सामग्री पर जाएँ

महाभारतम्-14-आश्वमेधिकपर्व-020

विकिस्रोतः तः
← आश्वमेधिकपर्व-019 महाभारतम्
चतुर्दशपर्व
महाभारतम्-14-आश्वमेधिकपर्व-020
वेदव्यासः
आश्वमेधिकपर्व-021 →
  1. 001
  2. 002
  3. 003
  4. 004
  5. 005
  6. 006
  7. 007
  8. 008
  9. 009
  10. 010
  11. 011
  12. 012
  13. 013
  14. 014
  15. 015
  16. 016
  17. 017
  18. 018
  19. 019
  20. 020
  21. 021
  22. 022
  23. 023
  24. 024
  25. 025
  26. 026
  27. 027
  28. 028
  29. 029
  30. 030
  31. 031
  32. 032
  33. 033
  34. 034
  35. 035
  36. 036
  37. 037
  38. 038
  39. 039
  40. 040
  41. 041
  42. 042
  43. 043
  44. 044
  45. 045
  46. 046
  47. 047
  48. 048
  49. 049
  50. 050
  51. 051
  52. 052
  53. 053
  54. 054
  55. 055
  56. 056
  57. 057
  58. 058
  59. 059
  60. 060
  61. 061
  62. 062
  63. 063
  64. 064
  65. 065
  66. 066
  67. 067
  68. 068
  69. 069
  70. 070
  71. 071
  72. 072
  73. 073
  74. 074
  75. 075
  76. 076
  77. 077
  78. 078
  79. 079
  80. 080
  81. 081
  82. 082
  83. 083
  84. 084
  85. 085
  86. 086
  87. 087
  88. 088
  89. 089
  90. 090
  91. 091
  92. 092
  93. 093
  94. 094
  95. 095
  96. 096
  97. 097
  98. 098
  99. 099
  100. 100
  101. 101
  102. 102
  103. 103
  104. 104
  105. 105
  106. 106
  107. 107
  108. 108
  109. 109
  110. 110
  111. 111
  112. 112
  113. 113
  114. 114
  115. 115
  116. 116
  117. 117
  118. 118

कृष्णेनार्जुनंप्रति मोक्षसाधनादिप्रतिपादकसिद्धकाश्यपसंवादरूपानुगीतोपदेशः।। 1 ।।

ब्राह्मण उवाच। 14-20-1x
यः स्यादेकान्त आसीनस्तूष्णीं किञ्चिदचिन्तयन्।
पूर्वंपूर्वं परित्यज्य स निरारम्भको भवेत्।।
14-20-1a
14-20-1b
सर्वमित्रः सर्वसहः शमे रक्तो जितेन्द्रियः।
व्यपेतभयमन्युश्च कामहा मुच्यते नरः।।
14-20-2a
14-20-2b
आत्मवत्सर्वभूतेषु यश्चरेन्नियतः शुचिः।
`नित्यमेव यथान्यायं यश्चरेन्नियतेन्द्रियः।'
अमानी निरभीमानः सर्वतो मुक्त एव सः।।
14-20-3a
14-20-3b
14-20-3c
जीवितं मरणं चोभे सुखदुःखे तथैव च।
लाभालाभे प्रियद्वेष्ये यः समः स च मुच्यते।।
14-20-4a
14-20-4b
न कस्यचित्स्पृहयते नावजानाति किचन।
निर्द्वन्द्वो वीतरागात्मा सर्वथा मुक्त एव सः।।
14-20-5a
14-20-5b
अनमित्रश्च निर्बन्धुरनपत्यश्च यः क्वचित्।
त्यक्तधर्मार्थकामश्च निराराङ्क्षी च मुच्यते।।
14-20-6a
14-20-6b
नैव धर्मी न चाधर्मी पूर्वोपचितहा च यः।
क्षीणधातुः प्रशान्तात्मा निर्द्वंद्वः स विमुच्यते।।
14-20-7a
14-20-7b
अकर्मा चाविकाङ्क्षश्च पश्येज्जगदशाश्वतम्।
अस्वस्तमवशं नित्यं जन्ममृत्युजरायुतम्।।
14-20-8a
14-20-8b
वैराग्यबुद्धिः सततं तावद्दोषव्यपेक्षकः।
आत्मबन्धविनिर्मोक्षं स करोत्यचिरादिव।।
14-20-9a
14-20-9b
अगन्धमरसस्पर्शमशब्दमपरिग्रहम्।
अरूपमनभिज्ञेयं दृष्ट्वाऽऽत्मानं विमुच्यते।।
14-20-10a
14-20-10b
पञ्चभूतगुणैर्हीनममूर्तिमदलेपकम्।
अगुणं गुणभोक्तारं यः पश्यति स मुच्यते।।
14-20-11a
14-20-11b
विहाय सर्वसङ्कल्पान्बुद्ध्या शारीरमानसान्।
शनैर्निर्वाणमाप्नोति निरिन्धन इवानलः।।
14-20-12a
14-20-12b
सर्वसंस्कारनिर्मुक्तो निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः।
तपसा इन्द्रियग्रामं यश्चरेन्मुक्त एव सः।।
14-20-13a
14-20-13b
विमुक्तः सर्वसंस्कारैस्ततो ब्रह्मि सनातनम्।
परमाप्नोति संशान्तमचलं नित्यमक्षरम्।।
14-20-14a
14-20-14b
अतः परं प्रवक्ष्यामि योगशास्त्रमनुत्तमम्।
यज्ज्ञात्वा सिद्धमात्मानं लोके पश्यन्ति योगिनः।।
14-20-15a
14-20-15b
तस्योपदेशं वक्ष्यामि यथावत्तन्निबोध मे।
यैर्योगैर्भावयन्नित्यं पश्यत्यात्मानमात्मनि।।
14-20-16a
14-20-16b
इन्द्रियाणि तु संहृत्य मन आत्मनि धारयेत्।
तीव्रं तप्त्वा तपः पूर्वं मोक्षयोगं समाचरेत्।।
14-20-17a
14-20-17b
तपस्वी नित्यसङ्कल्पो दम्भाहङ्कारवर्जितः।
मनीषी मनसा विप्रः पश्यत्यात्मानमात्मनि।।
14-20-18a
14-20-18b
स चेच्छक्रोत्ययं साधुर्योक्तुमात्मानमात्मनि।
तत एकान्तशीलः स पश्यत्यात्मानमात्मनि।।
14-20-19a
14-20-19b
संयतः सततं युक्त आत्मवान्विजितेन्द्रियः।
यथा य आत्मनाऽऽत्मानं सम्प्रयुक्तः प्रपश्यति।।
14-20-20a
14-20-20b
यथाहि पुरुषः स्वप्ने दृष्ट्वा पश्यत्यसाविति।
तथारूपमिवात्मानं साधुयुक्तः प्रपश्यति।।
14-20-21a
14-20-21b
इषीकां च यथा मुञ्जात्कश्चिन्निष्कृष्य दर्शयेत्।
योगी निष्कृष्य चात्मानं तथा पश्यति देहतः।।
14-20-22a
14-20-22b
मुञ्जं शरीरमित्याहुरिषीकामात्मनि श्रिताम्।
एतन्निदर्शनं प्रोक्तं योगविद्भिरनुत्तमम्।।
14-20-23a
14-20-23b
यदा हि युक्तमात्मानं सम्यक् पश्यति देहभूत्।
न तस्येहेश्वरः कश्चित्त्रैलोक्यस्यापि यः प्रभुः।।
14-20-24a
14-20-24b
अन्यान्याश्चैव तनवो यथेष्टं प्रतिपद्यते।
विनिर्भिद्य जरां मृत्युं न शोचति न हृष्यति।।
14-20-25a
14-20-25b
देवानामपि देवत्वं युक्तः कारयते वशी।
ब्रह्म चाव्ययमाप्नोति हित्वा देहमशाश्वतम्।।
14-20-26a
14-20-26b
विनश्यत्सु च लोकेषु न भयं तस्य जायते।
क्लिश्यमानेषु भूतेषु न स क्लिश्यति केनचित्।।
14-20-27a
14-20-27b
दुःखशोकमलैर्घोरैः सङ्गस्नेहसमुद्भवैः।
न विचाल्यति युक्तात्मा निस्पृहः शान्तमानसः।।
14-20-28a
14-20-28b
नैनं शस्त्राणि विध्यन्ते न मृत्युश्चास्य विद्यते।
नातः सुखतरं किञ्चिल्लोके क्वचन दृश्यते।।
14-20-29a
14-20-29b
सम्यग्युक्त्वा स आत्मानमात्मन्येव प्रतिष्ठिते।
विनिवृत्तजरादुःखः सुखं स्वपिति चापि सः।।
14-20-30a
14-20-30b
देहान्यथेष्टमभ्येति हित्वेमां मानुषीं तनुम्।
निर्वेदस्तु न कर्तव्यो भुञ्जानेन कथञ्चन।।
14-20-31a
14-20-31b
सम्यग्युक्तो यदात्मानमात्मन्येव प्रपश्यति।
तदैव न स्पृहयते साक्षादपि शतक्रतोः।।
14-20-32a
14-20-32b
योगमेकान्तशीलस्तु यथा विन्दति तच्छृणु।
दृष्टपूर्वां दिशं चिन्त्य यस्मिन्संनिवसेत्परे।।
14-20-33a
14-20-33b
पुरस्याभ्यन्तरे तस्य मनः स्थाप्यं न बाह्यतः।
पुरस्याभ्यन्तरे तिष्ठन्यस्मिन्नावसथे वसेत।
तस्मिन्नावसथे धार्यं सबाद्याभ्यन्तरं मनः।।
14-20-34a
14-20-34b
14-20-34c
प्रचिन्त्यावसथे कृत्स्नं यस्मिन्काये स पश्यति।
तस्मिन्काये मनश्चास्य न च किञ्चन बाह्यतः।।
14-20-35a
14-20-35b
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं निर्घोषं निर्जने वने।
कायमभ्यन्तरं कृत्स्नमेकाग्रः परिचिन्तयेत्।।
14-20-36a
14-20-36b
इन्तांस्तालु च जिह्वां च गलं ग्रीवां तथैव च।
हृदयं चिन्तयेच्चापि तथा हृदयबन्धनम्।।
14-20-37a
14-20-37b
इत्युक्तः स मया शिष्यो मेधावी मधुसूदन।
पप्रच्छ पुनरेवेमं मोक्षधर्मं सुदुर्वचम्।।
14-20-38a
14-20-38b
भुक्तं भुक्तमिदं कोष्ठे कथमन्नं विपच्यते।
कथं रसत्वं व्रजति शोणितत्वं कथं पुनः।।
14-20-39a
14-20-39b
तथा मांसं च मेदश्च स्नाय्वस्थीनि च पोषयेत्।
कथमेतानि सर्वाणि शरीराणि शरीरिणाम्।।
14-20-40a
14-20-40b
वर्धन्ते वर्धमानस्य वर्धते च कथं बलम्।
निरासनं निष्कसनं मलानां च पृथक् पृथक्।।
14-20-41a
14-20-41b
कुतो वाऽयं प्रश्वसिति उच्छ्वसित्यपि वा पुनः।
कं च देशमधिष्ठाय तिष्ठत्यात्माऽयमात्मनि।।
14-20-42a
14-20-42b
जीवः कथं वहति च चेष्टमानः कलेवरम्।
किंवर्णं कीदृशं चैव निवेशयति वै मनः।।
14-20-43a
14-20-43b
याथातथ्येन भगवन्वक्तुमर्हसि मेऽनघ।
इति सम्परिपृष्टोऽहं तेन विप्रेणि माधव।।
14-20-44a
14-20-44b
प्रत्यब्रवं महाबाहो यथाश्रुतमरिंदम।
यथा स्वकोष्ठे प्रक्षिप्य भाण्डं भाण्डमना भवेत्।।
14-20-45a
14-20-45b
तथा स्वकाये प्रक्षिप्य मनोद्वारैरनिश्चलैः।
आत्मानं तत्र मार्गेत प्रमादं परिवर्जयेत्।।
14-20-46a
14-20-46b
एवं सततमुद्युक्तः प्रीतात्मा नचिरादिव।
आसादयति तद्ब्रह्म यद्दृष्ट्वा स्यात्प्रधानवित्।।
14-20-47a
14-20-47b
न त्वसौ चक्षुषा ग्राह्यो न च सर्वैरपीन्द्रियैः।
मनसैव प्रदीपेन महानात्मा प्रदृश्यते।।
14-20-48a
14-20-48b
सर्वतः पाणिपादान्तः सर्वतोक्षिशिरोमुखः।
सर्वतः श्रुतिमाँल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति।।
14-20-49a
14-20-49b
जीवो निष्क्रान्तमात्मानं शरीरात्सम्प्रपश्यति।
स तमुत्सृज्य देहं स्वं पारयेद्ब्रह्म केवलम्।।
14-20-50a
14-20-50b
आत्मानमालोकयति मनसा प्रहसन्निव।
तदेवमाश्रयं कृत्वा मोक्षं याति ततो मयि।।
14-20-51a
14-20-51b
इदं सर्वरहस्यं ते मया प्रोक्तं द्विजोत्तम।
आपृच्छे साधयिष्यामि गच्छ विप्र यथासुखम्।।
14-20-52a
14-20-52b
इत्युक्तः स तदा कृष्ण मया शिष्यो महातपाः।
अगच्छत यथाकामं ब्राह्मणश्छिन्नसंशयः।।
14-20-53a
14-20-53b
वासुदेव उवाच। 14-20-54x
इत्युक्त्वा स तदा वाक्यं मां पार्थ द्विजसत्तमः।
मोक्षधर्माश्रितं सम्यक् तत्रैवान्तरधीयत।।
14-20-54a
14-20-54b
कच्चिदेतत्त्वया पार्थ श्रुत्मेकाग्रचेतसा।
तदापि हि रथस्थस्त्वं श्रुतवानेतदेव हि।।
14-20-55a
14-20-55b
नैतत्पार्थ सुविज्ञेयं व्यामिश्रेणेति मे मतिः।
नरेणाकृतसङ्गेन विशुद्धेनान्तरात्मना।।
14-20-56a
14-20-56b
सुरहस्यमिदं प्रोक्तं देवानां भरतर्षभ।
कच्चित्त्विदं श्रुतं पार्थ मनुष्येणेह कर्हिचित्।।
14-20-57a
14-20-57b
न ह्येतच्छ्रोतुमर्होऽन्यो मनुष्यस्त्वामृतेऽनघ।
नैतदन्येनि विज्ञेयं व्यामिश्रेणान्तरात्मना।।
14-20-58a
14-20-58b
क्रियावद्भिर्हि कौन्तेय देवलोकः समावृतः।
न चैतदिष्टं देवानां मर्त्यैरुपरि वर्तनम्।।
14-20-59a
14-20-59b
परा हि सा गतिः पार्थ यत्तद्ब्रह्म सनातनम्।
यत्रामृतत्वं प्राप्नोति त्यक्त्वा दुःखं सदा सुखी।।
14-20-60a
14-20-60b
इमं धर्मं समास्थाय येऽपि स्युः पापयोनयः।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्।।
14-20-61a
14-20-61b
किं पुनर्ब्रह्मणाः पार्थ क्षत्रिया वा बहुश्रुताः।
स्वधर्मरतयो नित्यं ब्रह्मलोकपरायणः।।
14-20-62a
14-20-62b
हेतुमच्चैतदुद्दिष्टमुपायाश्चास्य साधने।
सिद्धिं फलं च मोक्षश्च दुःखस्य च विनिर्णियः।।
14-20-63a
14-20-63b
नातः परं सुखं त्वन्यत्किंचित्स्याद्भरतर्षभ।
श्रुतवाञ्श्रद्दधानश्च पराक्रान्तश्च पाण्डव।।
14-20-64a
14-20-64b
यः परित्यज्यते मर्त्यो लोकसारमसरवत्।
एतैरुपायैः स क्षिप्रं परां गतिमवाप्नुते।।
14-20-65a
14-20-65b
एतावदेव वक्तव्यं नान्तो भूयोस्ति किञ्चन।
षण्मासान्नित्ययुक्तस्य योगः पार्थ प्रवर्तते।।
14-20-66a
14-20-66b
।। इति श्रीमन्महाभारते आश्वमेधिकपर्वणि
अनुगीतापर्वणि विंशोऽध्यायः।। 20 ।।

14-20-2 सर्वमित्रोऽद्रोही। सर्वसहः क्षमी।। 14-20-6 अनमित्रः शत्रुहीनः।। 14-20-11 अमूर्तिमदहेतुकमिति झ.पाठः।।

आश्वमेधिकपर्व-019 पुटाग्रे अल्लिखितम्। आश्वमेधिकपर्व-021