मत्स्यपुराणम्/अध्यायः २५

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ययातिचरित्रम्।

ऋषय ऊचुः।
किमर्थं पौरवो वंशः श्रेष्ठत्वं प्राप भूतले।
ज्येष्ठस्यापि यदोर्वंशः किमर्थं ह्रीयते श्रिया।। २५.१ ।।

अन्यद् ययातिचरितं सूत! विस्तरतो वद।
यस्मात्तत्पुण्यमायुष्यमभिनन्द्यं सुरैरपि।। २५.२ ।।

सूत उवाच।
एतदेव पुरा पृष्टः शतानीकेन शौनकः।
पुण्यं पवित्रमायुष्यं ययाति चरितं महत्।। २५.३ ।।

शतानीक उवाच।
ययातिः पूर्वजोऽस्माकं दशामो यः प्रजापते।
कथं स शुक्रतनयां लेभे परमदुर्लभाम्।। २५.४ ।।

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण तपोधन।
आनुपूर्व्याच्च मे शंस पूरोर्वंश धरान्नृपान्।। २५.५ ।।

शौनक उवाच।
ययातिरासीद्राजर्षि र्देवराज समद्युतिः।
तं शुक्रवृषपर्वाणौ वव्राथे वै यथा पुरा।। २५.६ ।।

तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि पृच्छतो राजसत्तम।
देवयान्याश्च संयोगं ययातेर्नाहुषस्य च।। २५.७ ।।

सुराणमसुराणाञ्च समजायत वै मिथः।
ऐश्वर्यं प्रतिसङ्घर्षं स्त्रैलोक्ये सचराचरे।। २५.८ ।।

जिगीषया ततो देव बब्रुराङ्गिरसं मुनिम्।
पौरोहित्ये च यज्ञार्थे काव्यं तूशनसं परे।। २५.९ ।।

ब्राह्मणौ तावुभौ नित्यमन्योन्यं स्पर्धिनौ भृशम्।
तत्र देवा निजघ्नुर्यान् दानवान् युधिसङ्गतान्।। २५.१० ।।

तान् पुनर्जीवयामास काव्यो विद्या बलाश्रयात्।
ततस्ते पुनरुत्थाय योधयां चक्रिरे सुरान्।। २५.११ ।।

असुरास्तु निजघ्नुर्या सुरान् समरमूर्द्धनि।
न तान्‌ संजीवयामास बृहस्पतिरुदारधीः।। २५.१२ ।।

न हि वेदसतां विद्यां यां काव्यो वेद वीर्य्यवान्।
संजीवनीन्ततो देवा विषादमगमन् परम्।। २५.१३ ।।

अथ देवा भयोद्विग्नाः काव्यादुशनसस्तदा।
ऊचुः कचमुपागम्य ज्येष्ठं पुत्रं बृहस्पतेः।। २५.१४ ।।

भजमानान् भजस्वास्मान् कुरु साहाय्यमुत्तमम्।
यासौ विद्या निवसति ब्रह्मणे मिततेजसि।। २५.१५ ।।

शुक्रे तामाहर क्षिप्रं भागभाग्नो भविष्यसि।
वृषपर्वणः समीपेऽसौ शक्यो द्रष्टुं त्वया द्विजः।। २५.१६ ।।

रक्षते दानवांस्तत्र न स रक्षत्यदानवान्।
तमाराधयितुं शक्तो नान्यः कश्चिद्रृते त्वया।। २५.१७ ।।

देवयानी च दयिता सुता तस्य महात्मनः।
तामाराधयितुं शक्तो नान्यः कश्चन विद्यते।। २५.१८ ।।


शीलदाक्षिण्यमाधुर्यैराचारेण दमेन च।
देवयान्यान्तु तुष्टायां विद्यान्तां प्राप्स्यसि ध्रुवम्।। २५.१९ ।।

तदा हि प्रेषितो देवैः समीपे वृषपर्वणः।
तथेत्युक्त्वा तु स प्रायाद्‌ बृहस्पतिसुतः कचः।। २५.२० ।।

स गत्वा त्वरितो राजन्! देवैः संपूजितः कचः।
असुरेन्द्रपुरे शुक्रं प्रणम्येदमुवाच ह।। २५.२१ ।।

ऋषेरङ्गिरसः पौत्रं पुत्रं साक्षाद्‌ बृहस्पते।
नाम्ना कचेति विख्यातं शिष्यं गृह्णातु मां भवान्।। २५.२२ ।।

ब्रह्मचर्यं चरिष्यामि त्वय्यहं परमं गुरो।
अनुमन्यस्व मां ब्रह्मन्! सहस्र परिवत्सरान्।। २५.२३ ।।

शुक्र उवाच।
कच! सुस्वागतन्तेऽस्तु प्रतिगृह्णामि ते वचः।
अर्चयिष्येऽहमर्च्यं त्वामर्चितोऽस्तु बृहस्पतिः।। २५.२४ ।।

शौनक उवाच।
कचस्तु तं तथेत्युक्त्वा प्रतिजग्राह तद्‌ व्रतम्।
आदिष्टं कविपुत्रेण शुक्रेणोशनसावयम्।। २५.२५ ।।

व्रतञ्च व्रतकालञ्च यथोक्तं प्रत्यगृह्णत।
आराधयन्नुपाध्यायं देवयानीञ्च भारत।। २५.२६ ।।

संशीलयन् देवायनीं कन्यां संप्राप्तयौवनाम्।
पुष्पैः फलैः प्रेषणैश्च तोषयामास भार्गवीम्।। २५.२७ ।।

देवयान्यपि तं विप्रं नियमव्रतचारिणम्।
अनुयायन्ती ललना रहः पर्यचरत्तदा।। २५.२८ ।।

पञ्चवर्ष शतान्येवं कचस्य चरतो भृशम्।
तत्तत्तीव्रं व्रतं बुध्वा दानवास्तं ततः कचम्।। २५.२९ ।।

गारक्षन्तं वने द्रृष्ट्वा रहस्येनममर्षिताः।
जघ्नुर्बृहस्पते र्द्वेषान्निजरक्षार्थमेव च।। २५.३० ।।

हत्वा शालावृकेभ्यश्च प्रायच्छंस्तिलशः कृतम्।
ततो गावो निवृत्तास्ता अगोपाः खनिवेशनम्।। २५.३१ ।।

ता द्रृष्ट्वा रहितागास्तु कचेनाभ्यागता वनात्।
उवाच वचनं काले देवयान्यथ भार्गवम्।। २५.३२ ।।

हुतञ्चैवाग्निहोत्रन्ते सूर्यश्चास्तङ्गतः प्रभो।
अगोपाश्चागतागावः कचस्तात! न द्रृश्यते।। २५.३३ ।।

व्यक्तं हतो धृतो वापि कचस्तात! भविष्यति।
तं विना नैव जीवामि वचः सत्यं ब्रवीम्यहम्।। २५.३४ ।।

शुक्र उवाच।
अथैह्येहीति शब्देन मृतं सञ्जीवयाम्यहम्।
ततः स़ञ्जीवनीं विद्यां प्रयुक्त्वा कचमाह्वयत।। २५.३५ ।।

आहूतः प्राद्रवद् दूरात् कचः शुक्रं ननाम सः।
ततोऽहमितिचाचख्यौ राक्षसै र्धिषणात्मजः।। २५.३६ ।।

स पुनर्देवयान्युक्तः पुष्पाहारे यद्रृच्छया।
वनं ययौ कचो विप्रः पठन्‌ ब्रह्म च शाश्वतम्।। २५.३७ ।।

वने पुष्पाणि चिन्वन्तं दद्रृशुर्दानवाश्च तम्।
ततो द्वितीये तं हत्वा पुनः कृत्वा च चूर्णवत्।। २५.३८ ।।

प्रायच्छन् ब्राह्मणायैव सुरायामसुरास्तदा।। २५.३९ ।।

देवयान्यथ भुयोऽपि पितरं वाक्यमब्रवीत्।
पुष्पाहारप्रेषणकृत् कचस्तात! न द्रृश्यते।। २५.४० ।।

व्यक्तं हतो मृतोवापि कचस्तात! भविष्यति।
तं विना नैव जीवामि वचः सत्यं ब्रवीमि ते।। २५.४१ ।।

शुक्र उवाच।
बृहस्पतेः सुतः पुत्रि! कचः प्रेतगतिं गतः।
विद्यया जीवितोऽप्येवं हन्यते करवाणि किम्।। २५.४२ ।।

मैनं शुचो मा रुद देवयानि! न त्वाद्रृशी मर्त्यमनु प्रशोचेत्।
यस्यास्तव ब्रह्म च ब्राह्मणाश्च सेन्द्रा देवा वसवोऽश्विनौ च।। २५.४३ ।।

सुरद्विषश्चैव जगच्च सर्वमुपस्थितं मत्तपसः प्रभावात्।
अशक्योऽयं जीवयितुं द्विजातिः सञ्जीवितो यो वध्यते चैव भूयः।। २५.४४ ।।

देवयान्युवाच।
यस्याङ्गिरा वृद्धमतः पितामहो बृहस्पतिश्चापि पिता तपोनिधिः।
ऋषेः सुपुत्रन्तमथापि पौत्रं कथं न शोचेयमहन्नरुन्द्याम्।। २५.४५ ।।

स ब्रह्मचारी च तपोधनश्च सहोत्थितः कर्मसु चैव दक्षः।
कचस्य मार्गं प्रतिपत्स्ये न भोक्ष्ये प्रियो हि मे तात! कचोभिरूपः।। २५.४६ ।।

शौनक उवाच।
सत्वेवमुक्तो देवयान्या महर्षिः संरम्भेण व्याजहाराथ काव्यः।
असंशयं मामसुरा द्विषन्ति ये मे शिष्यानागतान् सूदयन्ति।। २५.४७ ।।

अब्राह्मणं कर्तुमिच्छन्ति रौद्रा एभिर्व्यर्थं प्रस्तुतो दानवैर्हि।
तत्कर्म्मणाप्यस्य भवेदिहान्तः कं ब्रह्महत्या न दहेदपीन्द्रम्।। २५.४८ ।।

स तेनपृष्टो विद्यया चोपहूतो शनैर्वाचं जठरे व्याजहार।
तमब्रवीत्केन चेहोपनीतो ममोदरे तिष्ठसि ब्रूहि वत्स!।। २५.४९ ।।

कच उवाच।
भवत्प्रसादान्न जहाति मां स्मृतिः सर्वं स्मरेयं यच्च यथा च वृत्तम्।
नत्वेवं स्यात्तपसः क्षमो मे ततः क्लेशं घोरतरं स्मरामि।। २५.५० ।।

असुरैः सुरायां भवतोऽस्मि दत्तो हत्वा दग्धा चूर्णयित्वा च काव्य!।
ब्राह्मीं मायान्त्वासुरीं त्वत्र माया त्वयि स्थिते कथमेवाभिबाधते।। २५.५१ ।।

शुक्र उवाच।
किं ते प्रियं करवाण्यद्य वत्से! विनैव मे जीवितं स्यात् कचस्य।
नान्यत्र कुक्षेर्मम भेदनाच्च द्रृश्येत् कचो मद्गतो देवयानि!।। २५.५२ ।।

देवयान्युवाच।
द्वौ मां शोकावग्निकल्पौ दहेतां कचस्य नाशस्तव चैवोपघातः।
कचस्य नाशे मम नास्ति शर्म तवोपघाते जीवितुं नास्मि शक्ता।। २५.५३ ।।

शुक्र उवाच।
संसिद्धरूपोऽसि बृहस्पतेः सुत! यत्त्वां भक्तं भजते देवयानी।
विद्यामिमां प्राप्नुहि जीवनीं त्वं न चेदिन्द्रः कचरूपी त्वमद्य।। २५.५४ ।।

न निवर्तेत पुनर्जीवन् कश्चिदन्यो ममोदरात्।
ब्राह्मणं वर्जयित्वैकं तस्माद्विद्यामवाप्नुहि।। २५.५५ ।।

पुत्रो भूत्वा निष्क्रमस्वोदरान् मे भित्वा कुक्षिञ्जीवय मां च तात!।
अवेक्ष्येऽथो धर्म्मवतीमवेक्षां गुरोः सकाशात्प्राप्य विद्यां स विद्याः ।। २५.५६ ।।

शौनक उवाच।
गुरोः सकाशात् समवाप्य विद्यां भित्वा कुक्षिन्निर्विचक्राम विप्रः।
प्रालेयाद्रेः शुक्लमुद्भिद्य श्रृङ्गं रात्र्यागमे पौर्णमास्यामिवेन्दुः।। २५.५७ ।।

द्रृष्ट्वा च तं पतितं वेदराशिमुत्थापयामास ततः कचोऽपि।
विद्यां सिद्धांन्तामवाप्याभिवाद्यः ततः कचस्तं गुरुमित्युवाच।। २५.५८ ।।

निधिं निधीनां वरदं वराणां येनाद्रियन्ते गुरुमर्चनीयम्।
प्रालेयाद्रि प्रोज्वलभालसंस्थं पापान् लोकांस्ते व्रजन्त्यप्रतिष्ठाः।। २५.५९ ।।

शौनक उवाच।
सुरापानाद्‌ वञ्चनात्प्रापयित्वा संज्ञा नाशञ्चेतसश्चापि घोरम्।
द्रृष्ट्वा कचञ्चापि तथाभिरूपं पीतं तथा सुरया मोहितेन।। २५.६० ।।

स मन्युरुत्थाय महानुभावस्तदोशना विप्र हितं चिकीर्षुः।
काव्यः स्वयं वाक्यमिदं जगाद सुरापानां प्रत्यसौ जातशङ्कः।। २५.६१ ।।

शुक्र उवाच।
यो ब्राह्मणोऽद्य प्रभृतीह कश्चिन्मोहात् सुरा पास्यति मन्दबुद्धिः।
अपेतधर्मा ब्रह्महा चैव स स्यादस्मिन् लोके गर्हितः स्यात्परे च।। २५.६२ ।।

मया चेमां विप्र धर्मोक्त सीमां मर्यादां वै स्थापितां सर्वलोके।
सन्तो विप्राः शुश्रुवांसो गुरूणां देवा दैत्याश्चोप श्रृण्वन्तु सर्वे।। २५.६३ ।।

शौनक उवाच।
इतीदमुक्त्वा स महाप्रभावस्तपोनिधीनां निधिरप्रमेयः।
तान्दानवांश्चैव निगूढ़बुद्धीनिदं समाहूय वचोऽभ्युवाच।। २५.६४ ।।

शुक्र उवाच।
आचक्षाणो दानवा बालिशास्थ शिष्यः कचोवत्स्यति मत्समीपे।
सञ्जीवनीं प्राप्यविद्यां ममायं तुल्यप्रभावो ब्राह्मणो ब्रह्मभूतः।। २५.६५ ।।

शौनक उवाच।
गुरोरुष्य सकाशे च दशवर्षशतानि सः।
अनुज्ञातः कचोगन्तुमियेष त्रिदशालयम्।। २५.६६ ।।