मत्स्यपुराणम्/अध्यायः ११९

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हिमवत्प्रदेशवर्णनम्।
सूत उवाच।
तत्र यौ तौ महाश्रृङ्गौ महावर्णौ महाहिमौ।
तृतीयन्तु तयोर्मध्ये श्रृङ्गमत्यन्तमुच्छ्रितम्।। ११९.१ ।।

नित्यातप्तशिलाजालं सदाभ्रपरिवर्जितम्।
तस्याधस्ताद्‌वृक्षगणो दिशा भागे च पश्चिमे।। ११९.२ ।।

जातीलतापरिक्षिप्तं विवरं चारुदर्शनम्।
द्रृष्टैव कौतुकाविष्टस्तं विवेश महीपतिः।। ११९.३ ।।

तमसा चातिनिबिडं नल्वमात्रं सुसङ्कटम्।
नल्वमात्रमतिक्रम्य स्वप्रभाभरणोज्ज्वलम्।। ११९.४ ।.

तमुच्छ्रितमथात्यन्तं गम्भीरं परिवर्तुलम्।
न तत्र सूर्य्यस्तपति न विराजति चन्द्रमाः।। ११९.५ ।।

तथापि दिवसाकारं प्रकाशं तदहर्निशम्।
क्रोशाधिकपरीमाणं सरसाच विराजितम्।। ११९.६ ।।

समन्तात्सरसस्तस्य शैललग्ना तु वेदिका।
सौवर्णे राजतैर्वृक्षैर्विद्रुमैरुपशोभितम्।। ११९.७ ।।

नानामाणिक्यकुसुमैः सुप्रभाभरणोज्ज्वलैः।
तस्मिन् सरसि पद्मानि पद्मरागच्छदानि तु।। ११९.८ ।।

वज्रकेसरजालानि सुगन्धीनि तथा युतम्।
पत्रैर्मरकतैर्नीलर्वैढूर्य्यस्य महीपते।। ११९.९ ।।

कर्णिकाश्च तथा तेषां जातरूपस्य पार्थिव।
तस्मिन् सरसि या भूमिर्न सा वज्रसमाकुला।। ११९.१० ।।

नानारत्नैरुपचिता जलजानां समाश्रया।
कपर्दिकानां शुक्तीनां शङ्कानाञ्च महीपते!।। ११९.११ ।।

मकराणाञ्च मत्स्यानां चण्डानां कच्छपैः सह।
तत्र मरकतखण्डानि वज्राणाञ्च सहस्रशः।। ११९.१२ ।।

पद्मरागेन्द्रनीलानि महानीलानि पार्थिव।
पुष्परागाणि सर्वाणि तथा कर्कोटकानि च।। ११९.१३ ।।

तुत्थकस्य तु खण्डानि तथाशेषस्य भागशः।
राजावर्तस्य मुख्यस्य रुचिराक्षस्य चाप्यथ।। ११९.१४ ।।

सूर्य्येन्दुकान्तयश्चैव नीलो वर्णान्तिमश्च यः।
ज्योतीरसस्य रम्यस्य स्यमन्तस्य च भागशः।। ११९.१५ ।।

सुरोरगवलक्षाणां स्फटिकस्य तथैव च।
गोमेदपित्तकानाञ्च धूलीमरकतस्य च।। ११९.१६ ।।

वैढूर्यसौगन्धिकयस्तथा राजमणेर्नृप।
वज्रस्यैव च मुख्यस्य तथा ब्रह्ममणेरपि।। ११९.१७ ।।

मुक्ताफलानि मुक्तानान्ताराविग्रहधारिणाम्।। ११९.१८ ।।

सुखोष्णञ्चैव तत्तोयं स्नानाच्छीतविनाशनम्।
वैढूर्यस्य शिलामध्ये सरसस्तस्य शोभना।। ११९.१९ ।।

प्रमाणेन तथा सा च द्वे च राजन्! धनुः शते।
चतुरस्रा तथा रम्या तपसा निर्मिताऽत्रिणा।। ११९.२० ।।

बिलद्वारसमो देशो यत्र तत्र हिरण्मयः।
प्रदेशः स तु राजेन्द्र! द्वीपे तस्मिन् मनोहरे।। ११९.२१ ।।

तथा पुष्करिणी रम्या तस्मिन् राजन्! शिलातले।
सुशीतामलपानीया जलजैश्च विराजिता।। ११९.२२ ।।

आकाशप्रतिमा राजन्! चतुरस्रा मनोहरा।
तस्यास्तदुदकं स्वादु लघुशीतं सुगन्धिकम्।। ११९.२३ ।।

न क्षिणोति यथा कण्ठं कुक्षिन्नापूरयत्यपि।
तृप्तिं विधत्ते परमां शरीरे च महत् सुखम्।। ११९.२४ ।।

मध्ये तु तस्याः प्रासादं निर्मितं तपसात्रिणा।
रुक्मसेतुप्रवेशान्तं सर्वरत्नमयं शुभम्।। ११९.२५ ।।

इन्द्रनीलमहास्तम्भं मरकतासक्तवेदिकम्।
वज्रांशुजालैः स्फुरितं रम्यं द्रृष्टिमनोरमम्।। ११९.२६ ।।

प्रासादे तत्र भगवान् देवदेवो जनार्दनः।
भोगिभोगावलीसुप्तः सर्वालङ्कारभूषितः।। ११९.२७ ।।

जान्वाचकुञ्चितस्त्वेको देवदेवस्य चक्रिणः।
फणीन्द्रसन्निविष्टोऽङ्‌घ्रिर्द्वितीयश्च तथानघ।। ११९.२८ ।।

लक्ष्म्युत्सङ्गगतोऽङ्घ्रिस्तु शेषभोगप्रशायिनः।
फणीन्द्रभोगसन्यस्तबाहुः केयूरभूषणः।। ११९.२९ ।।

अङ्गुलीपृष्ठविन्यस्तदेवशीर्षधरम्भुजम्।
एकं वै देवदेवस्य द्वितीयन्तु प्रसारितम्।। ११९.३० ।।

समाकुञ्चितजानुस्थमणिबन्धेन शोभितम्।
किञ्चिदाकुञ्चितं चैव नाभिदेशकरस्थितम्।। ११९.३१ ।।

तृतीयन्तु भुजं तस्य चतुर्थन्तु तथा श्रृणु।
आत्तसन्तानकुसुमं घ्राणदेशानुसर्पिणम्।। ११९.३२ ।।

लक्ष्म्या सवाह्यमानाङ्‌घ्रिः पद्मपत्रनिभेः करैः।
सन्तानमालामुकुटं हारकेयूरभूषितम्।। ११९.३३ ।।

भूषितञ्च तथा देवमङ्गदैरङ्गुलीयकैः।
फणीन्द्रफणविन्यस्तचारुरत्नशिरोज्ज्वलम्।। ११९.३४ ।।

अज्ञातवस्तुचरितं प्रतिष्ठितमथात्रिणा।
सिद्धानुपूज्यं सततं सन्तानकुसुमार्चितम्।। ११९.३५ ।।

दिव्यगन्धानुलिप्ताङ्गं दिव्यधूपेन धूपितम्।
सुरसैः सुफलैर्हृद्यैः सिद्धेरुपहृतैः सदा।। ११९.३६ ।।

शोभितोत्तमपार्श्वन्तं देवमुत्पलशीर्षकम्।
ततः सन्मुखमुद्वीक्ष्य ववन्दे स नराधिपः।। ११९.३७ ।।

जानुभ्यां शिरसा चैव गत्वा भूमिं यथाविधिः।
नाम्नां सहस्रेण तदा तुष्टाव मधुसूदनम्।। ११९.३८ ।।

प्रदक्षिणमथो चक्रे स तूत्थाय पुनः पुनः।
रम्यमायतनं द्रृष्ट्वा तत्रोवासाश्रमे पुनः।। ११९.३९ ।।

जलाद्‌बहिर्गुहां काञ्चिदाश्रित्य सुमनोहराम्।
तपश्चकार तत्रैव पूजयन्‌ मधुसूदनम्।। ११९.४० ।।

नानाविधैस्तथा पुष्पैः फलमूलैः सगोरसैः।
नित्यं त्रिषवणस्नायी वह्निपूजापरायणः।। ११९.४१ ।।

देववापीजलैः कुर्वन् सततं प्राणधारणम्।
सर्वाहारपरित्यागं कृत्वा तु मनुजेश्वरः।। ११९.४२ ।।

अनास्तृतगुहाशायी कालं नयति पार्थिवः।
त्यक्ताहारक्रियश्चैव केवलं तोयतो नृपः।। ११९.४३ ।।

न तस्य ग्लानिमायाति शरीरञ्च तदद्‌भुतम्।
एवं स राजा तपसि प्रसक्तः संपूजयन् देववरं सदैव।।
तत्राश्रमे कालमुवास कञ्चित् स्वर्गोपमे दुःखमविन्दमानः।। ११९.४४ ।।