मत्स्यपुराणम्/अध्यायः २४४

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वामनावतारचरित्रवर्णनम्।

ऋषय ऊचुः।
राजधर्मस्त्वया सूत! कथितो विस्तरेण तु।
तथैवाद्भुतमङ्गल्यं स्वप्नदर्शनमेव च ।। २४४.१ ।।

विष्णोरिदानीं माहात्म्यं पुनर्वक्तुमिहार्हसि।
कथं स वामनो भूत्वा बबन्ध बलिदानवम् ।। २४४.२ ।।
क्रमतः कीदृशं रुपमासील्लोकत्रये हरेः।

सूत उवाच।
एतदेव पुरा पृष्टः कुरुक्षेत्रे तपोधनः ।। २४४.३ ।।

शौनकस्तीर्थयात्रायां वामनायतने पुरा।
यदा समयभेदित्वं द्रौपद्याः पार्थिवं प्रति ।। २४४.४ ।।

अर्जुनेन कृतन्तत्र तीर्थयात्रां तदा ययौ।
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे वामनायतने स्थितः ।। २४४.५ ।।

दृष्ट्वा स वामनस्तत्र अर्जुनो वाक्यमब्रवीत्।

अर्जुन उवाच।
किन्निमित्तमयं देवो वामनाकृतिरिज्यते ।। २४४.६ ।।

वराहरूपी भगवान् कस्मात्पूज्योऽभवत्पुरा।
कस्माच्च वामनस्येदमिष्टं क्षेत्रमजायत ।। २४४.७ ।।

शौनक उवाच।
वामनस्य च वक्ष्यामि वराहस्य च धीमतः।
पुरा निवारिते शक्रे सुरेषु विजितेषु च ।। २४४.८ ।।

चिन्तयामास देवानां जननी पुनरुद्भवम्।
अदितिर्देवमाता च परमं दुश्चरं तपः ।। २४४.९ ।।

तीव्रञ्च चारवर्षाणां सहस्रं पृथिवीपते!।
आराधनाय कृष्णस्य वाताहारा ह्यभोजना ।। २४४.१० ।।

दैत्यैर्निराकृतान् दृष्ट्वा तनयान् कुरुनन्दन!।
वृथा पुत्राहमस्मीति निर्वेदात्प्रणताहरिम् ।। २४४.११ ।।

तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः परमार्थनिबोधने।
देवदेवं हृषीकेशं नत्वा सर्वगतं हरिम् ।। २४४.१२ ।।

अदितिरुवाच।
नमः स्मृतार्तिनाशाय नमः पुष्करमालिने।
नमः परमकल्याण कल्याणायादिवेधसे ।। २४४.१३ ।।

नमः पङ्कजनेत्राय नमः पङ्गजनाभये।
श्रियः कान्ताय दान्ताय दान्तदृश्याय चक्रिणे ।। २४४.१४ ।।

नमः पङ्कजसम्भूति सम्भवायात्मयोनये।
नमः शङ्खासिहस्ताय नमः कनकरेतसे ।। २४४.१५ ।।

तथात्मज्ञातविज्ञात योगिचिन्त्यात्म योगिने।
निर्गुणायाविशेषाय हरये ब्रह्मरूपिणे ।। २४४.१६ ।।

जगत्प्रतिष्ठितं यत्र जगता यो न दृश्यते।
नमः स्थूलातिसूक्ष्माय तस्मै देवाय शङ्खिने ।। २४४.१७ ।।

यन्न पश्यन्ति पश्यन्तो जगदप्यखिलन्नराः।
अपश्यद्भिर्जगत्यत्र न देवो हृदि संस्थितः ।। २४४.१८ ।।

यस्मिन्नन्नं पयश्चैव नद्यश्चैवाखिलं जगत्।
तस्मै समस्तजगतामाधाराय नमो नमः ।। २४४.१९ ।।

आद्यः प्रजापतिपतिः यः प्रभूणां पतिः परः।
पतिः सुराणां यस्तस्मै नमः कृष्णाय वेधसे ।। २४४.२० ।।

यः प्रवृत्तौ निवृत्तौ च इज्यते कर्मभिः स्वकैः।
स्वर्गापवर्गफलदो नमस्तस्मै गदाभृते ।। २४४.२१ ।।

यश्चिन्त्यमानो मनसा सद्यः पापं व्यपोहति।
नमस्तस्मै विशुद्धाय पराय हरिवेधसे ।। २४४.२२ ।।

यं बुद्ध्वा सर्वभूतानि देवदेवेशमव्ययम्।
न पुनर्जन्ममरणे प्राप्नुवन्ति नमामि तम् ।। २४४.२३ ।।

यो यज्ञे यज्ञपरमैरिज्यते यज्ञसंज्ञितः।
तं यज्ञपुरुषं विष्णुं नमामि प्रभुमीश्वरम् ।। २४४.२४ ।।

गीयते सर्वदेवेषु वेदविद्भिर्विदां पतिः।
यस्तस्मै वेदवेद्याय विष्णवे जिष्णवे नमः ।। २४४.२५ ।।

यतो विश्वं समुत्पन्नं यस्मिंश्च लयमेष्यति।
विश्वागम प्रतिष्ठाय नमस्तस्मै महात्मने ।। २४४.२६ ।।

ब्रह्मादि स्तम्बपर्यन्तं येन विश्वमिदं ततम्।
मायाजालं समुत्तर्तुं तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् ।। २४४.२७ ।।

यस्तु तोयस्वरूपस्थो बिभर्त्यखिलमीश्वरः।
विश्वं प्रजापतिं विष्णुं तं नमामि प्रजापतिम् ।। २४४.२८ ।।

यमाराध्य विशुद्धेन मनसा कर्मणा गिरा।
तरन्त्यविद्यामखिलान्तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् ।। २४४.२९ ।।

विषादतोषरोषद्यैः योऽजस्रं सुखदुःखजैः।
नृत्यत्यखिलभूतस्थस्तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् ।। २४४.३० ।।

मूर्तं तमो सुरमयन्तद्वधात् विनिहन्ति यः।
रात्रिरूपी सूर्यरूपी तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् ।। २४४.३१ ।।

यस्याक्षिणी चन्द्रसूर्यौ सर्वलोकशुभाशुभम्।
पश्यतः कर्म सततमुपेन्द्रं तं नमाम्यहम् ।। २४४.३२ ।।

यस्मिन् सर्वेश्वरे सर्वं सत्यमेतन्मयोदितम्।
नानृतं तमजं विष्णुं नमामि प्रभवाव्ययम् ।। २४४.३३ ।।

यच्चैतत्सत्यमुक्तं मे भूयांश्चातो जनार्दनः।
सत्येन तेन सकलाः पूर्यन्तां मे मनोरथाः ।। २४४.३४ ।।

एवंस्तुतः स भगवान् वासुदेव उवाच ताम्।
अदृश्यः सर्वभूतानां तस्याः सन्दर्शने स्थितः ।। २४४.३५ ।।

मनोरथां स्त्वमदिते! यानिच्छस्यभिवाञ्छितान्।
तांस्त्वं प्राप्स्यसि धर्मज्ञे! मत्प्रसादान्न संशयः ।। २४४.३६ ।।

श्रृणुष्व सुमहाभागे वरो यस्ते हृदि स्थितः।
तमाशु व्रियतां कामं श्रेयस्ते सम्भविष्यति
मद्दर्शनं हि विफलं न कदाचिद्भविष्यति ।। २४४.३७ ।।

अदितिरुवाच।
यदि देव! प्रसन्नस्त्वं मद्भक्त्या भक्तवत्सल!।
त्रैलोक्याधिपतिः पुत्रस्तदस्तु मम वासवः ।। २४४.३८ ।।

हृतं राज्यं हृताश्चास्य यज्ञभागा महासुरैः।
त्वयि प्रसन्ने वरदे तान् प्राप्नोतु सुतो मम ।। २४४.३९ ।।

हृतं राज्यं न दुःखाय मम पुत्रस्य केशव!।
सापन्त्याद्दायनिर्भ्रंशो बाधां न कुरुते हृदि ।। २४४.४० ।।

श्रीभगवानुवाच।
कृतः प्रसादो हि मया तव देवि! यथेप्सितः।
स्वांशेन चैव ते गर्भे सम्भविष्यामि कश्यपात् ।। २४४.४१ ।।

तव गर्भसमुद्भूतस्ततस्ते ये सुरारयः।
तानहं निहनिष्यामि निवृत्ता भव नन्दिनि! ।। २४४.४२ ।।

अदितिरुवाच।
प्रसीद देव! देवेश! नमस्ते विश्वभावन!।
नाहं त्वामुदरे देव!वोढुं शक्ष्यामि केशव!।। २४४.४३ ।।

यस्मिन् प्रतिष्ठितं विश्वं यो विश्वं स्वयमीश्वरः।
तमहं नोदरेण त्वां वोढुं शक्ष्यामि दुर्धरम् ।। २४४.४४ ।।

श्रीभगवानुवाच।
सत्यमात्थ महाभागे! मयि सर्वमिदं जगत्।
प्रतिष्ठितं न मां शक्तावोढुं सेन्द्रा दिवौकसः ।। २४४.४५ ।।

किं त्वहं सकलान् लोकान् सदेवासुरमानुषान्।
जङ्गमान् स्थावरान् सर्वान् त्वाञ्च देवि! सकश्यपाम् ।। २४४.४६ ।।

धारयिष्यामि भद्रन्ते तदलं सम्भ्रमेण ते।
न ते ग्लानिर्न ते स्वेदो गर्भस्थे भविता मयि ।। २४४.४७ ।।

दाक्षायणि! प्रसादन्ते करोम्यन्यैः सुदुर्लभम्।
गर्भस्थे मयि पुत्राणां तव योऽभिभविष्यति
तेजसस्तस्य हानिञ्च करिष्ये मा व्यथां कृथाः ।। २४४.४८ ।।

शैनक उवाच।
एवमुक्त्वा ततः सद्यो यातोऽन्तर्धानमीश्वरः।
सापि कालेन तं गर्भमवाप कुरुसत्तम! ।। २४४.४९ ।।

गर्भस्थिते ततः कृष्णे चचाल सकला क्षितिः।
चकम्पिरे महाशैलाः क्षोभञ्जग्मुस्तथाब्धयः ।। २४४.५० ।।

यतो यतोऽदितिर्याति ददाति ललितं पदम्।
ततस्ततः क्षितिः स्वेदात् ननाम वसुधाधिप! ।। २४४.५१ ।।

दैत्यानामथ सर्वेषां गर्भस्थे मधुसूदने।
बभूव तेजसां हानिर्यथोक्तं परमेष्ठिना ।। २४४.५२ ।।