मत्स्यपुराणम्/अध्यायः ११

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आदित्याख्यानम्।
आदित्यवंशमखिलं वद सूत! यथाक्रमम्।
सोमवंशञ्च तत्वज्ञ! यथावद्वक्तुमर्हसि।। ११.१ ।।

विवस्वान् कश्यपात् पूर्वमदित्यामभवत्सुतः।।
तस्य पत्नीत्रयं तद्वत् संज्ञा राज्ञी प्रभा तथा।
रैवतस्य सुता राज्ञी रेवतं सुषुवे तनुम्।
प्रभा प्रभातं सुषुवे त्वाष्ट्री संज्ञा तथा मनुम्।। ११.२ ।।

यमश्च यमुना चैव यमलौ तु बभूवतुः।
ततस्तेजोमयं रूपमसहन्ती विवस्वतः।। ११.३ ।।

नारीमुत्पादयामास स्वशरीरादनिन्दिताम्।
त्वाष्ट्री स्वरूपेण नाम्ना छायेतिभामिनी तदा।। ११.४ ।।

किङ्करोमीति पुरतः स्थितां तामभ्यभाषत।
छाये! त्वं भज भर्तारमस्मदीयं वरानने!।। ११ .५ ।।

अपत्यानि मदीयानि मातृस्नेहेन पालय।
तथेत्युक्ता तु सा देवमगमत् क्वापि सुव्रता।। ११.६ ।।

कामयामास देवोऽपि संज्ञेयमिति चादरात्।
जनयामास तस्यां तु पुत्रञ्च मनुरूपिणम्।। ११.७ ।।

सवर्णत्वाच्च सावर्णिम् मनोर्वैवस्वतस्य च।
ततः शनिञ्च तपतीं विष्टिं चैव क्रमेण तु।। ११.८ ।।

छायायां जनयामास संज्ञेयमिति भास्करः।
छाया स्वपुत्रेऽभ्यधिकं स्नेहं चक्रे मनौ तथा।। ११.९ ।।

पूर्वो मनुस्तु चक्षाम न यमः क्रोधमूर्च्छितः।
सन्तर्जयामास तदा पादमुद्यम्य दक्षिणम्।। ११.१० ।।

शशाप च यमं छाया सक्षतः कृमिसंयुतः।
पादोऽयमेको भविता पूय शोणित विस्रवः।। ११.११ ।।

निवेदयामास पितुर्धर्म्मः शापादमर्षितः।
निष्कारणमहं शप्तो मात्रा देव! सकोपया।। ११.१२ ।।

बालभावान् मया किञ्चिदुद्यतश्चरणः सकृत्।
मनुना वार्यमाणापि मम शापमदाद्विभो।। ११.१३ ।।

प्रायेण माता सास्माकं शापेनाहं यतो हतः।
देवोऽप्याह यमं भूयः किङ्करोमि महामते।। ११.१४ ।।

मौर्ख्यात् कस्य न दुःखं स्यादथवा कर्म्म सन्ततेः।
अनिवार्याभवस्यापि का कथान्येषु जन्तुषु।। ११.१५ ।।

कृकवाकुर्म्मया दत्तो यः कृमीन् भक्षयिष्यति।
क्लेदञ्च रुधिरञ्चैव वत्सायमपनेष्यति।। ११.१६ ।।

एवमुक्तस्तपस्तेपे यमस्तीव्रं महायशाः।
गोकर्णतीर्थे वैराग्यात् फलपत्रानिलाशनः।। ११.१७ ।।

आराधयन् महादेवं यावद्वर्षायुतायुतम्।
वरं प्रादान् महादेवः सन्तुष्टः शूलभृत्तदा।। ११.१८ ।।

वव्रे सलोकपालत्वं पितृलोके नृपालयम्।
धर्म्माधर्म्मात्मकस्यापि जगतस्तु परीक्षणम्।। ११.१९ ।।

एवं स लोकपालत्वमगमच्छूलपाणिनः।
पितॄणाञ्चाधिपत्यञ्च धर्म्माधर्म्मस्य चानघ।। ११.२० ।।

विवस्वानथ तज्ज्ञात्वा संज्ञायाः कर्म्मचेष्टितम्।
त्वष्टुः समीपमगमदाचचक्षे च रोषवान्।। ११.२१ ।।

तमुवाच ततस्त्वष्टा सान्त्वपूर्वं द्विजोत्तामाः।
तवासहन्ती भगवन्!महस्तीव्रं तमोनुदम्।। ११.२२ ।।

व़डवारूपमास्थाय मत्सकाशमिहागता।
निवारिता मया सातु त्वया चैव दिवाकर!।। ११.२३ ।।

यस्मादविज्ञाततया मत्सकाशमिहागता।
तस्मान्मदीयं भवनं प्रवेष्टुं न त्वमर्हसि।। ११.२४ ।।

एवमुक्ता जगामाथ मरुदेशमनिन्दिता।
व़डवा रूपमास्थाय भूतले सम्प्रतिष्ठिता।। ११.२५ ।।

तस्मात्प्रसादं कुरु मे यद्यनुग्रह भागहम्।
अपनेष्यामि ते तेजो यन्त्रे कृत्वा दिवाकर!।। ११.२६ ।।

रूपं तव करिष्यामि लोकानन्दकरं प्रभो!।
तथेत्युक्तः स रविणा भ्रमौ कृत्वा दिवाकरम्।। ११.२७ ।।

पृथक् चकार तत्तेजश्चक्रं विष्णोरकल्पयत्।
त्रिशूलञ्चापि रुद्रस्य वज्रमिन्द्रस्य चाधिकम्।।११.२८।।

दैत्यदानवसंहर्तुः सहस्र किरणात्मकम्।
रूपञ्चाप्रतिमञ्चक्रे त्वष्टा पद्भ्यामृते महत्।। ११.२९ ।।

न शशाकाथ तद् द्रष्टुं पादरूपं रवेः पुनः।
अर्चास्वपि ततः पादौ न कश्चित् कारयेत् क्वचित्।। ११.३० ।।

यः करोति स पापिष्ठां गतिमाप्नोति निन्दिताम्।
कुष्ठरोगमवाप्नोति लोकेऽस्मिन् दुःखसंयुतः।। ११.३१ ।।

तस्माच्च धर्म्मकामार्थी चित्रेष्वायतनेषु च।
न क्वचित्कारयेत्पादौ देवदेवस्य धीमतः।। ११.३२ ।।

ततः स भगवान्! गत्वा भूर्लोकममराधिपः।
कामयामास कामार्तो मुख एव दिवाकरः।। ११.३३ ।।

अश्वरूपेण महता तेजसा च समावृतः।
संज्ञा च मनसा क्षोभमगमद्भयविह्वला।। ११.३५ ।।
नासा पुटाभ्यामुत्सृष्टं परोऽयमितिशङ्कया।
तद्रेतसस्ततो जातावश्विनावितिनिश्चितम्।। ११.३६ ।।

दस्रौ सुतत्वात् सञ्जातौ नासत्यौ नासिकाग्रतः।
ज्ञात्वाचिराच्च तं देवं सन्तोषमगमत्परम्।।
विमानेनागमत् स्वर्गं पत्या सह मुदान्विता।। ११.३७ ।।

सावर्णोऽपि मनुर्मेरावद्याप्यास्ते तपोधनः।
शनिस्तपोबलादाप ग्रहसाम्यं ततः पुनः।। ११.३८ ।।

यमुना तपती चैवपुनर्नद्यौ बभूवतुः।
विष्टिर्घोरात्मिका तद्वत् कालत्वेन व्यवस्थिता।। ११.३९ ।।

मनोर्वैवस्वतस्यासन् दशपुत्रा महाबलाः।
इलस्तु प्रथमस्तेषां पुत्रेष्ट्यां समजायत।। ११.४० ।।

इक्ष्वाकुः कुशनाभश्च अरिष्टो धृष्ण एव च।
नरिष्यतः करूपश्च शर्य्यातिश्च महाबलः।।
पृषध्रश्चाथ नाभागः सर्वे ते दिव्यमानुषाः।। ११.४१ ।।

अभिषिच्य मनुः पुत्रमिलं ज्येष्ठं स धार्मिकः।
जगाम तपसे भूयः स महेन्द्रवनालयम्।। ११.४२ ।।

अथ दिग्जयसिध्यर्थमिलः प्रायान् महीमिमाम्।
भ्रमन् द्वीपानि सर्वाणि क्ष्माभृतः संप्रधर्षयन्।। ११.४३ ।।

जगामोपवनं शम्भोरश्वाकृष्टः प्रतापवान्।
कल्पद्रुमलताकीर्णं नाम्ना शरवणं महत्।। १०.४४ ।।

रमते यत्र देवेशः शम्भुः सोमार्द्धशेखरः।
उमया समयस्तत्र पुरा शरवणे कृतः।। ११.४५ ।।

पुन्नामसत्त्वं यत् किञ्चिदागमिष्यति ते वने।
स्त्रीत्वमेष्यति तत्सर्वं दश योजन मण्डले।। ११.४६ ।।

अज्ञातसमयो राजा इलः शरवणे पुरा।
स्त्रीत्वमाप विशन्नेव व़डवात्त्वं हयस्तदा।। ११.४७ ।।

पुरुषत्वं हृतं सर्वं स्त्रीरूपे विस्मितो नृप।
इलेति साभवन्नारी पीनोन्नत घनस्तनी।। ११.४८ ।।

उन्नतश्रोणिजघना पद्म पत्रायतेक्षणा।
पूर्णेन्दुवदना तन्वी विलासोल्लासितेक्षणा।। ११.४९ ।।

मूलोन्नतायतभुजा नीलकुञ्चितमूर्धजा।
तनुलोमा सुदशना मृदुगम्भीरभाषिणी।। ११.५० ।।

श्यामगौरेण वर्णेन हंसवारणगामिनी।
कार्मुक भ्रू युगोपेता तनु ताम्र नखाङ्करा।। ११.५१ ।।

भ्रमन्ती च वने तस्मिन् चिन्तयामास भामिनी।
को मे पिताऽथवा भ्राता का मे माता भवेदिह।। ११.५२ ।।

कस्य भर्तुरहं दत्ता कियद्वत्स्यामि भूतले।
इति चिन्तयती दृष्टा सोमपुत्रेण साङ्गना।। ११.५३ ।।

इलारूपसमाक्षिप्त मनसा वरवर्णिनीम्।
बुधस्तदाप्तये यत्नमकरोत् कामपीड़ितः।। ११.५४ ।।

विशिष्टाकारवान् दण्डी सकमण्डलु पुस्तकः।
वेणुदण्डकृतानेक पवित्रक गणित्रकः।। ११.५५ ।।

द्विजरूपः शिखी ब्रह्मनिगदन् कर्णकुण्डलः।
वटुभिश्चान्वितोयुक्तैः समित्पुष्पकुशोदकैः।। ११.५६ ।।

किलान्विषन्वने तस्मिन्नाजुहाव स तामिलाम्।
बहिर्वनस्यान्तरितः किल पादप मण्डले।। ११.५७ ।।

ससम्भ्रममकस्मात्तां सोपालम्भमिवावदत्।
त्यक्त्वाग्नि होत्रशुश्रूषां क्व गता मन्दिरान्मम।। ११.५८ ।।
इयं विहारवेला ते ह्यतिक्रामति साम्प्रतम्।
एह्येहि पृथुसुश्रोणि! सम्भ्रान्ता केन हेतुना ।। ११.५९ ।।

इयं सायन्तनीवेला विहारस्येह वर्तते।
कृत्वोपलेपनं पुष्पैरलंकुरु गृहं मम।। ११.६० ।।

सात्त्वब्रवीद्विस्मृताहं सर्वमेतत्तपोधन!।
आत्मानं त्वाञ्च भर्तारं कुलञ्च वद मेऽनघ।। ११.६१ ।।

बुधः प्रोवाच तां तन्वीमिला त्वं वरवर्णिनि!।
अहञ्च कामुको नाम बहुविद्योबुधः स्मृतः।। ११.६२ ।।

तेजस्विनः कुले जातः पिता मे ब्राह्मणाधिपः।
इति सा तस्य वचनात् प्रविष्टा बुधमन्दिरम्।। ११.६३ ।।

रत्नस्तम्भसमायुक्तं दिव्यमाया विनिर्मितम्।
इला कृतार्थमात्मानं मेने तद्भवनस्थिता।। ११.६४ ।।

अहोवृत्तमहोरूपमहोधनमहोकुलम्।
मम चास्य च मे भर्तुरहोलावण्यमुत्तमम्।। ११.६५ ।।

रेमे च सा तेन सममतिकालमिला ततः।
सर्वभोगमये गेहे यथेन्द्रभवने तथा।। ११.६६ ।।