मत्स्यपुराणम्/अध्यायः १२४

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पृथिवीपरिमाणवर्णनम्।
सूत उवाच।
अत ऊद्‌र्ध्वं प्रवक्ष्यामि सूर्य्याचन्द्रमसोर्गतिम्।
सूर्य्याचन्द्रमसावेतौ भ्राजन्तौ यावदेवतु।। १२४.१ ।।

सप्तद्वीपसमुद्राणां द्वीपानां भवति विस्तरः।
विस्तरार्द्धं पृथिव्यास्तु भवेदन्यत्र बाह्यतः।। १२४.२ ।।

पर्यासपरिमाणञ्च चन्द्रादित्यौ प्रकाशतः।
पर्यासपारिमाण्यात्तु बुधैस्तुल्यं दिवः स्मृतम्।। १२४.३ ।।

त्रीन् लोकान् प्रतिसामान्यात् सूर्य्यो यात्यविलम्बतः।
अचिरात्तु प्रकाशेन अवनात्तु रविः स्मृतः।। १२४.४ ।।

भूयो भूयः प्रवक्ष्यामि प्रमाणं चन्द्रसूर्य्ययोः.
महितत्वान्‌महच्छब्दो ह्यस्मिन्नर्थे निगद्यते।। १२४.५ ।।

अस्य भारतवर्षस्य विष्कम्भात् तुल्यविस्तृतम्।
मण्‍डलं भास्करस्याथ योजनैस्तन्निबोधत।। १२४.६ ।।

नवयोजनसाहस्रो विस्तारो मण्डलस्य तु ।
विस्तारत्रिगुणश्चापि परिणाहोऽत्र मण्डले।। १२४.७ ।।

विष्कम्भान् मण्डलाच्चैव भास्कराद् द्विगुणः शशी।
अतः पृथिव्या वक्ष्यामि प्रमाणं योजनैः पुनः।। १२४.८ ।।

सप्तद्वीपसमुद्राया विस्तारो मण्डलस्य तु।
इत्येतदिह संख्यातं पुराणे परिमाणतः।। १२४.९ ।।

तद्वक्ष्यामि प्रसंख्याय साम्प्रतञ्चाभिमानिभिः।
अभिमानिनो ह्यतीता ये तुल्यास्ते साम्प्रतैस्त्विह।। १२४.१० ।।

देवदेवैरतीतास्तु रूपैर्नामभिरेव च।
तस्माद्वै साम्प्रतैर्देवैर्वक्ष्यामि वसुधातलम्।। १२४.११ ।।

दिव्यस्य सन्निवेशो वै साम्प्रतैरेव कृत्स्नशः।
शतार्द्धकोटिविस्तारा पृथिवी कृत्स्नशः स्मृता।। १२४.१२ ।।

तस्याश्चार्द्धप्रमाणञ्च मेरोश्चैवोत्तरोत्तरम्।
मेरोर्मध्ये प्रतिदिशं कोटिरेकातु सा स्मृता।। १२४.१३ ।।

तथा शतसहस्राणामेकोननवतिं पुनः।
पञ्चाशच्च सहस्राणि पृथिव्यर्द्धस्य विस्तरः।। १२४.१४ ।।

पृथिव्या विस्तरं कृत्स्नं योजनैस्तन्निबोधत।
तिस्रः कोट्यस्तु विस्तारात् संख्यातास्तु चतुर्दिशम्।। १२४.१५ ।।

तथा शतसहस्राणामेकोनाशीतिरुच्यते।
सप्तद्वीपसमुद्रायाः पृथिव्याः स तु विस्तरः।। १२४.१६ ।।

विस्तारं त्रिगुणञ्चैव पृथिव्यन्तरमण्डलम्।
गणितं योजनानान्तु कोट्यस्त्वेकादशस्मृताः।। १२४.१७ ।।

तारकास्तन्निवेशस्य दिवि यावत्तु मण्डलम्।
पर्याप्तसन्निवेशस्य भूमेस्तावत्तु मण्डलम्।। १२४.१८ ।।

पर्यासपरिमाणञ्च भूमेस्तुल्यं दिवः स्मृतम्।
मेरोः प्राच्यां दिशायान्तु मानसोत्तरमूर्द्धनि।। १२४.१९ ।।

वस्त्वेकसारा माहेन्द्री पुण्या हेमपरिष्कृता।
दक्षिणेन पुनर्मेरोर्मानसस्य तु पृष्ठतः।। १२४.२० ।।

वैवस्वतो निवसति यमः संयमने पुरे।
प्रतीच्यान्तु पुनर्मेरोर्मानसस्य तु मूर्द्धनि।। १२४.२१ ।।

सुषा नाम पुरी रम्या वरुणस्यापि धीमतः।
दिश्युत्तरायां मेरोस्तु मानसस्यैव मूर्द्धनि।। १२४.२२ ।।

तुल्या महेन्द्रपुर्यापि सोमस्यापि विभावरी।
मानसोत्तरपृष्ठे तु लोकपालाश्चतुर्दिशम्।। १२४.२३ ।।

स्थिता धर्मव्यवस्थार्थं लोकसंरक्षणाय च।
लोकपालोपरिष्टात्तु सर्वतोदक्षिणायने।। १२४.२४ ।।

काष्ठागतस्य सूर्य्यस्य गतिस्तत्र निबोधत।
दक्षिणोपक्रमे सूर्य्यः क्षिप्तेषुरिव सर्पति।। १२४.२५ ।।

ज्योतिषाञ्च क्रमादाय सततं परिगच्छति।
मध्यगश्चामरावत्यां यदा भवति भास्करः।। १२४.२६ ।।

वैवस्वते संयमने उद्यन् सूर्य्यः प्रद्रृश्यते।
सुषायामर्द्धरात्रस्तु विभावर्यास्तमेति च।। १२४.२७ ।।

वैवस्वते संयमने मध्याह्ने तु रविर्यदा।
सुषायामथ वारुण्यामुत्तिष्ठन् स तु द्रृश्यते।। १२४.२८ ।।

विभावर्यामर्द्धरात्रं माहेन्द्र्यामस्तमेव च।
सुषायामथ वारुण्यां मध्याह्ने तु रविर्यदा।। १२४.२९ ।।

विभावर्य्यां सोमपुर्य्यां उत्तिष्ठति विभावसुः।
महेन्द्रस्यामरावत्यामुद्गच्छति दिवाकरः।। १२४.३० ।।

अर्द्धरात्रं संयमने वारुण्यामस्तमेति च।
स शीघ्रमेव पर्येति भानुरालातचक्रवत्।। १२४.३१ ।।

भ्रमन् वै भ्रममाणानि ऋक्षाणि चरते रविः।
एवं चतुर्षु पार्श्वेषु दक्षिणां तेषु सर्पति।। १२४.३२ ।।

उदयास्तमये वाऽसावुत्तिष्ठति पुनः पुनः।
पूर्वाह्णे चापराह्णे च द्वौ द्वौ देवालयौ तु सः।। १२४.३३ ।।

पतत्येकन्तु मध्याह्ने भाभिरेव च रश्मिभिः।
उदितो वर्धमानाभिर्मध्याह्ने तपते रविः।। १२४.३४ ।।

अतः परं ह्रसन्तीभिर्गोभिरस्तं स गच्छति।
उदयास्तमयाभ्यां च स्मृते पूर्वापरे तु वै।। १२४.३५ ।।

याद्रृक् पुरस्तात्तपति याद्रृक्‌ पृष्ठे तु पार्श्वयोः।
यत्रोदयस्तु दृश्येत तेषां स उदयः स्मृतः।। १२४.३६ ।।

प्रणाशं गच्छते यत्र तेषामस्तः स उच्यते।
सर्वेषामुत्तरे मेरुर्लोकालोकस्य दक्षिणे।। १२४.३७ ।।

विदूरभावादर्कस्य भूमेरेषा गतस्य च।
श्रयन्ते रश्मयो यस्मात्तेन रात्रौ न द्रृश्यते।। १२४.३८ ।।

ऊद्‌र्ध्वं शतसहस्रांशुः स्थितस्तत्र प्रद्रृश्यते।
एवं पुष्करमध्ये तु यदा भवति भास्करः।। १२४.३९ ।।

त्रिंशद्भागञ्च मेदिन्या मुहूर्त्तेन स गच्छति।
योजनानां सहस्रस्य इमां संख्यां निबोधत।। १२४.४० ।।

पूर्णं शतसहस्राणां एकत्रिंशच्च सा स्मृता।
पञ्चाशच्च सहस्राणि तथान्यान्यधिकानि च।। १२४.४१ ।।

मौहूर्तिकी गतिर्ह्येषा सूर्य्यस्त तु विधीयते।
एतेन क्रमयोगेन यदा काष्ठान्तु दक्षिणाम्।। १२४.४२ ।।

परिगच्छति सूर्य्योऽसौ मासं काष्ठामुदक् दिनात्।
मध्येन पुष्करस्याथ भ्रमते दक्षिणायने।। १२४.४३ ।।

मानसोत्तरमेरोस्तु अन्तरं त्रिगुणं स्मृतम्।
सर्वतो दक्षिणायान्तु काष्ठायां तन्निबोधत।। १२४.४४ ।.

नवकोट्यः प्रसंख्याता योजनैः परिमण्‍डलम्।
तथा शतसहस्राणि चत्वारिंशञ्च पञ्च च।। १२४.४५ ।।

अहोरात्रात् पतङ्गस्य गतिरेषा विधीयते।
दक्षिणादिङ्‌निवृत्तोऽसौ विषुवस्थो यदा रविः।। १२४.४६ ।।

क्षीरोदस्य समुद्रस्योत्तरतोऽपि दिशं चरन्।
मण्डलं विषुवच्चापि योजनेस्तन्निबोधत।। १२४.४७ ।।

तिस्रः कोट्यस्तु सम्पूर्णा विषुवस्यापि मण्डलम्।
तथा शतसहस्राणि विंशत्येकाधिकानि तु।। १२४.४८ ।।

श्रावणे चोत्तरां काष्ठां चित्रभानुर्यदा भवेत्।
गोमेदस्य परद्वीपे उत्तराञ्च दिशं चरन्।। १२४.४९ ।।

उत्तरायाः प्रमाणन्तु काष्ठाया मण्डलस्य तु।
दक्षिणोत्तरमध्यानि तानि विन्द्याद्यथाक्रमम्।। १२४.५० ।।

स्थानं जरद्‌गवं मध्ये तथैरावतमुत्तरम्।
वैश्वानरं दक्षिणतो निर्दिष्टमिह तत्त्वतः।। १२४.५१ ।।

नागवीथ्युत्तरा वीथी ह्यजवीथिस्तु दक्षिणा।
उभे आषाढमूलन्तु अजवीथ्यादयस्त्रयः।। १२४.५२ ।।

अभिजित् पूर्वतः स्वाति न्नागवीथ्युत्तरास्त्रयः।
अश्विनीकृत्तिकायाम्या नागवीथ्यस्त्रयः स्मृताः।। १२४.५३ ।।

रोहिण्यार्द्रा मृगशिरो नागवीथिरिति स्मृता।
पुष्याश्लेषा पुनर्वस्वोर्वीथी चैरावती स्मृता।। १२४.५४ ।।

त्रिस्रस्तु वीथयो ह्येता उत्तरा मार्ग उच्यते।
पूर्वउत्तरफल्गुन्यौ मघा चैवार्षभी भवेत्।। १२४.५५ ।।

पूर्वोत्तरप्रोष्ठपदौ गोवीथी रेवती स्मृता।
श्रवणञ्च धनिष्ठा च वारुणञ्च जरद्‌गवम्।। १२४.५६ ।।

एतास्तु वीथयस्तिस्रो मध्यमो मार्ग उच्यते।
हस्त चित्रा तथा स्वाती ह्यजवीथिरितिस्मृता।। १२४.५७ ।।

जेष्ठा विशाखा मैत्रञ्च मृगवीथी तथोच्यते।
मूलं पूर्वोत्तराषाढ़े वीथीवैश्वानरी भवेत्।। १२४.५८ ।।

स्मृतास्तिस्रस्तु वीथ्यस्ता मार्गे वै दक्षिणे पुनः।
काष्ठयोरन्तरञ्चैतद्वक्ष्ये योजनैः पुनः।। १२४.५९ ।।

एतच्छतसहस्राणामेकत्रिंशत्तु वै स्मृतम्।
शतानि त्रीणि चान्यानि त्रयस्त्रिंशत्तथैव च।। १२४.६० ।।

काष्ठयोरन्तरं ह्येतद्योजनानां प्रकीर्त्तितम्।
काष्ठयोर्लेखयोश्चैव अयने दक्षिणोत्तरे।। १२४.६१ ।।

ते वक्ष्यामि प्रसंख्याय योजनैस्तु निबोधत।
एकैकमन्तरं तद्वद्युक्तान्येतानि सप्तभिः।। १२४.६२ ।।

सहस्रेणातिरिक्ता च ततोऽन्या पञ्चविंशतिः।
लेखयोः काष्ठयोश्चैव बाह्याभ्यन्तरयोश्चरन्।। १२४.६३ ।।

अभ्यन्तरं स पर्येति मण्डलान्युत्तरायणे।
बाह्यतो दक्षिणेनैव सततं सूर्य्यमण्डलम्।। १२४.६४ ।।

चरन्नसावुदीच्याञ्च ह्यशीत्या मण्डलान् शतम्।
अभ्यन्तरं स पर्येति क्रमते मण्डलानि तु।। १२४.६५ ।।

प्रमाणां मण्डलस्यापि योजनानान्निबोधत।
योजनानां सहस्राणि दश चाष्टौ तथा स्मृतम्।। १२४.६६ ।।

अधिकान्यष्टपञ्चाशद्योजनानि तु वै पुनः।
विष्कम्भो मण्डलस्यैव तिर्यक् स तु विधीयते।। १२४.६७ ।।

अहस्तु चरते नाभेः सूर्य्यो वै मण्डलं क्रमात्।
कुलालचक्रपर्यन्तो यथा चन्द्रो रविस्तथा।। १२४.६८ ।।

दक्षिणे चक्रवत् सूर्य्यस्तथा शीघ्रं निवर्त्तते।
तस्मात् प्रकृष्टां भूमिं तु कालेनाल्पेन गच्छति।। १२४.६९ ।।

सूर्य्यो द्वादशभिः शीघ्रं मुहूर्त्तैर्दक्षिणायने।
त्रयोदशार्द्धमृक्षाणां मध्ये चरति मण्डलम्।। १२४.७० ।।

मुहूर्त्तैस्तानि ऋक्षाणि नक्तमष्टादशैश्चरन्।
कुलालचक्रमध्यस्थो यथा मन्दं प्रसर्पति।। १२४.७१ ।।

उदग्याने तथा सूर्य्यः सर्पते मन्दविक्रमः।
तस्माद्दीर्घेण कालेन भूमिं सोऽल्पां प्रसर्पति
सूर्य्योऽष्टादशभिरह्नो मुहूर्तैरुदगायने।। १२४.७२ ।।

त्रयोदशानां मध्ये तु ऋक्षाणां चरते रविः।
मुहूर्तैस्तानि ऋक्षाणि रात्रौ द्वादशभिश्चरन्।। १२४.७३ ।।

ततो मन्दतरं ताभ्यां चक्रन्तु भ्रमते पुनः।
मृत्पिण्ड इव मध्यस्थो भ्रमतेऽसौ ध्रुवस्तथा।। १२४.७४ ।।

मुहूर्तैस्त्रिंशता तावदहोरात्रं ध्रुवो भ्रमत्।
उभयोः काष्ठयोर्मध्ये भ्रमते मण्डलानि तु।। १२४.७५ ।।

उत्तरक्रमणेऽर्कस्य दिवा मन्दगतिः स्मृता।
तस्यैव तु पुनर्नक्तं शीघ्रा सूर्य्यस्य वै गतिः।। १२४.७६ ।।

दक्षिणप्रक्रमे वापि दिवा शीघ्रं विधीयते।
गतिः सूर्यस्य वै नक्तं मन्दा चापि विधीयते।। १२४.७७ ।।

लोकसन्तानतोह्येष वैश्वानरपथाद्‌बहिः।
व्युष्टिर्यावत् प्रभा सौरी पुष्करान् संप्रवर्त्तते।। १२४.७८ ।।

पार्श्वेभ्यो बाह्यतस्तावल्लोकालोकश्च पर्वतः।
योजनानां सहस्राणि दशोद्‌र्ध्वं चोच्छ्रितो गिरिः।। १२४.७९ ।।

प्रकाशश्चाप्रकाशश्च पर्वतः परिमण्डलः।
नक्षत्रचन्द्रसूर्य्याश्च ग्रहास्तारागणैः सह।। १२४.८० ।।

अभ्यन्तरे प्रकाशन्ते लोकालोकस्य वै गिरेः।
एतावानेवलोकस्तु निरालोकस्ततः परम्।। १२४.८१ ।।

लोक आलोकने धातुर्निरालोकस्त्वलोकता।
लोकालोकौ तु संधत्ते तस्मात् सूर्य्यः परिभ्रमन्।। १२४.८२ ।।

तस्मात्‌ सन्ध्येति तामाहु रुषा व्युष्टैर्यथान्तरम्।
उषा रात्रिः स्मृता विप्रैर्व्युष्टिश्चापि अहः स्मृतम्।। १२४.८३ ।।

त्रिंशत्कलो मुहूर्तस्तु अहस्ते दशपञ्च च।
ह्रासो वृद्धिरहर्भागैर्दिवसानां यथा तु वै।। १२४.८४ ।।

सन्ध्या मुहूर्तमात्रायां ह्रासवृद्धी तु ते स्मृते।
लेखा प्रभृत्यथादित्ये त्रिमुहूर्तागते तु वै।। १२४.८५ ।।

प्रातः स्मृतस्ततः कालो भागांश्चाहुश्च पञ्च च।
तस्मात् प्रातर्गतात्कालान्मुहूर्ताः सङ्गवस्त्रयः।। १२४.८६ ।।

मध्याह्नस्त्रिमुहूर्तस्तु तस्मात् कालादनन्तरम्।
तस्मान्मध्यन्दिनात् कालाद्अपराह्ण इति स्मृतः।। १२४.८७ ।।

त्रय एव मुहूर्तास्तु काल एषस्मृतो बुधैः।
अपराह्णव्यतीताच्च कालः सायं स उच्यते।। १२४.८८ ।।

दशपञ्च मुहूर्ताह्नो मुहूर्तास्त्रय एव च।
दशपञ्च मुहूर्तं वै अहस्तु विषुवे स्मृतम्।। १२४.८९ ।।

वर्धत्यतो ह्रसत्येव अयने दक्षिणोत्तरे।
अहस्तु ग्रसते रात्रिं रात्रिस्तु ग्रसते अहः।। १२४.९० ।।

शरद्वसन्तयोर्मध्यं विषुवन्तु विधीयते।
आलोकान्तः स्मृतो लोको लोकाश्चालोक उच्यते।। १२४.९१ ।।

लोकपालाः स्थितास्तत्र लोकालोकस्य मध्यतः।
चत्वारस्ते महात्मानस्तिष्ठन्त्याभूतसंप्लवम्।। १२४.९२ ।।

सुधामा चैव वैराजः कर्दमश्च प्रजापतिः।
हिरण्यरोमा पर्जन्यः केतुमान् राजसाश्च सः।। १२४.९३ ।।

निर्द्वन्द्वा निरभीमाना निस्तन्द्रा निष्परिग्रहाः।
लोकपालाः स्थितास्त्वेते लोकालोके चतुर्दिशम्।। १२४.९४ ।।

उत्तरं यदगस्त्यस्य श्रृङ्गं देवर्षिसेवितम्।
पितृयानः स्मृतः पन्था वैश्वानरपथाद्‌बहिः।। १२४.९५ ।।

तत्रासते प्रजाकामा ऋषयो येऽग्निहोत्रिणः।
लोकस्य सन्तानकराः पितृयाने पथिस्थिताः।। १२४.९६ ।।

भूतारम्भकृतं कर्म्म आशिषश्चविशाम्पते।
प्रारम्भन्ते लोककामास्तेषां पन्था सदक्षिणः।। १२४.९७ ।।

चलितन्ते पुनर्धर्म स्थापयन्ति युगे युगे।
सन्तप्ततपसा चैव मर्यादाभिः श्रुतेन च।। १२४.९८ ।।

जायमानास्तु पूर्वे वै पश्चिमानां गृहेषु ते।
पश्चिमाश्चैव पूर्वेषां जायन्ते निधनेष्विह।। १२४.९९ ।।

एवमवर्तमानास्ते वर्तन्त्याभूतसंप्लवम्।
अष्टाशीतिसहस्राणि ऋषीणां गृहमेधिनाम्।। १२४.१०० ।।

सवितुर्दक्षिणं मार्गमाश्रित्याभूतसंप्लवम्।
क्रियावतां प्रसंख्यैषा ये श्मशानानि भेजिरे।। १२४.१०१ ।।

लोकसंव्यवहारार्थं भूतारम्भकृतेन च।
इच्छाद्वेषरताच्चैव मैथुनोपगमाच्च वै।। १२४.१०२ ।।

तथा कामकृतेनेह सेवनाद्विषयस्य च।
इत्येतैः कारणैः सिद्धाः श्मशानानीह भेजिरे।। १२४.१०३ ।।

प्रजैषिणः सप्तऋषयो द्वापरेष्विह जज्ञिरे।
सन्ततिन्ते जुगुप्सन्ते तस्मान्मृत्युर्जितस्तु तैः।। १२४.१०४ ।।

अष्टाशीतिसहस्राणि तेषामप्यूर्ध्वरेतसाम्।
उदक् पन्थानपर्यन्तमाश्रित्याभूतसंप्लवम्।। १२४.१०५ ।।

ते सम्प्रयोगाल्लोकस्य मिथुनस्य च वर्जनात्।
ईर्ष्याद्वेषनिवृत्त्या च भूतारम्भविवर्जनात्।। १२४.१०६ ।।

इत्येतैः कारणैः शुद्धैस्तेऽमृतत्वं हि भेजिरे।
आभूतसंप्लवस्थानाममृतत्वं विभाव्यते।। १२४.१०७ ।।

त्रैलोक्यस्थितिकालो हि न पुनर्मारगामिनाम्।
भ्रूणहत्याश्वमेधादि पापपुण्यनिभैः परम्।।
आभूतसंप्लवान्ते तु क्षीयन्ते चोर्ध्वरेतसः।। १२४.१०८ ।।

ऊर्ध्वोत्तरमृषिभ्यस्तु ध्रुवो यत्रानुसंस्थितः।
एतद्विष्णुपदं दिव्यं तृतीयं व्योम्नि भास्वरम्।। १२४.१०९ ।।

यत्र गत्वा न शोचन्ति तद्विष्णोः परमम्पदम्।
धर्मे ध्रुवस्य तिष्ठन्ति ये तु लोमस्य काङ्‌क्षिणः।। १२४.११० ।।