मत्स्यपुराणम्/अध्यायः ४

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अत्र गम्यताम् : सञ्चरणम्, अन्वेषणम्
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सृष्टिप्रकरणम्।

मनुरुवाच।
अहो कष्टतरञ्चैतदङ्गजागमनं विभो!।
कथं न दोषमगमत् कर्मणानेन पद्मभूः।। ४.१ ।।

परस्परञ्च सम्बन्धः सगोत्राणामभूत्कथम्।
वैवाहिकस्तत्सुतानाच्छिन्धि मे संशयं विभो।। ४.२ ।।

दिव्येयमादिसृष्टिस्तु रजोगुणसमुद्भवा।
अतीन्द्रियेन्द्रिया तद्वदतीन्द्रिय शरीरिका।४.३

दिव्यतेजोमयी भूप! दिव्यज्ञानसमुद्भवा।
न मर्त्यैरभितः शक्त्या वक्तुं वै मांसचक्षुभिः।। ४.४ ।।

यथा भुजङ्गाः सर्पाणामाकाशं विश्वपक्षिणाम्।
विदन्ति मार्गं दिव्यानां दिव्या एव न मानवाः।। ४.६ ।।

कार्य्याकार्ये न देवानां शुभाशुभफलप्रदे।
यस्मात्तस्मान्न राजेन्द्र! तद्विचारो नृणां शुभः।। ४.६ ।।

अन्यच्च सर्ववेदानामधिष्ठाता चतुर्मुखः।
गायत्री ब्रह्मणस्तद्वदङ्गभूता निगद्यते।। ४.७ ।।

अमूर्तं मूर्तिमद्वापि मिथुनं तत्प्रचक्षते।
विरिञ्चिर्यत्र भगवांस्तत्र देवी सरस्वती।।
भारती यत्र यत्रैव तत्र तत्र प्रजापतिः।। ४.८ ।।

यथा तपो न रहितश्छायया दृश्यते क्वचित्।
गायत्री ब्रह्मणः पार्श्वं तथैव न विमुञ्चति।। ४.९ ।।

वेदराशिः स्मृतो ब्रह्मा सावित्री तदधिष्ठिता।
तस्मान्नकश्चिद्दोषः स्यात् सावित्री गमने विभो।। ४.१० ।।

तथापि लज्जावनतः प्रजापतिरभूत् पुरा।
स्वसुतोपगमात् ब्रह्मा शशाप कुसुमायुधम्।। ४.११ ।।

यस्मान्ममापि भवता मनः संक्षोभितं शरैः।
तस्मात्वद्देहमचिराद्रुद्रो भस्मीकरिष्यति।। ४.१२ ।।

ततः प्रसादयामास कामदेवश्चतुर्मुखम्।
न मामकारणे शप्तुं त्वमिहार्हसि मानद!।। ४.१३ ।।

अहमेवंविधः सृष्टस्त्वयैव चतुरानन!।
इन्द्रियक्षोभजनकः सर्वेषामेव देहिनाम्।। ४.१४ ।।

स्त्रीपुंसोरविचारेण मया सर्वत्र सर्वदा।
क्षोभ्यं मनः प्रयत्नेन त्वयैवोक्तं पुरा विभो।। ४.१६ ।।

तस्मादनपराधेन त्वयाशप्तस्तथा विभो!।
कुरु प्रसादं भगवन्! स्वशरीराप्तये पुनः।। ४.१६ ।।

ब्रह्मोवाच।
वैवस्वतेऽन्तरे प्राप्ते यादवान्वयसम्भवः।
रामो नाम यदा मर्त्यो मत्सत्वबलमाश्रितः।। ४.१७ ।।

अवतीर्य्यासुरध्वंसी द्वारकामधिवत्स्यति।
तद्‌ भ्रातुस्तत्समस्य त्वन्तदा पुत्रत्वमेष्यसि।। ४.१८ ।।

एवं शरीरमासाद्य भुक्त्वा भोगानशेषतः।
ततो भरतवंशान्ते भूत्वा वत्स नृपात्मजः।। ४.१९ ।।

विद्याधराधिपत्वं च यावदाभूतसंप्लवम्।
सुखानि धर्म्मतः प्राप्य मत्समीपङ्गमिष्यसि।। ४.२० ।।

एवं शापप्रसादाभ्यामुपेतः कुसुमायुधः।
शोकप्रमोदाभियुतो जगाम स यथागतम्।। ४.२१ ।।

मनुरुवाच।
कोऽसौ यदुरिति प्रोक्तो यद्वंशे कामसम्भवः।
कथञ्च दग्धो रुद्रेण किमर्थं कुसुमायुधः।। ४.२२ ।।

भरतस्यान्वये कस्य का च सृष्टिः पुराभवत्।
एतत्सर्वं समाचक्ष्व मूलतः संशयो हि मे।। ४.२३ ।।

मत्स्य उवाच।
या सा देहार्घसम्भूता गायत्री ब्रह्मवादिनी।
जननी या मनोर्देवी शतरूपा शतेन्द्रिया।। ४.२४ ।।

रतिर्मनस्तपो बुद्धि महदादि समुद्भवः।
ततः स शतरूपायां सप्तापत्यान्यजीजनत्।। ४.२६ ।।

ये मरीच्यादयः पुत्रा मानसास्तस्य धीमतः।
तेषामयमभूल्लोकः सर्वज्ञानात्मकः पुरा।। ४.२६ ।।

ततोऽसृजद्वामदेवं त्रिशूलवरधारिणम्!।
सनत्कुमारं च विभुं पूर्वेषामपि पूर्वजम्।। ४.२७ ।।

वामदेवस्तु भगवानसृजन् मुखतो द्विजान्।
राजन्यानसृजद्‌ बाह्वोर्विट्‌शूद्रानूरुपादयोः।। ४.२८ ।।

विद्युतोऽशनिमेघाश्च रोहितेन्द्रधनूंषि च।
च्छदांसि स ससर्जादौ पर्जन्यं च ततः परम्।। ४.२९ ।।

ततः साध्यगणानीशस्त्रिनेत्रानसृजत् पुनः।
कोटयश्चतुराशीतिर्जरामरणवर्जिताः।। ४.३० ।।

वामोऽसृजन्नमर्त्यांस्तान् ब्रह्मणाविनिवारितः।
नैवंविधाभवेत् सृष्टिर्जरामरणवर्जिता।। ४.३१ ।।

शुभाशुभात्मिका यातु सैव सृष्टिः प्रशस्यते।
एवं स्थितः स तेनादौ सृष्टौ स्थाणुरतोऽभवत्।। ४.३२ ।।

स्वायम्भुवो मनुर्धीमांस्तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम्।
पत्नीमेवापरूपाढ्यामनन्तीं नाम नामतः।। ४.३३ ।।

प्रियव्रतोत्तानपादौ मनुस्तस्यामजीजनत्।
धर्मस्य कन्या चतुरा सूनृता नाम भामिनी।। ४.३४ ।।

उत्तानपादात्तनयान् प्राप मन्थरगामिनी।
अपस्यतिमपस्यन्तं कीर्तिमन्तं ध्रुवं तथा।।४.३६

उत्तानपादोऽजनयत् सूनृतायां प्रजापतिः।
ध्रुवो वर्षसहस्राणि त्रीणि कृत्वातपः पुरा।। ४.३६ ।।

दिव्यमाप ततः स्थानमचलं ब्रह्मणो वरात्।
मतेव पुरतः कृत्वा ध्रुवं सप्तर्षयः स्थिताः।। ४.३७ ।।

धन्या नाम मनोः कन्या ध्रुवाच्छिष्टमजीजनत्।
अग्निकन्या तु सुच्छाया शिष्टात्मा सुषुवे सुतान्।। ४.३८ ।।

कृपं रिपुं जयं वृत्तं वृकं च वृकतेजसम्।
चक्षुषं ब्रह्मदौहित्र्यां वीरिण्यां स रिपुञ्जयः।। ४.३९ ।।

वीरणस्यात्मजायान्तु चक्षुर्मनुमजीजनत्।
मनु र्वैराजकन्यायां नड्‌वलायां स चाक्षुषः।। ४.४० ।।

जनयामास तनयान्दश शूरानकल्मषान्।
ऊरुः पूरुः शतद्युग्न स्तपस्वी सत्यवाक्‌ हविः।। ४.४१ ।।

अग्निष्टुदतिरात्रश्च सुद्युम्नश्चापराजितः।
अभिमन्युस्तु दशमो ऩड्वलायामजायत।। ४.४२ ।।

ऊरोरजनयत् पुत्रान् षडाग्नेयी तु सुप्रभान्।
अग्निं सुमनसंख्यातिं क्रतुमङ्गिरसं गयम्।। ४.४३ ।।

पितृकन्या सुनीथातु वेनमङ्गादजीजनत्।
वेनमन्यायितं विप्रा ममन्थुस्तत्करादभूत्।।
पृथुर्नाम महातेजाः स पुत्रौ द्वावजीजनत्।। ४.४४ ।।

अन्तर्धानस्तु मारीचं शिखण्डिन्यामजीजनत्।
हविर्धानात् ष़डाग्नेयी धिषणाऽजनयत् सुतान्।।
प्राचीनबर्हिषं साङ्गं यमं शुक्रं बलं शुभम्।। ४.४६ ।।

प्राचीनबर्हिर्भगवान् महानासीत्प्रजापतिः।
हविर्धानाः प्रजास्तेन बहवः सम्प्रवर्त्तिताः।। ४.४६ ।।

सवर्णायान्तु सामुद्र्यान्दशाधत्त सुतान्‌ प्रभुः।
सर्वे प्रचेतसो नाम धनुर्वेदस्य पारगाः।। ४.४७ ।।

तत्तपो रक्षिता वृक्षा बभुर्लोके समन्ततः।
देवादेशाश्च तानग्निरदहद्रविनन्दन!।। ४.४८ ।।

सोमकन्याऽभवत्पत्नी मारिषा नाम विश्रुता।
तेभ्यस्तु दक्षमेकं सा पुत्र मग्र्‌यमजीजनत्।। ४.४९ ।।

दक्षादनन्तरं वृक्षानौषधानि च सर्वशः।
अजीजनत्सोमकन्या नन्दीं चन्द्रवतीं तथा।। ४.६० ।।

सोमांशस्य च तस्यापि दक्षस्याशीतिकोटयः।
तासां तु विस्तरं वक्ष्ये लोके यः सुप्रतिष्ठितः।। ४.६१ ।।

द्विपदश्चाभवन् केचित् केचिद्‌ बहुपदा नराः।
बलीमुखाः शङ्कुकर्णाः कर्णप्रावरणास्तथा।। ४.६२ ।।

अश्वऋक्षमुखाः केचित् केचित् सिंहाननास्तथा।
श्वशूकरमुखाः केचित् केचिदुष्ट्रमुखास्तथा।। ४.६३ ।।

जनयामास धर्मात्मा म्लेच्छान् सर्व्वाननेकशः।
ससृष्ट्वा मनसा दक्षः स्त्रियः पश्चादजीजनत्।। ४.६४ ।।

ददौ स दश दर्माय कश्यपाय त्रयोदश।
सप्तविंशतिः सोमाय ददौ नक्षत्रसंज्ञिताः।।
देवासुरमनुष्यादि ताभ्यः सर्वमभूज्जगत्।। ४.६६ ।।