महाभारतम्-14-आश्वमेधिकपर्व-051

विकिस्रोतः तः
अत्र गम्यताम् : सञ्चरणम्, अन्वेषणम्
← आश्वमेधिकपर्व-050 महाभारतम्
चतुर्दशपर्व
महाभारतम्-14-आश्वमेधिकपर्व-051
वेदव्यासः
आश्वमेधिकपर्व-052 →
  1. 001
  2. 002
  3. 003
  4. 004
  5. 005
  6. 006
  7. 007
  8. 008
  9. 009
  10. 010
  11. 011
  12. 012
  13. 013
  14. 014
  15. 015
  16. 016
  17. 017
  18. 018
  19. 019
  20. 020
  21. 021
  22. 022
  23. 023
  24. 024
  25. 025
  26. 026
  27. 027
  28. 028
  29. 029
  30. 030
  31. 031
  32. 032
  33. 033
  34. 034
  35. 035
  36. 036
  37. 037
  38. 038
  39. 039
  40. 040
  41. 041
  42. 042
  43. 043
  44. 044
  45. 045
  46. 046
  47. 047
  48. 048
  49. 049
  50. 050
  51. 051
  52. 052
  53. 053
  54. 054
  55. 055
  56. 056
  57. 057
  58. 058
  59. 059
  60. 060
  61. 061
  62. 062
  63. 063
  64. 064
  65. 065
  66. 066
  67. 067
  68. 068
  69. 069
  70. 070
  71. 071
  72. 072
  73. 073
  74. 074
  75. 075
  76. 076
  77. 077
  78. 078
  79. 079
  80. 080
  81. 081
  82. 082
  83. 083
  84. 084
  85. 085
  86. 086
  87. 087
  88. 088
  89. 089
  90. 090
  91. 091
  92. 092
  93. 093
  94. 094
  95. 095
  96. 096
  97. 097
  98. 098
  99. 099
  100. 100
  101. 101
  102. 102
  103. 103
  104. 104
  105. 105
  106. 106
  107. 107
  108. 108
  109. 109
  110. 110
  111. 111
  112. 112
  113. 113
  114. 114
  115. 115
  116. 116
  117. 117
  118. 118

कृष्णेनार्जुनंप्रति मुक्त्युपायप्रतिपादकगुरुशिष्यसंवादानुवादसमापनपूर्वकं स्वस्य निजनगरजिगमिषानिवेदनम्।। 1 ।।

ब्रह्मोवाच। 14-51-1x
भूतानामथ पञ्चानामथेषामीश्वरं मनः।
नियमे च विसर्गे च भूतानां मन एव च।।
14-51-1a
14-51-1b
अधिष्ठातृमनो नित्यं भूतानां महतां तथा।
बुद्धिरैश्वर्यमाचष्टे क्षेत्रज्ञश्च स उच्यते।।
14-51-2a
14-51-2b
इनद्रियाणि मनो युङ्क्ते सदश्वानिव सारथिः।
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः क्षेत्रज्ञे युज्यते सदा।।
14-51-3a
14-51-3b
महदश्वसमायुक्तं बुद्धिसंयमनं रथम्।
समारुह्य स भूतात्मा समन्तात्परिधावति।।
14-51-4a
14-51-4b
इन्द्रियग्रामसंयुक्तो मनःसारथिरेव च।
बुद्धिसंयमनो नित्यं महान्ब्रह्ममयो रथः।।
14-51-5a
14-51-5b
एवं यो वेत्ति विद्वान्वै सदा ब्रह्ममयं रथम्।
स धीरः सर्वलोकेषु न मोहमधिगच्छति।।
14-51-6a
14-51-6b
अव्यक्तादिविशेषान्तं सहस्थावरजङ्गमम्।।
सूर्यचन्द्रप्रभालोकं ग्रहनक्षत्रमण्डितम्।।
14-51-7a
14-51-7b
नदीपर्वतजालैश्च सर्वतः परिभूषितम्।
विविधाभिस्तथा चाद्भिः सततं समलंकृतम्।।
14-51-8a
14-51-8b
अजितं सर्वभूतानां सर्वप्राणभृतां गतिः।
एतद्ब्रह्मवनं नित्यं तस्मिंश्चरति क्षेत्रवित्।।
14-51-9a
14-51-9b
लोकेऽस्मिन्यानि सत्वानि त्रसानि स्थावराणि च।
तान्येवाग्रे प्रलीयन्ते पश्चाद्भूतकृता गुणाः।
गुणेभ्यः पञ्च भूतानि एष भूतसमुच्छ्रयः।।
14-51-10a
14-51-10b
14-51-10c
देवा मनुष्या गन्धर्वाः पिशाचासुरराक्षसाः।
सर्वे स्वभावतः सृष्टा न क्रियाभ्यो न कारणात्।।
14-51-11a
14-51-11b
एते विश्वसृजो विप्रा जायन्तीह पुनः पुनः।
तेभ्यः प्रसूतास्तेष्वेव महाभूतेषु पञ्चसु।
प्रलीयन्ते यथाकालमूर्मयः सागरे यथा।।
14-51-12a
14-51-12b
14-51-12c
विश्वसृग्भ्यस्तु भूतेभ्यो महाभूतास्तु सर्वशः।
भूतेब्यश्चापि पञ्चभ्यो भुक्तो गच्छेत्परां गतिम्।।
14-51-13a
14-51-13b
प्रजापतिरिदं सर्वं मनसैवासृजत्प्रभुः।
तथैव देवानृषयस्तपसा प्रतिपेदिरे।।
14-51-14a
14-51-14b
तपसश्चानुपूर्व्येण फलमूलाशिनस्तथा।
त्रैलोक्यं तपसा सिद्धाः पश्यन्तीह समाहिताः।।
14-51-15a
14-51-15b
औषधान्यगदादीनि नानाविद्याश्च सर्वशः।
तपसैव प्रसिद्ध्यन्ति तपोमूलं हि साधनम्।।
14-51-16a
14-51-16b
यद्दुरापं दुराम्नायं दुराधर्षं दुरन्वयम्।
तत्सर्वं तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम्।।
14-51-17a
14-51-17b
सुरापो ब्रह्महा स्तेनो भ्रूणहागुरुतल्पगः।
तपसैव सुतप्तेन मुच्यते किल्बिषात्ततः।।
14-51-18a
14-51-18b
मनुष्याः पितरो देवाः पशवो मृगपक्षिणः।
यानि चान्यानि भूतानि चराणि स्थावराणि च।।
14-51-19a
14-51-19b
तपःपरायणा नित्यं सिद्ध्यन्ते तपसा सदा।
तथैव तपसा देवा महाभागा दिवं गताः।।
14-51-20a
14-51-20b
आशीर्युक्तानि कर्माणि कुर्वते ये त्वतन्द्रिताः।
अहङ्कारसमायुक्तास्ते सकाशे प्रजापतेः।।
14-51-21a
14-51-21b
ध्यानयोगेन शुद्वेन निर्ममा निरहंकृताः।
आप्नुवन्ति महात्मानो महान्तं लोकमुत्तमम्।।
14-51-22a
14-51-22b
ध्यानयोगमुपागम्य प्रसन्नमतयः सदा।
सुखोपचयमव्यक्तं प्रविशन्त्यात्मवित्तमाः।।
14-51-23a
14-51-23b
ध्यानयोगादुपागम्य निर्ममा निरहंकृताः।
अव्यक्तं प्रविशन्तीह महतां लोकमुत्तमम्।।
14-51-24a
14-51-24b
अव्यक्तादेव सम्भूताः समयज्ञा गताः पुनः।
तमोरजोभ्यां निर्मुक्ताः सत्वमास्थाय केवलम्।।
14-51-25a
14-51-25b
निर्मुक्तः सर्वपापेभ्यः सर्वं त्यजति निष्कलः।
क्षेत्रज्ञ इति तं विद्याद्यस्तं वेद स वेदवित्।।
14-51-26a
14-51-26b
चित्तं चित्तादुपागम्य मुनिरासीत संयतः।
यच्चित्तस्तन्मना भूत्वा ग्राह्यमेतत्सनातनम्।।
14-51-27a
14-51-27b
अव्यक्तादिविशेषान्तमविद्यालक्षणं स्मृतम्।
निबोधत तथा ज्ञानं गुणैर्लक्षणमित्युत।।
14-51-28a
14-51-28b
द्व्यक्षरस्तु भवेन्मृत्युस्त्र्यक्षरं ब्रह्म शाश्वतम्।
ममेति च भवेन्मृत्युर्न ममेति च शाश्वतम्।।
14-51-29a
14-51-29b
कर्म केचित्प्रशंसन्ति मन्दबुद्धितया नराः।
ये तु वृद्धा महात्मानो न प्रशंसन्ति कर्म ते।।
14-51-30a
14-51-30b
कर्मणा जायते जन्तुर्मूर्तिमान्षोडशात्मकः।
पुरुषं ग्रसते विद्या तद्ग्राह्यममृताशिनम्।।
14-51-31a
14-51-31b
तस्मात्कर्मसु निःस्नेहा ये केचित्पारदर्शिनः।
विद्यामयोऽयं पुरुषो न तु कर्ममयः स्मृतः।।
14-51-32a
14-51-32b
य एवममृतं नित्यमग्राह्यं शश्वदक्षरम्।।
वश्यात्मानमसंश्लिष्टं यो वेद न मृतो भवेत्।।
14-51-33a
14-51-33b
अपूर्वमकृतं नित्यं य एनमविचारिणम्।
य एवं विन्देदात्मानमग्राह्यममृताशनम्।
अग्राह्यो ह्यमृतो भवति स एभिः कारणैर्ध्रुवः।।
14-51-34a
14-51-34b
14-51-34c
आयोज्य सर्वसंस्कारान्संयम्यात्मानमात्मनि।
स तद्ब्रह्म शुभं वेत्ति यस्माद्भूयो न विद्यते।।
14-51-35a
14-51-35b
प्रसादे चैव सत्वस्य प्रसादं समवाप्नुयात्।
लक्षणं हि प्रसादस्य यथा स्यात्स्वप्नदर्शनम्।।
14-51-36a
14-51-36b
गतिरेषा तु मुक्तानां ये ज्ञानपरिनिष्ठिताः।
प्रवृत्तयश्च याः सर्वाः पश्यन्ति परिणामजाः।।
14-51-37a
14-51-37b
एषा गतिर्विरक्तानामेष धर्मः सनातनः।
एषा ज्ञानवतां प्राप्तिरेतद्वृत्तमनिन्दितम्।।
14-51-38a
14-51-38b
समेन सर्वभूतेषु निस्पृहेण निराशिषा।
शक्या गतिरियं गन्तुं सर्वत्र समदर्शिना।।
14-51-39a
14-51-39b
एतद्वः सर्वमाख्यातं मया विप्रर्षिसत्तमाः।
एवमाचरत क्षिप्रं ततः सिद्धिमवाप्स्यथ।।
14-51-40a
14-51-40b
गुरुरुवाच। 14-51-41x
इत्युक्तास्ते तु मुनयो गुरुणा ब्रह्मणा तथा।
कृतवन्तो महात्मानस्ततो लोकमवाप्नुवन्।।
14-51-41a
14-51-41b
त्वमप्येतन्महाभाग मयोक्तं ब्रह्मणो वचः।
सम्यगाचर शुद्धात्भंस्ततः सिद्धिमवाप्स्यसि।।
14-51-42a
14-51-42b
वासुदेव उवाच। 14-51-43x
इत्युक्तः स तदा शिष्यो गुरुणा धर्ममुत्तमम्।
चकार सर्वं कौन्तेय ततो मोक्षमवाप्तवान्।।
14-51-43a
14-51-43b
कृतकृत्यश्च स तदा शिष्यः कुरुकुलोद्वह।
तत्पदं समनुप्राप्तो यत्र गत्वा न शोचति।।
14-51-44a
14-51-44b
अर्जुन उवाच। 14-51-45x
को न्वसौ ब्राह्मणः कृष्ण कश्च शिष्यो जनार्दन।
श्रोतव्यं चेन्मयैतद्वै तत्त्वमाचक्ष्व मे विभो।।
14-51-45a
14-51-45b
0
वासुदेव उवाच। 14-51-46x
अहं गुरुर्महाबाहो मनः शिष्य च विद्धि मे।
त्वत्प्रीत्या गुह्यमेतच्च कथितं ते धनंजय।।
14-51-46a
14-51-46b
मयि चेदस्ति ते प्रीतिर्नित्यं कुरुकुलोद्वह।
अध्यात्ममेतच्छ्रुत्वा त्वं सम्यगाचर सुव्रत।।
14-51-47a
14-51-47b
ततस्त्वं सम्यगाचीर्णो धर्मेऽस्मिन्नरिकर्शन।
सर्वपापविनिर्मुक्तो मोक्षं प्राप्स्यसि केवलम्।।
14-51-48a
14-51-48b
पूर्वमप्येतदेवोक्तं युद्धकाल उपस्थिते।
मया तव महाबाहो तस्मादत्र मनः कुरु।।
14-51-49a
14-51-49b
मया तु भरतश्रेष्ठ चिरदृष्टः पिता प्रभुः।
तमहं द्रष्टमिच्छामि सम्मते तव फल्गुन।।
14-51-50a
14-51-50b
वैशम्पायन उवाच। 14-51-51x
इत्युक्तवचनं कृष्णं प्रत्युवाच धनंजयः।
`यदिष्टं कुरु सर्वेषामीश्वरोऽस्मान्प्रपालय।।
14-51-51a
14-51-51b
नमस्ते सर्वलोकात्मन्नारायण परात्पर।
मनोमलात्तपोशक्यं कर्म चाविद्यया हतम्।
दानमप्यर्थदोषेणि नाम तस्मात्कलौ स्मरेत्।।
14-51-52a
14-51-52b
14-51-53c
यदि गन्तुं कृता बुद्धिर्वासुदेव नमोस्तु ते।'
गच्छावो नगरं कृष्ण गजसाह्वयमद्य वै।।
14-51-53a
14-51-53b
समेत्य तत्रि राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम्।
समनुज्ञाप्य राजानं स्वां पुरीं यातुमर्हसि।।
14-51-54a
14-51-54b
।। इति श्रीमन्महाभारते आश्वमेधिकपर्वणि
अनुगीतापर्वणि एकपञ्चाशोऽध्यायः।। 51 ।।

[सम्पाद्यताम्]

14-51-13 महाभूतानि गच्छतीति क.ट.थ.पाठः।। 14-51-31 विममो यः स पुरुष इति क.पाठः।। 14-51-35 अपोह्य सर्वान्संकल्पान्संयतात्मानमात्मनीति थ.पाठः।।

आश्वमेधिकपर्व-050 पुटाग्रे अल्लिखितम्। आश्वमेधिकपर्व-052