महाभारतम्-07-द्रोणपर्व-143

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अर्जुनच्छिन्नभुजस्य भूरिश्रवसः तदुपालम्भपूर्वकं प्रायोपवेशः।। 1 ।। सात्यकिना भूरिश्रवश्शिरश्छेदः।। 2 ।।

सञ्जय उवाच। 5-143-1x
स बाहुर्न्यपतद्भूमौ सखङ्गः सशुभाङ्गदः।
आदधज्जीवलोकस्य दुःखमद्भुतमुत्तमः।
`यन्त्रमुक्तो महेन्द्रस्य ध्वजो वृत्तोत्सवो यथा'।।
5-143-1a
5-143-1b
5-143-1c
प्रहरिष्यन्हृतो बाहुरदृश्यते किरीटिना।
वेगेन न्यपतद्भूमौ पञ्चास्य इव पन्नगः।।
5-143-2a
5-143-2b
स मोघं कृतमात्मानं दृष्ट्वा पार्थेन कौरवः।
उत्सृज्य सात्यकिं क्रोधाद्ग्रर्हयामास पाण्डवम्।।
5-143-3a
5-143-3b
`स विबाहुर्महाराज एकपक्ष इवाण्डजः।
एकचक्रो रथो यद्वद्धरणीमास्थितो नृपः।
उवाच पाण्डवं चैव सर्वक्षत्रस्य पश्यतः।।
5-143-4a
5-143-4b
5-143-4c
भूरिश्रवा उवाच। 5-143-5x
नृशंसं बत कौन्तेय कर्मेदं कृतवानसि।
अपश्यतो विषक्तस्य यन्मे त्वं बाहुमच्छिनः।।
5-143-5a
5-143-5b
येषु येषु नरः पार्थ वर्तते सुसमाहितः।
आशु तच्छीलतामेति तदिदं दृश्यते त्वयि।।
5-143-6a
5-143-6b
किं नु वक्ष्यसि राजानं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम्
किं कुर्वाणो मया सङ्ख्ये हतो भूरिश्रवा इति।।
5-143-7a
5-143-7b
इदमिन्द्रेण ते साक्षादुपदिष्टं महात्मना।
अस्त्रं रुद्रेण वा पार्थ द्रोणेनाथ कृपेण वा।।
5-143-8a
5-143-8b
ननु नामास्त्रधर्मज्ञस्त्वं लोकेऽभ्यधिकः परैः।
सोऽयुध्यमानस्य कथं रणे प्रहृतवानसि।।
5-143-9a
5-143-9b
न प्रमत्ताय भीताय विरथाय प्रयाचते।
व्यसने वर्तमानाय प्रहरन्ति मनीषिणः।।
5-143-10a
5-143-10b
इदं तु नीचाचरितमसत्पुरुषसेवितम्।
कथमाचरितं पार्थ पापकर्म सुदुष्करम्।।
5-143-11a
5-143-11b
आर्येण सुकरं त्वाहुरार्यकर्म धनञ्जय।
अनार्यकर्म त्वार्येण सुदुष्करतमं भुवि।।
5-143-12a
5-143-12b
कथं हि राजवंश्यस्त्वं कौरवेयो विशेषतः।
क्षत्रधर्मादपक्रान्तः सुवृत्तश्चारितव्रतः।।
5-143-13a
5-143-13b
`अल्पस्तवापराधोऽत्र न त्वां तात विगर्हये।
वार्ष्णेयापशदं प्राप्य क्षुद्रं कृतमिदं त्वया'।।
5-143-14a
5-143-14b
इदं तु यदतिक्षुद्रं वार्ष्णेयार्थे कृतं त्वया।
वासुदेवमतं नूनं नैतत्त्वय्युपपद्यते।।
5-143-15a
5-143-15b
को हि नाम प्रमत्ताय परेण सह युध्यते।
ईदृशं व्यसनं दद्याद्यो न कृष्णसखो भवेत्।।
5-143-16a
5-143-16b
व्रात्याः सङ्क्लिष्टकर्माणः प्रकृत्यैव च गर्हिताः।
वृष्ण्यन्धकाः कथं पार्थ प्रमाणं भवता कृताः।।
5-143-17a
5-143-17b
सञ्जय उवाच। 5-143-18x
एवमुक्तो रणे पार्थो भूरिश्रवसमब्रवीत्।
व्यक्तं हि जीर्यमाणोऽपि बुद्धिं जरयते नरः।
अनर्थकमिदं सर्वं यत्त्वया व्याहृतं प्रभो।।
5-143-18a
5-143-18b
5-143-18c
जानन्नेव हृषीकेशं गर्हसे मां च पाण्डवम्।
सङ्गामाणां हि धर्मज्ञः सर्वशास्त्रार्थपारगः।।
5-143-19a
5-143-19b
न चाधर्ममहं कुर्यां जानंश्चैव हि मुह्यसे।। 5-143-20a
युध्यन्ते क्षत्रियाः शत्रून्स्वैःस्वैः परिवृता नराः।
भ्रातृभिः पितृभिः पुत्रैस्तथा सम्बन्धिबान्धवैः।
वयस्यैरथ मित्रैश्च स्वबाहुबलमाश्रिताः।।
5-143-21a
5-143-21b
5-143-21c
स कथं सात्यकिं शिष्यं सुखसम्बन्धिमेव च।
अस्मदर्थे च युध्यन्तं त्यक्त्वा प्राणान्सुदुस्त्यजान्।।
5-143-22a
5-143-22b
मम बाहुं रणे राजन्दक्षिणं युद्धदुर्मदम्।
*त्वया निकृष्यमाणं च दृष्टवानस्मि निष्क्रियम्।।
5-143-23a
5-143-23b
न च त्वं रक्षितव्यो हि एको रणगतेन हि।
यो यस्य युध्यतेऽर्थाय संरक्ष्यो नराधिप।
तै रक्ष्यमाणैः स नृपो रक्षितव्यो महामृधे।।
5-143-24a
5-143-24b
5-143-24c
यद्यहं सात्यकिं दृष्ट्वा तूष्णीमासिष्य आहवे।
ततस्तेन वियोगश्च प्राप्यं नरकमेव च।।
5-143-25a
5-143-25b
रक्षितव्यो मया यस्मात्तस्माल्लब्धो मया स च।
यशश्चैव स्वपक्षेभ्यः फलं मित्रस्य रक्षणात्।।
5-143-26a
5-143-26b
यच्च मां गर्हसे राजन्कृष्णेन सह सङ्गतम्।
कस्तेन सङ्गमं नेच्छेत्तत्र ते बुद्धिविभ्रमः।।
5-143-27a
5-143-27b
आबद्धकवचस्येह रथमारुह्य तिष्ठतः।
सर्वायुधैरुपेतस्य प्रतियोद्धृप्रतीक्षिणः।।
5-143-28a
5-143-28b
अस्मिन्रथगजानीके हयपत्तिसमाकुले।
सिंहनादोद्धतरवे गम्भीरे सैन्यसागरे।।
5-143-29a
5-143-29b
स्वैश्चापि समुपेतस्य विक्रान्तस्य तथा रणे।
सात्यकेन कथं योग्यः सङ्ग्रामस्ते भविष्यति।।
5-143-30a
5-143-30b
बहुभिः सह सङ्गम्य निर्जित्य च महारथान्।
श्रान्तश्च श्रान्तवाहश्च क्षीणसर्वायुधस्त्वया।
समेतः सात्यकिः सङ्ख्ये निर्जितश्च महारथः।।
5-143-31a
5-143-31b
5-143-31c
ईदृशं सात्यकिं सङ्ख्ये निर्जित्य च महारथम्।
अधिकत्वं विजानीपे स्ववीर्यवशमागतम्।।
5-143-32a
5-143-32b
इच्छसि त्वं शिरस्तस्य असिना हर्तुमाहवे।
तथा कृच्छ्रगतं दृष्ट्वा सात्यकिं कः क्षमिष्यति।
एकस्यैकेन हि कथं सङ्ग्रामः सम्भविष्यति।।
5-143-33a
5-143-33b
5-143-33c
त्वं तु गर्हय चात्मानं स्वधर्मं यो न रक्षसि।
कथं रक्षिष्यसे वीर ये वै त्वां संश्रिता जनाः।।
5-143-34a
5-143-34b
आत्तशस्त्रस्य हि रणे वृष्णिपुत्रं जिघांसतः।
छिन्नवान्यदहं बाहुं नैतल्लोकविगर्हितम्।।
5-143-35a
5-143-35b
न्यस्तशस्त्रस्य हि पुनर्विकलस्य विवर्मणः।
अभिमन्योर्वधं तात धार्मिकः को नु पूजयेत्।।
5-143-36a
5-143-36b
सञ्जय उवाच। 5-143-37x
एवमुक्तो महार्बाहुर्यूपकेतुर्महायशाः।
युयुधानं समुत्सृज्य रणे प्रायमुपाविशत्।।
5-143-37a
5-143-37b
शरानास्तीर्य सव्येन पाणिना पुण्यलक्षणः।
यियासुर्ब्रह्मलोकाय प्राणान्प्राणेष्वथाजुहोत्।।
5-143-38a
5-143-38b
सूर्ये चक्षुः समाधाय प्रसन्नं सलिले मनः।
ध्यायन्महोपनिषदं योगयुक्तोऽभवन्मुनिः।।
5-143-39a
5-143-39b
ततस्ते सर्वसेनासु जनाः कृष्णधनञ्जयौ।
गर्हयामासुरप्येतौ शशंसुर्भूरिदक्षिणम्।।
5-143-40a
5-143-40b
निन्द्यमानौ तथा कृष्णौ नोचतुः किञ्चिदप्रियम्।
ततः प्रशस्यमानश्च नाहृष्यद्यूपकेतनः।।
5-143-41a
5-143-41b
तांस्तथावादिनो राजन्पुत्रांस्तव धनञ्जयः।
अमूष्यमाणो मनसा तेषां तस्य च भाषितम्।।
5-143-42a
5-143-42b
असङ्क्रुद्धमना वाचः स्मारयन्निव भारत।
उवाच पाण्डुतनयः साक्षेपमिव फल्गुनः।।
5-143-43a
5-143-43b
मम सर्वेऽपि राजानो जानन्त्येतन्महाव्रतम्।
न शक्यो मामको हन्तुं यो मे स्याद्बाणगोचरे।।
5-143-44a
5-143-44b
यूपकेतुं समीक्ष्यैतन्न मां गर्हितुमर्हथ।
न हि धर्ममविज्ञाय युक्तं गर्हयितुं परम्।।
5-143-45a
5-143-45b
न्यस्तशस्त्रस्य बालस्य विरथस्य विवर्मणः।
`नाभिमन्योर्वधं यूयं गर्हयध्वं कुतस्तदा।।
5-143-46a
5-143-46b
दुर्योधनस्य क्षुद्रस्य अप्रमाणे च तिष्ठतः।
सौमदत्तेरथं साधुः सर्वसाहाय्यकारिणः।।
5-143-47a
5-143-47b
अस्मदीया मया रक्ष्याः प्राणबाध उपस्थिते।
ये मे प्रत्यक्षतो वीरा हन्येरन्निति मे मतिः।।
5-143-48a
5-143-48b
सात्यकश्च वशं नीतः कौरवेण महात्मना।
ततो मयैतच्चरितं प्रतिज्ञारक्षणं प्रति।।
5-143-49a
5-143-49b
सञ्जय उवाच। 5-143-50x
पुनश्च कृपयाऽऽविष्टो बहु तत्तद्विचिन्तयन्।
उवाच चैनं कौरव्यमर्जुनः शोकपीडितः।।
5-143-50a
5-143-50b
धिगस्तु क्षत्रधर्मं तु यत्र त्वं पुरुषेश्वरः।
अवस्थामीदृशीं प्राप्तः शरण्यः शरणप्रदः।।
5-143-51a
5-143-51b
नातिभारः कृतान्तस्य विद्यते कुरुनन्दन।
यत्र त्वं पुरुषव्याघ्रः प्राप्तः पापामिमां दशाम्।।
5-143-52a
5-143-52b
नात्मनः सुकृतस्यास्य फलं वै नृपसत्तम।
यत्र त्वं कुरुशार्दूल प्राप्तः पापामिमां दशाम्।।
5-143-53a
5-143-53b
रौरवं नरकं भीमं गमिष्यति सुयोधनः।
यत्कृते नरशार्दूलः प्राप्तः पापामिमां दशाम्।।
5-143-54a
5-143-54b
को हि नाम पुमाँल्लोके मादृशः पुरुषोत्तम।
प्रहरेत्त्वद्विधे त्वद्य प्रतिज्ञा यदि नो भवेत्'।।
5-143-55a
5-143-55b
एवमुक्तः स पार्थेन शिरसा भूमिमस्पृशत्।
पाणिना चैव सव्येन प्राहिणोदस्य दक्षिणम्।।
5-143-56a
5-143-56b
एतत्पार्थस्य तु वचस्ततः श्रुत्वा महाद्युतिः।
युपकेतुर्महाराज तूष्णीमासीदवाङ्मुखः।।
5-143-57a
5-143-57b
अर्जुन उवाच। 5-143-58x
या प्रीतिर्धर्मराजे मे भीमे च बलिनां वरे।
नकुले सहदेवे च सा मे त्वयि शलाग्रज।।
5-143-58a
5-143-58b
मया त्वं समनुज्ञातः कृष्णेन च महात्मना।
गच्छ पुण्यकृतां लोकाञ्छिबिरौशीनरो यथा।।
5-143-59a
5-143-59b
वासुदेव उवाच। 5-143-60x
ये लोका मम विमलाः सकृद्विभाता
ब्रह्माद्यैः सुरवृषभैरपीष्यमाणाः।
तान्क्षिप्रं व्रज सतताग्निहोत्रयाजि--
न्मत्तुल्यो भव गरुडोत्तमाङ्गयानः।।
5-143-60a
5-143-60b
5-143-60c
5-143-60d
सञ्जय उवाच। 5-143-61x
`धनञ्जये ब्रुवत्येवं घृणया च परिप्लुते।
अवाङ्मुखा बभूवुश्च सैनिकाः सर्व एव ते।।
5-143-61a
5-143-61b
मुहूर्तादिव विश्रम्य सात्यकिः क्रोधमूर्च्छितः।
अमर्षवशमापन्नः सौमदत्तिनिराकृतः'।।
5-143-62a
5-143-62b
उत्थितः स तु शैनेयो विमुक्तः सौमदत्तिना।
सङ्गमादाय चिच्छित्सुः शिरस्तस्य महात्मनः।।
5-143-63a
5-143-63b
निहतं पाण्डुपुत्रेण प्रसक्तं भूरिदक्षिणम्।
इयेष सात्यकिर्हन्तुं शलाग्रजमकल्मषम्।।
5-143-64a
5-143-64b
निकृत्तभुजमासीनं छिन्नहस्तमिव द्विपम्।
क्रोशतां सर्वसैन्यानां निन्द्यमानः सुदुर्मनाः।।
5-143-65a
5-143-65b
वार्यमाणः स कृष्णेन पार्थेन च महात्मना।
भीमेन चक्रक्षाभ्यामश्वत्थाम्ना कृपेण च।।
5-143-66a
5-143-66b
कर्णेन वृषसेनेन सैन्धवेन तथैव च।
विक्रोशतां च सैन्यानामवधीत्तं धृतव्रतम्।।
5-143-67a
5-143-67b
प्रायोपविष्टस्य रणे पार्थेन च्छिन्नबाहुनः।
सात्यकिः कौरवेयस्य खङ्गेनापाहरच्छिरः।।
5-143-68a
5-143-68b
नाभ्यनन्दन्त तं सैन्याः सात्यकिं तेन कर्मणा।
अर्जुनेन हतं पूर्वं यज्जघान कुरूद्वहम्।।
5-143-69a
5-143-69b
सहस्राक्षसमं चैव सिद्धचारणमानवाः।
भूरिश्रवसमालोक्य युद्धे प्रायगतं हतम्।।
5-143-70a
5-143-70b
अपूजयन्त तं देवा विस्मितास्तेऽस्य कर्मभिः।
पक्षवादांश्च सुबहून्प्रावदंस्तव सैनिकाः।।
5-143-71a
5-143-71b
न वार्ष्णेयस्यापराधो भवितव्यं हि तत्तथा।
तस्मान्मन्युर्न वः कार्यः क्रोधो दुःखतरो नृणाम्।।
5-143-72a
5-143-72b
हन्तव्यश्चैष वीरेण नात्र कार्या विचारणा।
विहितो ह्यस्य धात्रैव मृत्युः सात्यकिराहवे।।
5-143-73a
5-143-73b
`मर्तव्यमेव सर्वेण चरमं पूर्वमेव वा।
मन्यध्वं मृत इत्येष माभूद्वो बुद्धिलाघवम्।।
5-143-74a
5-143-74b
तस्मिन्हते महाबाहौ यूपकेतौ महात्मनि।
धिगेनमिति चाक्रन्दन्क्षत्रियाः क्रोधमूर्च्छिताः।।
5-143-75a
5-143-75b
अन्ये न युक्तमित्येव भवितव्यं तथेति च।
केचिदासन्विमनसः केचिद्दुःखसमन्विताः'।।
5-143-76a
5-143-76b
सात्यकिरुवाच। 5-143-77x
न हन्तव्यो न हन्तव्य इति मन्दाः प्रभाषत।
धर्मवादैरधर्मिष्ठा धर्मकञ्चुकमास्थिताः।।
5-143-77a
5-143-77b
यदा बालः सुभद्रायाः सुतः शस्त्रनिनाकृतः।
युष्माभिर्निहतो युद्धे तदा धर्मः क्व वो गतः।।
5-143-78a
5-143-78b
मया त्वेतत्प्रतिज्ञातं क्षेपे कस्मिंश्चिदेव हि।
`श्रुत्वा तत्सर्वभावेन गर्हयध्वं न चार्जुनम्।
शृणुध्वं सर्वमेवेह श्रुत्वा गर्हथ मानवाः'।।
5-143-79a
5-143-79b
5-143-79c
यो मां निष्पिष्य सङ्ग्रमे जीवन्हन्यात्पदा रुषा।
स मे वध्यो भवेच्छत्रुर्यद्यपि स्यान्मुनिव्रतः।।
5-143-80a
5-143-80b
चेष्टमानं प्रतीघाते सभुजं मां सचक्षुषः।
मन्यध्वं मृत इत्येवमेतद्वो बुद्धिलाघवम्।।
5-143-81a
5-143-81b
युक्तो ह्यस्य प्रतीघातः कृतो मे कुरुपुङ्गवाः।। 5-143-82a
यत्तु पार्थेन मां दृष्ट्वा प्रतिज्ञामभिरक्षता।
सखङ्गोऽस्य हृतो बाहुरेतेनैवास्मि वञ्चितः।।
5-143-83a
5-143-83b
भवितव्यं हि यद्भावि दैवं चेष्टयते हि तत्।
सोयं हतो विमर्देऽस्मिन्किमत्राधर्मचेष्टितम्।।
5-143-84a
5-143-84b
अपि चापं पुरा गीतः श्लोको वाल्मीकिना भुवि।
न हन्तव्याः स्त्रिय इति यद्ब्रवीषि प्लवङ्गम।।
5-143-85a
5-143-85b
सर्वकालं मनुष्येण व्यवसायवता सदा।
पीडाकरममित्राणां यत्स्यात्कर्तव्यमेव तत्।
अनुष्ठितं मया तच्च कस्माद्गर्हथ मूढवत्।।
5-143-86a
5-143-86b
5-143-86c
सञ्चय उवाच। 5-143-87x
एवमुक्ते महाराज सर्वे कौरवपुङ्गवाः।
न स्म किंचिदभाषन्त मनसा समपूजयन्।।
5-143-87a
5-143-87b
मन्त्रभिपूतस्य महाध्वरेषु
यशस्विनो भूरिसहस्रदस्य।
मुनेरिवारण्यगतस्य तस्य
न तत्र कश्चिद्वधमभ्यनन्दत्।।
5-143-88a
5-143-88b
5-143-88c
5-143-88d
सुनीलकेशं वरदस्य तस्य
सूरस्य पारावतलोहिताक्षम्।
अश्वस्य मेध्यस्य शिरो निकृत्तं
न्यस्तं हविर्धानमिवान्तरेण।।
5-143-89a
5-143-89b
5-143-89c
5-143-89d
स तेजसा शस्त्रकृतेन पूतो
महाहवे देहवरं विसृज्य।
आक्रामदूर्ध्वं वरदो वरार्हो
व्यावृत्त्य धर्मेण परेम रोदसी।।
5-143-90a
5-143-90b
5-143-90c
5-143-90d
।। इति श्रीमन्महाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि
चतुर्दशदिवसयुद्धे त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः।। 143 ।।

[सम्पाद्यताम्]

5-143-5 विषक्तस्यान्यासक्तस्य।। 5-143-6 येषुयेषु सत्स्वसत्सु वा।। 5-143-* एतदादि 35 त्तमश्लोकपर्यन्तं विद्यमानानां श्लोकानां स्थाने अधोलिखिताः श्लोकाः झ. पुस्तके सन्ति। नचात्मा रक्षितव्यो वै राजन्रणगतेन हि। यो यस्य युज्यतेऽर्थेषु स वै रक्ष्यो नराधिप।। 1 ।। तै रक्ष्यमाणैः स नृपो रक्षितव्यो महामृधे। यद्यहं सात्यकिं पश्ये वध्यमानं महारणे।। 2 ।। ततस्तस्य वियोगेन पापं मेऽनर्थतो भवेत्। रक्षितश्च मया यस्मात्तस्मात्क्रुध्यसि किं मयि।। 3 ।। यच्च मे गर्हसे राजन्नन्येन सह सङ्गतम्। अहं त्वया विनिकृतस्तत्र मे बुद्धिविभ्रमः।। 4 ।। कवचं धुन्वतस्तुभ्यं रथं चारोहतः स्वयम्। धनुर्ज्यां कर्षतश्चैव युध्यतः सह शत्रुभिः।। 5 ।। एवं रथगजाकीर्णे हयपत्तिसमाकुले। सिंहनादोद्भतरवे गम्भीरे सैन्यसागरे।। 6 ।। स्वैः परैश्च समेतेभ्यः सात्वतेन च सङ्गमे। एकस्यैकेन हि कथं सङ्ग्रमः सम्भविष्यति।। 7 ।। बहुभिः सह सङ्गम्य निर्जित्य च महारथान्। श्रान्तश्च श्रान्तवाहश्च विमनाः शस्त्रपीडितः।। 8 ।। ईदृशं सात्यकिं संख्ये निर्जित्य च महारथम्। अधिकत्वं विजानीषे स्ववीर्यवशमागतम्।। 9 ।। यदिच्छसि शिरश्चास्य असिना हन्तुमाहवे। तथा कृच्छ्रगतं चैव सात्यकिं कः क्षमिष्यति।। 10 ।। त्वं वै विगर्हयात्मानमात्मानं यो न रक्षसि। कथं करिष्यसे वीर यो वा त्वां संश्रयेज्जनः।। 11 ।। 5-143-23 दक्षिणं बाहुं तत्स्थनीयम्।। 5-143-37 प्रायं आमरणानशनं प्रारब्धवान्।। 5-143-38 प्राणानसून् प्राणेषुवायुषु अजुहोदाहितवान्।। 5-143-39 प्रसन्नमकल्पमषम्।। 5-143-49 स कथं च वधं नीतः इति ङ. पाठः। सः सात्यकिः वधसुद्दिस्येति शेषः।। 5-143-52 नातिहारः कृतान्तस्येति ठ.पाठः। अतिहारः परिहारः।। 5-143-56 दक्षिणं कृत्तमात्मनः पाणिं अस्यार्जुनस्य समीपे प्राहिणोत् प्रहितवान्।। 5-143-60 ये लोका इति श्लोकः झ.घ.ञ. पुस्तकेष्वेवास्ति। सकृद्विभाताः सहप्रकाशाः। गरुडस्योत्तमाङ्गेन पृष्ठेन यानं यस्य।। 5-143-64 प्रसक्तमन्यासक्तम्।। 5-143-79 क्षेपे निन्दामाम्। जीवन्निति द्वितीयार्थे प्रथमा।। 5-143-85 न हन्तव्या इत्यर्थं घ.ङ.झ.ञ. पाठेष्वेवास्ति।। 5-143-89 वरदस्यार्थितार्थप्रदातुः। हविर्धानमन्तरेण हविर्गृहस्य मध्ये।। 5-143-143 त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः।।

द्रोणपर्व-142 पुटाग्रे अल्लिखितम्। द्रोणपर्व-144