ब्रह्मपुराणम्/अध्यायः १३३

विकिस्रोतः तः
अत्र गम्यताम् : सञ्चरणम्, अन्वेषणम्
← अध्यायः १३२ ब्रह्मपुराणम्
अध्यायः १३३
वेदव्यासः
अध्यायः १३४ →
  1. अध्यायः १
  2. अध्यायः २
  3. अध्यायः ३
  4. अध्यायः ४
  5. अध्यायः ५
  6. अध्यायः ६
  7. अध्यायः ७
  8. अध्यायः ८
  9. अध्यायः ९
  10. अध्यायः १०
  11. अध्यायः ११
  12. अध्यायः १२
  13. अध्यायः १३
  14. अध्यायः १४
  15. अध्यायः १५
  16. अध्यायः १६
  17. अध्यायः १७
  18. अध्यायः १८
  19. अध्यायः १९
  20. अध्यायः २०
  21. अध्यायः २१
  22. अध्यायः २२
  23. अध्यायः २३
  24. अध्यायः २४
  25. अध्यायः २५
  26. अध्यायः २६
  27. अध्यायः २७
  28. अध्यायः २८
  29. अध्यायः २९
  30. अध्यायः ३०
  31. अध्यायः ३१
  32. अध्यायः ३२
  33. अध्यायः ३३
  34. अध्यायः ३४
  35. अध्यायः ३५
  36. अध्यायः ३६
  37. अध्यायः ३७
  38. अध्यायः ३८
  39. अध्यायः ३९
  40. अध्यायः ४०
  41. अध्यायः ४१
  42. अध्यायः ४२
  43. अध्यायः ४३
  44. अध्यायः ४४
  45. अध्यायः ४५
  46. अध्यायः ४६
  47. अध्यायः ४७
  48. अध्यायः ४८
  49. अध्यायः ४९
  50. अध्यायः ५०
  51. अध्यायः ५१
  52. अध्यायः ५२
  53. अध्यायः ५३
  54. अध्यायः ५४
  55. अध्यायः ५५
  56. अध्यायः ५६
  57. अध्यायः ५७
  58. अध्यायः ५८
  59. अध्यायः ५९
  60. अध्यायः ६०
  61. अध्यायः ६१
  62. अध्यायः ६२
  63. अध्यायः ६३
  64. अध्यायः ६४
  65. अध्यायः ६५
  66. अध्यायः ६६
  67. अध्यायः ६७
  68. अध्यायः ६८
  69. अध्यायः ६९
  70. अध्यायः ७०
  71. अध्यायः ७१
  72. अध्यायः ७२
  73. अध्यायः ७३
  74. अध्यायः ७४
  75. अध्यायः ७५
  76. अध्यायः ७६
  77. अध्यायः ७७
  78. अध्यायः ७८
  79. अध्यायः ७९
  80. अध्यायः ८०
  81. अध्यायः ८१
  82. अध्यायः ८२
  83. अध्यायः ८३
  84. अध्यायः ८४
  85. अध्यायः ८५
  86. अध्यायः ८६
  87. अध्यायः ८७
  88. अध्यायः ८८
  89. अध्यायः ८९
  90. अध्यायः ९०
  91. अध्यायः ९१
  92. अध्यायः ९२
  93. अध्यायः ९३
  94. अध्यायः ९४
  95. अध्यायः ९५
  96. अध्यायः ९६
  97. अध्यायः ९७
  98. अध्यायः ९८
  99. अध्यायः ९९
  100. अध्यायः १००
  101. अध्यायः १०१
  102. अध्यायः १०२
  103. अध्यायः १०३
  104. अध्यायः १०४
  105. अध्यायः १०५
  106. अध्यायः १०६
  107. अध्यायः १०७
  108. अध्यायः १०८
  109. अध्यायः १०९
  110. अध्यायः ११०
  111. अध्यायः १११
  112. अध्यायः ११२
  113. अध्यायः ११३
  114. अध्यायः ११४
  115. अध्यायः ११५
  116. अध्यायः ११६
  117. अध्यायः ११७
  118. अध्यायः ११८
  119. अध्यायः ११९
  120. अध्यायः १२०
  121. अध्यायः १२१
  122. अध्यायः १२२
  123. अध्यायः १२३
  124. अध्यायः १२४
  125. अध्यायः १२५
  126. अध्यायः १२६
  127. अध्यायः १२७
  128. अध्यायः १२८
  129. अध्यायः १२९
  130. अध्यायः १३०
  131. अध्यायः १३१
  132. अध्यायः १३२
  133. अध्यायः १३३
  134. अध्यायः १३४
  135. अध्यायः १३५
  136. अध्यायः १३६
  137. अध्यायः १३७
  138. अध्यायः १३८
  139. अध्यायः १३९
  140. अध्यायः १४०
  141. अध्यायः १४१
  142. अध्यायः १४२
  143. अध्यायः १४३
  144. अध्यायः १४४
  145. अध्यायः १४५
  146. अध्यायः १४६
  147. अध्यायः १४७
  148. अध्यायः १४८
  149. अध्यायः १४९
  150. अध्यायः १५०
  151. अध्यायः १५१
  152. अध्यायः १५२
  153. अध्यायः १५३
  154. अध्यायः १५४
  155. अध्यायः १५५
  156. अध्यायः १५६
  157. अध्यायः १५७
  158. अध्यायः १५८
  159. अध्यायः १५९
  160. अध्यायः १६०
  161. अध्यायः १६१
  162. अध्यायः १६२
  163. अध्यायः १६३
  164. अध्यायः १६४
  165. अध्यायः १६५
  166. अध्यायः १६६
  167. अध्यायः १६७
  168. अध्यायः १६८
  169. अध्यायः १६९
  170. अध्यायः १७०
  171. अध्यायः १७१
  172. अध्यायः १७२
  173. अध्यायः १७३
  174. अध्यायः १७४
  175. अध्यायः १७५
  176. अध्यायः १७६
  177. अध्यायः १७७
  178. अध्यायः १७८
  179. अध्यायः १७९
  180. अध्यायः १८०
  181. अध्यायः १८१
  182. अध्यायः १८२
  183. अध्यायः १८३
  184. अध्यायः १८४
  185. अध्यायः १८५
  186. अध्यायः १८६
  187. अध्यायः १८७
  188. अध्यायः १८८
  189. अध्यायः १८९
  190. अध्यायः १९०
  191. अध्यायः १९१
  192. अध्यायः १९२
  193. अध्यायः १९३
  194. अध्यायः १९४
  195. अध्यायः १९५
  196. अध्यायः १९६
  197. अध्यायः १९७
  198. अध्यायः १९८
  199. अध्यायः १९९
  200. अध्यायः २००
  201. अध्यायः २०१
  202. अध्यायः २०२
  203. अध्यायः २०३
  204. अध्यायः २०४
  205. अध्यायः २०५
  206. अध्यायः २०६
  207. अध्यायः २०७
  208. अध्यायः २०८
  209. अध्यायः २०९
  210. अध्यायः २१०
  211. अध्यायः २११
  212. अध्यायः २१२
  213. अध्यायः २१३
  214. अध्यायः २१४
  215. अध्यायः २१५
  216. अध्यायः २१६
  217. अध्यायः २१७
  218. अध्यायः २१८
  219. अध्यायः २१९
  220. अध्यायः २२०
  221. अध्यायः २२१
  222. अध्यायः २२२
  223. अध्यायः २२३
  224. अध्यायः २२४
  225. अध्यायः २२५
  226. अध्यायः २२६
  227. अध्यायः २२७
  228. अध्यायः २२८
  229. अध्यायः २२९
  230. अध्यायः २३०
  231. अध्यायः २३१
  232. अध्यायः २३२
  233. अध्यायः २३३
  234. अध्यायः २३४
  235. अध्यायः २३५
  236. अध्यायः २३६
  237. अध्यायः २३७
  238. अध्यायः २३८
  239. अध्यायः २३९
  240. अध्यायः २४०
  241. अध्यायः २४१
  242. अध्यायः २४२
  243. अध्यायः २४३
  244. अध्यायः २४४
  245. अध्यायः २४५
  246. अध्यायः २४६

शुक्लतीर्थवर्णनम्
ब्रह्मोवाच
शुक्लतीर्थमिति ख्यातं सर्वसिद्धिकरं नृणाम्।
यस्य स्मरणमात्रेण सर्वकामानवाप्नुयात्।। १३३.१ ।।

भरद्वाज इति ख्यातो मुनिः परमधार्मिकः।
तस्य पैठीनसी नाम भार्या सुकुलभूषणा।। १३३.२ ।।

गौतमीतीरमध्यास्ते पतिव्रतपरायणा।
अग्नीषोमीयमैन्द्राग्नं पुरोडाशमकल्पयत्।। १३३.३ ।।

पुरोडाशे श्रप्यमाणे धूमात्कश्चिदजायत।
पुरोडाशं भक्षयित्वा लोकत्रितयभीषणः।। १३३.४ ।।

यज्ञं मे ह्यत्र को हंसि कोपात्त्वमिति तं मुनिः।
प्रोवाच सत्वरं क्रुद्धो भरद्वाजो द्विजोत्तमः।
तदृषेर्वचनं श्रुत्वा राक्षसः प्रत्युवाच तम्।। १३३.५ ।।

राक्षस उवाच
हव्याध्न इति विख्यातं भरद्वाज निबोध माम्।
संध्यासुतोऽहं ज्येष्ठश्च पुनः प्राचीनबर्हिषः।। १३३.६ ।।

ब्रह्मणा मे वरे दत्तो यज्ञान्खाद यथासुखम्।
ममानुजः कलिश्चापि बलवानतिभीषणः।। १३३.७ ।।

अहं कृष्णः पिता कृष्णो माता कृष्णा तथाऽनुजः।
अहं मखं हनिष्यामि यूपं छेद्मि कृतान्तकः।। १३३.८ ।।

भरद्वाज उवाच
रक्ष्यतां मे त्वया यज्ञः प्रियो धर्मः सनातनः।
जाने त्वां यज्ञहन्तारं सद्‌द्विजं रक्ष मे क्रतुम्।। १३३.९ ।।

यज्ञघ्न उवाच
भरद्वाजं निबोधेदं वाक्यं मम् समासतः।
ब्रह्मणाऽहं पुरा शप्तो देवदानवसंनिधौ।। १३३.१० ।।

ततः प्रसादितो देवो मया लोकपितामहः।
अमृतैः प्रोक्षयिष्यन्ति यदा त्वां मुनिसत्तमाः।। १३३.११ ।।

तदा विशापो भविता हव्यघ्न त्वं न चान्यथा।
एवं करिष्यसि यदा ततः सर्वं भविष्यति।।
यद्यदाकाङ्‌क्षितं ब्रह्मन्नैतन्मिथ्या कदाचन।। १३३.१२ ।।

ब्रह्मोवाच
भरद्वाजः पुनः प्राह सखा मेऽसि महामते।
मखसंरक्षणं येन स्यान्मे वद करोमि तत्।। १३३.१३ ।।

संभूय देवा दैतेया ममन्युः क्षीरसागरम्।
अलभन्तामृतं कष्टात्तदस्मत्सुलभं कथम्।। १३३.१४ ।।

प्रीत्य यदि प्रसन्नोऽसि सुलभं यद्वदस्व तत्।
तदृषेर्वचनं श्रुत्वा रक्षः प्राह तदा मुदा।। १३३.१५ ।।

अमृतं गौतमीवारि अमृतं स्वर्णमुच्यते।
अमृतं गोभवं चाऽऽज्यममृतं सोम एव च।। १३३.१६ ।।

एतैर्मामभिषिञ्चस्व अथ वैतैस्तथा त्रिभिः।
गङ्गाया वारिणाऽऽज्येन हिरण्येन तथैव च।।
सर्वेभ्योऽप्यधिकं दिव्यममृतं गौतमीजलम्।। १३३.१७ ।।

ब्रह्मोवाच
एतदाकर्ण्य स ऋषिः परं संतोषमागतः।
पाणावादाय गङ्गायाः सलिलामृतमादरात्।। १३३.१८ ।।

तेनाकरोदृषी रक्षो ह्यभिषिक्तं तदा मखे।
पुनश्च यूपे च पशावृत्विक्षु मखमण्डले।। १३३.१९ ।।

सर्वमेवाभवच्छुक्लमभिषेकान्महात्मनः।
तद्रक्षोऽपि तदा शुक्लो भूत्वोत्पन्नो महाबलः।। १३३.२० ।।

यः पुरा कृष्णरूपोऽभूत्स तु शुक्लोऽभवत्क्षणात्।
यज्ञं सर्वं समाप्याथ भरद्वाजः प्रतापवान्।। १३३.२१ ।।

ऋत्पिजोऽपि विसृज्याथ यूपं गङ्गोदकेऽक्षिपत्।
गङ्गामध्ये तद्धि यूपमद्याप्यास्ते महामते।। १३३.२२ ।।

अभिषिक्तं चामृतेन अभिज्ञानं तु तन्महत्।
तत्र तीर्थे पुना रक्षो भरद्वाजमुवाच ह।। १३३.२३ ।।

रक्ष उवाच
अहं यामि भरद्वाज कृतः शुक्लस्त्वया पुनः।
तस्मात्तवात्र तीर्थे ये स्नानदानादिपूजनम्।। १३३.२४ ।।

कुर्युस्तेषामभीष्टानि भवेयुर्यत्फलं मखे।
स्मरणादपि पापानि नाशं यान्तु सदा मुने।। १३३.२५ ।।

ततः प्रभृति त्ततीर्थं शुक्लतीर्थमिति स्मृतम्।।
तीर्थानां मुनिशार्दूल सर्वसिद्धिप्रदायिनाम्।। १३३.२६ ।।

उभयोस्तीरयोः सप्त सहस्राण्यपराणि च।
तीर्थमाहात्म्ये शुक्लतीर्थाद्युभयतीरस्थसप्तसहस्रतीर्थवर्णनं नाम त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः।। १३३ ।।

गौतमीमाहात्म्ये चतुःषष्टितमोऽध्यायः।। ६४ ।।