महाभारतम्-14-आश्वमेधिकपर्व-106

विकिस्रोतः तः
Jump to navigation Jump to search
← आश्वमेधिकपर्व-105 महाभारतम्
चतुर्दशपर्व
महाभारतम्-14-आश्वमेधिकपर्व-106
वेदव्यासः
आश्वमेधिकपर्व-107 →


कृष्णेन युधिष्ठिरंप्रति कपिलादानप्रशंसनम्।। 1 ।। ब्रह्मणाऽग्निकुण्डमध्यात्कपिलासर्जनम्। तधा रुद्रादिदेवैः कपिलायै सर्वपूज्यत्वादिरूपवरदानम्।। 2 ।। देवर्ष्यादिभइः स्वनिवासाय कपिलावयवसमाश्रयणम्।। 3 ।। कृष्णेन हव्यकव्यदानकालकथनम्। तथा श्राद्धार्हानर्हब्राह्मणविवेचनम्। तथा स्वर्गनरकप्रापकसुकृतदुष्कृतकथनम्।। 4 ।।

कपिला गौ
  1. 001
  2. 002
  3. 003
  4. 004
  5. 005
  6. 006
  7. 007
  8. 008
  9. 009
  10. 010
  11. 011
  12. 012
  13. 013
  14. 014
  15. 015
  16. 016
  17. 017
  18. 018
  19. 019
  20. 020
  21. 021
  22. 022
  23. 023
  24. 024
  25. 025
  26. 026
  27. 027
  28. 028
  29. 029
  30. 030
  31. 031
  32. 032
  33. 033
  34. 034
  35. 035
  36. 036
  37. 037
  38. 038
  39. 039
  40. 040
  41. 041
  42. 042
  43. 043
  44. 044
  45. 045
  46. 046
  47. 047
  48. 048
  49. 049
  50. 050
  51. 051
  52. 052
  53. 053
  54. 054
  55. 055
  56. 056
  57. 057
  58. 058
  59. 059
  60. 060
  61. 061
  62. 062
  63. 063
  64. 064
  65. 065
  66. 066
  67. 067
  68. 068
  69. 069
  70. 070
  71. 071
  72. 072
  73. 073
  74. 074
  75. 075
  76. 076
  77. 077
  78. 078
  79. 079
  80. 080
  81. 081
  82. 082
  83. 083
  84. 084
  85. 085
  86. 086
  87. 087
  88. 088
  89. 089
  90. 090
  91. 091
  92. 092
  93. 093
  94. 094
  95. 095
  96. 096
  97. 097
  98. 098
  99. 099
  100. 100
  101. 101
  102. 102
  103. 103
  104. 104
  105. 105
  106. 106
  107. 107
  108. 108
  109. 109
  110. 110
  111. 111
  112. 112
  113. 113
  114. 114
  115. 115
  116. 116
  117. 117
  118. 118
वैशम्पायन उवाच। 14-106-1x
एवं श्रुत्वा परं पुण्यं कपिलादानमुत्तमम्।
धर्मपुत्रः प्रहृष्टात्मा केशवं पुनरब्रवीत्।।
14-106-1a
14-106-1b
देवदेवश कपिला यदा विप्राय दीयते।
कथं सर्वेषु चाङ्गेषु तस्यास्तिष्ठन्ति देवताः।।
14-106-2a
14-106-2b
याश्चैताः कपिलाः प्रोक्ता दश चैव त्वया मम।
तासां कति सुरश्रेष्ठ् कपिलाः पुण्यलक्षणाः।।
14-106-3a
14-106-3b
कथं वाऽनुगृहीतास्ताः सुरैः पितृगणैरपि।
केन युक्ताश्च वर्णेन श्रोतुं कौतूहलं मे।।
14-106-4a
14-106-4b
वैशम्पायन उवाच। 14-106-5x
युधिष्ठिरेणैवमुक्तः केशवः सत्यवाक्तदा।
गुह्यानां परमं गुह्यं वक्तुमेवोपचक्रमे।।
14-106-5a
14-106-5b
शृणु राजन्पवित्रं वै रहस्यं धर्ममुत्तमम्।।
ग्रहणीयं सत्यमिदं न श्राव्यं हेतुवादिभिः।।
14-106-6a
14-106-6b
यदा वत्सस्य पादौ द्वौ प्रसवे शिरसा सह।
दृश्येते दानकालं तत्तमाहुर्मुनिसत्तमाः।।
14-106-7a
14-106-7b
अन्तरिक्षगतो वत्सो यावद्भूमिं न यास्यति।
गौस्तावत्पृथिवी ज्ञेया तस्माद्देया तु तादृशी।।
14-106-8a
14-106-8b
यावन्ति धेन्वा रोमाणि सवत्साया युधिष्ठिर।
यावत्यः सिकताश्चापि गर्भोदकपरिप्लुताः।
तावद्वर्षसहस्राणि दाता स्वर्गे महीयते।।
14-106-9a
14-106-9b
14-106-9c
सुवर्णाभरणां कृत्वा सव्तसां कपिलां तिलैः।
प्रच्छाद्य तां तु दद्याद्वै सर्वरत्नैरलङ्कृताम्।।
14-106-10a
14-106-10b
ससमुद्रा नदी तेन सशैलवनकानना।
चतुरन्ता भवेद्दत्ता नात्र कार्या विचारणा।।
14-106-11a
14-106-11b
पृथिवीदानतुल्येन तेन दानेन मानवः।
संसारसागरात्तीर्णो याति लोकं प्रजापतेः।।
14-106-12a
14-106-12b
ब्रह्महा भ्रूणहा गोघ्नो यदि वा गुरुतल्पगः।
महापातकयुक्तोपि एतद्दानेन शुद्ध्यति।।
14-106-13a
14-106-13b
इदं पठति यः पुण्यं कपिलादानमुत्तमम्।
प्रातरुत्थाय मद्भक्त्या तस्य पुण्यफलं शृणु।।
14-106-14a
14-106-14b
मनसा कर्मणा वाचा मतिपूर्वं युधिष्ठिर।
पापं रात्रिकृतं हन्यादस्याध्यायस्य पाठकः।।
14-106-15a
14-106-15b
इदमावर्तमानस्तु श्राद्धे यस्तर्पयेद्द्विजान्।
तस्याप्यमृतमश्नन्ति पितरोऽत्यन्तहर्षिताः।।
14-106-16a
14-106-16b
यश्चेदं शृणुयाद्भक्त्या मद्गतेनान्तरात्मना।
तस्य रात्रिकृतं सर्वुं पापमाशु प्रणश्यति।।
14-106-17a
14-106-17b
अतः परं विशेषं तु कपिलानां ब्रवीमि ते।
याश्चैताः कपिलाः प्रोक्ता दश राजन्मया तव।
तासां चतस्रः प्रवराः पुण्याः पापप्रणाशनाः।।
14-106-18a
14-106-18b
14-106-18c
सुवर्णकपिला पुण्या तथा रक्ताक्षिपिङ्गला।
पिङ्गलाक्षी च या गौश्च या स्यात्पिङ्गलपिङ्गला।।
14-106-19a
14-106-19b
एताश्चतस्रः प्रवराः पवित्राः पापनाशनाः।
नमस्कृता वा दृष्टा वा घ्नन्ति पापं नरस्य तु।।
14-106-20a
14-106-20c
यस्यैताः कपिलाः सन्ति गृहे पापप्रणाशनाः।
तत्र श्रीर्विजयः कीर्तिः स्फीता नित्यं युधिष्ठिर।।
14-106-21a
14-106-21b
एतासां प्रीतिमायाति क्षीरेण तु वृषध्वजः।
दध्ना च त्रिदशाः सर्वे घृतेन तु हुताशनः।।
14-106-22a
14-106-22b
पितरः पितामहाश्चैव तथैव प्रपितामहाः।
सकृद्देत्तेन तुष्यन्ति वर्षकोटिं युधिष्ठिर।।
14-106-23a
14-106-23b
कपिलाया घृतं क्षीरं दधि पायसमेव वा।
श्रोत्रियेभ्यः सकृद्दत्वा नरः पापैः प्रमुच्यते।।
14-106-24a
14-106-24b
उपवासं तु यः कृत्वाऽप्यहोरात्रं जितेन्द्रियः।
कपिलापञ्चगव्यं तु पीत्वा चान्द्रायणात्परम्।।
14-106-25a
14-106-25b
सौम्ये मुहूर्ते तत्प्रशय शुद्धात्मा शुद्धमानसः।
क्रोधानृतविनिर्मुक्तो मद्गतेनान्तरात्मना।।
14-106-26a
14-106-26b
कपिलापञ्चगव्येन सुमन्त्रेण पृथक्पथक्।
यो मत्प्रतिकृतिं वाऽपि शङ्कराकृतिमेव वा।
स्नापयेद्विषुवे यस्तु सोऽश्वमेधफलं लभेत्।।
14-106-27a
14-106-27b
14-106-27c
स मुक्तपापः शुद्धात्मा यानेनांबरशोभिना।
मम लोकं व्रजेन्मुक्तो रुद्रलोकमथापि वा।।
14-106-28a
14-106-28b
ब्रह्मणा तु पुरा सृष्टा कपिला काञ्चनप्रभा।
अग्निकुण्डात्परैर्मन्त्रैर्होमधेनुर्महाप्रभा।।
14-106-29a
14-106-29b
सृष्टमात्रां तु तां दृष्ट्वा देवा रुद्रादयो दिवि।
सिद्धा ब्रह्मर्षयश्चैव वेदाः साङ्गाः सहाध्वरैः।।
14-106-30a
14-106-30b
सागराः सरितश्चैव पर्वताः सबलाहकाः।
गन्धर्वाप्सरसो यक्षाः पन्नगाश्चाप्युपस्थिताः।।
14-106-31a
14-106-31b
सर्वे विस्मयमापन्नाः शिखिमध्ये महाप्रभाम्।
मन्त्रैशअच विविधैस्तां तु तुष्टुवुस्तामनेकशः।।
14-106-32a
14-106-32b
कृताञ्जलिपुटाः सर्वे नातिशृङ्गीं त्रिलोचनाम्।
मूर्ध्ना प्रणम्य तां भूमौ सवत्साममृतारणिम्।।
14-106-33a
14-106-33b
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे चतुर्वक्त्रं पितामहम्।
आज्ञापय महादेव किं ते कुर्मः कथं विभो।।
14-106-34a
14-106-34b
एवमुक्तः सुरैः सर्वैर्ब्रह्मा वचनमब्रवीत्।
भवन्तोप्यनुगृह्णन्तु दोग्ध्रीमेनां पयस्विनीम्।।
14-106-35a
14-106-35b
होमधेनुरियं ज्ञेया ह्यग्नीन्संतर्पयिष्यति।
अतोऽग्निस्तर्पितः सर्वान्भवतस्तर्पयिष्यति।।
14-106-36a
14-106-36b
प्रीताः क्षीरामृतेनास्या जातवीर्यपराक्रमाः।
जयिष्यथ यथाकामं दानवान्सर्व एव तु।।
14-106-37a
14-106-37b
जातवीर्यबलैर्युक्ताः सत्ववन्तो जितेन्द्रियाः।
असङ्ख्येयबलाः सर्वे पालयिष्यथ वै प्रजाः।।
14-106-38a
14-106-38b
पालिताश्च प्रजाः सर्वा भवद्भिरिह धर्मतः।
पूजयिष्यन्ति वा नित्यं यज्ञैर्विविधदक्षिणैः।।
14-106-39a
14-106-39b
एवमुक्ताः सुराः सर्वे ब्रह्मणा परमेष्ठिना।
ततः संहृष्टवदनाः कपिलायै वरं ददुः।।
14-106-40a
14-106-40b
देवता ऊचुः। 14-106-41x
यस्माल्लोकहितायाद्य ब्रह्मणा त्वं विनिर्मिता।
तस्मात्पूता पवित्रा च भव पापव्यपोहिनी।।
14-106-41a
14-106-41b
ये त्वां दृष्ट्वा नमस्यन्ति स्पृष्ट्वा चापि करैर्नराः।
तेषां वर्षकृतं पापं त्वद्भक्तानां प्रणश्यति।।
14-106-42a
14-106-42b
अकामकृतमज्ञानमदृष्टं यच्च पातकम्।
त्वां दृष्ट्वा ये नमस्यन्ति नराः सर्वसहेति च।
तेषां तद्विलयं याति तमः सूर्योदये यथा।।
14-106-43a
14-106-43b
14-106-43c
भगवानुवाच। 14-106-44x
इत्युक्त्वाऽस्यै वरं दत्त्वा प्रययुस्ते यथागतम्।
लोकनिस्तरणार्थाय सा च लोकांश्चचार ह।।
14-106-44a
14-106-44b
तस्यामेव समुद्भूता ह्येताश्च कपिला नव।
विचरन्ति महीमेनां लोकानुग्रहकारणात्।
तस्मात्तु कपिला देया परत्र हितमिच्छता।।
14-106-45a
14-106-45b
14-106-45c
यदा च दीयते राजन्कपिला ह्यग्निहोत्रिणे।
तदा च शृङ्गयोस्तस्या विष्णुरिन्द्रश्च तिष्ठति।।
14-106-46a
14-106-46b
चन्द्रवज्रधरौ चापि तिष्ठतः शृङ्गमूलयोः।
शृङ्गमध्ये तथा ब्रह्मा ललाटे गोवृषध्वजः।।
14-106-47a
14-106-47b
कर्णयोरश्विनौ देवौ चक्षुषी शशिभास्करौ।
दन्तेषु मरुतो देवा जिह्वायां वाक्सरलस्वती।।
14-106-48a
14-106-48b
रोमकूपेषु मुनयश्चर्मण्येव प्रजापतिः।
निश्श्वासेषु स्थिता वेदाः सषडङ्गपदक्रमाः।।
14-106-49a
14-106-49b
नासापुटे स्थिता गन्धाः पुष्पाणि सुरभीणि च।
अधरे वसवः सर्वे मुखे चाग्निः प्रतिष्ठितः।।
14-106-50a
14-106-50b
साध्या देवाः स्थिताः कक्षे ग्रीवायां पार्वती स्थिता।
पृष्ठे च नक्षत्रगणाः ककुद्देशे नभस्स्थलम्।।
14-106-51a
14-106-51b
अपाने सर्वतीर्थानि गोमूत्रे जाह्नवी स्वयम्।
इष्टतुष्टमया लक्ष्मीर्गोमये वसती तदा।।
14-106-52a
14-106-52b
नासिकायां सदा देवी ज्येष्ठा वसति भामिनी।
श्रोणीतटस्थाः पितरो रमा लाङ्गूलमाश्रिता।।
14-106-53a
14-106-53b
पार्श्वयोरुभयोः सर्वे विश्वेदेवाः प्रतिष्ठिताः।
तिष्ठत्युरसि तासां तु प्रीतः शक्तिधरो गुहः।।
14-106-54a
14-106-54b
जानजङ्घोरुदेशेषु पञ्च तिष्ठन्ति वायवः।
खुरमध्येषु गन्धर्वाः खुराग्रेषु च पन्नगाः।।
14-106-55a
14-106-55b
चत्वारः सागराः पूर्णास्तस्या एव पयोधराः।
रतिर्मेधा क्षमा स्वाहा श्रद्धा शान्तिर्धृतिः स्मृतिः।
14-106-56a
14-106-56b
कीर्तिर्दीप्तिः क्रिया कान्तिस्तुष्टिः पुष्टिस्च सन्ततिः।
दिशश्च प्रदिशश्चैव सेवन्ते कपिलां सदा।।
14-106-57a
14-106-57b
देवा पितृगणाश्चापि गन्धर्वाप्सरसां गणाः।
लोका द्वीपार्णवाश्चैव गङ्गाद्याः सरितस्तथा।।
14-106-58a
14-106-58b
देवाः पितृगणाश्चापि वेदाः साङ्गाः सहाध्वरैः।
वेदोक्तैर्विविधैर्मन्त्रैः स्तुवन्ति हृषितास्तथा।।
14-106-59a
14-106-59b
विद्याधराश्च ये सिद्धा भूतास्तारागणास्तथा।
पुष्पवृष्टिं च वर्षन्ति प्रनृत्यन्ति च हर्षिताः।।
14-106-60a
14-106-60b
ब्रह्मणोत्पादिता देवी वह्निकुण्डान्महाप्रभा।
नमस्ते कपिले पुण्ये सर्वदेवैर्नमस्कृते।।
14-106-61a
14-106-61b
कपिलेऽथ महासत्वे सर्वतीर्थमये शुभे।
दातारं स्वजनोपेतं ब्रह्मलोकं नय स्वयम्।।
14-106-62a
14-106-62b
अहो रत्नमिदं पुण्यं सर्वदुःखघ्नमुत्तमम्।
अहो धर्मार्जितं शुद्धमिदमग्र्यं महाधनम्।
इत्याकाशस्थितस्ते तु सर्वदेवा जपन्ति च।।
14-106-63a
14-106-63b
14-106-63c
तस्याः प्रतिग्रहीता च भुङ्क्ते यावद्द्विजोत्तमः।
तावद्देवगणाः सर्वे कपिलामर्चयन्ति च।
स्वर्णशृङ्गीं रूप्यखुरां गन्धैः पुष्पैः सुपूजिताम्।।
14-106-64a
14-106-64b
14-106-64c
वस्त्राभ्यामहताभ्यां तु यावत्तिष्ठत्यलङ्कृता।
तावद्यदिच्छेत्कपिला मन्त्रपूता सुसंस्कृता।
भूलोकवासिनः सर्वान्ब्रह्मलोकं नयेत्स्वयम्।।
14-106-65a
14-106-65b
14-106-65c
भूरश्वः कनकं गावो रूप्यमश्वं तिला यवाः।
दीयमानानि विप्राय प्रहृष्यन्ति दिनेदिने।।
14-106-66a
14-106-66b
अथ त्वश्रोत्रियेभ्यो वै तानि दत्तानि पाण्डव।
तथा निन्दन्त्यथात्मानमशुभं किंनु नः कृतं।।
14-106-67a
14-106-67b
अहो रक्षःपिशाचैश्च लुप्यमानाः समन्ततः।
यास्यामो निरयं शीघ्रमिति शोचन्ति तानि वै।।
14-106-68a
14-106-68b
एतान्यपि द्विजेभ्यो वै श्रोत्रियेभ्यो विशेषतः।
दीयमानानि वर्धन्ते दातारं तारयन्ति च।।
14-106-69a
14-106-69b
युधिष्ठिर उवाच। 14-106-70x
देवदेवेश दैत्यघ्न कालः को हव्यकव्ययोः।
के तत्रि पूजामर्हन्ति वर्जनीयाश्च के द्विजाः।।
14-106-70a
14-106-70b
भगवानुवाच। 14-106-71x
दैवं पूर्वाह्णिकं ज्ञेयं पैतृकं चापराह्णिकम्।
कालहीनं च यद्दानं तद्दानं राजसं विदुः।।
14-106-71a
14-106-71b
अवघुष्टं च यद्भुक्तमनृतेन च भारत।
परामृष्टं शुना वाऽपि तद्भागं राक्षसं विदुः।।
14-106-72a
14-106-72b
यावन्तः पतिता विप्रा जडोन्मत्तादयोपि च।
दैवे च पित्र्ये ते विप्रा राजन्नार्हन्ति सत्क्रियां।।
14-106-73a
14-106-73b
क्लीबः प्लङ्गी च कृष्ठी च राजयक्ष्मान्वितश्च यः।
अपस्मारी च यश्चापि पित्र्ये नार्हति सत्कृतिम्।।
14-106-74a
14-106-74b
चिकित्सका देवलका मिथ्यानियमधारिणः।
सोमविक्रयिणश्चापि श्राद्धे नार्हन्ति सत्कृतिम्।।
14-106-75a
14-106-75b
एकोद्दिष्टे च ये चान्नं भुञ्जते विधिवद्द्बिजाः।
चान्द्रायणमकृत्वा ते पुनर्नार्हन्ति सत्कृतिम्।।
14-106-76a
14-106-76b
गायका नर्तकाश्चैव प्लवका वादकास्तथा।
कथका यौधिकाश्चैव श्राद्धे नार्हन्ति सत्कृतिम्।।
14-106-77a
14-106-77b
अनग्नयश्च ये विप्राः शवनिर्यातकाश्च ये।
स्तेनाश्चापि विकर्मस्था राजन्नार्हन्ति सत्कृतिम्।।
14-106-78a
14-106-78b
अपरिज्ञातपूर्वाश्च गणपुत्राश्च ये द्विजाः।
पुत्रिकापुत्रकाश्चापि श्राद्धे नार्हन्ति सत्कृतिम्।।
14-106-79a
14-106-79b
रणकर्ता च यो विप्रो यश्च वाणिज्यको द्विजः।
प्राणिविक्रयवृत्तिश्च श्राद्धे नार्हन्ति सत्कृतिम्।।
14-106-80a
14-106-80b
चीर्णव्रतगुणैर्युक्ता नित्यं स्वाध्यायतत्पराः।
सावित्रीज्ञाः क्रियावन्तस्ते श्राद्धे सत्कृतिक्षमाः।।
14-106-81a
14-106-81b
श्राद्धस्य ब्राह्मणः कालः प्राप्तं दघि घृतं तथा।
दर्भाः सुमनसः क्षेत्रं तत्काले श्राद्धदो भवेत्।।
14-106-82a
14-106-82b
चारित्रनिरता राजन्कृशा ये कृशवृत्तयः।
अर्थिनश्चोपगच्छन्ति तेभ्यो दत्तं महत्फलम्।।
14-106-83a
14-106-83b
तपस्विनश्च ये विप्रास्तथा भैक्षचराश्च ये।
अर्थिनः केचिदिच्छन्ति तेषां दत्तं महत्फलम्।।
14-106-84a
14-106-84b
एवं धर्मभूतां श्रेष्ठ ज्ञात्वा सर्वात्मना तदा।
र्श्रोत्रियाय दरिद्राय प्रयच्छानुपकारिणे।।
14-106-85a
14-106-85b
दानं यत्ते प्रियं किंचिच्छ्रोत्रियाणां च यत्प्रियम्।
तत्प्रयच्छस्व धर्मज्ञ यदीच्छसि तदक्षयम्।।
14-106-86a
14-106-86b
निरयं ये च गच्छन्ति तच्छृणुष्व युधिष्ठिर।। 14-106-87a
गुर्वर्थं वा भयार्थं वा नोचेदन्यत्र पाण्डव।
वदन्ति येऽनृतं विप्रास्ते वै निरयगामिनः।।
14-106-88a
14-106-88b
परदारापहर्तारः परदारामिमर्शकाः।
परारप्रयोक्तारस्तें वै निरयगामिनः।।
14-106-89a
14-106-89b
सूचकाः संधिभेत्तारः परद्रव्योपजीविनः।
अकृतज्ञाश्च मित्राणां ते वै निरयगामिनः।।
14-106-90a
14-106-90b
वर्णाश्रमाणां ये बाह्याः पाषण्डाश्चैव पापिनः।
उपासते च तानेव ते सर्वे नरकालयाः।।
14-106-91a
14-106-91b
वेदविक्रयिणश्चैव वेदानां चैव दूषकाः।
वेदानां लेखकाश्चैव ते वै निरयगामिनः।।
14-106-92a
14-106-92b
रसविक्रयिणो राजन्विषविक्रयिणश्च ये।
क्षीरविक्रयिणश्चापि ते वै निरयगामिनः।।
14-106-93a
14-106-93b
चण्डालेभ्यश्च ये क्षीरं प्रयच्छन्ति नराधमाः।
अर्थार्थमथवा स्नेहात्ते वै निरयगामिनः।।
14-106-94a
14-106-94b
पशूनां दमक**यैव तथा नासानुवेधकाः
पुंस्त्वहिंसाकरस्चैव ते वै निरयगामिनः।।
14-106-95a
14-106-95b
अदातारः समर्था ये द्रव्याणां लोभकारणात्।
दीनानन्धान्न पश्यन्ति ते वै निरयगामिनः।।
14-106-96a
14-106-96b
क्षान्तान्दान्तान्कृशान्प्राज्ञान्दीर्घकालं सहोषितान्।
त्यजन्ति कृतकृत्या ये ते वा निरयगामिनः।।
14-106-97a
14-106-97b
बालानामपि वृद्धानां श्रान्तानां चापि ये नराः।
अदत्त्वाऽश्नान्ति मृष्टान्नं ते वै निरयगामिनः।।
14-106-98a
14-106-98b
एते पूर्वर्षिभिः प्रोक्ता नरा निरयगामिनः।
ये स्वर्गं समनुप्राप्तास्ताञ्शृणुष्व युधिष्ठिर।।
14-106-99a
14-106-99b
दानेन तपसा चैव सत्येन च दमेन च।
ये धर्ममनुवर्तन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः।।
14-106-100a
14-106-100b
शुश्रूषयाऽप्युपाध्यायाच्छ्रुतमादाय पाण्डव।
ये प्रतिग्रहनिस्स्नेहास्ते नराः स्वर्गगामिनः।।
14-106-101a
14-106-101b
मधुमांसासवेभ्यस्तु निवृत्ता व्रतवत्तु ये।
परदारनिवृत्ता ये ते नराः स्वर्गगामिनः।।
14-106-102a
14-106-102b
मातरं पितरं चैव शुश्रूषन्ति च ये नराः।
भ्रहातॄणामपि सस्नेहास्ते नराः स्वर्गगामिनः।।
14-106-103a
14-106-103b
ये तु भोजनकाले तु निर्याताश्चातिथिप्रियाः।
द्वाररोधं न कुर्वन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः।।
14-106-104a
14-106-104b
वैवाहिकं तु कन्यानां दरिद्राणां च ये नराः।
कारयन्ति च कुर्वन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः।।
14-106-105a
14-106-105b
रसानामथ बीजानामोषधीनां तथैव च।
दातारः श्रद्धयोपेतास्ते नराः स्वर्गगामिनः।।
14-106-106a
14-106-106b
क्षेमाक्षेमं च मार्गेषु समानि विषमाणि च।
अर्थिनां ये च वक्ष्यन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः।।
14-106-107a
14-106-107b
पर्वद्वये चतुर्दश्यामष्टम्यां संध्ययोर्द्वयोः।
आर्द्रायां जन्मनक्षत्रे विषुवे श्रवणेऽथवा।
ये ग्राम्यधर्मविरतास्ते नराः स्वर्गगाप्तिनः।।
14-106-108a
14-106-108b
14-106-108c
हव्यकव्यविधानं च नरकस्वर्गगामिनौ।
धर्माधर्मौ च कथितौ किं भूयः श्रोतुमिच्छसि।।
14-106-109a
14-106-109b
।। इति श्रीमन्महाभारते आश्वमेधिकपर्वणि
वैष्णवधर्मपर्वणि षडधिकशततमोऽध्यायः।। 106


आश्वमेधिकपर्व-105 पुटाग्रे अल्लिखितम्। आश्वमेधिकपर्व-107