महाभारतम्-08-कर्णपर्व-026

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देबानामाज्ञया विश्वकर्मणा भूम्यादिसाधनै रुद्राय रथनिर्माणम्।। 1 ।।

दुर्योधन उवाच। 8-26-1x
तेजसोऽर्धं सुरा दत्त्वा शङ्कराय महात्मने।
पशुत्वमपि चोपेत्य विश्वकर्माणमव्ययम्।।
8-26-1a
8-26-1b
ऊचुः सर्वे समाभाष्य रथः सङ्कल्प्यतामिति।
विश्वकर्माऽपि सञ्चिन्त्य रथं दिव्यमकल्पयत्।।
8-26-2a
8-26-2b
समेतां पृथिवीं देवी विशालां पुरमालिनीम्।
सपर्वतवनद्वीपां चक्रे भूतधरां रथम्।।
8-26-3a
8-26-3b
ईषां नक्षत्रवंशं च छत्रं मेरुमहागिरिम्।
अनेकद्रुसञ्छन्नं रत्नाकरमनुत्तमम्।।
8-26-4a
8-26-4b
हिमवन्तं च विन्ध्यं च नानाद्रुमलताकुलम्।
अवस्करं प्रतिष्ठानं कल्पयामास वै तदा।।
8-26-5a
8-26-5b
अस्तंगिरिमधिष्ठानं नानाद्विजगणायुतम्।
चकार भगवांस्त्वष्टा उदयं रथकूबरम्।।
8-26-6a
8-26-6b
मीननक्रझषावासं दानवालयमुत्तमम्।
समुद्रमक्षं विदधे पत्तनाकरशोभितम्।।
8-26-7a
8-26-7b
चक्रं चक्रे चन्द्रमसं तारकागणमण्डितम्।
दिवाकरं चाप्यपरं चक्रं चक्रेंऽशुमालिनम्।।
8-26-8a
8-26-8b
गङ्गां सरस्वतीं तूणीं चक्रे विश्वकृदव्ययः।
अलङ्कारा रथस्यासन्नापगाः सरितस्तथा।।
8-26-9a
8-26-9b
त्रीनग्नीन्मन्त्रवच्चक्रे रथस्याथ त्रिवेणुकम्।
अनुकर्षान्रथे दीप्तान्वरूथांश्चापि तारकाः।।
8-26-10a
8-26-10b
ओषधीर्वीरुधश्चैव घण्टाजालं च भानुमत्
अलञ्चकार च रथं मासपक्षर्तुभिर्विभुः।।
8-26-11a
8-26-11b
अहोरात्रैः कलाभिश्च काष्ठाभिरयनैस्तथा।
द्यां युगं युगपर्वाणि संवर्तकबलाहरकान्।।
8-26-12a
8-26-12b
शम्यां धृतिं च मेधां च स्थितिं सन्नतिमेव च।
ऋघ्वेदं सामवेदं च धुर्यावश्वावकल्पयत्।।
8-26-13a
8-26-13b
पृष्ठाश्वौ तु यजुर्वेदः कल्पितोऽथर्वणस्तथा।
अश्वानां चाप्यलङ्कारं विदधे पदसञ्चयम्।।
8-26-14a
8-26-14b
सिनीवालीमनुमतिं कुहूं राकां च सुप्रभाम्।
योक्ताणि चक्रे चाश्वानां कूश्माण्डांश्चापि पन्नगान्।
8-26-15a
8-26-15b
तालपृष्ठोऽथ नहुषः कार्कोटकधनञ्जयौ।
इतरे चाभवन्नागा हयानां वाहबन्धनम्।।
8-26-16a
8-26-16b
अभीशवः षडङ्गानि कल्पितानि महीपते।
ओङ्कारः कल्पितस्तस्य प्रतोदो विश्वकर्मणा।।
8-26-17a
8-26-17b
यज्ञाः सर्वे पृथक्लृप्ता रथाङ्गानि च भागशः।
अधिष्ठानं मनश्चासीत्परिरथ्या सरस्वती।।
8-26-18a
8-26-18b
नानावर्णानि शस्त्राणि पताकाः पवनेरिताः।
विद्युदिन्द्रधनुर्युक्तं रथं दीप्त्या व्यदीपयत्।।
8-26-19a
8-26-19b
वर्म योद्धुं च विहितं नमो ग्रहगणाकुलम्।
अभेद्यं भानुमच्चित्रं कालचक्रपरिक्षतम्।।
8-26-20a
8-26-20b
एवमस्मिन्महाराज कल्पिते रथसत्तमे।
त्वष्ट्रा मनुजशार्दूल द्विषतां भयवर्धने।।
8-26-21a
8-26-21b
स्वान्यायुधानि दिव्यानि न्यदधाच्छङ्करो रथे।
ध्वजयष्टिं वियत्कृत्वा स्थापयामास गोवृषम्।।
8-26-22a
8-26-22b
ब्रह्मदण्‍डः कालदम्डो रुद्रदण्डश्च ते ज्वराः।
परिष्कारा र्थस्यासन्समन्ताद्दिशमुद्धताः।।
8-26-23a
8-26-23b
विचित्रमृतुभिः षड्भिः कृत्वा संवत्सरं धनुः।
छायामेवात्मनश्चक्रे धनुर्ज्यामक्षयां ध्रुवाम्।।
8-26-24a
8-26-24b
कालो हि भगवान्रुद्रस्तच्च संवत्सरं धनुः।
तस्माद्रौद्री कालरात्री ज्या कृता धनुषो जरा।।
8-26-25a
8-26-25b
ततो रथे रथाश्वांस्तानृषयः समयोजयन्।
एकैकशः सुसंहृष्टानादाय सुधृतव्रताः।।
8-26-26a
8-26-26b
दक्षिणस्यां धुरि कृत ऋग्वेदो मन्त्रपारगैः।
सव्यतः सामवेदश्च युक्तो राजन्महर्षिभिः।।
8-26-27a
8-26-27b
पार्ष्ठिदक्षिणतो युक्तो यजुर्वेदः सुरद्विजैः।
इतरस्यां तथा पार्ष्ठ्यां युक्तो राजन्नथर्वणः।।
8-26-28a
8-26-28b
एवं ते वाजिनो युक्ता यज्ञविद्भिस्तथा रथे।
अशोभन्त तथा युक्ता यथैवाध्वरमध्यगाः।।
8-26-29a
8-26-29b
कल्पयित्वा रथं दिव्यं ततो बाणमकल्पयत्।
चिन्तयित्वा हरिं विष्णुमव्ययं यज्ञवाहनम्।।
8-26-30a
8-26-30b
शरं सङ्कल्पयाञ्चक्रे विश्वकर्मा महामनाः।
तस्य वाजांश्च पुङ्खं च कल्पयामास वै तदा।।
8-26-31a
8-26-31b
पुण्यगन्धवहं राजञ्श्वसनं राजसत्तम।
अग्नीषोमौ शरमुखे कल्पयामास वै तदा।।
8-26-32a
8-26-32b
अग्नीषोमात्मकं कृत्स्नमुच्यते वैष्णवं जगत्।
विष्णुरात्मा भगवतो भवस्यामिततेजसः।।
8-26-33a
8-26-33b
तस्माद्धनुर्ज्यासंस्पर्शं स विषेहे शरस्य वै।
तस्मिञ्शरे तीक्ष्णमन्युममुञ्चद्दुःसहं प्रभुः।।
8-26-34a
8-26-34b
भृग्वङ्गिरोमन्युभवः क्रोधाग्निरतिदुःसहः।
स नीललोहितो धूम्रः कृत्तिवासा भयानकः।।
8-26-35a
8-26-35b
आदित्यायुतसङ्काशस्तेजोज्वालावृतो भवः।
दुश्चर्यच्यावको जेता हन्ता ब्रह्मद्विषां वरः।।
8-26-36a
8-26-36b
तस्याङ्गानि समाश्रित्य स्थितं विश्वमिदं जगत्।
जङ्गमाजङ्गमं राजञ्छुशुभेऽद्भुतदर्शनम्।।
8-26-37a
8-26-37b
दृष्टा तु तं रथं दिव्यं कवची स शरासनी।
आददे स शरं दिव्यं सोमविष्ण्वग्निवायुजम्।।
8-26-38a
8-26-38b
तमादाय महादेवस्त्रासयन्दैत्यदानवान्।
आरुरोह तदा यत्तः कम्पयन्निव रोदसी।।
8-26-39a
8-26-39b
महर्षिभिः स्तूयमानो वन्द्यमानश्च वन्दिभिः।
उपनृत्तश्चाप्सरसां गणैर्नृत्तविशारदैः।।
8-26-40a
8-26-40b
स शोभमानो वरदः खङ्गी बाणी शरासनी।
हसन्निवाब्रवीद्देवः सारथिः को भवेदिति।।
8-26-41a
8-26-41b
।। इति श्रीमन्महाभारते
कर्णपर्वणि षड्विंशोऽध्यायः।। 26 ।।

[सम्पाद्यताम्]

ओषधीर्वीरुधश्चैव घण्टाः पुष्पफलोपगाः - पाठभेदः

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