मत्स्यपुराणम्/अध्यायः ४८

विकिस्रोतः तः
अत्र गम्यताम् : सञ्चरणम्, अन्वेषणम्
  1. अध्यायः १
  2. अध्यायः २
  3. अध्यायः ३
  4. अध्यायः ४
  5. अध्यायः ५
  6. अध्यायः ६
  7. अध्यायः ७
  8. अध्यायः ८
  9. अध्यायः ९
  10. अध्यायः १०
  11. अध्यायः ११
  12. अध्यायः १२
  13. अध्यायः १३
  14. अध्यायः १४
  15. अध्यायः १५
  16. अध्यायः १६
  17. अध्यायः १७
  18. अध्यायः १८
  19. अध्यायः १९
  20. अध्यायः २०
  21. अध्यायः २१
  22. अध्यायः २२
  23. अध्यायः २३
  24. अध्यायः २४
  25. अध्यायः २५
  26. अध्यायः २६
  27. अध्यायः २७
  28. अध्यायः २८
  29. अध्यायः २९
  30. अध्यायः ३०
  31. अध्यायः ३१
  32. अध्यायः ३२
  33. अध्यायः ३३
  34. अध्यायः ३४
  35. अध्यायः ३५
  36. अध्यायः ३६
  37. अध्यायः ३७
  38. अध्यायः ३८
  39. अध्यायः ३९
  40. अध्यायः ४०
  41. अध्यायः ४१
  42. अध्यायः ४२
  43. अध्यायः ४३
  44. अध्यायः ४४
  45. अध्यायः ४५
  46. अध्यायः ४६
  47. अध्यायः ४७
  48. अध्यायः ४८
  49. अध्यायः ४९
  50. अध्यायः ५०
  51. अध्यायः ५१
  52. अध्यायः ५२
  53. अध्यायः ५३
  54. अध्यायः ५४
  55. अध्यायः ५५
  56. अध्यायः ५६
  57. अध्यायः ५७
  58. अध्यायः ५८
  59. अध्यायः ५९
  60. अध्यायः ६०
  61. अध्यायः ६१
  62. अध्यायः ६२
  63. अध्यायः ६३
  64. अध्यायः ६४
  65. अध्यायः ६५
  66. अध्यायः ६६
  67. अध्यायः ६७
  68. अध्यायः ६८
  69. अध्यायः ६९
  70. अध्यायः ७०
  71. अध्यायः ७१
  72. अध्यायः ७२
  73. अध्यायः ७३
  74. अध्यायः ७४
  75. अध्यायः ७५
  76. अध्यायः ७६
  77. अध्यायः ७७
  78. अध्यायः ७८
  79. अध्यायः ७९
  80. अध्यायः ८०
  81. अध्यायः ८१
  82. अध्यायः ८२
  83. अध्यायः ८३
  84. अध्यायः ८४
  85. अध्यायः ८५
  86. अध्यायः ८६
  87. अध्यायः ८७
  88. अध्यायः ८८
  89. अध्यायः ८९
  90. अध्यायः ९०
  91. अध्यायः ९१
  92. अध्यायः ९२
  93. अध्यायः ९३
  94. अध्यायः ९४
  95. अध्यायः ९५
  96. अध्यायः ९६
  97. अध्यायः ९७
  98. अध्यायः ९८
  99. अध्यायः ९९
  100. अध्यायः १००
  101. अध्यायः १०१
  102. अध्यायः १०२
  103. अध्यायः १०३
  104. अध्यायः १०४
  105. अध्यायः १०५
  106. अध्यायः १०६
  107. अध्यायः १०७
  108. अध्यायः १०८
  109. अध्यायः १०९
  110. अध्यायः ११०
  111. अध्यायः १११
  112. अध्यायः ११२
  113. अध्यायः ११३
  114. अध्यायः ११४
  115. अध्यायः ११५
  116. अध्यायः ११६
  117. अध्यायः ११७
  118. अध्यायः ११८
  119. अध्यायः ११९
  120. अध्यायः १२०
  121. अध्यायः १२१
  122. अध्यायः १२२
  123. अध्यायः १२३
  124. अध्यायः १२४
  125. अध्यायः १२५
  126. अध्यायः १२६
  127. अध्यायः १२७
  128. अध्यायः १२८
  129. अध्यायः १२९
  130. अध्यायः १३०
  131. अध्यायः १३१
  132. अध्यायः १३२
  133. अध्यायः १३३
  134. अध्यायः १३४
  135. अध्यायः १३५
  136. अध्यायः १३६
  137. अध्यायः १३७
  138. अध्यायः १३८
  139. अध्यायः १३९
  140. अध्यायः १४०
  141. अध्यायः १४१
  142. अध्यायः १४२
  143. अध्यायः १४३
  144. अध्यायः १४४
  145. अध्यायः १४५
  146. अध्यायः १४६
  147. अध्यायः १४७
  148. अध्यायः १४८
  149. अध्यायः १४९
  150. अध्यायः १५०
  151. अध्यायः १५१
  152. अध्यायः १५२
  153. अध्यायः १५३
  154. अध्यायः १५४
  155. अध्यायः १५५
  156. अध्यायः १५६
  157. अध्यायः १५७
  158. अध्यायः १५८
  159. अध्यायः १५९
  160. अध्यायः १६०
  161. अध्यायः १६१
  162. अध्यायः १६२
  163. अध्यायः १६३
  164. अध्यायः १६४
  165. अध्यायः १६५
  166. अध्यायः १६६
  167. अध्यायः १६७
  168. अध्यायः १६८
  169. अध्यायः १६९
  170. अध्यायः १७०
  171. अध्यायः १७१
  172. अध्यायः १७२
  173. अध्यायः १७३
  174. अध्यायः १७४
  175. अध्यायः १७५
  176. अध्यायः १७६
  177. अध्यायः १७७
  178. अध्यायः १७८
  179. अध्यायः १७९
  180. अध्यायः १८०
  181. अध्यायः १८१
  182. अध्यायः १८२
  183. अध्यायः १८३
  184. अध्यायः १८४
  185. अध्यायः १८५
  186. अध्यायः १८६
  187. अध्यायः १८७
  188. अध्यायः १८८
  189. अध्यायः १८९
  190. अध्यायः १९०
  191. अध्यायः १९१
  192. अध्यायः १९२
  193. अध्यायः १९३
  194. अध्यायः १९४
  195. अध्यायः १९५
  196. अध्यायः १९६
  197. अध्यायः १९७
  198. अध्यायः १९८
  199. अध्यायः १९९
  200. अध्यायः २००
  201. अध्यायः २०१
  202. अध्यायः २०२
  203. अध्यायः २०३
  204. अध्यायः २०४
  205. अध्यायः २०५
  206. अध्यायः २०६
  207. अध्यायः २०७
  208. अध्यायः २०८
  209. अध्यायः २०९
  210. अध्यायः २१०
  211. अध्यायः २११
  212. अध्यायः २१२
  213. अध्यायः २१३
  214. अध्यायः २१४
  215. अध्यायः २१५
  216. अध्यायः २१६
  217. अध्यायः २१७
  218. अध्यायः २१८
  219. अध्यायः २१९
  220. अध्यायः २२०
  221. अध्यायः २२१
  222. अध्यायः २२२
  223. अध्यायः २२३
  224. अध्यायः २२४
  225. अध्यायः २२५
  226. अध्यायः २२६
  227. अध्यायः २२७
  228. अध्यायः २२८
  229. अध्यायः २२९
  230. अध्यायः २३०
  231. अध्यायः २३१
  232. अध्यायः २३२
  233. अध्यायः २३३
  234. अध्यायः २३४
  235. अध्यायः २३५
  236. अध्यायः २३६
  237. अध्यायः २३७
  238. अध्यायः २३८
  239. अध्यायः २३९
  240. अध्यायः २४०
  241. अध्यायः २४१
  242. अध्यायः २४२
  243. अध्यायः २४३
  244. अध्यायः २४४
  245. अध्यायः २४५
  246. अध्यायः २४६
  247. अध्यायः २४७
  248. अध्यायः २४८
  249. अध्यायः २४९
  250. अध्यायः २५०
  251. अध्यायः २५१
  252. अध्यायः २५२
  253. अध्यायः २५३
  254. अध्यायः २५४
  255. अध्यायः २५५
  256. अध्यायः २५६
  257. अध्यायः २५७
  258. अध्यायः २५८
  259. अध्यायः २५९
  260. अध्यायः २६०
  261. अध्यायः २६१
  262. अध्यायः २६२
  263. अध्यायः २६३
  264. अध्यायः २६४
  265. अध्यायः २६५
  266. अध्यायः २६६
  267. अध्यायः २६७
  268. अध्यायः २६८
  269. अध्यायः २६९
  270. अध्यायः २७०
  271. अध्यायः २७१
  272. अध्यायः २७२
  273. अध्यायः २७३
  274. अध्यायः २७४
  275. अध्यायः २७५
  276. अध्यायः २७६
  277. अध्यायः २७७
  278. अध्यायः २७८
  279. अध्यायः २७९
  280. अध्यायः २८०
  281. अध्यायः २८१
  282. अध्यायः २८२
  283. अध्यायः २८३
  284. अध्यायः २८४
  285. अध्यायः २८५
  286. अध्यायः २८६
  287. अध्यायः २८७
  288. अध्यायः २८८
  289. अध्यायः २८९
  290. अध्यायः २९०
  291. अध्यायः २९१


ययातिपुत्राणामन्वयवर्णनम्।

सूत उवाच।
तुर्वसोस्तु सुतो गर्भो गोभानुस्तस्य चात्मजः।
गो भानोस्तु सुतो वीर स्त्रिसारिरपराजितः।। ४८.१ ।।

करन्धमस्तु त्रैसारिर्भरतस्तस्य चात्मजः।
दुष्यन्तः पौरवस्यापि तस्य पुत्रो ह्यकल्मषः।। ४८.२ ।।

एवं ययाति शापेन जरा संक्रमणे पुरा।
तुर्वसोः पौरवं वंशं प्रविवेश पुरा किलः।। ४८.३ ।।

दुष्यन्तस्य तु दायादो वरूथो नाम पार्थिवः।
वरूथात्तु तथा वीरः सन्धानस्तस्य चात्मजः।। ४८.४ ।।

पाण्ड्यश्च केरलश्चैव चोलः कर्णस्तथैव च।
तेषां जनपदास्फीताः पाण्ड्याश्चोलाः सकेरलाः।। ४८.५ ।।

द्रुह्यस्य तनयौ शूरौ सेतुः केतुस्तथैव च।
सेतु पुत्रः शरद्वांस्तु गन्दारस्तस्य चात्मजः।। ४८.६ ।।

ख्यायते यस्य नाम्नासौ गन्धारविषयो महान्।
आरट्टदेशजास्तस्य तुरगा वाजिनां वराः।। ४८.७ ।।

गन्धारपुत्रो धर्म्मस्तु घृतस्तस्यात्मजोऽभवत्।
घृताच्च विदुषो जज्ञे प्रचेतास्तस्य चात्मजः।। ४८.८ ।।

प्रचेतसः पुत्रशतं राजानः सर्व एव ते।
म्लेच्छराष्ट्राधिपाः सर्वे उदीचीं दिशमाश्रिताः।। ४८.९ ।।

अनोश्चैव सुता वीरास्त्रयः परमधार्मिकाः।
सभानरश्चाक्षुषश्च परमेषु तथैव च।। ४८.१० ।।

सभानरस्य पुत्रस्तु विद्वान् कोलाहलो नृपः।
कोलाहलस्य धर्मात्मा सञ्जयो नाम विश्रुतः।। ४८.११ ।।

सञ्जयस्याभवत् पुत्रो वीरो नाम पुरञ्जयः।
जनमेजयो महाराज! पुरञ्जय सुतोऽभवत्।। ४८.१२ ।।

जनमेजयस्य राजर्षे महाशालोऽभवत् सुतः।
आसीदिन्द्रसमो राजा प्रतिष्ठित यशाभवत्।। ४८.१३ ।।

महामना) सुतस्तस्य महाशालस्य धार्मिकः।
सप्तद्वीपेश्वरो जज्ञे चक्रवर्त्ती महामनाः।। ४८.१४ ।।

महामनास्तु द्वौ पुत्रौ जनयामास विश्रुतौ।
उशीनरञ्च धर्मज्ञं तितिक्षुं चैव तावुभौ।। ४८.१५ ।।

उशीनरस्य पुत्रस्तु पञ्चराजर्षि सम्भवाः।
भृशा कृशानवा दर्शा या च देवी द्रृषद्वती।। ४८.१६ ।।

उशीनरस्य पुत्रास्तु तासु जाताः कुलोद्वहाः।
तपसा ते तु महता जाता वृद्धस्य धार्मिकाः।। ४८.१७ ।।

भृशायास्तु नृगः पुत्रो नवाया नव एव च।
कृशायास्तु कृशो जज्ञे दर्शायाः सुव्रतोऽभवत्।।
द्रृषद्वत्याः सुतश्चापि शिबिरौशीनरो नृपः।। ४८.१८ ।।

शिवेस्तु शिवयः पुत्राश्चत्वारो लोकविश्रुताः।
पृथुदर्भः सुवीरश्च केकयो भद्रकस्तथा।। ४८.१९ ।।

तेषां जनपदाः स्फीताः केकयाभद्रकास्तथा।
सौवीराश्चैव पौराश्च नृगस्य केकयास्तथा।। ४८.२० ।।

सुव्रतस्य तथाम्बष्ठा कृशस्य वृषला पुरी।
नवस्य नवराष्ट्रन्तु तितिक्षोस्तु प्रजां श्रृणु।। ४८.२१ ।।

तितिक्षुरभवद्राजा पूर्वस्यां दिशि विश्रुतः।
वृषद्रथः सुतस्तस्य तस्य सेनोऽभवत् सुतः।। ४८.२२ ।।

सेनस्य सुतपा जज्ञे सुतपस्तनयो बलिः।
जातो मानुषयोन्यान्तु क्षीणे वंशे प्रजेच्छया।। ४८.२३ ।।

महायोगी तु स बलिर्बद्धो बन्धैर्महात्मना।
पुत्रानुत्पादयामास क्षेत्रजान् पञ्च पार्थिवान्।। ४८.२४ ।।

अङ्गं स जनयामास वङ्गं सह्यं तथैव च।
पुण्ड्रं कलिङ्गं च तथा बालेयं क्षेत्रमुच्यते।।
बालेया ब्राह्मणाश्चैव तस्य वंशकराः प्रभौ।। ४८.२५ ।।

बलेश्च ब्रह्मणा दत्तो वरः प्रीतेन धीमतः।
महायोगित्वमायुश्च कल्पस्य परिमाणकम्।। ४८.२६ ।।

संग्रामे चाप्यजेयत्वं धर्मे चैवोत्तमा मतिः।
त्रैकाल्यदर्शनं चैव प्राधान्यं प्रसवे तथा।। ४८.२७ ।।

जयञ्चाप्रतिमं युद्धे धर्मे तत्त्वार्थ दर्शनम्।
चतुरो नियतान् वर्णान् स वै स्थापयिता प्रभुः।। ४८.२८ ।।

तेषाञ्च पञ्च दायादावङ्गाङ्गाः सुह्यकास्तथा।
पुण्ड्राः कलिङ्गाश्च तथा अङ्गस्य तु निबोधत।। ४८.२९ ।।

मुनय ऊचुः।
कथं बलेः सुता जाताः पञ्च तस्य महात्मनः।
किं नाम्नी महिषी तस्य जनिता कतमो ऋषिः।। ४८.३० ।।

कथं चोत्पादितास्तेन तन्नः प्रब्रूहि पृच्छताम्।
माहात्म्यञ्च प्रभावञ्च निखिलेन वदस्व तत्।। ४८.३१ ।।

सूत उवाच।
अथोशिज इति ख्यात आसीद्विद्वानृषिः पुरा।
पत्नी वै ममता नाम बभूवास्य महात्मनः।। ४८.३२ ।।

उशिजस्य यवीयान् वै भ्रातृपत्नीमकामयत्।
बृहस्पतिर्म्महातेजा ममतामेत्य कामतः।। ४८.३३ ।।

उवाच मम तातन्तु देवरं वरवर्णिनी।
अन्तर्वन्यस्मि ते भ्रातुर्ज्येष्ठस्य तु विरम्यताम्।। ४८.३४ ।।

अयं तु मे महाभाग! गर्भः कुप्येत् बृहस्पते !।
औशिजो भ्रातृजन्यस्ते सोपाङ्गं वेदमुद्गिरन्।। ४८.३५ ।।

अमोघरेतास्त्वञ्चापि न मां भजितुमर्हसि।
अस्मिन्नेव गते काले यथा वा मन्यसे प्रभो!।। ४८.३६ ।।

एवमुक्तस्तथा सम्यक् बृहत्तेजा बृहस्पतिः।
कामात्मा स महात्मापि नमनः सोऽभ्यवारयत्।। ४८.३७ ।।

सम्बभूवैव धर्मात्मा तया सार्द्धमकामया।
उत्सृजन्तं तु तद्रेतो वाचं गर्भोऽभ्यभाषत।। ४८.३८ ।।

भो तात! वाचामधिप! द्वयोर्नास्तीह संस्थितिः।
अमोघरेतास्त्वञ्चापि पूर्वं चाहमिहागतः।। ४८.३९ ।।

सोऽशपत्तं ततः क्रुद्ध एवमुक्तो बृहस्पतिः।
पुत्रं ज्येष्ठस्य वै भ्रातुर्गर्भस्थं भगवानृषिः।। ४८.४० ।।

यस्मात्त्वमीद्रृशे काले गर्भस्थोऽपि निषेधसि।
मामेव मुक्तवांस्तस्मात् तमो दीर्घं प्रवेक्ष्यसि।। ४८.४१ ।।

ततो दीर्घतमा नाम शापाद्रृषिरजायत।
अतोंऽशजो बृहत्कीर्त्ति बृहस्पतिरिवोजसा।। ४८.४२ ।।

ऊर्ध्वरेतास्ततोऽसौ वै वसते भ्रातुराश्रमे।
स धर्मान् सौरभेयास्तु वृषभाच्छ्रुतवांस्ततः।। ४८.४३ ।।

तस्य भ्राता पितृव्यो श्चकार भरणं तथा।
तस्मिन्निवसतस्तस्य यद्रृच्छैवागतो वृषः।। ४८.४४ ।।

यज्ञार्थमाहृतान् दर्भां श्चषाद सुरभीकृतः।
जग्राह तं दीर्घतमाः श्रृङ्गयोस्तु चतुष्पदम्।। ४८.४५ ।।

तेनासौ निगृहीतश्च न चचाल पदात्पदम्।
ततोऽब्रवीद् वृषस्तं वै मुञ्च मां बलिनां वर।। ४८.४६ ।।

न मया सादितस्तात! बलवांस्त्वत्समः क्वचित्।
मम चान्यः समोवापि न हि मे बलसंख्यया।।
मुञ्च तातेति च पुनः प्रीतस्तेऽहं वरं वृणु।। ४८.४७ ।।

एवमुक्तोऽब्रवीदेनं जीवन्मे त्वं क्व यास्यसि।
एष त्वां न विमोक्ष्यामि परस्वादं चतुष्पदम्।। ४८.४८ ।।

वृषभ उवाच।
नास्माकं विद्यते। तात! पातकं स्तेयमेव च।
भक्ष्याभक्ष्यं तथा चैव पेयापेयं तथैव च।। ४८.४९ ।।

द्विपदां बहवो ह्येते धर्म एष गवां स्मृतः।
कार्याकार्ये न वा गम्यागमनञ्च तथैव च।। ४८.५० ।।

सूत उवाच।
गवां धर्म्मन्तु वै श्रुत्वा सम्भ्रान्तस्तु विसृज्यतम्।
शक्त्यान्नपानदानात्तु गोपतिं सम्प्रसादयन्।। ४८.५१ ।।

प्रसादिते गते तस्मिन् गोधर्मं भक्तितस्तु सः।
मनसैव समादध्यौ तन्निष्ठस्तत्परो हि सः।। ४८.५२ ।।

ततो यवीयसः पत्नीं गौतमस्याभ्यपद्यत।
कृतावलोपान्तां मत्वा सोऽनड्वानिव न क्षमे।। ४८.५३ ।।

गोधर्म्मन्तु परं मत्वा स्नुषान्तामभ्यपद्यत।
निर्भर्त्स्य चैनं रुद्ध्वा च बाहुभ्यां सम्प्रगृह्य च।। ४८.५४ ।।

भाव्यमर्थन्तु तं ज्ञात्वा माहात्म्यात्तमुवाच सा।
विपर्ययन्तु त्वं लब्ध्वा अनड्वानिव वर्त्तसे।। ४८.५५ ।।

गम्यागम्यं न जानीषे गोधर्मात् प्रार्थयन् सुताम्।
दुर्वृत्तं त्वान्त्यजाम्यद्य गच्छ त्वं स्वेन कर्म्मणा।। ४८.५६ ।।

काष्ठे समुद्रे प्रक्षिप्य गङ्गाम्भसि समुत्सृजत्।
यस्मात्त्वमन्धोवृद्धश्च भर्त्तव्योदुरधिष्ठितः।। ४८.५७ ।।

तमुह्यमानं वेगेन स्रोतसोऽभ्यासमागतः।
जग्राह तं स धर्मात्मा बलिर्वैरोचनिस्तदा।। ४८.५८ ।।

अन्तः पुरे जुगोप्यैनं भक्ष्यभोज्यैश्च तर्पयन्।
प्रीतश्चैवं वरेणैवच्छन्दयामास वै बलिम्।। ४८.५९ ।।

तस्माच्च स वरं वव्रे पुत्रार्थे दानवर्षभः।
सन्तानार्थं महाभाग! भार्य्यायां मम मानद।।
पुत्रान् धर्मार्थतत्त्वज्ञानुत्पादयितुमर्हसि।। ४८.६० ।।

एवमुक्तोऽर्थ देवर्षिस्तथास्त्वित्युक्तवान् प्रभुः।
स तस्य राजा स्वां भार्य्यां सुदेष्णां नाम प्राहिणोत्।
अन्धं वृद्धञ्च तं ज्ञात्वा न सा देवी जगाम ह।। ४८.६१ ।।

शूद्रान्धात्रेयिकां तस्मै अन्धाय प्राहिणोत्तदा।
तस्यां काक्षीवदादींश्च शूद्रयोनावृषिर्वशी।। ४८.६२ ।।

जनयामास धर्मात्मा शूद्रानित्येवमादिकम्।
उवाच तं बली राजा द्रृष्ट्वा काक्षीवदादिकान्।। ४८.६३ ।।

प्रवीणानृषिधर्म्मस्य चेश्वरान् ब्रह्मवादिनः।
विद्वान् प्रत्यक्षधर्माणां बुद्धिमान् वृत्तिमान् शुचीन्।। ४८.६४ ।।

ममैवचेति होवाच तं दीर्घतमसं बलिः।
नेत्युवाच मुनिस्तं वै ममैवमितिचाब्रवीत्।। ४८.६५ ।।

उत्पन्नाः शूद्रयोनौ तु भवच्छन्दे सुरोत्तम।
अन्धं वृद्धञ्च मां ज्ञात्वा सुदेष्णा महिषी तव।।
प्राहिणोदवमानान् मे शूद्रां धात्रेयिकां नृप।। ४८.६६ ।।

ततः प्रसादयामास बलिस्तमृषिसत्तमम्।
बलिः सुदेष्णान्तां भार्य्यां भर्त्सयामास दानवः।। ४८.६७ ।।

पुनश्चैनामलङ्कृत्य ऋषये प्रत्यपादयत्।
तां स दीर्घतमा देवीं तथा कृतवतीं तदा।। ४८.६८ ।।

दध्ना लवणमिश्रेण स्वसक्तं मधुकेन तु।
लिहमाम जुगुप्सन्ती आपादतलमस्तकम्।।
ततस्त्वं प्राप्स्यसे देवि! पुत्रान् वै मनसेप्सितान्।। ४८.६९ ।।

तस्य सा तद्वचो देवी सर्वं कृतवती तदा।
तस्य सा पानमासाद्य देवी परिहरत्तदा।। ४८.७० ।।

तामुवाच ततः सोऽथ यत्ते परिहृतं शुभे।
विना पानं कुमारन्तु जनयिष्यसि पूर्वजम्।। ४८.७१ ।।

सुदेष्णोवाच।
नार्हसि त्वं महाभाग! पुत्रं मे दातुमीद्रृशम्।
तोषितश्च यथाशक्त्या प्रसादं कुरु मे प्रभो।। ४८.७२ ।।

तथापचाराद्देव्येष नान्यथा भविता शुभे।
नैव दास्यति पुत्रस्ते पौत्रो वै दास्यते फलम्।। ४८.७३ ।।

तस्यापानं विना चैव योग्यभावो भविष्यति।
तस्माद्दीर्गतमाङ्गेषु कुक्षौ स्पृष्ट्वेदमब्रवीत्।। ४८.७४ ।।

प्राशितं यद्यदग्रेषु न सोपस्थं शुचिस्मिते।
तेन तिष्ठन्ति ते गर्भो पौर्णमास्यामि वोडुराट्।। ४९.७५ ।।

भविष्यन्ति कुमारास्ते पञ्चदेवसुतोपमाः।
तेजस्विनः सुवृत्ताश्च यज्वानो धार्मिकाश्चते।। ४८.७६ ।।

सूत उवाच।
तदंशस्तु सुदेष्णाया ज्येष्ठः पुत्रो व्यजायत।
अङ्गस्तथा कलिङ्गश्च पुण्ड्रः सुह्मस्तथैव च।। ४८.७७ ।।

वङ्गराजस्तु पञ्चैते बलेः पुत्राश्च क्षेत्रजाः।
इत्येते दीर्घतमसा बलेर्दत्ताः सुतास्तथा।। ४८.७८ ।।

प्रतिष्ठामागतानां हि ब्राह्मण्यं कारयंस्ततः।
ततो मानुषयोन्यां स जनयामास वै प्रजाः।। ४८.७९ ।।

ततस्तं दीर्घतमसं सुरभिर्वाक्यमब्रवीत्।
विचार्य यस्माद् गोधर्मं प्रमाणन्ते कृतं विभो।। ४८.८० ।।

भक्त्या चानन्ययाऽस्मासु तेन प्रीतास्मि तेऽनघ।
तस्मात्तुभ्यन्तमोदीर्घमाघ्रायापनुदामि वै।। ४८.८१ ।।

बार्हस्पत्यस्तथैवैष पाप्मा वै तिष्ठति त्वयि।
जरां मृत्युं तमश्चैव आघ्रायापनुदामि ते।। ४८.८२ ।।

सद्यः स घ्रातमात्रस्तु असितोमुनिसत्तम!।
आयुष्यमांश्च वपुष्मांश्च चक्षुष्मांश्च ततोऽभवत्।। ४८.८३ ।।

गोभ्याहते तमसि वै गौतमस्तु ततोऽभवत्।
काक्षीवांस्तु ततो गत्वा सहपित्रा गिरिव्रजम्।। ४८.८४ ।।

द्रृष्ट्वा स्पृष्ट्वा पितुः सो वै ह्युपविष्टश्चिरन्तपः।
ततः कालेन महता तपसा भावितस्तु सः।। ४८.८५ ।।

विधूय मातृजं कायं ब्राह्मण्यं प्राप्तवान् विभुः।
ततोऽब्रवीत्पिता तं वै पुत्रवानस्म्यहं त्वया ।। ४८.८६ ।।

सत्पुत्रेण तु धर्मज्ञ! कृतार्थोऽहं यशस्विना।
मुक्त्वात्मानं ततोऽसौ वै प्राप्तवान् ब्रह्मणः क्षयम्।। ४८.८७ ।।

ब्राह्मण्यं प्राप्य काक्षीवान् सहस्रमसृजत् सुतान्।
कौष्माण्डा गौतमाश्चैव स्मृताः काक्षीवतः सुताः।। ४८.८८ ।।

इत्येष दीर्घतमसो बलेर्वैरोचनस्य च।
समागमो वः कथितः सन्ततिश्चोभयोस्तथा।। ४८.८९ ।।

बलिस्तानभिनन्द्याह पञ्चपुत्रानकल्मषान्।
कृतार्थः सोऽपि धर्मात्मा योगमायावृतः स्वयम्।। ४८.९० ।।

अद्रृश्यः सर्वभूतानां कालापेक्षः स वै प्रभुः।
तत्राङ्गस्य तु दायादो राजासीद्दधिवाहनः।। ४८.९१ ।।

दधिवाहनपुत्रस्तु राजा दिविरथः स्मृतः।
आसीद्दिविरथापत्यं विद्वान् धर्मरथोनृपः।। ४८.९२ ।।

स हि धर्मरथः श्रीमांस्तेन विष्णुपदे गिरौ।
सोमः शुक्रेण वै राज्ञा सहपीतो महात्मना।। ४८.९३ ।।

अथ धर्मरथस्याभूत् पुत्रश्चित्ररथः किल।
तस्य सत्यरथः पुत्रस्तस्माद्दशरथः किल।। ४८.९४ ।।

लोमपाद इति ख्यातस्तस्य शान्ता सुताभवत्।
अथ दाशरथिर्वीरश्चतुरङ्गो महायशाः।। ४८.९५ ।।

ऋष्यश्रृङ्गप्रसादेन जज्ञे स्वकुलवर्धनः।
चतुरङ्गस्य पुत्रस्तु पृथुलाक्ष इति स्मृतः।। ४८.९६ ।।

पृथुलाक्षसुतश्चापि चम्पनामा बभूव ह।
चम्पस्य तु पुरी चम्पा पूर्व या मालिनोऽभवत्।। ४८.९७ ।।

पूर्णभद्रप्रसादेन हर्यङ्गोऽस्य सुतोऽभवत्।
जज्ञे विभाण्डकाच्चास्य वारणः शत्रुवारणः।। ४८.९८ ।।

अवतारयामास महीं मन्त्रैर्वाहनमुत्तमम्।
हर्यङ्गस्य तु दायादो जातो भद्ररथः किलः।। ४८.९९ ।।

अथ भद्ररथस्यासीत् बृहत् कर्मा जनेश्वरः।
बृहद्भानुः सुतस्तस्य तस्माज्जज्ञे महात्मवान्।। ४८.१०० ।।

बृहद्भानुस्तु राजेन्द्रो जनयामास वै सुतम्।
नाम्ना जयद्रथं नाम तस्मात् बृहद्रथो नृपः।। ४८.१०१ ।।

आसीत् बृह्द्रथाच्चैव विश्वजिज्जनमेजयः।
दायादस्तस्य चाङ्गो वै तस्मात् कर्णोऽभवन्नृपः।। ४८.१०२ ।।

कर्णस्य वृषसेनस्तु पृथुसेनस्तथात्मजः।
एतेऽङ्गस्यात्मजाः सर्वे राजानः कीर्तिता मया।।
विस्तरेणानुपूर्व्याच्च पूरोस्तु श्रृणुत द्विजाः।। ४८.१०३ ।।

ऋषय ऊचुः।
कथं सूतात्मजः कर्णः कथमङ्गस्य चात्मजः।
एतदिच्छामहे श्रोतुमत्यन्तकुशलोह्यसि।। ४८.१०४ ।।

सूत उवाच।
बृहद्भानुसुतो जज्ञे राजा नाम्ना बृहन्मनाः।
तस्य पत्नीद्वयं ह्यासीच्छैव्यस्य तनये ह्युभे।।
यशोदेवी च सत्या च तयोर्वंशञ्च मे श्रृणु।। ४८.१०५ ।।

जयद्रथन्तु राजानं यशोदेवी ह्यजीजनत्।
सा बृहन्मनसः सत्या विजयं नाम विश्रुतम्।। ४८.१०६ ।।

विजयस्य बृहत्पुत्रस्तस्य पुत्रो बृहद्रथः।
बृहद्रथस्य पुत्रस्तु सत्यकर्मा महामनाः।। ४८.१०७ ।।

सत्यकर्मणोऽधिरथः सूतश्चाऽधिरथः स्मृतः।
यः कर्णं प्रतिजग्राह तेन कर्णस्तु सूतजः।।
तच्चेदं सर्वमाख्यातं कर्णं प्रति यथोदितम्।। ४८.१०८ ।।