मत्स्यपुराणम्/अध्यायः १२३

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अत्र गम्यताम् : सञ्चरणम्, अन्वेषणम्
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गोमेदकपुष्करद्वीपयोर्वर्णनम्।
सूत उवाच।
गोमेदकं प्रवक्ष्यामि षष्ठं द्वीपं तपोधनाः।!।
सुरोदकसमुद्रस्तु गोमेदेन समावृतः।। १२३.१ ।।

शाल्मलस्य तु विस्ताराद्‌द्विगुणस्तस्य विस्तरः।
तस्मिन्‌ द्वीपे तु विज्ञेयौ पर्वतौ द्वौ समाहितौ।। १२३.२ ।।

प्रथमः सुमना नाम जात्यञ्जनमयो गिरिः।
द्वितीयः कुमुदो नाम सर्वौषधिसमन्वितः।। १२३.३ ।।

शातकौम्भमयः श्रीमान् विज्ञेयः सुमहाचितः।
समुद्रेक्षरसोदेन वृतो गोमेदकश्च सः।। १२३.४ ।।

षष्ठेन तु समुद्रेण सुरोदाद् द्विगुणेन च।
धातकी कुमुदश्चैव हव्यपुत्रौ सुविस्तृतौ।। १२३.६ ।।

सौमनं प्रथमं वर्षं धातकीखण्डमुच्यते।
धातकिनः स्मृतं तद्वै प्रथमं प्रथमस्य तु।। १२३.५ ।।

गोमेदं यत् स्मृतं वर्षं नाम्ना सर्वसुखन्तु तत्।
कुमुदस्य द्वितीयस्य द्वितीयं कुमुदं ततः।। १२३.७ ।।

एतौ द्वौ पर्वतौ वृत्तौ शेषौ सर्वसमुच्छ्रितौ।
पूर्वेण तस्य द्वीपस्य सुमनाः पर्वतः स्थितः।। १२३.८ ।।

प्राक्‌पश्चिमायतैः पादैरासमुद्रादिति स्थितः।
पश्चार्द्धे कुमुदस्तस्य एवमेव स्थितस्तु वै।। १२३.९ ।।

एतैः पर्वतपादैस्तु स देशो वै द्विधाकृतः।
दक्षिणार्द्धे तु द्वीपस्य धातकीखण्डमुच्यते।। १२३.१० ।।

कुमुदन्तूत्तरे तस्य द्वितीयं वर्षमुत्तमम्।
एतौ जनपदौ द्वौ तु गोमेदस्य तु विस्तृतौ।। १२३.११ ।।

अतः परं प्रवक्ष्यामि सप्तमं द्वीपमुत्तमम्।
समुद्रेक्षुरसं चैव गोमेदाद्‌द्विगुणं हि सः।। १२३.१२ ।।

आवृत्य तिष्ठति द्वीपः पुष्करः पुष्करैर्वृतः।
पुष्करेण वृतः श्रीमांश्चित्रसानुर्महागिरिः।। १२३.१३ ।।

कूटैश्चित्रैर्मणिमयैः शिलाजालसमुद्भवैः।
द्वीपस्यैव तु पूर्वार्द्धे चित्रसानुः स्थितो महान्।। १२३.१४ ।।

परिमण्डलसहस्राणि विस्तीर्णः पञ्चविंशतिः।
ऊद्‌र्ध्वं स वै चतुर्विशद्योजनानां महाबलः।। १२३.१५ ।।

द्वीपार्द्धस्य परिक्षिप्तः पश्चिमे मानसो गिरिः।
स्थितो वेला समीपे तु पूर्णचन्द्र इवोदितः।। १२३.१६ ।।

योजनानां सहस्राणि सार्द्धं पञ्चाशदुच्छ्रितः।
तस्य पुत्रो महावीतः पश्चिमार्द्धस्य रक्षिता।। १२३.१७ ।।

पूर्वार्द्धे पर्वतस्यापि द्विधा देशस्तु स स्मृतः।
स्वादूदकेनोदधिना पुष्करः परिवारितः।। १२३.१८ ।।

विस्तारान्‌मण्डलाच्चैव गोमेदाद्‌द्विगुणेन तु।
त्रिंशद्वर्षसहस्राणि तेषु जीवन्ति मानवाः।। १२३.१९ ।।

विपर्ययो न तेष्वस्ति एतत् स्वाभाविकं स्मृतम्।
आरोग्यं सुखबाहुल्यं मानसीं सिद्धिमास्थिताः।। १२३.२० ।।

सुखमायुश्च रूपञ्च त्रिषु द्वीपेषु सर्वशः।
अधमोत्तमौ न तेष्वास्तां तुल्यास्ते वीर्य्यरूपतः।। १२३.२१ ।।

न तत्र वध्यवधकौ नेर्ष्यासूया भयं तथा।
न लोभो न च दम्भो वा न द्वेषः परिग्रहः।। १२३.२२ ।।

सत्यानृतेन तेष्वास्तां धर्माधर्मौ तथैव च.
वर्णाश्रमाणां वार्ता च पाशुपाल्यं वणिक्‌कृषिः।। १२३.२३ ।।

त्रयीविद्या दण्डनीतिः शुश्रूषा दण्ड एव च।
न तत्र वर्ष नद्यो वा शीतोष्णञ्च न विद्यते।। १२३.२४ ।।

उद्भिदान्युदकानि स्युर्गिरिप्रस्रवणानि च।
तुल्योत्तरकुरूणान्तु कालस्तत्र तु सर्वदा।। १२३.३५ ।।

सर्वतः सुखकालोऽसौ जराक्लेशविवर्जितः।
सर्गस्तु धातकीखण्डे महावीते तथैव च।। १२३.२६ ।।

एवं द्वीपाः समुद्रैस्तु सप्तसप्तभिरावृताः।
द्वीपस्यानन्तरो यस्तु समुद्रस्तत् समस्तु वै।। १२३.२७ ।।

एवं द्वीपसमुद्राणां वृद्धिर्ज्ञेया परस्परम्।
अपाञ्चैव समुद्रेकात् समुद्र इति संज्ञितः।। १२३.२८ ।।

ऋषद्वसन्त्यो वर्षेषु प्रजा यत्र चतुर्विधाः।
ऋषिरित्येव रमणे वर्षन्त्वेतेन तेषु वै।। १२३.२९ ।।

उदयतीन्दौ पूर्वे तु समुद्रः पूर्यते सदा।
प्रक्षीयमाणे बहुले क्षीयतेऽस्तमिते च वै।। १२३.३० ।।

आपूर्यमाणो ह्युदधिरात्मनैवापि पूर्यते।
ततो वै क्षीयमाणे तु स्वात्मन्येव ह्यपां क्षयः।। १२३.३१ ।।

उदयात् पयसां योगात् पुष्णन्त्यापो यथा स्वयम्।
तथा स तु समुद्रोऽपि वर्द्धते शशिनोदये।। १२३.३२ ।।

अन्यूनानतिरिक्तात्मा वर्द्धन्त्यापोह्रसन्ति च।
उदयेऽस्तमये चेन्द्रोः पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः।। १२३.३३ ।।

क्षयवृद्धी समुद्रस्य शशिवृद्धिक्षये तथा।
दशोत्तराणि पञ्चाहुरङ्गुलानां शतानि च।। १२३.३४ ।।

अपां वृद्धिः क्षयोद्रृष्टः समुद्राणान्तु पर्वसु।
द्विरापत्वात् स्मृतो द्वीपो दधनाच्चोदधिः स्मृतः।। १२३.३५ ।।

अपशीर्णात्तु गिरयो पर्वबन्धाच्च पर्वताः।
शाकद्वीपे तु वैशाकः पर्वतस्तेन चोच्यते।। १२३.३६ ।।

कुशद्वीपे कुशस्तम्बो मध्ये जनपदस्य तु।
क्रौञ्चद्वीपे गिरिः क्रौञ्चस्तस्य नाम्ना निगद्यते।। १२३.३७ ।।

शाल्मलिः शाल्मलद्वीपे पूज्यते स महाद्रुमः।
गोमेदके तु गोमेदः पर्वतस्तेन चोच्यते।। १२३.३८ ।।

न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे पद्मवत्तेन सः स्मृतः।
पूज्यते स महादेवैर्ब्रह्मांशो व्यक्तसम्भवः।। १२३.३९ ।।

तस्मिन् स वसति ब्रह्मा साध्यैः सार्द्धं प्रजापतिः।
तत्र देवा उपासन्ते त्रयस्त्रिंशन्महर्षिभिः।। १२३.४० ।।

स तत्र पूज्यते देवो देवैर्महर्षिसत्तमैः।
जम्बूद्वीपात्प्रवर्तन्ते रत्नानि विविधानि च।। १२३.४१ ।।

द्वीपेषु तेषु सर्वेषु प्रजानां क्रमशस्तु वै।
आर्जवात् ब्रह्मचर्येण सत्येन च दमेन च।। १२३.४२ ।।

आरोग्यायुः प्रमाणाभ्यां द्विगुणं द्विगुणं ततः।
द्वीपेषु तेषु सर्वेषु यथोक्तं वर्षकेषु च।। १२३.४३ ।।

गोपायन्ते प्रजास्तत्र सर्वैः सहजपण्डितैः।
भोजनञ्चाप्रयत्नेन सदा स्वयमुपस्थितम्।। १२३.४४ ।।

षड्रसं तन्महावीर्यं तत्र ते भुञ्जते जनाः।
परेण पुष्करस्याथ आवृत्यावस्थितो महान्।। १२३.४५ ।।

स्वादूदकसमुद्रस्तु स समन्तादवेष्टयत्।
स्वादूदकस्य पतितः शैलस्तु परिमण्डलः।। १२३.४६ ।।

प्रकाशश्चाप्रकाशश्च लोकालोकः स उच्यते।
आलोकस्तत्र चार्वाक् च निरालोकस्ततः परम्।। १२३.४७ ।।

लोकविस्तारमात्रन्तु पृथिव्यार्द्धन्तु बाह्यतः।
प्रतिच्छन्नं समन्तात्तु उदकेनावृतं महत्।। १२३.४८ ।।

भूमेर्दशगुणाश्चापः समन्तात् पालयन्ति गाम्।
अद्‌भ्यो दशगुणश्चाग्निः सर्वतो धारयत्यपः।। १२३.४९ ।।

अग्नेर्दशगुणोवायुर्धारयन्‌ ज्योतिरास्थितः।
तिर्य्यक्‌ च मंडलो वायुर्भूतान्यावेष्ट्य धारयन्।। १२३.५० ।।

दशाधिकं तथाकाशं वायोर्भूतान्यधारयत्।
भूतादिधारयन् व्योम तस्माद्दशगुणस्तु वै।। १२३.५१ ।।

भूतादितो दशगुणं महद्‌भूतान्यधारयत्।
महत्तत्वं ह्यनन्तेन अव्यक्तेन तु धार्य्यते।। १२३.५२ ।।

आधाराधेयभावेन विकारास्ते विकारिणाम्।। १२३.५३ ।।

पृथ्व्यादयो विकारास्ते परिच्छिन्नाः परस्परम्।
परस्पराधिकाश्चैव प्रविष्टाश्च परस्परम्।। १२३.५४ ।।

एवं परस्परोत्पन्ना धार्यन्ते च परस्परम्।
यस्मात्प्रविष्टास्तेऽन्योन्यं तस्मात्ते स्थिरतां गतः।।
आसंस्ते ह्यविशेषाश्च विशेषा अन्यवेशनात् ।। १२३.५५ ।।

पृथ्व्यादयस्तु वाय्व्यन्ताः परिच्छिन्नास्तु तत्र ते।
भूतेभ्यः परतस्तेभ्यो ह्यलोकः सर्वतः स्मृतः।। १२३.५६ ।।

तथा ह्यालोक आकाशे परिच्छिन्नानि सर्वशः।
पात्रे महति पत्राणि यथा ह्यन्तगतानि च।। १२३.५७ ।।

भवन्त्यन्योन्यहीनानि परस्परसमाश्रयात्।
तथा ह्यालोकः आकाशे भेदास्त्वन्तर्गता गताः।। १२३.५८ ।।

कृतान्येतानि तत्त्वानि अन्योन्यस्याधिकानि तु।
यावदेतानि तत्त्वानि तावदुत्पत्तिरुच्यते।। १२३.५९ ।।

जन्तूनामिह संस्कारो भूतेष्वन्तर्गतेषु वै।
प्रत्याख्यायेह भूतानि कार्य्योत्पत्तिर्न विद्यते।। १२३.६० ।।

तस्मात्परिमिताभेदाः स्मृता कार्य्यात्मकास्तु वै।
ते कारणात्मकाश्चैव स्युर्भेदा महदादयः।। १२३.६१ ।।

इत्येवं सन्निवेशोऽयं पृथ्व्याक्रान्तस्तु भागशः।
सप्तद्वीपसमुद्राणां याथातथ्येन वै मया ।। १२३.६२ ।।

विस्तारान् मण्डलाच्चैव प्रसंख्यानेन चैव हि।
विश्वरूपं प्रधानस्य परिमाणैकदेशिनः।। १२३.६३ ।।

एतावत्सन्निवेशस्तु मया सम्यक् प्रकाशितः।। १२३.६४ ।।

एतावदेव श्रोतव्यं सन्निवेशस्य पार्थिव।
अत ऊद्‌र्ध्व प्रवक्ष्यामि सूर्य्याचन्द्रमसोर्गतिम्।। १२३.६५ ।।