मत्स्यपुराणम्/अध्यायः २

विकिस्रोतः तः
अत्र गम्यताम् : सञ्चरणम्, अन्वेषणम्
  1. अध्यायः १
  2. अध्यायः २
  3. अध्यायः ३
  4. अध्यायः ४
  5. अध्यायः ५
  6. अध्यायः ६
  7. अध्यायः ७
  8. अध्यायः ८
  9. अध्यायः ९
  10. अध्यायः १०
  11. अध्यायः ११
  12. अध्यायः १२
  13. अध्यायः १३
  14. अध्यायः १४
  15. अध्यायः १५
  16. अध्यायः १६
  17. अध्यायः १७
  18. अध्यायः १८
  19. अध्यायः १९
  20. अध्यायः २०
  21. अध्यायः २१
  22. अध्यायः २२
  23. अध्यायः २३
  24. अध्यायः २४
  25. अध्यायः २५
  26. अध्यायः २६
  27. अध्यायः २७
  28. अध्यायः २८
  29. अध्यायः २९
  30. अध्यायः ३०
  31. अध्यायः ३१
  32. अध्यायः ३२
  33. अध्यायः ३३
  34. अध्यायः ३४
  35. अध्यायः ३५
  36. अध्यायः ३६
  37. अध्यायः ३७
  38. अध्यायः ३८
  39. अध्यायः ३९
  40. अध्यायः ४०
  41. अध्यायः ४१
  42. अध्यायः ४२
  43. अध्यायः ४३
  44. अध्यायः ४४
  45. अध्यायः ४५
  46. अध्यायः ४६
  47. अध्यायः ४७
  48. अध्यायः ४८
  49. अध्यायः ४९
  50. अध्यायः ५०
  51. अध्यायः ५१
  52. अध्यायः ५२
  53. अध्यायः ५३
  54. अध्यायः ५४
  55. अध्यायः ५५
  56. अध्यायः ५६
  57. अध्यायः ५७
  58. अध्यायः ५८
  59. अध्यायः ५९
  60. अध्यायः ६०
  61. अध्यायः ६१
  62. अध्यायः ६२
  63. अध्यायः ६३
  64. अध्यायः ६४
  65. अध्यायः ६५
  66. अध्यायः ६६
  67. अध्यायः ६७
  68. अध्यायः ६८
  69. अध्यायः ६९
  70. अध्यायः ७०
  71. अध्यायः ७१
  72. अध्यायः ७२
  73. अध्यायः ७३
  74. अध्यायः ७४
  75. अध्यायः ७५
  76. अध्यायः ७६
  77. अध्यायः ७७
  78. अध्यायः ७८
  79. अध्यायः ७९
  80. अध्यायः ८०
  81. अध्यायः ८१
  82. अध्यायः ८२
  83. अध्यायः ८३
  84. अध्यायः ८४
  85. अध्यायः ८५
  86. अध्यायः ८६
  87. अध्यायः ८७
  88. अध्यायः ८८
  89. अध्यायः ८९
  90. अध्यायः ९०
  91. अध्यायः ९१
  92. अध्यायः ९२
  93. अध्यायः ९३
  94. अध्यायः ९४
  95. अध्यायः ९५
  96. अध्यायः ९६
  97. अध्यायः ९७
  98. अध्यायः ९८
  99. अध्यायः ९९
  100. अध्यायः १००
  101. अध्यायः १०१
  102. अध्यायः १०२
  103. अध्यायः १०३
  104. अध्यायः १०४
  105. अध्यायः १०५
  106. अध्यायः १०६
  107. अध्यायः १०७
  108. अध्यायः १०८
  109. अध्यायः १०९
  110. अध्यायः ११०
  111. अध्यायः १११
  112. अध्यायः ११२
  113. अध्यायः ११३
  114. अध्यायः ११४
  115. अध्यायः ११५
  116. अध्यायः ११६
  117. अध्यायः ११७
  118. अध्यायः ११८
  119. अध्यायः ११९
  120. अध्यायः १२०
  121. अध्यायः १२१
  122. अध्यायः १२२
  123. अध्यायः १२३
  124. अध्यायः १२४
  125. अध्यायः १२५
  126. अध्यायः १२६
  127. अध्यायः १२७
  128. अध्यायः १२८
  129. अध्यायः १२९
  130. अध्यायः १३०
  131. अध्यायः १३१
  132. अध्यायः १३२
  133. अध्यायः १३३
  134. अध्यायः १३४
  135. अध्यायः १३५
  136. अध्यायः १३६
  137. अध्यायः १३७
  138. अध्यायः १३८
  139. अध्यायः १३९
  140. अध्यायः १४०
  141. अध्यायः १४१
  142. अध्यायः १४२
  143. अध्यायः १४३
  144. अध्यायः १४४
  145. अध्यायः १४५
  146. अध्यायः १४६
  147. अध्यायः १४७
  148. अध्यायः १४८
  149. अध्यायः १४९
  150. अध्यायः १५०
  151. अध्यायः १५१
  152. अध्यायः १५२
  153. अध्यायः १५३
  154. अध्यायः १५४
  155. अध्यायः १५५
  156. अध्यायः १५६
  157. अध्यायः १५७
  158. अध्यायः १५८
  159. अध्यायः १५९
  160. अध्यायः १६०
  161. अध्यायः १६१
  162. अध्यायः १६२
  163. अध्यायः १६३
  164. अध्यायः १६४
  165. अध्यायः १६५
  166. अध्यायः १६६
  167. अध्यायः १६७
  168. अध्यायः १६८
  169. अध्यायः १६९
  170. अध्यायः १७०
  171. अध्यायः १७१
  172. अध्यायः १७२
  173. अध्यायः १७३
  174. अध्यायः १७४
  175. अध्यायः १७५
  176. अध्यायः १७६
  177. अध्यायः १७७
  178. अध्यायः १७८
  179. अध्यायः १७९
  180. अध्यायः १८०
  181. अध्यायः १८१
  182. अध्यायः १८२
  183. अध्यायः १८३
  184. अध्यायः १८४
  185. अध्यायः १८५
  186. अध्यायः १८६
  187. अध्यायः १८७
  188. अध्यायः १८८
  189. अध्यायः १८९
  190. अध्यायः १९०
  191. अध्यायः १९१
  192. अध्यायः १९२
  193. अध्यायः १९३
  194. अध्यायः १९४
  195. अध्यायः १९५
  196. अध्यायः १९६
  197. अध्यायः १९७
  198. अध्यायः १९८
  199. अध्यायः १९९
  200. अध्यायः २००
  201. अध्यायः २०१
  202. अध्यायः २०२
  203. अध्यायः २०३
  204. अध्यायः २०४
  205. अध्यायः २०५
  206. अध्यायः २०६
  207. अध्यायः २०७
  208. अध्यायः २०८
  209. अध्यायः २०९
  210. अध्यायः २१०
  211. अध्यायः २११
  212. अध्यायः २१२
  213. अध्यायः २१३
  214. अध्यायः २१४
  215. अध्यायः २१५
  216. अध्यायः २१६
  217. अध्यायः २१७
  218. अध्यायः २१८
  219. अध्यायः २१९
  220. अध्यायः २२०
  221. अध्यायः २२१
  222. अध्यायः २२२
  223. अध्यायः २२३
  224. अध्यायः २२४
  225. अध्यायः २२५
  226. अध्यायः २२६
  227. अध्यायः २२७
  228. अध्यायः २२८
  229. अध्यायः २२९
  230. अध्यायः २३०
  231. अध्यायः २३१
  232. अध्यायः २३२
  233. अध्यायः २३३
  234. अध्यायः २३४
  235. अध्यायः २३५
  236. अध्यायः २३६
  237. अध्यायः २३७
  238. अध्यायः २३८
  239. अध्यायः २३९
  240. अध्यायः २४०
  241. अध्यायः २४१
  242. अध्यायः २४२
  243. अध्यायः २४३
  244. अध्यायः २४४
  245. अध्यायः २४५
  246. अध्यायः २४६
  247. अध्यायः २४७
  248. अध्यायः २४८
  249. अध्यायः २४९
  250. अध्यायः २५०
  251. अध्यायः २५१
  252. अध्यायः २५२
  253. अध्यायः २५३
  254. अध्यायः २५४
  255. अध्यायः २५५
  256. अध्यायः २५६
  257. अध्यायः २५७
  258. अध्यायः २५८
  259. अध्यायः २५९
  260. अध्यायः २६०
  261. अध्यायः २६१
  262. अध्यायः २६२
  263. अध्यायः २६३
  264. अध्यायः २६४
  265. अध्यायः २६५
  266. अध्यायः २६६
  267. अध्यायः २६७
  268. अध्यायः २६८
  269. अध्यायः २६९
  270. अध्यायः २७०
  271. अध्यायः २७१
  272. अध्यायः २७२
  273. अध्यायः २७३
  274. अध्यायः २७४
  275. अध्यायः २७५
  276. अध्यायः २७६
  277. अध्यायः २७७
  278. अध्यायः २७८
  279. अध्यायः २७९
  280. अध्यायः २८०
  281. अध्यायः २८१
  282. अध्यायः २८२
  283. अध्यायः २८३
  284. अध्यायः २८४
  285. अध्यायः २८५
  286. अध्यायः २८६
  287. अध्यायः २८७
  288. अध्यायः २८८
  289. अध्यायः २८९
  290. अध्यायः २९०
  291. अध्यायः २९१

मत्स्य-मनुसंवादवर्णनम्।

सूत उवाच।
एवमुक्तो मनुस्तेन पप्रच्छ मधुसूदनम्।
भगवन्! कियद्भिर्वर्षैर्भविष्यत्यन्तरक्षयः।। २.१ ।।

सत्वानि च कथं नाथ! रक्षिष्ये मधुसूदन!।
त्वया सह पुनर्योगः कथं वा भविता मम।। २.२ ।।

मत्स्य उवाच।
अद्य प्रभृत्यनावृष्टिर्भविष्यति महीतले।
यावद्वर्षशतं साग्रं दुर्भिक्षमशुभावहम्।। २.३ ।।

ततोऽल्पसत्वक्षयदा रश्मयः सप्तदारुणाः।
सतसतेर्भविष्यन्ति प्रतप्ताङ्गारवर्णिनः।। २.४ ।।

(१) सुषुम्ण, (२) हरिकेश, (३) विश्वकर्मा, (४) विश्वव्यचा, (५) सम्यग्वसु, (६) उदग्वलुः (७) सुराहः

और्वानलोऽपि विकृतिङ्गमिष्यति युगक्षये।
विषाग्निश्चापि पातालात् सङ्कर्षणमुखच्युतः।।
भवस्यापि ललाटोत्थ तृतीयनयनानलः।। २.५ ।।

त्रिजगन्निर्दहन् क्षोभं समेष्यति महामुने!।
एवं दग्धा मही सर्वा यदास्याद् भस्मसन्निभा।। २.६ ।।

आकाशमूष्मणा तप्तं भविष्यति परन्तप!।
ततः सदेवनक्षत्रं जगद्यास्यति संक्षयम्‌।। २.७ ।।

सम्वर्तो भीमनादश्च द्रोणश्चण्डो बलाहकः।
विद्युत्पताकः शोणस्तु सप्तैते लयवारिदाः।। २.८ ।।

अग्निप्रस्वेदसम्भूतां प्लावयिष्यन्ति मेदिनीम्।
समुद्राः क्षोभमागत्य चैकत्वेन व्यवस्थिताः।। २.९ ।।

एतदेकार्णवं सर्वं करिष्यन्ति जगत्त्रयम्।
वेदनावमिमां गृह्य सत्वबीजानि सर्वशः।। २.१० ।।

आरोप्य रज्जुयोगेन मत्‌प्रदत्तेन सुव्रत।
संयम्य नावं मच्छृङ्गे मत्प्रभावाभिरक्षितः।। २.११ ।।

एकः स्थास्यसि देवेषु दग्धेष्वपि परन्तप!।
सोमसूर्यावहं ब्रह्मा चतुर्लोक समन्वितः।। २.१२ ।।

नर्मदा च नदीपुण्या मार्कण्डेयो महान् ऋषिः।
भवो वेदाः पुराणाश्च विद्याभिः सर्वतोवृतम्।। २.१३ ।।

त्वया सार्द्धमिदं विश्वं स्थास्यत्यन्तरसंक्षये।
एवमेकार्णवे जाते चाक्षुषान्तरसंक्षये।। २.१४ ।।

वेदान् प्रवर्तयिष्यामि त्वत्सर्गादौ महीपते।
एवमुक्त्वा स भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत।। २.१५ ।।

मनुरप्यास्थितो योगं वासुदेवप्रसादजम्।
अभ्यसन् यावदाभूत संप्लवं पूर्वसूचितम्।। २.१६ ।।

काले यथोक्ते संजाते वासुदेवमुखोद्गते।
श्रृङ्गी प्रादुर्बबूवाथ मत्स्यरूपी जनार्दनः।। २.१७ ।।

भुजङ्गोरज्जुरूपेण मनोः पार्श्वमुपागमत्।
भूतान्‌ सर्वान्‌ समाकृष्य योगेनारोप्य धर्म्मवित्।। २.१८ ।।

भुजङ्गरज्वा मत्स्यस्य श्रृङ्गे नावमयोजयत्।
उपर्य्युपस्थितस्तस्याः प्रणिपत्य जनार्दनम्।। २.१९ ।।

आभूतसंप्लवे तस्मिन्नतीते योगशायिना।
पृष्टेन मनुना प्रोक्तं पुराणं मत्स्यरूपिणा।। २.२० ।।

तदिदानीं प्रवक्ष्यामि श्रृणुध्वमृषिसत्तमाः।।
यद्भवद्भिः पुरा पृष्टः सृष्ट्यादिकमहँ द्विजाः।। २.२१ ।।

मनुरुवाच।
उत्पत्ति प्रलयञ्चैव वंशान्मन्वन्तराणि च।
वंश्यानुचरितञ्चैव भुवनस्य च विस्तरम्।। २.२२ ।।

दानधर्म्मविधिञ्चैव श्राद्धकल्पञ्च शाश्वतम्।
वर्णाश्रमविभागञ्च तथेष्टापूर्त्तसंज्ञितम्।। २.२३ ।।

देवतानां प्रतिष्ठादि यच्चान्यद्विद्यते भुवि।
तत्सर्वं विस्तरेण त्वं धर्म्मव्याख्यातुमर्हसि।। २.२४ ।।

महाप्रलयकालान्त एतदासीत्तमोमयम्।
प्रसुप्तमिव चातर्क्यमप्रज्ञातमलक्षणम्।। २.२५।।

अविज्ञेयमविज्ञातं जगत् स्थास्नु चरिष्णु च।
ततः स्वयम्भूरव्यक्तः प्रभवः पुण्यकर्म्मणाम्।। २.२६ ।।

यः शरीरादभिध्याय सिसृक्षुर्विविधं जगत्।
नारायण इति ख्यातः स एकः स्वयमुद्‌बभौ।। २.२७ ।।

अथ एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत्।। २.२८ ।।

तदेवाण्डं् समभवद् हेमरूप्यमयं महत्।
संवत्सरसहस्रेण सूर्य्यायुतसमप्रभम्।। २.२९ ।।

प्रविश्यान्तर्महातेजाः स्वयमेवात्मसम्भवः।
प्रभावादपि तद्‌व्याप्त्या विष्णुत्वमगमत्पुनः।। २.३० ।।

तदन्तर्भगवानेष सूर्य्यः समभवत् पुरा।
आदित्यश्चादिभूतत्वात् ब्रह्माब्रह्मपठन्नभूत्।। २.३१ ।।

दिवं भूमिं समकरोत्तदण्डशकलद्वयम्।
सचाकरोद्दिशः सर्व्वा मध्ये व्योम च शाश्वतम्।। २.३२ ।।

जरायुर्मेरुमुख्याश्च शैलास्तस्याभवंस्तदा।
यदुल्बं तदभून्मेघस्तडित्‌सङ्घातमण्डलम्।। २.३३ ।।

नद्योऽण्डनाम्नः सम्भूताः पितरो मनवस्तथा।
सप्त येऽमी समुद्राश्च तेऽपि चान्तर्जलोद्भवाः।। २.३४ ।।

लवणेक्षुसुराद्याश्च नानारत्नसमन्विताः।। ३५ ।।

स सिसृक्षुरभूद्देवः प्रजापतिररिन्दम।
तत्तेजसश्च तत्रैष मार्तण्डःि समजायत।। २.३६ ।।

मृतेऽण्डेच जायते यस्मान्मार्तण्डस्तेन संस्मृतः।
रजोगुणमयं यत्तद्रूपं तस्य महात्मनः।। २.३७ ।।

चतुर्मुखः स भगवानभूल्लोकपितामहः।। ३८ ।।

येन सृष्टं जगत्सर्वं सदेवासुरमानुषम्।
तमवेहि रजोरूपं महत्‌ सत्वमुदाहृतम्।। २.३९ ।।

इति श्रीमत्स्यपुराणे मत्स्यमनु संवादवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः।।