्य महानुभावं
शतक्रतुं वृत्रहणं नरेन्द्राः।
तीर्थानि सर्वाणि परिभ्रमन्तो
माघ्यां ययुः कौशिकीं पुण्यतीर्थाम्।।
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13-143-6d
सर्वेषु तीर्थेष्ववधूतपापा
जग्मुस्ततो ब्रह्मसरः सुपुण्यम्।
देवस्य तीर्थे जलमग्निकल्पा
विगाह्य ते भुक्तबिसप्रसूनाः।।
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13-143-7d
केचिद्बिसान्यखनंस्तत्र राजन्न-
न्ये मृणालान्यखनंस्तत्र विप्राः।
अथापश्यन्पुष्करं ते ह्रियन्तं
ह्रदादगस्त्येन समुद्धृतं तत्।।
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13-143-8d
नानाह सर्वानृषिमुख्यानगस्त्यः
केनाहृतं पुष्करं मे सुजातम्।
युष्माञ्शङ्के पुष्करं दीयतां मे
न वै भवन्तो हर्तुमर्हन्ति पद्मम्।।
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13-143-9d
शृणोमि कालो हिंसते धर्मवीर्यं
सेयं प्राप्ता वर्तते धर्मपीडा।
पुराऽधर्मो वर्तते नेह याव-
त्तावद्गच्छामः सुरलोकं चिराय।।
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पुरा वेदान्ब्राह्मणा ग्राममध्ये
घुष्टस्वरा वृषलान्श्रावयन्ति।
पुरा राजा व्यवहारानधर्मा-
न्पश्यत्यहं परलोकं व्रजामि।।
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पुरा राजा प्रत्यवरान्गरीयसो
मंस्यत्यथैनमनुयास्यन्ति सर्वे।
धर्मोत्तरं यावदिदं न वर्तते
तावद्व्रजामि परलोकं चिराय।।
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पुरा प्रपश्यामि परेण मर्त्या-
न्बलीयसा दुर्बलान्भुज्यमानान्।
तस्माद्यास्यामि परलोकं चिराय
न ह्युत्सहे द्रष्टुमीदृङ्नृलोके।।
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तमाहुरार्ता ऋषयो महर्षिं
न ते वयं पुष्करं चोरयामः।
मिथ्याभिशंसा भवता न कार्या
शपाम तीक्ष्णैः शपथैर्महर्षे।।
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ते निश्चितास्तत्र महर्षयस्तु
सम्पश्यन्तो धर्ममेतं नरेन्द्राः।
ततोऽशपन्त शपथान्पर्ययेण
सहैव ते पार्थिव पुत्रपौत्रैः।।
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भृगुरुवाच। 13-143-16x
प्रत्याक्रोशेदिहाक्रुष्टस्ताडितः प्रतिताडयेत्।
खादेच्च पृष्ठमांसानि यस्ते हरति पुष्करम्।।
13-143-16a
13-143-16b
वसिष्ठ उवाच। 13-143-17x
अस्वाध्यायपरो लोके श्वानं च परिकर्षतु।
पुरे च भिक्षुर्भवतु यस्ते हरति पुष्करम्।।
13-143-17a
13-143-17b
कश्यप उवाच। 13-143-18x
सर्वत्र सर्वं पणतु न्यासे लोभं करोतु च।
कूटसाक्षित्वमभ्येतु यस्ते हरति पुष्करम्।।
13-143-18a
13-143-18b
गौतम उवाच। 13-143-19x
जीवत्वहङ्कृतो बुद्ध्या विषमेणासमेन सः।
कर्षको मत्सरी चास्तु यस्ते हरति पुष्करम्।।
13-143-19a
13-143-19b
अङ्गिरा उवाच। 13-143-20x
अशुचिर्ब्रह्मकूटोस्तु श्वानं च परिकर्षतु।
ब्रह्महाऽनिकृतिश्चास्तु यस्ते हरति पुष्करम्।।
13-143-20a
13-143-20b
धुन्धुमार उवाच। 13-143-21x
अकृतज्ञस्तु मित्राणां शूद्रायां च प्रजायतु।
एकः सम्पन्नमश्नातु यस्ते हरति पुष्करम्।।
13-143-21a
13-143-21b
पुरूरवा उवाच। 13-132-22x
चिकित्सायां प्रचरतु भार्यया चैव पुष्यतु।
श्वशुरात्तस्य वृत्तिः स्याद्यस्ते हरति पुष्करम्।।
13-143-22a
13-143-22b
दिलीप उवाच। 13-143-23x
उदपानप्लवे ग्रामे ब्राह्मणो वृषलीपतिः।
तस्य लोकान्स व्रजतु यस्ते हरति पुष्करम्।।
13-143-23a
13-143-23b
शुक्र उवाच। 13-143-24x
वृथा मांसं समश्नातु दिवा गच्छतु मैथुनम्।
प्रेष्यो भवतु राज्ञश्च यस्ते हरति पुष्करम्।।
13-143-24a
13-143-24b
जमदग्निरुवाच। 13-143-25x
अनध्यायेष्वधीयीत मित्रं श्राद्धे च भोजयेत्।
श्राद्धे शूद्रस्य चाश्नीयाद्यस्ते हरति पुष्करम्।।
13-143-25a
13-143-25b
शिबिरुवाच। 13-143-26x
अनाहिताग्निर्मियतां यज्ञे विघ्नं करोतु च।
तपस्विभिर्विरुध्येच्च यस्ते हरति पुष्करम्।।
13-143-26a
13-143-26b
ययातिरुवाच। 13-143-27x
अनृतौ व्रतनियतायां भार्यायां स प्रजायतु।
निराकरोतु वेदांश्च यस्ते हरति पुष्करम्।।
13-143-27a
13-143-27b
नहुष उवाच। 13-143-28x
अतिथिर्गृहसंस्थोऽस्तु कामवृत्तस्तु दीक्षितः।
विद्यां प्रयच्छतु भृतो यस्ते हरति पुष्करम्।।
13-143-28a
13-143-28b
अम्बरीष उवाच। 13-143-29x
नृशंसस्त्यक्तधर्मोऽस्तु स्त्रीषु ज्ञातिषु गोषु च।
निहन्तु ब्राह्मणं चापि यस्ते हरति पुष्करम्।।
13-143-29a
13-143-29b
नारद उवाच। 13-143-30x
गृहज्ञानी बहिःशास्त्रं पठतां विस्वरं पदम्।
गरीयसोऽवजानातु यस्ते हरति पुष्करम्।।
13-143-30a
13-143-30b
नाभाग उवाच। 13-143-31x
अनृतं भाषतु सदा सद्भिश्चैव विरुध्यतु।
शुल्केन ददतु कन्यां यस्ते हरपि पुष्करम्।।
13-143-31a
13-143-31b
कविरुवाच। 13-143-32x
पदा च गां संस्पृशतु सूर्यं च प्रति मेहतु।
शरणागतं संत्यजतु यस्ते हरति पुष्करम्।।
13-143-32a
13-143-32b
विश्वामिइत्र उवाच। 13-143-33x
करोतु भृतकोऽवर्षां राज्ञश्चास्तु पुरोहितः।
ऋत्विगस्तु ह्ययाज्यस्य यस्ते हरति पुष्करम्।।
13-143-33a
13-143-33b
पर्वत उवाच। 13-143-34x
ग्रामे चाधिकृतः सोऽस्तु खरयानेन गच्छतु।
शुनः कर्षतु वृत्त्यर्थे यस्ते हरति पुष्करम्।।
13-143-34a
13-143-34b
भरद्वाज उवाच। 13-143-35x
सर्वपापसमादानं नृशंसे चानृते च यत्।
तत्तस्यास्तु सदा पापं यस्ते हरति पुष्करम्।।
13-143-35a
13-143-35b
अष्टक उवाच। 13-143-36x
स राजास्त्वकृतप्रज्ञः कामवृत्तश्च पापकृत्।
अधर्मेणाभिशास्तूर्वीं यस्ते हरति पुष्करम्।।
13-143-36a
13-143-36b
गालव उवाच। 13-143-37x
पापिष्ठेभ्यो ह्यनर्घार्हः स नरोऽस्तु स्वपापकृत्।
दत्त्वा दानं कीर्तयतु यस्ते हरति पुष्करम्।।
13-143-37a
13-143-37b
अरुन्धत्युवाच। 13-143-38x
श्वश्र्वाऽपवादं वदतु भर्तुर्भवतु दुर्मनाः।
एका स्वादु समश्नातु या ते हरति पुष्करम्।।
13-143-38a
13-143-38b
वालखिल्या ऊचुः। 13-143-39x
एकपादेन वृत्त्यर्थं ग्रामद्वारे स तिष्ठतु।
धर्मज्ञस्त्यक्तधर्मास्तु यस्ते हरति पुष्करम्।।
13-143-39a
13-143-39b
पशुसख उवाच। 13-143-40x
अग्निहोत्रमनादृत्य स सुखं स्वपतु द्विजः।
परिव्राट् कामवृत्तोस्तु यस्ते हरति पुष्करम्।।
13-143-40a
13-143-40b
सुरभ्युवाच। 13-143-41x
वालजेन निदानेन कांस्यं भवतु दोहनम्।
दुह्येत परवत्सेन या ते हरति पुष्करम्।।
13-143-41a
13-143-41b
भीष्म उवाच। 13-143-42x
ततस्तु तैः शपथैः शप्यमानै-
र्नानाविधैर्बहुभिः कौरवेन्द्र।
सहस्राक्षो देवराट् सम्प्रहृष्टः
समीक्ष्य तं कोपनं विप्रमुख्यम्।।
13-143-42a
13-143-42b
13-143-42c
13-143-42d
यथाब्रवीन्मघवा प्रत्ययं स्वं
स्वयं समागत्य तमृषिं जातरोषम्।
ब्रह्मर्षिदेवर्षिनृपर्षिमध्ये
यं तं निबोधेह ममाद्य राजन्।।
13-143-43a
13-143-43b
13-143-43c
13-143-43d
शक्र उवाच। 13-143-44x
अध्वर्यवे दुहितरं ददातु
छन्दोगे वाऽऽचरितब्रह्मचर्ये।
अथर्वणं वेदमधीत्य विप्रः
स्नायीत यः पुष्करमाददाति।।
13-143-44a
13-143-44b
13-143-44c
13-143-44d
सर्वान्वेदानधीयीत पुण्यशीलोऽस्तु धार्मिकः।
ब्रह्मणः सदनं यातु यस्ते हरति पुष्करम्।।
13-143-45a
13-143-45b
अगस्त्य उवाच। 13-143-46x
आशीर्वादस्त्वया प्रोक्तः शपथो बलसूदन।
दीयतां पुष्करं मह्यमेष धर्मः सनातनः।।
13-143-46a
13-143-46b
इन्द्र उवाच। 13-143-47x
न मया भगवँल्लोभाद्धृतं पुष्करमद्य वै।
धर्मांस्तु श्रोतुकामेन हृतं न क्रोद्धुमर्हसि।।
13-143-47a
13-143-47b
धर्मश्रुतिसमुत्कर्षो धर्मसेतुरनामयः।
आर्षो वै शाश्वतो नित्यमव्ययोऽयं मया श्रुतः।।
13-143-48a
13-143-48b
तदिदं गृह्यतां विद्वन्पुष्करं द्विजसत्तम।
अतिक्रमं मे भगवन्क्षन्तुमर्हस्यनिन्दित।।
13-143-49a
13-143-49b
इत्युक्तः स महेन्द्रेण तपस्वी कोपनो भृशम्।
जग्राह पुष्करं धीमान्प्रसन्नश्चाभवन्मुनिः।।
13-143-50a
13-143-50b
प्रययुस्ते ततो भूयस्तीर्थानि वनगोचराः।
पुण्येषु तीर्थेषु तथा गात्राण्याप्लावयन्त ते।।
13-143-51a
13-143-51b
आख्यानं य इदं युक्तः पठेत्वर्वणिपर्वणि।
न मूर्खं जनयेत्पुत्रं न भवेच्च निराकृतिः।।
13-143-52a
13-143-52b
न तमापत्स्पृशेत्काचिद्विज्वरो न जरावहः।
विरजाः श्रेयसा युक्तः प्रेत्य स्वर्गमवाप्नुयात्।।
13-143-53a
13-143-53b
यश्च शास्त्रमधीयीत ऋषिभिः परिपालितम्।
स गच्छेद्ब्रह्मणो लोकमव्ययं च नरोत्तम।।
13-143-54a
13-143-54b
।। इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि
दानधर्मपर्वणि त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः।। 143 ।।

[सम्पाद्यताम्]

13-143-1 अत्र शपथेनैव निषिद्धार्थप्रकाशने।। 13-143-2 पुष्करार्थं इन्द्रेण स्तैन्यं कृतम्। मुनिभिः शपथाः कृता इत्यर्थः।। 13-143-8 बिसमृणालयोः कमलकुमुदवदवान्तरभेदो ज्ञेयः। ह्रियन्तं ह्रियमाणम्।। 13-143-12 प्रत्यवरान्मध्यमान्। तमोत्तरं यावदिदं न वर्तत इति झ.पाठः।। 13-143-16 पृष्ठमांसानि पृष्ठवाहानां हयवृषभोष्ट्रादीनां मांसानि। खादेच्च ब्रह्ममांसानीति ड.पाठः।। 13-143-17 भिक्षुः संम्यासी।। 13-143-18 पणतु क्रयविक्रयं करोतु। सर्वं अपण्यमपि।। 13-143-19 विगतः समभावो यस्मात्तेनासमेन कामक्रोधादिना। कृपणत्वं समेतु स इति ट.ध.पाठः।। 13-143-20 अनिकृतिः अकृतप्रायाश्चेतः।। मानं च परिकर्षत्विति ट.ध.पाठः।। 13-143-22 चोरकार्यं प्रचरतु इति ट.ध.पाठः। भार्यां स्वां चैव दूष्यतु इति थ.पाठः। भार्या वाचैव तुष्यत्विति ध. पाठः।। 13-143-23 उदपाने प्लव आप्लवः स्नानं यस्मिन्।। 13-143-24 यतिर्गच्छतु मैथुनमिति ट.ध.पाठः।। 13-143-28 अतिथिर्यतिः। गृहसंस्थो गृहवासी। अतिथिं गृहस्थस्त्यजत्विति थ.पाठः। भृतो वित्तेन क्रीतः।। 13-143-30 गूढो ज्ञातुं बहिश्शास्त्रमिति थ. ध.पाठः।। 13-143-33 भृतकौ धान्यविक्रीतः सन् अवर्षां वृष्टिनिर्बन्धं करोतु।। 13-143-37 पापिष्ठा एव अनर्घार्हाः अपूज्याः। अयं तु ततोप्यपूज्योस्तु। स्वपापकृत् स्वेषु ज्ञातिषु पापकृत्।। 13-143-41 निदानं दोहनकाले गवां पादबन्धनी रज्जुस्तेन।। 13-143-43 प्रत्ययमभिप्रायम्।। 13-143-48 धर्मश्रुतीनां सम्यगुत्कर्षः। धर्म एव सेतुस्तरणोपायः।।

अनुशासनपर्व-142 पुटाग्रे अल्लिखितम्। अनुशासनपर्व-144