मत्स्यपुराणम्/अध्यायः १५९

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अत्र गम्यताम् : सञ्चरणम्, अन्वेषणम्
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  282. अध्यायः २८२
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  289. अध्यायः २८९
  290. अध्यायः २९०
  291. अध्यायः २९१

कुमारोत्पत्तिवर्णनम् देवकृतकुमारस्तुतिश्च।

सूत उवाच।
वामं विदार्य निष्क्रान्तः सुतो देव्याः पुनः शिशुः।
स्कन्दाच्च वदने वह्नेः शुक्रात् सुवदनोऽरिहा ।। १५९.१

कृत्तिका मेलनादेव शाखाभिः सविशेषतः।
शाखाभिधाः समाख्याताः षट्षु वक्त्रेषु विस्तृताः ।। १५९.२

यतस्ततो विशाखोऽसौ ख्यातो लोकेषु षण्मुखः।
स्कन्दो विशाखः षड्वक्त्रो कार्त्तिकेयश्च विश्रुतः ।। १५९.३

चैत्रस्य बहुले पक्षे पञ्चदश्यां महाबलौ।
संभूतावर्क सदृशौ विशाले शरकानने ।। १५९.४

चैत्रस्यैव सिते पक्षे पञ्चम्यां पाकशासनः।
बालकाभ्याञ्चकारैकं मत्वा चामरभूतये ।। १५९.5

तस्यामेव ततः षष्ट्यामभिषिक्तो गुहः प्रभुः।
सर्वैरमरसङ्घातैः ब्रह्मेन्द्रोपेन्द्र भास्करैः ।। १५९.६

गन्धमाल्यैः शुभैर्धूपैस्तथा क्रीडनकैरपि।
छत्रैश्चामरजालैश्च भूषणैश्च विलेपनैः ।। १५९.७

अभ्यर्चितो विधानेन यतावत्षण्मुखः प्रभुः।
सुतामस्मै ददौ शक्रो देवसेनेति विश्रुताम् ।। १५९.८
पत्न्यर्थं देवदेवस्य ददौ विष्णुस्तदायुधान्।
यक्षाणां दशलक्षाणि ददावस्मै धनाधिपः ।। १५९.९

ददौ हुताशनस्तेजो ददौ वायुश्च वाहनम्।
ददौ क्रीडनकन्त्वष्टा कुक्कुटं कामरूपिणम्।। १५९.१०

एवं सुरास्तु ते सर्वे परिवारमनुत्तमम्।
ददुर्मुदितचेतस्काः स्कन्दायादित्यवर्चसे ।। १५९.११

जानुभ्यामवनौ स्थित्वा सुरसङ्घास्तमस्तुवन्।
स्तोत्रेणानेन वरदं षण्मुखं मुख्यशः सुराः ।। १५९.१२

देवा ऊचुः।
नमः कुमाराय महाप्रभाय स्कन्दाय च स्कन्दित दानवाय।
नवार्कविद्युद्द्युतये नमोऽस्तु नमोस्तु ते षण्मुख कामरूप !!।। १५९.१३

पिनद्धनानाभरणाय भर्त्रे नमो रणे दारुण दारुणाय।
नमोऽस्तु तेऽर्कप्रतिमप्रभाय नमोऽस्तु गुह्याय गुहाय तुभ्यम् ।। १५९.१४

नमोऽस्तु त्रैलोक्यभयापहाय नमोऽस्तु ते बालकृपापराय।
नमो विशालामल लोचनाय नमो विशाखाय महाव्रताय ।। १५९.१5

नमो नमस्तेऽस्तु मनोहराय नमो नमस्तेऽस्तु रणोत्कटाय।
नमो मयूरोज्ज्वलवाहनाय नमोऽस्तु केयूरवराय तुभ्यम् ।। १५९.१६

नमो धृतोदग्रपताकिने नमो नमः प्रभावप्रणताय तेऽस्तु।
नमो नमस्ते वरवीर्यशालिने क्रियापराणां भवभव्यमूर्तये ।। १५९.१७

क्रियापरा यज्ञपतिञ्च स्तुत्वा विरेमुरेव त्वमराधिपाद्याः।
एवं तदा षड्वदनन्तु सेन्द्रा मुदा सुतुष्टश्च गुहस्ततस्तान्।
निरीक्ष्य नेत्रैरमरैः सुरेशान् शत्रून् हनिष्यामि गतज्वराःस्थ।। १५९.१८

कुमार उवाच।
कं वः कामं प्रयच्छामि देवता! ब्रूत निर्वृताः।
यद्यप्यसाध्यं हृद्यं वो हृदये चिन्तितम्परम् ।। १५९.१९

इत्युक्तास्तु सुरास्तेन स्तुत्वा प्रणतमौलयः।
सर्व एव महात्मानं गुहं तद्गतमानसाः ।। १५९.२०

दैत्येन्द्रस्तारको नाम सर्वामर कुलान्तकृत्।
बलवान् दुर्जयो दुष्टो दुराचारोऽतिकोपनः ।। १५९.२१

तमेव जहि हृद्योऽर्थं एषोऽस्माकं भयापह!।
एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा सर्वामर पदानुगः ।। १५९.२२

जगाम जगतां नाथ स्तूयमानोऽमरेश्वरैः।
तारकस्य वधार्थाय जगतः कण्टकस्य वै ।। १५९.२३

ततश्च प्रेषयामास शक्रो लब्धसमाश्रयः।
दूतं दानवसिंहस्य परुषाक्षरवादिनम् ।। १५९.२४

स तु गत्वाब्रवीद्दैत्यं निर्भयो बीमदर्शनः।
शक्रस्त्वामाह देवेशो दैत्यकेतो! दिवस्पतिः ।। १५९.२5

तारकासुर! तच्छ्रुत्वा घट शक्त्या यथेच्छया।
यज्जगद्दलनादाप्तं किल्बिषं दानव! त्वया ।। १५९.२६

तस्याहं शासकस्तेऽद्य राजास्मि भुवनत्रये।
श्रुत्वैतद्दूतवचनं कोपसंरक्तलोचनः ।। १५९.२७

उवाच दूतं दुष्टात्मा नष्टप्रायविभूतिकः।
दृष्टं ते पौरुषं शक्र! रणेषु शतशो मया ।। १५९.२८

निस्त्रपत्वान्न ते लज्जा विद्यते शक्र! दुर्मते!।
एवमुक्ते गते दूते चिन्तयामास दानवः ।। १५९.२९

नालव्धसंश्रयः शक्रो वक्तुमेव हि चार्हति।
जितः स शक्रो नोऽकस्माज्जायते संश्रयाश्रयः ।। १५९.३०

निमित्तानि च दुष्टानि सोऽपश्यद्दुष्टचेष्टितः।
पांसुवर्षमसृक्पातं गगनादवनीतले।। १५९.३१

भुजनेत्रप्रकम्पं च वक्त्रशोषं मनोभ्रमम्।
स्वकान्ता वक्त्रपद्मानां म्लानताञ्च व्यलोकयत् ।। १५९.३२

दुष्टांश्च प्राणिनो रौद्रान् सोऽपश्यद् दुष्टवेदिनः।
तदचिन्त्वैव दितिजो न्यस्तचिन्तोऽभवत् क्षणात् ।। १५९.३३

यावद्रजघटाघण्टा रणत्काररवोत्कटाम्।
तद्वत्तुरगसङ्घात क्षुण्ण भूरेणु पिञ्जराम् ।। १५९.३४

चञ्चलस्यन्दनोदग्र ध्वजराजि विराजिताम्।
विमानैश्चाद्भुताकारे श्चलितामरचामरैः ।। १५९.३5

तां भूषणनिबद्धाञ्च किन्नरोद् गीतनादिताम्।
नानानाक तरूत्फुल्ल कुसुमापीडधारिणीम् ।। १५९.३६

विकोशास्त्रपरिष्कारां वर्म्मनिर्मलदर्शनाम्।
वन्द्युद्धुष्टस्तुतिरवां नानावाद्य निनादिताम् ।। १५९.३७

सेनां नाकसदां दैत्यः प्रासादस्थो व्यलोकयत्।
चिन्तयामास स तदा किंचिदुद्भ्रान्तमानसः ।। १५९.३८

अपूर्वः को भवेद्योद्धा यो मया न विनिर्जितः।
ततश्चिन्ताकुलो दैत्य सुश्राव कटुकाक्षरम् ।। १५९.३९

सिद्धबन्दिभिरुद्घुष्टमिदं हृदयदारणम्।
अथ गाथा।
जय अतुलशक्ति-दीघितिपिञ्जर!
भुजदण्ड -चण्डरभस! सुखद! कुमुदकानन विकासनेन्दो!
कुमार! जय दितिज-कुलमहोदधि-वडवानल! ।। १५९.४०

षण्मुख! मधुररवमयूररथ! सुरमुकुट कोटि घट्टित चरण नवाङ्कुरमहासन्!।।१५९.४१


जय विशाख! विभो! जय सकललोकतारक!।
स्कन्द! जय गौरीनन्दन! घण्टाप्रिय
प्रिय! विशाख! विभो!धृतपताकप्रकीर्णपटल!। कनकभूषणभासुर दिनकरच्छाय!। १५९.४२

जय जनितसंभ्रम लीलालूनाखिलाराते!
जय सकललोकतारक! दितिजासुरवरतारकान्तक!।
स्कन्द! जय बाल! सप्तवासर! जय भुवनावलिशोकविनाशन! ।। १५९.४३