मत्स्यपुराणम्/अध्यायः ९३

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ग्रहशान्तिवर्णनम्।

सूत उवाच।
वैशम्पायनमासीनमपृच्छच्छौनकः पुरा।
सर्वकामाप्तये नित्यं कथं शान्तिक पौष्टिकम्।। ९३.१ ।।

वैशम्पायन उवाच।
श्रीकामः शान्तिकामो वा ग्रहयज्ञं समारभेत्।
वृध्यायुः पुष्टिकामो वा तथैवाभिचरन्‌ पुनः।।
येन ब्रह्मन्! विधानेन तन्मे निगदतः श्रृणुः।। ९३.२ ।।

सर्वशास्त्राण्यनुक्रम्य संक्षिप्य ग्रन्थविस्तरम्।
ग्रहशान्तिं प्रवक्ष्यामि पुराणश्रुतिनोदिताम्।। ९३.३ ।।

पुण्येऽह्नि विप्रकथिते कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्।
ग्रहान्‌ ग्रहादिदेवांश्च स्थाप्य होमं समारभेत्।। ९३.४ ।।

ग्रहयज्ञस्त्रिधा प्रोक्तः पुराणश्रुतिकोविदैः।
प्रथमोऽयुतहोमः स्याल्लक्षहोमस्ततः परम्।। ९३.५ ।।

तृतीयः कोटिहोमस्तु सर्वकामफलप्रदः।
अयुतेनाहुतीनाञ्च नवग्रहमखः स्मृतः।। ९३.६ ।।

तस्य तावद्विधिं वक्ष्ये पुराणश्रुतिभाषितम्।
गर्तस्योत्तरपूर्वेण वितस्तिद्वयविस्तृताम्।। ९३.७ ।।

वप्रद्वयावृतां वेदिं वितस्त्युच्छ्रयसम्मिताम्।
संस्थापनाय देवानाञ्चतुरस्रामुदङ्मुखाम्।। ९३.८ ।।

अग्निप्रणयनं कृत्वा तस्यामावाहयेत्सुरान्।
देवतानां ततः स्थाप्य विंशतिर्द्वादशाधिका।। ९३.९ ।।

सूर्य्यः सोमस्तथा भौमो बुधजीवसितार्कजाः।
राहुः केतुरिति प्रोक्ता ग्रहा लोकहितावहाः।। ९३.१० ।।

मध्ये तु भास्करं विन्द्याल्लोहितं दक्षिणेन तु।
उत्तरेण गुरुं विन्द्याद्‌बुधं पूर्वोत्तरेण तु।। ९३.११ ।।

पूर्वेण भार्गवं विन्द्यात् सोमं दक्षिणपूर्वके।
पश्चिमेन शनिं विन्द्याद्राहुं पश्चिमदक्षिणे।।
पश्चिमोत्तरतः केतुं स्थापयेच्छुक्लतण्डुलैः।। ९३.१२ ।।

भास्करस्येश्वरं विन्द्यादुमाञ्चशशिनस्तथा।
स्कन्दमङ्गारकस्यापि बुधस्य च तथा हरिम्।। ९३.१३ ।।

ब्रह्माणञ्च गुरोर्विन्द्याच्छक्रस्यापि शचीपतिम्।
शनैश्चरस्य तु यमं राहोः कालं तथैव च।। ९३.१४ ।।

केतौर्वै चित्रगुप्तञ्च सर्वेषामधिदेवताः।
अग्निरापः क्षिपिर्विष्णुरिन्द्र ऐन्द्रीच देवताः।। ९३.१५ ।।

प्रजापतिश्च सर्पाश्च ब्रह्मा प्रत्यधिदेवताः।
विनायकं तथा दुर्गां वायुराकाशमेव च।
आवाहयेद्व्याहृतिभिस्तथैवाश्विकुमारकौ।। ९३.१६ ।।

संस्मरेत् रक्तकादित्यमङ्गारकसमन्वितम्।
सोमशुक्रौ तथा श्वेतौ बुधजीवौ जपिङ्गलौ।।
मन्दराहू तथा कृष्णौ धूम्रं केतुगणं विदुः।। ९३.१७ ।।

ग्रहवर्णानि देयानि वासांसि कुसुमानि च।
धूपामोदोऽत्र सरभिरुपरिष्टाद्वितानिकम्।
शोभनं स्थापयेत्प्राज्ञः फलपुष्पसमन्वितम्।। ९३.१८ ।।

गुड़ौदनं रवेर्दद्यात् सोमाय घृतपायसम्।
अङ्गारकाय संयावं बुधाय क्षीरषष्टिके।। ९३.१९ ।।

दध्योदनञ्च जीवाय शुक्राय च गुड़ौदनम्।
शनैश्चराय कृसरामजामांसञ्च राहवे।।
चित्रौदनञ्च केतुभ्यः सर्वैर्भक्ष्यैरथार्चयेत्।। ९३.२० ।।

प्रागुत्तरेण तस्माच्च दध्यक्षतविभूषितम्।
चूतपल्लवसंच्छन्नं फलवस्त्रयुगान्वितम्।। ९२.२१ ।।

पञ्चरत्नसमायुक्तं पञ्चभङ्गसमन्वितम्।
स्थापयेदव्रणं कुम्भं वरुणं तत्र विन्यसेत्।। ९२.२२ ।।

गङ्गाद्याः सरितः सर्वाः समुद्राश्च सरांसि च।
गजाश्वरथ्यावल्मीकसङ्गमाद्रतगोकुलात्।। ९२.२३ ।।

मृदमानीयविप्रेन्द्र! सर्वौषधिजलान्वितम्।
स्नानार्थं विन्यसेत् तत्र यजमानस्य धर्म्मवित्।। ९३.२४ ।।

सर्वे समुद्राः सरितः सरांसि च नदास्तथा।
आयान्तु यजमानस्य दुरितक्षयकारकाः।। ९३.२५ ।।

एवमावाहयेदेतानमरान्‌ मुनिसत्तम!।
होमं समारभेत् सर्पिर्यवव्रीहितिलादिना।।९३.२६ ।।

अर्कः पालाशखदिरावपामार्गोऽथपिप्पलः।
औदुम्बरः शमीदूर्वा कुशाश्च समिधः क्रमात्।। ९३.२७ ।।

एकैकस्याष्टकशतमष्टाविंशतिमेव वा।
होतव्या मधुसर्पिभ्यां दध्ना चैव समन्विताः।। ९३.२८ ।।

प्रादेशमात्रा अशिफा अशाखा अपलाशिनीः।
समिधः कल्पयेत्प्राज्ञः सर्वकर्म्मसु सर्वदा।। ९३.२९ ।।

देवानामपि सर्वेषामुपांशु परमार्तवित्।
स्वेन स्वेनैव मन्त्रेण होतव्याः समिधः पृथक्।। ९३.३० ।।

होतव्यं च घृताभ्युक्तं चरु भक्षादिकं पुनः।
मन्त्रैर्दशाहुतीर्हुत्वा होमं व्याहृतिभिस्ततः।। ९३.३१ ।।

उदङ्‌मुखाः प्राङ्‌मुखा वा कुर्युर्ब्राह्मणपुङ्गवाः।
मन्त्रवन्तश्च कर्त्तव्या श्चरवः प्रतिदैवतम्।। ९३.३२ ।।

हुत्वा च तांश्चरून् सम्यक् ततो हामं समाचरेत्।
आकृष्णेति च सूर्य्याय होमः कार्यो द्विजन्मना।। ९३.३३ ।।

आप्यायस्वेतिसोमाय मन्त्रेण जुहुयात् पुनः।
अग्निर्मूर्द्धादिवो मन्त्र इति भौमाय कीर्तयेत्।। ९३.३४ ।।

अग्ने! विवस्वदुषस इति सोमसुताय वै।
बृहस्पते! परिदीया रथेनेति गुरोर्मतः।। ९३.३५ ।।

शुक्रन्ते अन्यदितिच शुक्रस्यापि निगद्यते।
शनैश्चरायेति पुनः शन्नो देवीति होमयेत्।।
कयानश्चित्र आभुव इति राहोरुदाहृतः।। ९३.३६ ।।

केतुं कृण्वन्नितिब्रूयात् केतूनामपि शान्तये।
आवो राजेति रुद्रस्य बलिहोमं समाचरेत्।।
आपोहिष्ठेत्युमायास्तु स्योनेति स्वामिनस्तथा।। ९३.३७ ।।

विष्णोरिदं विष्णुरिति तमीशेति स्वयम्भुवः।
इन्द्रमिद्देवतायेति इन्द्राय जुहुयात्ततः।। ९३.३८ ।।

तथा यमस्यचायं गौरिति होमः प्रकीर्त्तितः।
कालस्य ब्रह्मयज्ञानमिति मन्त्रविदो विदुः।। ९३.४० ।।

चित्रगुप्तस्य चाज्ञातमिति मन्त्रविदो विदुः।
अग्निं दूतं वृणीमहे इति वह्नेरुदाहृतः।। ९३.४१ ।।

उदुत्तमं वरुणमित्यापां मन्त्रः प्रकीर्तितः।
भूमेः पृथिव्यन्तरिक्षमिति वेदेषु पठ्यते।। ९३.४२ ।।

सहस्रशीर्षा पुरुष इति विष्णोरुदाहृतः।
इन्द्रायेन्दो मरुत्वत इति शक्रस्य शस्यते।। ९३.४३ ।।

उत्तापर्णे सुभगे इति देव्याः समाचरेत्।
प्रजापतेः पुनर्होमः प्रजापतिरिति स्मृतः।। ९३.४४ ।।

नमोऽस्तु सर्पेभ्य इति सर्पाणां मन्त्र उच्यते।
एष ब्रह्माय ऋत्विज्य इति ब्रह्मण्युदाहृतः।। ९३.४५ ।।

विनायकस्य चानूनमिति मन्त्रो बुधैः स्मृतः।
जातवेदसे सुनवामितिदुर्गामन्त्र उच्यते।। ९३.४६ ।।

आदिप्रत्नस्य रेतस आकाशस्य उदाहृतः।
प्राणाशिशुर्महीनाञ्च वायोर्मन्त्रः प्रकीर्त्तितः।। ९३.४७ ।।

एषो उषा अपूर्व्वादित्यश्विनोर्मन्त्र उच्यते।
पूर्णाहुतिस्तु मूर्द्धानं दिव इत्यभिपातयेत्।। ९३.४८ ।।

अथाभिषेकमन्त्रेण वाद्यमङ्गलगीतकैः।
पूर्णकुम्भेन तेनैव होमान्ते प्रागुदङ्‌मुखम्।। ९३.४९ ।।

अव्यगावयवैर्ब्रह्मन्! हेमस्रग्दामभूषितैः।
यजमानस्य कर्तव्यं चतुर्भिः स्नपनं द्विजैः।। ९३.५० ।।

सुरास्त्वामभिषिञ्चन्तु ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।
वासुदेवो जगन्नाथस्तथा सङ्कर्षणो विभुः
प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च भवन्तु विजयाय ते।। ९३.५१ ।।

आखण्डलोऽग्निर्भगवान् यमो वै नैर्ऋतिस्तथा।
वरुणः पवनश्चैव धनाध्यक्षस्तथा शिवः।
ब्रह्मणा सहितः शेषो दिक्‌पालास्त्वामवन्तु ते।। ९३.५२ ।।

कीर्त्तिर्लक्ष्मीर्धृतिर्मेधा पुष्टिः श्रद्धा क्रिया मतिः।
बुद्धिर्लज्जा वपुः शान्तिस्तुष्टिकान्तिश्च मातरः।
एतास्त्वामभिषिञ्चन्तु धर्म्मपत्न्यः समागताः।। ९३.५३ ।।

आदित्यश्चन्द्रमाभौमो बुधो जीवः सितोऽर्कजः।
ग्रहास्त्वामभिषिञ्चन्तु राहुः केतुश्च तर्पिताः।। ९३.५४ ।।

देवदानवगन्धर्वाः यक्षराक्षसपन्नगाः
ऋषयो मुनयो गावो देवमातर एव च।। ९३.५५ ।।

देवपत्न्यो द्रुमानागा दैत्याश्चाप्सरसाङ्गणाः।
अस्त्राणि सर्वशस्त्राणि राजानो वाहनानि च।। ९३.५६ ।।

औषधानि च रत्नानि कालस्यावयवाश्च ये।
सरितः सागराः शैलास्तीर्थानि जलदानदाः
एते त्वामभिषिञ्चन्तु सर्वकामार्थसिद्धये।। ९३.५७ ।।

ततः शुक्लाम्बरधरः शुक्लगन्धानुलेपनः।
सर्वौषधैः सर्वगन्धैः स्नापितो द्विज़पुङ्गवैः।। ९३.५८ ।।

यजमानः सपत्नीकः ऋत्विजः सुसमाहितान्।
दक्षिणाभिः प्रयत्नेन पूजयेद्रतविस्मयः।। ९३.५९ ।।

सूर्य्याय कपिलां धेनुं शङ्खं दद्यात्तथेन्दवे।
रक्तं धुरन्धरं दद्याद्भौमाय च ककुद्मिनम्।। ९३.६० ।।

बुधाय जातरूपन्तु गुरवे पीतवाससी।
श्वेताश्वान् दैत्यगुरवे कृष्णाङ्गामर्कसूनवे।। ९३.६१ ।।

आयसं राहवे दद्यात् केतुभ्यश्छागमुत्तमम्।
सुर्वणेन समा कार्य्या यजमानेन दक्षिणा।। ९३.६२ ।।

सर्वेषामथवा गावो दातव्या हेमभूषिताः।
सुवर्णमथवादद्याद्‌गुरुर्वा येन तुष्यति।।
समन्त्रेणैव दातव्याः सर्वाः सर्वत्र दक्षिणाः।। ९३.६३ ।।

पुण्यस्त्वं शङ्खपुण्यानां मङ्गलानाञ्च मङ्गलम्।
विष्णुना विधृतश्चासि ततः शान्तिं प्रयच्छ मे।। ९३.६४ ।।

धर्म्मस्त्वं वृषरूपेण जगदानन्दकारक!।
अष्टमूर्त्तेरधिष्ठानमतः शान्तिं प्रयच्छ मे।। ९३.६५ ।।

हिरण्यगर्भगर्भस्त्वं हेमवीजं विभावसोः।
अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे।। ९३.६६ ।।

पीतवस्त्रयुगं यस्माद्वासुदेवस्य वल्लभम्।
प्रदानात्तस्य मे विष्णो! ह्यतः शान्तिं प्रयच्छ मे।। ९३.६७ ।।

विष्णुस्त्वमश्वरूपेण यस्मादमृतसम्भवः।
चन्द्रार्कवाहनो नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे।। ९३.६८ ।।

यस्मात्त्वं पृथिवी सर्वा धेनुः केशवसन्निभा।
सर्वपापहरा नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे।। ९३.६९ ।।

यस्मादायासकर्माणि तवाधीनानि सर्वदा।
लाङ्गलाद्यायुधादीनि तस्माच्छान्तिं प्रयच्छ मे।। ९३.७० ।।

यस्मात्त्वं सर्वयज्ञानामङ्गत्वेन व्यवस्थितः।
यानं विभावसोर्नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे।। ९३.७१ ।।

गवामङगेषु तिष्ठन्ति भुवनानि चतुर्दश।
यस्मात्तस्माच्छ्रियै मे स्यादिहलोके परत्र च।। ९३.७२ ।।

यस्मादशून्यं शयनं केशवस्य च सर्वदा।
शय्या ममाप्यशून्यास्तु दत्ता जन्मनि जन्मनि।। ९३.७३ ।।

यथा रत्नेषु सर्वेषु सर्वे देवाः प्रतिष्ठिताः।
तथा रत्नानि यच्छन्तु रत्नदानेन मे सुराः।। ९३.७४ ।।

यथा भूमिप्रदानस्य कलान्नार्हन्ति षोड़शीम्।
दानान्यन्यानि मे शान्तिर्भूमिदानाद्भवत्विह।। ९३.७५ ।।

एवं संपूजयेद्भक्त्या वित्तशाठ्येन वर्जितः।
रक्तकाञ्चनवस्त्रौघैर्धूपमाल्यानुलेपनैः।। ९३.७६ ।।

अनेन विधिना यस्तु ग्रहपूजां समाचरेत्।
सर्वान्कामानवाप्नोति प्रेत्य स्वर्गे महीयते।। ९३.७७ ।।

यस्तु पीड़ाकरो नित्यमल्पवित्तस्य वा ग्रहः।
तञ्च यत्नेन संपूज्य शेषानप्यर्चयेद् बुधः।। ९३.७८ ।।

ग्रहा गावो नरेन्द्राश्च ब्राह्मणाश्च विशेषतः।
पूजिताः पूजयन्त्येते निर्दहन्त्यवमानिताः।। ९३.७९ ।।

यथा बाणप्रहाराणां कवचम्भवति वारणम्।
तद्वद्दैवोपघातानां शान्तिर्भवति वारणम्।। ९३.८० ।।

तस्मान्नदक्षिणाहीनं कर्त्तव्यं भूतिमिच्छता।
संपूर्णया दक्षिणया यस्माद् एकोऽपि तुष्यति।। ९३.८१ ।।

सदैवायुतहोमोऽयं नवग्रहमखे स्थितः ।
विवाहोत्सवयज्ञेषु प्रतिष्ठादिषु कर्म्मसु।। ९३.८२ ।।

निर्विघ्नार्थं मुनिश्रेष्ठ! तथोद्वेगाद्भुतेषु च।
कथितोऽयुतहोमोऽयं लक्षहोममतः श्रृणु।। ९३.८३ ।।

सर्वकामाप्तये यस्माल्लक्षहोमं विदुर्बुधाः।
पितॄणां वल्लभं साक्षाद्भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्।। ९३.८४ ।।

ग्रहताराबलं लब्ध्वा कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्।
गृहस्योत्तरपूर्वेण मण्डपं कारयेद् बुधः।। ९३.८५ ।।

रुद्रायतनभूमौ वा चतुरस्रमुद्ङ्‌मुखम्।
दशहस्तमथाष्टौ वा हस्तान्कुर्याद्विधानतः।। ९३.८६ ।।

प्रागुदक् प्लवनाम्भूमिं कारयेद्यत्नतो बुधः।
प्रागुत्तरं समासाद्य प्रदेशं मण्डपस्य तु।। ९३.८७ ।।

शोभनं कारयेत्कुण्डं यथावल्लक्षणान्वितम्।
चतुरस्रं समन्तात्तु योनिवक्त्रं समेखलम्।। ९४.८८ ।।

चतुरङ्गुलविस्तारा मेखला तद्वदुच्छ्रिता।
प्रागुदक्‌प्लवना कार्या सर्वतः समवस्थिता।। ९३.८९ ।।

शान्त्यर्थं सर्वलोकानां नवग्रहमखः स्मृतः।
मानहीनाधिकं कुण्डमनेकभयदभ्भवेत्।।
यस्मात्तस्मात् सुसम्पूर्णं शान्तिकुण्डं विधीयते।। ९३.९० ।।

अस्माद्दशगुणः प्रोक्तो लक्षहोमः स्वयम्भुवा।
आहुतीभिः प्रयत्नेन दक्षिणाभिस्तथैव च।। ९३.९१ ।।

द्विहस्तविस्तृतं तद्वच्चतुर्हस्तायतं पुनः।
लक्षहोमे भवेत्कुण्डं योनिवक्त्रन्त्रिमेखलम् ।। ९३.९२ ।।

तस्य चोत्तरपूर्वेण वितस्तित्रयसंस्थितम्।
प्रागुदक् प्रवणन्तच्च चतुरस्रं समन्ततः।। ९३.९३ ।।

विष्कम्भार्द्धोच्छ्रितं प्रोक्तं स्थण्डिलं विश्वकर्म्मणा।
संस्थापनाय देवानां वप्रत्रयसमावृतम्।। ९३.९४ ।।

द्व्यङ्गुलोह्यच्छ्रितो विप्रः प्रथमः स उदाहृतः।
अङ्गुलोच्छ्रयसंयुक्तं वप्रद्वयमथोपरिः।। ९३.९५ ।।

त्र्यङ्गुलस्य च विस्तारः सर्वेषां कथ्यते बुधैः।
दशाङ्गुलोच्छ्रिता भित्तिः स्थण्डिले स्यात्तथोपरि।
तस्मिन्नावाहयेद्देवान् पूर्ववत् पुष्पतण्डलैः।। ९४.९६ ।।

आदित्याभिमुखाः सर्वाः साधिप्रत्यधिदेवताः।
स्थापनीया मुनिश्रेष्ठ! नोत्तरेणपराङ्मुखाः।। ९४.९७ ।।

गरुत्मानधिकस्तत्र संपूज्यः श्रियमिच्छता।
सामध्वनिशरीरत्वं वाहनं परमेष्ठिनः।। ९४.९८ ।।

अस्माद्दशगुणः प्रोक्तो लक्षहोमः स्वयम्भुवा।
आहुतीभिः प्रयत्नेन दक्षिणाभिस्तथैव च।। ९३.९९ ।।

गरुत्मानधिकस्तत्र संपूज्यः श्रियमिच्छता।
सामध्वनिशरीरत्वं वाहनं परमेष्ठिनः।।
विषपापहरो नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे।। ९३.१०० ।।

पूर्ववत्कुम्भमामन्त्र्य तद्वद्धोमं समाचरेत्।
सहस्राणां शतं हुत्वा समित्संख्याधिकं पुनः।
घृतकुम्भवसोर्धारां पातयेदनलोपरि।। ९३.१०१ ।।

औदुम्बरीं तथार्द्राञ्च ऋज्वीं कोटरवर्जिताम्।
बाहुमात्रां स्नुचं कृत्वा ततस्तम्भद्वयोपरि
घृतधारान्तया सम्यगग्नेरुपरि पातयेत्।। ९३.१०२ ।।

श्रावयेत् सूक्तमाग्नेयं वैष्णवं रोद्रमैन्दवम्।
महावैश्वानरं साम ज्येष्ठसाम च वाचयेत्।। ९३.१०३ ।।

स्नानञ्च यजमानस्य पूर्ववत् स्वस्तिवाचनम्।
दातव्या यजमानेन पूर्ववद्दक्षिणाः पृथक्।। ९३.१०४ ।।

कामक्रोधविहीनेन ऋत्विग्भ्यः शान्तचेतसा।
नवग्रहमखे विप्राश्चत्वारो वेदवेदिनः।। ९३.१०५ ।।

अथवा ऋत्विजौ शान्तौ द्वावेव श्रुतिकोविदौ।
कार्यावयुतहोमे तु न प्रसज्जेत विस्तरे।। ९३.१०६ ।।

तद्वच्च दश चाष्टौ च लक्षहोमे तु ऋत्विजः।
कर्त्तव्याः शक्तितस्तद्वच्चतुरो वा विमत्सरः।। ९३.१०७ ।।

नवग्रहमखात् सर्वं लक्षहोमे दशोत्तरम्।
भक्ष्यान् दद्यान्मुनिश्रेष्ठ! भूषणान्यपिशक्तितः।। ९३.१०८ ।।

शयनानि सवस्त्राणि हेमानिकटकानिच।
कर्णाङ्गलिपवित्राणि कण्ठसूत्राणिशक्तिमान्।। ९३.१०९ ।।

न कुर्याद्दक्षिणाहीनं वित्तशाठ्येन मानवः।
अददन् लोभतो मोहात्कुलक्षयमवाप्नुते।। ९३.११० ।।

अन्नदानं यथाशक्त्या कर्त्तव्यं भूतिमिच्छता।
अन्नहीनः कृतो यस्माद्दुर्भिक्षफलदोभवेत्।। ९३.१११ ।।

अन्नहीनो दहेद्राष्ट्रं मन्त्रहीनस्तु ऋत्वजः।
यष्टारं दक्षिणाहीनं नास्ति यज्ञसमो रिपुः।। ९३.११२ ।।

नवाप्यल्पधनः कुर्याल्लक्षहोमं नरः क्वचित्।
यस्मात्पीड़ाकरोनित्यं यज्ञे भवति विग्रहः।। ९३.११३ ।।

तमेव पूजयेद्भक्त्या द्वौ वा त्रीन्‌वा यथाविधि।
एकमप्यर्चयेद्भक्त्या ब्राह्मणं वेदपारगम्।।
दक्षिणाभिः प्रयत्नेन न बहूनल्पवित्तवान्।। ९३.११४ ।।

पूज्यते शिवलोके च वस्वादित्यमरुद्गणैः।
यावत्कल्पशतान्यष्टावथ मोक्षमवाप्नुयात्।। ९३.११५ ।।

सकामोयस्त्विमं कुर्याल्लक्षहोमं यथाविधि।
स तं काममवाप्नोति पदमानन्त्यमश्नुते।। ९३.११६ ।।

पुत्रार्थीं लभते पुत्रान्‌धनार्थीलभतेधनम्।
भार्यार्थी शोभनांभार्य्यां कुमारीचशुभंपतिम्।। ९३.११७ ।।

भ्रष्टराज्यस्तथा राज्यंश्रीकामः श्रियमाप्नुयात्।
यं यं प्रार्थयतेकामं सवैभवतिपुष्कलः।
निष्कामः कुरुते यस्तु स परं ब्रह्म गच्छति।। ९३.११८ ।।

अस्माच्छतगुणः प्रोक्तः कोटिहोमः स्वयम्भुवा।
आहुतीभिः प्रयत्नेनदक्षिणाभिः फलेनच।।९३.११९ ।।

पूर्ववद् ग्रहदेवानामावाहनविसर्जने।
होममन्त्रास्त एवोक्ताः स्नाने दाने तथैव च।।
कुण्डमण्डपवेदीनां विशेषोऽयं निबोध मे।। ९३.१२० ।।

कोटिहोमे चतुर्हस्तं चतुरस्रन्तु सर्वतः।
योनिवक्त्रद्वयोपेतं तदप्याहुस्त्रिमेखलम्।। ९३.१२१ ।।

द्वयङ्गुलाभ्युच्छ्रिताकार्याप्रथमामेखलाबुधैः।
त्र्यङ्गुलाभ्युच्छ्रितातद्वद्‌द्वितीयापरिकीर्त्तिता।। ९३.१२२ ।।

उच्छ्रायविस्तराभ्यां च तृतीया चतुरङ्गुला।
द्व्‌यङ्गुलश्चेति विस्तारः पूर्वयोरेव शस्यते।। ९३.१२३ ।।

वितस्तिमात्रां योनिः स्यात्षट्‌सप्तांगुलविस्तृता ।
ता कूर्मपृष्टोन्नता मध्ये पार्श्वयोश्चांगुलोच्छ्रिता।। ९३.१२४ ।।

गजोष्ठसद्रृशी तद्वदायताच्छिद्रसंयुता।
एतत् सर्वेषु कुण्डेषु योनिलक्षणमुच्यते।। ९३.१२५ ।।

मेखलोपरि सर्वत्र अश्वत्थदलसन्निभम्।
वेदी च कोटिहोमे स्याद्वितस्तीनां चतुष्टयम्।। ९३.१२६ ।।

चतुरस्ना समन्ताच्च त्रिभिर्वप्रैस्तुसंयुता।
वप्रप्रमाणं पूर्वोक्तं वेदीनाञ्च तथोच्छ्रयः।। ९३.१२७ ।।

तथा षोड़शहस्तः स्यान्मण्डपश्च चतुर्मुखः।
पूर्वद्वारे च संस्थाप्य बह्वृचंवेदपारगम्।। ९३.१२८ ।।

यजुर्विदं तथा याम्ये पश्चिमे सामवेदिनम्।
अथर्ववेदिनं तद्वदुत्तरे स्थापयेद् बुधः।। ९३.१२९ ।।

अष्टौ तु होमकाः कार्या वेदवेदाङ्गवेदिनः।
एवं द्वादश विप्राः स्युर्वस्त्रमाल्यानुलेपनैः।।
पूर्ववत् पूजयेद्भक्त्या वस्त्राभरणभूषणैः।। ९३.१३० ।।

रात्रिसूक्तं च रौद्रञ्च पावमानं सुमङ्गलम्।
पर्वतो बह्वृचः शान्तिं पठन्नास्तेह्युदङ्‌मुखः।। ९३.१३१ ।।

शान्तं शाक्रञ्च सौम्यञ्च कौष्माण्डं शान्तिमेव च।
पाठयेद्दक्षिणद्वारियजुर्वेदिनमुत्तमम्।। ९३.१३२ ।।

सुपर्णमथ वैराजमाग्नेयं रुद्रसंहिताम्।
ज्येष्ठसाम तथा शान्तिं छन्दोगः पश्चिमे जपेत्।। ९३.१३३ ।।

शाग्तिं सूक्तञ्च सौरञ्च तथाशाकुनकं शुभम्।
पौष्टिकञ्च महाराज्यमुत्तरेणाप्यथर्ववित्।। ९३.१३४ ।।

पञ्चभिः सप्तभिर्वापिहोमः कार्योऽत्रपूर्ववत्।
स्नाने दाने च मन्त्राः स्युस्तएवमुनिसत्तम!।। ९३.१३५ ।।

वसोर्धाराविधानञ्च लक्षहोमे विशिष्यते।
अनेन विधिना यस्तु कोटिहोमं समाचरेत्।।
सर्वान् कामानवाप्नोति ततो विष्णुपदं व्रजेत्।। ९३.१३६ ।।

यः पठेच्छृणुयाद्वापि ग्रहयज्ञत्रयं नरः।
सर्वपापविशुद्धात्मा पदमिन्द्रस्य गच्छति।। ९३.१३७ ।।

अश्वमेधसहस्राणि दशचाष्टौच धर्म्मवित्।
कृत्वा यत्फलमाप्नोति कोटिहोमात्तदश्नुते।। ९३.१३८ ।।

ब्रह्महत्यासहस्राणि भ्रूणहत्यार्बुदानि च।
कोटिहोमेन नश्यन्ति यथावच्छिवभाषितम्।। ९३.१३९ ।।

वश्यकर्माभिचारादि तथैवोच्चाटनादिकम्।
नवग्रहमखं कृत्वा ततः काम्यं समाचरेत्।। ९३.१४० ।।

अन्यथा फलदं पुंसां न काम्यं जायते क्वचित्।
तस्मादयुतहोमस्य विधानं पूर्वमाचरेत्।। ९३.१४१ ।।

वृत्त वोच्चाटने कुण्डं तथा च वशकर्म्मणि।
त्रिमेखलञ्चैकवक्त्रमरत्निर्विस्तरेण तु।। ९३.१४२ ।।

पलाशसमिधः शस्ता मधुगोरोचनान्विताः।
चन्दनागुरुणा तद्वत् कुङ्कुमेनाभिषिञ्चिताः।। ९३.१४३ ।।

होमयेन्मधुसर्पिभ्यां बिल्वानि कमलानि च।
सहस्राणि दशैवोक्तं सर्वदैव स्वयम्भुवा।। ९३.१४४ ।।

वश्यकर्मणि बिल्वानां पद्मानां चैव धर्मवित्।
सुमित्रियान आप औषधय इतिहोमयेत्।। ९३.१४५ ।।

न चात्र स्थापनंकार्यं नचकुम्भाभिषेचनम्।
स्नानं सर्वौषधैः कृत्वाशुक्लपुष्पाम्बरोगृही।। ९३.१४६ ।।

कण्ठसूत्रैः सकनकैः विप्रान् समभिपूजयेत्।
सूक्ष्मवस्त्राणि देयानि शुक्लागावः सकाञ्चनाः।। ९३.१४७ ।।

अवश्मनि वशीकुर्यान् सर्वशत्रुबलान्यपि।
अमित्राण्यपिमित्राणिहोमोऽयं पापनाशनः।। ९३.१४८ ।।

विद्वेषणेऽभिचारे च त्रिकोणं कुण्डमिष्यते।
द्विमेखलं कोणमुखं हस्तमात्रञ्च सर्वशः।। ९३.१४९ ।।

होमंकुर्युस्ततोविप्रा रक्तमाल्यानुलेपनाः।
निवीतलोहितोष्णीषा लोहिताम्बरधारिणः।। ९३.१५० ।।

नववायसरक्ताढ्यपात्रत्रयसमन्विताः।
समिधो वामहस्तेन श्येनास्थिबलसंयुताः।
होतव्या मुक्तकेशैस्तु ध्यायद्भिरशिवं रिपौ।। ९३.१५१ ।।

दुर्भित्रियास्तस्मैसन्तु तथा हुम्फडितीतिच।
श्येनाभिचारमन्त्रेणक्षुरं समभिमन्त्र्य च।। ९३.१५२ ।।

प्रतिरूपं रिपोः कृत्वा क्षूरेण परिकर्तयेत्।
रिपुरूपस्य शकलान्यथैवाग्नौ विनिक्षिपेत्।। ९३.१५३ ।।

ग्रहयज्ञविधानान्ते सदैवाभिचरन् पुनः।
विद्वेषणं तथा कुर्वन्नेतदेव समाचरेत्।। ९३.१५४ ।।

इहैव फलदं पुंसामेतन्नामुत्र शोभनम्।
तस्माच्छान्तिकमेवात्र कर्त्तव्यं भूतिमिच्छता।। ९३.१५५ ।।

ग्रहयज्ञत्रयं कुर्य्याद्यस्त्वकाम्येनमानवः।
सविष्णोः पदमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभम्।। ९३.१५६ ।।

य इदं श्रृणुयान्नित्यं श्रावयेद्वापि मानवः।
न तस्य ग्रहपीडा स्यान्नच बन्धुजनक्षयः।। ९३.१५७ ।।

ग्रहयज्ञत्रयं गेहे लिखितं तत्र तिष्ठति।
न पीडा तत्र बालानां न रोगो न च बन्धनम्।। ९३.१५८ ।।

अशेषयज्ञफलदं निः शेषाघविनाशनम्।
कोटिहोमं विदुः प्राज्ञा भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्।। ९३.१५९ ।।

अश्वमेधफलं प्राहुर्लक्षहोमं सुरोत्तमाः।
द्वादशाहमखस्तद्वन्नवग्रहमखः स्मृतः।। ९३.१६० ।।

इति कथितमिदानीमुत्सवानन्दहेतोः सकलकलुषहारी देवयज्ञाभिषेकः।
परिपठति य इत्थं यः श्रृणोति प्रसङ्गादभिभवति स शत्रूनायुरारोग्ययुक्तः।। ९३.१६१ ।।