मत्स्यपुराणम्/अध्यायः १४२

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अत्र गम्यताम् : सञ्चरणम्, अन्वेषणम्
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चतुर्युगमानवर्णनम्।

ऋषय ऊचुः।
चतुर्युगानि यानि स्युः पूर्वे स्वायम्भुवेऽन्तरे।
एषां निसर्गं संख्याञ्च श्रोतुमिच्छाम विस्तरात्।। १४२.१ ।।

सूत उवाच।
एतच्चतुर्युगं त्वेवं तद्वक्ष्यामि निबोधत।
तत्प्रमाणं प्रसंख्याय विस्तराच्चैव कृत्स्नशः।। १४२.२ ।।

लौकिकेन प्रमाणेन निष्पाद्याब्दन्तु मानुषम्।
तेनापीह प्रसंख्याय वक्ष्यामि तु चतुर्यगम्।। १४२.३ ।।

काष्ठा निमेषा दश पञ्च चैव त्रिंशच्च काष्ठाङ्गणयेत् कलान्तु।
त्रिंशत्कलाश्चैव भवेन् मुहूर्तस्तैस्त्रिंशता रात्र्यहनी समेते।। १४१.४ ।।

अहोरात्रे विभजते सूर्यो मानुषलौकिके।
रात्रिः स्वप्नाय भूतानाञ्चेष्टायै कर्म्मणामहः।। १४२.५ ।।

पित्र्ये रात्र्यहनी मासः प्रविभागस्तयोः पुनः।
कृष्णपक्षस्त्वहस्तेषां शुक्लः स्वप्नाय शर्वरी।। १४२.६ ।।

त्रिंशद्ये मानुषा मासाः पैत्रो मासः स उच्यते।
शतानि त्रीणि मासानां षष्ठ्या चाभ्यधिकानि तु।।

पैत्रः संवत्सरो ह्येष मानुषेण विभाव्यते।। १४२.७ ।।
मानुषेणैव मानेन वर्षाणां यच्छतं भवेत्।

पितॄणां तानि वर्षाणि संख्यातानि तु त्रीणि वै।
दश च ह्यधिका मासाः पितृसंख्येह कीर्तिताः।। १४२.८ ।।

लौकिकेन प्रमाणेन अब्दो यो मानुषः स्मृतः।
एतद्दिव्यमहोरात्रमित्येषा वैदिकी श्रुतिः।। १४२.९ ।।

दिव्ये रात्र्यहनी वर्षं प्रविभागस्तयोः पुनः।
अहस्तु यदुदक् चैव रात्रिर्या दक्षिणायनम्।।
एते रात्र्यहनी दिव्ये प्रसंख्याते तयोः पुनः।। १४२.१० ।।

त्रिंशद्यानि तु वर्षाणि दिव्यो मासस्तु स स्मृतः।
मानुषाणां शतं यच्च दिव्या मासास्त्रयस्तु वै।
तथैव सह संख्यातो दिव्य एष विधिः स्मृतः।। १४२.११ ।।

त्रीणि वर्षशतान्येवं षष्टिवर्षस्तथैव च।
दिव्यः सम्वत्सरोह्येष मानुषेण प्रकीर्तितः।। १४२.१२ ।।

त्रीणि वर्षसहस्राणि मानुषेण प्रमाणतः।
त्रिंशदन्यानि वर्षाणि स्मृतः सप्तर्षिवत्सरः।। १४२.१३ ।।

नव यानि सहस्राणि वर्षाणां मानुषाणि च।
वर्षाणि नवतिश्चैव ध्रुवसम्वत्सरः स्मृतः।।
षट्‌त्रिंशत्तु सहस्राणि वर्षाणां मानुषाणि च।। १४२.१४ ।।

षष्टिश्चैव सहस्राणि संख्यातानि तु संख्यया।
दिव्यं वर्षसहस्रन्तु प्राहुः संख्याविदो जनाः।। १४२.१५ ।।

इत्येतद्रृषिभिर्गीतं दिव्यया संख्यया द्विजाः।
दिव्येनैव प्रमाणेन युगसंख्या प्रकल्पिता।। १४२.१६ ।।

चत्वारि भारते वर्षे युगानि ऋषयोऽब्रुवन्।
कृतत्रेता द्वापरञ्च कलिश्चैवं चतुर्युगम्।। १४२.१७ ।।

पूर्वं कृतयुगं नाम ततस्त्रेताभिधीयते।
द्वापरञ्च कलिश्चैव युगानि परिकल्पयेत्।। १४२.१८ ।।

चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तत् कृतं युगम्।
तस्य तावच्छती सन्ध्या सन्ध्यांशश्च तथाविधः।। १४२.१९ ।।

इतरेषु ससन्ध्येषु ससन्ध्यांशेषु च त्रिषु।
एकपादे निवर्तन्ते सहस्रणि शतानि च।। १४२.२० ।।

त्रेता त्रीणि सहस्राणि युगसंख्याविदो विदुः।
तस्यापि त्रिशती सन्ध्या सन्ध्यांशः सन्ध्यया समः।। १४२.२१ ।।

द्वे सहस्रे द्वापरन्तु सन्ध्यांशौ तु चतुः शतम्।
सहस्रमेकं वर्षाणां कलिरेव प्रकीर्तितः।

द्वेशते च तथान्ये च सन्ध्या सन्ध्यांशयोः स्मृते।। १४२.२२ ।।
एषा द्वादशसाहस्री युगसंख्या तु संज्ञिका।

कृतत्रेता द्वापरञ्च कलिश्चेति चतुष्टयम्।। १४२.२३ ।।
तत्र सम्वत्सराः सृष्टा मानुषास्तान्निबोधत।

नियुतानि दश द्वे च पञ्च चैवात्र संख्यया।।
अष्टाविंशत्सहस्राणि कृतं युगमथोच्यते।। १४२.२४ ।।

प्रयुतन्तु तथा पूर्णं द्वे चान्ये नियुते पुनः।
षण्णवतिसहस्राणि संख्या तानि च संख्यया।। १४२.२५ ।।

त्रेतायुगस्य संख्यैषा मानुषेण तु संज्ञिता।
अष्टौ शतसहस्राणि वर्षाणां मानुषाणि तु।।
चतुः षष्टिसहस्राणि वर्षाणां द्वापरं युगम्।। १४२.२६ ।।

चत्वारि नियुतानि स्युर्वर्षाणि तु कलिर्युगम्।
द्वात्रिंशच्च तथान्यानि सहस्राणि तु संख्यया।
एतत्कलियुगं प्रोक्तं मानुषेण प्रमाणतः।। १४२.२७ ।।

एषा चतुर्युगावस्था मानुषेण प्रकीर्तिता।
चतुर्युगस्य संख्याता सन्ध्या सन्ध्यांशकैः सह।। १४२.२८ ।।

एषा चतुर्युगाख्या तु साधिका त्वेकसप्ततिः।
कृतत्रेतादियुक्ता सा मनोरन्तरमुच्यते।। १४२.२९ ।।

मन्वन्तरस्य संख्या तु मानुषेण निबोधत।
एकत्रिंशत्तथाकोट्य संख्याताः संख्यया द्विजैः।। १४२.३० ।।

तथा शतसहस्राणि दशचान्यानि भागशः।
सहस्राणि ते द्वात्रिंशच्छतान्यष्टाधिकानि च।। १४२.३१ ।।

अशीतिश्चैव वर्षाणि मासाश्चैवाधिकास्तु षट्।
मन्वन्तरस्य संख्यैषा मानुषेण प्रकीर्तिता।। १४२.३२ ।।

दिव्येन च प्रमाणेन प्रवक्ष्याम्यन्तरं मनोः।
सहस्राणां शतान्याहुः स च वै परिसंख्यया।। १४२.३३ ।।

चत्वारिंशत् सहस्राणि मनोरन्तरमुच्यते।
मन्वन्तरस्य कालस्तु युगैः सह प्रकीर्तितः।। १४२.३४ ।।

एषा चतुर्युगाख्या तु साधिका ह्येकसप्ततिः।
क्रमेण परिवृत्ता सा मनोरन्तरमुच्यते।। १४२.३५ ।।

एतच्चतुर्दशगुणं कल्पमाहुस्तु तद्विदः।
ततस्तु प्रलयः कृत्स्नः स तु संप्रलयो महान्।। १४२.३६ ।।

कल्पप्रमाणो द्विगुणो यथा भवति संख्यया।
चतुर्युगाख्या व्याख्याता कृतं त्रेतायुगञ्च वै।। १४२.३७ ।।

त्रेतासृष्टिं प्रवक्ष्यामि द्वापरं कलिमेव च।
युगपत्समवेतौ द्वौ द्विधा वक्तुं न शक्यते।। १४२.३८ ।।

क्रमागतं मयाप्येतत्तुभ्यं नोक्तं युगद्वयम्।
ऋषिवंशप्रसङ्गेन व्याकुलत्वात्तथा क्रमात्।। १४२.३९ ।।

नोक्तं त्रेतायुगे शेषं तद्वक्ष्यामि निबोधत।
अथ त्रेतायुगस्यादौ मनुः सप्तर्षयश्च ये।।
श्रौतस्मार्तं ब्रुवन्धर्मं ब्रह्मणा तु प्रचोदिताः।। १४२.४० ।।

दाराग्निहोत्रसम्बन्धं ऋग्यजुः सामसंहिताः।
इत्यादिबहुलं श्रौतं धर्मं सप्तर्षयोऽब्रुवन्।। १४२.४१ ।।

परम्परागतं धर्मं स्मार्तत्वाचारलक्षणम्।
वर्णाश्रमाचारयुक्तं मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत्।। १४२.४२ ।।

सत्येन ब्रह्मचर्येण श्रुतेन तपसा तथा।
तेषां सुतप्ततपसा मार्गेणानुक्रमेण ह।। १४२.४३ ।।

सप्तर्षीणां मनोश्चैव आदौ त्रेतायुगे ततः।
अबुद्धिपूर्वकं तेन सकृत् पूर्वकमेव च।। १४२.४४ ।।

अभिवृत्तास्तु ते मन्त्रा दर्शनैस्तारकादिभिः।
आदिकल्पे तु देवानां प्रादुर्भूतास्तु ते स्वयम्।। १४२.४५ ।।

प्रमाणेष्वथ सिद्धानामन्येषाञ्च प्रवर्तते।
मन्त्रयोगो व्यतीतेषु कल्पेष्वथ सहस्रशः।
ते मन्त्रा वै पुनस्तेषां प्रतिमायामुपस्थिताः।। १४२.४६ ।।

ऋचो यजूंषि सामानि मन्त्राश्चाथर्वणास्तु ये।
सप्तर्षिभिश्च ये प्रोक्ताः स्मार्त्तन्तु मनुरबवीत्।। १४२.४७ ।।

त्रेतादौ संहिता वेदाः केवलं धर्म्मसेतवः।
संरोधादायुषश्चैव व्यस्यन्ते द्वापरे च ते।।
ऋषयस्तपसा वेदानहोरात्रमधीयत।। १४२.४८ ।।

अनादिनिधना दिव्याः पूर्वं प्रोक्ताः स्वयम्भुवा।
स्वधर्म्मसंवृताः साङ्गा यथा धर्मं युगे युगे।
विक्रियन्ते स्वधर्म्मन्तु वेदवादाद्यथायुगम्।। १४२.४९ ।।

आरम्भयज्ञः क्षत्रहविर्यज्ञा विशः स्मृताः।
परिचारयज्ञाः शूद्राश्च जपयज्ञाश्च ब्राह्मणाः।। १४२.५० ।।

ततः समुदिता वर्णास्त्रेतायां धर्म्मशालिनः।
क्रियावन्तः प्रजावन्तः समृद्धिसुखिनश्च वै।। १४२.५१ ।।

ब्राह्मणैश्च विधीयन्ते क्षत्रियाः क्षत्रियैर्विशः।
वैश्यान् शूद्रानुवर्तन्ते शूद्रान् परमनुग्रहात्।। १४२.५२ ।।

शुभाः प्रकृतयस्तेषां दर्मा वर्णाश्रमाश्रयाः।
सङ्कल्पितेन मनसा वाचा वा हस्तकर्म्मणा।।
त्रेतायुगे ह्यविकले कर्मारम्भः प्रसिध्यति।। १४२.५३ ।।

आयुरूपं बलं मेधा आरोग्यं धर्म्मशीलता।
सर्वसाधारणं ह्येतदासीत्त्रेतायुगे तु वै।। १४२.५४ ।।

वर्णाश्रमव्यवस्थानमेषां ब्रह्म तथा करोत्।
संहिताश्च तथा मन्त्रा आरोग्यं धर्मशीलता।। १४२.५५ ।।

संहिताश्च तथा मन्त्रा ऋषिभिर्ब्रह्मणः सुतैः।
यज्ञः प्रवर्तितश्चैव तदा ह्येव तु दैवतैः।। १४२.५६ ।।

यामै शुक्लैर्जयैश्चैव सर्वसाधनसंभृतैः।
विश्वसृड्भिस्तथा सार्द्धं देवेन्द्रेण महौजसाः।।
स्वायम्भुवेन्तरे देवैस्ते यज्ञाः प्राक्‌प्रवर्तिताः।। १४२.५७ ।।

सत्यं जपस्तपोदानां पूर्वं धर्मोऽयमुच्यते।
यदा धर्म्मस्य ह्रसते शाखा धर्म्मस्य वर्द्धते।। १४२.५८ ।।

जायन्ते च तदा शूरा आयुष्मन्तो महाबलाः।
न्यस्तदण्डा महायोगा यज्वानो ब्रह्मवादिनः।। १४२.५९ ।।

पद्मपत्रायताक्षाश्च पृथुवक्त्रः सुसंहताः।
सिंहोरस्का महासत्वा मत्तमातङ्गगामिनः।। १४२.६० ।।

महाधनुर्द्धराश्चैव त्रेतायां चक्रवर्त्तिनः।
सर्वलक्षणपूर्णास्ते न्यग्रोधपरिमण्डलाः।। १४२.६१ ।।

न्यग्रोधौ तु स्मृतौ बाहू व्यामो न्यग्रोध उच्यते।
व्यामेन तूच्छ्रयो यस्य अत ऊर्द्ध्वन्तु देहिनः।।
समुच्छ्रयो परीणाहो न्यग्रोधपरिमण्डलः।। १४२.६२ ।।

चक्रं रथो मणिर्मार्या निधिरश्वो गजस्तथा।
प्रोक्तानि सप्तरत्नानि पूर्वं स्वायम्भुवेऽन्तरे।। १४२.६३ ।।

विष्णोरंशेन जायन्ते पृथिव्यां चक्रवर्तिनः।
मन्वन्तरेषु सर्वेषु ह्यतीतानागतेषु वै।। १४२.६४ ।।

भूतभव्यानि यानीह वर्तमानानि यानि च।
त्रेतायुगानि तेष्वत्र जायन्ते चक्रवर्तिनः।। १४२.६५ ।।

भद्राणीमानि तेषाञ्च विभाव्यन्ते महीक्षिताम्।
अत्यद्भुतानि चत्वारि बलं धर्मसुखं धनम्।। १४२.६६ ।।

अन्योन्यस्याविरोधेन प्राप्यन्ते नृपतेः समम्।
अर्थोधर्म्मश्च कामश्च यशो विजय एव च।। १४२.६७ ।।

ऐश्वर्येणाणिमाद्येन प्रभुशक्तिबलान्विताः।
श्रुतेन तपसा चैव ऋषींस्तेऽभिभवन्ति हि।। १४२.६८ ।।

बलेनाभिभवन्त्येते तेन दानवमानवान्।
लक्षणैश्चैव जायन्ते शरीरस्थैरमानुषाः।। १४२.६९ ।।

केशास्थिता ललाटेन जिह्वा च परिमार्जनी।
श्यामप्रभाश्चतुर्दंष्ट्राः श्रवसाश्चोद्‌र्ध्वरेतसः।। १४२.७० ।।

आजानुबाहवश्चैव तालहस्तौ वृषाकृती।
परिणाहप्रमाणाभ्यां सिंहस्कन्धाश्च मेधिनः।। १४२.७१ ।।

पादयोश्चक्रमत्स्यौ तु शङ्खपद्मे च हस्तयोः।
पञ्चाशीति सहस्राणि जीवन्ति ह्यजरामयाः।। १४२.७२ ।।

असङ्गा गतयस्तेषां चतस्रश्चक्रवर्तिनाम्।
अन्तरिक्षे समुद्रेषु पाताले पर्वतेषु च।। १४२.७३ ।।

इज्यादानन्तपः सत्यन्त्रेताधर्मास्तु वै स्मृताः।
तदा प्रवर्तते धर्मो वर्णाश्रमविभागशः।। १४२.७४ ।।

मर्यादास्थापनार्थञ्च दण्डनीतिः प्रवर्तते।
हृष्टपुष्टा जनाः सर्वे आरोगाः पूर्णमानसाः।। १४२.७५ ।।

एको वेदश्चतुष्पादस्त्रेतायान्तु विधिः स्मृतः।
त्रीणि वर्षसहस्राणि जीवन्तो तत्रताः प्रजाः।। १४२.७६ ।।

पुत्रपौत्रसमाकीर्णा म्रियन्ते च क्रमेण ताः।
एते त्रेतायुगे भावास्त्रेता संख्यां निबोधत।। १४२.७७ ।।

त्रेतायुगस्वभावेन सन्ध्या पादेन वर्तते।
सन्ध्या पादः स्वभावाच्च योंऽशः पादेन तिष्ठति।। १४२.७८ ।।