महाभारतम्-14-आश्वमेधिकपर्व-050

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ब्रह्मणा महर्षिन्प्रति धर्मप्रदर्शनपूर्वकं तदनुष्ठानसहकृतज्ञानस्यैव दृष्टान्तप्रदर्शनेन परमपुरुषार्थसाधनत्वोक्तिः।। 1 ।।

ब्रह्मोवाच। 14-50-1x
हन्त वः सम्प्रक्ष्यामि यन्मां पृच्छथ सत्तमाः।
गुरुणा शिष्यमासाद्य यदुक्तं तन्निबोधत।।
14-50-1a
14-50-1b
समस्तमिह तच्छ्रुत्वा सम्यगेवावधार्यताम्।
अहिंसा सर्वभूतानामेतत्कृत्यतमं मतम्।।
14-50-2a
14-50-2b
एतत्पदमनुद्विग्नं वरिष्ठं धर्मलक्षणम्।
ज्ञानं निःश्रेय इत्याहुर्वृद्धा निश्चितदर्शिनः।
तस्माज्ज्ञानेन शुद्धेन मुच्यते सर्वकिल्बिषैः।।
14-50-3a
14-50-3b
14-50-3c
हिंसापराश्च ये केचिद्ये च नास्तिकवृत्तयः।
लोभमोहसमायुक्तास्ते वै निरयगामिनः।।
14-50-4a
14-50-4b
आशीर्युक्तानि कर्माणि कुर्वते ये त्वतन्द्रिताः।
तेऽस्मिन्लोके प्रमोदन्ते जायमानाः पुनः पुनः।।
14-50-5a
14-50-5b
कुर्वते ये तु कर्माणि श्रद्धधाना विपश्चितः।
अनाशीर्योगसंयुक्तास्ते धीराः साधुदर्शिनः।।
14-50-6a
14-50-6b
अतः परं प्रवक्ष्यामि सत्वक्षेत्रज्ञयोर्यथा।
संयोगो विप्रयोगश्च तन्निबोधत सत्तमाः।।
14-50-7a
14-50-7b
विषयो विषयित्वं च सम्बन्धोऽयमिहोच्यते।
विषयी पुरुषो नित्यं सत्वं च विषयः स्मृतः।।
14-50-8a
14-50-8b
व्याख्यातं पूर्वकल्पेनि मशकोदुम्बरं यथा।
भुज्यमानं न जानीते नित्यं सत्वमचेतनम्।
यस्त्वेवं तं विजानीते यो भुङ्क्ते यश्च भुज्यते।।
14-50-9a
14-50-9b
14-50-9c
अनित्यं द्वन्द्वसंयुक्तं सत्वमाहुर्मनीषिणः।
निर्द्वन्द्वो निष्कलो नित्यः क्षेत्रज्ञो निर्गुणात्मकः।।
14-50-10a
14-50-10b
समः संज्ञानुगश्चैव स सर्वत्र व्यवस्थितः।
न सज्जते सदा सत्वमापः पुष्करपर्णवत्।।
14-50-11a
14-50-11b
सर्वैरपि गुणैर्विद्वान्व्यतिषक्तो न लिप्यते।
जलबिन्दुर्यथा लोलः पद्मिनीपत्रसंस्थितः।।
14-50-12a
14-50-12b
एवमेवाप्यसंयुक्तः पुरुषः स्यान्न संशयः।
द्रव्यमात्रमभूत्सत्वं पुरुषस्येति निश्चयः।।
14-50-13a
14-50-13b
यथा द्रव्यं च कर्ता च संयोगोऽप्यनयोस्तथा।
यथा प्रदीपमादाय कश्चित्तमसि गच्छति।
तथा सत्त्वप्रदीपेन गच्छन्ति परमर्षयः।।
14-50-14a
14-50-14b
14-50-14c
यावद्द्रव्यं गुणस्तावत्प्रदीपः सम्प्रकाशते।
क्षीणे द्रव्ये गुणे ज्योतिरन्तर्धानाय गच्छति।।
14-50-15a
14-50-15b
व्यक्तः सत्वगुणस्त्वेवं पुरुषो द्रव्यमुच्यते।
एतद्विप्रा विजानीत हन्त भूयो ब्रवीमि वः।।
14-50-16a
14-50-16b
सहस्रेणापि दुर्मेधा न बुद्धिमधिगच्छति।
चतुर्थेनाप्यथांशेन बुद्धिमान्सुखमेधते।।
14-50-17a
14-50-17b
एवं धर्मस्य विज्ञेयं संसाधनमुपायतः।
उपायज्ञो हि मेधावी सुखमत्यन्तमश्नुते।।
14-50-18a
14-50-18b
यथाऽध्वानमपाथेयः प्रपन्नो मनुजः क्वचित्।
क्लेशेन याति महता विनश्यत्यन्तराऽपि च।।
14-50-19a
14-50-19b
तथा कर्मसु विज्ञेयं फलं भवति वा न वा।
पुरुषस्यात्मनिःश्रेयः शुभाशुभनिदर्शनम्।।
14-50-20a
14-50-20b
यथा च दीर्घमध्वानं पद्म्यामेव प्रपद्यते।
अदृष्टपूर्वं सहसा तत्त्वदर्शनवर्जितः।।
14-50-21a
14-50-21b
तमेव च यथाऽध्वानं रथेनेहाशुगामिना।
गच्छत्यश्वप्रयुक्तेन तथा बुद्धिमतां गतिः।।
14-50-22a
14-50-22b
ऊर्ध्वं पर्वतमारुह्य नान्ववेक्षेत भूतलम्।
रथेन रथिनं पश्येत्क्लिश्यमानमचेतनम्।।
14-50-23a
14-50-23b
यावद्रथपथस्तावद्रथेन स तु गच्छति।
क्षीणे रथपदे विद्वान्रथमुत्सृज्य गच्छति।।
14-50-24a
14-50-24b
एवं गच्छति मेधावी तत्त्वयोगविधानवित्।
परिज्ञाय गुणज्ञश्च उत्तरादुत्तरोत्तरम्।।
14-50-25a
14-50-25b
यथाऽर्णवं महाघोरमप्लवः सम्प्रगाहते।
बाहुभ्यामेव सम्मोहाद्वधं वाञ्छत्यसंशयम्।।
14-50-26a
14-50-26b
नावा चापि यथा प्राज्ञो विभागज्ञः स्वरित्रया।
अश्रान्तः सलिलं गहाच्छीध्रं संतरते ह्रदम्।।
14-50-27a
14-50-27b
तीर्णो गच्छेत्परं पारं नावमुत्सृज्य निर्ममः।
व्याख्यातं पूर्वकल्पेन यथा रथपदातिनोः।।
14-50-28a
14-50-28b
स्नेहात्सम्मोहमापन्नो नावि दाशो यथा तथा।
ममत्वेनाभिभूतः संस्तत्रैव परिवर्तते।।
14-50-29a
14-50-29b
नावं न शक्यमारुह्य स्थले विपरिवर्तितुम्।
तथैव रथमारुह्य नाप्सु चर्या विधीयते।।
14-50-30a
14-50-30b
एवं कर्म कृतं वित्त विषयस्थं पृथक्पृथक्।
यथा कर्म कृतं लोके तथा तदुपपद्यते।।
14-50-31a
14-50-31b
यन्नैव गन्धि नो रस्यं न रूपस्पर्सशब्दवत्।
मन्यते न मनो बुद्ध्या तत्प्रधानं प्रचक्षते।।
14-50-32a
14-50-32b
तत्र प्रधानमव्यक्तमव्यक्तस्य गुणो महान्।
महप्रधानभूतस्य गुणोऽहङ्कार एव च।।
14-50-33a
14-50-33b
अहङ्कारात्तु सम्भूतो महाभूतकृतो गुणः।
पृथक्त्वेन हि भूतानां विषया वै गुणाःस्मृताः।।
14-50-34a
14-50-34b
बीजधर्मं यथाऽव्यक्तं तथैव प्रसवात्मकम्।
बीजधर्मा महानात्मा प्रसवश्चेति नः श्रुतम्।।
14-50-35a
14-50-35b
बीजधर्मात्साहङ्कारात्प्रसवश्च पुनःपुनः।
बीजप्रसवधर्माणि महाभूतानि पञ्च वै।।
14-50-36a
14-50-36b
बीजधर्मिण इत्याहुः प्रसवं च प्रकुर्वते।
विशेषाः पञ्चभूतानां तेषां वित्त विशेषणम्।।
14-50-37a
14-50-37b
तत्रैकगुणमाकाशं द्विगुणो वायुरुच्यते।
त्रिगुणं ज्योतिरित्याहुरापश्चापि चतुर्गुणाः।।
14-50-38a
14-50-38b
पृथ्वी पञ्चगुणा ज्ञेया चरस्थावरसङ्कुला।
सर्वभूतकरी देवी शुभाशुभनिदर्शिनी।।
14-50-39a
14-50-39b
शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च पञ्चमः।
एते पञ्चगुणा भूमेर्विज्ञेया द्विजसत्तमाः।।
14-50-40a
14-50-40b
पार्थिवश्च सदा गन्धो गन्धश्च बहुधा स्मृतः।
तस्य गन्धस्य वक्ष्यामि विस्तरेण बहून्गुणान्।।
14-50-41a
14-50-41b
इष्टश्चानिष्टगन्धश्च मधुरोऽम्लः कटुस्तथा।
निर्हारी संहतः स्निग्धो रूक्षो विशद एव च।।
14-50-42a
14-50-42b
एवं दशविधो ज्ञेयः पार्थिवो गन्ध इत्युत।
शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं द्रवश्चापां गुणाः स्मृताः।।
14-50-43a
14-50-43b
रसज्ञानं तु वक्ष्यामि रसस्तु बहुधा स्मृतः।
मधुरोऽम्लः कटुस्तिक्तः कषायो लवणस्तथा।।
14-50-44a
14-50-44b
एवं षड्विधविस्तारो रसो वारिमयः स्मृतः।
शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं त्रिगुणं ज्योतिरुच्यते।।
14-50-45a
14-50-45b
ज्योतिषश्च गुणो रूपं रूपं च बहुधा स्मृतम्।
शुक्लं कृष्णं तथा रक्तं नीलं पीतारुणं तथा।।
14-50-46a
14-50-46b
ह्रस्वं दीर्घं कृशं स्थूलं चतुरश्राणुवृत्तकम्।
एवं द्वादशविस्तारं तेजसो रूपमुच्यते।।
14-50-47a
14-50-47b
विज्ञेयं ब्राह्मणैर्वृद्धैर्धर्मज्ञैः सत्यवादिभिः।
शब्दस्पर्शौ च विज्ञेयौ द्विगुणो वायुरुच्यते।।
14-50-48a
14-50-48b
वायोश्चापि गुणः स्पर्शः स्पर्सश्च बहुधा स्मृतः।
उष्णः शीतः सुखो दुःखः स्निग्धो विशद एव च।।
14-50-49a
14-50-49b
कठिनश्चिक्वणः श्लक्ष्णः पिच्छिलो दारुणो मृदुः।
एवं द्वादशविस्तारो वायव्यो गुण उच्यते।।
14-50-50a
14-50-50b
विधिवद्ब्राह्मणैः सिद्धैर्मन्त्रज्ञैस्तत्त्वदार्शिभिः।। 14-50-51a
तत्रैकगुणमाकाशं शब्द इत्येव च स्मृतः।
तस्य शब्दस्यि वक्ष्यामि विस्तरेण बहून्गुणान्।।
14-50-52a
14-50-52b
षड्जर्षभः सगान्धारो मध्यमः पञ्चमस्तथा।
अतः परं तु विज्ञेयो निषादो धैवतस्तथा।
इष्टश्चानिष्टशब्दश्च संहतः प्रतिभानवान्।।
14-50-53a
14-50-53b
14-50-53c
एवं बहुविधो ज्ञेयः शब्द आकाशसम्भवः।
आकाशमुत्तमं भूतमहङ्कारस्ततः परः।।
14-50-54a
14-50-54b
अहङ्कारात्परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा ततः परः।
तस्मात्तु परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः।।
14-50-55a
14-50-55b
परावरज्ञो भूतानां विधिज्ञः सर्वकर्मणाम्।
सर्वभूतात्मभूतात्मा यं प्राप्यानन्त्यमश्नुते।।
14-50-56a
14-50-56b
।। इति श्रीमन्महाभारते आश्वमेधिकपर्वणि
अनुगीतापर्वणि पञ्चाशोऽध्यायः।। 50 ।।
आश्वमेधिकपर्व-049 पुटाग्रे अल्लिखितम्। आश्वमेधिकपर्व-051