मत्स्यपुराणम्/अध्यायः १३५

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अत्र गम्यताम् : सञ्चरणम्, अन्वेषणम्
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  290. अध्यायः २९०
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इलावृतवर्षवर्णनम्।
सूत उवाच।
ततो रणे देवबलं नारदोऽभ्यगमत् पुनः।
आगत्य चैव त्रिपुरात्सभायामास्थितः स्वयम्।। १३५.१ ।।

इलावृतमितिख्यातं तद्वर्षं विस्तृतायतम्।
यत्र यज्ञो बलेर्वृत्तो बलिर्यत्र च संयतः।। १३५.२ ।।

देवानां जन्मभूमिर्या त्रिषु लोकेषु विश्रुता।
विवाहाः क्रतवश्चैव जातकर्म्मादिकाः क्रियाः।। १३५.३ ।।

देवानां यत्र वृत्तानि कन्यादानानि यानि च।
रेमे नित्यं भवो यत्र सहायैः पार्षदैर्गणैः।। १३५.४ ।।

लोकपालाः सदा यत्र तस्थुर्मेरुगिरौ यथा।
मधुपिङ्गलनेत्रस्तु चन्द्रावयवभूषणः।।
देवानामधिपं प्राह गणपांश्च महेश्वरः।। १३५.५ ।।

वासवैतदरीणां ते त्रिपुरं परिद्रृश्यते।
विमानैश्च पताकाभिर्ध्वजैश्च समलङ्कृतम्।। १३५.६ ।।

इदं वृत्रमिदं ख्यातं वह्निवद्भृशतापनम्।
एते जना गिरिप्रख्याः सकुण्डलकिरीटिनः।। १३५.७ ।।

प्राकारगोपुराट्टेषु कक्षान्ते दानवाः स्थिताः।
इमे च तोयदाभासा दनुजा विकृताननाः।। १३५.८ ।।

निर्गच्छन्ति पुरो दैत्याः सायुधा विजयैषिणः।
स त्वं शरशतैः सार्द्धं ससहायो वरायुधः।। १३५.९ ।।

सहद्भिर्मामकैर्भृत्यैर्व्यापादय महासुरान्।। १३५.१० ।।

अहं च रथवर्येण निश्चलाचलवत् स्थितः।
पुरः पुरस्य रन्ध्रार्थी स्थास्यामि विजयाय वः।। १३५.११ ।।

यदा तु पुष्पयोगेन एकत्वं स्थास्यते परम्।
तदेतन्निर्दहस्यामि शरेणैकेन वासव!।। १३५.१२ ।।

इत्युक्तो वै भगवता रुद्रेणेह सुरेश्वरः।
ययौ तत् त्रिपुरं जेतुं तेन सैन्येन संवृतः।। १३५.१३ ।।

प्रक्रान्तरथभीमैस्तैः स देवैः पार्षदाङ्गणैः।
कृतसिंहरवोपेतैरुद्गच्छद्भिरिवाम्बुदैः।। १३५.१४ ।।

तेन नादेन त्रिपुराद्दानवा युद्धलालसाः।
उत्पत्य दुद्रुवुश्चेलुः सायुधाः खे गणेश्वरान्।। १३५.१५ ।।

अन्ये पयोधरा रावाः पयोधरसमा बभुः।
ससिंहनादं वादित्रं वादयामासुरुद्धताः।। १३५.१६ ।।

देवानां सिंहनादश्च सर्वतूर्यरवो महान्।
ग्रस्तोऽभूद्दैत्यनादैश्च चन्द्रस्तोयधरैरिव।। १३५.१७ ।।

चन्द्रोदयात् समुद्भूतः पौर्णमास इवार्णवः।
त्रिपुरं प्रभवत्तद्वद्भीमरूपो महासुरैः।। १३५.१८ ।।

प्राकारेषु पुरे तत्र गोपुरेष्वपि चापरे।
अट्टालकान् समारुह्य केचिच्चलितवादिनः।। १३५.१९ ।।

स्वर्णमालाधराः शूराः प्रभासितकराम्बराः।
केचिन्नदन्ति दनुजास्तोयमुक्ता इवाम्बुदाः।। १३५.२० ।।

इतश्चेतश्च धावन्तः केचिदुद्धूतवाससः।
किमेतदिति पप्रच्छ्रु रन्योन्यं गृहमाश्रिताः।। १३५.२१ ।।

किमेतन्नैव जानामि ज्ञानमन्तर्हितं हि मे।
ज्ञास्यसे नान्तरेणेति कालो विस्तारतो महान्।। १३५.२२ ।।

सोऽप्यसौ पृथिवीसारं सिंहश्च रथमास्थितः।
तिष्ठते त्रिपुरं पीड्य देहं व्याधिरवोच्छ्रितः।। १३५.२३ ।।

य एषोऽस्ति स एषोऽस्तु का चिन्ता सम्भ्रमे सति।
एहि मायुधमादाय क्व मे पृच्छा भविष्यति।। १३५.२४ ।।

इति तेऽन्योन्यमाविद्धा उत्तरोत्तरभाषिणः।
आसाद्य पृच्छन्ति तदा दानवास्त्रिपुरालयाः।। १३५.२५ ।।

तारकाक्षपुरे दैत्यास्तारकाक्षपुरः सराः।
निर्गताः कुपितास्तूर्णं बिलादिवमहोरगाः।। १३५.२६ ।।

निर्द्धावन्तस्तु ते दैत्याः प्रमथाधिपयूथपैः।
निरुद्धा गजराजानो यथा केसरियूथपैः।। १३५.२७ ।।

दर्पितानां ततश्चैषां दर्पितानामिवाग्निनाम्।
रूपाणि जज्वलुस्तेषामग्नीनामिव धम्यताम्।। १३५.२८ ।।

ततो बृहन्ति चापानि भीमनादानि सर्वशः।
निकृष्य जघ्नुरन्योन्यमिषुभिः प्राणभोजनैः।। १३५.२९ ।।

मार्जारमृगभीमास्यान् पार्षदान्विकृताननान्।
द्रृष्ट्वा द्रृष्ट्वा हसन्नुच्चैर्दानवा रूपसम्पदा।। १३५.३० ।।

बाहुभिः परिघाकारैः कृष्यतां धनुषां शराः।
भटवर्मेषु विविशुस्तड़ागानीव पक्षिणः।। १३५.३१ ।।

मृताः स्थ क्व नु यास्येथ हनिष्यामो निवर्त्तताम्।
इत्येवं परुषाण्युक्त्वा दानवाः पार्षदर्षभान्।। १३५.३२ ।।

बिभिदुः सायकैस्तीक्ष्णैः सूर्य्यपादा इवाम्बुदान्।
प्रमथा अपि सिंहाक्षाः सिंहविक्रान्तविक्रमाः।।
खण्डशैलशिलावृक्षैर्बिभिदुर्दैत्यदानवान्।। १३५.३३ ।।

अम्बुदैराकुलमिव हंसाकुलमिवाम्बरम्।
दानवाकुलमत्यर्थं तत्पुरं सकलं बभौ।। १३५.३४ ।।

विकृष्टचापा दैत्येन्द्राः सृजन्ति शरदुर्दिनम्।
इन्द्रचापाङ्कितोरस्का जलदा इव दुर्दिनम्।। १३५.३५ ।।

इषुभिस्ताड्यमानास्ते भूयो भूयो गणेश्वराः।
चक्रुस्ते देहनिर्यासं स्वर्णधातुमिवाचलाः।। १३५.३६ ।।

तथा वृक्षशिला वज्रशूलपट्टिपरश्वधैः।
चूर्ण्यन्तेऽभिहता दैत्याः काचाष्टङ्कहता इव।। १३५.३७ ।।

चन्द्रोदयात् समुद्भूतः पौर्णमास इवार्णवः।
त्रिपुरं प्रभवत्तद्वद्भीमरूपमहासुरैः।। १३५.३८ ।।

तारकाक्षो जयत्येष इति दैत्या व्यघोषयन्।
जयतीन्द्रश्च रुद्रश्च इत्येव च गणेश्वराः।। १३५.३९ ।।

वारिता दारिता बाणैर्योधास्तस्मिन् बलोभये।
निः स्वनन्तोऽम्बुसमये जलगर्भा इवाम्बुदाः।। १३५.४० ।।

करैश्छिन्नैः शिरोभिश्च ध्वजैश्छत्रैश्च पाण्डुरैः।
युद्धभूमिर्भयवती मांसशोणितपूरिता।। १३५.४१ ।।

व्योम्नि चोत्प्लुत्य सहसा तालमात्रं वरायुधैः।
द्रृढ़ाहताः पतन्पूर्वं दानवाः प्रमथास्तथा।। १३५.४२ ।।

सिद्धाश्चाप्सरसश्चैव चारणाश्च नभो गताः।
द्रृढ़प्रहारहृषिताः साधु साध्विति चुक्रुशुः।। १३५.४३ ।।

अनाहताश्च वियति देवदुन्दुभयस्तथा।
नदन्तो मेघशब्देन सरमा इव रोषिताः।। १३५.४४ ।।

त तस्मिंस्त्रिपुरे दैत्यानद्यः सिन्धुपताविव।
विशन्ति क्रुद्धवदना वल्मीकमिवपन्नगाः।। १३५.४५ ।।

तारकाक्षपुरे तस्मिन् सुराः शूराः समन्ततः।
सशस्त्रा निपतन्तिस्म सपक्षा इव भूधराः।। १३५.४६ ।।

योधयन्ति त्रिभागेन त्रिपुरे तु गणेश्वराः।
विद्युन्माली मयश्चैव भग्नौ च द्रुमवद्रणे।। १३५.४७ ।।

विद्युन्माली स दैत्येन्द्रो गिरीन्द्रसद्रृशद्युतिः।
आदाय परिघं घोरं ताड़यामास नन्दिनम्।। १३५.४८ ।।

स नन्दी दानवेन्द्रेण परिघेण द्रृढ़ाहतः।
भ्रमते मधुना व्यक्तः पुरा नारायणो यथा।। १३५.४९ ।।

नन्दीश्वरे गते तत्र गणपाख्यातविक्रमाः।
दुद्रुवुर्जातसंरम्भा विद्युन्मालिनमासुरम्।। १३५.५० ।।

घण्टाकर्णः शङ्कुकर्णो महाकालश्च पार्षदाः।। १३५.५१ ।।

ततश्च सायकैः सर्वान् गणपान् गणपाकृतीन्।
भूयो भूयः स विव्याध गणेश्वरमहत्तमान्।। १३५.५२ ।।

भित्वा भित्वा रुरावोच्चैर्नभस्यम्बुधरो यथा।
तस्यारम्भित शब्देन नन्दी दिनकरप्रभः।।
संज्ञां लभ्य ततः सोऽपि विद्युन्मालिनमाद्रवत्।। १३५.५३ ।।

रुद्रदत्तं तदा दीप्तं दीप्तानलसमप्रभम्।
वज्रं वज्रनिभाङ्गस्य दानवस्य ससर्जह।। १३५.५४ ।।

तन्नन्दिभुजनिर्मुक्तं मुक्ताफलविभूषितम्।
पपात वक्षसि तदा वज्रं दैत्यस्य भीषणम्।। १३५.५५ ।।

स वज्रं निहतो दैत्यो वज्रसंहननोपमः।
पपात वज्राभिहतः शक्रेणाद्रिरिवाहतः।। १३५.५६ ।।

दैत्येश्वरं विनिहतं नन्दिना कुलनन्दिना।
चुक्रुशुर्दानवाः प्रेक्ष्य दुद्रुवुश्च गणाधिपाः।। १३५.५७ ।।

दुः खामर्षितरोषास्ते विद्युन्मालिनिपातिते।
द्रुमशैलमहावृष्टिं पयोदाः ससृजुर्यथा।। १३५.५८ ।।

ते पीड्यमाना गुरुभिर्गिरिभिश्च गणेश्वराः।
कर्त्तव्यं न विदुः किञ्चिद्वन्द्यमधार्मिका इव ।। १३५.५९ ।।

ततोऽसुरवरः श्रीमांस्तारकाक्षः प्रतापवान्।
स तरूणां गिरीणां वै तुल्यरूपधरो बभौ।। १३५.६० ।।

भिन्नोत्तमाङ्गा गणपा भिन्नपादाङ्किताननाः।
विरेजुर्भुजगा मन्त्रैर्वार्यमाणा यथा तथा।। १३५.६१ ।।

मयेन मायावीर्येण वध्यमाना गणेश्वराः।
भ्रमन्ति बहुशब्दालाः पञ्जरे शकुना इव।। १३५.६२ ।।

तथा सुरवरः श्रीमांस्तारकाक्षः प्रतापवान्।
ददाह च बलं सर्वं शुष्केन्धनमिवानलः।। १३५.६३ ।।

तारकाक्षेण वार्यन्ते शरवर्षैस्तदा गणाः।
मयेन माया निहतास्तारकाख्येण चेषुभिः।। १३५.६४ ।।

गणेशा विधुरा जाता जीर्णमूला यथा द्रुमाः।। १३५.६५ ।।

भूयः सम्पततो चाग्निर्ग्रहान् ग्राहान् भुजङ्गमान्।
गिरीन्द्रांश्च हरीन् व्याघ्रान् वृक्षान् सृमरवर्णकान्।। १३५.६६ ।।

शरभानष्टपादांश्च आपः पवनमेव च।
मयो मायाबलेनैव पातयत्येव शत्रुषु।। १३५.६७ ।।

ते तारकाक्षेण मयेन मायया संमुह्यमाना विवशा गणेश्वराः।
न शक्नुवंस्ते मनसापि चेष्टितुं यथेन्द्रियार्था मुनिनाभिसंयताः।। १३५.६८ ।।

महाजलाग्न्यादि सकुञ्जरोरगैर्हरीन्द्रव्याघ्रर्क्षतरक्षुराक्षसैः।
विबाध्यमानास्तमसा विमोहिताः समुद्रमध्येष्विव गाधकाङ्क्षिणः।। १३५.६९ ।।

संमर्द्यमानेषु गणेश्वरेषु सन्नर्दमानेषु सुरेतरेषु।
ततः सुराणां प्रवराभिरक्षितुं रिपोर्बलं सम्विविशुः सहायुधाः।। १३५.७० ।।

यनोगदास्रो वरुणश्च भास्करस्तथा कुमारोऽमरकोटिसंयुतः।
स्वयं च शक्रः सितनागवाहनः कुलीशपाणिः सुरलोकपुङ्गवः।। १३५.७१ ।।

स चोडुनाथः ससुतो दिवाकरा ससान्तकस्त्र्यक्षपतिर्महाद्युतिः।
एते रिपूणां प्रबलाभिरक्षितं तदा बलं सम्विविशुर्मदोद्धताः।। १३५.७२ ।।

यथा वनं दर्पितकुञ्जराधिपा यथा नभः साम्बुधरं दिवाकरः।
यथा च सिंहैर्विजनेषु गोकुलं तथा बलं तत्त्रिदशैरभिद्रुतम्।। १३५.७३ ।।

कृतप्रहारा-तुरदीनदानवं ततस्त्वभज्यन्त बलं हि पार्षदाः।
स्वर्ज्योतिषां ज्योतिरिवोष्मवान् हरिर्यथा तमो घोरतरं नराणाम्।। १३५.७४ ।।

विशान्तयामास यथा सदैव निशाकरः सञ्चितशार्वरन्तमः।
ततोऽपकृष्टे च तमः प्रभावे अस्त्रप्रभावे च विवर्द्धमाने।। १३५.७५ ।।

दिग्लोकपालैर्गणनायकैश्च कृतो महान् सिंहरवो मुहूर्त्तम्।
संख्ये विभग्ना विकरा विपादाश्छिन्नोत्तमाङ्गाः शरपूरिताङ्गाः।। १३५.७६ ।।

देवेतरा देववरैर्विभिन्नाः सीदन्ति पङ्केषु यथा गजेन्द्राः।
वज्रेण भीमेन च वज्रपाणिः शक्त्या च शक्त्या च मयूरकेतुः।। १३५.७७ ।।

दण्डेन चोग्रेण च धर्मराजः पाशेन चोग्रेण च वारिगोप्ता।
शूलेन कालेन च यक्षराजो वीर्येण तेजस्वितया सुकेशः।। १३५.७८ ।।

गणेश्वरास्ते सुरसन्निकाशाः पूर्णाहुतीसिक्तशिखिप्रकाशाः।
उत्सादयन्ते दनुपुत्रवृन्दान्यथैव इन्द्राशनयः पतन्त्यः।। १३५.७९ ।।

मयस्तु देवान् परिरक्षितारमुमात्मजं देववरं कुमारम्।
शरेण भित्वा स हि तारकासुतं सतारकाख्यासुरमाबभाषे।। १३५.८० ।।

कृत्वा प्रहारं प्रविशामिवीरं पुरं हि दैत्येन्द्र बलेन युक्तः।
विश्राममूर्जस्करमप्यवाप्य पुनः करिष्यामि रणं प्रपन्नैः।। १३५.८१ ।।

वयं हि शस्त्रक्षतवीक्षिताङ्गा विशीर्णशस्त्रध्वजवर्मवाहाः।
जयैषिणस्ते जयकाशिनश्च गणेश्वरा लोकवराधिपाश्च।। १३५.८२ ।।

मयस्य श्रुत्वा दिवि तारकाख्यो वचोभिकाङ्क्षन् क्षतजोपमाक्षः।
विवेश तूर्णं त्रिपुरन्दितेः सुतैः सुतैरदित्या युधि वृद्धहर्षैः।। १३५.८३ ।।

ततः सशङ्खानकभेरिभीमं ससिंहनादं हरसैन्यमाबभौ।।
मयानुगन्धोरगभीरगह्वरं यथा हिमाद्रेर्गजसिंहनादितम्।। १३५.८४ ।।