मत्स्यपुराणम्/अध्यायः १००

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अत्र गम्यताम् : सञ्चरणम्, अन्वेषणम्
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विभूतिद्वादशीव्रतमाहात्म्यवर्णनम्।

नन्दिकेश्वर उवाच।
पुरा रथन्तरे कल्पे राजासीत् पुष्पवाहनः।
नाम्ना लोकेषु विख्यातस्तेजसा सूर्यसन्निभः।। १००.१ ।।

तपसा तस्य तुष्टेन चतुर्वक्त्रेण नारद!।
कमलं काञ्चनं दत्तं यथा कामगमं मुने।। १००.२ ।।

लोकैः समस्तैर्नगरवासिभिः सहितो नृपः।
द्वीपानि सुरलोकञ्च यथेष्टं व्यचरत् तदा।। १००.३ ।।

कल्पादौ सप्तमं द्वीपं तस्य पुष्करवासिनः।
लोके च पूजितं यस्मात् पुष्करद्वीपमुच्यते।। १००.४ ।।

देवेन ब्रह्मणा दत्तं यानमस्य यतोऽम्बुजम्।
पुष्पवाहनमित्याहुस्तस्मात्तं देवदानवाः।। १००.५ ।।

नागम्यमस्यास्ति जगत्त्रयेऽपि ब्रह्माम्बुजस्थस्य तपोऽनुभावात्।
पत्नी च तस्याप्रतिमा मुनीन्द्र! नानीसहस्रैरभितोऽभिनन्द्या।
नाम्ना च लावण्यवती बभूव सा पार्वतीवेष्टतमा भवस्य।। १००.६ ।।

तस्यात्मजा नामयुतम्बभूव धर्मात्मनामग्र्‌यधनुर्धराणाम्।
तदात्मनः सर्वमवेक्ष्य राजा मुहुर्मुर्हुर्विस्मय आससाद।
सोऽभ्यागतं वीक्ष्य मुनिप्रवीरं प्राचेतसं वाक्यमिदं बभाषे।। १००.७ ।।

राजोवाच।
कस्माद्विभूतिरमलामरमर्त्यपूज्या जाता च सा विजितामरसुन्दरीणाम्।
भार्या ममाल्पतपसा परितोषितेन दत्तं ममाम्बुजगृहञ्च मुनीन्द्र! धात्रा।। १००.८ ।।

यस्मिन् प्रविष्ठमपि कोटिशतं नृपाणाम् सामात्यकुञ्जररथौघजनावृतानाम्।
नो लक्ष्यते क्व गतमम्बरमध्य इन्दुस्तारागणैरिव गतः परितः स्फुरद्भिः।। १००.९ ।।

तस्मात् किमन्यजननीजठरोद्भवेन धर्मादिकं कृतमशेषफलाप्तिहेतुः।
भगवन् मयाऽथ तनयैरथवाऽनयापि भद्रं यदेतदखिलं कथय प्रचेतः।। १००.१० ।।

मुनिरभ्यधादथ भवान्तरितं समीक्ष्य पृथ्वीपतेः प्रसभमद्भुतहेतुवृत्तम्।
जन्मा भवत्तव तु लुब्धकुलेति घोरे जातस्त्वमप्यनुदिनं किल पापकारी।। १००.११ ।।

वपुरप्यभूत्तव पुनः परुषाङ्गसन्धिदुर्गन्धिसत्वभुजगावरणं समन्तात्।
न च ते सुहृन्नसुतबन्धुजनो न तातस्त्वाद्रृक् स्वसा न जननी च तदाभिशस्ता।।
अभिसङ्गतापरमभीष्टतमा विमुखी महीश! तव योषिदियम्।। १००.१२ ।।

अभूदनावृष्टिरतीव रौद्रा कदाचिदाहारनिमित्तमस्मिन्।
क्षुत्पीडितेनाथ तथा न किञ्चिदासादितं धान्यफलामिषञ्च।। १००.१३ ।।

अथामिदृष्टं महदम्बुजाढ्यं सरोवरं पङ्कपरीतरोधः।
पद्मान्यथादाय ततो बहूनि गतः पुरं वै दिशनामधेयम्।। १००.१४ ।।

तन्मौल्यलाभाय पुरं समस्तं भ्रान्तं त्वया शेषमहस्तदासीत्।
नैता न कश्चित् कमलेषु जातः श्रान्तो भृशं क्षुत्परिपीडितश्च।। १००.१५ ।।

उपविष्टस्त्वमेकस्मिन् सभार्यो भवनाङ्गणे।
अथ मङ्गंलशब्दश्च त्वया रात्रौ महाञ्छ्रृतः।। १००.१६ ।।

सभार्यस्तत्र गतवान् यत्रासौमङ्गलध्वनिः।
तत्र मण्डपमध्यस्था विष्णोरर्चावलोकिता।। १००.१७ ।।

वेश्यानंगवती नाम विभूतिद्वादशीव्रतम्।
समाप्तौ माघमासस्य लवणाचलमुत्तमम्।। १००.१८ ।।

निवेदयन्ति गुरवे शय्यां चोपस्करान्विताम्।
अलङ्कृत्यहृषीकेशं सौवर्णामरपादपम्।। १००.१९ ।।

तान्तु द्रृष्ट्वा ततस्ताभ्यामिदं च परिकीर्ततम्।
किमेभिः कमलैः कार्यं वरं विष्णुरलङ्‌कृतः।। १००.२० ।।

इति भक्तिस्तदा जाता दम्पत्योस्तु नराधिप!।
तत्प्रसंगात् समभ्यर्च्य केशवं लवणाचलम्।
शय्या च पुष्पप्रकरैः पूजिता भूश्च सर्वतः।। १००.२१ ।।

अथानंगवती तुष्टा तयोर्धनशतत्रयम्।
दातुं त्वामाददे साथ कलधौतशतत्रयम्।। १००.२२ ।।

न गृहीतं ततस्ताभ्यां बहुसत्वावलम्बनात्।
अनंगवत्या च पुनस्तयोरन्नं चतुर्विधम्।।
आनीय व्याहृतञ्चात्र बुज्यतामिति भूपते!।। १००.२३ ।।

ताभ्यान्तु तदपि त्यक्तं भोक्ष्या वो वै वरानने!
प्रसंगादुपवासेन तवाद्य सुखमावयोः।। १००.२४ ।।

जन्म प्रभृति पापिष्ठौ कुकर्माणौ द्रृढ़व्रते!
तत्प्रसंगात् तयोर्मध्ये धर्मलेशस्तु तेऽनघ!।। १००.२५ ।।

इति जागरणं ताभ्यां तत्प्रसंगाधनुष्ठितम्।
प्रभाते च तया दत्ता शय्या सलवणाचला।। १००.२६ ।।

ग्रामाश्च गुरवे भक्त्या विप्रेषु द्वादशैव तु।
वस्त्रालङ्कारसंयुक्ता गावश्च करकान्विताः।। १००.२७ ।।

भोजनञ्च सुहृन्मित्रदीनान्धकुपणैः समम्।
तच्च लुब्धकदाम्पत्यं पूजयित्वा विसर्जितम्।। १००.२८ ।।

स भवान् लुब्धको जातः सपत्नीको नृपेश्वरः।
पुष्करप्रकरात् तस्मात् केशवस्य च पूजनात्।। १००.२९ ।।

विनष्टाशेषपापस्य तव पुष्करमन्दिरम्।
तस्य सत्वस्य माहात्म्यादल्पेन तपसा नृप!।। १००.३० ।।

यथाकामगमं जातं लोकनाथश्चतुर्मुखः।
सन्तुष्टस्तव राजेन्द्र!ब्रह्मरूपी जनार्दनः।। १००.३१ ।।

साप्यनङ्गवती वेश्या कामदेवस्य साम्प्रतम्।
पत्नीसपत्नीसञ्जाता रत्याः प्रीतिरितिश्रुताः।।
लोकेष्वानन्दजननी सकलामरपूजिता।। १००.३२ ।।

तस्मादुत्सृज्य राजेन्द्र! पुष्करं तन्महीतले।
गङ्गातटं समाश्रित्य विभूतिद्वादशीव्रतम्।।
कुरु राजेन्द्र! निर्वाणमवश्यं समवाप्स्यसि।। १००.३३ ।।

नन्दिकेश्वर उवाच।
इत्युक्त्वा स मुनिर्ब्रह्मन्! तत्रैवान्तरधीयत।
राजा यतोक्तञ्च पुनरकरोत् पुष्पवाहनः।। १००.३४ ।।

इदमाचरतो ब्रह्मन्नखण्डव्रतमाचरेत्।
यथा कथञ्चित्कमलैर्द्वादशद्वादशीर्मुने।। १००.३५ ।।

कर्तव्याः शक्तितो देया विप्रेभ्यो दक्षिणाऽनघ!।
न वित्तशाठ्यं कर्वीत भक्त्या तुष्यति केशव।। १००.३६ ।।

इति कलुषविदारणं जनानामपि पठति श्रृणोति चाथ भक्त्या।
मतिमपि च ददाति देवलोके वसति स कोटिशतानि वत्सराणाम्।। १००.३७ ।।