मत्स्यपुराणम्/अध्यायः १६४

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अत्र गम्यताम् : सञ्चरणम्, अन्वेषणम्
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मनुमत्स्यसंवादवर्णनम्।

ऋषय उचुः।
कथितं नरसिंहस्य माहात्म्यं विस्तरेण च।
पुनस्तस्यैव माहात्म्यमन्यद्विस्तरतो वद ।। १६४.१

पद्मरूपमभूदेतत् कथं हेममयं जगत्।
कथञ्च वैष्णवी सृष्टिः पद्ममध्येऽभवत्पुरा ।। १६४.२

सूत उवाच।
श्रुत्वा च नरसिंहस्य माहात्म्यं रविनन्दनः।
विस्मयोत्फुल्ल नयनः पुनः प्रप्रच्छ केशवम्।। १६४.३

मनुरुवाच।
कथं पाद्मे महाकल्पे तव पद्ममयं जगत्।
जलार्णवगतस्येह नाभौ जातं जनार्दन! ।। १६४.४

प्रभावात् पद्मनाभस्य स्वपतः सागराम्भसि।
पुष्करे च कथं भूता देवाः सर्षिगणाः पुरा ।। १६४.५

एनमाख्याहि निखिलं योगं योगविदाम्पते!।
श्रृण्वतस्तस्य मे कीर्तिः न तृप्तिरुपजायते ।। १६४.६

कियता चैव कालेन शेते वै पुरुषोत्तमः।
कियन्तं वा स्वपिति च कोऽस्य कालस्य सम्भवः ।। १६४.७

कियतावाथ कालेन ह्युत्तिष्ठति महायशाः।
कथञ्चोत्थाय भगवान् सृजते निखिलं जगत् ।। १६४.८

के प्रजापतयस्तावदासन् पूर्वं महामुने!।
कथं निर्मितवांश्चैव चित्रं लोकं सनातनम् ।। १६४.९

प्रथमेकार्णवे शून्ये नष्टस्थावरजङ्गमे।
दग्धदेवासुरनरे प्रनष्टोरगराक्षसे ।। १६४.१०

नष्टानिलानले लोके नष्टाकाशमहीतले।
केवलं गह्वरीभूते महाभूतविपर्यये ।। १६४.११

विभुर्महाभूतपतिर्महातेजा महाकृतिः।
आस्ते सुरवरश्रेष्ठो विधिमास्थाय योगवित् ।। १६४.१२

श्रृणुयां परया भक्त्या ब्रह्मन्नेतदशेषतः।
वक्तुमर्हसि धर्मिष्ठ!। यशो नारायणात्मकम् ।। १६४.१३

श्रद्धया चोपविष्टानां भगवान्!वक्तुमर्हसि।
मत्स्य उवाच।
नारायणस्य यशसः श्रवणे या तव स्पृहा ।। १६४.१४

तद्वंश्यान्वयभूतस्य न्याय्यं रविकुलर्षभ!।
श्रृणुष्वादिपुराणेषु वेदेभ्यश्च यथाश्रुतम् ।। १६४.१५

ब्राह्मणानाञ्च वदतां श्रुत्वा वै सुमहात्मनाम्।
यथा च तपसा दृष्ट्वा बृहस्पति समद्युतिः ।। १६४.१६

पराशरसुतः श्रीमान् गुरुर्द्वैपायनोऽब्रवीत्।
तत्तेऽहं कथयिष्यामि यथाशक्ति यथाश्रुति ।। १६४.१७

यद्विज्ञातुं मया शक्यमृषिमात्रेण सत्तमाः!।
कः समुत्सहते ज्ञातुं परं नारायणात्मकम् ।। १६४.१८

विश्वायनश्च यद्ब्रह्मा न देवयति तत्त्वतः।
तत्कर्म्म विश्वदेदानां तद्रहस्यं महर्षिणाम् ।। १६४.१९

तमीज्यं सर्वयज्ञानां तत्तत्त्वं सर्वदर्शिनाम्।
तदध्यात्मविदां चिन्त्यं नरकं न विकर्मिणाम् ।। १६४.२०

अधिदैवञ्च अध्यात्ममधियज्ञं सुसंज्ञितम्।
तद्भूतमधिभूतञ्च तत्परं परमर्षिणाम् ।। १६४.२१

स यज्ञो वेदनिर्दिष्टस्तत्तपः कवयो विदुः।
यः कर्ता कारको बुद्धिर्मनः क्षेत्रज्ञ एव च ।। १६४.२२

प्रणवः पुरुषः शास्ता एकश्चेति विभाव्यते।
प्राणः पञ्चविधश्चैव ध्रुव अक्षर एव च ।। १६४.२३

कालः शाकश्च यन्ता च द्रष्टा स्वाध्याय एव च।
उच्यते विविधैर्देवः स एवायं न तत्परम् ।। १६४.२४

स एव भगवान् सर्वं करोति विकरोति च।
सोऽस्मान् कारयते सर्वान् सोऽत्येति व्याकुलीकृतान् ।। १६४.२५

यतामहे तमेवाद्यन्तमेवेच्छाम निर्वृताः।
यो वक्ता यच्च वक्तव्यं यच्चाहं तद् ब्रवीमि वः ।। १६४.२६

श्रूयते यच्च वै श्राव्यं यच्चान्यत् परिजल्प्यते।
याः कथाश्चैव वर्तन्ते श्रुतयो वाथ तत्पराः ।। १६४.२७

विश्वं विश्वपतिर्यश्च स तु नारायणः स्मृतः।
यत् सत्यं यदमृतमक्षरं परं यत् यद्भूतं परममिदं च यद् भविष्यत् ।
यत् किञ्चिच्चरमचरं यदस्ति चान्यत् तत् सर्वं पुरुषवरः प्रभुः पुराणः ।। १६४.२८