महाभारतम्-14-आश्वमेधिकपर्व-058

विकिस्रोतः तः
Jump to navigation Jump to search
← आश्वमेधिकपर्व-057 महाभारतम्
चतुर्दशपर्व
महाभारतम्-14-आश्वमेधिकपर्व-058
वेदव्यासः
आश्वमेधिकपर्व-059 →
  1. 001
  2. 002
  3. 003
  4. 004
  5. 005
  6. 006
  7. 007
  8. 008
  9. 009
  10. 010
  11. 011
  12. 012
  13. 013
  14. 014
  15. 015
  16. 016
  17. 017
  18. 018
  19. 019
  20. 020
  21. 021
  22. 022
  23. 023
  24. 024
  25. 025
  26. 026
  27. 027
  28. 028
  29. 029
  30. 030
  31. 031
  32. 032
  33. 033
  34. 034
  35. 035
  36. 036
  37. 037
  38. 038
  39. 039
  40. 040
  41. 041
  42. 042
  43. 043
  44. 044
  45. 045
  46. 046
  47. 047
  48. 048
  49. 049
  50. 050
  51. 051
  52. 052
  53. 053
  54. 054
  55. 055
  56. 056
  57. 057
  58. 058
  59. 059
  60. 060
  61. 061
  62. 062
  63. 063
  64. 064
  65. 065
  66. 066
  67. 067
  68. 068
  69. 069
  70. 070
  71. 071
  72. 072
  73. 073
  74. 074
  75. 075
  76. 076
  77. 077
  78. 078
  79. 079
  80. 080
  81. 081
  82. 082
  83. 083
  84. 084
  85. 085
  86. 086
  87. 087
  88. 088
  89. 089
  90. 090
  91. 091
  92. 092
  93. 093
  94. 094
  95. 095
  96. 096
  97. 097
  98. 098
  99. 099
  100. 100
  101. 101
  102. 102
  103. 103
  104. 104
  105. 105
  106. 106
  107. 107
  108. 108
  109. 109
  110. 110
  111. 111
  112. 112
  113. 113
  114. 114
  115. 115
  116. 116
  117. 117
  118. 118

उदङ्केनाभिज्ञाननिवेदनेनि मदयन्तीतः कुण्डलग्रहणपूर्वकं प्रतिनिवर्तनम्।। 1 ।। मध्येमार्गं क्षुधाविष्टेन तेन बिल्वतरुमारुह्य शाखायां कुण्डलासञ्जनपूर्वकं फलपातनाय शाखाचालनम्।। 2 ।। तत्र पतत्फलघट्टनेन कुण्डलयोरधःपतने केनचिदुरगवरेण तदपहृत्य नागलोकगमनम्।। 3 ।। तत इन्द्रसाहाय्याद्भूविदारणेन नागलोकंगतेनोदङ्केन तत्राश्ववचसा तदपानदेशधमने तन्निर्गतधूमपटलनिरुद्धैः सर्पैरुदङ्काय कुण्डलप्रत्यर्पणम्।। 4 ।। तत उदङ्केन गुरुपत्न्यै कुण्डलप्रदानम्।। 5 ।।

वैशम्पायन उवाच। 14-58-1x
स मित्रसहमासाद्य अभिज्ञानमयाचत।
तस्मै ददावभिज्ञानं स चेक्ष्वाकुवरस्तदा।।
14-58-1a
14-58-1b
सौदास उवाच। 14-58-2x
न चैवैषा गतिः क्षेम्या न चान्या विद्यते गतिः।
एतन्मे तत्वमाज्ञाय प्रयच्छ मणिकुण्डले।।
14-58-2a
14-58-2b
इत्युक्तस्तामुदङ्कस्तु भर्तुर्वाक्यमथाब्रवीत्।
श्रुत्वा च सा तदा प्रादात्ततस्ते मणिकुण्डले।।
14-58-3a
14-58-3b
अवाप्य कुण्डले ते तु राजानं पुनरब्रवीत्।
किमेतद्गुह्यवचनं श्रोतुमिच्छामि पार्थिव।।
14-58-4a
14-58-4b
सौदास उवाच। 14-58-5x
प्रजाविसर्गाद्विप्रान्वै क्षत्रियाः पूजयन्ति ह।
विप्रेभ्यश्चापि बहवो दोषाः प्रादुर्भवन्ति नः।।
14-58-5a
14-58-5b
सोहं द्विजेभ्यः प्रणतो विप्राद्दोषमवाप्तवान्।
गतिमन्यां न पश्यामि मदयन्तीसहायवान्।।
14-58-6a
14-58-6b
न चान्यामपि पश्यामि गतिं गतिमतांवर।
स्वर्गद्वारस्य गमने स्थाने चेह द्विजोत्तम।।
14-58-7a
14-58-7b
न हि राज्ञा विशेषेण विरुद्धेन द्विजातिभिः।
शक्यं हि लोके स्थातुं वै प्रेत्य वा सुखमेधितुम्।।
14-58-8a
14-58-8b
तदिष्टे ते मया दत्ते एते स्वे मणिकुण्डले।
यः कृतस्तेऽद्य समयः सफलं तं कुरुष्य मे।।
14-58-9a
14-58-9b
उदङ्क उवाच। 14-58-10x
राजंस्तथेह कर्तास्मि पुनरेष्यामि ते वशम्।
प्रश्नं च कञ्चित्प्रष्टुं त्वां व्यवसिष्ये परंतप।।
14-58-10a
14-58-10b
सौदास उवाच। 14-58-11x
ब्रूहि विप्र यथाकामं प्रतिवक्तास्मि ते वचः।
छेत्तास्मि संशयं तेऽद्य न मेऽत्राश्ति विचारणा।।
14-58-11a
14-58-11b
उदङ्क उवाच। 14-58-12x
प्राहुर्वाक्संयतं विप्रं धर्मनैपुणदर्शिनः।
मित्रेषु यश्च विषमः स्तेन इत्येव तं विदुः।।
14-58-12a
14-58-12b
स बवान्मित्रतामद्य सम्प्राप्तो मम पार्थिव।
स मे बुद्धिं प्रयच्छस्व सम्मतां पुरुषर्षभ।।
14-58-13a
14-58-13b
अवाप्तार्थोऽहमद्येह भवांश्च पुरुषादकः।
भवत्सकाशमागन्तुं क्षमं मम न वेति वै।।
14-58-14a
14-58-14b
सौदास उवाच। 14-58-15x
क्षमं चेदिह वक्तव्यं मया द्विजवरोत्तम।
मत्समीपं द्विजश्रेष्ट नागन्तव्यं कथञ्चन।।
14-58-15a
14-58-15b
एवं तव प्रपश्यामि श्रेयो भृगुकुलोद्वह।
आगच्छतो हि ते विप्रि भवेन्मृर्त्युन संशयः।।
14-58-16a
14-58-16b
वैशम्पायन उवाच। 14-58-17x
इत्युक्तः स तदा राजा क्षमं बुद्धिमता हितम्।
अनुज्ञाप्य स राजानमहल्यां प्रति जग्मिवान्।।
14-58-17a
14-58-17b
गृहीत्वा कुण्डले दिव्ये गुरुपत्न्याः प्रियंकरः।
जवेन महता प्रायाद्गौतमस्याश्रमं प्रति।।
14-58-18a
14-58-18b
यथा तयो रक्षणं च मदयन्त्याऽभिभाषितम्।
तथा ते कुण्डले बध्वा तदा कृष्णाजिनेऽनयत्।।
14-58-19a
14-58-19b
स कस्मिंश्चित्क्षुधाविष्टः फलभारसमन्वितम्।
बिल्वं ददर्श विप्रर्षिरारुरोह च तं ततः।।
14-58-20a
14-58-20b
शाखास्वासज्य तस्यैव कृष्णाजिनमरिंदम।
पातयामास बिल्वानि तदा स द्विजपुङ्गवः।।
14-58-21a
14-58-21b
अथ पातयमानस्य बिल्वापहृतचक्षुषः।
न्यपतंस्तानि बिल्वानि तस्मिन्नेवाजिने विभो।।
14-58-22a
14-58-22b
यस्मिंस्ते कुण्डले बद्धे तदा द्विजवरेण वै।
बिल्वप्रहारैस्तस्याथ व्यशीर्यद्बन्धनं ततः।।
14-58-23a
14-58-23b
सकुण्डलं तदजिनं पपात सहसा तरोः।
विशीर्णबन्धने तस्मिन्गते कृष्णाजिने महीम्।।
14-58-24a
14-58-24b
अपश्यद्भुजगः कश्चित्ते तत्र मणिकुण्डले।
ऐरावतकुलोद्भूतः शीघ्रो भूत्वा तदा हि सः।।
14-58-25a
14-58-25b
विदश्यास्येन वल्मीकं विवेशाथ स कुण्डले।
ह्रियमाणे तु दृष्ट्वा स कुण्डले भुजगेन ह।।
14-58-26a
14-58-26b
पपात वृक्षात्सोद्वेगो दुःखात्परमकोपनः।
स दण्डकाष्ठमादाय वल्मीकमखनत्तदा।।
14-58-27a
14-58-27b
[अहानि त्रिंशदव्यग्रः पञ्च चान्यानि भारत।]
क्रोधामर्षाभिसंतप्तस्तदा ब्राह्मणिसत्तमः।।
14-58-28a
14-58-28b
तस्य वेगमसह्यं तमसहन्ती वसुन्धरा।
दण्डकाष्ठाभिनुन्नाङ्गी चचाल भृशमाकुला।
ततः खनत एवाथ विप्रर्षेर्धरणीतलम्
नागलोकस्य पन्थानं कर्तुकामस्य निश्चयात्।।
14-58-29a
14-58-29b
14-58-29c
14-58-29d
रथेन हरियुक्तेन तं देशमुपजग्मिवान्।
वज्रपाणिर्महातेजास्तं ददर्श द्विजोत्तमम्।।
14-58-30a
14-58-30b
वैशम्पायन उवाच। 14-58-31x
स तु तं ब्राह्मणो भूत्वा तस्य दुःखेन दुःखितः।
उदङ्कमब्रवीद्वाक्यं नैतच्छक्यं त्वयेति वै।।
14-58-31a
14-58-31b
इतो हि नागलोको वै योजनानि सहस्रशः।
न दण्डकाष्ठसाध्यं च मन्ये कार्यमिदं तव।।
14-58-32a
14-58-32b
उदङ्क उवाच। 14-58-33x
नागलोके यदि ब्रह्मन्न शक्ये कुण्डले मया।
प्राप्तुं प्राणान्विमोक्ष्यामि पश्यतस्ते द्विजोत्तम।।
14-58-33a
14-58-33b
वैशम्पायन उवाच। 14-58-34x
यदा स नाशकत्तस्य निश्चयं कर्तुमन्यथा।
वज्रपाणिस्तदा दण्डं वज्रास्त्रेण युयोज ह।।
14-58-34a
14-58-34b
ततो वज्रप्रहारैस्तैर्दार्यमाणा वसुन्धर।
नागलोकस्य पन्थानमकरोज्जनमेजय।।
14-58-35a
14-58-35b
स तेन मार्गेण तदा नागलोकं विवेश ह।
ददर्श नागलोकं च योजनानि सहस्रशः।।
14-58-36a
14-58-36b
प्रकारनिचयैर्दिव्यैर्मणिमुक्तास्वलङ्कृतैः।
उपपन्नं महाभाग शातकुम्भमयैस्तथा।।
14-58-37a
14-58-37b
वापीः स्फटिकसोपाना नदीस्च विमलोदकाः।
ददर्श वृक्षांश्च बहून्नानाद्विजगणायुतान्।।
14-58-38a
14-58-38b
तस्य लोकस्य च द्वारं स ददर्श भृगूद्वहः।
पञ्चयोजनविस्तारमायतं शतयोजनम्।।
14-58-39a
14-58-39b
नागलोकमुदङ्कस्तु प्रेक्ष्य दीनोऽभवत्तदा।
निराशश्चाभवत्तत्र कुण्डलाहरणे पुनः।।
14-58-40a
14-58-40b
तत्र प्रोवाच तुरगस्तं कृष्णश्वेतवालधिः।
ताम्रास्यनेत्रः कौरव्यः प्रज्वलन्निव तेजसा।।
14-58-41a
14-58-41b
धमस्वापानमेतन्मे ततस्त्वं विप्र लप्स्यसे।
ऐरावतसुतेनेहि तव्रानीते हि कुण्डले।।
14-58-42a
14-58-42b
मा जुगुप्सां कृथाः पुत्र त्वमत्रार्थे कथञ्चन।।
त्वयैतद्धि समाचीर्णं गौतमस्याश्रमे तदा।।
14-58-43a
14-58-43b
उदङ्ग उवाच। 14-58-44x
कथं भवन्तं जानीयामुपाध्यायाश्रमं प्रति।
यन्मया चीर्णपूर्वं हि श्रोतुमिच्छामि तद्ध्यहम्।।
14-58-44a
14-58-44b
अश्व उवाच। 14-58-45x
गुरोर्गुरु मां जानीहि ज्वलन्तं जातवेदसम्।
त्वया ह्यहं सदा विप्र गुरोरर्थेऽभिपूजितः।।
14-58-45a
14-58-45b
विधिवत्सततं विप्र शुचिना भृगुनन्दन।
तस्माच्छ्रेयो विधास्यामि तवैवं कुरु माचिरम्।।
14-58-46a
14-58-46b
इत्युक्तस्तु तथाऽकार्षीदुदङ्कश्चित्रभानुना।
ताम्रार्चिः प्रीतिमांश्चापि प्रजज्वाल दिधक्षया।।
14-58-47a
14-58-47b
ततोऽस्य रोमकूपेभ्यो ध्मायमानस्य भारत।
घनः प्रादुरभूद्धूमो नागलोकभयावहः।।
14-58-48a
14-58-48b
तेन धूमेन महता वर्धमानेन भारत।
नागलोके महाराज न प्राज्ञायत किञ्चन।।
14-58-49a
14-58-49b
हाहाकृतमभूत्सर्वमैरावतिनिवेशनम्।
वासुकिप्रमुखानां च नागानां जनमेजय।।
14-58-50a
14-58-50b
न प्राकाशन्त वेश्मानि धूमरुद्धानि भारत।
नीहारसंवृतानीव वनानि गिरयस्तथा।।
14-58-51a
14-58-51b
ते धूमरक्तनयना वह्नितेजोभितापिताः।
आजग्मुर्निश्चयं ज्ञातुं भार्गवस्य महात्मनः।।
14-58-52a
14-58-52b
श्रुत्वा च निश्चयं तस्य महर्षेरतितेजसः।
सम्भ्रान्तनयनाः सर्वे पूजां चक्रुर्यथाविधि।।
14-58-53a
14-58-53b
सर्वे प्राञ्जलयो नागा वृद्धबालपुरोगमाः।
शिरोभिः प्रणिपत्योचुः प्रसीद भगवन्निति।।
14-58-54a
14-58-54b
प्रसाद्य ब्राह्मणं ते तु पाद्यमर्घ्यं निवेद्य च।
प्रायच्छन्कुण्डले दिव्ये पन्नगाः परमार्चिते।।
14-58-55a
14-58-55b
ततः स पूजितो नागैस्तदोदङ्कः प्रतापवान्।
अग्निं प्रदक्षिणं कृत्वा जगाम गुरुसद्म तत्।।
14-58-56a
14-58-56b
स गत्वा त्वरितो राजन्गौतमस्य निवेशनम्।
प्रायच्छत्कुण्डले दिव्ये गुरुपत्न्यास्तदाऽनघ।।
14-58-57a
14-58-57b
वासुकिप्रमुकानां च नागानां जनमेजय।
सर्वं शशंस गुरेव यथावद्द्विजसत्तमः।।
14-58-58a
14-58-58b
एवं महात्मना तेन त्रींलोकाञ्जनमेजय।
परिक्रम्याहृते दिव्ये ततस्ते मणिकुण्डले।।
14-58-59a
14-58-59b
एवंप्रभावः स मुनिरुदङ्को भरतर्षभ।
परेण तपसा युक्तो यन्मां त्वं परिपृच्छसि।
14-58-60a
14-58-60b
।। इति श्रीमन्महाभारते आश्वमेधिकपर्वणि
अनुगीतापर्वणि अष्टपञ्चासोऽध्यायः।। 58 ।।

[सम्पाद्यताम्]

14-58-1 मित्रसहः सौदासः अभिज्ञानं श्लोकरूपं ज्ञापकम्। 14-58-2 एषा रक्षोयोनिरूपा। अन्या इतो मुक्तिरूपा।। 14-58-10 ततोदंकाय वै प्रादात्तस्मै ते मणिकुण्डले इति क.ट.थ.पाठः।। 14-58-12 निवृत्तिस्मि परं तपेति झ.पाठः।। 14-58-16 प्राप्तवान्सङ्गतिं मित्रं धर्मनैपुण्यदर्शनादिति क.ट.थ.पाठः।। 14-58-16 तत्रैव तु प्रवक्ष्यामि श्रेयो भृगुकुलोद्वहेति क.ट.थ.पाठः।। 14-58-26 आस्येन कुण्डले विदश्य धृत्वा वल्मीकं विवेशेति सम्बन्धः।।

आश्वमेधिकपर्व-057 पुटाग्रे अल्लिखितम्। आश्वमेधिकपर्व-059