महाभारतम्-14-आश्वमेधिकपर्व-092

विकिस्रोतः तः
Jump to navigation Jump to search
← आश्वमेधिकपर्व-091 महाभारतम्
चतुर्दशपर्व
महाभारतम्-14-आश्वमेधिकपर्व-092
वेदव्यासः
आश्वमेधिकपर्व-093 →
  1. 001
  2. 002
  3. 003
  4. 004
  5. 005
  6. 006
  7. 007
  8. 008
  9. 009
  10. 010
  11. 011
  12. 012
  13. 013
  14. 014
  15. 015
  16. 016
  17. 017
  18. 018
  19. 019
  20. 020
  21. 021
  22. 022
  23. 023
  24. 024
  25. 025
  26. 026
  27. 027
  28. 028
  29. 029
  30. 030
  31. 031
  32. 032
  33. 033
  34. 034
  35. 035
  36. 036
  37. 037
  38. 038
  39. 039
  40. 040
  41. 041
  42. 042
  43. 043
  44. 044
  45. 045
  46. 046
  47. 047
  48. 048
  49. 049
  50. 050
  51. 051
  52. 052
  53. 053
  54. 054
  55. 055
  56. 056
  57. 057
  58. 058
  59. 059
  60. 060
  61. 061
  62. 062
  63. 063
  64. 064
  65. 065
  66. 066
  67. 067
  68. 068
  69. 069
  70. 070
  71. 071
  72. 072
  73. 073
  74. 074
  75. 075
  76. 076
  77. 077
  78. 078
  79. 079
  80. 080
  81. 081
  82. 082
  83. 083
  84. 084
  85. 085
  86. 086
  87. 087
  88. 088
  89. 089
  90. 090
  91. 091
  92. 092
  93. 093
  94. 094
  95. 095
  96. 096
  97. 097
  98. 098
  99. 099
  100. 100
  101. 101
  102. 102
  103. 103
  104. 104
  105. 105
  106. 106
  107. 107
  108. 108
  109. 109
  110. 110
  111. 111
  112. 112
  113. 113
  114. 114
  115. 115
  116. 116
  117. 117
  118. 118

नकुलेन युधिष्ठिरादीन्प्रति सकुटुम्बस्योञ्छवृत्तेर्ब्राह्मणस्य धर्मपुरुषाय सक्तुप्रस्तदानमहिमवर्णनपूर्वकंपुनस्तत्रैवान्तर्धानम्।। 1 ।।

नकुल उवाच। 14-92-1x
हन्त वः कथयिष्यामि दानस्य फलमुत्तमम्।
न्यायलब्धस्य सूक्ष्मस्य विप्रदत्तस्य यद्द्विजाः।।
14-92-1a
14-92-1b
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे धर्मज्ञैर्बहुभिर्वृते।
उञ्छवृत्तिर्द्विजः कश्चित्कापोतिरभवत्पुरा।।
14-92-2a
14-92-2b
सभार्यः सहपुत्रेण सस्नुषस्तपसि स्थितः।
बभूव शुक्लवृत्तः स धर्मात्मा नियतेन्द्रियः।।
14-92-3a
14-92-3b
षष्ठे काले सदा विप्रो भुङ्क्ते तैः सह संवृतः।। 14-92-4a
षष्ठे काले कदाचित्तु तस्याहारो न विद्यते।
भुङ्क्तेऽन्यस्मिन्कदाचित्स षष्ठे काले द्विजोत्तमः।।
14-92-5a
14-92-5b
कपोतधर्मिणस्तस्य दुर्भिक्षे सति दारुणे।
नाविद्यत तदा विप्राः संचयस्तन्निबोधत।।
14-92-6a
14-92-6b
क्षीणाषैदिसमावापो द्रव्यहीनोऽभवत्तदा।
कालेकालेऽस्य सम्प्राप्ते नैव विद्येत भोजनम्।।
14-92-7a
14-92-7b
क्षुधापरिगताः सर्वे प्रातिष्ठन्त तदा तु ते।
उञ्छं तदा शुक्लपक्षे मध्यं तपति भास्करे।।
14-92-8a
14-92-8b
उष्णार्तश्च क्षुधार्तश्च विप्रस्तपसि संस्थितः।
उञ्छमप्राप्तवानेव ब्राह्मणः क्षुच्छ्रमान्वितः।।
14-92-9a
14-92-9b
स तथैव क्षुधाविष्टः सार्धं परिजनेन ह।
क्षपयामास तं कालं कृच्छ्रप्राणो द्विजोत्तमः।।
14-92-10a
14-92-10b
अथ षष्ठे गते काले यवप्रस्थमुपार्जयन्।
यवप्रस्थं तु तं सक्तूनकुर्वन्त तपस्विनः।।
14-92-11a
14-92-11b
कृतजप्याह्निकास्ते तु हुत्वा चाग्निं यथाविधि।
कुडवंकुडवं सर्वे व्यभजन्त तपस्विनः।।
14-92-12a
14-92-12b
अथागच्छद्द्विजः कश्चिदतिथिर्भुञ्जतां तदा।
ते तं दृष्ट्वाऽतिथिं प्राप्तं प्रहृष्टमनसोऽभवन्।।
14-92-13a
14-92-13b
तेऽभिवाद्य सुखप्रश्नं पृष्ट्वा तमतिथिं तदा।
विशुद्धमनसो दान्ताः श्रद्धादमसमन्विताः।।
14-92-14a
14-92-14b
अनसूया गतक्रोधाः साधवो वीतमत्सराः।
त्यक्तमानमदक्रोधा धर्मज्ञा द्विजसत्तमाः।।
14-92-15a
14-92-15b
सब्रह्यचर्यं गोत्रं ते तस्य ख्यात्वा परस्परम्।
कुटीं प्रवेशयामासुः क्षुधार्तमतिथिं तदा।।
14-92-16a
14-92-16b
इदमर्घ्यं च पाद्यं च बृसी चेयं तवानघ।
शुचयः सक्तवश्चेमे नियमोपार्जिताः प्रभो।
प्रतिगृह्णीष्व भद्रं ते मया दत्ता द्विजर्षभ।।
14-92-17a
14-92-17b
14-92-17c
इत्युक्तः प्रतिगृह्याथ सक्तूनां कुडवं द्विजः।
भक्षयामास राजेन्द्र न च तुष्टिं जगाम सः।।
14-92-18a
14-92-18b
स उञ्छवृत्तिस्तं प्रेक्ष्य क्षुधापरिगतं द्विजम्।
आहारं चिन्तयामास कथं तुष्टो भवेदिति।।
14-92-19a
14-92-19b
तस्य भार्याऽब्रवीद्वाक्यं मद्भागो दीयतामिति।
गच्छत्वेष यथाकामं परितुष्टो द्विजोत्तमः।।
14-92-20a
14-92-20b
इति ब्रुवन्तीं तां साध्वीं भार्यां स द्विजसत्तमः।
क्षउधापरिगतां ज्ञात्वा तान्सक्तून्नाभ्यनन्दत।।
14-92-21a
14-92-21b
आत्मानुमानतो विद्वान्स तु विप्रर्षभस्तदा।
जानन्वृद्धां क्षुधार्तां च श्रान्तां ग्लानां तपस्विनीम्।
त्वगस्थिभूता वेपन्तीं ततो भार्यामुवाच ह।।
14-92-22a
14-92-22b
14-92-22c
अपि कीटपतङ्गानां मृगाणां चैव शोभने।
स्त्रियो रक्ष्याश्च पोष्पाश्च न त्वेवं वक्तुमर्हसि।।
14-92-23a
14-92-23b
अनुकंप्यो नरः पत्न्या पुष्टो रक्षित एव च।
प्रपतेद्यशसो दीप्तात्स च लोकान्न चाप्नुयात्।।
14-92-24a
14-92-24b
धर्मकामार्थकार्याणि शुश्रूषाकुलसंततिः।
दारेष्वदीनो धर्मस्च पितॄणामात्मनस्तथा।।
14-92-25a
14-92-25b
न वेत्ति कर्मतो भार्यारक्षणे योऽक्षमः पुमान्।
अयशो महदाप्नोति नारकांश्चैव गच्छति।।
14-92-26a
14-92-26b
इत्युक्ता सा ततः प्राह धर्मार्थौ नौ समौ द्विज।
सक्तुप्रस्थचतुर्भागं गृहाणेमं प्रसीद मे।।
14-92-27a
14-92-27b
सत्यं रतिश्च धर्मश्च स्वर्गश्च गुणनिर्जितः।
स्त्रीणां पतिसमाधीनं काङ्क्षितं च द्विजर्षभ।।
14-92-28a
14-92-28b
ऋतुर्मातु पितुर्बीजं दैवतं परमं पतिः।
भर्तुः प्रसादान्नारीणां रतिपुत्रफलं तथा।।
14-92-29a
14-92-29b
पालनाद्धि पतिस्त्वं मे भर्ताऽसि भरणाच्च मे।
पुत्रप्रदानाद्वरदस्तस्मात्सक्तून्प्रयच्छ मे।।
14-92-30a
14-92-30b
जरापरिगतो वृद्धः क्षुधार्तो दुर्बलो भृशम्।
उपवासपरिश्रान्तो यदा त्वमपि कर्शितः।।
14-92-31a
14-92-31b
इत्युक्तः स तया सक्तून्प्रगृह्येदं वचोऽब्रवीत्।
द्विजि सक्तूनिमान्भूयः प्रतिगृह्णीष्व सत्तम।।
14-92-32a
14-92-32b
स तान्प्रगृह्य भुक्त्वा च न तुष्टिमगमद्द्विजः।
तमुञ्छवृत्तिरालक्ष्य ततश्चिन्तापरोऽभवत्।।
14-92-33a
14-92-33b
पुत्र उवाच। 14-92-34x
सक्तूनिमान्प्रगृह्य त्वं देहि विप्राय सत्तम।
इत्येव सुकृतं मन्ये तस्मादेतत्करोम्यहम्।।
14-92-34a
14-92-34b
भवान्हि परिपाल्यो मे सर्वदैव प्रयत्नतः।
साधूनां काङ्क्षितं यस्मात्पितुर्वृद्धस्य पालनम्।।
14-92-35a
14-92-35b
पुत्रार्थो विहितो ह्येष वार्धके परिपालनम्।।
श्रुतिरेषा हि विप्रर्षे त्रिषु लोकेषु शाश्वती।।
14-92-36a
14-92-36b
प्राणाधारणमात्रेण शक्यं कर्तुं तपस्त्वया।
प्राणो हि परमो धर्मः स्थितो देहेषु देहिनाम्।।
14-92-37a
14-92-37b
पितोवाच। 14-92-38x
अपि वर्षसहस्री त्वं बाल एव मतो मम।
उत्पाद्य पुत्रं हि पिता कृतकृत्यो भवेत्सुतात्।।
14-92-38a
14-92-38b
बालानां क्षुद्बलवती जानाम्येतदहं प्रभो।
वृद्धोऽहं धारयिष्यामि त्वं बली भव पुत्रक।।
14-92-39a
14-92-39b
जीर्णेन वयसा पुत्र न मां क्षुद्बाधतेऽपि च।
दीर्घकालं तपस्तप्तं न मे मरणतो भयम्।।
14-92-40a
14-92-40b
पुत्र उवाच। 14-92-41x
अपत्यमस्मि ते पुंसस्त्राणात्पुत्र इति स्मृतः।
आत्मा पुत्रः स्मृतस्तस्मात्त्राह्यात्मानमिहात्मना।।
14-92-41a
14-92-41b
पितोवाच। 14-92-42x
रूपेण सदृशस्त्वं मे शीलेन च दमेन च।
परीक्षितश्च बहुधा सक्तूनादद्मि ते सुत।।
14-92-42a
14-92-42b
इत्युक्त्वाऽऽदाय तान्सक्तून्प्रीतात्मा द्विजसत्तमः।
प्रहसन्निव विप्राय स तस्मै प्रददौ तदा।।
14-92-43a
14-92-43b
भुक्त्वा तानपि सक्तून्स नैव तुष्टो बभूव ह।
उच्छवृत्तिस्तु धर्मात्मा व्रीडामनुजगाम ह।।
14-92-44a
14-92-44b
तं वै वधूः स्थिता साध्वी ब्राह्मणिप्रियकाम्यया।
सक्तूनादाय संहृष्टा श्वशुरं वाक्यमब्रवीत्।।
14-92-45a
14-92-45b
संतानात्तव संतानं मम विप्र भविष्यति।
सक्तूनिमानतिथये गृहीत्वा सम्प्रयच्छ मे।।
14-92-46a
14-92-46b
तव प्रसादान्निर्वृत्ता मम लोकाः किलाक्षयाः।
पुत्रेण तानवाप्नोति यत्र गत्वा न शोचति।।
14-92-47a
14-92-47b
धर्माद्या हि यथा त्रेता वह्नित्रेता तथैव च।
तथैव पुत्रपौत्राणां स्वर्गस्त्रेता किलाक्षयः।।
14-92-48a
14-92-48b
पितॄणात्तारयति पुत्र इत्यनुशुश्रुम।
पुत्रपौत्रैश्च नियतं सादुलोकानुपाश्नुते।।
14-92-49a
14-92-49b
श्वशुर उवाच। 14-92-50x
वातातपविशीर्णाङ्गीं त्वां विवर्णां निरीक्ष्य वै।
कर्शितां सुव्रताचारे क्षुधाविह्वलचेतसम्।।
14-92-50a
14-92-50b
कथं सक्तून्ग्रहीष्यामि भूत्वा धर्मोपघातकः।
कल्याणवृत्ते कल्याणि नैव त्वं वक्तुमर्हसि।।
14-92-51a
14-92-51b
षष्ठे काले व्रतवतीं शौचशीलतपोन्विताम्।
कृच्छ्रवृत्तिं निराहारां द्रक्ष्यामि त्वां कथं शुभे।।
14-92-52a
14-92-52b
बाला क्षुधार्ता नारी च रक्ष्या त्वं सततं मया।
उपवासपरिश्रान्ता त्वं हि बान्धवनन्दिनी।।
14-92-53a
14-92-53b
स्नुषोवाच। 14-92-54x
गुरोर्मम गुरुस्त्वं वै यतो दैवतदैवतम्।
देवातिदेवस्तस्मात्त्वं सक्तूनादत्स्व मे प्रभो।।
14-92-54a
14-92-54b
देहः प्राणश्च धर्मश्च शुश्रूषार्थमिदं गुरोः।
तव विप्र प्रसादेन लोकान्प्राप्स्यामहे शुभान्।।
14-92-55a
14-92-55b
अवेक्ष्या इति कृत्वाऽहं दृढभक्तेति वा द्विज।
चिन्त्या ममेयमिति वा सक्तूनादानुमर्हसि।।
14-92-56a
14-92-56b
श्वशुर उवाच। 14-92-57x
अनेन नित्यं साध्वी त्वं शीलवृत्तेन शोभसे।
या त्वं धर्मव्रतोपेता गुरुवृत्तिमवेक्षसे।।
14-92-57a
14-92-57b
तस्मात्सक्तून्ग्रहीष्यामि वधु नार्हसि वञ्चनाम्।
गणयित्वा महाभागे त्वां हि धर्मभृतां वरे।।
14-92-58a
14-92-58b
इत्युक्त्वा तानुपादाय सक्तून्प्रादाद्द्विजातये।
ततस्तुष्टोऽभवद्विप्रस्तस्य साधोर्महात्मनः।।
14-92-59a
14-92-59b
प्रीतात्मा स तु तं वाक्यमिदमाह द्विजर्षभम्।
वाग्मी तदा द्विजश्रेष्टो धर्मः पुरुषविग्रहः।।
14-92-60a
14-92-60b
शुद्धेनि तव दानेन न्यायोपात्तेन धर्मतः।
यथाशक्ति विसृष्टेन प्रीतोस्मि द्विजसत्तम।।
14-92-61a
14-92-61b
अहो दानं घुष्यते ते स्वर्गे स्वर्गनिवासिभिः।
गगनात्पुष्पवर्षं च पश्येदं पतितं भुवि।।
14-92-62a
14-92-62b
सुरर्षिदेवगन्धर्वा ये च देवपुरःसराः।
स्तुवन्तो देवदूताश्च स्थिता दानेन विस्मिताः।।
14-92-63a
14-92-63b
ब्रह्मर्षयो विमानस्था ब्रह्मलोकचरश्च ये।
काङ्क्षन्ते दर्शनं तुभ्यं दिवं व्रज द्विजर्षभ।।
14-92-64a
14-92-64b
पितृलोकगताः सर्वे तारिताः पितरस्त्वया।
अनागताश्च बहवः सुबहूनि युगान्युत।।
14-92-65a
14-92-65b
ब्रह्मचर्येण दानेन यज्ञेनि तपसा तथा।
अगह्वरेण धर्मेण तस्माद्गच्च दिवं द्विज।।
14-92-66a
14-92-66b
श्रद्धया परया यरत्वं तपश्चरसि सुव्रत।
तस्माद्देवास्तवानेन प्रीता ब्राह्मणसत्तम।।
14-92-67a
14-92-67b
सर्वमेतद्धि यस्मात्ते दत्तं शुद्धेन चेतसा।
कृच्छ्रकाले ततः स्वर्गो विजितः कर्मणा त्वया।।
14-92-68a
14-92-68b
क्षुधा निर्णुदति प्रज्ञां धर्मबुद्धिं व्यपोहति।
क्षुधापरिगतज्ञानो धृतिं त्यजति चैव ह।।
14-92-69a
14-92-69b
बुभुक्षां जयते यस्तु स स्वर्गं जयते ध्रुवम्।
यदा दानरुचिः स्याद्वै तदा धर्मो न सीदति।।
14-92-70a
14-92-70b
अनवेक्ष्य सुतस्नेहं कलत्रस्नेहमेव च।
धर्ममेव गुरं ज्ञात्वा तृष्णा न गणिता त्वया।।
14-92-71a
14-92-71b
द्रव्यागमो नृणां सूक्ष्मः पात्रे दानं ततः परम्।
कालः परतरो दानाच्छ्रद्धा चैव ततः परा।।
14-92-72a
14-92-72b
स्वर्गद्वारं सुसूक्ष्मं हि नरैर्माहान्नि दृश्यते।
सङ्गर्गलं लोभकीलं रागगुप्तं दुरासदम्।।
14-92-73a
14-92-73b
तं तु पश्यन्ति पुरुषा जितदक्रोधा जितेन्द्रियाः।
ब्राह्मणास्तपसा युक्ता यथाशक्ति प्रदायिनः।।
14-92-74a
14-92-74b
सहस्रशक्तिश्च शतं शतशक्तिर्दशापि च।
दद्यादपश्च यः शक्त्या सर्वे तुल्यफलाः स्मृताः।।
14-92-75a
14-92-75b
रन्तिदेवो हि नृपतिरपः प्रादादकिंचनः।
शुद्धेन मनसा विप्र नाकपृष्ठं ततो गतः।।
14-92-76a
14-92-76b
न धर्मः प्रीयते तात दानैर्दत्तैर्महाफलैः।
न्यायलब्धैर्यथा सूक्ष्मैः श्रुद्धापूतैः स तुष्यति।।
14-92-77a
14-92-77b
गोप्रदानसहस्राणि द्विजेभ्योऽदान्नृगो नृपः।
एकां दत्त्वा स पारक्यां नरकं समपद्यत।।
14-92-78a
14-92-78b
आत्ममांसप्रदानेन शिबोरौशीनरो नृपः।
प्राप्य पुण्यकृताँल्लोकान्मोदत दिवि सुव्रतः।।
14-92-79a
14-92-79b
विभवेन नृणां पुण्यं यच्छत्त्या स्वार्जितं न तत्।
न यज्ञैर्विविधैर्विप्र यथान्यायेन संचितैः।।
14-92-80a
14-92-80b
क्रोधाद्दानफलं हन्ति लोभात्स्वर्गं न गच्छति।
न्यायवृत्तिर्हि तपसा दानवित्स्वर्गमश्नुते।।
14-92-81a
14-92-81b
न राजसूयैर्बहुभिरिष्टा विपुलदक्षिणैः।।
न चाश्वमेधैर्बहुभिः फलं सममिदं तव।।
14-92-82a
14-92-82b
सक्तुप्रस्थेन विजितो ब्रह्मलोकस्त्वयाऽक्षयः।
विरजो ब्रह्मसदनं गच्छ विप्र यतासुखम्।।
14-92-83a
14-92-83b
सर्वेषां वो द्विजश्रेष्ठ दिव्यं यानमुपस्थितम्।
आरोहत यथाकामं धर्मोस्मि द्विज पश्य माम्।।
14-92-84a
14-92-84b
बाधितो हि त्वया देहो लोके कीर्तिः स्थिरा च ते।
सभार्यः सहपुत्रश्च सस्नुषश्च दिवं व्रज।।
14-92-85a
14-92-85b
इत्युक्तवाक्ये धर्मे तु यानमारुद्य स द्विजः।
सदारः ससुतश्चैव सस्नुषश्च दिवं गतः।।
14-92-86a
14-92-86b
तस्मिन्विपरे गते स्वर्गं ससुते सस्नुषे तदा।
भार्याचतुर्थे धर्मज्ञे ततोऽहं निःसृतो बिलात्।।
14-92-87a
14-92-87b
ततस्तु सक्तुगन्धेन क्लेदेन सलिलस्य च।
दिव्यपुष्पविमर्दाच्च साधोर्दानलवैश्च तैः।।
14-92-88a
14-92-88b
विप्रस्य तपसा तस्य शिरो मे काञ्चनीकृतम्।
तस्य सत्याभिसन्धस्य सक्तुदानेन चैव ह।।
14-92-89a
14-92-89b
शरीरार्धं च मे विप्राः शातकुंभमयं कृतम्।
पश्यतेमं सुविपुलं तपसा तस्य धीमतः।।
14-92-90a
14-92-90b
कथमेवंविधं स्याद्वै पार्श्वमन्यदिति द्विजाः।
तपोवनानि यज्ञांश्च हृष्टोऽभ्योमि पुनः पुनः।
14-92-91a
14-92-91b
यज्ञं त्वहमिमं श्रुत्वा रुरुराजस्य धीमतः।
आशया परया प्राप्तो न चाहं काञ्चनीकृतः।।
14-92-92a
14-92-92b
ततो मयोक्तं तद्वाक्यं प्रहस्य ब्राह्मणर्षभाः।
सक्तुप्रस्थेन यज्ञोऽयं संमितो नेति सर्वथा।।
14-92-93a
14-92-93b
सक्तुप्रस्थलवैस्तैर्हि तदाऽहं काञ्चनीकृतः।
न हि यज्ञो महानेष सदृशस्तैर्मतो मम।।
14-92-94a
14-92-94b
इत्युक्त्वा नकुलः सर्वान्यज्ञे द्विजवरांस्तदा।
जगामादर्सनं तेषां विप्रास्ते च ययुर्गृहान्।।
14-92-95a
14-92-95b
एतत्ते सर्वमाख्यातं मया परपुरंजय।
यदाश्चर्यमभूत्तत्र वाचिमेधे महाक्रतौ।।
14-92-96a
14-92-96b
न विस्मयस्ते नृपते यज्ञे कार्यः कथञ्चन।
ऋषिकोटिसहस्राणि तपोभिर्ये दिवं गताः।।
14-92-97a
14-92-97b
अद्रोहः सर्वभूतेषु संतोषः शीलमार्जवम्।
तपो दमश्च सत्यं च प्रदानं चेति संमितम्।।
14-92-98a
14-92-98b
।। इति श्रीमन्महाभारते आश्वमेधिकपर्वणि
अनुगीतापर्वणि द्विनवतितमोऽध्यायः।। 92 ।।


                  १४.९३ 14.90


नकुल उवाच॥

हन्त वो वर्तयिष्यामि दानस्य परमं फलम् |
न्यायलब्धस्य सूक्ष्मस्य विप्रदत्तस्य यद्द्विजाः ॥१॥14.90.23

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे धर्मज्ञैर्बहुभिर्वृते |
उञ्छवृत्तिर्द्विजः कश्चित्कापोतिरभवत्पुरा ॥२॥

सभार्यः सह पुत्रेण सस्नुषस्तपसि स्थितः |
वधूचतुर्थो वृद्धः स धर्मात्मा नियतेन्द्रियः ॥३॥

षष्ठे काले तदा विप्रो भुङ्क्ते तैः सह सुव्रतः |
षष्ठे काले कदाचिच्च तस्याहारो न विद्यते ॥४॥

भुङ्क्तेऽन्यस्मिन्कदाचित्स षष्ठे काले द्विजोत्तमः ॥४॥

कपोतधर्मिणस्तस्य दुर्भिक्षे सति दारुणे |
नाविद्यत तदा विप्राः सञ्चयस्तान्निबोधत ॥५॥

क्षीणौषधिसमावायो द्रव्यहीनोऽभवत्तदा ॥५॥

काले कालेऽस्य सम्प्राप्ते नैव विद्येत भोजनम् |
क्षुधापरिगताः सर्वे प्रातिष्ठन्त तदा तु ते ॥६॥

उञ्छंस्तदा शुक्लपक्षे मध्यं तपति भास्करे |
उष्णार्तश्च क्षुधार्तश्च स विप्रस्तपसि स्थितः ॥७॥

उञ्छमप्राप्तवानेव सार्धं परिजनेन ह ॥७॥

स तथैव क्षुधाविष्टः स्पृष्ट्वा तोयं यथाविधि |
क्षपयामास तं कालं कृच्छ्रप्राणो द्विजोत्तमः ॥८॥

अथ षष्ठे गते काले यवप्रस्थमुपार्जयत् |
यवप्रस्थं च ते सक्तूनकुर्वन्त तपस्विनः ॥९॥

कृतजप्याह्विकास्ते तु हुत्वा वह्निं यथाविधि |
कुडवं कुडवं सर्वे व्यभजन्त तपस्विनः ॥१०॥

अथागच्छद्द्विजः कश्चिदतिथिर्भुञ्जतां तदा |
ते तं दृष्ट्वातिथिं तत्र प्रहृष्टमनसोऽभवन् ॥११॥

तेऽभिवाद्य सुखप्रश्नं पृष्ट्वा तमतिथिं तदा |
विशुद्धमनसो दान्ताः श्रद्धादमसमन्विताः ॥१२॥

अनसूयवो गतक्रोधाः साधवो गतमत्सराः |
त्यक्तमाना जितक्रोधा धर्मज्ञा द्विजसत्तमाः ॥१३॥

सब्रह्मचर्यं स्वं गोत्रं समाख्याय परस्परम् |
कुटीं प्रवेशयामासुः क्षुधार्तमतिथिं तदा ॥१४॥

इदमर्घ्यं च पाद्यं च बृसी चेयं तवानघ |
शुचयः सक्तवश्चेमे नियमोपार्जिताः प्रभो ॥१५॥

प्रतिगृह्णीष्व भद्रं ते मया दत्ता द्विजोत्तम ॥१५॥

इत्युक्तः प्रतिगृह्याथ सक्तूनां कुडवं द्विजः |
भक्षयामास राजेन्द्र न च तुष्टिं जगाम सः ॥१६॥

स उञ्छवृत्तिः तं प्रेक्ष्य क्षुधापरिगतं द्विजम् |
आहारं चिन्तयामास कथं तुष्टो भवेदिति ॥१७॥

तस्य भार्याब्रवीद्राजन्मद्भागो दीयतामिति |
गच्छत्वेष यथाकामं सन्तुष्टो द्विजसत्तमः ॥१८॥

इति ब्रुवन्तीं तां साध्वीं धर्मात्मा स द्विजर्षभः |
क्षुधापरिगतां ज्ञात्वा सक्तूंस्तान्नाभ्यनन्दत ॥१९॥

जानन्वृद्धां क्षुधार्तां च श्रान्तां ग्लानां तपस्विनीम् |
त्वगस्थिभूतां वेपन्तीं ततो भार्यामुवाच ताम् ॥२०॥

अपि कीटपतङ्गानां मृगाणां चैव शोभने |
स्त्रियो रक्ष्याश्च पोष्याश्च नैवं त्वं वक्तुमर्हसि ॥२१॥

अनुकम्पितो नरो नार्या पुष्टो रक्षित एव च |
प्रपतेद्यशसो दीप्तान्न च लोकानवाप्नुयात् ॥२२॥

इत्युक्ता सा ततः प्राह धर्मार्थौ नौ समौ द्विज |
सक्तुप्रस्थचतुर्भागं गृहाणेमं प्रसीद मे ॥२३॥

सत्यं रतिश्च धर्मश्च स्वर्गश्च गुणनिर्जितः |
स्त्रीणां पतिसमाधीनं काङ्क्षितं च द्विजोत्तम ॥२४॥

ऋतुर्मातुः पितुर्बीजं दैवतं परमं पतिः |
भर्तुः प्रसादात्स्त्रीणां वै रतिः पुत्रफलं तथा ॥२५॥

पालनाद्धि पतिस्त्वं मे भर्तासि भरणान्मम |
पुत्रप्रदानाद्वरदस्तस्मात्सक्तून्गृहाण मे ॥२६॥

जरापरिगतो वृद्धः क्षुधार्तो दुर्बलो भृशम् |
उपवासपरिश्रान्तो यदा त्वमपि कर्शितः ॥२७॥

इत्युक्तः स तया सक्तून्प्रगृह्येदं वचोऽब्रवीत् |
द्विज सक्तूनिमान्भूयः प्रतिगृह्णीष्व सत्तम ॥२८॥

स तान्प्रगृह्य भुक्त्वा च न तुष्टिमगमद्द्विजः |
तमुञ्छवृत्तिरालक्ष्य ततश्चिन्तापरोऽभवत् ॥२९॥

पुत्र उवाच॥

सक्तूनिमान्प्रगृह्य त्वं देहि विप्राय सत्तम |
इत्येवं सुकृतं मन्ये तस्मादेतत्करोम्यहम् ॥३०॥

भवान्हि परिपाल्यो मे सर्वयत्नैर्द्विजोत्तम |
साधूनां काङ्क्षितं ह्येतत्पितुर्वृद्धस्य पोषणम् ॥३१॥

पुत्रार्थो विहितो ह्येष स्थाविर्ये परिपालनम् |
श्रुतिरेषा हि विप्रर्षे त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥३२॥

प्राणधारणमात्रेण शक्यं कर्तुं तपस्त्वया |
प्राणो हि परमो धर्मः स्थितो देहेषु देहिनाम् ॥३३॥

पितोवाच॥

अपि वर्षसहस्री त्वं बाल एव मतो मम |
उत्पाद्य पुत्रं हि पिता कृतकृत्यो भवत्युत ॥३४॥

बालानां क्षुद्बलवती जानाम्येतदहं विभो |
वृद्धोऽहं धारयिष्यामि त्वं बली भव पुत्रक ॥३५॥

जीर्णेन वयसा पुत्र न मा क्षुद्बाधतेऽपि च |
दीर्घकालं तपस्तप्तं न मे मरणतो भयम् ॥३६॥

पुत्र उवाच॥

अपत्यमस्मि ते पुत्रस्त्राणात्पुत्रो हि विश्रुतः |
आत्मा पुत्रः स्मृतस्तस्मात्त्राह्यात्मानमिहात्मना ॥३७॥

पितोवाच॥

रूपेण सदृशस्त्वं मे शीलेन च दमेन च |
परीक्षितश्च बहुधा सक्तूनादद्मि ते ततः ॥३८॥

इत्युक्त्वादाय तान्सक्तून्प्रीतात्मा द्विजसत्तमः |
प्रहसन्निव विप्राय स तस्मै प्रददौ तदा ॥३९॥

भुक्त्वा तानपि सक्तून्स नैव तुष्टो बभूव ह |
उञ्छवृत्तिस्तु सव्रीडो बभूव द्विजसत्तमः ॥४०॥

तं वै वधूः स्थिता साध्वी ब्राह्मणप्रियकाम्यया |
सक्तूनादाय संहृष्टा गुरुं तं वाक्यमब्रवीत् ॥४१॥

सन्तानात्तव सन्तानं मम विप्र भविष्यति |
सक्तूनिमानतिथये गृहीत्वा त्वं प्रयच्छ मे ॥४२॥

तव प्रसवनिर्वृत्या मम लोकाः किलाक्षयाः |
पौत्रेण तानवाप्नोति यत्र गत्वा न शोचति ॥४३॥

धर्माद्या हि यथा त्रेता वह्नित्रेता तथैव च |
तथैव पुत्रपौत्राणां स्वर्गे त्रेता किलाक्षया ॥४४॥

पितॄंस्त्राणात्तारयति पुत्र इत्यनुशुश्रुम |
पुत्रपौत्रैश्च नियतं साधुलोकानुपाश्नुते ॥४५॥

श्वशुर उवाच॥

वातातपविशीर्णाङ्गीं त्वां विवर्णां निरीक्ष्य वै |
कर्शितां सुव्रताचारे क्षुधाविह्वलचेतसम् ॥४६॥

कथं सक्तून्ग्रहीष्यामि भूत्वा धर्मोपघातकः |
कल्याणवृत्ते कल्याणि नैवं त्वं वक्तुमर्हसि ॥४७॥

षष्ठे काले व्रतवतीं शीलशौचसमन्विताम् |
कृच्छ्रवृत्तिं निराहारां द्रक्ष्यामि त्वां कथं न्वहम् ॥४८॥

बाला क्षुधार्ता नारी च रक्ष्या त्वं सततं मया |
उपवासपरिश्रान्ता त्वं हि बान्धवनन्दिनी ॥४९॥

स्नुषोवाच॥

गुरोर्मम गुरुस्त्वं वै यतो दैवतदैवतम् |
देवातिदेवस्तस्मात्त्वं सक्तूनादत्स्व मे विभो ॥५०॥

देहः प्राणश्च धर्मश्च शुश्रूषार्थमिदं गुरोः |
तव विप्र प्रसादेन लोकान्प्राप्स्याम्यभीप्सितान् ॥५१॥

अवेक्ष्या इति कृत्वा त्वं दृढभक्त्येति वा द्विज |
चिन्त्या ममेयमिति वा सक्तूनादातुमर्हसि ॥५२॥

श्वशुर उवाच॥

अनेन नित्यं साध्वी त्वं शीलवृत्तेन शोभसे |
या त्वं धर्मव्रतोपेता गुरुवृत्तिमवेक्षसे ॥५३॥

तस्मात्सक्तून्ग्रहीष्यामि वधूर्नार्हसि वञ्चनाम् |
गणयित्वा महाभागे त्वं हि धर्मभृतां वरा ॥५४॥

इत्युक्त्वा तानुपादाय सक्तून्प्रादाद्द्विजातये |
ततस्तुष्टोऽभवद्विप्रस्तस्य साधोर्महात्मनः ॥५५॥

प्रीतात्मा स तु तं वाक्यमिदमाह द्विजर्षभम् |
वाग्मी तदा द्विजश्रेष्ठो धर्मः पुरुषविग्रहः ॥५६॥

शुद्धेन तव दानेन न्यायोपात्तेन यत्नतः |
यथाशक्ति विमुक्तेन प्रीतोऽस्मि द्विजसत्तम ॥५७॥

अहो दानं घुष्यते ते स्वर्गे स्वर्गनिवासिभिः |
गगनात्पुष्पवर्षं च पश्यस्व पतितं भुवि ॥५८॥

सुरर्षिदेवगन्धर्वा ये च देवपुरःसराः |
स्तुवन्तो देवदूताश्च स्थिता दानेन विस्मिताः ॥५९॥

ब्रह्मर्षयो विमानस्था ब्रह्मलोकगताश्च ये |
काङ्क्षन्ते दर्शनं तुभ्यं दिवं गच्छ द्विजर्षभ ॥६०॥

पितृलोकगताः सर्वे तारिताः पितरस्त्वया |
अनागताश्च बहवः सुबहूनि युगानि च ॥६१॥

ब्रह्मचर्येण यज्ञेन दानेन तपसा तथा |
अगह्वरेण धर्मेण तस्माद्गच्छ दिवं द्विज ॥६२॥

श्रद्धया परया यस्त्वं तपश्चरसि सुव्रत |
तस्माद्देवास्तवानेन प्रीता द्विजवरोत्तम ॥६३॥

सर्वस्वमेतद्यस्मात्ते त्यक्तं शुद्धेन चेतसा |
कृच्छ्रकाले ततः स्वर्गो जितोऽयं तव कर्मणा ॥६४॥

क्षुधा निर्णुदति प्रज्ञां धर्म्यां बुद्धिं व्यपोहति |
क्षुधापरिगतज्ञानो धृतिं त्यजति चैव ह ॥६५॥

बुभुक्षां जयते यस्तु स स्वर्गं जयते ध्रुवम् |
यदा दानरुचिर्भवति तदा धर्मो न सीदति ॥६६॥

अनवेक्ष्य सुतस्नेहं कलत्रस्नेहमेव च |
धर्ममेव गुरुं ज्ञात्वा तृष्णा न गणिता त्वया ॥६७॥

द्रव्यागमो नृणां सूक्ष्मः पात्रे दानं ततः परम् |
कालः परतरो दानाच्छ्रद्धा चापि ततः परा ॥६८॥

स्वर्गद्वारं सुसूक्ष्मं हि नरैर्मोहान्न दृश्यते |
स्वर्गार्गलं लोभबीजं रागगुप्तं दुरासदम् ॥६९॥

तत्तु पश्यन्ति पुरुषा जितक्रोधा जितेन्द्रियाः |
ब्राह्मणास्तपसा युक्ता यथाशक्तिप्रदायिनः ॥७०॥

सहस्रशक्तिश्च शतं शतशक्तिर्दशापि च |
दद्यादपश्च यः शक्त्या सर्वे तुल्यफलाः स्मृताः ॥७१॥

रन्तिदेवो हि नृपतिरपः प्रादादकिञ्चनः |
शुद्धेन मनसा विप्र नाकपृष्ठं ततो गतः ॥७२॥

न धर्मः प्रीयते तात दानैर्दत्तैर्महाफलैः |
न्यायलब्धैर्यथा सूक्ष्मैः श्रद्धापूतैः स तुष्यति ॥७३॥

गोप्रदानसहस्राणि द्विजेभ्योऽदान्नृगो नृपः |
एकां दत्त्वा स पारक्यां नरकं समवाप्तवान् ॥७४॥

आत्ममांसप्रदानेन शिबिरौशीनरो नृपः |
प्राप्य पुण्यकृताँल्लोकान्मोदते दिवि सुव्रतः ॥७५॥

विभवे न नृणां पुण्यं स्वशक्त्या स्वर्जितं सताम् |
न यज्ञैर्विविधैर्विप्र यथान्यायेन सञ्चितैः ॥७६॥

क्रोधो दानफलं हन्ति लोभात्स्वर्गं न गच्छति |
न्यायवृत्तिर्हि तपसा दानवित्स्वर्गमश्नुते ॥७७॥

न राजसूयैर्बहुभिरिष्ट्वा विपुलदक्षिणैः |
न चाश्वमेधैर्बहुभिः फलं सममिदं तव ॥७८॥

सक्तुप्रस्थेन हि जितो ब्रह्मलोकस्त्वयानघ |
विरजो ब्रह्मभवनं गच्छ विप्र यथेच्छकम् ॥७९॥

सर्वेषां वो द्विजश्रेष्ठ दिव्यं यानमुपस्थितम् |
आरोहत यथाकामं धर्मोऽस्मि द्विज पश्य माम् ॥८०॥

पावितो हि त्वया देहो लोके कीर्तिः स्थिरा च ते |
सभार्यः सहपुत्रश्च सस्नुषश्च दिवं व्रज ॥८१॥

इत्युक्तवाक्यो धर्मेण यानमारुह्य स द्विजः |
सभार्यः ससुतश्चापि सस्नुषश्च दिवं ययौ ॥८२॥

तस्मिन्विप्रे गते स्वर्गं ससुते सस्नुषे तदा |
भार्याचतुर्थे धर्मज्ञे ततोऽहं निःसृतो बिलात् ॥८३॥

ततस्तु सक्तुगन्धेन क्लेदेन सलिलस्य च |
दिव्यपुष्पावमर्दाच्च साधोर्दानलवैश्च तैः ॥८४॥

विप्रस्य तपसा तस्य शिरो मे काञ्चनीकृतम् ॥८४॥

तस्य सत्याभिसन्धस्य सूक्ष्मदानेन चैव ह |
शरीरार्धं च मे विप्राः शातकुम्भमयं कृतम् ॥८५॥

पश्यतेदं सुविपुलं तपसा तस्य धीमतः ॥८५॥

कथमेवंविधं मे स्यादन्यत्पार्श्वमिति द्विजाः |
तपोवनानि यज्ञांश्च हृष्टोऽभ्येमि पुनः पुनः ॥८६॥

यज्ञं त्वहमिमं श्रुत्वा कुरुराजस्य धीमतः |
आशया परया प्राप्तो न चाहं काञ्चनीकृतः ॥८७॥

ततो मयोक्तं तद्वाक्यं प्रहस्य द्विजसत्तमाः |
सक्तुप्रस्थेन यज्ञोऽयं संमितो नेति सर्वथा ॥८८॥

सक्तुप्रस्थलवैस्तैर्हि तदाहं काञ्चनीकृतः |
न हि यज्ञो महानेष सदृशस्तैर्मतो मम ॥८९॥

वैशम्पायन उवाच॥

इत्युक्त्वा नकुलः सर्वान्यज्ञे द्विजवरांस्तदा |
जगामादर्शनं राजन्विप्रास्ते च ययुर्गृहान् ॥९०॥

एतत्ते सर्वमाख्यातं मया परपुरञ्जय |
यदाश्चर्यमभूत्तस्मिन्वाजिमेधे महाक्रतौ ॥९१॥

न विस्मयस्ते नृपते यज्ञे कार्यः कथञ्चन |
ऋषिकोटिसहस्राणि तपोभिर्ये दिवं गताः ॥९२॥

अद्रोहः सर्वभूतेषु सन्तोषः शीलमार्जवम् |
तपो दमश्च सत्यं च दानं चेति समं मतम् ॥९३॥

[सम्पाद्यताम्]

14-92-2 कपोतवदेकैकं कणमादत्ते स कापोतिः।। 14-92-8 उंछं कणश आदानं कर्तुमिति शेषः। शुक्लस्य ज्येष्ठस्य पक्षे।। 14-92-56 अवेक्ष्या पालनीया। चिन्त्या परीक्षणीया।। 14-92-58 हे वरे श्रेष्ठे महाभागे त्वां धर्मभृतां मध्ये गणयित्वा सक्तून् ग्रहीष्यामीत्यन्वयः।। 14-92-84 तारितो हि त्वयेति झ.पाठः।।

आश्वमेधिकपर्व-091 पुटाग्रे अल्लिखितम्। आश्वमेधिकपर्व-093