मत्स्यपुराणम्/अध्यायः २०९

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सावित्र्युपाख्यानम्।
सत्यवानुवाच।
वनेऽस्मिन् शाद्वलाकीर्णे सहकारं मनोहरम्।
नेत्रघ्राणसुखं पश्य वसन्तं रतिवर्धनम् ।। २०९.१ ॥

वनेऽप्यशोकं दृष्ट्वैनं रागवन्तं सुपुष्पितम्।
वसन्तो हसतीवायं मामेवायतलोचने!।। २०९.२ ॥

दक्षिणे दक्षिणेनैतां पश्य रम्यां वनस्थलीम्।
पुष्पितैः किंशुकैर्युक्तां ज्वलितानलसप्रभैः ।। २०९.३ ॥

सुगन्धिकुसुमामोदो वनराजिविनिर्गतः।
करोति वायुर्दाक्षिण्यमावयोः कल्मनाशनम् ।। २०९.४ ॥

पश्चिमेन विशालाक्षि! कणिकारैः सुपुष्पितैः।
काञ्चनेन विभात्येषा वनराजी मनोरमा ।। २०९.५ ॥

अतिमुक्तलताजालरुद्धमार्गा वनस्थली।
रम्या सा चारुसर्वाङ्गी कुसुमोत्करभूषणा ।। २०९.६ ॥

मधुमत्तालि झङ्कार व्याजेन वरवर्णिनी।
चापाकृष्टिं करोतीव कामः पार्श्वे जिघांसया ।। २०९.७ ॥

फलास्वादलसद्वक्त्र पुस्कोकिल विनादिता।
विभाति चारुतिलका त्वमिवैषा वनस्थली ।। २०९.८ ॥

कोकिलश्चूतशिखरे मञ्जरीरेणुपिञ्जरः।
गदितैर्व्यक्ततां याति कुलीनश्चेष्टितैरिव ।। २०९.९ ॥

पुष्परेणुविलिप्ताङ्गी प्रियामनु सरिद्वने।
कुसुमं कुसुमं याति कूजन् कामी शिलीमुखः।। २०९.१० ॥

मञ्जरी सहकारस्य कान्तावच्चाग्रपीडिताम्।
स्वदते बहुपुष्पेऽपि पुंस्कोकिलयुवा वने ।। २०९.११ ॥

काकः प्रसूतां वृक्षाग्रे स्वामेकाग्रेण चञ्चुना।
काकीं सम्भावयत्येष पक्षाच्छादितपुत्रिकाम् ।। २०९.१२ ॥

शुभाङ्गनिम्नमासाद्य दयिता सहितो युवा।
नाहारमपि चादत्ते कामाक्रान्तः कपिञ्जल ।। २०९.१३ ॥

कलविङ्कस्तु रमयन् प्रियोत्सङ्गं समास्थितः।
मुहुर्मुहुर्विशालाक्षि! उत्कण्ठयति कामिनः ।। २०९.१४ ॥

वृक्षशाखां समारूढः शुकोऽयं सह भार्यया।
करेण लम्बयन् शाखां करोति सफलं शिरः ।। २०९.१५ ॥

वनेऽत्र पिशितास्वाद तृप्तो निद्रामुपागतः।
शेते सिंहयुवा कान्ता चरणान्तरगामिनी ।। २०९.१६ ॥

व्याघ्रयोर्मिथुनं पश्य शैलकन्दर संस्थितम्।
ययोर्नेत्र प्रभालोके गुहाभिन्नेव लक्ष्यते ।। २०९.१७ ॥

अयं द्वीपी प्रियां लेढि जिह्वाग्रेण पुनः पुनः।
प्रीतिमायाति च तया लिह्यमानः स्वकान्तया ।। २०९.१८ ॥

उत्सङ्गकृतमूर्धानं निद्रापहृतचेतसम्।
जन्तूद्धरणतः कान्तं सुखयत्येव वानरी ।। २०९.१९ ॥

भूमौ निपतितां रामां मार्जारो दर्शितोदरीम्।
नखैर्दन्तैर्दशत्येष न च पीडयते तथा ।। २०९.२० ॥

शशकः शशकी चोभे संसुप्ते पीडिते इमे।
संलोनगात्रचरणे कर्णैर्व्यक्तिमुपागते ।। २०९.२१ ॥

स्नात्वा सरसि पद्माढ्ये नागस्तु मदनप्रियः।
सम्भावयति तन्वङ्गीमृणालकबलैः प्रियाम् ।। २०९.२२ ॥

कान्त प्रोथसमुत्थानैः कान्तमार्गानुगामिनी।
करोति कवलं मस्तैर्वराही पोतकानुगा ।। २०९.२३ ॥

दृढाङ्गसन्धिर्महिषः कर्दमाक्ततनुर्वने।
अनुव्रजति धावन्तीं प्रियबद्धचतुष्करः ।। २०९.२४ ॥

पश्य चार्वङ्गि! सारङ्गं त्वं कटाक्षविभावनैः।
सभार्यं मां हि पश्यन्तं कौतूहल समन्वितम् ।। २०९.२५ ॥

पश्य पश्चिमपादेन रोही कण्डूयते मुखम्।
स्नेहार्द्रभावात्कर्षन्ती भर्त्तारं श्रृङ्गकोटिना ।। २०९.२६ ॥

द्रागिमाञ्चमरीं पश्य सितबालामगच्छतीम्।
अन्वास्ते चमरः कामी माञ्च पश्यति गर्वितः ।। २०९.२७ ॥

आतपे गवयं पश्य प्रकृष्टं भार्यया सह।
रोमन्थनं प्रकुर्वाणं काकङ्ककुदि वारयन् ।। २०९.२८ ॥

पश्येमं भार्यया सार्द्धं न्यस्ताग्र चरणद्वयम्।
विपुले बदरीस्कन्धे बदराशनकाम्यया ।। २०९.२९ ॥

हंसं सभार्यं सरसि विचरन्तं सुनिर्मलम्।
सुमुक्तस्येन्दुबिम्बस्य पश्य वै श्रियमुद्वहन् ।। २०९.३० ॥

सभार्यश्चक्रवाकोऽयं कमलाकरमध्यगः।
करोति पद्मिनीं कान्तां सुपष्पामिव सुन्दरी ।। २०९.३१ ॥

मया फलोच्चयः सुभ्रु! त्वया पुष्पोच्चयः कृतः।
इन्धनं न कृतं सुभ्रु! तत्करिष्यामि सांप्रतम् ।। २०९.३२ ॥

त्वमस्य सरसस्तीरे द्रुमच्छायां समाश्रिता।
क्षणमात्रं प्रतीक्षस्व विश्रमस्व च भामिनि ।। २०९.३३ ॥

सावित्र्युवाच।
एवमेतत्करिष्यामि मम दृष्टिपथस्त्वया।
दूरं कान्त!न कर्तव्यो बिभेमि गहने वने ।। २०९.३४ ॥

मत्स्य उवाच।
ततः स काष्ठानि चकार तस्मिन्वने तदा राजसुता समक्षम्।
तस्या ह्यदूरे सरसस्तदानीं मेने च सा तं मृतमेव राजन् ।। २०९.३४ ॥