मत्स्यपुराणम्/अध्यायः ९५

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शिवचतुर्दशीव्रतकथनम्।

नारद उवाच।
भगवन्! भूतभव्येश! तथान्यदपि यच्छ्रुतम्।
भुक्तिमुक्तिफलायालं तत्पुनर्वक्तुमर्हसि।। ९५.१ ।।

एवमुक्तोऽब्रवीच्छम्भुरयं वाङ्‌मयपारगः।
मत्समस्तपसा ब्रह्मन्! पुराणश्रुतिविस्तरै।। ९५.२ ।।

धर्मोऽयं वृषरूपेण नन्दी नाम गणाधिपः।
धर्मान् माहेश्वरान् वक्ष्यत्यतः प्रभृति नारद?।। ९५.३ ।।

मत्स्य उवाच।
श्रृणुष्वावहितो ब्रह्मन्! वक्ष्ये माहेश्वरं व्रतम्।
त्रिषुलोकेषु विख्यातं नाम्ना शिवचतुर्दशी।। ९५.४ ।।

मार्गंशीर्षं त्रयोदश्यां सितायामेकभेजनः।
प्रार्थयेद्देवदेवेश! त्वामहं शरणं गतः।। ९५.५ ।।

चतुर्दश्यां निराहारः सम्यगभ्यर्च्य शङ्करम्।
सुवर्णवृषभं दत्त्वा भोक्ष्यामि च परेऽहनिः।। ९५.६ ।।

एवं नियमकृत्स्तुत्वा प्रातरुत्थाय मानवः।
कृतस्नानजपः पश्चादुमया सह शङ्करम्।
पूजयेत्कमलैः शुभ्रैर्गन्धमाल्यानुलेपनैः।। ९५.७ ।।

पादौ नमः शिवायेति शिरः सर्वात्मने नमः।
त्रिनेत्रायेति नेत्राणि ललाटं हरये नमः।। ९५.८ ।।

मुखमिन्दुमुखायेति श्रीकण्ठायेति कन्धराम्।
सद्योजाताय कर्णौतु वामदेवाय वै भुजौ।। ९५.९ ।।

अघोरहृदयायेति हृदयञ्चाभिपूजयेत्।
स्तनौ तत्पुरुषायेति तथेशानाय चोदरम्।। ९५.१0 ।।

पार्श्वे चानन्तधर्माय ज्ञानभूताय वै कटिम्।
ऊरू चानन्तवैराग्य सिंहायेत्यभिपूजयेत्।। ९५.११ ।।

अनन्तैश्वर्य्यनाथाय जानुनी चार्चयेद्‌बुधः।
प्रधानाय नमो जङ्घे गुल्‌फौ व्योमात्मने नमः।। ९५.१२ ।।

व्योमकेशात्मरूपाय केशान् पृष्ठञ्च पूजयेत्।
नमः पुष्ट्यै नमस्तुष्ट्यै पार्वतीञ्चापि पूजयेत्।। ९५.१३ ।।

ततस्तुवृषभं हैममुदकुम्भसमन्वितम्।
शुक्लमाल्याम्बरधरं पञ्चरत्नसमन्वितम्।
भक्ष्यैर्नानाविधैर्युक्तं ब्राह्मणाय निवेदयेत्।। ९५.१४ ।।

ततो विप्रान् समाहूय तर्पयेद्भक्तितः शुभान्।
शुक्लमाल्याम्बरधरं पञ्चरत्नसमन्वितम्।। ९५.१५ ।।

पञ्चदश्यां ततः पूज्य विप्रान् भुञ्जीत वाग्यतः।
तद्वत् कृष्णचतुर्दश्यामेतत् सर्वंसमाचरेत्।। ९५.१६ ।।

चतुर्दशीषु सर्वासु कुर्य्यात् पूर्ववदर्चनम्।
ये तु मासे विशेषाः स्युस्तान्निबोध क्रमादिह।। ९५.१७ ।।

मार्गशीर्षादिमासेषु क्रमादेतदुदीरयेत्।
शङ्कराय नमस्तेऽस्तु नमस्ते करवीरक!।। ९५.१८ ।।

त्र्यम्बकाय नमस्तेऽस्तु महेश्वरमतः परम् ।
नमस्तेऽस्तु महादेव! स्थाणवे च ततः परम्।। ९५.१९ ।।

नमः पशुपते नाथ! नमस्ते शम्भवे पुनः।
नमस्ते परमानन्द! नमः सोमार्द्धधारिणे।। ९५.२0 ।।

नमो भीमाय इत्येवं त्वामहं शरणं गतः।
गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधिसर्पिः कुशोदकम्।। ९५.२१ ।।

पञ्चगव्यं ततो बिल्वं कर्पूरञ्चागुरुं यवाः।
तिलाः कृष्णाश्च विधिवत्प्राशनं क्रमशः स्मृतम्।।
प्रतिमासं चतुर्दश्योरेकैकं प्राशनं स्मृतम्।। ९५.२२ ।।

मन्दारमालतीभिश्च तथा धत्तूरकैरपि।
सिन्दुवारैरशोकैश्च मल्लिकाभिश्च पाटलैः।। ९५.२३ ।।

अर्कपुष्पैः कदम्बैश्च शतपत्र्या तथोत्पलैः।
एकैकेन चतुर्दश्योरर्चयेत्पार्वतीपतिम्।। ९५.२४ ।।

पुनश्च कार्तिके मासे प्राप्ते सन्तर्पयेद्‌द्विजान्।
अन्नैर्नानाविधैर्भक्ष्यैर्वस्त्रमाल्यविभूषणैः।। ९५.२५ ।।

कृत्वा नीलवृषोत्सर्गं श्रुत्युक्तविधिना नरः।
उमामहेश्वरं हैमं वृषभञ्च गवा सह।। ९५.२६ ।।

मुक्ताफलाष्टकयुतं सितनेत्रपटावृतम्।
सर्वोपस्करसंयुक्तां शय्यां दद्यात् सकुम्भकाम्।। ९५.२७ ।।

ताम्रपात्रोपरि पुनः शालितण्डुलसंयुतम्।
स्थाप्य विप्राय शान्ताय वेदव्रतपराय च।। ९५.२८ ।।

ज्येष्ठसामविदे देयं न वकव्रतिने क्वचित्।
गुणज्ञे श्रोत्रिये दद्यादाचार्ये तत्त्ववेदिनि।। ९५.२९ ।।

अव्यङ्गाङ्गाय सौम्याय सदाकल्याणकारिणे।
सपत्नीकाय संपूज्य वस्त्रमाल्यविभूषणैः।। ९५.३0 ।।

गुरौ सति गुरोर्देयं तदभावे द्विजातये।
न वित्तशाठ्यं कुर्वीत कुर्वन् दोषात्पतत्यधः।। ९५.३१ ।।

अनेन विधिना यस्तु कुर्याच्छिवचतुर्दशीम्।
सोऽश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः।। ९५.३२ ।।

ब्रह्महत्यादिकं किञ्चिद्यदत्रामुत्र वा कृतम्।
पितृभिर्भ्रातृभिर्वापि तत्सर्वां नाशमाप्नुयात्।। ९५.३३ ।।

दीर्घायुरारोग्यकुलान्नवृद्धिरत्राक्षयामुत्र चतुर्भुजत्वम्।
गणाधिपत्यं दिवि कल्पकोटिशतान्युषित्वा पदमेति शम्भोः।। ९५.३४ ।।

न बृहस्पतिरप्यनन्तमस्याः फलमिन्द्रो न पितामहोऽपि वक्तुम्।।
न च सिद्धगणोऽप्यलं न चाहं यदि जिह्वायुतकोटयोऽपि वक्त्रे।। ९५.३५ ।।

भवत्यमरवल्लभः पठति यः स्मरेद्वासदा।
श्रृणोत्यपि विमत्सरः सकलपापनिर्मोचनम्।
इमां शिव चतुर्दशी ममरकामिनी कोटयः।
स्तुवन्ति तमनिन्दितं किमुसमाचरेद्यः सदा।। ९५.३६ ।।

या वाथ नारी कुरुतेति भक्त्या भर्तारमापृच्छ्य सुतान् गुरून् वा।
सापि प्रसादात्परमेश्वरस्य परम्पदं याति पिनाकपाणेः।। ९५.३७ ।।