महाभारतम्-07-द्रोणपर्व-146

विकिस्रोतः तः
Jump to navigation Jump to search
← द्रोणपर्व-145 महाभारतम्
सप्तमपर्व
महाभारतम्-07-द्रोणपर्व-146
वेदव्यासः
द्रोणपर्व-147 →
  1. 001
  2. 002
  3. 003
  4. 004
  5. 005
  6. 006
  7. 007
  8. 008
  9. 009
  10. 010
  11. 011
  12. 012
  13. 013
  14. 014
  15. 015
  16. 016
  17. 017
  18. 018
  19. 019
  20. 020
  21. 021
  22. 022
  23. 023
  24. 024
  25. 025
  26. 026
  27. 027
  28. 028
  29. 029
  30. 030
  31. 031
  32. 032
  33. 033
  34. 034
  35. 035
  36. 036
  37. 037
  38. 038
  39. 039
  40. 040
  41. 041
  42. 042
  43. 043
  44. 044
  45. 045
  46. 046
  47. 047
  48. 048
  49. 049
  50. 050
  51. 051
  52. 052
  53. 053
  54. 054
  55. 055
  56. 056
  57. 057
  58. 058
  59. 059
  60. 060
  61. 061
  62. 062
  63. 063
  64. 064
  65. 065
  66. 066
  67. 067
  68. 068
  69. 069
  70. 070
  71. 071
  72. 072
  73. 073
  74. 074
  75. 075
  76. 076
  77. 077
  78. 078
  79. 079
  80. 080
  81. 081
  82. 082
  83. 083
  84. 084
  85. 085
  86. 086
  87. 087
  88. 088
  89. 089
  90. 090
  91. 091
  92. 092
  93. 093
  94. 094
  95. 095
  96. 096
  97. 097
  98. 098
  99. 099
  100. 100
  101. 101
  102. 102
  103. 103
  104. 104
  105. 105
  106. 106
  107. 107
  108. 108
  109. 109
  110. 110
  111. 111
  112. 112
  113. 113
  114. 114
  115. 115
  116. 116
  117. 117
  118. 118
  119. 119
  120. 120
  121. 121
  122. 122
  123. 123
  124. 124
  125. 125
  126. 126
  127. 127
  128. 128
  129. 129
  130. 130
  131. 131
  132. 132
  133. 133
  134. 134
  135. 135
  136. 136
  137. 137
  138. 138
  139. 139
  140. 140
  141. 141
  142. 142
  143. 143
  144. 144
  145. 145
  146. 146
  147. 147
  148. 148
  149. 149
  150. 150
  151. 151
  152. 152
  153. 153
  154. 154
  155. 155
  156. 156
  157. 157
  158. 158
  159. 159
  160. 160
  161. 161
  162. 162
  163. 163
  164. 164
  165. 165
  166. 166
  167. 167
  168. 168
  169. 169
  170. 170
  171. 171
  172. 172
  173. 173
  174. 174
  175. 175
  176. 176
  177. 177
  178. 178
  179. 179
  180. 180
  181. 181
  182. 182
  183. 183
  184. 184
  185. 185
  186. 186
  187. 187
  188. 188
  189. 189
  190. 190
  191. 191
  192. 192
  193. 193
  194. 194
  195. 195
  196. 196
  197. 197
  198. 198
  199. 199
  200. 200
  201. 201
  202. 202
  203. 203

अर्जुनेन कर्णेंप्रति तत्कुतभीमगर्हणातितिक्षया तद्गर्हणपूर्वकं तत्सुतवधप्रतिज्ञा।। 1 ।। कर्णदुर्योधनसंवादः सङ्कुलयुद्धं च।। 2 ।।

धृतराष्ट्र उवाच। 5-146-1x
तथा गतेषु शूरेषु तेषां मम च सञ्जय।
किंस्विद्भीमार्जुनौ चैव सात्यकिश्चाकरोत्तदा।।
5-146-1a
5-146-1b
सञ्जय उवाच। 5-146-2x
विरथो भीमसेनो वै कर्णवाक्शल्यपीडितः।
अमर्षवशमापन्नः फल्गुनं वाक्यमब्रवीत्।।
5-146-2a
5-146-2b
पुनःपुनस्तूबरक मूढ औदरिकेति च।
अकृतास्त्रक मा योत्सीर्बाल सङ्ग्रामकातर।।
5-146-3a
5-146-3b
इति मामब्रवीत्कर्णः पश्यतस्ते धनञ्जय।
एवं वक्ता च मे वध्यस्तेन चोक्तस्तथा ह्यहम्।।
5-146-4a
5-146-4b
एतद्व्रतं महाबाहो त्वया सह कृतं मया।
तथैतन्मम कौन्तेय यथा तव न संशयः।।
5-146-5a
5-146-5b
तद्वधाय नरश्रेष्ठ स्मरैतद्वचनं मम।
यथा भवति तत्सत्यं तथा कुरु धनञ्जय।।
5-146-6a
5-146-6b
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य भीमस्यामितविक्रमः।
ततोऽर्जुनोऽब्रवीत्कर्णं किञ्चिदभ्येत्य संयुगे।।
5-146-7a
5-146-7b
कर्णकर्ण वृथादृष्टे सूतपुत्रात्मसंस्तुत।
अधर्मबुद्धे शृणु मे यत्त्वां वक्ष्यामि साम्प्रतम्।।
5-146-8a
5-146-8b
द्वावेवं कर्ण शूराणां रणे दृष्टौ जयाजयौ।
तौ चाप्यनित्यौ राधेय वासवस्यापि युध्यतः।।
5-146-9a
5-146-9b
`रणमुत्सृज्य निर्लज्ज गच्छसे च पुनः पुनः।
माहात्म्यं पश्य भीमस्य कर्म जन्म कुले तथा।
नोक्तवान्परुषं यत्त्वां पलायनपरायणम्।।
5-146-10a
5-146-10b
5-146-10c
भूयस्त्वमपि सङ्गम्यं सकृदेव यदृच्छया।
विरथं कृतवान्वीरं पाण्डवं सूतदायद।।
5-146-11a
5-146-11b
कुलस्य सदृशं चापि राधेय कृतवानसि।
नैकान्तसिद्धिः सङ्ग्रामे वासवस्यापि विद्यते'।।
5-146-12a
5-146-12b
मुमूर्षुर्युयुधानेन विरथो विकलेन्द्रियः।
मद्वध्यस्त्वमिति ज्ञात्वा जित्वा जीवन्विसर्जितः।।
5-146-13a
5-146-13b
यदृच्छया रणे भीमं युध्यमानं महाबलम्।
कथञ्चिद्विरथं कृत्वा यत्त्वं रूक्षमभाषथाः।
अधर्मस्त्वेष सुमहाननार्यचरितं च तत्।।
5-146-14a
5-146-14b
5-146-14c
नारिं जित्वाऽतिकत्थन्ते न च जल्पन्ति दुर्वचः।
न च कञ्चन निन्दन्ति सन्तः शूरा नरर्षभाः।।
5-146-15a
5-146-15b
त्वं तु प्राकृतविज्ञानस्तत्तद्वदसि सूतज।
बह्वबद्धमकर्ण्यं च चापलादपरीक्षितम्।।
5-146-16a
5-146-16b
युध्यमानं पराक्रान्तं शूरमार्यव्रते रतम्।
यदवोचोऽप्रियं भीमं नैतत्सत्यं वचस्तव।
पश्यतां सर्वसैन्यानां केशवस्य ममैव च।।
5-146-17a
5-146-17b
5-146-17c
विरथो भीमसेनेन कृतोऽसि बहुशो रणे।
न च त्वां परुषं किञ्चिदुक्तवान्पाण्डुनन्दनः।।
5-146-18a
5-146-18b
यस्मात्तु बहु रूक्षं च श्रावितस्ते वृकोदरः।
परोक्षं यच्च सौभद्रो युष्माभिर्बहुभिर्हतः।
तस्मादस्यावलेपस्य सद्यः फलमवाप्नुहि।।
5-146-19a
5-146-19b
5-146-19c
त्वया तस्य धनुश्छिन्नमात्मनाशाय दुर्मते।
तस्माद्वध्योऽसि मे मूढ सभृत्यसुतबान्धवः।।
5-146-20a
5-146-20b
कुरु त्वं सर्वकृत्यानि महत्ते भयमागतम्।
हन्ताऽस्मि वृषसेनं ते प्रेक्षमाणस्य संयुगे।।
5-146-21a
5-146-21b
ये चान्येऽप्युपयास्यन्ति बुद्धिमोहेन मां नृपाः।
तांश्च सर्वान्हनिष्यामि सत्येनायुधमालभे।।
5-146-22a
5-146-22b
त्वां च मूढाकृतप्रज्ञमतिमानिनमाहवे।
दृष्ट्वा दुर्योधनो मन्दो भृशं तप्स्यति पातितम्।।
5-146-23a
5-146-23b
सञ्जय उवाच। 5-146-24x
अर्जुनेन प्रतिज्ञाते वधे कर्णसुतस्य तु।
महान्सुतुमुलः शब्दो बभूव रथिनां तदा।।
5-146-24a
5-146-24b
तस्मिन्नाकुलसङ्ग्रामे वर्तमाने महाभये।
मन्दरश्मिः सहस्रांशुरस्तङ्गिरिमुपाद्रवत्।।
5-146-25a
5-146-25b
ततो दुर्योधनो राजा राधेयं त्वरितोऽब्रवीत्।
अर्जुनं प्रेक्ष्य संयातं जयद्रथवधं प्रति।।
5-146-26a
5-146-26b
`अमानुषाणि कर्माणि कुर्वन्तौ भरतर्षभ।
सात्यकिं भीमसेनं च यत्तौ तौ दर्शयन्निव।।
5-146-27a
5-146-27b
अयं स वैकर्तन युद्धकालो
विदर्शयस्वात्मबलं महात्मन्।
यथा न वध्येत रणेऽर्जुनेन
जयद्रथः कर्ण तथा कुरुष्व।।
5-146-28a
5-146-28b
5-146-28c
5-146-28d
अल्पावशेषो दिवसो हि साम्प्रतं
निवारयेहाद्य रिपुं शरौघैः।
दिनक्षयं प्राप्य नरप्रवीर
ध्रुवो हि नः कर्ण जयो भविष्यति।।
5-146-29a
5-146-29b
5-146-29c
5-146-29d
सैन्धवे रक्ष्यमाणे तु सूर्यस्यास्तमनं प्रति।
मिथ्याप्रतिज्ञः कौन्तेयः प्रवेक्ष्यति हुताशनम्।।
5-146-30a
5-146-30b
अनर्जुनायां च भुवि मुहूर्तमपि मानद।
जीवितुं नोत्सहेरन्वै भ्रातरोऽस्य सहानुगाः।।
5-146-31a
5-146-31b
पाण्डवेषु विनष्टेषु सशैलवनकाननाम्।
वसुन्धरामिमां कर्ण भोक्ष्यामो महतकण्टकाम्।।
5-146-32a
5-146-32b
दैवेनोपहतः पार्थो विपरीतश्च मानद।
कार्याकार्यमजानानः प्रतिज्ञां कृतवान्रणे।।
5-146-33a
5-146-33b
नूनमात्मविनाशाय पाण्डवेन किरीटिना।
मिथ्याप्रतिज्ञैव कृता जयद्रथवधं प्रति।।
5-146-34a
5-146-34b
कथं जीवति दुर्धर्षे त्वपि राधेय फल्गुनः।
अनस्तङ्गत आदित्ये हन्यात्सैन्धवकं नृपम्।।
5-146-35a
5-146-35b
रक्षितं मद्रराजेन कृपेण च महात्मना।
जयद्रथं रणमुखे कथं हन्याद्धनञ्जयः।।
5-146-36a
5-146-36b
द्रौणिना रक्ष्यमाणं च मया दुःशासनेन च।
कथं प्राप्स्यति बीभत्सुः सैन्धवं कालचोदितः।।
5-146-37a
5-146-37b
युध्यन्ते बहवः शूरा लम्बते च दिवाकरः।
शङ्के जयद्रथं पार्थो नैव प्राप्स्यति मानद।।
5-146-38a
5-146-38b
स त्वं कर्ण मया सार्धं शूरैश्चान्यैर्महारथैः।
द्रौणिना त्वं हि सहितो मद्रेशेन कृपेण च।
युध्यस्व यत्नमास्थाय परं पार्थेन संयुगे।।
5-146-39a
5-146-39b
5-146-39c
एवमुक्तस्तु राधेयस्तव पुत्रेण मारिष।
दुर्योधनमिदं वाक्यं प्रत्युवाच कुरूत्तमम्।।
5-146-40a
5-146-40b
दृढलक्ष्येण वीरेण भीमसेनेन धन्विना।
भृशं भिन्नतनुः सङ्ख्ये शरजालैरनेकशः।।
5-146-41a
5-146-41b
स्थातव्यमिति तिष्ठामि रणे सम्प्रति मानद।
नाङ्गमिङ्गति किञ्चिन्मे सन्तप्तस्य महेषुभिः।
योत्स्यामि तु यथाशक्त्या त्वदर्थं जीवितं मम।।
5-146-42a
5-146-42b
5-146-42c
`तत्तथा प्रयतिष्येऽहं परं शक्त्याxxxxसुयोधन'।
यथा पाण्डवमुख्योऽसौ न हनिष्याति सैन्धवम्।।
5-146-43a
5-146-43b
न हि मे युध्यमानस्य सायकानस्यतः शितान्।
सैन्धवं प्राप्स्यते वीरः सव्यसाची धनञ्जयः।।
5-146-44a
5-146-44b
यत्तु भक्तिमता कार्यं सततं हितकाङ्क्षिणा।
तत्करिष्यामि कौरव्य जयो दैवे प्रतिष्ठितः।।
5-146-45a
5-146-45b
सैन्धवार्थे परं यत्नं करिष्याम्यद्य संयुगे।
त्वत्प्रियार्थं महाराज जयो दैवे प्रतिष्ठितः।।
5-146-46a
5-146-46b
अद्य योत्स्येऽर्जुमहं पौरुषं स्वं व्यपाश्रितः।
त्वदर्थे पुरुषव्याघ्र जयो दैवे प्रतिष्ठितः।।
5-146-47a
5-146-47b
अद्य युद्धं कुरुश्रेष्ठ मम पार्थस्य चोभयोः।
पश्यन्तु सर्वसैन्यानि दारुणं रोमहर्षणम्।।
5-146-48a
5-146-48b
सञ्जय उवाच। 5-146-49x
कर्णकौरवयोरेवं रणे संभाषमाणयोः।
अर्जुनो निशितैर्बाणैर्जघान तव वाहिनीम्।।
5-146-49a
5-146-49b
चिच्छेद निशितैर्बाणैः शूराणामनिवर्तिनाम्।। 5-146-50a
भुजान्परिघसङ्काशान्हस्तिहस्तोपमान्रणे।
शिरांसि च महाबाहुश्चिच्छेद निशितैः शरैः।।
5-146-51a
5-146-51b
हस्तिहस्तान्द्विपस्कन्धान्रथाक्षांश्च समन्ततः।
शोणिताक्तान्हयारोहान्गृहीतप्रासतोमरान्।।
5-146-52a
5-146-52b
क्षुरैश्चिच्छेद बीभत्सुर्द्विधैकैकं त्रिधैव च।
हयान्वारणमुख्यांश्च पदातींश्च समन्ततः।
ध्वजांश्छत्राणि चापानि चामराणि शिरांसि च।।
5-146-53a
5-146-53b
5-146-53c
कक्षमग्निरिवोद्धूतः प्रादहत्तव वाहिनीम्।
अचिरेण महीं पार्थश्चकार रुधिरोत्तराम्।।
5-146-54a
5-146-54b
हतभूयिष्ठयोधं तत्कृत्वा तव बलं बली।
आससाद दुराधर्षः सैन्धवं सत्यविक्रमः।।
5-146-55a
5-146-55b
बीभत्सुर्भीमसेनेन सात्वतेन च रक्षितः।
प्रबभौ भरतश्रेष्ठ ज्वलन्निव हुताशनः।।
5-146-56a
5-146-56b
तं तथाऽवस्थितं दृष्ट्वा त्वदीया वीरसंमताः।
नामृष्यन्त महेष्वासाः पाण्डवं पुरुषर्षभाः।।
5-146-57a
5-146-57b
दुर्योधनश्च कर्णश्च वृषसेनोऽथ मद्रराट्।
अश्वत्थामा कृपश्चैव स्वयमेव च सैन्धवः।।
5-146-58a
5-146-88b
सन्नद्धाः सैन्धवस्यार्थे समावृण्वन्किरीटिनम्।
नृत्यन्तं रथमार्गेषु धनुर्ज्यातलनिःस्वनैः।।
5-146-59a
5-146-59b
सङ्ग्रामकोविदं पार्थं सर्वे युद्धविशारदाः।
अभीताः पर्यवर्तन्त व्यादितास्यमिवान्तकम्।।
5-146-60a
5-146-60b
सैन्धवं पृष्ठतः कृत्वा जिघांसन्तोऽच्युतार्जुनौ।
सूर्यास्तमनमिच्छन्तो लोहितायति भास्करे।।
5-146-61a
5-146-61b
ते भुजैर्भोगिभोगाभैर्धनूंष्यानम्य सायकान्।
मुमुचुःसूर्यरश्म्याभाञ्छतशः फल्गुनं प्रति।।
5-146-62a
5-146-62b
ततस्तानस्यमानांश्च किरीटी युद्धदुर्मदः।
द्विधा त्रिधाऽष्टधैकैकं छित्त्वा विव्याध तान्रथान्।।
5-146-63a
5-146-63b
सिंहलाङ्गूलकेतुस्तु दर्शयन्वीर्यमात्मनः।
शारद्वतीसुतो राजन्नर्जुनं प्रत्यवारयन्।।
5-146-64a
5-146-64b
स विद्‌वा दशभिः पार्थं वासुदेवं च सप्तभिः।
अतिष्ठद्रथमार्गेषु सैन्धवं प्रतिपालयन्।।
5-146-65a
5-146-65b
अथैनं कौरवश्रेष्ठाः सर्व एव महारथाः।
महता रथवंशेन सर्वतः प्रत्यवारयन्।।
5-146-66a
5-146-66b
विष्फारयन्तश्चापानि विसृजन्तश्च सायकान्।
सैन्धवं पर्यरक्षन्त शासनात्तनयस्य ते।।
5-146-67a
5-146-67b
ततः पार्थस्य शूरस्य बाह्वोर्बलमदृश्यत।
इषूणामक्षयत्वं च धनुषो गाण्डिवस्य च।।
5-146-68a
5-146-68b
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य द्रौणेः शारद्वतस्य च।
एकैकं दशभिर्बाणैः सर्वानेव समार्पयत्।।
5-146-69a
5-146-69b
तं द्रौणिः पञ्चविंशत्या वृषसेनश्च सप्तभिः।
दुर्योधनश्च विंशत्या कर्णशल्यौ त्रिभिस्त्रिभिः।।
5-146-70a
5-146-70b
त एनमभिगर्जन्तो विध्यन्तश्च पुनःपुनः।
विधुन्वन्तश्च चापानि सर्वतः प्रत्यवारयन्।।
5-146-71a
5-146-71b
श्लिष्टं च सर्वतश्चक्रू रथमण्डलमाशु ते।
सूर्यास्तमनमिच्छन्तस्त्वरमाणा महारथाः।।
5-146-72a
5-146-72b
त एनमभिनर्दन्तौ विधुन्वाना धनूंषि च।
सिषिचुर्मार्गणैस्तीक्ष्णैर्गिरिं मेघा इवाम्बुभिः।।
5-146-73a
5-146-73b
ते महास्त्राणि दिव्यानि तत्र राजन्व्यदर्शयन्।
धनञ्जयस्य गात्रे तु शूराः परिघबाहवः।।
5-146-74a
5-146-74b
`निवार्य ताञ्शरव्रातैर्दिव्यान्यस्त्राणि दर्शयन्'।
हतभूयिष्ठयोधं तत्कृत्वा तव बलं बली।
आससाद दुराधर्षः सैन्धवं सत्यविक्रमः।।
5-146-75a
5-146-75b
5-146-75c
तं कर्णः संयुगे राजन्प्रत्यवारयदाशुगैः।
मिषतो भीमसेनस्य सात्वतस्य च भारत।।
5-146-76a
5-146-76b
तं पार्थो दशभिर्बाणैः प्रत्यविध्यद्राणाजिरे।
सूतपूत्रं महाबाहुः सर्वसैन्यस्य पश्यतः।।
5-146-77a
5-146-77b
सात्वतश्च त्रिभिर्बाणैः कर्णं विव्याध मारिष।
भीमसेनस्त्रिभिश्चैव पुनः पार्थश्च सप्तभिः।।
5-146-78a
5-146-78b
तान्कर्णः प्रतिविव्याध षष्ट्याषष्ट्या महारथः।
तद्युद्धमभवद्राजन्कर्णस्य बहुभिः सह।।
5-146-79a
5-146-79b
तत्राद्भूतमपश्याम सूतपुत्रस्य मारिष।
यदेकः समरे क्रुद्धस्त्रीन्रथान्पर्थवारयत्।।
5-146-80a
5-146-80b
फल्गुनस्तु महाबाहुः कर्णं वैकर्तनं रणे।
सायकानां शतेनैव सर्वमर्मस्वताडयत्।।
5-146-81a
5-146-81b
रुधिरोक्षितसर्वाङ्गः सूतपुत्रः प्रतापवान्।
शरैः पञ्चाशता वीरः फल्गुनं प्रत्यविध्यत।।
5-146-82a
5-146-82b
तस्य तल्लाघवं दृष्ट्वा नामृष्यत रणेऽर्जुनः।
तस्य पार्थो धनुश्छित्त्वा विव्याधैनं स्तनान्तरे।
सायकैर्नवभिर्वीरस्त्वरमाणो धनञ्जयः।।
5-146-83a
5-146-83b
5-146-83c
अथान्यद्धनुरादाय सूतपुत्रः प्रतापवान्।
सायकैरष्टसाहस्रैश्छादयामास पाण्डवम्।।
5-146-84a
5-146-84b
तां बाणवृष्टिमतुलां कर्णचापसमुत्थिताम्।
व्यधमत्सायकैः पार्थः शलभानिव मारुतः।।
5-146-85a
5-146-85b
छादयामास च तदा सायकैरर्जुनो रणे।
पश्यतां सर्पयोधानां दर्शयन्पाणिलाघवम्।।
5-146-86a
5-146-86b
वधार्थं चास्य समरे सायकं सूर्यवर्चसम्।
चिक्षेप त्वरया युक्तस्त्वराकाले धनञ्जयः।।
5-146-87a
5-146-87b
तमापतन्तं वेगेन द्रौणिश्चिच्छेद सायकम्।
अर्धचन्द्रेण तीक्ष्णेन स च्छिन्नः प्रापतद्भूवि।।
5-146-88a
5-146-88b
कर्णोऽपि द्विषतां हन्ता छादयामास फल्गुनम्।
सायकैर्बहुसाहस्रैः कृतप्रतिकृतेप्सया।।
5-146-89a
5-146-89b
तौ वृषाविव नर्दन्तौ नरसिंहौ महारथौ।
सायकैस्तु प्रतिच्छन्नं चक्रतुः खमजिह्मगैः।।
5-146-90a
5-146-90b
अदृश्यौ च शरौथैस्तौ निघ्न्तावितरेतरम्।
कर्ण पार्थोऽस्ति तिष्ठत्वं कर्णोऽहं तिष्ठ फल्गुन्न।।
5-146-91a
5-146-91b
इत्येवं तर्जयन्तौ तौ वाक्शल्यैस्तु परस्परम्।
विध्येतां समरे वीरौ चित्रं लघु च सुष्ठु च।।
5-146-92a
5-146-92b
प्रेक्षणीयौ चाभवतां सर्वयोधसमागमे।
प्रशस्यामानौ समरे सिद्धचारणपन्नगैः।।
5-146-93a
5-146-93b
अयुध्येतां महाराज परस्परवधैषिणौ।
ततो दुर्योधनो राजंस्तावकानभ्यभाषत।।
5-146-94a
5-146-94b
यत्नाद्रक्षत राधेयं नाहत्वा समरेऽर्जुनम्।
निवर्तिष्यति राधेयो न वाऽजित्वाऽद्य फल्गुनं।।
5-146-95a
5-146-95b
एतस्मिन्न्तरे राजन्दृष्ट्वा कर्णस्य विक्रमम्।
आकर्णमुक्तैरिषुभिः कर्णस्य चतुरो हयान्।
अनयत्प्रेतलोकाय चतुर्भिः श्वेतवाहनः।।
5-146-96a
5-146-96b
5-146-96c
सारथिं चास्य भल्लेन रथनीडादपातयत्।
छादयामास स शरैस्तव पुत्रस्य पश्यतः।।
5-146-97a
5-146-97b
सञ्छाद्यमानः समरे हताश्वो हतसारथिः।
मोहितः शरजालेन कर्तव्यं नाभ्यपद्यत।।
5-146-98a
5-146-98b
तं तथा विरथं दृष्ट्वा रथमारोप्य तं तदा।
अश्वत्थामा महाराज भूयोऽर्जुनमयोधयत्।।
5-146-99a
5-146-99b
मद्रराजश्च कौन्तेयमविध्यत्त्रिंशता शरैः।
`आवव्रेऽर्जुनमार्गं च शरजालेन भारत'।।
5-146-100a
5-146-100b
शारद्वतस्तु विंशत्यं वासुदेवं समार्पयत्।
धनञ्जयं द्वादशभिराजघान शिलीमुखैः।।
चतुर्भिः सिन्धुराजश्च वृषसेनश्च सप्तभिः।
पृथक्पृथङ्‌महाराज विव्यधुः कृष्णपाण्डवौ।।
5-146-101a
5-146-101b
5-146-101c
5-146-101d
तथैव तान्प्रत्यविध्यत्कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः।
द्रोणपुत्रं चतुःषष्ट्या मद्रराजं शतेन च।।
सैन्धवं दशभिर्बाणैर्वृषसेनं त्रिभिः शरैः।
शारद्वतं च विंशत्या विद्व्वा पार्थो ननाद ह।।
5-146-102a
5-146-102b
5-146-102c
5-146-102d
ते प्रतिज्ञाप्रतीघातमिच्छन्तः सव्यसाचिनः।
सहितास्तावकास्तूर्णमभिपेतुर्धनञ्जयम्।।
5-146-103a
5-146-103b
अथार्जुनः सर्वतो वारुणास्त्रं
प्रादुश्चक्रे त्रासयन्धार्तराष्ट्रान्।
तं प्रत्युदीयः कुरुवः पाण्डुपुत्रं
रथैर्महार्हैः शरवर्षं सृजन्तः।।
5-146-104a
5-146-104b
5-146-104c
5-146-104d
ततस्तु तस्मिंस्तुमले समुत्थिते
सुदारुणे भारतमोहनीये।
नो मुह्यत प्राप्य स राजपुत्रः
किरीटमाली व्यसृजच्छरौघान्।।
5-146-105a
5-146-105b
5-146-105c
5-146-105d
वधप्रेप्सुः सव्यसाची कुरूणां
स्मरन्क्लेशान्द्वादशवर्षवृत्तान्।
गाण्डीवमुक्तैरिषुभिर्महात्मा
सर्वा दिशो व्यावृणोदप्रमेयः।।
5-146-106a
5-146-106b
5-146-106c
5-146-106d
प्रदीप्तोल्कमभवच्चान्तरिक्षं
मृतेषु देहेष्वपतन्वयांसि।
यत्पिङ्गलज्येन किरीटमाली
क्रुद्धो रिपूनाजगवेन हन्ति।।
5-146-107a
5-146-107b
5-146-107c
5-146-107d
ततः किरीटि महता महायशाः
शरासनेनास्य शराननीकजित्।
हयप्रवेकोत्तमनागघूर्णिता--
न्कुरुप्रवीरानिषुभिर्व्यापातयत्।।
5-146-108a
5-146-108b
5-146-108c
5-146-108d
गदाश्च गुर्वीः परिघानयस्मया--
नसींश्च शक्तीश्च रणे नराधिपाः।
महान्ति शस्त्राणि च भीमदर्शनाः
प्रगृह्य पार्थं सहसाऽभिदुद्रुवुः।।
5-146-111a
5-146-111b
5-146-111c
5-146-111d
ततो युगान्ताभ्रसमस्वनं मह--
न्महेन्द्रचापप्रतिमं च गाण्डिवम्।
चकर्ष दोर्भ्यों विहसन्भृशं ययौ
दहंस्त्वहीयान्यमराष्ट्रवर्धनः।।
5-146-112a
5-146-112b
5-146-112c
5-146-112d
स तानुदीर्णान्सरथान्सवारणा--
न्पदातिसङ्घांश्च महाधनुर्धरः।
विपन्नसर्वायुधजीवितान्रणे
चकार वीरो यमराष्ट्रवर्धनान्।।
5-146-113a
5-146-113b
5-146-113c
5-146-113d
।। इति श्रीमन्महाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि
चतुर्दशदिवसयुद्धे षट्‌चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः।। 146 ।।

[सम्पाद्यताम्]

5-146-33 उपहतो मोहितः। विपरीतोऽन्यथाभूतप्रकृतिः।। 5-146-41 दृढलक्ष्येण दृढप्रहारेण।। 5-146-45 प्रतिष्ठितः अधीनः।। 5-146-106 सर्वर्तोदारमस्त्रं इति। क.ख.ट.पाठः। सर्वतः सारमस्त्रं इति ङ. पाठः।। 5-146-107 प्राप्य युद्धमिति शेषः।। 5-146-110 आस्य समन्ततः क्षिप्त्वा।। 5-146-146 षट्चत्वारिंशदधिकचततमोऽध्यायः।।

द्रोणपर्व-145 पुटाग्रे अल्लिखितम्। द्रोणपर्व-147