महाभारतम्-07-द्रोणपर्व-203

विकिस्रोतः तः
Jump to navigation Jump to search
← द्रोणपर्व-202 महाभारतम्
सप्तमपर्व
महाभारतम्-07-द्रोणपर्व-203
वेदव्यासः
कर्णपर्व →
  1. 001
  2. 002
  3. 003
  4. 004
  5. 005
  6. 006
  7. 007
  8. 008
  9. 009
  10. 010
  11. 011
  12. 012
  13. 013
  14. 014
  15. 015
  16. 016
  17. 017
  18. 018
  19. 019
  20. 020
  21. 021
  22. 022
  23. 023
  24. 024
  25. 025
  26. 026
  27. 027
  28. 028
  29. 029
  30. 030
  31. 031
  32. 032
  33. 033
  34. 034
  35. 035
  36. 036
  37. 037
  38. 038
  39. 039
  40. 040
  41. 041
  42. 042
  43. 043
  44. 044
  45. 045
  46. 046
  47. 047
  48. 048
  49. 049
  50. 050
  51. 051
  52. 052
  53. 053
  54. 054
  55. 055
  56. 056
  57. 057
  58. 058
  59. 059
  60. 060
  61. 061
  62. 062
  63. 063
  64. 064
  65. 065
  66. 066
  67. 067
  68. 068
  69. 069
  70. 070
  71. 071
  72. 072
  73. 073
  74. 074
  75. 075
  76. 076
  77. 077
  78. 078
  79. 079
  80. 080
  81. 081
  82. 082
  83. 083
  84. 084
  85. 085
  86. 086
  87. 087
  88. 088
  89. 089
  90. 090
  91. 091
  92. 092
  93. 093
  94. 094
  95. 095
  96. 096
  97. 097
  98. 098
  99. 099
  100. 100
  101. 101
  102. 102
  103. 103
  104. 104
  105. 105
  106. 106
  107. 107
  108. 108
  109. 109
  110. 110
  111. 111
  112. 112
  113. 113
  114. 114
  115. 115
  116. 116
  117. 117
  118. 118
  119. 119
  120. 120
  121. 121
  122. 122
  123. 123
  124. 124
  125. 125
  126. 126
  127. 127
  128. 128
  129. 129
  130. 130
  131. 131
  132. 132
  133. 133
  134. 134
  135. 135
  136. 136
  137. 137
  138. 138
  139. 139
  140. 140
  141. 141
  142. 142
  143. 143
  144. 144
  145. 145
  146. 146
  147. 147
  148. 148
  149. 149
  150. 150
  151. 151
  152. 152
  153. 153
  154. 154
  155. 155
  156. 156
  157. 157
  158. 158
  159. 159
  160. 160
  161. 161
  162. 162
  163. 163
  164. 164
  165. 165
  166. 166
  167. 167
  168. 168
  169. 169
  170. 170
  171. 171
  172. 172
  173. 173
  174. 174
  175. 175
  176. 176
  177. 177
  178. 178
  179. 179
  180. 180
  181. 181
  182. 182
  183. 183
  184. 184
  185. 185
  186. 186
  187. 187
  188. 188
  189. 189
  190. 190
  191. 191
  192. 192
  193. 193
  194. 194
  195. 195
  196. 196
  197. 197
  198. 198
  199. 199
  200. 200
  201. 201
  202. 202
  203. 203

इतरालक्षितं पुरतः स्वानुकूलं युध्यमानं शूलपाणिं कञ्चन पुरुषप्रवरमवलोकयता पार्थेन स क इति यदृच्छासमागतं व्यासं प्रति प्रश्नः।। 1 ।।

तेन तम्प्रति तस्य तस्य पशुपतित्वोक्त्या शतरुद्रीयपठनेन सविस्तरं तद्गुणगणवर्णनम्।। 2 ।।

धृतराष्ट्र उवाच। 5-203-1x
तस्मिन्नतिरथे द्रोणे निहते तत्र सञ्जय।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वन्नतः परम्।।
5-203-1a
5-203-1b
सञ्जय उवाच। 5-203-2x
तस्मिन्नतिरथे द्रोणे निहते पार्षतेन वै।
कौरवेषु च भग्नेषु कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः।।
5-203-2a
5-203-2b
दृष्ट्वा सुमहदाश्चर्यमात्मनो विजयावहम्।
मुनिं स्निग्धाम्बुदाभासं वेदव्यासमकल्मषम्।
यदृच्छयाऽऽगतं व्यासं पप्रच्छ भरतर्षभ।।
5-203-3a
5-203-3b
5-203-3c
अर्जुन उवाच। 5-203-4x
सङ्ग्रामे न्यहनं शत्रूञ्शरौघैर्विमलैरहम्।
अग्रतो लक्षये यान्तं पुरुषं पावकप्रभम्।।
5-203-4a
5-203-4b
ज्वलन्तं शूलमुद्यम्य यां दिशं प्रतिपद्यते।
तस्यां दिशि विदीर्यन्ते शत्रवो मे महामुने।।
5-203-5a
5-203-5b
तेन भग्नानरीन्सर्वान्मद्भग्नान्मन्यते जनः।
तेन भग्नानि सैन्यानि पृष्ठतोऽनुव्रजाम्यहम्।।
5-203-6a
5-203-6b
भगवंस्तन्ममाचक्ष्व को वै स पुरुषोत्तमः।
शूलपाणिर्मया दृष्टस्तेजसा सूर्यसन्निभः।।
5-203-7a
5-203-7b
न पद्भ्यां स्पृशते भूमिं न च शूलं विमुञ्चति।
शूलाच्छूलसहस्राणि निष्पेतुस्तस्य तेजसा।।
5-203-8a
5-203-8b
व्यास उवाच। 5-203-9x
प्रजापतीनां प्रथमं तैजसं पुरुषं प्रभुम्।
भुवनं भूर्भुवं देवं तेजसां प्रवरं प्रभुम्।।
5-203-9a
5-203-9b
ईशानं वरदं पार्थ दृष्टवानसि शङ्करम्।
तं गच्छ शरणं देवं वरदं भुवनेश्वरम्।।
5-203-10a
5-203-10b
महादेवं महात्मानमीशानं जटिलं विभुम्।
त्र्यक्षं महाभुजं रुद्रं शिखिनं चीवराससम्।।
5-203-11a
5-203-11b
महादेवं हरं स्थाणुं वरदं भुवनेश्वरम्।
जगत्प्रधानमजितं जगत्प्रीतिमधीश्वरम्।।
5-203-12a
5-203-12b
जगद्योनिं जगद्बीजं जयिनं जगतो गतिम्।
विश्वात्मानं विश्वसृजं विश्वमूर्तिं यशस्विनम्।।
5-203-13a
5-203-13b
विश्वेश्वरं विश्वनरं कर्मणामीश्वरं प्रभुम्।
शंभुं स्वयंभुं भूतेशं भूतभव्यभवोद्भवम्।।
5-203-14a
5-203-14b
योगं योगेश्वरं सर्वं सर्वलोकेश्वरेश्वरम्।
सर्वश्रेष्ठं जगच्छ्रेष्ठं वरिष्ठं परमेष्ठिनम्।।
5-203-15a
5-203-15b
लोकत्रयविधातारमेकं लोकत्रयाश्रयम्।
शुद्धात्मानं भवं भीमं शशाङ्ककृतशेखरम्।।
5-203-16a
5-203-16b
शाश्वतं भूधरं देवं सर्ववागीश्वरेश्वरम्।
सुदुर्जयं जगन्नाथं जन्ममृत्युजरातिगम्।।
5-203-17a
5-203-17b
ज्ञानात्मानं ज्ञानगम्यं ज्ञानश्रेष्ठं सुदुर्विदम्।
दातारं चैव भक्तानां प्रसादविहितान्वरान्।।
5-203-18a
5-203-18b
तस्य पारिषदा दिव्या रूपैर्नानाविधैर्विभोः।
वामना जटिला मुण्डा हस्वग्रीवा महोदराः।।
5-203-19a
5-203-19b
महाकाया महोत्साहा महाकर्णास्तथाऽपरे।
आननैर्विकृतैः पादैः पार्थ वेषैश्च वैकृतैः।।
5-203-20a
5-203-20b
ईदृशैः स महादेवः पूज्यमानो महेश्वरः।
स शिवस्तात तेजस्वी प्रसादाद्याति तेऽग्रतः।।
5-203-21a
5-203-21b
तस्मिन्घोरे सदा पार्थ सङ्ग्रामे रोमहर्षणे।
द्रौणिकर्णकृपैर्गुप्तां महेष्वासैः प्रहारिभिः।।
5-203-22a
5-203-22b
कस्तां सेनां तदा पार्थ मनसाऽपि प्रधर्षयेत्।
ऋते देवान्महेष्वासाद्बहुरूपान्महेश्वरात्।।
5-203-23a
5-203-23b
स्थातुमुत्सहते कश्चिन्न तस्मिन्नग्रतः स्थिते।
न हि भूतं समं तेन त्रिषु लोकेषु विद्यते।।
5-203-24a
5-203-24b
गन्धेनापि हि सङ्ग्रामे तस्य क्रुद्धस्य शत्रवः।
विसंज्ञा हतभूयिष्ठा वेपन्ति च पतन्ति च।।
5-203-25a
5-203-25b
तस्मै नमस्तु कुर्वन्तो देवास्तिष्ठन्ति वै दिवि।
ये चान्ये मानवा लोके ये च स्वर्गजितो नराः।।
5-203-26a
5-203-26b
ये भक्ता वरदं देव शिवं रुद्रमुमापतिम्।
अनन्यभावेन सदा सर्वेशं समुपासते।।
5-203-27a
5-203-27b
`सङ्ग्रामेषु जयं प्राप्य पालयन्ति महीमिमाम्'।
इह लोके सुखं प्राप्य ते यान्ति परमां गतिम्।।
5-203-28a
5-203-28b
नमस्कुरुष्व कौन्तेय तस्मै शान्ताय वै सदा।
रुद्राय शितिकण्ठाय कनिष्ठाय सुवर्चसे।।
5-203-29a
5-203-29b
कपर्दिने करालाय हर्यक्षवरदाय च।
याम्यायाव्यक्तकेशाय सद्वृत्ते शङ्कराय च।।
5-203-30a
5-203-30b
काम्याय हरिनेत्राय स्थाणवे पुरुषाय च।। 5-203-31a
`नमो वृक्षाय सेनान्ये मध्यमाय नमोनमः'।
हरिकेशाय मुण्डाय कृशायोत्तारणाय च।
भास्कारय सुतीर्थाय देवदेवाय रंहसे।।
5-203-32a
5-203-32b
5-203-32c
बहुरूपाय सर्वाय प्रियाय प्रियवाससे।
उष्णीषिणे सुवक्त्राय सहस्राक्षाय मीढुषे।।
5-203-33a
5-203-33b
गिरिशाय प्रशान्ताय पतये चीरवाससे।
हिरण्यबाहवे राजन्नुग्राय पतये दिशाम्।।
5-203-34a
5-203-34b
पर्जन्यपतये चैव भूतानां पतये नमः।
वृक्षाणां पतये चैव गवां च पतये नमः।।
5-203-35a
5-203-35b
वृक्षैरावृतकायाय सेनान्ये मध्यमाय च।
स्रुवहस्ताय देवाय धन्विने भार्गवाय च।।
5-203-36a
5-203-36b
बहुरूपाय विश्वस्य पतये मुञ्चवाससे।
सहस्रशिरसे चैव सहस्रचरणाय च।
सहस्रबाहवे चैव सहस्रवदनाय च।।
5-203-37a
5-203-37b
5-203-37c
शरणं गच्छ कौन्तेय वरदं भुवनेश्वरम्।
उमापतिं विरूपाक्षं दक्षयज्ञनिबर्हणम्।।
5-203-38a
5-203-38b
प्रजानां पतिमव्यग्रं भूतानां पतिमव्ययम्।
कपर्दिनं वृषावर्तं वृषनाभं वृषध्वजम्।।
5-203-39a
5-203-39b
वृषदर्पं वृषपतिं वृषशृङ्गं वृषर्षभम्।
वृषाङ्गं वृषभोदारं वृषभं वृषभेक्षणम्।।
5-203-40a
5-203-40b
वृषायुधं वृषशरं वृषभूतं वृषेश्वरम्।
महोदरं महाकायं द्वीपिचर्मनिवासिनम्।।
5-203-41a
5-203-41b
लोकेशं वरदं पुण्यं ब्रह्मण्यं ब्राह्मणप्रियम्।
त्रिशूलपाणिं वरदं खङ्गचर्मधरं प्रभुम्।।
5-203-42a
5-203-42b
पिनाकिनं खङ्घधरं लोकानां पतिमीश्वरम्।
प्रपद्ये शरणं देवं शरण्यं चीरवाससम्।।
5-203-43a
5-203-43b
नमस्तस्मै सुरेशाय गणानां पतये नमः।
सुवाससे नमस्तुभ्यं सुव्रताय सुधन्विने।।
5-203-44a
5-203-44b
धनुर्धराय देवाय प्रियधन्वाय धन्विने।
धन्वन्तराय धनुषे धन्वाचार्याय ते नमः।।
5-203-45a
5-203-45b
उग्रायुधाय देवाय नमः सुरवराय च।
नमोस्तु बहुरूपाय नमोस्तु बहुधन्विने।।
5-203-46a
5-203-46b
नमोस्तु स्थाणवे नित्यं नमस्तस्मै तपस्विने।
नमोस्तु त्रिपुरघ्नाय भगघ्नाय च वै नमः।
5-203-47a
5-203-47b
वनस्पतीनां पतये नराणां पतये नमः।
मातॄणां पतये चैव गणानां पतये नमः।।
5-203-48a
5-203-48b
गवां च पतये नित्यं यज्ञानां पतये नमः।
अपां च पतये नित्यं देवानां पतये नमः।।
5-203-49a
5-203-49b
पूष्णो दन्तविनाशाय त्र्यक्षाय वरदाय च।
नीलकण्ठाय पिङ्गाय स्वर्णकेशाय वै नमः।।
5-203-50a
5-203-50b
कर्माणि यानि दिव्यानि महादेवस्य धीमतः।
तानि ते कीर्तयिष्यामि तथाप्रज्ञं यथाश्रुतम्।।
5-203-51a
5-203-51b
न सुरा नासुरा लोके न गन्धर्वा न राक्षसाः।
सुखमेधन्ति कुपिते तस्मिन्नपि गुरागताः।।
5-203-52a
5-203-52b
दक्षस्य यजमानस्य विधिवत्संभृतं पुरा।
विव्याध कुपितो यज्ञं निर्दयस्त्वभवत्तदा।
धनुषा बाणमुत्सृज्य सघोषं विननाद च।।
5-203-53a
5-203-53b
5-203-53c
तेन शर्म कुतः शान्तिं लेभिरे स्म सुरास्तदा।
विद्रुते सहसा यज्ञे कुपिते च महेश्वरे।।
5-203-54a
5-203-54d
तेन ज्यातलघोषेण सर्वे लोकाः समाकुलाः।
बभूवुर्वशगाः पार्थ निपेतुश्च सुरासुराः।।
5-203-55a
5-203-55b
आपश्चुक्षुभिरे सर्वाश्चकम्पे च वसुन्धरा।
पर्वताश्च व्यशीर्यन्त दिशो नागाश्च मोहिताः।।
5-203-56a
5-203-56b
अन्धेन तमसा लोका न प्राकाशन्त संवृताः।
जघ्निवान्सह सूर्येण सर्वेषां ज्योतिषां प्रभाः।।
5-203-57a
5-203-57b
चुक्षुभुर्भयभीताश्च शान्तिं चक्रुस्तथैव च।
ऋषयः सर्वभूतानामात्मनश्च सुखैषिणः।।
5-203-58a
5-203-58b
पूषाणमभ्यद्रवत शङ्करः प्रहसन्निव।
पुरोडाशं भक्षयतो दशनान्वै व्यशातयत्।।
5-203-59a
5-203-59b
ततो निश्चक्रमुर्देवा वेपमाना भयार्दिताः।। 5-203-60a
पुनश्च सन्दधे दीप्तान्देवानां निशिताञ्शरान्।
सधूमान्सस्फुलिङ्गांश्च विद्युत्तोयदसन्निभान्।।
5-203-61a
5-203-61b
तं दृष्ट्वा तु सुराः सर्वे प्रणिपत्य महेश्वरम्।
रुद्रस्य यज्ञभागं च विशिष्टं ते त्वकल्पयन्।।
5-203-62a
5-203-62b
भयेन त्रिदशा राजञ्छरणं च प्रपेदिरे।
तेन चैवातिकोपेन स यज्ञः सन्धितस्तदा।
भग्नाश्चापि सुरा आसन्भीताश्चाद्यापि तं प्रति।।
5-203-63a
5-203-63b
5-203-63c
असुराणां पुराण्यासंस्त्रीणि वीर्यवतां दिवि।
आयसं राजतं चैव सौवर्णं परमं महत्।।
5-203-64a
5-203-64b
सौवर्णं कमलाक्षस्य तारकाक्षस्य राजतम्।
तृतीयं तु पुरं तेषां विद्युन्मालिन आयसम्।
न शक्तस्तानि मघवान्भेत्तुं सर्वायुधैरपि।।
5-203-65a
5-203-65b
5-203-65c
अथ सर्वे सुरा रुद्रं जग्मुः शरणमर्दिताः।
ते तमूचुर्महात्मानं सर्वे देवाः सवासवाः।।
5-203-66a
5-203-66b
ब्रह्मदत्तवरा ह्येते घोरास्त्रिपुरवासिनः।
पीडयन्त्यधिकं लोकं यस्मात्ते वरदर्पिताः।।
5-203-67a
5-203-67b
त्वदृते देवदेवेश नान्यः शक्तः कथञ्चन।
हन्तुं दैत्यान्महादेव जहि तांस्त्वं सुरद्विपः।।
5-203-68a
5-203-68b
रुद्र रौद्रा भविष्यन्ति पशवः सर्वकर्मसु।
निपातयिष्यसे चैतानसुरान्भुवनेश्वर।।
5-203-69a
5-203-69b
स तथोक्तस्तथेत्युक्त्वा देवानां हितकाम्यया।
गन्धमादनविन्ध्यौ च कृत्वा वंशध्वजौ हरः।।
5-203-70a
5-203-70b
पृथ्वीं ससागरवनां रथं कृत्वा तु शङ्करः।
अक्षं कृत्वा तु नागेन्द्रं शेषं नाम त्रिलोचनः।।
5-203-71a
5-203-71b
चक्रे कृत्वा तु चन्द्रार्कौ देवदेवः पिनाकधृत्।
अणी कृत्वैलपत्रं च पुष्पदन्तं च त्र्यम्बकः।।
5-203-72a
5-203-72b
यूपं कृत्वा तु मलयमवनाहं च तक्षकम्।। 5-203-73a
योक्त्राङ्गानि च सत्वानि कृत्वा शर्वः प्रतापवान्।
वेदान्कृत्वाऽथ चतुरश्चतुरश्वान्महेश्वरः।।
5-203-74a
5-203-74b
उपदेवान्खलीनांश्च कृत्वा लोकत्रयेश्वरः।
गायत्रीं प्रग्रहं कृत्वा सावित्रीं च महेश्वरः।।
5-203-75a
5-203-75b
कृत्वोंकारं प्रतोदं च ब्रह्माणं चैव सारथिम्।
गाण्डीवं मन्दरं कृत्वा गुणं कृत्वा तु वासुकिम्।।
5-203-76a
5-203-76b
विष्णुं शरोत्तमं कृत्वा शल्यमग्निं तथैव च।
वायुं कृत्वाऽथ वाजाभ्यां पुङ्खे वैवस्वतं यमम्।।
5-203-77a
5-203-77b
विद्युत्कृत्वाऽथ निश्राणं मेरुं कृत्वाऽथ वै ध्वजम्।
आरुह्य स रथं दिव्यं सर्वदेवमयं शिवः।।
5-203-78a
5-203-78b
त्रिपुरस्य वधार्थाय स्थाणुः प्रहरतां वरः।
असुराणामन्तकरः श्रीमानतुलविक्रमः।।
5-203-79a
5-203-79b
स्तूयमानः सुरैः पार्थ ऋषिभिश्च तपोधनैः।
स्थानं माहेश्वरं कृत्वा दिव्यमप्रतिमं प्रभुः।
अतिष्ठत्स्थाणुभूतः स सहस्रं परिवत्सरान्।।
5-203-80a
5-203-80b
5-203-80c
यदा त्रीणि समेतानि अन्तरिक्षे पुराणि च।
त्रिपर्वणा त्रिशल्येन तदा तानि बिभेद सः।।
5-203-81a
5-203-81b
पुराणि न च तं शेकुर्दानवाः प्रतिवीक्षितुम्।
शरं कालाग्निसंयुक्तं विष्णुसोमसमायुतम्।।
5-203-82a
5-203-82b
पुराणि दग्धवन्तं तं देवी याता प्रवीक्षितुम्।
`देव्याः स्वयंवरे वृत्तं शृणुष्वान्यद्धनञ्जय'।।
5-203-83a
5-203-83b
बालमङ्कगतं कृत्वा स्वयं पञ्चशिखं पुनः।
उमा जिज्ञासमाना वै कोयमित्यब्रवीत्सुरान्।।
5-203-84a
5-203-84b
असूयतश्च शक्रस्य वज्रेण प्रहरिष्यतः।
बाहुं सवज्रं तं तस्य क्रुद्धस्यास्तम्भयत्प्रभुः।
[प्रहस्य* भगवांस्तूर्णं सर्वलोकेश्वरो विभुः।।
5-203-85a
5-203-85b
5-203-85c
ततः स स्तम्भितभुजः शक्रो देवगणैर्वृतः।
जगाम ससुरस्तूर्णं ब्रह्माणं प्रभुमव्ययम्।।
5-203-86a
5-203-86b
ते तं प्रणम्य शिरसा प्रोचुः प्राञ्जलयस्तदा।। 5-203-87a
किमप्यङ्कगतं ब्रह्मन्पार्वत्या भूतमद्भुतम्।
बालरूपधरं दृष्ट्वा नास्माभिरभिलक्षितः।।
5-203-88a
5-203-88b
तस्मात्त्वां प्रष्टुमिच्छामो निर्जिता येन वै वयम्।
अयुध्यता हि बालेन लीलया सपुरंदराः।।
5-203-89a
5-203-89b
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः।
ध्यात्वा स शंभुं भगवान्बालं चामिततेजसम्।
उवाच भगवान्ब्रह्मा शक्रादींश्च सुरोत्तमान्।।
5-203-90a
5-203-90b
5-203-90c
चराचरस्य जगतः प्रभुः स भगवान्हरः।
तस्मात्परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति महेश्वरात्।।
5-203-91a
5-203-91b
यो दृष्टो ह्युमया सार्धं युष्माभिरमितद्युतिः।
स पार्वत्याः कृते शर्वः कृतवान्बालरूपताम्।।
5-203-92a
5-203-92b
ते मया सहिता यूयं प्रापद्यध्वं तमेव हि]।
स एष भगवान्देवः सर्वलोकेश्वरः प्रभुः।।
5-203-93a
5-203-93b
न सम्बबुधिरे चैनं देवास्तं भुवनेश्वरम्।
सप्रजापतयः सर्वे बालार्कसदृशप्रभम्।।
5-203-94a
5-203-94b
अथाभ्येत्य ततो ब्रह्मा दृष्ट्वा स च महेश्वरम्।
अयं श्रेष्ठ इति ज्ञात्वा ववन्दे तं पितामहः।।
5-203-95a
5-203-95b
[ब्रह्मोवाच। 5-203-96x
त्वं यज्ञो भुनस्यास्य त्वं गतिस्त्वं परायणम्।
त्वं भवस्त्वं महादेवस्त्वं धाम परमं पदम्।।
5-203-96a
5-203-96b
त्वया सर्वमिदं व्याप्तं जगत्स्थावरजङ्गमम्।। 5-203-97a
भगवन्भूतभव्येश लोकनाथ जगत्पते।
प्रसादं कुरु शक्रस्य त्वया क्रोधार्दितस्य वै।।
5-203-98a
5-203-98b
व्यास उवाच। 5-203-99x
पद्मयोनिवचः श्रुत्वा ततः प्रीतो महेश्वरः
प्रसादाभिमुखो भूत्वा अट्टहासमथाकरोत्।।]
5-203-99a
5-203-99b
ततः प्रसादयामासुरुमां रुद्रं च ते सुराः।
अभवच्च पुनर्बाहुर्यथाप्रकृति वज्रिणः।।
5-203-100a
5-203-100b
तेषां प्रसन्नो भगवान्सपत्नीको वृषध्वजः।
देवानां त्रिदशश्रेष्ठो दक्षयज्ञविनाशनः।।
5-203-101a
5-203-101b
स वै रुद्रः स च शिवः सोऽग्निः सर्वश्च सर्ववित्।
स चेन्द्रश्चैव वायुश्च सोऽश्विनौ च स विद्युतः।।
5-203-10a
5-203-10b
स भवः स च पर्जन्यो महादेवः सनातनः।
स चन्द्रमाः स चेशानः स सूर्यो वरुणश्च सः।।
5-203-10a
5-203-10b
स कालः सोऽन्तको मृत्युः स यमो रात्र्यहानि तु।
मासार्धमासा ऋतवः सन्ध्ये संवत्सरश्च सः।।
5-203-10a
5-203-10b
धाता च स विधाता च विश्वात्मा विश्वकर्मकृत्।
सर्वामां देवतानां च धारयत्यवपुर्वपुः।।
5-203-10a
5-203-10b
सर्वदेवैः स्तुतो देवः सैकधा बहुधा च सः।
शतधा सहस्रधा चैव भूयः शतसहस्रधाः।।
5-203-10a
5-203-10b
द्वे तनू तस्य देवस्य वेदज्ञा ब्राह्मणा विदुः।
घोरा चान्या शिवा चान्या ते तनू बहुधा पुनः।।
5-203-10a
5-203-10b
घोरा तु यातुधानस्य सोऽग्निर्विष्णुः स भास्करः।
सौम्यातु पुनरेवास्य आपो ज्योतींषि चन्द्रमाः।।
5-203-10a
5-203-10b
वेदाः साङ्गोपनिषदः पुराणाध्यात्मनिश्चयाः।
यदत्र परमं गुह्यं स वै देवो महेश्वरः।।
ईदृशश्च महादेवो भूयांश्च भगवानजः।
5-203-10a
5-203-10b
5-203-10b
न हि सर्वे मया शक्या वक्तुं भगवतो गुणाः।।
अपि वर्षसहस्रेण सततं पाण्‍डुनन्दन।
सर्वैर्ग्रहैर्गृहीतान्वै सर्वपापसमन्वितान्।।
5-203-10a
5-203-10b
5-203-111b
स मोचयति सुप्रीतः शरण्यः शरणागतान्।
आयुरारोग्यमैश्वर्यं वित्तं कामांश्च पुष्कलान्।।
5-203-112a
5-203-112b
स ददाति मनुष्येभ्यः स चैवाक्षिपते पुनः।
सेन्द्रादिषु च देवेषु तस्य चैश्वर्यमुच्यते।।
5-203-113a
5-203-113b
स चैव वेत्ति लोकेषु मनुष्याणां शुभाशुभे।
ऐश्वर्याच्चैव कामानामीश्वरश्च स उच्यते।।
5-203-114a
5-203-114b
महेश्वरश्च महतां भूतानामीश्वरश्च सः।
बहुभिर्बहुधा रूपैर्विश्वं व्याप्नोति वै जगत्।।
5-203-115a
5-203-115b
तस्य देवस्य यद्वक्त्रं समुद्रे तदधिष्ठितम्।
ब़डबामुखेति विख्यातं पिबत्तोयमयं हविः।।
5-203-116a
5-203-116b
एष चैव श्मशानेषु देवो वसति नित्यशः।
यजन्त्येनं जनास्तत्र वीरस्थान इतीश्वरम्।।
5-203-117a
5-203-117b
अस्य दीप्तानि रूपाणि घोराणि च बहूनि च।
लोके यान्यस्य पूज्यन्ते मनुष्याः प्रवदन्ति च।।
5-203-118a
5-203-118b
नामधेयानि लोकेषु बहून्यस्य यथार्थवत्।
निरुच्यन्ते महत्त्वाच्च विभुत्वात्कर्मणस्तथा।।
5-203-119a
5-203-119b
वेदे चास्य समाम्नातं शतरुद्रियमुत्तमम्।
नाम्ना चानन्तरुद्रेति ह्युपस्थानं महात्मनः।।
5-203-120a
5-203-120b
स कामानां प्रभुर्देवो ये दिव्या ये च मानुषाः।
स विभुः स प्रभुर्देवोविश्वं व्याप्नोति वै महत्।।
5-203-121a
5-203-121b
ज्येष्ठं भूतं वदन्त्येनं ब्राह्मणा मनुयस्तथा।
प्रथमो ह्येष देवानां मुखादस्यानलोऽभवत्।।
5-203-122a
5-203-122b
सर्वथा यत्पशून्पाति तैश्च यद्रमते पुनः।
तेषामधिपतिर्यच्च तस्मात्पशुपतिः स्मृतः।।
5-203-123a
5-203-123b
दिव्यं च ब्रह्मचर्येण लिङ्गमस्य यथास्थितम्।
महयत्येष लोकांश्च महेश्वर इति स्मृतः।।
5-203-124a
5-203-124b
ऋषयश्चैव देवाश्च गन्धर्वाप्यरसस्तथा।
लिङ्गमस्यार्चयन्ति स्म तच्चाप्यूर्ध्वं समास्थितम्।।
5-203-125a
5-203-125b
पूज्यमाने ततस्तस्मिन्मोदते स महेश्वरः।
सुखी प्रीतश्च भवति प्रहृष्टश्चैव शङ्करः।।
5-203-126a
5-203-126b
यदस्य बहुधा रूपं भूतभव्यभवस्थितम्।
स्थावरं जङ्गमं चैव बहुरूपस्ततः स्मृतः।।
5-203-127a
5-203-127b
एकाक्षो जाज्वलन्नास्ते सर्वतोक्षिमयोऽपि वा।
क्रोधाद्यश्चाविशल्लोकांस्तस्मात्सर्व इति स्मृतः।।
5-203-128a
5-203-128b
धूम्ररूपं च यत्तस्य धूर्जटिस्तेन चोच्यते।
विश्वे देवाश्च यत्तस्मिन्विश्वरूपस्ततः स्मृतः।।
5-203-129a
5-203-129b
तिस्रो देवीर्यदा चैव भजते भुवनेश्वरः।
द्यामपः पृथिवीं चैव त्र्यम्बकश्च ततः स्मृतः।।
5-203-130a
5-203-130b
समेधयति यन्नित्यं सर्वार्थान्सर्वकर्मसु।
शिवमिच्छन्मनुष्याणां तस्मादेष शिवः स्मृतः।।
5-203-131a
5-203-131b
सहस्राक्षोऽयुताक्षो वा सर्वतोक्षिमयोऽपि वा।
यच्च विश्वं महत्पाति महादेवस्ततः स्मृतः।।
5-203-132a
5-203-132b
महत्पूर्वं स्थितो यच्च प्राणोत्पत्तिस्थितश्च यत्।
स्थितलिङ्गश्च यन्नित्यं तस्मात्स्थाणुरिति स्मृतः।।
5-203-133a
5-203-133b
[सूर्याचन्द्रमसोर्लोके प्रकाशन्ते रुचश्च याः।
ताः केशसंज्ञितास्त्र्यक्षे व्योमकेशस्ततः स्मृतः।।
5-203-134a
5-203-134b
भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं जगदशेषतः।
भव एव ततो यस्माद्भूतभव्यभवोद्भवः।।
5-203-135a
5-203-135b
कपिः श्रेष्ठ इति प्रोक्तो धर्मश्च वृष उच्यते।
स देवदेवो भगवान्कीर्त्यतेऽतो वृषाकपिः।।
5-203-136a
5-203-136b
ब्रह्माणमिन्द्रं वरुणं यमं धनदमेव च।
निगृह्य हरते यस्मात्तस्माद्वर इति स्मृतः।।
5-203-137a
5-203-137b
निमीलिताभ्यां नेत्राभ्यां बलाद्देवो महेश्वरः।
ललाटे नेत्रमसृजत्तेन त्र्यक्षः स उच्यते।।]
5-203-138a
5-203-138b
विषमस्थः शरीरेषु समश्च प्राणिनामिह।
स वायुर्विषमस्थेषु प्राणोऽपानः शरीरिषु।।
5-203-139a
5-203-139b
पूजयेद्विग्रहं यस्तु लिङ्गं चापि महात्मनः।
लिङ्गं पूजयिता नित्यं महतीं श्रियमश्नुते।।
5-203-140a
5-203-140b
ऊरुभ्यामर्धमाग्नेयं सोमोऽर्धं च शिवा तनुः।
आत्मनोऽर्धं तथा चाग्निः सोमोर्धं पुनरुच्यते।।
5-203-141a
5-203-141b
तैजसी महती दीप्ता देवेभ्योऽस्य शिवा तनुः।
भास्वती मानुषेष्वस्य तनुर्घोराऽग्निरुच्यते।।
5-203-142a
5-203-142b
ब्रह्मचर्यं चरत्येष शिवा याऽस्य तनुस्तया।
याऽस्य घोरतरा मूर्तिः सर्वानत्ति तयेश्वरः।।
5-203-143a
5-203-143b
यन्निर्दहति यत्तीक्ष्णो यदुग्रो यत्प्रतापवान्।
मांसशोणितमज्जादो यत्ततो रुद्र उच्यते।।
5-203-144a
5-203-144b
एष देवो महादेवो योऽसौ पार्थ तवाग्रतः।
सङ्ग्रामे शास्त्रवान्निघ्नंस्त्वया दृष्टः पिनाकधृत।।
5-203-145a
5-203-145b
सिन्धुराजवधार्थाय प्रतिज्ञाते त्वयाऽनघ।
कृष्णेन दर्शितः स्वप्ने यस्तु शैलेन्द्रमूर्धनि।।
5-203-146a
5-203-146b
एष वै भगवान्देवः सङ्ग्रामे याति तेऽग्रतः।
येन दत्तानि तेऽस्त्राणि यैस्त्वया दानवा हताः।।
5-203-147a
5-203-147b
धन्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं वेदैश्च सम्मितम्।
देवदेवस्य ते पार्थ व्याख्यातं शतरुद्रियम्।
5-203-148a
5-203-148b
सर्वार्थसाधनं पुण्यं सर्वकिल्बिषनाशनम्।
सर्वपापप्रशमनं सर्वदुःखभयापहम्।।
5-203-149a
5-203-149b
चतुर्विधमिदं स्तोत्रं यः शृणोति नरः सदा।
विजित्य शत्रून्सर्वान्स रुद्रलोके महीयते।।
5-203-150a
5-203-150b
चरितं महात्मनो नित्यं साङ्ग्रामिकमिदं स्मृतम्।
पठन्वै शतरुद्रीयं शृण्वंश्च सततोत्थितः।।
5-203-151a
5-203-151b
भक्तो विश्वेश्वरं देवं मानुषेषु च यः सदा।
वरान्कामान्स लभते प्रसन्ने त्र्यम्बके नरः।।
5-203-152a
5-203-152b
गच्छ युध्यस्व कौन्तेय न तवास्ति पराजयः।
गस्य मन्त्री च गोप्ता च पार्श्वस्थो हि जनार्दनः।।
5-203-153a
5-203-153b
सञ्जय उवाच। 5-203-154x
एवमुक्त्वाऽर्जुनं सङ्ख्ये पराशरसुतस्तदा।
जगाम भरतश्रेष्ठ यथागतमरिन्दम।।
5-203-154a
5-203-154b
`वेशंपायन उवाच। 5-203-155x
एतदाख्याय वै सूतो राज्ञः सर्वं तु सञ्जयः।
प्रयातः शिबिरायैव द्रष्टुं कर्णस्य वैशसम्।।
5-203-155a
5-203-155b
युद्धं कृत्वा महद्धोरं पञ्चाहानि महाबलः।
ब्राह्मणो निहतो राजन्ब्रह्मलोकमवाप्तवान्।।
5-203-156a
5-203-156b
स्वधीते यत्फलं वेदे तदस्मिन्नपि पर्वणि।
क्षत्रियाणामभीरूणां युक्तमत्र महद्यशः।।
5-203-157a
5-203-157b
य इदं पठते पर्व शृणुयाद्वाऽपि नित्यशः।
स मुच्यते महापापैः कृतैर्घोरैश्च कर्मभिः।।
5-203-158a
5-203-158b
यज्ञावाप्तिर्ब्राह्मणस्येह नित्यं
घोरे युद्धे क्षत्रियाणां यशश्च।
शेषौ वर्णौ काममिष्टं लभेते
पुत्रान्पौत्रान्नित्यमिष्टांस्तथैव।।
5-203-159a
5-203-159b
5-203-159c
5-203-159d
।। इति श्रीमन्महाभारते शतसाहस्यां संहितायां वैयासिक्यां
द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वणि
त्र्यधिकद्विशततमोऽध्यायः।। 203 ।।
समाप्तं नारायणास्त्रमोक्षपर्व।। 8 ।। द्रोणपर्व च समाप्तम्।। 7 ।।

[सम्पाद्यताम्]

5-203-3 यदृच्छया।। 5-203-11 जटिलं शिखिनमिति रुपभेदाभिप्रायेण विशेषणद्वयं योज्यम्।। 5-203-12 जगत्प्रीतिं जगदानन्दकरम्।। 5-203-13 जगद्योनिं जगद्बीजमिति जगतां मातापितृरूपम्।। 5-203-14 विश्वनरं विश्वस्य नेतारम्। भूतस्य भव्यस्य भवस्य वर्तमानस्य चोद्भवम्।। 5-203-15 योगेश्वरं योगिनामीशम्। योगानां फलप्रदं वा।। 5-203-17 सुदुर्जयमत्यन्तं दुष्प्रापमनधिकारिभिः।। 5-203-51 कर्माणि चैव घोराणि महादेवस्य धन्विनः इति क.ख.पाठः।। 5-203-52 गुहागताः पातालगता अपीत्यर्थः।। 5-203-57 तमसा संवृता न प्राकाशन्त न प्राज्ञायन्त।। 5-203-58 चक्रुर्ऋषय इति सम्बन्धः।। 5-203-59 पूषाणं पूषणम्।। 5-203-60 नताः स्म ते इति पाठे नता लीनाः सन्तो निश्चक्रमुर्यज्ञदेशादपक्रान्ताः।। 5-203-61 देवानां लीनानामपि वधायेति शेषः।। 5-203-63 अतिकोपेन अतिक्रान्तकोपेन शान्तेनेत्यर्थः। ततः प्रभृति पूर्वं भग्नाः सन्तोऽद्यापि भीताः सन्तीत्यर्थः।। 5-203-70 वंशध्वजौ अल्पौ ध्वजौ पार्श्वद्वयस्थौ। महाध्वजस्तु मेरुरिति वक्ष्यते।। 5-203-72 अणी युगान्तबन्धने द्वौ नागौ।। 5-203-73 यूपं युगम्। अवनाहं त्रिवेणुयुगबन्धनरज्जुम्।। 5-203-74 योक्त्राणि। अङ्गानि चाकर्षादीनि। सत्वानि सरीसृपपर्वतादीनि च।। 5-203-75 उपवेदान् आयुर्वेदधनुर्वेदगान्धर्ववेदपश्चिमाम्नायान्। खलीनान् खडियाळीति प्रसिद्धान्। गायत्रीसावित्र्यौ प्रग्रहं रश्मीन्।। 5-203-77 वाजाभ्यां पक्षाभ्यां पक्षयोरित्यर्थः।। 5-203-78 विद्युत् विद्युतम्। निश्राणं निशितम्।। 5-203-80 स्थानं स्थीयतेस्मिन्निति योगाद्व्यूहम्। स्थाणुरचलः।। 5-203-81 समेतानि समसूत्रगतानि। त्रिपर्वणा त्रीणि विष्णुवायुवैवस्वताख्यानि शरपक्षपुङ्खरूपाणि पर्वाणि यस्य तेन। त्रिशल्येन गार्हपत्यदक्षिणाग्न्याहवनीयरूपाऽग्नित्रयशल्येन।। 5-203-96 गतिः पालकः। परायणं लयस्थानम्। भव उत्पत्तिकारणम्।। 5-203-98 ईशः शिक्षकः। नाथः नायकः। पतिः पालकः।। 5-203-120 शतरुद्रियं नमस्ते रुद्र मन्यव इति याजुषः प्रपाठकः। उपस्थानं रुद्रोपस्थानमन्त्रभूतम्।। 5-203-121 कामानां दिव्यानां मानुषाणां च स प्रभुर्दाता। विभुर्व्यापकः।। 5-203-203 त्र्यधिकद्विशततमोऽध्यायः।।

द्रोणपर्व-202 पुटाग्रे अल्लिखितम्। कर्णपर्व