मत्स्यपुराणम्/अध्यायः १४६

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अत्र गम्यताम् : सञ्चरणम्, अन्वेषणम्
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तारकाख्यानवर्णनम्।

ऋषय ऊचुः।
कथं मत्स्येन कथितस्तारकस्य वधो महान् ।
कस्मिन् काले विनिर्वृत्ता कथेयं सूतनन्दन!।। १४६.१ ।।

त्वन्मुखक्षीरसिन्धूत्था कथेयममृतात्मिका ।
कर्णाभ्यां पिबतां तृप्तिरस्माकं न प्रजायते।। १४६.२ ।।

इदं मुने! समाख्याहि महाबुद्धे! मनोगतम्।।
सूत उवाच।
पृष्टस्तु मनुना देवो मत्स्यरूपी जनार्दनः।। १४६.३ ।।

कथं शरवने जातो देवः षड्‌वदनो विभो!।
एतत्तु वचनं श्रुत्वा पार्थिवस्यामितौजसः।। १४६.४ ।।

उवाच भगवान् प्रीतो ब्रह्मसूनुर्महामतिम्।
मत्स्य उवाच।
वज्राङ्गो नाम दैत्योऽभूत् तस्य पुत्रस्तु तारकः।। १४६.५ ।।

सुरानुद्वासयामास पुरेभ्यः स महाबलः।
ततस्ते ब्रह्मणोऽभ्यासं जाग्मुर्भयनिपीडिताः।। १४६.६ ।।

भीताश्च त्रिदशात् द्रृष्ट्वा ब्रह्मा तेषामुवाच ह।
सन्त्यज्यध्वं भयं देवाः! शङ्करस्यात्मजः शिशुः।। १४६.७ ।।

तुहिनाचलदौहित्रस्तं हनिष्यति दानवम्।
ततः काले तु कस्मिंश्चिद्दृष्ट्वा वै शैलजां शिवः।। १४६.८ ।।

स्वरेतो वह्निवदने व्यसृजत्कारणान्तरे।
तत्प्राप्तं वह्निवदने रेतो देवानतर्पयत्।। १४६.९ ।।

विदार्य जठराण्येषामजीर्णं निर्गतं मुने!।
पतितं तत्सरिद्वारे ततस्तु शरकानने।। १४६.१० ।।

तस्मात्तु स समुद्‌भूतो गुहो दिनकरप्रभः।
स सप्तदिवसो बालो निजघ्ने तारकासुरम्।। १४६.११ ।।

एवं श्रुत्वा ततो वाक्यं तमूचुर्ऋषिसत्तमाः।
ऋषय ऊचुः।
अत्याश्चर्यवती रम्या कथेयं पापनाशिनी।। १४६.१२ ।।

विस्तरेण हि नो ब्रूहि यथातथ्येन श्रृण्वताम्।
वज्राङ्गो नाम दैत्येन्द्रः कस्य वंशोद्भवः पुरा।। १४६.१३ ।।

तस्याभूत्तारकः पुत्रः सुरप्रमथनो बली।
निर्मितः को वधे चाभूत्तस्यः दैत्येश्वरस्य तु।। १४६.१४ ।।

गुहजन्म तु कात्र्स्न्येन अस्माकं ब्रूहि मानद!।।
सूत उवाच।
मानसो ब्रह्मणः पुत्रो दक्षो नाम प्रजापतिः।। १४६.१५ ।।

षष्टिं सोऽजनयत्कान्या वैरिण्यामेव नः श्रुतम्।
ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश।। १४६.१६ ।।

सप्तविंशति सोमाय चतस्रोऽरिष्टनेमये।
द्वौ वौ बाहुकपुत्राय द्वौ चान्येऽङ्गिरसे तथा।। १४६.१७ ।।

द्वे कृशाश्वाय विदुषे प्रजापतिसुतः प्रभुः।
अदितिर्दितिर्दनुर्विश्वा ह्यरिष्टा सुरसा तथा।। १४६.१८ ।।

सुरभिर्विनता चैव ताम्रा क्रोधवशा इरा।
कर्द्रूर्मुनिश्च लोकस्य मातरो गोषु मातरः।। १४६.१९ ।।

तासां सकाशाल्लोकानां जङ्गमस्थावरात्मनाम्।
जन्म नाना प्रकाराणां ताभ्योऽन्ये देहिनः स्मृताः।। १४६.२० ।।

देवेन्द्रोपेन्द्रपूजाद्याः सर्वेते दितिजा मताः।
दितेः सकाशाल्लोकास्तु हिरण्यकशिपादयः।। १४६.२१ ।।

दानवाश्च दनोः पुत्रा गावश्च सुरभीसुताः।
पक्षिणो विनतापुत्रागरुड़प्रमुखाः सुताः।। १४६.२२ ।।

नागाः कद्रूसुता ज्ञेयाः सेषाश्चान्येऽपि जन्तवः।
त्रैलोक्यनाथं शक्रन्तु सर्वामरगणप्रभुम्।। १४६.२३ ।।

हिरण्यकशिपुश्चक्रे नीत्वा राज्यं महाबलः।
ततः केनापि कालेन हिरण्यकशिपादयः।। १४६.२४ ।।

निहता विष्णुना सङ्ख्ये शेषाश्चेन्द्रेण दानवाः।
ततो निहतपुत्राभूद्दितिर्वरमयाचत।। १४६.२५ ।।

भर्त्तारं कश्यपं देवं पुत्रमन्यं महाबलम्।
समरे शक्रहन्तारं स तस्या अददात् प्रभुः।। १४६.२६ ।।

नियमे वर्त हे देवि! सहस्रं शुचिमानसा।
वर्षाणां लप्स्यसे पुत्रमित्युक्ता सा तथा करोत्।। १४६.२७ ।।

वर्त्तन्त्या नियमे तस्याः सहस्राक्षः समाहितः।
उपासामाचरत्तस्याः सा चैनमन्वमन्यत।। १४६.२८ ।।

दशसम्वत्सरशेषस्य सहस्रस्य तदा दितिः।
उवाच शक्रं सुप्रीता वरदा तपसि स्थिता।। १४६.३० ।।

दितिरुवाच।
पुत्रोत्तीर्णव्रतां प्रायः विद्धि मां पाकशासन!।
भविष्यति च ते भ्राता तेन सार्द्धमिमां श्रियम्।। १४६.३० ।।

भुङ्‌क्ष्व वत्स! यथाकामं त्रैलोक्यं हतकण्टकम्।
इत्युक्त्वा निद्रयाविष्टा चरणाक्रान्तमूर्द्धजाः।। १४६.३१ ।।

स्वयं सुष्वापनियता भाविनोऽर्थस्य गौरवात्।
तत्तु रन्ध्रं समासाद्य जठरं पाकशासनः।। १४६.३२ ।।

चकार सप्तधा गर्भं कुलिशेन तु देवराट्।

एकैकन्तु पुनः खण्डं चकार मघवा ततः।। १४६.३३ ।।

सप्तधा सप्तधा कोपात् प्रबुध्यत ततोऽदितिः।
विबुध्योवाच मा शक्र! घातयेथाः प्रजां मम।। १४६.३४ ।।

तच्छ्रुत्वा निःर्गतः शक्रः स्थित्वा प्राञ्जलिरग्रतः।
उवाच वाक्यं सन्त्रस्तो मातुर्वै वदनेरितम्।। १४६.३५ ।।

शक्र उवाच।
दिवा स्वप्नपरा मातः! पादाक्रान्तशिरोरुहा।
सप्त सप्तभिरेवातस्तव गर्भः कृतो मया।। १४६.३६ ।।

एकोनपञ्चाशत्‌ कृता भागा वज्रेण ते सुताः।
दास्यामि तेषां स्थानानि दिवि दैवतपूजिते।। १४६.३७ ।।

इत्युक्ता सा तदा देवी सैवमस्त्वित्यभाषत।
पुनश्च देवी भर्तारमुवाचासितलोचना।। १४६.३८ ।।

पुत्रं प्रजापते! देहि शक्रजेतारमूर्जितम्।
यो नास्त्रशस्त्रैर्बध्यत्वं गच्छेत्‌ त्रिदिववासिनाम्।। १४६.३९ ।।

इत्युक्तः स तथोवाच तां पत्नीमतिदुःखिताम्।
दशवर्षसहस्राणि तपः कृत्वा तु लप्स्यसे।। १४६.४० ।।

वज्रसारमयैरङ्गैरच्छेद्यैरायसैर्द्रृढ़ैः।
वज्राङ्‌गो नाम पुत्रस्ते भविता पुत्रवत्सले!।। १४६.४१ ।।

सा तु लब्धवरा देवी जगाम तपसे वनम्।
दशवर्षसहस्राणि सा तपो घोरमाचरत्।। १४६.४२ ।।

तपसोऽन्ते भगवती जनयामास दुर्जयम्।
पुत्रमप्रतिकर्माणमजेयं वज्रदुश्छिदम्।। १४६.४३ ।।

सजातस्तत्र एवाभूत् सर्वशस्त्रास्त्रपारगः।
उवाच मातरं भक्त्या मातः! किङ्करवाण्यहम्।। १४६.४४ ।।

तमुवाच ततो हृष्टा दितिर्दैत्याधिपञ्च सा।
बहवो मे हताः पुत्राः सहस्राक्षेण पुत्रक!।। १४६.४५ ।।

तेषां त्वं प्रतिकर्तुं वै गच्छ शक्रवधाय च।
बाढ़मित्येव तामुक्त्वा जगाम त्रिदिवं बली।। १४६.४६ ।।

बद्‌ध्वा ततः सहस्राक्षं पाशेनामोघवर्चसाः।
मातुरन्तिकमागच्छद्व्याघ्रः क्षुद्रमृगं यथा।। १४६.४७ ।।

एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा कश्यपश्च महातपाः।
आगतो तत्र यत्रास्तां मातापुत्रावभीतकौ।। १४६.४८ ।।

द्रृष्ट्वा तु तमुवाचेदं ब्रह्मा कश्यप एव च।
मुञ्चैनं पुत्र! देवेन्द्रं किमनेन प्रयोजनम्।। १४६.४९ ।।

अपमानो वधः प्रोक्तः पुत्रसम्भावितस्य च।
अस्मद्वाक्येन यो मुक्तो विद्धि तं मृतमेव च।। १४६.५० ।।

परस्य गौरवान् मुक्तः शत्रूणां भारमावहेत्।
जीवन्नेव मृतो वत्स! दिवसे दिवसे स तु।। १४६.५१ ।।

महतां वशमायाते वैरं नैवास्ति वैरिणि।
एतच्छ्रुत्वा तु वज्राङ्गः प्रणतो वाक्यमब्रव्रीत्।। १४६.५२ ।।

न मे कृत्यमनेनास्ति मातुराज्ञा कृता मया।
त्वं सुरासुरनाथो वै मम च प्रपितामहः।। १४६.५३ ।।

करिष्ये त्वद्वचो देव! एष मुक्तः शतक्रतुः।
तपसे मे रतिर्देव! निर्विघ्नं चैव मे भवेत्।। १४६.५४ ।।

त्वत्प्रसादेन भगवन्नित्युक्त्वा विरराम सः।
तस्मिंस्तूष्णीं स्थिते दैत्ये प्रोवाचेदं पितामहः।। १४६.५५ ।।

ब्रह्मोवाच।
तपस्त्वं क्रूरमापन्नो अस्मच्छासनसंस्थितः।
अनया चित्तशुद्ध्या ते पर्याप्तं जन्मनः फलम्।। १४६.५६ ।।

इत्युक्त्वा पद्मजः कन्यां ससर्जायतलोचनाम्।
तामस्मै प्रददौ देवः पत्न्यर्थं पद्मसम्भवः।। १४६.५७ ।।

वराङ्गेति च नामास्याः कृत्वा यातः पितामहः।
वज्राङ्गोऽपि तया सार्द्धं जगाम तपसे वनम्।। १४६.५८ ।।

ऊद्‌र्ध्वं बाहुः स दैत्येन्द्रोऽचरदब्द सहस्रकम्।
कालं कमलपत्राक्षः शुद्ध बुद्धिर्महातपाः।। १४६.५९ ।।

तावच्चावाङ्‌मुखः कालं तावत् पञ्चाग्निमध्यगः।
निराहारो घोरतपाः तपोराशिरजायत।। १४६.६० ।।

ततः सोऽन्तर्जले चक्रे कालं वर्षसहस्रकम्।
जलान्तरं प्रविष्टस्य तस्य पत्नी महाव्रता।। १४६.६१ ।।

तस्यैव तीरे सरसस्तपस्यन्ती मौनमास्थिता।
निराहारा तपो घोरं प्रविवेश महाद्युतिः।। १४६.६२ ।।

तस्यां तपसि वर्त्तन्त्यामिन्द्रश्चक्रे विभीषिकाम्।
भूत्वा तु मर्कटस्तत्र तदाश्रमपदं महत्।। १४६.६३ ।।

चक्रे विलोलं निः शेषं तुम्वी घटकरण्डकम्।
ततस्तु मेषरूपेण कम्पं तस्याकरोन्महान्।। १४६.६४ ।।

ततो भुजङ्गरूपेण बध्वा च चरणद्वयम्।
अपकृष्टा ततो दूरं भ्रमंस्तस्या महीमिमाम्।। १४६.६५ ।।

तपो बलाढ्या सा तस्य न वध्यत्वं जगाम ह।
ततो गोमायुरूपेण तस्या दूषयदाश्रमम्।। १४६.६६ ।।

ततस्तु मेघरूपेण तस्याः क्लेदयदाश्रमम्।
भीषिकाभिरनेकाभिस्तां क्लिश्यन् पाकशासनः।। १४६.६७ ।।

विरराम यदा नैवं वज्राङ्गमहिषी तदा।
शैलस्य दुष्टतां मत्वा शापन्दातुं व्यवस्थिता।। १४६.६८ ।।

स शापाभिमुखां द्रृष्ट्वा शैलः पुरुषविग्रहः।
उवाच तां वरारोहां वराङ्गीं भीरुचेतनः।। १४६.६९ ।।

नाहं वराङ्गने! दुष्टः सेव्योऽहं सर्वदेहिनाम्।
विभ्रमन्तु करोत्येष रुषितः पाकशासनः।। १४६.७० ।।

एतस्मिन्नन्तरे जातः काल वर्षसहस्रिकः।
तस्मिन् गते तु भगवान् काले कमलसम्भवः।
तुष्टः प्रोवाच वज्राङ्गं तमागम्य जलाश्रयम्।। १४६.७१ ।।

ब्रह्मावाच।
ददामि सर्वकामांस्ते उत्तिष्ठ दितिनन्दन!।
एवमुक्तस्तदोत्थाय दैत्येन्द्रस्तपसां निधिः।।
उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं सर्वलोक पितामहम्।। १४६.७२ ।।

वज्राङ्ग उवाच।
आसुरो मास्तु मे भावः सन्तु लोका ममाक्षयाः।
तपस्येव रतिर्मेऽस्तु शरीरस्यास्तु वर्तनम्।। १४६.७३ ।।

एवमस्त्विति तन्देवो जगाम स्वकमालयम्।
वज्राङ्गोऽपि समाप्ते तु तपसि स्थिरसंयमः।। १४६.७४ ।।

आहारमिच्छन् भार्यां स्वान्न ददर्शाश्रमे स्वके।
क्षुधाविष्टः स शैलस्य गहनम्प्रविवेश ह।। १४६.७५ ।।

आदातुं फलमूलानि स च तस्मिन्‌ व्यलोकयत्।
रुदन्तीं तां प्रियां दीनां तनुप्रच्छादिताननाम्।। १४६.७६ ।।

तां विलोक्य स दैत्येन्द्रः प्रोवाच परिसान्त्वयन्।

वज्राङ्ग उवाच।
केन तेऽपकृतं भीरु! यमलोकं यियासुना।। १४६.७७ ।।
कम्वा कामं प्रयच्छामि शीघ्रं मे ब्रूहि मानिनि!।।