मत्स्यपुराणम्/अध्यायः ७

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मरुद्‌गणोत्पत्तिकथने मदनद्वादशीव्रतकथनम्।

ऋषय ऊचुः।
दितेः पुत्राः कथं जाता मरुतो देववल्लभाः।
देवैर्जग्मुश्च सापत्नैः कस्मात्ते सख्यमुत्तमम्।। ७.१ ।।

सूत उवाच।
पुरा देवासुरे युद्धे हतेषु हरिणासुरैः।
पुत्रा पौत्रेषु शोकार्त्ता गत्वा भूलोकमुत्तमम्।। ७.२ ।।

स्यमन्तपञ्चके क्षेत्रे सरस्वत्यास्तटे शुभे।
भर्तुराराधनपरा तप उग्रं चचार ह।। ७.३ ।।

तदादितिर्दैत्यमाता ऋषिरूपेण सुव्रत!।
फलाहारा तपस्तेपे कृच्छ्रं चान्द्रायणादिकम्।। ७.४ ।।

यावद्वर्षशतं साग्रं जाता शोकसमाकुला।
ततः सा तपसा तप्ता वसिष्ठादीनपृच्छत।। ७.५ ।।

कथयन्तु भवन्तो मे पुत्रशोकविनाशनम्।
व्रतं सौभाग्यफलदमिह लोके परत्र च।। ७.६ ।।

ऊचु र्वसिष्ठप्रमुखा मदनद्वादशीव्रतम्।
यस्याः प्रभावादभवत् सुतशोक विवर्जिताः।। ७.७ ।।

श्रोतुमिच्छामहे सूत! मदनद्वादशी व्रतम्।
सुतानेकोनपञ्चाशद्येन लेभे दितिः पुनः।। ७.८ ।।

यद्वसिष्ठादिभिः पूर्वन्दितेः कथितमुत्तमम्।
विस्तरेण तदेवेदं मत्सकाशान्निबोधत।। ७.९ ।।

चैत्रमासि सिते पक्षे द्वादश्यां नियतव्रतः।
स्थापयेदव्रणं कुम्भं सित तण्डुल पूरितम्।। ७.१० ।।

नानाफलयुतं तद्वदिक्षुदण्डसमन्वितम्।
सितवस्त्रयुगच्छन्नं सितचन्दन चर्चितम्।। ७.११ ।।

नानाभक्ष्यसमोपेतं सहिरण्यन्तु शक्तितः।
ताम्रपात्रं गुड़ोपेतं तस्योपरि निवेशयेत्।। ७.१२

तस्मादुपरि कामन्तु कदलीदलसंस्थितम्।
कुर्य्याद् भार्याद्वयोपेतं रतिं तस्य च वामतः।। ७.१३ ।।

गन्धं धूपं ततो दद्याद् गीतं वाद्यञ्च कारयेत्।
तदभावे कथां कुर्य्यात् कामकेशवयोर्नरः।। ७.१४ ।।

कामनाम्नो हरेरर्चां स्नापयेद्‌ गन्धवारिणा।
शुक्लपुष्पाक्षततिलैरर्चयेन्‌ मधुसूदनम्।। ७.१५ ।।

कामाय पादौ संपूज्य जङ्घे सौभाग्यदाय च।
ऊरुस्मरायेति पुनर्मन्मथायेति वै कटिम्।। ७.१६ ।।

स्वच्छोदरायेत्युदरमनङ्गायेत्त्युरो हरेः।
मुखं पद्ममुखायेति बाहू पञ्चशराय वै।। ७.१७ ।।

नमः सर्व्वात्मने मौलिमर्चयेदिति केशवम्।
ततः प्रभाते तं कुम्भं ब्राह्मणाय निवेदयेत्।। ७.१८ ।।

ब्राह्मणान् भोजयेद् भक्त्या स्वयञ्चलवणादृते।
भुक्त्वा तु दक्षिणां दद्यादिमं मन्त्रमुदीरयेत्।। ७.२० ।।

अनेन विधिना सर्वं मासि मासि व्रतं चरेत्।
उपवासी त्रयोदश्यामर्चयेद्विष्णुमव्ययम्।। ७.२१ ।।

फलमेकञ्च संप्राश्य द्वादश्यां भूतले स्वपेत्।
ततस्त्रयोदशे मासि घृत धेनु समन्विताम्।। ७.२२ ।।

शय्यां दद्यादनङ्गाय सर्वापस्करसंयुताम्।
काञ्चनं कामदेवञ्च शुक्लां गाञ्च पयस्विनीम्।। ७.२३ ।।

घासोभिर्द्विजदाम्पत्यं पूज्यं शक्त्या विभूषणैः।
शय्या गन्धादिकं दद्यात्‌ प्रीयतामित्युदीरयेत्।। ७.२४ ।।

होमः शुक्लतिलैः कार्य्यः कामनामानि कीर्त्तयेत्।
गव्येन हविषा तद्वत् पायसेन च धर्म्मवित्।। ७.२५ ।।

विप्रेभ्यो भोजनं दद्याद्वित्तशाठ्यं विवर्जयेत्।
इक्षुदण्डानथो दद्यात् पुष्पमालाश्च शक्तितः।। ७.२६ ।।

यः कुर्याद्विधिनानेन मदनद्वादशीमिमाम्।
स सर्वपापनिर्मुक्तः प्राप्नोति हरिसाम्यताम्।। ७.२७ ।।

इह लोके वरान् पुत्रान् सौभाग्यफलमश्नुते।
यः स्मरः संस्मृतो विष्णुरानन्दात्मा महेश्वरः।। ७.२८ ।।

सुखार्थी कामरूपेण स्मरेदङ्गजमीश्वरम्।
एतच्छ्रुत्वा चकारासौ दितिः सर्वमशेषतः।। ७.२९ ।।

कश्यपो व्रतमाहात्म्यादगत्य परया मुदा।
चकार कर्कशां भूयो रूपयौवनशालिनीम्।। ७.३० ।।

वरैराच्छन्दयामास सातु वव्रे ततो वरम्।
पुत्रं शक्रवधार्थाय समर्थममितौजसम्।। ७.३१ ।।

वरयामि महात्मानं सर्वामरनिषूदनम्।
उवाच कश्यपो वाक्यमिन्द्रहन्तारमूर्जितम्।। ७.३२ ।।

प्रदास्याम्यहमेवेह किं त्वेतत्‌ क्रियतां शुभे।
आपस्तम्बः करोत्विष्टिं पुत्रीयामद्य सुव्रते।। ७.३३ ।।

विधास्यामि ततो गर्भमिन्द्रशत्रुनिषूदनम्।
आपस्तम्बस्ततश्चक्र पुत्रेष्टिन्द्रविणाधिकाम्।। ७.३४ ।।

इन्द्रशत्रुर्भवस्वेति जुहाव च सविस्तरम्।
देवा मुमुदिरे दैत्या विमुखा स्युश्च दानवाः।। ७.३५ ।।

दित्यां गर्भमथाधत्त कश्यपः प्राहतां पुनः।
त्वया यत्नो विधातव्यो ह्यस्मिन्‌ गर्भे वरानने।। ७.३६ ।।

सम्वत्सरशतं त्वेकमस्मिन्नेव तपोवने।
सन्ध्यायां नैव भोक्तव्यं गर्भिण्या वरवर्णिनि!।। ७.३७ ।।

न स्थातव्यं न गन्तव्यं वृक्षमूलेषु सर्वदा।
नोपस्करेषूपविशेन्मुसलोलूखलादिषु।। ७.३८ ।।

जले च नावगाहेत शून्यागारञ्च वर्जयेत्।
वल्मीकायां न तिष्ठेत नचोद्विग्नमना भवेत्।। ७.३९ ।।

विलिखेन्न नखैर्भूमिन्नाङ्गारेण न भस्मना।
न शयालुः सदा तिष्ठेद् व्यायामञ्च विवर्जयेत्।। ७.४० ।।

न तुषांगारभस्मास्थिकपालिषु समाविशेत्।
वर्जयेत्कलहं लोकैर्गात्रभंगं तथैव च।। ७.४१ ।।

न मुक्तकेशा तिष्ठेत नारुचिः स्यात् कदाचन।
न सयीतोत्तरशिरा नचापरशिराः क्वचित्।। ७.४२ ।।

न वस्त्रहीना नोद्विग्ना नचार्द्रावरणा सती।
नामंगल्यां वदेद्वाचं न च हास्याधिका भवेत्।। ७.४३ ।।

कुर्य्यात्तु गुरुशुश्रूषां नित्यं मांगल्य तत्परा।
सर्व्यौषधीभिः कोणेन वारिणा स्नानमाचरेत्।। ७.४४ ।।

कृतरक्षा सुभूषा च वास्तु पूजन तत्परा।
तिष्ठेत् प्रसन्नवदना भर्तुः प्रियहिते रता।। ७.४५ ।।

दानशीला तृतीयायां पार्वण्यं नक्तमाचरेत्।
इति वृत्ताभवेन्नारी विशेषेणतु गर्भिणी।। ७.४६ ।।

यस्तुतस्या भवेत् पुत्रः शीलायुर्वृद्धिसंयुतः।
अन्यथा गर्भपतनमवाप्नोति न संशयः।। ७.४७ ।।

तस्मात्‌ त्वमनयावृत्त्या गर्भेऽस्मिन्‌ यत्नमाचर।
स्वस्त्यस्तु ते गमिष्यामि तथेत्युक्तस्तया पुनः।। ७.४८ ।।

पश्यतां सर्वभूतानां तत्रैवान्तरधीयत।
ततः सा कश्यपोक्तेन विधिना समतिष्ठत।। ७.४९ ।।

अथ भीतस्तथेन्द्रोऽपि दितेः पार्श्वमुपागमत्।
विहायदेवसदनं तच्छुश्रूषुरवस्थितः।। ७.५० ।।

दितेश्छिद्रान्तरप्रेप्सुरभवत् पाकशासनः।
विनीतोऽभवदव्यग्रः प्रशान्तवदनो बहिः।। ७.५१ ।।

अजानन् किल तत्‌ कार्य्यमात्मनः शुभमाचरन्।
ततो वर्षशतान्ते सा न्यूनेतु दिवसैस्त्रिभिः।। ७.५२ ।।

मेने कृतार्थमात्मानं प्रीत्या विस्मितमानसा।
अकृत्वा पादयोः शौचं प्रसुप्ता मुक्तमूर्धजा।। ७.५३ ।।

निद्राभरसमाक्रान्ता दिवापरशिराः क्वचित्।
ततस्तदन्तरं लब्ध्वा प्रविष्टस्तु शचीपतिः।। ७.५४ ।।

वज्रेण सप्तधा चक्रे तं गर्भं त्रिदशाधिपः।
ततः सप्तैव ते जाताः कुमाराः सूर्य्यवर्चसः।। ७.५५ ।।

रुदन्तः सप्तवेताला निषिद्धा गिरिदारिणा।
भूयोऽपि रुदतश्चैतानेकैकं सप्तधा हरिः।। ७.५६ ।।

चिच्छेद वृत्रहन्ता वै पुनस्तदुदरे स्थितः।
एवमेकोनपञ्चाशद् भूत्वा ते रुरुदुर्भृशम्।।७.५७

इन्द्रो निवारयामास मा रोदीष्ट पुनः पुनः।
ततः सचिन्तयामास किमेतदितिवृत्रहा। ७.५८

धर्म्मस्य कस्य माहात्म्यात् पुनः सञ्जीवितास्त्वमी।
विदित्वा ध्यानयोगेन मदन द्वादशी फलम्।। ७.५९ ।।

नूनमेतत् परिणतमधुना कृष्णपूजनात्।
वज्रेणापि हताः सन्तो न विनाशमवाप्नुयुः।। ७.६० ।।

एकोऽप्यनेकतामाप यस्मादुदरगोप्यलम्।
अवध्या नूनमेते वै तस्माद्देवा भवन्त्विति।। ७.६१ ।।

यस्मान्मारुदतेत्युक्ता रुदन्तो गर्भसंस्थिताः।
मरुतो नाम ते नाम्ना भवन्तु मखभागिनः।। ७.६२ ।।

ततः प्रसाद्य देवेशः क्षमस्वेति दितिं पुनः।
अर्थशास्त्रं समास्थाय मयैतद्दुष्कृतं कृतम्।। ७.६३ ।।

कृत्वा मरुद्गणं देवैः समानममराधिपः।
दितिं विमानमारोप्य ससुतामनयद्दिवम्।। ७.६४ ।।

यज्ञभागभुजो जाता मरुतस्ते ततो द्विजाः।
न जग्मुरैक्यमसुरैरतस्ते सुरवल्लभाः।। ७.६५ ।।