मत्स्यपुराणम्/अध्यायः १५५

विकिस्रोतः तः
अत्र गम्यताम् : सञ्चरणम्, अन्वेषणम्
  1. अध्यायः १
  2. अध्यायः २
  3. अध्यायः ३
  4. अध्यायः ४
  5. अध्यायः ५
  6. अध्यायः ६
  7. अध्यायः ७
  8. अध्यायः ८
  9. अध्यायः ९
  10. अध्यायः १०
  11. अध्यायः ११
  12. अध्यायः १२
  13. अध्यायः १३
  14. अध्यायः १४
  15. अध्यायः १५
  16. अध्यायः १६
  17. अध्यायः १७
  18. अध्यायः १८
  19. अध्यायः १९
  20. अध्यायः २०
  21. अध्यायः २१
  22. अध्यायः २२
  23. अध्यायः २३
  24. अध्यायः २४
  25. अध्यायः २५
  26. अध्यायः २६
  27. अध्यायः २७
  28. अध्यायः २८
  29. अध्यायः २९
  30. अध्यायः ३०
  31. अध्यायः ३१
  32. अध्यायः ३२
  33. अध्यायः ३३
  34. अध्यायः ३४
  35. अध्यायः ३५
  36. अध्यायः ३६
  37. अध्यायः ३७
  38. अध्यायः ३८
  39. अध्यायः ३९
  40. अध्यायः ४०
  41. अध्यायः ४१
  42. अध्यायः ४२
  43. अध्यायः ४३
  44. अध्यायः ४४
  45. अध्यायः ४५
  46. अध्यायः ४६
  47. अध्यायः ४७
  48. अध्यायः ४८
  49. अध्यायः ४९
  50. अध्यायः ५०
  51. अध्यायः ५१
  52. अध्यायः ५२
  53. अध्यायः ५३
  54. अध्यायः ५४
  55. अध्यायः ५५
  56. अध्यायः ५६
  57. अध्यायः ५७
  58. अध्यायः ५८
  59. अध्यायः ५९
  60. अध्यायः ६०
  61. अध्यायः ६१
  62. अध्यायः ६२
  63. अध्यायः ६३
  64. अध्यायः ६४
  65. अध्यायः ६५
  66. अध्यायः ६६
  67. अध्यायः ६७
  68. अध्यायः ६८
  69. अध्यायः ६९
  70. अध्यायः ७०
  71. अध्यायः ७१
  72. अध्यायः ७२
  73. अध्यायः ७३
  74. अध्यायः ७४
  75. अध्यायः ७५
  76. अध्यायः ७६
  77. अध्यायः ७७
  78. अध्यायः ७८
  79. अध्यायः ७९
  80. अध्यायः ८०
  81. अध्यायः ८१
  82. अध्यायः ८२
  83. अध्यायः ८३
  84. अध्यायः ८४
  85. अध्यायः ८५
  86. अध्यायः ८६
  87. अध्यायः ८७
  88. अध्यायः ८८
  89. अध्यायः ८९
  90. अध्यायः ९०
  91. अध्यायः ९१
  92. अध्यायः ९२
  93. अध्यायः ९३
  94. अध्यायः ९४
  95. अध्यायः ९५
  96. अध्यायः ९६
  97. अध्यायः ९७
  98. अध्यायः ९८
  99. अध्यायः ९९
  100. अध्यायः १००
  101. अध्यायः १०१
  102. अध्यायः १०२
  103. अध्यायः १०३
  104. अध्यायः १०४
  105. अध्यायः १०५
  106. अध्यायः १०६
  107. अध्यायः १०७
  108. अध्यायः १०८
  109. अध्यायः १०९
  110. अध्यायः ११०
  111. अध्यायः १११
  112. अध्यायः ११२
  113. अध्यायः ११३
  114. अध्यायः ११४
  115. अध्यायः ११५
  116. अध्यायः ११६
  117. अध्यायः ११७
  118. अध्यायः ११८
  119. अध्यायः ११९
  120. अध्यायः १२०
  121. अध्यायः १२१
  122. अध्यायः १२२
  123. अध्यायः १२३
  124. अध्यायः १२४
  125. अध्यायः १२५
  126. अध्यायः १२६
  127. अध्यायः १२७
  128. अध्यायः १२८
  129. अध्यायः १२९
  130. अध्यायः १३०
  131. अध्यायः १३१
  132. अध्यायः १३२
  133. अध्यायः १३३
  134. अध्यायः १३४
  135. अध्यायः १३५
  136. अध्यायः १३६
  137. अध्यायः १३७
  138. अध्यायः १३८
  139. अध्यायः १३९
  140. अध्यायः १४०
  141. अध्यायः १४१
  142. अध्यायः १४२
  143. अध्यायः १४३
  144. अध्यायः १४४
  145. अध्यायः १४५
  146. अध्यायः १४६
  147. अध्यायः १४७
  148. अध्यायः १४८
  149. अध्यायः १४९
  150. अध्यायः १५०
  151. अध्यायः १५१
  152. अध्यायः १५२
  153. अध्यायः १५३
  154. अध्यायः १५४
  155. अध्यायः १५५
  156. अध्यायः १५६
  157. अध्यायः १५७
  158. अध्यायः १५८
  159. अध्यायः १५९
  160. अध्यायः १६०
  161. अध्यायः १६१
  162. अध्यायः १६२
  163. अध्यायः १६३
  164. अध्यायः १६४
  165. अध्यायः १६५
  166. अध्यायः १६६
  167. अध्यायः १६७
  168. अध्यायः १६८
  169. अध्यायः १६९
  170. अध्यायः १७०
  171. अध्यायः १७१
  172. अध्यायः १७२
  173. अध्यायः १७३
  174. अध्यायः १७४
  175. अध्यायः १७५
  176. अध्यायः १७६
  177. अध्यायः १७७
  178. अध्यायः १७८
  179. अध्यायः १७९
  180. अध्यायः १८०
  181. अध्यायः १८१
  182. अध्यायः १८२
  183. अध्यायः १८३
  184. अध्यायः १८४
  185. अध्यायः १८५
  186. अध्यायः १८६
  187. अध्यायः १८७
  188. अध्यायः १८८
  189. अध्यायः १८९
  190. अध्यायः १९०
  191. अध्यायः १९१
  192. अध्यायः १९२
  193. अध्यायः १९३
  194. अध्यायः १९४
  195. अध्यायः १९५
  196. अध्यायः १९६
  197. अध्यायः १९७
  198. अध्यायः १९८
  199. अध्यायः १९९
  200. अध्यायः २००
  201. अध्यायः २०१
  202. अध्यायः २०२
  203. अध्यायः २०३
  204. अध्यायः २०४
  205. अध्यायः २०५
  206. अध्यायः २०६
  207. अध्यायः २०७
  208. अध्यायः २०८
  209. अध्यायः २०९
  210. अध्यायः २१०
  211. अध्यायः २११
  212. अध्यायः २१२
  213. अध्यायः २१३
  214. अध्यायः २१४
  215. अध्यायः २१५
  216. अध्यायः २१६
  217. अध्यायः २१७
  218. अध्यायः २१८
  219. अध्यायः २१९
  220. अध्यायः २२०
  221. अध्यायः २२१
  222. अध्यायः २२२
  223. अध्यायः २२३
  224. अध्यायः २२४
  225. अध्यायः २२५
  226. अध्यायः २२६
  227. अध्यायः २२७
  228. अध्यायः २२८
  229. अध्यायः २२९
  230. अध्यायः २३०
  231. अध्यायः २३१
  232. अध्यायः २३२
  233. अध्यायः २३३
  234. अध्यायः २३४
  235. अध्यायः २३५
  236. अध्यायः २३६
  237. अध्यायः २३७
  238. अध्यायः २३८
  239. अध्यायः २३९
  240. अध्यायः २४०
  241. अध्यायः २४१
  242. अध्यायः २४२
  243. अध्यायः २४३
  244. अध्यायः २४४
  245. अध्यायः २४५
  246. अध्यायः २४६
  247. अध्यायः २४७
  248. अध्यायः २४८
  249. अध्यायः २४९
  250. अध्यायः २५०
  251. अध्यायः २५१
  252. अध्यायः २५२
  253. अध्यायः २५३
  254. अध्यायः २५४
  255. अध्यायः २५५
  256. अध्यायः २५६
  257. अध्यायः २५७
  258. अध्यायः २५८
  259. अध्यायः २५९
  260. अध्यायः २६०
  261. अध्यायः २६१
  262. अध्यायः २६२
  263. अध्यायः २६३
  264. अध्यायः २६४
  265. अध्यायः २६५
  266. अध्यायः २६६
  267. अध्यायः २६७
  268. अध्यायः २६८
  269. अध्यायः २६९
  270. अध्यायः २७०
  271. अध्यायः २७१
  272. अध्यायः २७२
  273. अध्यायः २७३
  274. अध्यायः २७४
  275. अध्यायः २७५
  276. अध्यायः २७६
  277. अध्यायः २७७
  278. अध्यायः २७८
  279. अध्यायः २७९
  280. अध्यायः २८०
  281. अध्यायः २८१
  282. अध्यायः २८२
  283. अध्यायः २८३
  284. अध्यायः २८४
  285. अध्यायः २८५
  286. अध्यायः २८६
  287. अध्यायः २८७
  288. अध्यायः २८८
  289. अध्यायः २८९
  290. अध्यायः २९०
  291. अध्यायः २९१


शर्व उवाच।
शरीरे मम तन्वङ्गि! सिते भास्यसितद्युतिः
भुजङ्गी वासिता शुद्धा संश्लिष्टा चन्दने तरौ ।। १५५.१

चन्द्रातपेन संपृक्ता रुचिराम्वरया तथा।
रजनीवासिते पक्षे दृष्टिदोषं ददासि मे ।। १५५.२

इत्युक्ता गिरिजा तेन मुक्तकण्ठा पिनाकिना।
उवाच कोपरक्ताक्षी भ्रुकुटीकुटिलानना ।। १५५.३

देव्युवाच।
स्वकृतेन जनः सर्वो जाड्येन परिभूयते।
अवश्यमर्थात् प्राप्नोति खण्डनं शशिमण्डन! ।। १५४.४

तपोभिर्दीर्घचरितैर्यच्च प्रार्थिवत्यहम्।
तस्या मे नियतस्त्वेष ह्यवमानः पदे पदे ।। १५५.५

नैवास्मि कुटिला शर्व! विषमा नैव धूर्जटे!।
स विषस्त्वङ्गतः ख्यातिं व्यक्तं दोषाकराश्रयात् ।। १५५.६

नाहं पूष्णोऽपि दशना नेत्रे चास्मि भवस्य हि।
आदित्यश्च विजानाति भगवान् द्वादशात्मकः ।। १५५.७

मूर्ध्नि शूलं जनयसि स्वैर्दोषैर्मामधिक्षिपन्।
यस्त्वं ममाह कृष्णेति महाकालेति विश्रुतः ।। १५४.८

यास्याम्यहं परित्यक्त्वा चात्मानं तपसा गिरिम्।
जीवन्त्या नास्ति मे कृत्यं धूर्त्तेन परिभूतया
निशम्य तस्या वचनं कोपतीक्ष्णाक्षरम्भवः।
उवाचाधिकसम्भ्रान्तः प्रणयेनेन्दुमौलिना
अगात्मजासि गिरिजे !नाहं निन्दापरस्तव।
त्वद्भक्तिबुद्ध्या कृतवांस्तवाहं नामसंश्रयम् ।। १५४.9

विकल्पः स्वस्थचित्तेऽपि गिरिजे! नैव कल्पना।
यद्येवं कुपिता भीरु! त्वन्तवाहन्नवै पुनः ।। १५४.१०

नर्मवादी भविष्यामि जहि कोपं शुचिस्मिते!।
शिरसा प्रणतश्चाहं रचितस्ते मयाञ्जलिः ।। १५४.११

स्नेहेनाप्यवमानेन निन्दितेनैव विक्रियाम्।
तस्मान्न यातु रुष्टस्य नर्मस्पृष्टो जनः किल ।। १५४.१२

अनेकैः स्वादुभिर्देवी देवेन शङ्करपाणिना।
कोपन्तीव्रन्न तत्याज सती मर्मणि घट्टिता
अवष्टब्धमथास्फाल्य वासः शङ्करपाणिना।
विपर्यस्तालका वेगाद्यातुमैच्छत शैलजा ।। १५४.

तस्या व्रजन्त्याः कोपेन पुनराह पुरान्तकः।
सत्यं सर्वैरवयवैः सुतासि सदृशी पितुः
हिमाचलस्य श्रृङ्गैस्तै र्मेघजालाकुलैर्नभः।
तथा दुरवगाह्येभ्यो हृदयेभ्यस्तवाशयः ।। १५५.१८

काठिन्याङ्कस्त्वमस्मभ्यं वनेभ्यो बहुधा गता।
कुटिलत्वञ्च वक्त्रेभ्यो दुःसेव्यत्वं हिमादपि ।। १५५.१9

संक्रान्ति सर्वदैवेति तन्वङ्गि! हिमशैलराट्।
इत्युक्ता सा पुनः प्राह गिरिशं शैलजा तदा ।। १५५.२०

कोपकम्पितमूर्द्धा च प्रस्फुरद्दशनच्छदा।
उमोवाच।
मा सर्वान्दोषदानेन निन्दान्यान् गुणिनो जनान् ।। १५५.२१

तवापि दुष्टसम्पर्कात् संक्रान्तं सर्वमेव हि।
व्यालेभ्योऽधिकजिह्मत्वं भस्मना स्नेहबन्धनम् ।। १५५.२२

हृत्कालुष्यं शशाङ्कात्तु दुर्बोधित्वं वृषादपि।
तता बहु किमुक्तेन अलं वाचा श्रमेण ते ।। १५५.२३

श्मशानवासान्निर्भीत्वं नग्नत्वान्न तवत्रपा।
निर्घृणत्वं कपालित्वाद्दया ते विगताचिरम् ।। १५४.२४

इत्युक्त्वामन्दिरात्तस्मान्निर्जगाम हिमाद्रिजा।
तस्यां व्रजन्त्यां देवेश गणैः किलकिलोध्वनिः ।। १५४.२५

क्व मातर्गच्छसि त्यक्त्वा रुदन्तो धाविताः पुनः ।
विष्टभ्य चरणौ देव्या वीरको बाष्पगद्गदम् ।। १५४.२६

प्रोवाच मातः! किन्त्वेतत् क्व यासि कुपितान्तरा।
अहं त्वामनुयास्यामि व्रजन्तीं स्नेहवर्जिताम् ।। १५५.२७

सोऽहं पतिष्ये शिखरात् तपो निष्ठे त्वयोज्झितः।
उन्नाम्य वदनं देवी दक्षिणेन तु पाणिना ।। १५५.२८

उवाच वीरकं माता माशोकं पुत्र! भावय।
शैलाग्रात् पतितुं देवी दक्षिणेन तु पाणिना ।। १५५.२9

युक्तन्ते पुत्र! वक्ष्यामि येन कार्येण तच्छृणु।
कृष्णेत्युक्त्वाहरेणाहं निन्दिताचाप्यनिन्दिता ।। १५५.३०

साहं तपः करिष्यामि येन गौरीत्वमाप्नुयात्।
एष स्त्रीलम्पटो देवो यातायां मय्यनन्तरम्।। १५५.३१

द्वाररक्षा त्वया कार्य्या नित्यं रन्ध्रान्ववेक्षिणा।
यता न काचित् प्रविशेद्योषिदत्र हरान्तिकम् ।। १५५.३२

दृष्ट्वा परस्त्रियञ्चात्र वदेथा मम पुत्रक!।
शीघ्रमेव करिष्यामि यथा युक्तमनन्तरम् ।। १५५.३३

एवमस्त्विति देवीं स वीरकः प्राह साम्प्रतम्।
मातुराज्ञामृताह्लाद प्लाविताङ्गो गतज्वरः
जगाम कक्ष्यां संद्रष्टुं प्रणिपत्य च मातरम् ।। १५५.३४