महाभारतम्-14-आश्वमेधिकपर्व-108

विकिस्रोतः तः
Jump to navigation Jump to search
← आश्वमेधिकपर्व-107 महाभारतम्
चतुर्दशपर्व
महाभारतम्-14-आश्वमेधिकपर्व-108
वेदव्यासः
आश्वमेधिकपर्व-109 →
  1. 001
  2. 002
  3. 003
  4. 004
  5. 005
  6. 006
  7. 007
  8. 008
  9. 009
  10. 010
  11. 011
  12. 012
  13. 013
  14. 014
  15. 015
  16. 016
  17. 017
  18. 018
  19. 019
  20. 020
  21. 021
  22. 022
  23. 023
  24. 024
  25. 025
  26. 026
  27. 027
  28. 028
  29. 029
  30. 030
  31. 031
  32. 032
  33. 033
  34. 034
  35. 035
  36. 036
  37. 037
  38. 038
  39. 039
  40. 040
  41. 041
  42. 042
  43. 043
  44. 044
  45. 045
  46. 046
  47. 047
  48. 048
  49. 049
  50. 050
  51. 051
  52. 052
  53. 053
  54. 054
  55. 055
  56. 056
  57. 057
  58. 058
  59. 059
  60. 060
  61. 061
  62. 062
  63. 063
  64. 064
  65. 065
  66. 066
  67. 067
  68. 068
  69. 069
  70. 070
  71. 071
  72. 072
  73. 073
  74. 074
  75. 075
  76. 076
  77. 077
  78. 078
  79. 079
  80. 080
  81. 081
  82. 082
  83. 083
  84. 084
  85. 085
  86. 086
  87. 087
  88. 088
  89. 089
  90. 090
  91. 091
  92. 092
  93. 093
  94. 094
  95. 095
  96. 096
  97. 097
  98. 098
  99. 099
  100. 100
  101. 101
  102. 102
  103. 103
  104. 104
  105. 105
  106. 106
  107. 107
  108. 108
  109. 109
  110. 110
  111. 111
  112. 112
  113. 113
  114. 114
  115. 115
  116. 116
  117. 117
  118. 118

कृष्णेन युधिष्ठिरंप्रति यत्यग्निमहिमानुवर्णनम्।। 1 ।। दानपात्रब्राह्मणलक्षणकथनम्।। 2 ।। तथाऽन्नदानप्रशंसनम्।। 3 ।।

युधिष्ठिर उवाच। 14-108-1x
अनेकान्तं बहुद्वारं धर्ममाहुर्मनीपिणः।
किंलक्षणोसौ भति तन्मे ब्रूहि जनार्दन।।
14-108-1a
14-108-1b
भगवानुवाच। 14-108-2x
शृणु राजन्समासेन धर्मशौचविधिक्रमम्।
अहिंसा शौचमक्रोधमानृशंस्यं दमः शमः।
आर्जवं चैव राजेन्द्र निश्चितं धर्मलक्षणम्।।
14-108-2a
14-108-2b
14-108-2c
ब्रह्मचर्यं तपः क्षान्तिर्मधुमांसस्य वर्जनम्।
मर्यादायां स्थितिश्चैव शमः शौचस्य लक्षणम्।।
14-108-3a
14-108-3b
बाल्ये विद्यां निषेवेत यौवने दारसंग्रहम्।
वार्धके मौनमातिष्ठेत्सर्वदा धर्ममाचरेत्।।
14-108-4a
14-108-4b
ब्राह्मणान्नावमन्येत गुरुन्परिवदेन्न च।
यतीनामनुकूलः स्यादेष धर्मः सनातनः।।
14-108-5a
14-108-5b
यतिर्गुरुर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः।
पतिरेव गुरुः स्त्रीणां सर्वेषां पार्थिवो गुरुः।।
14-108-6a
14-108-6b
यद्गृहस्तार्जितं पापं ज्ञानतोऽज्ञानतोपि वा।
निर्दहिष्यति तत्सर्वमेकरात्रोषितो यतिः।।
14-108-7a
14-108-7b
दुर्वृत्ता वा सुवृत्ता वा ज्ञानिनोऽज्ञानिनोपि वा।
गृहस्थैर्यतयः पूज्याः परत्र हितकाङ्क्षिभिः।।
14-108-8a
14-108-8b
एकदण्डी त्रिदण्डी वा शिखी वा मुण्डितोपि वा।
काषायदण्डधारोपि यतिः पूज्यो न संशयः।।
14-108-9a
14-108-9b
अपूजितो गृहस्थैर्वा तथा चाप्यवमानितः।
यतिर्वाऽप्यतिथिर्वाऽपि नरके पातयिष्यतः।।
14-108-10a
14-108-10b
तस्मात्तु यत्नतः पूज्या मद्भक्ता मत्परायणाः।
मयि संन्यस्तकर्माणः परत्र हितकाङ्क्षिभिः।।
14-108-11a
14-108-11b
प्रहरेन्न द्विजान्विप्रो गां न हन्यात्कदाचन।
भ्रूणहत्यासमं चैव उभयं यो निषेवते।।
14-108-12a
14-108-12b
नाग्निं मुखेनोपधमेन्न च पादौ प्रतापयेत्।
नाधः कुर्यात्कदाचित्तु न पृष्ठं परितापयेत्।।
14-108-13a
14-108-13b
नान्तरा गमनं कुर्यान्न चामेध्यं विनिक्षिपेत्।
उच्छिष्टो न स्पृशेदग्निमाशौचस्थो न जातुचित्।।
14-108-14a
14-108-14b
श्वचण्डालादिभिः स्पृष्टो नाङ्गमग्नौ प्रतापयेत्।
सर्वदेवमयो वह्निस्तस्माच्छुद्धः सदा स्पृशेत्।।
14-108-15a
14-108-15b
प्राप्तमूत्रपुरीषस्तु न स्पृशेद्वह्निमात्मवान्।
यावत्तु धारयेद्वेगं तावदप्रयतो भवेत्।।
14-108-16a
14-108-16b
पचनाग्निं न गृह्णीयात्परवेश्मनि जातुचित्।
तस्मिन्पक्वेन चान्नेन यत्कर्म कुरुते शुभम्।।
14-108-17a
14-108-17b
तस्यैव तच्छुभस्यार्धमग्निदस्य भवेन्नृप।
तस्माद्गृहगतं वह्निं प्रकुर्यादविनाशितम्।।
14-108-18a
14-108-18b
प्रमादाद्यदि वाऽज्ञानात्तस्य नाशो भविष्यति।
गृह्णीयात्तु मथित्वा वा श्रोत्रियागारतोपि वा।।
14-108-19a
14-108-19b
युधिष्ठिर उवाच। 14-108-20x
कीदृशाः साधवो विप्रास्तेभ्यो दत्तं महाफलम्।
कीदृशेभ्यो हि दातव्यं तन्मे ब्रूहि जनार्दन।।
14-108-20a
14-108-20b
भगवानुवाच। 14-108-21x
अक्रोधनाः सत्यपरा धर्मनित्या जितेन्द्रियाः।
तादृशाः साधवो विप्रास्तेभ्यो दत्तं महाफलम्।।
14-108-21a
14-108-21b
अमानिनः सर्वसहा दृष्टार्था विजितेन्द्रियाः।
सर्वभूतहिता मैत्रास्तेभ्यो दत्तं महाफलम्।।
14-108-22a
14-108-22b
अलुब्धाः शुचयो वैद्या हीमन्तः सत्यवादिनः।
स्वधर्मनिरता ये तु तेभ्यो दत्तं महाफलम्।।
14-108-23a
14-108-23b
साङ्गंश्च चतुरो वेदान्योऽधीयेत दिनेदिने।
शूद्रान्नं यस्य नो देहे तत्पात्रमृषयो विदुः।।
14-108-24a
14-108-24b
प्रज्ञाश्रुताभ्यां वृत्तेन शीलेन च समन्वितः।
तारयेत्तत्कुलं सर्वमेकोपीह युधिष्ठिर।।
14-108-25a
14-108-25b
गामश्वमन्नं वित्तं वा तद्विधे प्रतिपादयेत्।
निशम्य तु गुणोपेतं ब्राह्मअणं साधुसंमतम्।
दूरादाहृत्य सत्कृत्य तं प्रयत्नेन पूजयेत्।।
14-108-26a
14-108-26b
14-108-26c
युधिष्टिर उवाच। 14-108-27x
धर्माधर्मविधिस्त्वेवं भीमं भीष्मेण भाषितम्।
भीष्मवाक्यात्सारभूतं वद धर्मं सुरेश्वर।।
14-108-27a
14-108-27b
भगवानुवाच। 14-108-28x
अन्नेन धार्यते सर्वं जगदेतच्चराचरम्।
अन्नात्प्रभवति प्राणः प्रत्यक्षं नास्ति संशयः।।
14-108-28a
14-108-28b
कलत्रं पीडयित्वा तु देशे काले च शक्तितः।
दातव्यं भिक्षवे चान्नमात्मनो भूतिमिच्छता।।
14-108-29a
14-108-29b
विप्रमध्वपरिश्रान्तं बालं वृद्धमथापि वा।
अर्चयेद्गुरुवत्प्रीतो गृहस्थो गृहमागतम्।।
14-108-30a
14-108-30b
क्रोधमुत्पतितं हित्वा सुशीलो वीतमत्सरः।
अर्चयेदतिथिं प्रीतः परत्र हितभूतये।।
14-108-31a
14-108-31b
अतिथिं नावमन्येत नानृतां गिरमीरयेत्।
न पृच्छेद्गोत्रचरणं नाधीतं वा कदाचन।।
14-108-32a
14-108-32b
चण्डालो वा श्वपाको वा काले यः कश्चिदागतः।
अन्नेन पूजनीयः स्यात्परत्र हितमिच्छता।।
14-108-33a
14-108-33b
पिधाय तु गृहद्वारं भुक्ते योऽन्नं प्रहृष्टवान्।
स्वर्गद्वारपिधानं वै कृतं तेन युधिष्ठिर।।
14-108-34a
14-108-34b
पितॄन्देवानृषीन्विप्रानतिथींश्च निराश्रयान्।
यो नरः प्रीणयत्यन्नैस्तस्य पुण्यफलं महत्।।
14-108-35a
14-108-35b
कृत्वा तु पापं बहुशो यो दद्यादन्नमर्थिने।
ब्राह्मणाय विशेषेण सर्वपापैः प्रमुच्यते।।
14-108-36a
14-108-36b
अन्नदः प्राणदो लोके प्राणदः सर्वदो भवेत्।
तस्मादन्नं विशेषेण दातव्यं भूतिमिच्छता।।
14-108-37a
14-108-37b
अन्नं ह्यमृतमित्याहुरन्नं प्रजननं स्मृतम्।
अन्नप्रणाशो सीदन्ति शरीरे पञ्च धातवः।।
14-108-38a
14-108-38b
बलं बलवतो नश्येदन्नहीनस्य देहिनः।
तस्मादन्नं विशेषेण श्रद्धयाऽश्रद्धयापि वा।।
14-108-39a
14-108-39b
आदत्ते हि रसं सर्वमादित्यः स्वगभस्तिभिः।
वायुस्तस्मात्समादाय रसं मेधेषु धारयेत्।।
14-108-40a
14-108-40b
तत्तु मेघगतं भूमौ शक्रो वर्षति तादृशम्।
तेन दिग्धा भवेद्देवी मही प्रीता च ****
14-108-41a
14-108-41b
तस्यां सस्यानि रोहन्ति यैर्जीवन्त्यखिलाः प्रजाः।
मांसमेदोस्थिमज्जानां सम्भवस्तेभ्य एव हि।।
14-108-42a
14-108-42b
एवं सूर्यश्च पवनो मेघः शक्रस्तथैव च।
एक एव स्थितो राशिर्यतो भूतानि जज्ञिरे।।
14-108-43a
14-108-43b
भवनानि च दिव्यानि दिवि तेषां महात्मनाम्।
नानासंस्थानि भूतानि नानाभूमिगतानि च।।
14-108-44a
14-108-44b
चन्द्रमण्डलशुभ्राणि किङ्किणीजालवन्ति च।
तरुणादित्यवर्णानि स्थावराणि चराणि च।।
14-108-45a
14-108-45b
अनेकशतसङ्ख्यानि सान्तर्जलवनानि च।
तत्र पुष्पफलोपेताः कामदाः सुरपादपाः।।
14-108-46a
14-108-46b
वाप्यो बद्धसभाः कूपा दीर्घिकाश्च सहस्रशः।
भक्ष्यभोज्यमयाः शैला वासांस्याभरणानि च।।
14-108-47a
14-108-47b
क्षीरस्रवन्त्यः सरितस्तथा चैवान्नपर्वताः।
घोषवन्ति च यानानि युक्तान्यथ सहस्रशः।।
14-108-48a
14-108-48b
प्रासादप्रवराः शुभ्राः शय्याश्च कनकोज्ज्वलाः।
अन्नदास्तत्र तिष्ठन्ति तस्मादन्नप्रदो भवेत्।।
14-108-49a
14-108-49b
।। इति श्रीमन्महाभारते आश्वमेधिकपर्वणि
वैष्णवधर्मपर्वणि अष्टोत्तरशततमोऽध्यायः।। 108
आश्वमेधिकपर्व-107 पुटाग्रे अल्लिखितम्। आश्वमेधिकपर्व-109