मत्स्यपुराणम्/अध्यायः १७९

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अत्र गम्यताम् : सञ्चरणम्, अन्वेषणम्
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भवमाहात्म्यवर्णनम्।
ऋषय ऊचुः।
श्रुतः पद्मोद्भवस्तात विस्तरेण त्वयेरितः।
समासाद् भव माहात्म्यं भैरवस्य विधीयताम् ।। १७९.१ ।।

सूत उवाच।
तस्यापि देवदेवस्य श्रृणुध्वं कर्म चोत्तमम्।
आसीद्दैत्योऽन्धको नाम भिन्नाञ्जन चयोपमः ।। १७९.२ ।।

तपसा महतायुक्तो ह्यबध्यस्त्रिदिवौकसाम्।
स कदाचित् महादेवं पार्वत्या सहितं प्रभुम् ।। १७९.३ ।।

क्रीडमानं तदा दृष्ट्वा हर्तुं देवीं प्रचक्रमे।
तस्य युद्धं तदा घोरमभवत् सह शम्भुना ।। १७९.४ ।।

आवन्त्ये विषये घोरे महाकालवनं प्रति।
तस्मिन्युद्धे तदा रुद्रश्चान्धकेनातिपीडितः ।। १७९.५ ।।

सुषुवे बाणमत्युग्र नाम्ना पाशुपतं हि तत्।
रुद्रबाणविनिर्भेदाद्रुधिरादन्धकस्य तु ।। १७९.६ ।।

अन्धकाश्च समुत्पन्नाः शतशोऽथ सहस्रशः।
तेषां विदार्यमाणानां रुधिरादपरे पुनः ।। १७९.७ ।।

बभूवुरन्धका घोरा यैर्व्याप्तमखिलं जगत्।
एवं मायाविनं दृष्ट्वा तञ्च देवस्तदान्धकम् ।। १७९.८ ।।

पानार्थमन्धकास्रस्य सोऽसृजन्मातरस्तदा।
माहेश्वरी तथाब्राह्मी कौमारी मालिनी तथा ।। १७९.९ ।।

सौपर्णी ह्यथ वायव्या शाक्री वै नैऋती तथा।
सौरी सौम्या शिवा दूती चामुण्डा चाथ वारुणी ।। १७९.१० ।।

वाराही नारसिंहीच वैष्णवीच चलच्छिखा।
शतानन्दा भगानन्दा पिच्छिला भगमालिनी ।। १७९.११ ।।

बला चातिबला रक्ता सुरभी मुखमण्डिका।
मातृनन्दा सुनन्दाच विडाली शकुनी तथा ।। १७९.१२ ।।

रेवतीच महारक्ता तथैव पिल पिच्छिका।
जयाच विजया चैव जयन्ती चापराजिता ।। १७९.१३ ।।

काली चैव महाकाली दूती चैव तथैव च।
सुभागा दुर्भगा चैव कराली नन्दिनी तथा ।। १७९.१४ ।।

अदितिश्च दितिश्चैव मारीवै मृत्युरेव च।
कर्णमोटी तथा ग्राम्या उलूकीच घटोदरी ।। १७९.१५ ।।

कपाली वज्रहस्ता च पिशाची राक्षसी तथा।
भुशुण्डी शाङ्करी चण्डा लाङ्गली कुटभी तथा ।। १७९.१६ ।।

खेटा सुलोचना धूम्रा एकवीरा करालिनी।
विशालदंष्ट्रिणी श्यामा त्रिजटी कुक्कुटी तथा ।। १७९.१७ ।।

वैनायकी च वैताली उन्मत्तो दुम्वरी तथा।
सिद्धिश्च लेलिहाना च केकरी गर्दभी तथा ।। १७९.१८ ।।

भ्रुकुटी बहुपुत्रीच प्रेतयाना विडम्बिनी।
क्रौञ्चा शैलमुखी चैव विनता सुरमा दनुः ।। १७९.१९ ।।

उषा रम्भा मेनकाच सलिला चित्ररूपिणी।
स्वाहा स्वधा वषट्कारा धृतिर्ज्येष्ठाकपर्दिनी ।। १७९.२० ।।

माया विचित्ररूपा च कामरूपा च सङ्गमा।
मुखेविला मङ्गला च महानासा महामुखी ।। १७९.२१ ।।

कुमारी रोचना भोमा सदाहा सा मदोद्धता।
अलम्बाक्षी कालपर्णी कुम्भकर्णो महासुरी ।। १७९.२२ ।।

केशिनी शङ्किनी लम्बा पिङ्गला लोहितामुखी।
घण्टारवाथ दंष्ट्राला रोचना काकजङ्घिका ।। १७९.२३ ।।

गोकर्णिकाच मुखिका महाग्रीवा महामुखी।
उल्कामुखी धूमशिखा कम्पिनी परिकम्पिनी ।। १७९.२४ ।।

मोहना कम्पनाक्ष्वेला निर्भया बाहुशाहिनी।
सर्पकर्णी तथैकाक्षी विशोका नन्दिनी तथा ।। १७९.२५ ।।

जोत्स्ना मुखी च रभसा निकुम्भा रक्तकम्पना।
अविकारा महाचित्रा चन्द्रसेना मनोरमा ।। १७९.२६ ।।

अदर्शना हरत्पापा मातङ्गी लम्बमेखला।
अवाला वञ्चना काली प्रमोदा लाङ्गलावती ।। १७९.२७ ।।

चित्ता चित्तजला कोणा शान्तिकाघविनाशिनी।
लम्बस्तनी लम्बसटा विसटा वासचूर्णिनी ।। १७९.२८ ।।

स्खलन्ती दीर्घकेशीच सुचिरा सुन्दरी शुभा।
अयोमुखी कटुमुखी क्रोधनीच तथाशनी ।। १७९.२९ ।।

कुटुम्बिका मुक्तिका च चन्द्रिका बलमोहिनी।
सामान्या हासिनी लम्बा कोविदारी समासवी ।। १७९.३० ।।

कङ्कुकर्णी महानादा महादेवी महोदरी।
हुङ्कारी रुद्रसुसटा रुद्रेशी भूतडामरी ।। १७९.३१ ।।

पिण्डजिह्वा चलज्ज्वाला शिवा ज्वालामुखी तथा।
एताश्चान्याश्च देवेशः सोऽसृजन्मातरस्तदा ।। १७९.३२ ।।

अन्धकानां महाघोराः पपुस्तद्रुधिरं तदा।
ततोऽन्धकासृजः सर्वाः परां तृप्तिमुपागताः ।। १७९.३३ ।।

तासु तृप्तासु संभूता भूय एवान्धकप्रजाः।
अर्दितस्तैर्महादेवः शूलमुद्गर पाणिभिः ।। १७९.३४ ।।

ततः स शङ्करो देवस्त्वन्धकै र्व्याकुलीकृतः।
जगाम शरणं देवं वासुदेवमजं विभुम् ।। १७९.३५ ।।

ततस्तु भगवान् विष्णुः सृष्टवान् शुष्करेवतीम्।
या पपौ सकलन्तेषामन्धकानामसृक् क्षणात् ।। १७९.३६ ।।

तथा तथाऽधिकं देवी संशुष्यति जनाधिप!।
पीयमाने तथातेषामन्धकानां तथासृजि ।
अन्धकास्तु क्षयन्नीताः सर्वं ते त्रिपुरारिणा ।। १७९.३७ ।।

मूलान्धकन्तु विक्रम्य तदा शर्वस्त्रिलोकधृक्।
चकार वेगाच्छूलाग्रे स चतुष्टाव शङ्करम् ।। १७९.३८ ।।

अन्धकस्तु महावीर्यस्तस्य तुष्टोऽभवद् भवः।
सामीप्यं प्रददौ नित्यं गणेशत्वं तथैव च ।। १७९.३९ ।।

ततो मातृगणाः सर्वे शङ्करं वाक्यमब्रुवन्।
भगवन्! भक्षयिष्यामः स देवासुरमानुषान् ।। १७९.४० ।।

त्वत्प्रसादाज्जगत् सर्वं तदनुज्ञातुमर्हसि।
शङ्कर उवाच।
भवतीभिः प्रजाः सर्वा रक्षणीया न संशयः ।। १७९.४१ ।।

तस्माद्घोरानभिप्रायान्मनः शीघ्रं निवर्त्यताम्।
इत्येवं शङ्करेणोक्तमनादृत्य वचस्तदा।। १७९.४२ ।।

भक्षयामासुरत्युग्रास्त्रैलोक्यं सचराचरम्।
त्रैलोक्ये भक्ष्यमाणे तु तदा मातृगणेन वै ।। १७९.४३ ।।

नृसिंहमूर्तिं देवेशं प्रदध्यौ भगवाञ्छिवः।
अनादिनिधनं देवं सर्वलोक भवोद्भवम् ।। १७९.४४ ।।

दैत्येन्द्रवक्षोरुधिर चर्चिताग्र महानखम्।
विद्युज्जिह्वं महादंष्ट्रं स्फुरत्केसरकण्टकम् ।।
कल्पान्तमारुतक्षुब्धं सप्तपर्ण समस्वनम् ।। १७९.४५ ।।

वज्रतीक्ष्णनखं घोरमाकर्ण-व्यादिताननम्।
मेरुशैलप्रतीकाशमुदयार्कसमेक्षणम् ।। १७९.४६ ।।

हिमाद्रिशिखराकारं चारुदंष्ट्रोज्वलाननम्।
नखनिःसृतरोषाग्नि ज्वाला केसरमालिनम् ।। १७९.४७ ।।

वज्राङ्गदं सुमुकुटं हारकेयूरभूषणम्।
श्रोणीसूत्रेण महता काञ्चनेन विराजितम् ।। १७९.४८ ।।

नीलोत्पलदलश्यामं वासोयुगविभूषणम्।
तेजसाक्रान्तसकल ब्रह्माण्डागार सङ्कुलम् ।। १७९.४९ ।।

पवनं भ्राम्यमाणानां हुतहव्य-वहार्चिषाम्।
आवर्तसदृशाकारैः संयुक्तं देहलोमजैः ।। १७९.५० ।।

सर्वपुष्पविचित्राञ्च दारयन्तं महास्रजम्।
स ध्यातमात्रो भगवान् प्रददौ तस्य दर्शनम् ।। १७९.५१ ।।

यादृशेनैवरूपेण ध्याते रुद्रेण धीमता।
तादृशेनैव रूपेण दुर्निरीक्ष्येण दैवतैः ।। १७९.५२ ।।

प्रणिपत्य तु देवेशं तदा तुष्टाव शङ्करः।
शङ्कर उवाच।
नमस्तेऽतु जगन्नाथ! नरसिंह वपुर्धर! ।। १७९.५३ ।।

दैत्यनाथासृजापूर्ण! नखशक्ति विराजित!।
ततः सकल संलग्ने हेमपिङ्गलविग्रह! ।। १७९.५४ ।।

नतोऽस्मि पद्मनाभ! त्वां सुरशक्र! जगद्गुरो!।
कल्पान्ताम्भोदनिर्घोष! सूर्यकोटिसमप्रभ ।। १७९.५५ ।।

सहस्रयमसंक्रोध! सहस्रेन्द्रपराक्रम!।
सहस्रधनदस्फीत! सहस्रवरुणात्मक! ।। १७९.५६ ।।

सहस्रकालरचित! सहस्रनियतेन्द्रिय!।
सहस्रभूमिसद्धैर्य! सहस्रानन्त! मूर्तिमन्! ।। १७९.५७ ।।

सहस्रचन्द्रप्रतिम! सहस्रग्रहविक्रम!।
सहस्ररुद्रतेजस्क! सहस्रब्रह्मसंस्तुत! ।। १७९.५८ ।।

सहस्रबाहुवर्गोग्र! सहस्रास्य निरीक्षण!।
सहस्रयन्त्रमथन! सहस्रवधमोचन! ।। १७९.५९ ।।

अन्धकस्य विनाशाय याः सृष्टाः मातरो मया।
अनादृत्य तु मद्वाक्यम् भक्षयन्त्यद्यताः प्रजाः ।। १७९.६० ।।

कृत्वा ताश्च न शक्तोऽहं संहर्तुमपराजित!।
स्वयङ्कृत्वा कथन्तासां विनाशमभिकारये ।। १७९.६१ ।।

एवमुक्तः स रुद्रेण नरसिंहवपुर्धरः।
ससर्ज देवो जिह्वायास्तदावाणीश्वरीं हरिः ।। १७९.६२ ।।

हृदयाच्च तथा माया गुह्याच्च भवमालिनी।
अस्थिभ्यश्च तथाकाली सृष्टा पूर्वं महात्मना ।। १७९.६३ ।।

यया तद्रुधिरम्पीतमन्धकानां महात्मनाम्।
याचास्मिन्कथिता लोके नामतः शुष्करेवती ।। १७९.६४ ।।

द्वात्रिंशन्मातरः सृष्टा गात्रेभ्यश्चक्रिणा ततः।
तासां नामानि वक्ष्यामि तानि मे गदतः श्रुणु ।। १७९.६५ ।।

सर्वास्तासु महाभागा घण्टाकर्णी तथैव च।
त्रैलोक्यमोहिनी पुण्या सर्वसत्व वशङ्करी ।। १७९.६६ ।।

तथा च चक्रहृदया पञ्चमी व्योमचारिणी।
शङ्खिनी लेखिनी चैव कालसङ्कर्षणी तथा ।। १७९.६७ ।।

इत्येतः पृष्ठगा राजन्! वागीशानुचराः स्मृताः।
सङ्कर्षणी तथाश्वत्था वीजभावा पराजिता ।। १७९.६८ ।।

कल्याणी मधुदंष्ट्री च कमलोत्पल हस्तिका।
इति देव्यष्टकं राजन्! मायानुचरमुच्यते ।। १७९.६९ ।।

अजिता सूक्ष्महृदया वृद्धा वेशाश्म दंशना।
नृसिंसभैरवा बिल्वा गरुत्महृदया जया ।। १७९.७० ।।

भवमालिन्यनुचरा इत्यष्टौ नृपमातरः।
आकर्णनी सम्भटा च तथैवोत्तरमालिका ।। १७९.७१ ।।

ज्वालामुखी भीषणिका कामधेनुश्च बालिका।
तथा पद्मकरा राजन्! रेवत्यनुचराः स्मृताः ।। १७९.७२ ।।

अष्टौ महाबलाः सर्वा देवगात्र समुद्भवाः।
त्रैलोक्यसृष्टिसंहार समर्थाः सर्वदेवताः ।। १७९.७३ ।।

ताः सृष्टमात्रा देवेन क्रुद्धा मातृगणस्य तु।
प्रधाविता महाराज! क्रोधविस्फारितेक्षणाः ।। १७९.७४ ।।

अविषह्य तमन्तासां दृष्टितेजः सुदारुणम्।
तमेव शरणं प्राप्ता नृसिंहो वाक्यमब्रवीत् ।। १७९.७५ ।।

यथा मनुष्याः पशवः पालयन्ति चिरात् सुतान्।
जयन्ति ते तथैवाशु यथा वै देवतागणः ।। १७९.७६ ।।

भवत्यस्तु तथालोकान्पालयन्तु मयेरिताः।
मनुजैश्च तता देवैर्यजध्वं त्रिपुरान्तकम् ।। १७९.७७ ।।

नच बाधा प्रकर्तव्या ये भक्ता स्त्रिपुरान्तके।
येच मां संस्मरन्तीह ते च रक्ष्याः सदा नराः ।। १७९.७८ ।।

बलिकर्म करिष्यन्ति युष्माकं ये सदा नराः।
सर्वकामप्रदास्तेषां भविष्यध्वन्तथैव च ।। १७९.७९ ।।

उच्छासनादिकं ये च कथयन्ति मयेरितम्।
ते च रक्ष्याः सदालोका रक्षितव्यं मदासनम् ।। १७९.८० ।।

रौद्रीं चैव परां मूर्तिं महादेवः प्रदास्यति।
युष्मन्मुख्या महादेव्यस्तदुक्तं परिरक्षय ।। १७९.८१ ।।

मया मातृगणः सृष्टो योऽयं विगतसाध्वसः।
एष नित्यं विशालाक्ष्यो मयैव सह रंस्यते ।। १७९.८२ ।।

मया सार्द्धं तथा पूजां नरेभ्यश्चैव लप्स्यथ।
पृथक् सुपूजिता लोकैः सर्वान् कामान् प्रदास्यथ ।। १७९.८३ ।।

शुष्कां संपूजयिष्यन्ति ये च पुत्रार्थिनो जनाः।
तेषां पुत्रप्रदा देवी भविष्यन्ति न संशयः ।। १७९.८४ ।।

एवमुक्त्वा तु भगवान् सह मातृगणेन तु।
ज्वाला मालाकुलवपुस्तत्रैवान्तरधीयत ।। १७९.८५ ।।

तत्र तीर्थं समुत्पन्नं कृतशौचेति यज्जगुः।
तत्रापि पूर्वजो देवो जगदार्तिहरो हरः ।। १७९.८६ ।।

रौद्रस्य मातृवर्गस्य दत्त्वा रुद्रस्तु पार्थिव।
रौद्रां दिव्यां तनुं तत्र मातृ मध्ये व्यवस्थितः ।। १७९.८७ ।।

सप्त ता मातरो देव्यः सार्द्धनारीनरः शिवः।
निवेश्य रौद्रं तत् स्थानं तत्रैवान्तरधीयत ।। १७९.८८ ।।

स मातृवर्गस्य हरस्य मूर्तिर्यदा यदा याति च तत्समीपे।
देवेश्वरस्यापि नृसिंहमूर्तेः पूजां विधत्ते त्रिपुरान्धकारिः ।। १७९.८९ ।।