मत्स्यपुराणम्/अध्यायः १४४

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अत्र गम्यताम् : सञ्चरणम्, अन्वेषणम्
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द्वापरयुग विवरणवर्णनम्।

सूत उवाच।
अत ऊद्‌र्ध्व प्रवक्ष्यामि द्वापरस्य विधिं पुनः।
तत्र त्रेतायुगे क्षीणे द्वापरं प्रतिपद्यते।। १४४.१ ।।

द्वापरादौ प्रजानान्तु सिद्धिस्त्रेतायुगे तु या।
परिवृत्ते युगे तस्मिंस्ततः सा वै प्रणश्यति।। १४४.२ ।।

ततः प्रवर्त्तिते तासां प्रजानां द्वापरे पुनः।
लोभो धृतिर्वणिग्युद्धं तत्त्वानामविनिश्चयः।। १४४.३ ।।

प्रध्वंसश्चैव वर्णानां कर्म्मणान्तु विपर्ययः।
यात्रा वधः परो दण्डो मानो दर्पोऽक्षमाबलम्।। १४४.४ ।।

तथा रजस्तमो भूयः प्रवृत्ते द्वापरे पुनः।
आद्ये कृतेनाधर्मोऽस्ति स त्रेतायां प्रवर्त्तितः।। १४४.५ ।।

द्वापरे व्याकुलो भूत्वा प्रणश्यति कलौ पुनः।
वर्णानां द्वापरे धर्माः सङ्कीर्यन्ते तथाश्रमाः।। १४४.६ ।।

द्वैधमुत्पद्यते चेव युगे तस्मिन्‌ श्रुतिस्मृतौ।
द्विधा श्रुतिः स्मृतिश्चैव निश्चयो नाधिगम्यते।। १४४.७ ।।

अनिश्चयावगमनाद्धर्मतत्त्वं न विद्यते।
धर्मतत्त्वे ह्यविज्ञाते मतिभेदस्तु जायते।। १४४.८ ।।
परस्परं विभिन्नास्ते द्रृष्टीनां विभ्रमेण तु।
अतो द्रष्टिविभिन्नैस्तैः कृतमत्याकुलन्त्विदम्।। १४४.९ ।।

एको वेदश्चतुष्पादः संहृत्य तु पुनः पुनः।
संक्षेपादायुषश्चैव व्यस्यते द्वापरेष्विहः।। १४४.१० ।।

वेदश्चैकश्चतुर्धा तु व्यस्यते द्वापारदिषु।
ऋषिपुत्रैः पुनर्वेदा भिद्यन्ते द्रृष्टिविभ्रमैः।। १४४.११ ।।

ते तु ब्राह्मणविन्यासैः स्वरक्रमविपर्ययैः।
संहृता ऋग्यजुः साम्नां संहितास्तैर्महर्षिभिः।। १४४.१२ ।।

सामान्याद्वैकृताच्चैव द्रृष्टिभिन्नैः क्वचित् क्वचित्।
ब्राह्मणं कल्पसूत्राणि भाष्यविद्यास्तथैव च।। १४४.१३ ।।

अन्ये तु प्रस्थितास्तान्वै केचित्तान् प्रत्यवस्थिताः।
द्वापरेषु प्रवर्तन्ते भिन्नार्थैस्तैः स्वदर्शनैः।। १४४.१४ ।।

एकमाध्वर्यवं पूर्वमासीद्‌द्वैधन्तु तत् पुनः।
सामान्यविपरीतार्थैः कृतं शस्त्राकुलन्त्विदम्।। १४४.१५ ।।

आध्वर्यवञ्च प्रस्थानैर्बहुधा व्याकुलीकृतम्।
तथैवाथर्वणां साम्नां विकल्पैः स्वस्य संक्षयैः।। १४४.१६ ।।

व्याकुलो द्वापरेष्वर्थः क्रियते भिन्नदर्शनैः।
द्वापरे सन्निवृत्ते ते वेदा नश्यन्ति वै कलौ।। १४४.१७ ।।

तेषां विपर्ययोत्पन्ना भवन्ति द्वापरे पुनः।
अद्रृष्टिर्मरणं चैव तथैव व्याध्युपद्रवाः।। १४४.१८ ।।

वाङ्नः कर्मभिर्दुः खैर्निर्वेदो जायते ततः।
निर्वेदाज्जायते तेषां दुः खमोक्षविचारणा।। १४४.१९ ।।

विचारणायां वैराग्यं वैराग्याद्दोषदर्शनम्।
दोषाणां दर्शनाच्चैव ज्ञानोत्पत्तिस्तु जायते।। १४४.२० ।।

तेषां मेधाविनां पूर्वं मर्त्ये स्वायम्भुवेऽन्तरे।
उत्पत्स्यन्तीह शास्त्राणां द्वापरे परिपन्थिनः।। १४४.२१ ।।

आयुर्वेदविकल्पाश्च अङ्गानां ज्योतिषस्य च।
अर्थशास्त्रविकल्पाश्च हेतुशास्त्रविकल्पनम्।। १४४.२२ ।।

प्रक्रिया कल्पसूत्राणां भाष्यविद्याविकत्थनम्।
स्मृतिशास्त्रप्रभेदाश्च प्रस्थानानि पृथक्‌ पृथक्।। १४४.२३ ।।

द्वापरेष्वभिवर्त्तन्ते मतिभेदास्तथा नृणाम्।
मनसा कर्म्मणा वाचा कृच्छ्राद्वार्त्ता प्रसिध्यति।। १४४.२४ ।।

द्वापरे सर्वभूतानां कालः क्लेशपरः स्मृतः।
लोभो धृतिर्वणिग्युद्धन्तत्त्वानामविनिश्चयः।। १४४.२५ ।।

वेदशास्त्रप्रणयनं वर्णानां सङ्करस्तथा।
वर्णाश्रमपरिध्वंसः कामद्वेषौ तथैव च।। १४४.२६ ।।

पूर्णो वर्षसहस्रेद्वे परमायुस्तदा नृणाम्।
निः शेषे द्वापरे तस्मिंस्तस्य सन्ध्या तु पादतः।। १४४.२७ ।।

गुणहीनास्तु तिष्ठन्ति धर्म्मस्य द्वापरस्य तु।
तथैव सन्ध्या पादेन अंशस्तस्यां प्रतिष्ठितः।। १४४.२८ ।।

द्वापरस्य तु पर्येषा पुष्यस्य च निबोधत।
द्वापरस्यांशशेषे तु प्रतिपत्तिः कलेरथ।। १४४.२९ ।।

हिंसास्तेयानृतं माया दम्भश्चैव तपस्विनाम्।
एते स्वभावाः पुष्यस्य साधयन्ति च ताः प्रजाः।। १४४.३० ।।

एष धर्म्मः स्मृतः कृत्स्नो धर्म्मश्च परिहीयते।
मनसा कर्मणा वाचा वार्त्ताः सिद्‌ध्यन्ति वानवा।। १४४.३१ ।।

कलिः प्रमारको रोगः सततं चापि क्षुद् भयम्।
अनावृष्टिभयञ्चैव देशानाञ्च विपर्ययः।। १४४.३२ ।।

न प्रमाणे स्थिति हर्यस्ति पुष्ये घोरे युगे कलौ।
गर्भस्थो म्रियते कश्चिद्‌ यौवनस्थस्तथापरः।। १४४.३३ ।।

स्थावर्ये मध्यकौमारे म्रियन्ते च कलौ प्रजाः।
अल्प तेजो बलाः पापा महाकोपा ह्यधार्मिकाः।। १४४.३४ ।।

अनृतव्रतलुब्धाश्च पुष्ये चैव प्रजाः स्थिताः।
दुरिष्टैर्दुरधीतैश्च दुराचारैर्दुरागमैः।। १४४.३५ ।।

विप्राणां कर्म्मदोषैस्तैः प्रजानां जायते भयम्।
हिंसा मानस्तथेर्ष्याच क्रोधोऽसूयाऽक्षमाऽधृतिः।। १४४.३६ ।।

पुष्ये भवन्ति जन्तूनां लोभो मोहश्च सर्वशः।
सङ्‌क्षोभो जायतेऽत्यर्थं कलिमासाद्य वै युगम्।। १४४.३७ ।।

नाधीयन्ते तथा वेदान् यजन्ते वै द्विजातयः।
उत्सीदन्ति यथा चैव वैश्यैः सार्द्धन्तु क्षत्रियाः।। १४४.३८ ।।

शूद्राणां मन्त्रयोनिस्तु सम्बन्धो ब्राह्मणैः सह।
भवतीह कलौ तस्मिन्‌ शयनासनभोजनैः।। १४४.३९ ।।

राजानः शूद्रभूयिष्ठाः पाषण्डानां प्रवृत्तयः।
काषायिणश्च निष्कच्छास्तथा कापालिनश्च ह।। १४४.४० ।।

ये चान्ये देवव्रतिनस्तथा ये धर्म्मदूषकाः।
दिव्यवृत्ताश्च ये केचिद्‌वृत्त्यर्थं श्रुतिलिङ्गनः।। १४४.४१ ।।

एवम्विधाश्च ये केचिद् भवन्तीह कलौ युगे।
अधीयते तदा वेदान् शूद्रा धर्मार्थकोविदाः।। १४४.४२ ।।

यजन्ति ह्यश्वमेधैस्तु राजानः शूद्रयोनयः।
स्त्रीबालगोवधं कृत्वा हत्वा चैव परस्परम्।। १४४.४३ ।।

उपहृत्य तथान्योन्यं साधयन्ति तदा प्रजाः।
दुः खप्रचुरताल्पायुर्देशोत्सादः सरोगताः।। १४४.४४ ।।

अधर्माभिनिवृत्तत्वं कलौ वृत्तं कलौस्मृतम्।
भ्रूणहत्या प्रजानाञ्च तथा ह्येवं प्रवर्त्तते।। १४४.४५ ।।

तस्मादायुर्बलं रूपं प्रहीयन्ते कलौ युगे।
दुः खेनाभिप्लुतानां च परमायुः शतं नृणाम्।। १४४.४६ ।।

भूत्वा च न भवन्तीह वेदाः कलियुगेऽखिलाः।
उत्सीदन्ते तथा यज्ञाः केवलं धर्महेतवः।। १४४.४७ ।।

एषा कलियुगावस्था सन्ध्यांशौ तु निबोधत।
युगे युगे तु हीयन्ते त्रींस्त्रीन् पादांश्च सिद्धयः।। १४४.४८ ।।

युगस्वभावाः सन्ध्यासु अवतिष्ठन्ति पादतः।
सन्ध्यास्वभावाः स्वांशेषु पादेनैवावतस्थिरे।। १४४.४९ ।।

एवं सन्ध्यांशके काले सम्प्राप्ते च युगान्तिके।
तेषामधर्मिणां शास्ता भृगुणाञ्च कुले स्थितः।। १४४.५० ।।

गोत्रेण वै चन्द्रमसे नाम्ना प्रमतिरुच्यते।
कलिसन्ध्यांशभागेषु मनोः स्वायम्भुवेऽन्तरे।। १४४.५१ ।।

समास्त्रिंशत्तु सम्पूर्णाः पर्यटन्वै वसुन्धराम्।
अस्त्रकर्मा स वै सेना हस्त्यश्वरथसङ्कुलाम्।। १४४.५२ ।।

प्रगृहीतायुधैर्विप्रैः शतशोऽथ सहस्रशः।
स तदातैः परिवृतो म्लेच्छान् सर्वान्निजघ्निवान्।। १४४.५३ ।।

स हत्वा सर्वशश्चैव राजानः शूद्रयोनयः।। १४४.५४ ।।

पाषण्डान् स तदा सर्वान्निः शेषानकरोत् प्रभुः।। १४४.५५ ।।

अधार्मिकाश्च ये केचित्तान्‌ सर्वान् हन्ति सर्वशः।
औदीच्यान्मध्यदेशांश्च पार्वतीयांस्तथैव च।। १४४.५६ ।।

प्राच्यान् प्रतीच्यांश्च तथा विन्ध्यपृष्ठा परान्तिकान्।
तथैव दाक्षिणात्यांश्च द्रविडान् सिंहलैः सह।। १४४.५७ ।।

गन्धारान् पारदांश्चैव पह्लवान् यवनान् शकान्।
तुषारान् बर्बशान् श्वेतान् पुलिन्दान् बर्बरान् श्वसान्।। १४४.५८ ।।

लम्पकानान्ध्रकांश्चापि चोरजातींस्तथैव च।
प्रवृत्तचक्रो बलवान्शूद्राणामन्तकृद् बभौ।। १४४.५९ ।।

विद्राव्य सर्वभूतानि चचार वसुधामिमाम्।
मानवस्य तु वंशे तु नृदेवस्येह जज्ञिवान्।। १४४.६० ।।

पूर्वजन्मनि विष्णुश्च प्रमतिर्नाम वीर्यवान्।
स्वतः स वै चन्द्रमसः पूर्वं कलियुगे प्रभुः।। १४४.६१ ।।

द्वात्रिंशेऽभ्युदिते वर्षे प्रकान्तो विंशतिं समाः।
निजघ्ने सर्वभूतानि मानुषाण्येव सर्वशः।। १४४.६२ ।।

कृत्वा वाजावशिष्टान्तां पृथ्वीं क्रूरेण कर्मणा।
परस्परनिमित्तेन कालेनाकस्मिकेन च।। १४४.६३ ।।

संस्थिता सह सायासे सेना प्रमतिना सह।
गङ्गायमुनयोर्मध्ये सिद्धिं प्राप्ताः समाधिना।। १४४.६४ ।।

ततस्तेषु प्रनष्टेषु सन्ध्यांशे क्रूरकर्म्मसु।
उत्साद्य पार्थिवान् सर्वान् तेष्वतीतेषु वे तदा ।। १४४.६५ ।।

ततः सन्ध्यांशके काले संप्राप्ते च युगान्तके।
स्थिताः स्वल्पावशिष्टासु प्रजास्विह क्वचित् क्वचित्।। १४४.६६ ।।

स्वाप्रदानास्तथा ते वै लोभाविष्टास्तु वृन्दशः।
उपहिंसन्ति चान्योन्यं प्रलुम्पन्ति परस्परम्।। १४४.६७ ।।

अराजके युगांशे तु सङ्क्षये समुपस्थिते।
प्रजास्ता वै तदा सर्वाः परस्परभयार्दिताः।। १४४.६८ ।।

व्याकुलास्ताः परावृत्तास्त्यज्य देवगृहाणि तु।
स्वान् स्वान् प्राणानवेक्षन्तो निष्कारुण्यात् सुदुः खिताः।। १४४.६९ ।।

नष्टे श्रौतस्मृते धर्मे कामक्रोधवशानुगाः।
निर्मर्यादा निरानन्दा निः स्नेहानिरपत्रपाः।। १४४.७० ।।

नष्टे धर्मे प्रतिहता हृस्वकाः पञ्चविंशकाः।
हित्वा दारांश्च पुत्रांश्च विषादव्याकुलप्रजाः।। १४४.७१ ।।

अनावृष्टिहतास्ते वै वार्त्तामुत्सृज्यदुः खिताः।
चीरकृष्णाजिनधरा निष्क्रुद्धानिष्परिग्रहाः।। १४४.७२ ।।

वर्णाश्रमपरिभ्रष्टाः सङ्करङ्घोरमास्थिताः।
एवं कष्टमनुप्राप्ता ह्यल्पशेषाः प्रजास्ततः।। १४४.७३ ।।

जन्तवश्च क्षुधाविष्टा दुः खान्निर्वेदमागमन्।
संश्रयन्तिच देशांस्तांश्चक्रवत् परिवर्त्तनाः।। १४४.७४ ।।

ततः प्रजास्तु ताः सर्वा मांसाहारा भवन्ति हि।
मृगान् वराहान् वृषभान्ये चान्ये वनचारिणः।। १४४.७५ ।।

भक्ष्यांश्चैवाप्यभक्ष्यांश्च सर्वांस्तान् भक्षयन्ति ताः।
समुद्रं संश्रिता यास्तु नदींश्चैव प्रजास्तु ताः।। १४४.७६ ।।

तेऽपि मत्स्यान् हरन्तीह आहारार्थं च सर्वशः।
अभक्ष्याहारदोषेण एकवर्णगता प्रजाः।। १४४.७७ ।।

यथा कृतयुगे पूर्वमेकवर्णमभूत्किल।
तथा कलियुगस्यान्ते शूद्रीभूताः प्रजास्तथा।। १४४.७८ ।।

एवं वर्षशतं पूर्णं दिव्यं तेषां न्यवर्त्तत।
षट्‌त्रिंशच्च सहस्राणि मानुषाणितु तानि वै।। १४४.७९ ।।

अथ दीर्घेण कालेन पक्षिणः पशवस्तथा।
मत्स्याश्चैव हताः सर्वैः क्षुधाविष्टैश्च सर्वशः।। १४४.८० ।।

निः शेषेष्वथ सर्वेषु मत्स्यपक्षिपशुष्वथ।
सन्ध्यांशे प्रतिपन्नेतु निः शेषास्तु तदा कृताः।। १४४.८१ ।।

ततः प्रजास्तु सम्भूय कन्दमूलमथोऽखनन्।
फलमूलाशनाः सर्वे अनिकेतास्तथैव च।। १४४.८२ ।।

वल्कलान्यथ वासांसि अधः शय्याश्च सर्वशः।
परिग्रहो न तेष्वस्ति धनशुद्धिमवाप्नुयुः।। १४४.८३ ।।

एवं क्षयं गमिष्यन्ति ह्यल्पशिष्टाः प्रजास्तदा।
तासामल्पावशिष्टनामाहाराद् वृद्धिरिष्यते।। १४४.८४ ।।

एवं वर्षशतं दिव्यं सन्ध्यांशस्तस्य वर्त्तते।
ततो वर्षसहस्रान्ते अल्पशिष्टाः स्त्रियः सुताः।। १४४.८५ ।।

मिथुनानि तु ताः सर्वाह्यन्योन्यं संप्रजज्ञिरे।
ततस्तास्तु म्रियन्ते वै पूर्वोत्पन्नाः प्रजास्तु याः।। १४४.८६ ।।

जातमात्रेष्वपत्येषु ततः कृतमवर्त्तत।
यथा स्वर्गे शरीराणि नरके चैव देहिनाम्।। १४४.८७ ।।

उपभोगसमर्थानि एवं कृतयुगादिषु।
एवं कृतस्य सन्तानः कलेश्चैव क्षयस्तथा।। १४४.८८ ।।

विचारणात्तु निर्वेदः साम्यावस्थात्मना तथा।
ततश्चैवात्मसम्बोधः सम्बोधाद्धर्म्मशीलता।। १४४.८९ ।।

कलिशिष्टेषु तेष्वेवं जायन्ते पूर्ववत् प्रजाः।
भाविनोऽर्थस्य च बलात्ततः कृतमवर्त्तत।। १४४.९० ।।

अतीतानागतानि स्युर्य्यानि मन्वन्तरेष्विह!।
एते युगस्वभावास्तु मयोक्तास्तु समासतः।। १४४.९१ ।।

विस्तरेणानुपूर्व्याच्च नमस्कृत्य स्वयम्भुवे।
प्रवृत्तेतु ततस्तस्मिन् पुनः कृतयुगे तु वै।। १४४.९२ ।।

उत्पन्नाः कलिशिष्टेषु प्रजाः कार्त्तयुगास्तथा।
तिष्ठन्ति चेह ये सिद्धा अद्रृष्टा विहरन्ति च।। १४४.९३ ।।

सह सप्तर्षिभिर्ये तु तत्र ये च व्यवस्थिताः।
ब्रह्मक्षत्रविशः शूद्रा बीजार्थे य इह स्मृताः।। १४४.९४ ।।

तेषां सप्तर्षयो धर्मं कथयन्तीह तेषु च।
वर्णाश्रमाचारयुतं श्रौतस्मार्त्तविधानतः।। १४४.९५ ।।

एवं तेषु क्रियावत्सु प्रवर्त्तन्तीह वै कृते।। १४४.९६ ।।
श्रौतस्मार्त्तस्थितानान्तु धर्मे सप्तर्षिदर्शिते।
ते तु धर्मव्यवस्थार्थं तिष्ठन्तीह कृते युगे।। १४४.९७ ।।

मन्वन्तराधिकारेषु तिष्ठन्ति ऋषयस्तु ते।
यथा दावप्रदग्धेषु तृणेष्वेवापनक्षितौ।। १४४.९८ ।।

वनानां प्रथमं द्रृष्ट्वा तेषां मूलेषु सम्भवः।
एवं युगाद्‌युगानां वै सन्तानस्तु परस्परम्।। १४४.९९ ।।

प्रवर्त्तते ह्यविच्छेदाद्यावन्मन्वन्तरक्षयः।
सुखमायुर्बलं रूपं धर्मार्थौ काम एव च।। १४४.१०० ।।

युगेष्वेतानि हीयन्ते त्रयः पादाः क्रमेण तु।
इत्येषः प्रतिसन्धिर्वः कीर्त्तितस्तु मया द्विजाः!।। १४४.१०१ ।।

चतुर्युगाणां सर्वेषामेतदेव प्रसाधनम्।
एषां चतुर्युगाणान्तु गणिता ह्येकसप्ततिः।। १४४.१०२ ।।

क्रमेण परिवृत्तास्ता मनोरन्तरमुच्यते।
युगाख्यासु तु सर्वासु भवतीह यदा च यत्।। १४४.१०३ ।।

तदेव च तदन्यासु पुनस्तद्वै यथाक्रमम्।
सर्गे सर्गे यथा भेदा ह्युत्पद्यन्ते तथैव च।। १४४.१०४ ।।

चतुर्दशसु तावन्तो ज्ञेया मन्वन्तरेष्विह।
आसुरी यातुधानी च पैशाची यक्षराक्षसी।। १४४.१०५ ।।

युगे युगे तदा काले प्रजा जायन्ति ताः श्रृणु।
यथाकल्पं युगैः सार्द्धं भवन्ति तुल्यलक्षणा।
इत्येतल्लक्षणं प्रोक्तं युगानां वै यथाक्रमम्।। १४४.१०६ ।।

मन्वन्तराणां परिवर्तनानि चिरप्रवृत्तातियुगस्वभावात्।
क्षणं न संतिष्ठति जीवलोकः क्षयोदयाभ्यां परिवर्त्तमानः।। १४४.१०७ ।।

एते युगस्वभावा वः परिक्रान्ता यथाक्रमम्।
मन्वन्तराणि यान्यस्मिन् कल्पे वक्ष्यामि तानि च।। १४४.१०८ ।।