मत्स्यपुराणम्/अध्यायः १४५

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मन्वन्तरस्थितिवर्णनम्।

सूत उवाच।
मन्वन्तराणि यानि स्युः कल्पे कल्पे चतुर्दश।
व्यतीतानागतानि स्युर्यानि मन्वन्तरेष्विह।। १४५.१ ।।

विस्तरेणानुपूर्व्याच्च स्थितिं वक्ष्ये युगे युगे।
तस्मिन् युगे च सम्भूतिर्यासां यावच्च जीवितम्।। १४५.२ ।।

युगमात्रन्तु जीवन्ति न्यूनं तस्माद्‌द्वयेन च।
चतुर्दशसु तावन्तो ज्ञेया मन्वन्तरेष्विह।। १४५.३ ।।

मनुष्याणां पशूनाञ्च पक्षिणां स्थावरैः सहः।
तेषामायुरुपक्रान्तं युगधर्मेषु सर्वशः।। १४५.४ ।।

तथैवायुः परिक्रान्तं युगधर्मेषु सर्वशः।
अस्थितिञ्च कलौ द्रृष्ट्वा भूतानां मानुषे तथा।। १४५.५ ।।

परमायुः शतन्त्वेतन्मानुषाणां कलौ स्मृतम्।
देवासुरमनुष्याश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः।। १४५.६ ।।

परिणाहोच्छ्रये तुल्या जायन्तेह कृते युगे।
षण्णवत्यङ्गुलोत्सेधो अष्टानां देवयोनिनाम्।। १४५.७ ।।

नवाङ्गुलप्रमाणेन निष्पन्नेन तथाष्टकम्।
एतत् स्वाभाविकं तेषां प्रमाणमधिकुर्वताम्।। १४५.८ ।।
मनुष्या वर्त्तमानास्तु युगसन्ध्यांशकेष्विह।
देवासुरप्रमाणन्तु सप्तसप्ताङ्गुलं क्रमात्।। १४५.९ ।।

चतुराशीतिकैश्चैव कलिजैरङ्गुलैः स्मृतम्।
आपादतलमस्तको नवतालो भवेत्तु यः।। १४५.१० ।।

संहृत्याजानुबाहुश्च दैवतैरभिपूज्यते।
गवाञ्च हस्तिनाञ्चैव महिषस्थावरात्मनाम्।। १४५.११ ।।

क्रमेणैतेन विज्ञेये ह्रासवृद्धी युगे युगे।
षट्‌सप्तत्यङ्गुलोत्सेधः पशुराककुदो भवेत्।। १४५.१२ ।।

अङ्गुलानामष्टशतमुत्सेधो हस्तिनां स्मृतः।
अङ्गुलानां सहस्रन्तु द्विचत्वारिंशदङ्गुलम्।। १४५.१३ ।।

शतार्द्धमङ्गुलानान्तु ह्युत्सेधः शाखिनाम्परः।
मानुषस्य शरीरस्य सन्निवेशस्तु याद्रृशः।। १४५.१४ ।।

तल्लक्षणन्तु देवानां द्रृश्यतेऽन्वयदर्शनात्।
बुद्ध्यातिशयसंयुक्तो देवानां काय उच्यते।। १४५.१५ ।।

तथा नातिशयश्चैव मानुषः काय उच्यते।
इत्येव हि परिक्रान्ता भावा ये दिव्यमानुषाः।। १४५.१६ ।।

पशूनां पक्षिणाञ्चैव स्थावराणां च सर्वशः।
गावोऽजाश्वाश्च विज्ञेया हस्तिनः पक्षिणो मृगाः।। १४५.१७ ।।

उपयुक्ताः क्रियास्वेते यज्ञियास्त्विह सर्वशः।
यथाक्रमोपभोगाश्च देवानां पशुमूर्त्तयः।। १४५.१८ ।।

तेषां रूपानुरूपैश्च प्रमाणैः स्थिरजङ्गमाः।
मनोज्ञैस्तत्र तैर्भागैः सुखिनो ह्युपपेदिरे।। १४५.१९ ।।

अथ सन्तः प्रवक्ष्यामि साधूनथ ततश्च वै।
ब्राह्मणाः श्रुतिशब्दाश्च देवानां पशुमूर्त्तयः।। १४५.२० ।।

संपूज्य ब्रह्मणा ह्यन्तस्तेन सन्तः प्रचक्षते।
सामान्येषु च धर्मेषु तथा वैशेषिकेषु च।। १४५.२१ ।।

ब्रह्मक्षत्रविशो युक्ताः श्रौतस्मार्तेन कर्म्मणा।
वर्णाश्रमेषु युक्तस्य सुखोदर्कस्य स्वर्गतौ।। १४५.२२ ।।

श्रौतस्मार्त्तो हि यो धर्मो ज्ञानधर्मः स उच्यते।
दिव्यानां साधनात् साधुर्ब्रह्मचारीगुरोर्हितः।। १४५.२३ ।।

कारणात् साधनाच्चैव गृहस्थः साधुरुच्यते।
तपसश्च तथाऽरण्ये साधुर्वैखानसः स्मृतः।। १४५.२४ ।।

यतमानो यतिः साधुः स्मृतो योगस्य साधनात्।
धर्मो धर्मगतिः प्रोक्तः शब्दो ह्येष क्रियात्मकः।। १४५.२५ ।।

कुशलाकुशलौ चैव धर्माधर्मौ ब्रवीत् प्रभुः।
अथ देवाश्च पितरः ऋषयश्चैव मानुषाः।। १४५.२६ ।।

अयं धर्मो ह्ययं नेति ब्रुवते मौनमूर्त्तिना।
धर्मेति धारणे धातुर्महत्वे चैव उच्यते।। १४५.२७ ।।

आधारणे महत्त्वे वा धर्म्मः स तु निरुच्यते।
तत्रेष्टप्रापको धर्म्म आचार्य्यैरुपदिश्यते।। १४५.२८ ।।

अधर्म्मश्चानिष्टफल आचार्य्यैर्नोपदिश्यते।
वृद्धाश्च लोलुपाश्चैव आत्मवन्तोह्यदाम्भिकाः।। १४५.२९ ।।

सम्यग्विनीतामृदवस्तानाचार्यान् प्रचक्षते।
धर्मज्ञैः विहितो धर्म्मः श्रौतस्मार्त्तो द्विजातिभिः।। १४५.३० ।।

दाराग्निहोत्रसम्बन्धमिज्या श्रौतस्य लक्षणम्।
स्मार्त्तो वर्णाश्रमाचारो यमैश्च नियमैर्युतः।। १४५.३१ ।।

पूर्वेभ्यो वेदयित्वाह श्रौतं सप्तर्षयोऽब्रुवन्।
ऋचो यजूंषि सामानि ब्रह्मणोऽङ्गानि वै श्रुतिः।। १४५.३२ ।।

मन्वन्तरस्यातीतस्य स्मृत्वा तन्मनुरब्रवीत्।
तस्मात् स्मार्तः स्मृतो धर्मो वर्णाश्रमविभागशः।। १४५.३३ ।।

एवं वै द्विविधो धर्म्मः शिष्टाचारः स उच्यते।
शिषेर्धातोश्च निष्ठन्ताच्छिष्ठशब्दं प्रचक्षते।। १४५.३४ ।।

मन्वन्तरेषु ये शिष्टा इह निष्ठान्तात्‌ धार्मिकाः।
मनुः सप्तर्षयश्चैव लोकसन्तानकारिणः।। १४५.३५ ।।

तिष्ठन्तीह च धर्मार्थं ताञ्छिष्टान्‌ सम्प्रचक्षते।
तैः शिष्टैश्चलितो धर्मः स्थाप्यते वै युगे युगे।। १४५.३६ ।।

त्रयीवार्त्ता दण्डनीतिः प्रजा वर्णाश्रमेप्सया।
शिष्टैराचर्य्यते यस्मात् पुनश्चैव मनुक्षये।। १४५.३७ ।।

पूर्वैः पूर्वैर्मतत्वाच्च शिष्टाचारः स शाश्वतः।
दानं सत्यं तपो लोको विद्येज्या पूजनन्दमः।। १४५.३८ ।।

अष्टौ तानि चरित्राणि शिष्टाचारस्य लक्षणम्।
शिष्टा यस्माच्चरन्त्येनं मनुः सप्तर्षयश्च ह।। १४५.३९ ।।

मन्वन्तरेषु सर्वेषु शिष्टाचारस्ततः स्मृतः।
विज्ञेयः श्रवणाच्छ्रौतः स्मरणात्स्मार्त्त उच्यते।। १४५.४० ।।

इज्या वेदात्मकः श्रौतः स्मार्त्तो वर्णाश्रमात्मकः।
प्रत्यङ्गानि प्रवक्ष्यामि धर्मस्येह तु लक्षणम्।। १४५.४१ ।।

द्रृष्टानुभूतमर्थञ्च यः पृष्टो न विगूहते।
यथा भूतप्रवादस्तु इत्येतद्धर्मलक्षणम्।। १४५.४२ ।।

ब्रह्मचर्य्यं तपो मौनं निराहारत्वमेव च।
इत्येतत् तपसो रूपं सुघोरन्तु दुरासदम्।। १४५.४३ ।।
पशूनां द्रव्यहविषामृक्‌सामयजुषां तथा।
ऋत्विजां दक्षिणायाश्च संयोगो यज्ञ उच्यते।। १४५.४४ ।।

आत्मवत्सर्वभूतेषु यो हिताय शुभाय च।
वर्त्तते सततं हृष्टः क्रिया श्रेष्ठा दया स्मृता।। १४५.४५ ।।

आक्रुष्टोऽभिहतो यस्तु नाक्रोशेत्प्रहरेदपि।
अदुष्टो वाङ्मनः कायैस्तितिक्षुः साक्षमास्मृता।। १४५.४६ ।।

स्वामिना रक्ष्यमाणानामुत्सृष्टानाञ्च सम्भ्रमे।
परस्वानामनादानमलोभ इति संज्ञितः।। १४५.४७ ।।

मैथुनस्यासमाचारो जल्पनाच्चिन्तनात्तथा।
निवृत्तिर्ब्रह्मचर्यञ्च तदेतच्छ्रमलक्षणम्।। १४५.४८ ।।

आत्मार्थे वा परार्थे वा इन्द्रियाणीह यस्य वै।
विषये न प्रवर्त्तन्ते दमस्यैतत्तु लक्षणम्।। १४५.४९ ।।

पञ्चात्मके यो विषये कारणे चाष्टलक्षणे।
तत्तद्‌गुणवते देयमित्येतद्दानलक्षणम्।। १४५.५१ ।।

श्रुतिस्मृतिभ्यां विहितो धर्मो वर्णाश्रमात्मकः।
शिष्टाचारप्रवृद्धश्च धर्मोऽयं साधुसम्मतः।। १४५.५२ ।।

अप्रद्वेष्यो ह्यनिष्टेषु इष्टं वै नाभिनन्दति।
प्रीतितापविषादानां विनिवृत्तिर्विरक्तता।। १४५.५३ ।।

सन्न्यासः कर्मणां न्यासः कृतानामकृतैः सह।
कुशलाकुशलाभ्यां तु प्रहाणं न्यास उच्यते।। १४५.५४ ।।

अव्यक्तादिविशेषान्त विकारेऽस्मिन्निवर्त्तते।
चेतनाचेतनं ज्ञात्वा ज्ञाने ज्ञानी स उच्यते।। १४५.५५ ।।

प्रत्यङ्गानि तु धर्मस्य चेत्येतल्लक्षणं स्मृतम्।
ऋषिभिर्धर्मतत्त्वज्ञैः पूर्वे स्वायम्भुवेऽन्तरे।। १४५.५६ ।।

अत्र वो वर्णयिष्यामि विधिं मन्वन्तरस्य तु।
तथैव चातुर्होत्रस्य चातुर्वर्ण्यस्य चैव हि।। १४५.५७ ।।

प्रति मन्वन्तरञ्चैव श्रुतिरन्या विधीयते।
ऋचो यजूंषि सामानि यथावत् प्रतिदैवतम्।। १४५.५८ ।।

विधिस्तोत्रं तथा होत्रं पूर्ववत् सम्प्रवर्त्तते।
द्रव्यस्तोत्रं गुणस्तोत्रं कर्म्मस्तोत्रं तथैव च।। १४५.५९ ।।

तथैवाभिजनस्तोत्रं स्तोत्रमेवं चतुर्विधम्।
मन्वन्तरेषु सर्वेषु यथा वेदाद्भवन्ति हि।। १४५.६० ।।

प्रवर्तयन्ति तेषां वै ब्रह्मस्तोत्रं पुनः पुनः।
एवं मन्त्रगुणानान्तु समुत्पत्तिश्चतुर्विधा।। १४५.६१ ।।

अथर्वऋग्यजुः साम्नां वेदेष्विह पृथक् पृथक्।
ऋषिणां तपतां तेषां तपः परमदुश्चरम्।। १४५.६२ ।।

मन्त्राः प्रादुर्भवन्त्यादौ पूर्वमन्वन्तरस्य ह।
असन्तोषाद्भयाद्‌दुः खान्मोहाच्छोकाच्च पञ्चधा।। १४५.६३ ।।

ऋषीणां तारका येन लक्षणेन यद्रृच्छया।
ऋषीणां याद्रृशत्वं हि तद्वक्ष्यामीह लक्षणाम्।। १४५.६४ ।।

अतीतानागतानाञ्च पञ्चधा ह्यार्षकं स्मृतम्।
तथा ऋषीणां वक्ष्यामि आर्षस्येह समुद्भवम्।। १४५.६५ ।।

गुणसाम्येन वर्त्तन्ते सर्वसम्प्रलये तदा।
अविभागेन वेदानामनिर्द्देश्यतमोमये।। १४५.६६ ।।

अबुद्धिपूर्वकं तद्वै चेतनार्थं प्रवर्तते।
तेनार्षं बुद्धिपूर्वन्तु चेतनेनाप्यधिष्ठितम्।। १४५.६७ ।।

प्रवर्तते यथा ते तु यथा मत्स्योदकावुभौ।
चेतनाधिकृतं सर्वं प्रावर्तत गुणात्मकम्।।
कार्यकारणभावेन तथा तस्य प्रवर्तते।। १४५.६८ ।।

विषयो विषयित्वञ्च तदा ह्यर्थपदात्मकौ।
कालेन प्रापणीयेन भेदाश्च कारणात्मकाः।। १४५.६९ ।।

सांसिद्धिकास्तदावृत्ताः क्रमेण महदादयः।
महतोऽसावहङ्कारस्तस्माद्‌भूतेन्द्रियाणि च।। १४५.७० ।।
भूतभेदाश्च भूतेभ्यो जज्ञिरे तु परस्परम्।
संसिद्धिकारणं कार्य्यं सद्य एव निवर्त्तते।। १४५.७१ ।।

यथोल्मुकात्तु विटपा एककालाद्भवन्ति हि।
तथा प्रवृत्ताः क्षेत्रज्ञाः कालेनैकेनकारणात्।। १४५.७२ ।।

यथान्धकारे खद्योतः सहसा सम्प्रद्रृश्यते।
तथा निवृत्तो ह्यव्यक्तः खद्योत इव सज्वलन्।। १४५.७३ ।।

स महात्मा शरीरस्थस्तत्रैवेह प्रवर्त्तते।
महतस्तमसः पारे वैलक्षण्याद्विभाव्यते।। १४५.७४ ।।

तत्रैव संस्थितो विद्वान् तपसान्त इति श्रुतम्।
बुद्धिर्विवर्द्धतस्तस्य प्रादुर्भूता चतुर्विधा।। १४५.७५ ।।

ज्ञानं वैराग्यमैश्वर्यं धर्मश्चेति चतुष्टयम्।
सांसिद्धिकान्यथैतानि अप्रतीतानि तस्य वै।। १४५.७६ ।।

महात्मनः शरीरस्य चैतन्यात् सिद्धिरुच्यते।
पुरि शेते यतः पूर्वं क्षेत्रज्ञानं तथापि च।। १४५.७७ ।।

पुरे शयनात् पुरुषः क्षेत्रज्ञानात् क्षेत्रज्ञ उच्यते।
यस्माद्धर्मात् प्रसूते हि तस्माद्वै धार्मिकस्तु सः।। १४५.७८ ।।

सांसिद्धिके शरीरे च बुद्‌ध्याव्यक्तस्तु चेतनः।
एवं विवृत्तः क्षेत्रज्ञः क्षेत्रं ह्यनभिसन्धितः।। १४५.७९ ।।
निवृत्तिसमकाले तु पुराणन्तदचेतनम्।
क्षेत्रज्ञेन परिज्ञातं भोग्योऽयं विषयो मम।। १४५.८० ।।

ऋषिर्हिंसागतौ धातुर्विद्या सत्यं तपः श्रुतम्।
एष सन्निचयो यस्माद् ब्रह्मणस्तु ततस्त्वृषिः।। १४५.८१ ।।

निवृत्तिसमकालाच्च बुद्ध्या व्यक्तऋषिस्त्वयम्।
ऋषते परमं यस्मात्परमर्षिस्ततः स्मृतः।। १४५.८२ ।।

गत्यर्थाद्रृषतेर्धातोर्नामनिर्वृत्तिकारणम्।
यस्मादेष स्वयम्भूतस्तस्माच्च ऋषिता मता।। १४५.८३ ।।

सेश्वराः स्वयमुद्‌भूता ब्रह्मणो मानसाः सुताः।
निवर्तमानैस्तैर्बुद्ध्या महान्‌ परिगतः परः।। १४५.८४ ।।

यस्माद्‌द्रृशपरत्वेन सह तस्मान्महर्षयः।
ईश्वराणां सुतास्तेषां मानसाश्चौरसाश्च वै।। १४५.८५ ।।

ऋषिस्तस्मात्परत्वेन भूतादिर्ऋषयस्ततः।
ऋषिपुत्रा ऋषीकास्तु मैथुनाद्‌ गर्भसम्भवाः।। १४५.८६ ।।

परत्वेन ऋषन्ते वै भूतादिनृषिकास्ततः।
ऋषिकाणां सुता ये तु विज्ञेया ऋषिपुत्रकाः।। १४५.८७ ।।

श्रुत्वा ऋषं परत्वेन श्रुतास्तस्माच्छ्रुतर्षयः।
अव्यक्तात्मा महात्मा वाहङ्कारात्मा तथैव च।। १४५.८८ ।।

भूतात्मा चेन्द्रियात्मा च तेषां तज्‌ज्ञानमुच्यते।
इत्येवमृषिजातिस्तु पञ्चधा नाम विश्रुता।। १४५.८९ ।।

भृगुर्मरीचिरत्रिश्च अङ्गिरः पुलहः क्रतुः।
मनुर्दक्षो वसिष्ठश्च पुलस्त्यश्चापि ते दश।। १४५.९० ।।

ब्रह्मणो मानसा ह्येते उत्पन्नाः स्वयमीश्वराः।
परत्वेनर्षयो यस्मान्मतास्तस्मान्महर्षयः।। १४५.९१ ।।

ईश्वराणां सुतास्त्वेषामृषयस्तान्निबोधत।
काव्यो बृहस्पतिश्चैव कश्यपश्च्यवनस्तथा।। १४५.९२ ।।

उतथ्यो वामदेवश्च अगस्त्यः कौशिकस्तथा।
कर्दमो वालखिल्याश्च विश्रवाः शक्तिवर्द्धनः।। १४५.९३ ।।

इत्येते ऋषयः प्रोक्तास्तपसा ऋषिताङ्गताः।
तेषां पुत्रानृषीकांस्तु गर्भोत्पन्नान्निबोधत।। १४५.९४ ।।

वत्सरो नग्नहूश्चैव भरद्वाजश्च वीर्यवान्।
ऋषिर्दीर्घतमा चैव बृहद्वक्षाः शरद्वतः।। १४५.९५ ।।

वाजिश्रवाः सुचिन्तश्च शावश्च सपराशरः।
श्रृङ्गी च शङ्खपाच्चैव राजा वै श्रवणस्तथा।। १४५.९६ ।।

इत्येते ऋषिकाः सर्वे सत्येन ऋषिताङ्गताः।
ईश्वरा ऋषयश्चैव ऋषीका ये च विश्रुताः।। १४५.९७ ।।

एवं मन्त्रकृतः सर्वे कृत्स्नशश्च निबोधत।
भृगुः काश्यपः प्राचेता दधीचो ह्यात्मवानपि।। १४५.९८ ।।

ऊर्वोऽथ जमदग्निश्च वेदः सारस्वतस्तथा।
आर्ष्टिषेणश्च्यवनश्च पीतहव्य स वेधसः।। १४५.९९ ।।

वैण्यः पृथुर्दिवोदासो ब्रह्मवान् गृत्सशौनकौ।
एकोनविंशतिर्ह्येते भृगवो मन्त्रकृत्तमाः।। १४५.१०० ।।

अङ्गिराश्चैव त्रितश्च भरद्वाजोऽथ लक्ष्मणः।
कृतवाचस्तथा गर्गः स्मृतिसंस्कृतिरेव च।। १४५.१०१ ।।

गुरुवीतश्च मान्धाता अम्वरीषस्तथैव च।
युवनाश्वः पुरुकुत्सः स्वश्रवस्तु सदस्यवान्।। १४५.१०२ ।।

अजमीढो स्वहार्यश्च ह्युत्कलः कविरेव च।
पृषदश्वो विरूपश्च काव्यश्चैवाथ मुद्गलः।। १४५.१०३ ।।

उतथ्यश्च शरद्वांश्च तथा वाजिश्रवा अपि।
अपस्यौषः सुचित्तिश्च वामदेवस्तथैव च।। १४५.१०४ ।।

ऋषिजो बृहच्छुल्कश्च ऋषिर्दीर्घतमा अपि।
कक्षीवांश्च त्रयस्त्रिंशत् स्मृता ह्यङ्गिरसां वराः।। १४५.१०५ ।।

एते मन्त्रकृतः सर्वे काश्यपांस्तु निबोधत।
कश्यपः सहवत्सारो नैध्रुवो नित्य एव च।। १४५.१०६ ।।

असितो देवलश्चैव षडेते ब्रह्मवादिनः।
अत्रिरर्द्धस्वनश्चैव शावास्योऽथ गविष्ठिरः।। १४५.१०७ ।।

कर्णकश्च ऋषिः सिद्धस्तथा पूर्वातिथिश्च यः।। १४५.१०८ ।।

इत्येते त्वत्रयः प्रोक्ता मन्तकृत् षण्महर्षयः ।
वसिष्ठश्चैव शक्तिश्च तृतीयश्च पराशरः।। १४५.१०९ ।।

ततस्तु इन्द्रप्रतिमः प़ञ्चमस्तु भरद्वसुः।
षष्ठस्तु मित्रावरुणः सप्तमः कुण्डिनस्तथा।। १४५.११० ।।

इत्येते सप्त विज्ञेया वासिष्ठा ब्रह्मवादिनः।
विश्वामित्रश्च गाधेयो देवरातस्तथा बलः।। १४५.१११ ।।

तथा विद्वन्मधुच्छन्दा ऋषिश्चान्योऽघमर्षणः।
अष्टको लोहितश्चैव भृतकीलश्चमाम्बुधिः।। १४५.११२ ।।

देवश्रवा देवरतः पुराणश्च धनञ्जयः।
शिशिरश्च महातेजाः शालङ्कायन एव च।। १४५.११३ ।।

त्रयोदशैते विज्ञेया ब्रह्मिष्ठाः कौशिका वराः।
अगस्त्योऽथ द्रृढद्युम्नो इन्द्रबाहुस्तथैव च।। १४५.११४ ।।

ब्रह्मिष्टागस्तयो ह्येते त्रयः परमकीर्त्तयः।
मनुर्वैवस्वतश्चैव ऐलो राजा पुरूरवाः।। १४५.११५ ।।

क्षत्रियाणां वरौ ह्येतौ विज्ञेयौ मन्त्रवादिनौ।
भलन्दकश्च वासाश्वः सङ्कीलश्चैव ते त्रयः।।१४५.११६ ।।

एते मन्त्रकृतो ज्ञेया वैश्यानां प्रवराः सदा।
इति द्विनवतिः प्रोक्ता मन्त्रा यैश्च बहिष्कृताः।। १४५.११७ ।।

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या ऋषिपुत्रान्निबोधत।
ऋषीकाणां सुता ज्ञेते ऋषिपुत्राः श्रुतर्षयः।। १४५.११८ ।।