मत्स्यपुराणम्/अध्यायः १३३

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अत्र गम्यताम् : सञ्चरणम्, अन्वेषणम्
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देवेभ्यो महादेवस्य वरदानम्।
सूत उवाच।
ब्रह्माद्यैस्तूयमानस्तु देर्वैर्देवो महेश्वरः।
प्रजापतिमुवाचेदं देवानां क्व भयं महत्।। १३३.१।।

भो! देवः! स्वागतं वोऽस्तु ब्रूत यद्वो मनोगतम्।
तावदेव प्रयच्छामि नास्त्यदेयं मया हि वः।। १३३.२ ।।

युष्माकं नितरां शं वै कर्ताऽहं विबुधर्षभाः।
चरामि महदत्युग्रं यच्चापि परमं तपः।। १३२.३ ।।

विद्विष्टा वो मम द्विष्टाः कष्टाः कष्टपराक्रमाः।
तेषामभावः सम्पाद्यो युस्माकं भव एव च।। १३३.४ ।।

एवमुक्तास्तु देवेन प्रेम्णा सब्रह्मकाः सुराः।
रुद्रमाहुर्महाभागं भागार्हाः सर्व एव ते।। १३३.५ ।।

भगवंस्तैस्तपस्तप्तं रौद्रं रौद्रपराक्रमैः।
असुरैर्वध्यमानाः स्म वयं त्वां शरणं गताः।। १३३.६ ।।

मयो नाम दितेः पुत्रस्त्रिनेत्रकलहप्रियः।
त्रिपुरं येन तद्दुर्गं कृतं पाण्डुरगोपुरम्।। १३३.७ ।।

तदाश्रित्य पुरं दुर्गं दानवा वरनिर्भयाः।
बाधन्तेऽस्मान् महादेव प्रेष्यमस्वामिनं यथा।। १३३.८ ।।

उद्यानानि च भग्नानि नन्दनादीनि यानि च।
वराश्चाप्सरसः सर्वा रम्भाद्या दनुजैर्हृताः।। १३३.९ ।।

इन्द्रस्य बाह्याश्च गजाः कुमुदाञ्जनवामनाः।
ऐरावताद्यापहृता देवतानां महेश्वर!।। १३३.१० ।।

ये चेन्द्ररथमुख्याश्च हरयोऽपहृतासुरैः।
जाताश्च दानवानान्ते रथयोग्यास्तुरङ्गमाः।। १३३.११ ।।

ये रथा ये गजाश्चैव याः स्त्रियो वसु यच्च न।
तन्नो व्यपहृतं दैत्यैः संशयो जीविते पुनः।। १३३.१२ ।।

त्रिनेत्र एव मुक्तस्तु देवैः शक्रपुरोगमैः।
उवाच देवान् देवेशो वरदो वृषवाहनः।। १३३.१३ ।।

व्यपगच्छतु वो देवा महद्दानवजम्भयम्।
तदहं त्रिपुरन्धक्ष्ये क्रियतां यद्ब्रवीमि तत्।। १३३.१४ ।।

यदीच्छथ मया दग्धुं तत्पुरं सह दानवम्।
रथमौपयिकं मह्यं सज्जयध्वं किलास्यते।। १३३.१५ ।।

दिग्वाससा तथोक्तास्ते सपितामहकाः सुराः।
तथेत्युक्त्वा महादेवञ्चक्रुस्ते रथमुत्तमम्।। १३३.१६ ।।

धरां कूवरकौ तु द्वौ रुद्रपार्श्वचरावुभौ।
अधिष्ठानं शिरो मेरो रक्षो मन्दर एव च।। १३३.१७ ।।

चक्रुश्चन्द्रञ्च सूर्य्यञ्च चक्रे काञ्चनराजते।
कृष्णपक्षं शुक्लपक्षं पक्षद्वयमपीश्वराः।। १३३.१८ ।।

रथनेमिद्वयं चक्रुर्देवा ब्रह्मपुरः सराः।
आदिद्वयं पक्षयन्त्रं यन्त्रमेताश्च देवताः।। १३३.१९ ।।

कम्बलाश्वतराभ्याञ्च नागाभ्यां समवेष्टितम्।
भार्गवश्चाङ्गिराश्चैव बुधोऽङ्गारक एव च।। १३३.२० ।।

शनैश्चरस्तथा चात्र सर्वे ते देवसत्तमाः।
वरूथं गगनं चक्रुश्चारुरूपं रथस्य ते।। १३३.२१ ।।

कृतं द्विजिह्वनयनं त्रिवेणुं शातकौम्भिकम्।
मणिमुक्तेन्द्रनीलैश्च वृतं हृष्टमुखैः सुरैः।। १३३.२२ ।।

गङ्गा सिन्धुः शतद्रुश्च चन्द्रभागा सरस्वती।
वितस्ता च विपाशा च यमुना गण्डकी तथा।। १३३.२३ ।।

सरस्वती देविका च तथा च सरयूरपि।
एताः सरिद्वराः सर्वा वेणुसंज्ञाः कृता रथे।। १३३.२४ ।।

धृतराष्ट्रश्च ये नागास्ते च वेश्यात्मकाः कृताः।
वासुके कुलजा ये च ये च रैवतवंशजाः।। १३३.२५ ।।

ते सर्पा दर्पसम्पूर्णाश्चापतूणेष्वनूनगाः।
अवतस्थुः शरा भूत्वा नानाजातिशुभाननाः।। १३३.२६ ।।

सुरसा सरमा कद्रुर्विनता शुचिरेव च।
तृषा बुभुक्षा सर्वोग्रा मृत्युः सर्वशमस्तथा।। १३३.२७ ।।

ब्रह्मवध्या च गोवध्या बालवध्याः प्रजाभयाः।
गदा भूत्वा शक्तयश्च तदा देवरथेऽभ्ययुः।। १३३.२८ ।।

युगं कृतयुगञ्चात्र चातुर्होत्रप्रयोजकाः।
चतुर्वर्णाः सलीलाश्च बभूवुः स्वर्णकुण्डलाः।। १३३.२९ ।।

तद्युगं युगसङ्काशं रथशीर्षे प्रतिष्ठितम्।
धृतराष्ट्रेण नागेन बद्धं बलवता महत्।। १३३.३० ।।

ऋग्वेदः सामवेदश्च यजुर्वेदस्तथापरः।
वेदाश्चत्वार एवैते चत्वारस्तुरगा भवन्।। १३३.३१ ।।

अन्नदानपुरोगाणि यानि दानानि कानिचित्।
तान्यासन्वाजिनां तेषां भूषणानि सहस्रशः ।। १३३.३२ ।।

पद्मद्वयं तक्षकश्च कर्कोटकधनञ्जयौ।
नागा बभूवुरेवैते हयानां बालबन्धनाः।। १३३.३३ ।।

ओङ्कारप्रभवास्ता वा मन्त्रयज्ञक्रतुक्रियाः।
उपद्रवाः प्रतीकाराः पशुबन्धेष्टयस्तथा।। १३३.३४ ।।

यज्ञोपवाहान्येतानि तस्मिन् लोकरथे शुभे।
मणिमुक्ताप्रवालैस्तु भूषितानि सहस्रशः।। १३३.३५ ।।

प्रतोदोङ्कार एवासीत्तदग्रञ्च वषट्कृतम्।
सिनीवाली कुहूराका तथा चानुमती शुभा।। १३३.३६ ।।

योक्त्राण्यासंस्तुरङ्गाणामपसर्पणविग्रहाः।। १३३.३७ ।।

कृष्णान्यथ च पीतानि श्वेतमाञ्जिष्ठकानि च।
अवदाताः पताकास्तु बभूवुः पवनेरिताः।। १३३.३८ ।।

ऋतुभिश्च कृतः षड्भिर्धनुः सम्वत्सरोऽभवत्।
अजराज्याभवच्चापि साम्बका धनुषो द्रृढ़ा ।। १३३.३९ ।।

कालो हि भगवान् रुद्रः तं च सम्वतसरं विदुः।
तस्मादुमाकालरात्रिर्दनुषोज्या जराभवत्।। १३३.४० ।।

सगर्भं त्रिपुरं येन दग्धवान् स त्रिलोचनः।
स इषुर्विष्णुसोमाग्नित्रिदैवतमयोऽभवत्।। १३३.४१ ।।

आननं ह्यग्निरभवच्छल्यं सोमस्तमोनुदः।
तेजसः समवायोऽथ चेषोस्तेजो रथाङ्गधृत्।। १३३.४२ ।।

तस्मिंश्च वीर्य्यवृद्ध्यर्थं वासुकिर्नागपार्थिवः।
तेजः सम्वसनार्थं वै मुमोचातिविषो विषम्।। १३३.४३ ।।

कृत्वा देवा रथञ्चापि दिव्यं दिव्यप्रभावतः।
लोकाधिपतिमभ्येत्य इदं वचनमब्रुवन्।। १३३.४४ ।।

संस्कृतोऽयं रथोऽस्माभिस्तव दानवशत्रुजित्।
इदमापत्परित्राणं देवान् सेन्द्रपुरोगमान्।। १३३.४५ ।।

तं मेरुशिखराकारं त्रेलोक्यरथमुत्तमम्।
प्रशस्य देवान् साध्विति रथं पश्यति शङ्करः।। १३३.४६ ।।

मुहुर्द्रृष्ट्वा रथं साधु साध्वित्युक्त्वा मुहुर्मुहुः।
उवाच सेन्द्रानमरानमराधिपतिः स्वयम्।। १३३.४७ ।।

याद्रृशोऽयं रथः क्लृप्तो युष्माभिर्ममसत्तमाः।
ईद्रृशो रथसम्पत्त्या यन्ता शीघ्रं विधीयताम्।। १३३.४८ ।।


इत्युक्त्वा देवदेवेन देवाविद्धा इवेषुभिः।
अवापुर्महतीं चिन्तां कथं कार्यमिति ब्रुवन्।। १३३.४९ ।।

महादेवस्य देवोऽन्यः को नाम सद्रशौ भवेत्।
मुक्त्वा चक्रायुधं देवं सोपास्य इषुमाश्रितः।। १३३.५० ।।

धुरि युक्ता इवोक्षाणो घटन्त इव पर्वतैः।
निःश्वसन्तः सुराः सर्वे कथमेतदिति ब्रुवन्।। १३३.५१ ।।

देवोऽद्रृश्यत देवांस्तु लोकनाथस्य धूर्गतान्।
अहं सारथिरित्युक्त्वा जग्राहाश्वांस्ततोऽग्रजः।। १३३.५२ ।।

ततो देवैः सगन्धर्वैः सिंहनादो महान् कृतः।
प्रतोदहस्तं संप्रेक्ष्य ब्रह्माणं सूततां गतम्।। १३३.५३ ।।

भगवानपि विश्वेशो रथस्थे वै पितामहे।
सद्रृशः सूत इत्युक्त्वा चारुरोह रथं हरः।। १३३.५४ ।।

आरोहति रथं देवे ह्यश्वा हरभरातुराः।
जानुभिः पतिता भूमौ रजोग्रासश्च ग्रासितः।। १३३.५५ ।।

देवो द्रृष्ट्वाथ वेदांस्तानभीरुग्रहयान् भयात्।
उज्जहार पितॄनार्तान् सुपुत्र इव दुःखितान्।। १३३.५६ ।।

ततः सिंहरवो भूयो बभूव रथभैरवः।
जयशब्दश्च देवानां संबभूवार्णवोपमः।। १३३.५७ ।।

तदोङ्कारमयं गृह्य प्रतोदं वरदः प्रभुः।
स्वयम्भूः प्रययौ वाहाननुमन्त्र्य यथाजवम्।। १३३.५८ ।।

ग्रसमाना इवाकाशं मुष्णन्त इव मेदिनीम्।
मुखेभ्यः ससृजुः श्वासानुच्छ्वसन्त इवोरगाः।। १३३.५९ ।।

स्वयम्भुवा चोद्यमानाश्चोदितेन कपर्दिना।
व्रजन्ति तेऽश्वा जवनाः क्षयकाल इवानिलाः।। १३३.६० ।।

ध्वजोच्छ्रयविनिर्माणे ध्वजयष्टिमनुत्तमाम्।
आक्रम्य नन्दीवृषभं तस्थौ तस्मिञ्शिवेच्छया।। १३३.६१ ।।

भार्गवाङ्गिरसौ देवौ दण्डहस्तौ रविप्रभौ।
रथचक्रे तु रक्षेते रुद्रस्य प्रियकाङिक्षणौ।। १३३.६२ ।।

शेषश्च भगवान्नागः अनन्तोऽन्तकरोऽपिणाम्।
शरहस्तो रथम्पाति शयनं ब्रह्मणस्तदा।। १३३.६३ ।।

यमस्तूर्णसमास्थाय महिषञ्चातिदारुणम्।
द्रविणाधिपतिर्व्यालं सुराणामधिपो द्विपम्।। १३३.६४ ।।

अरक्षत मयूरं निकूजन्तं किन्नरं यथा।
गुह आस्थाय वरदो युगोपमरथं पितुः।। १३३.६५ ।।

नन्दीश्वरश्च भगवान् शूलमादाय दीप्तिमान्।
पृष्ठतश्चापि पार्श्वाभ्यां लोकस्य क्षयकृद्यथा।। १३३.६६ ।।

प्रमथाश्चाग्निवर्णाभाः साग्निज्वाला इवाचलाः।
अनुजग्मू रथं शार्वं नक्रा इव महार्णवम्।। १३३.६७ ।।

भृगुर्भरद्वाजवसिष्ठगौतमाः क्रतुः पुलस्त्यः पुलहस्तपोधनाः।
मरीचिरत्रिर्भगवानथाङ्गिराः पराशरागस्त्यमुखा महर्षयः।। १३३.६८ ।।

हरमजितमजं प्रतुष्टुवुर्वचनविषैर्विचित्रभूषणैः।
रथस्त्रिपुरे सकाञ्चनाचलो व्रजतिसपक्ष इवाद्रिरम्बरे।। १३३.६९ ।।

करिगिरिरविमेघसन्निभाः सजलपयोदनिनादनादिनः।
प्रमथगणाः परिवार्य्य देवगुप्तं रथममरापि ययुः स्म दर्पयुक्ताः।। १३३.७० ।।

मकरतिमितिमिङ्गिलावृतः प्रलय इवातिसमुद्धतोऽर्णवः।
व्रजति रथवरोऽति भास्वरो ह्यशनिनिपातपयोद-निःस्वनः।। १३३.७१ ।।