मत्स्यपुराणम्/अध्यायः १३७

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अत्र गम्यताम् : सञ्चरणम्, अन्वेषणम्
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मयसमीपे वापीपानकथनम्।

सूत उवाच।
प्रमथैः समरेभिन्नास्त्रैपुरास्ते सुरारयः।
पुरं प्रविविशुर्भीताः प्रमथैर्भग्नगोपुरम्।। १३७.१ ।।

शीर्ण दंष्ट्रा यथा नागा भग्नश्रृङ्गा यथा वृषाः।
यथा विपक्षाः शकुना नद्यः क्षीणोदका यथा।। १३७.२ ।।

मृतप्रायास्तथा दैत्या दैवतैर्विकृताननाः।
बभूवुस्ते विमनसः कथं कार्यमिति ब्रुवन्।। १३७.३ ।।

अथ तान् म्लानमनसस्तदा तामरसाननः।
उवाच दैत्यो दैत्यानां परमाधिपतिर्मयः।। १३७.४ ।।

कृत्वा युद्धानि घोराणि प्रमथैः सहसामरैः।
तोषयित्वा तथा युद्धे प्रमथानमरैः सह।। १३७.५ ।।

यूयं यत् प्रथमं दैत्याः पश्चाच्च बलपीडिताः।
प्रविष्टा नगरन्त्रासात् प्रमथैर्भृशमर्दिताः।। १३७.६ ।।

अप्रियं क्रियते व्यक्तं देवैर्नास्त्यत्र संशयः।
यत्र नाम महाभागाः प्रविशन्ति गिरेर्वनम्।। १३७.७ ।।

अहो हि कालस्य बलमहो कालो हि दुर्जयः।
यत्रेदृशस्य दुर्गस्य उपरोधोऽयमागतः।। १३७.८ ।।

मये विवदमाने तु नर्द्दमान इवाम्बुदे।
बभूवुर्निष्प्रभा दैत्या ग्रहा इन्दूदये यथा।। १३७.९ ।।

वापीपालास्ततोऽभ्येत्य नभः काल इवाम्बुदाः।
मयामाहुर्यमप्रख्यं साञ्जलिप्रग्रहाः स्थिताः।। १३७.१० ।।

या सामृतरसा गूढा वापी वै निर्मिता त्वया।
समाकुलोत्पलवना समीनाकुलपङ्कजा।। १३७.११ ।।

पीता सा वृषरूपेण केनचिद्दैत्यनायकः।
वापी सा साम्प्रतं द्रृष्टा मृतसंज्ञा इवाङ्गना।। १३७.१२ ।।

वापीपालवचः श्रुत्वा मयोऽसौ दानवप्रभुः।
कष्टमित्यसकृत्‌ प्रोच्य दितिजानिदमब्रवीत्।। १३७.१३ ।।

मया मायाबलकृता वापी पीता त्वियं यदि।
विनष्टाः स्म न सन्देहस्त्रिपुरं दानवागतम्।। १३७.१४ ।।

निहतान्निहतान् दैत्यानाजीवयति दैवतैः।
पीता वा यदि वा वापी पीता वै पीतवाससा।। १३७.१५ ।।

कोऽन्यो मन्मायया गुप्तां वापीममृततोयिनीम्।
पास्यते विष्णुमजितं वर्जयित्वा गदाधरम्।। १३७.१६ ।।

सुगुह्यमपि दैत्यानां नास्त्यस्याविदितम्भुवि।
यत्र मद्वरकौशल्यं विज्ञानं न वृतं बुधैः।। १३७.१७ ।।

समोऽयं रुचिरो देशो निर्द्रुमो निर्द्रुमाचलः।
लभेमन्द्रूरतः कृत्वा बाधन्तेऽस्मान् गणामराः।। १३७.१८ ।।

ते यूयं यदि मन्यध्वं सागरोपरिधिष्ठिताः।
प्रमथानां महावेगं सहामः श्वसनोपमम्।। १३७.१९ ।।

एतेषाञ्च समारम्भास्तस्मिन् सागरसंप्लवे।
निरुत्साहा भविष्यन्ति एतद्रथपथावृताः।। १३७.२० ।।

युध्यतां निघ्नतां शत्रून्‌ भीतानाञ्च द्रविष्यताम्।
सागरोऽम्बरसङ्काशः शरणन्नो भविष्यति।। १३७.२१ ।।

इत्युक्त्वा स मयो दैत्यो दैत्यानामधिपस्तदा।
त्रिपुरेण ययौ तूर्णं सागरं सिन्दुबान्धवम्।। १३७.२२ ।।

सागरे जलगम्भीर उत्पपात पुरं वरम्।
अवतस्थुः पुराण्येव गोपुराभरणानि च।। १३७.२३ ।।

अपक्रान्ते तु त्रिपुरे त्रिपुरारिस्त्रिलोचनः।
पितामहमुवाचेदं वेदवादविशारदम्।। १३७.२४ ।।

पितामह! द्रृढं भीता भगवन्! दानवा हि नः।
विपुलं सागरन्ते तु दानवाः समुपाश्रिताः।। १३७.२५ ।।

यत एव हि ते यातास्त्रिपुरेण तु दानवाः।
तत एव रथं तूर्णं प्रापयस्व पितामह।। १३७.२६ ।।

सिंहनादं ततः कृत्वा देवा देवरथञ्च तम्।
परिवार्य ययुर्हृष्टाः सायुधाः पश्चिमौ दधिम्।। १३७.२७ ।।

ततोऽमरामरगुरुं परिवार्य भवं हरम्।
नर्दयन्तो ययुस्तूर्णं सागरं दानवालयम्।। १३७.२८ ।।

अथ चारुपताकभूषितं पटहाडम्बरशङ्कनादितम्।
त्रिपुरमभिसमीक्ष्य देवता विविधबला ननदुर्यथा घनाः।। १३७.२९ ।।

असुरवरपुरेऽपि दारुणो जलधरारवमृदङ्गगह्वरः।
दनुतनयनिनादमिश्रितः प्रतिनिधिसंक्षुभितार्णवोपमः।। १३७.३० ।।

अथ भुवनपतिर्गतिः सुराणामरिमृगयां प्रददात् सुलब्धबुद्धिः।
त्रिदशगणापतिर्ह्युवा च शक्रम् त्रिपुरगतं सहसा निरीक्ष्य शत्रुम्।। १३७.३१ ।।

त्रिदशगणपते! निशामयैतत् त्रिपुरनिकेतनमुत्तमं सुरेन्द्र।
यमवरुणकुबेरषण्मुखैस्तत् सह गणपैरपि हन्मि तावदेव।। १३७.३२ ।।

विहितपरबलाभिघातभूतम् व्रज जलधेस्तु यतः पुराणि तस्थुः।
स रथवरगतो भवः समर्थो ह्युदधिमगात् त्रिपुरं पुनर्निहन्तुम्।। १३७.३३ ।।

इति परिगणयन्तोदितेः सुता ह्यवतस्थुर्लवणार्णवोपरिष्टात्।।
अभिभवत् त्रिपुरं स दानवेन्द्रं शरवर्षैर्मुसलैश्च वज्रमिश्रैः।। १३७.३४ ।।

अहमपि रथवर्यमास्थितः सुरवरवर्य्य! भवेय पृष्ठतः।
असुरवरवधार्थमुद्यतानाम् प्रतिविदधामि सुखयतेऽनघ।। १३७.३५ ।।

इति भववचनप्रचोदितो दशशतनयनवपुः समुद्यतः।
त्रिपुरपुरजिघांसया हरिः प्रविकसिताम्बुजलोचनो ययौ।। १३७.३६ ।।