महाभारतम्-14-आश्वमेधिकपर्व-042

विकिस्रोतः तः
Jump to navigation Jump to search
← आश्वमेधिकपर्व-041 महाभारतम्
चतुर्दशपर्व
महाभारतम्-14-आश्वमेधिकपर्व-042
वेदव्यासः
आश्वमेधिकपर्व-043 →
  1. 001
  2. 002
  3. 003
  4. 004
  5. 005
  6. 006
  7. 007
  8. 008
  9. 009
  10. 010
  11. 011
  12. 012
  13. 013
  14. 014
  15. 015
  16. 016
  17. 017
  18. 018
  19. 019
  20. 020
  21. 021
  22. 022
  23. 023
  24. 024
  25. 025
  26. 026
  27. 027
  28. 028
  29. 029
  30. 030
  31. 031
  32. 032
  33. 033
  34. 034
  35. 035
  36. 036
  37. 037
  38. 038
  39. 039
  40. 040
  41. 041
  42. 042
  43. 043
  44. 044
  45. 045
  46. 046
  47. 047
  48. 048
  49. 049
  50. 050
  51. 051
  52. 052
  53. 053
  54. 054
  55. 055
  56. 056
  57. 057
  58. 058
  59. 059
  60. 060
  61. 061
  62. 062
  63. 063
  64. 064
  65. 065
  66. 066
  67. 067
  68. 068
  69. 069
  70. 070
  71. 071
  72. 072
  73. 073
  74. 074
  75. 075
  76. 076
  77. 077
  78. 078
  79. 079
  80. 080
  81. 081
  82. 082
  83. 083
  84. 084
  85. 085
  86. 086
  87. 087
  88. 088
  89. 089
  90. 090
  91. 091
  92. 092
  93. 093
  94. 094
  95. 095
  96. 096
  97. 097
  98. 098
  99. 099
  100. 100
  101. 101
  102. 102
  103. 103
  104. 104
  105. 105
  106. 106
  107. 107
  108. 108
  109. 109
  110. 110
  111. 111
  112. 112
  113. 113
  114. 114
  115. 115
  116. 116
  117. 117
  118. 118

ब्रह्मणा महर्षीन्प्रत्यहङ्कारतत्वाद्भूतादिसृष्टिप्रकारकथनम्।। 1 ।।

ब्रह्मोवाच। 14-42-1x
अहङ्कारात्प्रसूतानि महाभूतानि पञ्च वै।
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम्।।
14-42-1a
14-42-1b
तेषु भूतानि मुह्यन्ति महाभूतेषु पञ्चसु।
शब्दस्पर्शनरूपेषु रसगन्धक्रियासु च।।
14-42-2a
14-42-2b
महाभूतविकारान्ते प्रलये प्रत्युपस्थिते।
सर्वप्राणभूतां धीरा महदुत्पद्यते भयम्।।
14-42-3a
14-42-3b
यद्यस्माज्जायते भूतं तत्र तत्प्रविलीयते।
लीयन्ते प्रतिलोमानि जायन्ते चोत्तरोत्तरम्।।
14-42-4a
14-42-4b
ततः प्रलीने सर्वस्मिन्भूते स्थावरजङ्गमे।
स्मृतिमन्तस्तदा धीरा न लीयन्ते कदाचन।।
14-42-5a
14-42-5b
शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च पञ्चमः।
क्रियाः करणयुक्ताः स्युरनित्या मोहसंज्ञिताः।।
14-42-6a
14-42-6b
लोभप्रजनसम्भूता निर्विशेषा ह्यकिञ्चनाः।
मांसशोणितसङ्घाता अन्योन्यस्योपजीविनः।।
14-42-7a
14-42-7b
बहिरात्मान इत्येते दीनाः कृपणजीविनः।
प्राणापानावुदानश्च समानो व्यान एव च।।
14-42-8a
14-42-8b
अन्तरात्मनि चाप्येते नियताः पञ्च वायवः।
वाङ्मनोबुद्धिरित्येभिः सार्धमष्टात्मकं जगत्।।
14-42-9a
14-42-9b
त्वग्घ्राणश्रोत्रचक्षूंषि रसना वाक्च संयताः।
विशुद्धं च मनो यस्य बुद्धिश्चाव्यभिचारिणी।।
14-42-10a
14-42-10b
अष्टौ यस्याग्नयो ह्येते दहन्तेऽहङ्क्रियाः सदा।
स तद्ब्रह्म शुभं याति तस्माद्भूयो न विद्यते।।
14-42-11a
14-42-11b
एकादश च यान्याहुरिन्द्रियाणि विशेषतः।
अहङ्कारात्प्रसूतानि तानि वक्ष्यामि नामतः।।
14-42-12a
14-42-12b
श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका चैव पञ्चमी।
पादौ पायुरुपस्थश्च हस्तौ वाग्दशमी भवेत्।।
14-42-13a
14-42-13b
इन्द्रियग्राम इत्येष मन एकादशं भवेत्।
एतं ग्रामं जयेत्पूर्वं ततो ब्रह्म प्रकाशते।।
14-42-14a
14-42-14b
बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चाहुः पञ्च कर्मेन्द्रियाणि च।
श्रोत्रादीन्यपि पञ्चाहुर्बुद्धियुक्तानि तत्त्वतः।।
14-42-15a
14-42-15b
अविशेषाणि चान्यानि कर्मयुक्तानि यानि तु।
उभयत्र मनो ज्ञेयं बुद्धिस्तु द्वादशी भवेत्।।
14-42-16a
14-42-16b
इत्युक्तानीन्द्रियाण्येतान्येकादश यथाक्रमम्।
मन्यन्ते कृतमित्येवं विदित्वा तानि पण्डिताः।।
14-42-17a
14-42-17b
`त्रीणि स्थानानि भूतानां चतुर्थं नोपपद्यते।'
स्थलमापस्तथाऽ।?काशं जन्म चापि चतुर्विधम्।।
14-42-18a
14-42-18b
अण्डजोद्भिज्जसंस्वेदजरायुजमथापि च।
चतुर्धा जन्म इत्येतद्भूतग्रामस्य लक्ष्यते।।
14-42-19a
14-42-19b
अपराण्यथ भूतानि खेचराणि तथैव च।
अण्डजानि विजानीयात्सर्वांश्चैव सरीसृपान्।।
14-42-20a
14-42-20b
स्वेदजाः कृमयः प्रोक्ता जन्तवश्च यथाक्रमम्।
जन्मद्वितीयमित्येतज्जघन्यतरमुच्यते।।
14-42-21a
14-42-21b
भित्त्वा तु पृथिवीं यानि जायन्ते कालपर्ययात्।
उद्भिज्जानि च तान्याहुर्भूतानि द्विजसत्तमाः।।
14-42-22a
14-42-22b
द्विपादबहुपादानि तिर्यग्गतिमतीनि च।
जरायुजानि भूतानि विकृतान्यपि सत्तमाः।।
14-42-23a
14-42-23b
द्विविधा खलु विज्ञेया ब्रह्मयोनिः सनातना।
तपः कर्म च यत्पुण्यमित्येष विदुषां नयः।।
14-42-24a
14-42-24b
विविधं कर्म विज्ञेयमिज्या दानं च तन्मखे।
वेदस्याध्ययनं पुण्यमिति वृद्धानुशासनम्।।
14-42-25a
14-42-25b
एतद्यो वेत्ति विधिवत्स मुक्तः स्याद्द्विजर्षभाः।
विमुक्तः सर्वपापेभ्य इति चैव निबोधत।।
14-42-26a
14-42-26b
`अतः परं प्रवक्ष्यामि सर्वं विविधमिन्द्रियम्।।' 14-42-27a
आकाशं प्रथमं भूतं श्रोत्रमध्यात्ममुच्यते।
अधिभूतं तथा शब्दो दिशश्चात्राधिदैवतम्।।
14-42-28a
14-42-28b
द्वितीयं मारुतं भूतं त्वगध्यात्मं च विश्रुतम्।
स्प्रष्टव्यमधिभूतं तु विद्युत्तत्राधिदैवतम्।।
14-42-29a
14-42-29b
तृतीयं ज्योतिरित्याहुश्चक्षुरध्यात्ममिष्यते।
अधिभूतं ततो रूपं सूर्यस्तत्राधिदैवतम्।।
14-42-30a
14-42-30b
चतुर्थमापो विज्ञेयं जिह्वा चाध्यात्ममिष्यते।
अधिभूतं रसश्चात्र सोमस्तत्राधिदैवतम्।।
14-42-31a
14-42-31b
पृथिवी पञ्चमं भूतं घ्राणश्चाध्यात्ममुच्यते।
अधिभूतं तथा गन्धो वायुस्तत्रादिदैवतम्।।
14-42-32a
14-42-32b
एषु पञ्चसु भूतेषु चतुष्टयविधिः स्मृतः।
अतः परं प्रवक्ष्यामि सर्वं त्रिविधमिन्द्रियम्।।
14-42-33a
14-42-33b
पादावध्यात्ममित्याहुर्ब्राह्मणास्तत्वदर्शिनः।
अधिभूतं तु गन्तव्यं विष्णुस्तत्राधिदैवतम्।।
14-42-34a
14-42-34b
अवाग्गतिरपानश्च पायुरध्यात्ममिष्यते।
अधिभूतं विसर्गश्च मित्रस्तत्राधिदैवतम्।।
14-42-35a
14-42-35b
प्रजनः सर्वभूतानामुपस्थोऽध्यात्ममुच्यते।
अधिभूतं तथा शुक्रं दैवतं च प्रजापतिः।।
14-42-36a
14-42-36b
हस्तावध्यात्ममित्याहुरद्यात्मविदुषो जनाः।
अधिभूतं च कर्माणि शक्रस्तत्राधिदैवतम्।।
14-42-37a
14-42-37b
वैश्वदेवी मनःपूर्वा वागध्यात्ममिहोच्यते।
वक्तव्यमधिभूतं च वह्निस्तत्राधिदैवतम्।।
14-42-38a
14-42-38b
अध्यात्मं मन इत्याहुः पञ्चभूतात्मचारकम्।
अधिभूतं च सङ्कल्पश्चन्द्रमाश्चाधिदैवतम्।।
14-42-39a
14-42-39b
अहङ्कारस्तथाऽध्यात्मं सर्वसंसारकारणम्।
अभिमानोऽधिभूतं च रुद्रस्तत्राधिदैवतम्।।
14-42-40a
14-42-40b
अध्यात्मं बुद्धिरित्याहुः षडिन्द्रियविचारिणी।
अधिभूतं तु विज्ञेयमहस्तत्राधिदैवतम्।।
14-42-41a
14-42-41b
यथावदध्यात्मविधिरेष वः कीर्तितो मया।
ज्ञानमस्य हि धर्मज्ञाः प्राप्तं ज्ञानवतामिह।।
14-42-42a
14-42-42b
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्च महाभूतानि पञ्च च।
सर्वाण्येतानि संधाय मनसा सम्प्रधारयेत्।।
14-42-43a
14-42-43b
क्षीणे मनसि सर्वस्मिन्न जन्मसुखमिष्यते।
ज्ञानसम्पन्नसत्त्वानां तत्सुखं विदुषां मतम्।।
14-42-44a
14-42-44b
अतः परं प्रवक्ष्यामि सूक्ष्मभावकरीं शिवाम्।
निवृत्तिं सर्वभूतेषु मृदुना दारुणेन वा।।
14-42-45a
14-42-45b
गुणागुणमनासङ्गमेकचर्यमनन्तरम्।
एतद्ब्राह्मणजं वृत्तमाहुरेकपदं सुखम्।।
14-42-46a
14-42-46b
विद्वान्कूर्म इवाङ्गानि कामान्संहृत्य सर्वशः।
विरजाः सर्वतो मुक्तो यो नरः स सुखी सदा।।
14-42-47a
14-42-47b
कामानात्मनि संयम्य क्षीणतृष्णः समाहितः।
सर्वभूतसुहृन्मैत्रो ब्रह्मभूयाय कल्पते।।
14-42-48a
14-42-48b
इन्द्रियाणां निरोधेन सर्वेषां विषयैषिणाम्।
मुनेर्जनपदत्यागादध्यात्माग्निः समिध्यते।।
14-42-49a
14-42-49b
यथाऽग्निरिन्धनैरिद्धो महाज्योतिः प्रकाशते।
तथेन्द्रियनिरोधेन महानात्मा प्रकाशतदे।।
14-42-50a
14-42-50b
यदा पश्यति भूतानि प्रसन्नात्माऽत्मनो हृदि।
स्वयंज्योतिस्तदासूक्ष्मात्सूक्ष्मं प्राप्नोत्यनुत्तमम्।।
14-42-51a
14-42-51b
अग्नी रूपं रसं स्रोतो वायुः स्पर्शनमेव च।
मही गन्धधरा घ्राणमाकाशः श्रवणं तथा।
`दृश्यमादित्यमेवाहुरध्यात्मविदुषो जनाः।।'
14-42-52a
14-42-52b
14-42-53c
रोगशोकसमाविष्टं पञ्चस्रोतःसमावृतम्।
पञ्चभूतसमायुक्तं नवद्वारं द्विदैवतम्।।
14-42-53a
14-42-53b
रजस्वलमथादृश्यं त्रिगुणं सप्तधातुकम्।
संसर्गाभिरतं मूढं शरीरमिति धारणा।।
14-42-54a
14-42-54b
दुश्चरं जीवलोकेऽस्मिन्सत्वं प्रति समाश्रितम्।
एतदेव हि लोकेऽस्मिन्कालचक्रं प्रवर्तते।।
14-42-55a
14-42-55b
एतन्महार्णवं घोरमगाधं मोहसंझितम्।
विसृजन्संक्षिपेच्चैव मोहयन्स्वापयञ्जगत्।।
14-42-56a
14-42-56b
कामं क्रोधं भयं लोभमभिद्रोहमथानृतम्।
इन्द्रियाणां निरोधेन सतस्त्यजति दुस्त्यजान्।।
14-42-57a
14-42-57b
यस्यैते निर्जिता लोके त्रिगुणाः पञ्चधातवः।
व्योम्नि तस्य परं स्थानमानन्तमथ लक्ष्यते।।
14-42-58a
14-42-58b
पञ्चेन्द्रियमहाकूलां मनःस्रोतोभयावहाम्।
नदीं मोहह्रदां तीर्त्वा कामक्रोधावुभौ जयेत्।।
14-42-59a
14-42-59b
स सर्वदोषनिर्मुक्तस्ततः पश्यति तत्परम्।
मनो मनसि सन्धाय पश्यन्नात्मानमात्मनि।।
14-42-60a
14-42-60b
सर्ववित्सर्वभूतेषु द्रक्ष्यत्यात्मानमात्मनि।
एकधा बहुधा चैव विकुर्वाणस्ततस्ततः।।
14-42-61a
14-42-61b
ध्रुवं पश्यति रूपाणि दीपाद्दीपशतं यथा।
स वै विष्णुश्च मित्रश्च वरुणोऽग्निः प्रजापतिः।।
14-42-62a
14-42-62b
स हि धाता विधाता च स प्रभुः सर्वतोमुखः।
हृदयं सर्वभूतानां महानात्मा प्रकाशते।।
14-42-63a
14-42-63b
तं विप्रसङ्घाश्च सुरासुराश्च
यक्षाः पिशाचाः पितरो वयांसि।
रक्षोगणा भूतगणाश्च सर्वे
महर्षयश्चैव सदा स्तुवन्ति।।
14-42-64a
14-42-64b
14-42-64c
14-42-64d
।। इति श्रीमन्महाभारते आश्वमेधिकपर्वणि
अनुगीतापर्वणि द्विचत्वारिंशोऽध्यायः।। 42 ।।

[सम्पाद्यताम्]

14-42-7 लोकप्रजनसंयुक्ता इति क.ट.पाठः।। 14-42-9 इत्युक्ता इति क.पाठः।। 14-42-25 जातस्याध्ययनं पुण्यमिति झ.पाठः।। 14-42-64 पितरश्च सिद्धा इति क.पाठः।।

आश्वमेधिकपर्व-041 पुटाग्रे अल्लिखितम्। आश्वमेधिकपर्व-043