मत्स्यपुराणम्/अध्यायः १०६

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युधिष्ठिर उवाच।
यथा यथा प्रयागस्य माहात्म्यं कथ्यते त्वया।
तथा तथा प्रमुच्येऽहं सर्वपापैर्न संशयः।। १०६.१ ।।

भगवन्! केन विधिना गन्तव्यं धर्म्मनिश्चयैः।
प्रयागे यो विधिः प्रोक्तस्तन्मे ब्रूहि महामुने!।। १०६.२ ।।

मार्कण्डेय उवाच।
कथयिष्यामि ते राजन्! तीर्थयात्राविदिक्रमम्।
आर्षेण विधिनानेन यथा द्रृष्टं यथाश्रुतम्।। १०६.३ ।।

प्रयागतीर्थयात्रार्थी यः प्रयाति नरः क्वचित्।
बलीवर्दसमारूढ श्रृणु तस्यापि यत्फलम्।। १०६.४ ।।

नरके वसते घोरे गवां क्रोष्टा हि दारुणे।
सलिलं न च गृह्णन्ति पितरस्तस्य देहिनः।। १०६.५ ।।

यस्तु पुत्रांस्तथा बालान् स्नापयेत्पाययेत्तया।
यथात्मना तथा सर्वं दानं विप्रेषु दापयेत्।। १०६.६ ।।

ऐश्वर्यलोभमोहाद्वा गच्छेद्यानेन यो नरः।
निष्फलं तस्य तत्सर्वं तस्माद्यानं विवर्जयेत्।। १०६.७ ।।

गङ्गायमुनयोर्मध्ये यस्तु कन्यां प्रयच्छति।
आर्षैणैव विवाहेन यथा विभवसम्भवम्। १०६.८ ।।

न स पश्यति तं घोरं नरकं तेन कर्म्मणा।
उत्तरान् स कुरून् गत्वा मोदते कालमक्षयम्।।
पुत्रान्दारांश्च लभते धार्मिकान् रूपसंयुतान्।। १०६.९ ।।

तत्र दानं प्रकर्त्तव्यं यथा विभवसम्भवम्।
तेन तीर्थफलञ्चैव वर्धते नात्र संशयः।।
स्वर्गे तिष्ठति राजेन्द्र! यावदाभूतसंप्लवम्।। १०६.१० ।।

वटमूलं समासाद्य यस्तु प्राणान् विमुञ्चति।
सर्वलोकानतिक्रम्य रुद्रलोकं स गच्छति।। १०६.११ ।।

तत्र ते द्वादशादित्यास्तपन्ति रुद्रसंश्रिताः।
निर्दहन्ति जगत्सर्वं वटमूलं न दह्यते।। १०६.१२ ।।

नष्टचन्द्रार्कभुवनं यदा चैकार्णवं जगत्।
स्थीयते तत्र वै विष्णुर्यजमानः पुनः पुनः।। १०६.१३ ।।

देवदानवागन्धर्वा ऋषयः सिद्धचारणाः।
सदा सेवन्ति तत्तीर्थं गङ्गायमुनसङ्गमम्।। १०६.१४ ।।

ततो गच्छेत राजेन्द्र! प्रयागं संस्तुवंश्च यत्।
यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयः सिद्धचारणाः।। १०६.१५ ।।

लोकपालाश्च साध्याश्च पितरो लोकसंमताः।
सनत्कुमारप्रमुखास्तथैव परमर्षयः।। १०६.१६ ।।

अङ्गिरः प्रमुखाश्चैव तथा ब्रह्मर्षयः परे।
तथा नागाः सुपर्णाश्च सिद्धाश्चक्रधरास्तथा।। १०६.१७ ।।

सागराः सरितः शैला नागा विद्याधराश्च ये।
हरिश्च भगवानास्ते प्रजापतिपुरः सरः।। १०६.१८ ।।

गङ्गायमुनमोर्मध्ये पृथिव्या जघनं स्मृतम्।
प्रयागं राजशार्दूल त्रिषु लोकेषु भारत!।। १०६.१९ ।।

श्रवणात्तस्य तीर्थस्य नामसंकीर्त्तनादपि।
मृत्तिकालम्भनाद्वापि नरः पापात् प्रमुच्यते।। १०६.२० ।।

तत्राभिषेकं यः कुर्यात् सङ्गमे शंसितव्रतः।
तुल्यं फलमवाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः।। १०६.२१ ।।

न देववचनात्तात! न लोकवचनात्तथा।
मतिरुत्क्रमणीया ते प्रयागगमनम्प्रति।। १०६.२२ ।।

दशतीर्थसहस्राणि षष्टिकोट्यस्तथापराः।
तेषां सान्निध्यमत्रैव ततस्तु कुरुनन्दन!।। १०६.२३ ।।

या गतिर्योगयुक्तस्य सत्यस्थस्य मनीषिणः।
स गतिस्त्यजतः प्राणान् गङ्गायमुनसङ्गमे।। १०६.२४ ।।

न ते जीवन्ति लोकेऽस्मिन् तत्रतत्र युधिष्ठिर।
ये प्रयागं न सम्प्राप्ता स्त्रिषु लोकेषु वञ्चिताः।। १०६.२५ ।।

एवं द्रृष्ट्वा तु तत्तीर्थं प्रयागं परमम्पदम्।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो शशाङ्क इव राहुणा।। १०६.२६ ।।

कम्बलाश्वतरौ नागौ विपुले यमुनातटे।
तत्र स्नात्वा च पीत्वा च सर्वपापैः प्रमुच्यते।। १०६.२७ ।।

तत्र गत्वा च संस्थानं महादेवस्य धीमतः।
नरस्तारयते सर्वान् दशपूर्वान् दशापरान्।। १०७.२८ ।।

कृत्वाभिषेकन्तु नरः सोऽश्वमेधफलं लभेत्।
स्वर्गलोकमवाप्नोति यावदाभूतसंप्लवम्।। १०६.२९ ।।

पूर्वपार्श्वे तु गङ्गाया स्त्रिषु लोकेषु भारत।
कूपञ्चैव तु सामुद्रं प्रतिष्ठानञ्च विश्रुतम्।। १०६.३० ।।

ब्रह्मचारी जितक्रोधस्त्रिरात्रं यदि तिष्ठति।
सर्वपापविशुद्धात्मा सोऽश्वमेधफलं लभेत्।। १०६.३१ ।।

उत्तरेण प्रतिष्ठानात् भागीरथ्यास्तु पूर्वतः।
हंसप्रपतनं नाम तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।। १०६.३२ ।।

अश्वमेधफलं तस्मिन् स्नानमात्रेण भारत।
यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च तावत् स्वर्गे महीयते।। १०६.३३ ।।

उर्वशीरमणे पुण्ये विपुले हंसपाण्डुरे।
परित्यजति यः प्राणान् श्रृणु तस्यापि यत् फलम्।। १०६.३४ ।।

षष्टिवर्षसहस्राणि षष्टिवर्षशतानि च।
सेव्यते पितृभिः सार्द्धं स्वर्गलोके नराधिप!।। १०६.३५ ।।

उर्वशीन्तु सदा पश्येत् स्वर्गलोके नरोत्तम!।
पूज्यते सततं पुत्र! ऋषिगन्दर्वकिन्नरै।। १०६.३६ ।।

ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टः क्षीणकर्मा दिवश्च्युतः।
उर्वशीसद्रृशीनान्तु कन्यानां लभते शतम्।। १०६.३७ ।।

मध्ये नारीसहस्राणां बहूनाञ्च पतिर्भवेत्।
दशग्रामसहस्राणां भोक्ता भवति भूमिपः।। १०६.३८ ।।

काञ्चीनूपुरशब्देन सुप्ताऽसौ प्रतिबुद्ध्यते।
भुक्त्वातु विपुलान् भोगान् तत्तीर्थं भजते पुनः।। १०६.३९ ।।

शुक्लाम्बरधरो नित्यं नियतः संयतेन्द्रियः।
एकं कालन्तु भुञ्जानो मासं भूमिपतिर्भवेत्।। १०६.४० ।।

सुवर्णालङ्कृतानान्तु नारीणां लभते शतम्।
पृथिव्यामासमुद्रायां महाभूमिपतिर्भवेत्।। १०६.४१ ।।

धनधान्यसमायुक्तो दाता भवति नित्यशः।
भुक्त्वातु विपुलान् भोगान् तत्तीर्थं लभते पुनः।। १०६.४२ ।।

अथ सन्ध्यावटे रम्ये ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः।
उपवासी शुचिः सन्ध्यां ब्रह्मलोकमवाप्नुयात्।। १०६.४३ ।।

कोटितीर्थं समासाद्य यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।
कोटिवर्षसहस्राणां स्वर्गलोके महीयते।। १०६.४४ ।।

ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टः क्षीणकर्मा दिवश्च्युतः।
सुवर्णमणिमुक्ताढ्य कुले जायेत रूपवान्।। १०६.४५ ।।

ततो भोगवतीं गत्वा वासुकेरुत्तरेण तु।
दशाश्वमेधिकं नाम तीर्थं तत्रापरं भवेत्।। १०६.४६ ।।

कृताभिषेकस्तु नरः सोऽश्वमेधफलं लभेत्।
धनाढ्यो रूपवान् दक्षो दाता भवति धार्मिकः।। १०६.४७ ।।

चतुर्वेदेषु यत् पुण्यं यत् पुण्यं सत्यवादिषु।
अहिंसायान्तु यो धर्मो गमनादेव तत् फलम्।। १०६.४८ ।।

कुरुक्षेत्रसमा गङ्गा यत्र यत्रावगाह्यते।
कुरुक्षेत्राद्दशगुणा यत्र विन्ध्येन सङ्गता।। १०६.४९ ।।

यत्र गङ्गा महाभागा बहुतीर्था तपोधना।
सिद्धक्षेत्रं हि तज्ज्ञेयं नात्र कार्य्या विचारणा।। १०६.५० ।।

क्षितौ तारयते मर्त्यान्नागांस्तारयतेऽप्यधः।
दिवि तारयते देवांस्तेन त्रिपथगा स्मृता।। १०६.५१ ।।

यावदस्थीनि गङ्गायां तिष्ठन्ति हि शरीरिणः।
तावद्वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते।। १०६.५२ ।।

तीर्थानान्तु परं तीर्थं नदीनां तु महानदी।
मोक्षदा सर्वभूतानां महापातकिनामपि।। १०६.५३ ।।

सर्वत्र सुलभा गङ्गा त्रिषु स्थानेषु दुर्लभा।
गङ्गाद्वारे प्रयागे च गङ्गासागरसङ्गमे।।
तव स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्ते पुनर्भवाः।। १०६.५४ ।।

सर्वेषामेव भूतानां पापोपहतचेतसाम्।
गतिमन्विष्यमाणानां नास्ति गङ्गासमागतिः।। १०६.५५ ।।

पवित्राणां पवित्रञ्च मङ्गलानाञ्च मङ्गलम्।
महेश्वरशिरोभ्रष्टा सर्वपापहरा शुभा।। १०६.५६ ।।