मत्स्यपुराणम्/अध्यायः १०१

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नन्दिकेश्वर उवाच।
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि व्रतषष्टिमनुत्तमाम्।
रुद्रेणाभिहितां दिव्यां महापातकनाशिनीम्।। १०१.१ ।।

नक्तमब्दं चरित्वा तु गवा सार्द्धं कुटुम्बिने।
हैमं चक्रं त्रिशूलञ्च दद्यात् विप्राय वाससी।। १०१.२ ।।

शिवरूपस्ततोऽस्माभिः शिवलोके स मोदते।
एतेद्देवव्रतं नाम महापातकनाशनम्।। १०१.३ ।।

यस्त्वेकभक्तेन समां शिवं हैमवृषान्वितम्।
धेनुं तिलमयीं दद्यात् सपदं यातिशाङ्करम्
एतद्रुद्रव्रतं नाम पापशोकविनाशनम्।। १०१.४ ।।

यस्तु नीलोत्पलं हैमं शर्करापात्रसंयुतम्।
एकान्तरितनक्ताशी समान्ते वृषसंयुतम्।।
स वैष्णवं पदं याति लीलाव्रतमिदंस्मृतम्।। १०१.५ ।।

आषाढ़ादिचतुर्मासमभ्यङ्गं वर्जयेन्नरः।
भोजनोपस्करं दद्यात् स याति भवनं हरेः।।
जने प्रीतिकरं नॄणां प्रीतिव्रतमिहोच्यते।। १०१.६ ।।

वर्जयित्वा मधौ यस्तु दधिक्षीरघृतैक्षवम्।
दद्याद्वस्त्राणि सूक्ष्माणि रसपात्रैश्च संयुतम्।। १०१.७ ।।

सम्पूज्य विप्रमिथुनं गौरी मे प्रीयतामिति।
एतद्गौरीव्रतं नाम भवानी लोकदायकम्।। १०१.८ ।।

पुष्पादौ यस्त्रयोदश्यां कृत्वा नक्तं मधौ पुनः।
अशोकं काञ्चनं दत्त्वा इक्षुयुक्तं दशाङ्गुलम्।। १०१.९ ।।

विप्राय वस्त्रसंयुक्तं प्रद्युम्नः प्रीयतामिति।
कल्पं विष्णुपदे स्थित्वा विशोकः स्यात् पुनर्नरः।।
एतत् कामव्रतं नाम सदा शोकविनाशनम्।। १०१.१० ।।

आषाढ़ादिव्रतं यस्तु वर्जयेन्नखकर्तनम्।
वार्ताकं च चतुर्मासं मधुसर्पिर्घटान्वितम्।। १०१.११ ।।

कार्तिक्यां तत्पुनर्हैमं ब्राह्मणाय निवेदयेत्।
स रुद्रलोकमाप्नोति शिवव्रतमिदं स्मृतम्।। १०१.१२ ।।

वर्जयेद्यस्तु पुष्पाणि हेमन्त शिशिरावृतू।
पुष्पत्रयं च फाल्गुन्यां कृत्वा शक्त्या च काञ्चनम्।। १०१.१३ ।।

दद्याद्विकालवेलायां प्रीयेतां शिवकेशवौ।
दत्त्वा परम्पदं याति सौम्यव्रतमिदं स्मृतम्।। १०१.१४ ।।

फाल्गुनादितृतीयायां लवणं यस्तु वर्जयेत्।
समाप्ते शयनं दद्यात् गृहञ्चोपस्करान्वितम्।। १०१.१५ ।।

संपूज्य विप्रमिथुनं भवानी प्रीयतामिति।
गौरीलोके वसेत्कल्पं सौभाग्यव्रतमुच्यते।। १०१.१६ ।।

सन्ध्या मौनं ततः कृत्वा समान्ते घृतकुम्भकम्।
वस्त्रयुग्मं तिलान् घण्टां ब्राह्मणाय निवेदयेत्।। १०१.१७ ।।

सारस्वतं पदं याति पुनरावृत्तिदुर्लभम्।
एतत्सारस्वतं नाम रूपविद्या प्रदायकम्।। १०१.१८ ।।

लक्ष्मीमभ्यर्च्य पञ्चम्यामुपवासी भवेन्नरः।
समान्ते हेमकमलं दद्याद्धेनुसमन्वितम्।। १०१.१९ ।।

सवैष्णवं पदं याति लक्ष्मीवान् जन्मजन्मनि।
एतत् सम्पद्व्रतं नाम सदा पापविनाशनम्।। १०१.२० ।।

कृत्वोपलेपनं शम्भोरग्रतः केशवस्य च।
यावदब्दं पुनर्दद्याद्धेनुञ्जलघटान्विताम्।। १०१.२१ ।।

जन्मायुतं स राजा स्यात्ततः शिवपुरं व्रजेत्।
एतदायुर्व्रतं नाम सर्वकामप्रदायकम्।। १०१.२२ ।।

अश्वत्थं भास्करं गङ्गां प्रणम्यैकत्र वाग्यतः।
एकभक्तं नरः कुर्यादब्दमेकं विमत्सरः।। १०१.२३ ।।

व्रतान्ते विप्रमिथुनं पूज्यं धेनुत्रयान्वितम्।
वृक्षं हिरण्मयं दद्यात् सोऽश्वमेधफलं लभेत्।।
एतत् कीर्त्तिव्रतं नाम भूतिकीर्त्तिफलप्रदम्।। १०१.२४ ।।

घृतेन स्नपनं कुर्याच्छम्भोर्वा केशवस्य च।
अक्षताभिः सपुष्पाभिः कृत्वा गोमयमण्डलम्।। १०१.२५ ।।

तिलधेनुसमोपेतं समाप्ते हेमपङ्कजम्।
शुद्धमष्टाङ्गुलं दद्याच्छिवलोके महीयते।।
सामगाय ततश्चैतत् सामव्रतमिहोच्यते।। १०१.२६ ।।

नवम्यामेकभक्तन्तु कृत्वा कन्याश्च शक्तितः।
भोजयित्वा समां दद्याद्धैमकञ्चुकवाससी।। १०१.२७ ।।

हैमं सिंहञ्च विप्राय दत्त्वा शिवपदं व्रजेत्।
जन्मार्बुदं सुरूपः स्याच्छत्रुभिश्चापराजितः।।
एतद्वीरव्रतं नाम नारीणां च सुखप्रदम्।। १०१.२८ ।।

यावत् समाभवेद्यस्तु पञ्चदश्यां पयोव्रतः।
समान्ते श्राद्धकृद्दद्यात् पञ्च गास्तु पयस्विनीः।। १०१.२९ ।।

वासांसि च पिशङ्गानि जलकुम्भयुतानि च।
स याति वैष्णवं लोकं पितॄणान्तारयेच्छतम्।
कल्पान्ते राजराजः स्यात् पितृव्रतमिदं स्मृतम्।। १०१.३० ।।

चैत्रादिचतुरो मासाञ्जलं दद्यादयाचितम्।
व्रतान्ते मणिकं दद्यादन्नवस्त्रसमन्वितम्।। १०१.३१ ।।

तिलपात्रं हिरण्यञ्च ब्रह्मलोके महीयते।
कल्पान्ते भूपतिर्नूनमानन्दव्रतमुच्यते।। १०१.३२ ।।

पञ्चामृतेन स्नपनं कृत्वा संवत्सरं विभोः।
वत्सरान्ते पुनर्दद्याद्धेनुं पञ्चामृतेन हि।। १०१.३३ ।।

विप्राय दद्याच्छंङ्खञ्च स पदं याति शाङ्करम्।
राजा भवति कल्पान्ते घृतिव्रतमिदं स्मृतम्।। १०१.३४ ।।

वर्जयित्वा पुनर्मासमब्दान्ते गोपदो भवेत्।
तद्वद्धेममृगं दद्यात् सोऽश्वमेधफलं लभेत्।।
अहिंसाव्रतमित्युक्तं कल्पान्ते भूपतिर्भवेत्।। १०१.३५ ।।

माघमास्युषसि स्नानं कृत्वा दाम्पत्यमर्चयेत्।
भोजयित्वा यथाशक्त्या माल्यवस्त्रविभूषणैः।।
सूर्य्यलोके वसेत् कल्पं सूर्य्यव्रतमिदं स्मृतम्।। १०१.३६ ।।

आषाढादिचतुर्मासं प्रातः स्नायी भवेन्नरः।
विप्रेषु भोजनं दद्यात् कार्तिक्या गोप्रदोभवेत्।।
स वैष्णवं पदं याति विष्णुव्रतमिदं शुभम्।। १०१.३७ ।।

अयनादयनं यावद्वर्जयेत् पुष्पसर्पिषी।
तदन्ते पुष्पदामानि घृतधेन्वा सहैव तु।। १०१.३८ ।।

दत्त्वा शिवपदं गच्छेद् विप्राय घृतपायसम्।
एतच्छीलव्रतं नाम शीलारोग्यफलप्रदम्।। १०१.३९ ।।

सन्ध्या दीपप्रदो यस्तु समां तैलं विवर्जयेत्।
समान्ते दीपिकां दद्यात् चक्रशूके च काञ्चने।। १०१.४० ।।

वस्त्रयुग्मञ्च विप्राय तेजस्वी स भवेदिह।
रुद्रलोकमवाप्नोति दीप्तिव्रतमिदं स्मृतम्।। १०१.४१ ।।

कार्त्तिकादि तृतीयायां प्राश्य गोमूत्रयावकम्।
नक्तञ्चरेदब्दमेकमब्दान्ते गोप्रदो भवेत्।। १०१.४२ ।।

गौरीलोके वसेत्कल्पं ततो राजा भवेदिह।
एतद्रुद्रव्रतं नाम सदा कल्याणकारकम्।। १०१.४३ ।।

वर्जयेच्चैत्रमासे च यश्च गन्धानुलेपनम्।
शुक्तिं गन्धभृतां दत्त्वा विप्राय सितवाससी।।
वारुणं पदमाप्नोति द्रृढ़व्रतमिदं स्मृतम्।। १०१.४४ ।।

वैशाखे पुष्पलवणं वर्जयित्वाऽथगोप्रदः।
भूत्वा विष्णुपदे कल्पं स्थित्वा राजा भवेदिह
एतत्कान्तिव्रतं नाम कान्तिकीर्त्तिफलप्रदम्।। १०१.४५ ।।

ब्रह्माण्डं काञ्चनं कृत्वा तिलराशिसमन्वितम्।
त्र्यहं तिलप्रदो भूत्वा वह्निसंतर्प्य सद्विजम्।। १०१.४६ ।।

संपूज्य विप्रदाम्पत्यं माल्यवस्त्रविभूषणैः।
शक्तितस्त्रिपलादूद्र्ध्वं विश्वात्मा प्रीयतामिति।। १०१.४७ ।।

पुण्येऽह्नि दद्यात् सपरं ब्रह्मयात्यपुनर्भवम्।
एतद्ब्रह्मव्रतं नाम निर्वाणपददायकम्।। १०१.४८ ।।

यश्चोभयमुखीं दद्यात् प्रभूतकनकान्विताम्।
दिनं पयोव्रतस्तिष्ठेत् स याति परमम्पदम्।
एतद्धेनुव्रतं नाम पुनरावृत्तिदुर्लभम्।। १०१.४९ ।।

त्र्यहं पयोव्रते स्थित्वा काञ्चनं कल्पपादपम्।
पलादूद्र्ध्वं यथाशक्त्या तण्डुलैस्तूपसंयुतम्।।
दत्त्वा ब्रह्मपदं याति कल्पव्रतमिदं स्मृतम्।। १०१.५० ।।

मासोपवासी यो दद्याद्धेनुं विप्राय शोभनाम्।
सवैष्णवं पदं याति भीमव्रतमिदंस्मृतम्।। १०१.५१ ।।

दद्याद्विंशत्पलादूद्र्ध्वं महीं कृत्वा तु काञ्चनीम्।
दिनं पयोव्रतस्तिष्ठेद्रुद्रलोके महीयते।।
धराव्रतमिदं प्रोक्तं सप्तकल्पशतानुगम्।। १०१.५२ ।।

माघे मासेऽथवा चैत्रे गुड़धेनुप्रदो भवेत्।
गुड़व्रतस्तृतीयायां गौरीलोके महीयते।।
महाव्रतमिदं नाम परमानन्दकारकम्।। १०१.५३ ।।

पक्षोपवासी यो दद्याद् विप्राय कपिलाद्वयम्।
ब्रह्मलोकमवाप्नोति देवासुरसुपूजितम्।।
कल्पान्ते राजराजः स्यात्प्रभाव्रतमिदं स्मृतम्।। १०१.५४ ।।

वत्सरन्त्वेकभक्ताशी सभक्ष्यजलकुम्भदः।
शिवलोके वसेत्कल्पं प्राप्तिव्रतमिदं स्मृतम्।। १०१.५५ ।।

नक्ताशी चाष्टमीषु स्याद्वत्सरान्ते च धेनुदः।
पौरन्दरं पुरं याति सुगतिव्रतमुच्यते।। १०१.५६ ।।

विप्रायेन्धनदो यस्तु वर्षादिचतुरो ऋतून्।
घृतधेनुप्रदोऽन्ते च स परं ब्रह्म गच्छति।।
वैश्वानरव्रतं नाम सर्वपापविनाशनम्।। १०१.५७ ।।

एकादश्याञ्च नक्ताशी यश्चक्रं विनिवेदयेत्।
समान्ते वैष्णवं हैमं स विष्णोः पदमाप्नुयात्।।
एतत्कृष्णव्रतं नाम कल्पान्ते राज्यभाग्भवेत्।। १०१.५८ ।।

पायसाशी समान्ते तु दद्याद्विप्राय गोयुगम्।
लक्ष्मीलोकमवाप्नोति ह्येतद्देवीव्रतं स्मृतम्।। १०१.५९ ।।

सप्तम्यान्नक्तभुग्दद्यात्समान्ते गाम्पयस्विनीम्।
सूर्य्यलोकमवाप्नोति भानुव्रतमिदं स्मृतम्।। १०१.६० ।।

चतुर्थ्यां नक्तभुग्दद्यादब्दान्ते हेमवारणम्।
व्रतं वैनायकं नाम शिवलोकफलप्रदम्।। १०१.६१ ।।

महाफलानि यस्त्यक्त्वा चतुर्मासं द्विजातये।
हैमानि कार्त्तिके दद्याद्गोयुगेनसमन्वितम्।
एतत्फलव्रतं नाम विष्णुलोकफलप्रदम्।। १०१.६२ ।।

यश्चोपवासी सप्तम्यां समान्ते हैमपङ्कजम्।
गावश्च शक्तितो दद्यात् हेमान्नघटसंयुताः।।
एतत्सौरव्रतं नाम स्वर्गलोकफलप्रदम्।। १०१.६३ ।।

द्वादश द्वादशीर्यस्तु समाप्यो पोषणेन च।
गोवस्त्रकाञ्चनैर्विप्रान् पूजयेच्छक्तितो नरः।।
परमम्पदमवाप्नोति विष्णुव्रतमिदं स्मृतम्।। १०१.६४ ।।

कार्तिक्याञ्च वृषोत्सर्गं कृत्वा नक्तं समाचरेत्।
शैवम्पदमवाप्नोति वार्षव्रतमिदं स्मृतम्।। १०१.६५ ।।

कृच्छ्रान्ते गोप्रदः कुर्याद्भोजनं शक्तितः पदम्।
विप्राणां शाङ्करं याति प्राजापत्यमिदं व्रतम्।। १०१.६६ ।।

चतुर्दश्यान्तु नक्ताशी समान्ते गोधनप्रदः।
शैवम्पदमवाप्नोति त्रैयम्बकमिदं व्रतम्।। १०१.६७ ।।

सप्तरात्रोषितो दद्याद्घृतकुम्भं द्विजातये।
घृतव्रतमिदम्प्राहुर्ब्रह्मलोकफलप्रदम्।। १०१.६८ ।।

आकाशशायी वर्षासु धेनुमन्ते पयस्विनीम्।
शक्रलोके वसेन्नित्यमिन्द्रव्रतमिदं स्मृतम्।। १०१.६९ ।।

अनग्निपक्वमश्नाति तृतीयायान्तु यो नरः।
गान्दत्त्वा शिवमभ्येति पुनरावृत्तिदुर्लभम्।।
इह चानन्दकृत् पुंसां श्रेयोव्रतमिदं स्मृतम्।। १०१.७० ।।

हैमं पलद्वयादूद्र्ध्वं रथमश्वयुगान्वितम्।
ददन् कृतोपवासः स्याद्दिवि कल्पशतं वसेत्।
कल्पान्ते राजराजः स्यादश्वव्रतमिदं स्मृतम्।। १०१.७१ ।।

वत्सरन्त्वेकभक्ताशी सभक्ष्यजलकुम्भकः।
शिवलोके वसेत्कल्पं प्राप्तिव्रतमिदं स्मृतम्।। १०१.७२ ।।

नक्ताशी चाष्टमीषु स्याद्वत्सरान्ते च धेनुदः।
पौरन्दरं पुरं याति सुगतिव्रतमुच्यते।। १०१.७३ ।।

निशि कृत्वा जले वासं प्रभाते गोप्रदो भवेत्।
वारुणं लोकमाप्नोति वरुणव्रतमुच्यते।। १०१.७४ ।।

चान्द्रायणञ्च यः कुर्य्यात् हेमचन्द्रं निवेदयेत्।
चन्द्रव्रतमिदं प्रोक्तं चन्द्रलोकफलप्रदम्।। १०१.७५ ।।

ज्यैष्ठे पञ्चतपाः सायं हेमधेनुप्रदो दिवम्।
यात्यष्टमी चतुर्दश्यो रुद्रव्रतमिदं स्मृतम्।। १०१.७६ ।।

सकृद्वितानकं कुर्य्यात्तृतीयायां शिवालये।
समान्ते धेनुदो याति भवानी व्रतमुच्यते।। १०१.७७ ।।

माघे निश्यार्द्रवासाः स्यात् सप्तम्यां गोप्रदो भवेत्।
दिवि कल्पमुषित्वेह राजा स्यात् पवनं व्रतम्।। १०१.७८ ।।

त्रिरात्रो पोषितो दद्यात् फाल्गुन्यां भवनं शुभम्।
आदित्यलोकमाप्नोति धामव्रतमिदं स्मृतम्।। १०१.७९ ।।

त्रिसन्ध्यं पूज्य दाम्पत्यमुपवासी विभूषणैः।
अन्नं गावः समाप्नोति मोक्षमिन्द्रव्रतादिह।। १०१.८० ।।

दत्त्वा सितद्वितीयायामिन्दोर्लवणभाजनम्।
समान्ते गोप्रदो याति विप्राय शिवमन्दिरम्।
कल्पान्ते राजराजः स्यात् सोमव्रतमिदं स्मृतम्।। १०१.८१ ।।

प्रतिपद्येकभक्ताशी समान्ते कपिलाप्रदः।
वैश्वानरपदं याति शिवव्रतमिदं स्मृतम्।। १०१.८२ ।।

दशम्यामेकभक्ताशी समान्ते दशधेनुदः।
दिशश्च काञ्चनैर्दद्यात् ब्रह्माण्डाधिपतिर्भवेत्।
एतद्विश्वव्रतं नाम महापातकनाशनम्।। १०१.८३ ।।

यः पठेच्छृणुयाद्वापि व्रतषष्टिमनुत्तमाम्।
मन्वन्तरशतं सोऽपि गन्धर्वाधिपतिर्भवेत्।। १०१.८४ ।।

षष्टिव्रतं नारद! पुण्यमेतत्तवोदितं विश्वजनीनमन्यत्।
श्रोतुं तवेच्छा तदुदीरयामि प्रियेषु किं वा कथनीयमस्ति।। १०१.८५ ।।