ब्रह्मपुराणम्/अध्यायः १०१

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अथैकाधिकशततमोऽध्यायः
सरस्वतीसंगमपुरूरवसब्रह्मतीर्थसिद्धेश्वरवर्णनम्
ब्रह्मोवाच
पुरूरवसमाख्यातं तीर्थं वेदविदो विदुः।
स्मरणादेव पापानां नाशनं किंतु दर्शनात्।। १०१.१ ।।

पुरूरवा ब्रह्मसदः प्राप्य तत्र सरस्वतीम्।
यदृच्छया देवनदीं हसन्तीं ब्रह्मणोऽन्तिके।।
तां दृष्ट्वा रूपसंपन्नामुर्वशीं प्राह भूपतिः।। १०१.२ ।।

राजोवाच
केयं रूपवती साध्वी स्थितेयं ब्रह्मणोऽन्तिके।
सर्वासामुत्तमा योषिद्दीपयन्ती सभामिमाम्।। १०१.३ ।।

ब्रह्मोवाच
उर्वशी प्राह राजानमियं देवनदी शुभा।
सरस्वती ब्रह्मसुता नित्यमेति च याति च।।
तच्छ्रुत्वा विस्मितो राजा आनयेमां ममान्तिकम्।। १०१.४ ।।

ब्रह्मोवाच
उर्वशी पुनरप्याह राजानं भूरिदक्षिणम्।। १०१.५ ।।

उर्वस्युवाच
आनीयते महाराज तस्याः सर्वं निवेद्य च।। १०१.६ ।।

ब्रह्मोवाच
ततस्तां प्राहिणोत्तत्र राजा प्रीत्या तदोर्वशीम्।
सा गत्वा राजवचनं न्यवेदयदथोर्वशी।। १०१.७ ।।

सरस्वत्यपि तन्मेने उर्वश्या यन्निवेदितम्।
सा तथेति प्रतिज्ञाय प्रायाद्यत्र पुरूरवाः।। १०१.८ ।।

सरस्वत्यास्ततस्तीरे स रेमे बहुलाः समाः।
सरस्वानभवत्पुत्रो यस्य पुत्रो बृहद्रथः।। १०१.९ ।।

तां गच्छन्तीं नृपगृहं नित्यमेव सरस्वतीम्।
सरस्वन्तं ततो लक्ष्म ज्ञात्वाऽन्येषु तथा कृतम्।। १०१.१० ।।

तस्यै ददावहं शापं भूया इति महानदी।
मच्छापभीता वागीशा प्रागाद्देवीं च गौतमीम्।। १०१.११ ।।

कमण्डलुभवां पूतां मातरं लोकपावनीम्।
तापत्रयोपशमनीमैहिकामुष्मिकप्रदाम्।। १०१.१२ ।।

सा गत्वा गौतमीं देवीं प्राह मच्छापमादितः।
गङ्गाऽपि मामुवाचेदं विशापां कर्तुमर्हसि।। १०१.१३ ।।

न युक्तं यत्सरस्वत्याः शापं त्वं दत्तवानसि।
स्त्रीणामेष स्वभावो वै पुंस्कामा योषितो यतः।। १०१.१४ ।।

स्वभावाचपला ब्रह्मन्योषितः सकला अपि।
त्वं कथं तु न जानीषे जगत्स्रष्टाऽम्बुजासन।। १०१.१५ ।।

विडम्बयति कं वा न कामो वाऽपि स्वभावतः।
ततो विशापमवदं द़ृश्याऽपि स्यात्सरस्वती।। १०१.१६ ।।

तस्माच्छापान्नदी मर्त्ये दृश्याऽदृश्या सरस्वती।
यत्रैषा संगता देवी गङ्गायां शापविह्वला।। १०१.१७ ।।

तत्र प्रायान्नृपवरो धार्मिकः स पुरूरवाः।
तपस्तप्त्वा समाराध्य देवं सिद्धेश्वरं हरम्।। १०१.१८ ।।

सर्वान्कामानथावाप गङ्गायाश्च प्रसादतः।
तत प्रभृति तत्तीर्थं पुरूरवसमुच्यते।। १०१.१९ ।।

सरस्वतीसंगमं च ब्रह्मतीर्थं तदुच्यते।
सिद्धेश्वरो यत्र देवः सर्वकामप्रदं तु तत्।। १०१.२० ।।

इति श्रीमहापुराणे आदिब्राह्मे तीर्थमाहात्म्ये सरस्वतीसंगमपुरूरवसब्रतीर्थसिद्धेश्वरवर्णनं नामैकाधिकशततमोऽध्यायः।। १०१ ।।

गौतमीमाहात्म्ये द्वात्रिंशोऽध्यायः।। ३२ ।।