ब्रह्मस्फुटसिद्धान्तः भागः ४

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ब्रह्मस्फुटसिद्धान्तः भागः ४
ब्रह्मगुप्तः
१९५२

A board of Editors headed by Samskrit. Research Publishe&by Indian Institute of Astronomical and Sanskrit Research 2239, Gurudwara Road, Karol Bagh, New Delhi-5. (India) Aided by Ministry of Education, Government of India Editorial Board Shri Ram Swamp Sharma r^|tfjrtfl£r yirector of the Institute. ■ Mitybura ishScharya Daya Shankar Dikshita Jyotishacharya Shri On Datt Sharma, Shastri M.A., M.O.L. Copy rights reserved by publishsers 1966 Price Rs. 60.00

Printed by Padam Shree Prakashan & Printers Chamelian Road, Delhi. श्रीब्रह्मगुप्ताचार्य-विरचित: ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः -(संस्क्रत-हिन्दी भाषायां वासनाविज्ञानभाष्याम्यां समलंकृतः सोपपत्तिकः) चतुर्थो-भागः प्रधानस्सम्पादक (सञ्चालक-इंडियन इंस्टीटयट प्राफ अस्ट्रानौमिकल एण्ड संस्कृत रिसर्च) काशक : इंडियन इंस्टीट्यूट आफ़ अस्ट्रानौमिकल एण्ड संस्कृत रिसर्च गुरुद्वारा रोड, करौल बाग्रा, न्यू देहली-५ । प्रकाशक- इंडियन इंस्टीटयूट प्राफ़ अस्ट्रानौमिकल एण्ड संस्कृत रिसर्च २२३९, गुरुद्वारा रोड, करौल बारा, नई दिल्ली-५ (भारत)

भारत सरकार के शिक्षा मन्त्रालय द्वारा प्रदत्त अनुदान से प्रकाशित ।

सम्पादक मण्डल- श्री रामस्वरुप शर्मा

    प्रधान् सम्पादक, सञ्चालक

श्री मुकुन्दमिश्र

    ज्योतिषाचार्य

श्री विश्वनाथ झा

    ज्योतिषाचार्य

श्री दयाशंकर दीक्षित

    ज्योतिषाचार्य

श्री ओम्बत्त शर्मा शास्त्री

    एम. ए., एम. ओ. एल

प्रथम संस्करण १९६६

मूल्य रु० ६०.००

मुद्रक : पक श्री प्रकाशन एण्ड प्रिण्टर्स १२, चमेलियन रोड, दिल्ली







                                     समर्पण :
                               श्रीयुत एस० के० पाटिल
                              यूनियन मिनिस्टर फ़ार रेल्वेज़
                                      को                                    
                                  सादर समर्पित  






                                   Dedicated to 
                                 Shri S. K. Patil 
                            Union Minister for Railways  


भूमिका

ब्रह्मगुप्त और ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त

श्रीचापवशतिलके श्रीव्याघ्रमुखे नृपे शकनृपाणाम्।
पञ्चाशत्संयुक्त वर्षशतैः पञ्चभिरतीतैः॥
ब्राह्याः स्फुटसिद्धान्तः सज्जनगणितज्ञगोलबित्प्रीत्यै ।
त्रिशद्वर्षेण कृते जिष्णुसुतब्रह्मगुप्तेन ।।

ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त के संज्ञाध्याय में आचार्यों की इस उक्ति के अनुसार ५२० शाकवर्षे में आचार्यं ब्रह्मगुप्त का जन्म हुआ । तीस वर्ष की आयु में ही उन्होंने ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त नामक ज्योतिष के इस महान् सिद्धान्त ग्रन्थ का प्रणयन किया। इनके जन्म काल नाम के अन्त में लग 'गुप्त' शब्द प्रकट करत है कि इनका जन्म वैश्य कुल के एक संपन्न परिवार में हुआ था। ज्योतिषशास्त्र कें यह प्रकाण्ड पण्डित थे—इसी से रीवां नरेश व्याघभटेश्वर ने इन्हें अपना प्रधान ज्योतिषी बनाकर सम्मानित किया।

इनके जन्म स्थान के सम्बन्ध में कोई मत विभिन्नता नहीं। पाश्चात्य विद्वानों की इस दिशा में खोज की जो उपलब्धि हुई है, उसके अनुसार इनका जन्म गुर्जर देशान्तवर्त भिनमाल नामक गाँव में हुआ। गुर्जर प्रदेश के ज्योतिषियों की जन्म स्थान सुखकथा से भी इस बात का समर्थन होता है। गुर्जर प्रदेश की उत्तर सीमा में मलव (मारवाड़देश से दक्षिण दिशा की ओर आबू पर्वत और गुण नदी के मध्यवर्ती पर्वत से वायुकोण में भिनमाल नरम का गाँव अब भी स्थित है।

ब्रह्मोक्त ग्रहगणितं महता कालेन यत् खिलीभूतम्।
अभिधीयते स्फुटं तज्जिष्णुसुतब्रह्मगुप्तेन।।

रचना—

आचार्यों की इस उक्ति से स्पष्ट ज्ञात होता है कि नलिकादि से वेधद्वारा दृग्गणितैषय (वेघागत और गणितागत प्रहादिकों की तुल्यता) कारक प्रहादि समथन के कारण विष्णुधर्मोत्तर पुराण के अन्तर्गत अति प्राचीन सिद्धान्त को ही अगम मानकर उसका संशोधन करके आचार्यं ब्रह्मगुप्त ने नवीन प्राह्मस्फुट सिद्धान्त की रचना की।

इस (ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त) की चतुर्वेदाचार्यं कृत 'तिलक' नाम की टीका प्रसिद्ध थी—वह इख समय संपूर्ण उपलब्ध नहीं है। 'कोलब्रुक' नामक पाश्चात्य विद्वान् को वह

                                         ( २ )

सम्पूर्ण टीका उपलब्ध थी । इसी कारण उसके आधार पर इस ग्रन्थ के वारहवें (व्यक्त)
अध्याय और अठारहवें (अव्यक्तगणित) अध्याय का कोलब्रक महाशय कृत, आङ्गल भाषा
में अनुवाद सन् १८१७ (१७३९ शाकवर्ष) ई० में ही उपलब्ध हो गया था।

इस ग्रन्थ (ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त ) में १००८ श्लोक (आर्यावृत्त ) हैं ।
पूर्वार्ध और उत्तरार्ध नामक दो भागों में बंटा हुआ है । पूर्वार्ध में (१) मध्यगति
(२) स्फुटगति (३) त्रिप्रश्नाध्याय (४) चन्द्रग्रहणाध्याय
ग्रन्थ का विषय (५) सूर्यग्रहणाध्याय, (६) उदयास्तमयाध्याय, (७) चन्द्रशृगो
विभाजन न्नत्यध्याय, (८) चन्द्राच्छायाध्याय, ( ९ ) ग्रहयुत्यध्याय और
(११) भग्रहयुत्यध्याय, ये दस अध्याय हैं। उत्तरार्ध में (१) तन्त्र
परीक्षाध्याय, (२) गणिताध्याय, (३) मध्यमत्युत्तराध्याय, (४) स्फुटगत्युत्तराध्याय
(५) त्रिप्रश्नोत्तराध्याय, (६) ग्रहणोत्तराध्याय, (७) छेद्यकाध्याय, (८) श्रृंगोन्नत्युत्तरा
ध्याथ, (8) कुट्टाकाराध्याय, (१०) छन्दश्वित्युत्तराध्याय, (११) गोलाध्याय, (१२) यन्त्रा
ध्याय, (१३) मानाध्याय और (१४) संज्ञाध्याय । ये चौदह अध्याय हैं । दोनों पूर्वार्ध और
उत्तरार्ध को मिला कर १० + १४ इस ग्रन्थ में कुल चौबीस अध्याय हैं ।

इन अध्यायों में तन्त्रपरीक्षाध्याय बहुत बिचारणीय हैं क्योंकि इस अध्याय में आचार्य
ने और अनेक आचार्यो के नामों और उनके मतों का उल्लेख किया है ।

लाटात् सूर्यशशाङ्कौ मध्याविन्दू च चन्द्रपातौ च ।
कुजबुध शीघ्रबृहस्पतिसितशीघ्र शनैश्चरान् मध्यान् ।
युगपातवर्षभगणान् वासिष्ठाद्विजयनन्दिकृतपादात् ।
मन्दोच्चपरिधिपातस्पष्टीकरणाद्यमार्यभटात् ।।
श्रीषेणेन गृहीत्वा रक्षोच्चयरोमकः कृतः कन्था ।
एतानेव गृहीत्वा वासिष्ठो विष्णुचन्द्रण ।
अनयोर्न कदाचिदपि ग्रहणादिषु भवति दृष्टिगणितैक्यम् ।
यद्भवति तद्घुणाक्षरमतोऽस्फुटाभ्यां किमेताभ्याम् ।।

इन श्लोकों के द्वारा श्रीषेणाचार्यकृत ‘रोमकसिद्धान्त' है और विष्णुचन्द्रकृत
‘वासिष्ठसिद्धान्त ।' दोनों के दोष कहते हैं, यह टीकाकार चतुर्वेदाचार्य का कथन है ।
‘पञ्चसिद्धान्तिका' में श्रीषेण और विष्णुचन्द्र के नामों का उल्लेख नहीं है । इससे मालूम
होता है कि वराहमिहिराचार्य के बाद और ब्रह्मगुप्त से पूर्व ४२६ और ५५० शाकवर्षे
के मध्य इन दोनों आचायों (श्रीषेण और विष्णुचन्द्र) ने ज्यौतिषसिद्धान्त के विशाल
ग्रन्थों की रचना की। इस बात को• स्वयं वेध द्वारा स्थिर करके आचार्य ने ‘यद् भवति
तदूधुणाक्षरम्’ इत्यादि प्रौढोक्ति से पुष्ट किया है।

आर्यभट के सिद्धान्त सर्वथा दोषपूर्ण हैं, यह कहते हुए आचार्य ने उनकी उक्तियों

आर्यभट के मत का नाना प्रकार से खण्डन करने के लिए इस ग्रन्थ की रचना का खण्डन की । आचार्य भूभ्रमणखण्डन में कहते हैं यः प्राणेनैति कलां भूर्यदि तर्हि कुतो ब्रजेत् कमध्वानम् । आवर्तनमुव्यश्चेन्न पतन्ति समुच्छूयः कस्मात् ।। आर्यभट तो पृथिवी के चलत्व और भगणों के स्थिरत्व को स्वीकार कर अहोरा त्रासु में पृथिवी के भ्रमण को अपने अक्ष के ऊपर मानते हैं, परन्तु ब्रह्मगुप्त ने प्रावत्र्तन मुव्र्याश्चेदित्यादि उक्ति के द्वारा, तथा अन्यत्र अनेक- अत्युक्तियों द्वारा भूभ्रमण का जो खंडन किया है वहदुराग्रहपूर्ण और केवल वाग्बल है। स्वयमेव नाम यत्कृतमार्यभटेन स्फुटं स्वगणितस्य । सिद्ध तदस्फुटत्वं ग्रहणादीनां विसंवादात् ।। जानात्येकमपि यतो नार्यभटो गणितकाल गोलानाम् । न मया प्रोक्तानि ततः पृथक् पृथक् दूषणान्येषाम् ।। आर्यभटदूषणानां संख्या वक्तु न शक्यते यस्मात् । तस्मादयमटेशो बृद्धिमताऽन्यानि योज्यानि । जिस रीति से, जिन शब्दों द्वारा ब्रह्मगुप्त ने आर्यभट के मत का खण्डन किया है उसी रीति से उन्हीं शब्दों में घटेश्वराचार्य ने वटेश्वर सिद्धान्त में ब्रह्मगुप्त के भत का खण्डन किया है। इसके विस्तृत विवरण के लिए वटेश्वर सिद्धान्त का अवलोकन अपे ग्रहग्रहणादि के वेधकर्ता ब्रह्मगुप्त स्वयं तो प्राचीनाचार्यो की अपेक्षा अनेक विशिष्ट ब्राह्मस्फुट ग्रहादिसाधन विधियों का, तथा गणित के सत्य और असत्य की सिद्धान्त परीक्षा के लिए वेध विधियों का अपने ग्रन्थ में प्रौढोक्ति के साथ प्रतिपादन करते हैं। ज्ञातं कृत्वा मध्यं भूयोऽन्यदिने तदन्तरं भुक्तिः । त्रैराशिकेन भुक्त्या कल्पग्रहमण्डलानयनम् ।। यदि भिन्नाः सिद्धान्ता भास्करसंक्रान्तयोऽपि भेदसमाः । स स्पष्टः पूर्वस्यां विषुवत्यकॉदयो यस्य ।। इत्यादि वास्तव विचारों में प्रवृत्त विशिष्ट विवेचनायुक्त सिद्धान्तं ग्रन्थ को रचना सधसे पहले ब्रह्मगुप्त ही ने की । यह बात इस समय उपलब्ध ज्यौतिष सिद्धान्तों के ग्रन्थों से विदित होती है । ‘कृती जयति जिष्णुजो गणकचक्रचूडामणिः ।' इस उक्ति द्वारा भास्कराचार्य ने अपने सिद्धान्त शिरोमणि के गणिताध्याय के प्रारम्भ में आचार्य ब्रह्मगुप्त को अभिवादन किया । उसके पश्चात् अनेक स्थानों पर ब्रह्मगुप्त के मत का उल्लेख करते हुए भास्करा चार्य ने लिखा यथाऽत्र ग्रन्थे ब्रह्मगुप्त स्वीकृतागमोऽङ्गीकृतः । इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि भास्कराचार्य ने अपने ग्रन्थ में ब्रह्मगुप्त का ही अनुकरण किया । ब्रह्मगुप्त को अयन चलन की उपलब्धि नहीं हुई, यह बात ‘ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त' से समझी जाती है। अत एव ब्रह्मगुप्तकृत अयन चलोपलब्धि का खण्डन देता जाता है। तन्त्रपरीक्षाध्याय में ब्रह्मगुप्त ने कहा है। परमाल्पा मिथुनान्ते द्युरात्रिनाडयोऽर्क गतिवशादृतवः । नायनयुगमयनवशात् स्थिरमयनद्वितयमपि तस्मात् ।। वराह मिहिराचार्य अयनचलन के विषय में सन्दिहान थे । इसीलिए उन्होंने ‘नूनं कदाचिदासीद्येनोक्तं पूर्वशास्त्रेषु ' कहा है। उस समय अश्विन्यादि में क्रान्तिपात था इसलिए अश्विन्यादि से नक्षत्रों की गणना प्रवृत्त हुई। ब्रह्मगुप्त के पश्चात् आज तक गणना की यही प्रक्रिया प्रचलित है। क्रान्तिपात पश्चिम दिशा में प्राय: ६५ वर्ष में एक ओश चलता है । अत: उसका ज्ञान अल्पसमय में असम्भव प्राय है । इसीलिए तो ब्रह्मगुप्त भी अयनचलन की उपलब्धि नहीं कर सके । आर्यभट का विरोधीं होकर भी ब्रह्मगुप्त ने ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त की रचना की । ३७ वर्ष की अवस्था में ब्रह्मगुप्त ने ' ‘खण्डखाद्यक' नाम के कारण ग्रन्थ का खण्डखाद्यक की रचना प्रणयन किया । उसके प्रारंभ में ही ग्रह्मगुप्त ने प्रणिपत्य महादेवं जगदुत्पत्ति स्थितिप्रलयहेतुम् । वक्ष्यामि खण्डखाद्यकमाचायांयभटतुल्यफलम् ।। प्रायेणार्यभटेन व्यवहारः प्रतिदिनं यतोऽशक्यः । उद्वाहजातकादिषु तत्समफल लघुतरोक्तिरतः ।। यह उनके ग्रन्थ की पर्यालोचन से समझा जाता है कि सर्वत्र मनुष्यों के व्यवहारों में प्रचलित आर्यभट मत का निराकरण करना अत्यन्त कठिन था । इसलिए आर्यभट मतानु सार व्यवहार करते हुए मनुष्यों के उपकारार्थ व्यावहारिक ‘खण्डखाद्यक’ नामक करण ग्रन्थ की रचना ब्रह्मगुप्त ने की । जिस प्रकार उपलब्ध प्राचीन ज्यौतिषसिद्धान्त ग्रन्थों में ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त एक आदर्श ग्रन्थ माना जाता है उसी पकार सब करणग्रन्थों में सर्व प्रथम आदर्श आज से तेरह सौ वर्ष पूर्व लिखित यही ‘खण्डखाद्यक’ है। ( ५ ) भारतीय ज्योतिषियों में आर्यभट ही सब से पहले दिन और रात्रि के कारण स्वरूप पृथिवी के प्रावर्तन को कहते हैं जैसे गीतिकापाद के प्रथम श्लोक में एक महायुग (४३२००००० ) में भूमि के १५८२२३७५०० भगण होते हैं। पहले इसको कह कर दृष्टान्त द्वारा भूभ्रमण की अनुलोमगतिनस्थः पश्यत्यचलं विलोमगं यद्वत् । अचलानि भानि तद्वत् समपश्चिमगानि लङ्कायाम् ।। उक्ति से दृढ़ करते हैं। परन्तु यहाँ विचित्रता देखने में आती है कि आर्यभटीय टीकाकार परमेश्वर ने इस श्लोक की व्याख्या के समय-भूमेः प्राग्गमनं नक्षत्राणां गत्य भावश्चेच्छन्ति केचित्तन्मिथ्याज्ञानवशादुत्पन्नां प्रत्यग्गमनप्रतीतिमङ्गीकृत्य भूमेः प्राग्गतिर भिधीयते । परमार्थतस्तु स्थिरैव भूमिः-कहा है। अर्थात् कोई-कोई पृथिवी के पूर्वाभि मुख चलन और नक्षत्रों के गत्यभाव (अर्थात् नक्षत्रों की गति नहीं है) कहते हैं वह मिथ्या अज्ञानवश पश्चिमाभिमुख चलन-की प्रतीति स्वीकार कर पृथिवी की पूर्वाभिमुख गति को कहते हैं । वस्तुतः पृथिवी स्थिर ही है। उदयास्तमयनिमित्तं नित्यं प्रवहेण वायुना क्षिप्तः । लङ्कासमपश्चिमगो भपञ्जरः स ग्रहो भ्रमति ।। इससे स्वयं आर्यभटाचार्य भी भू भ्रमण को अस्वीकार करते हैं। आर्यभटाचार्य के मन में यह निश्चय नहीं था कि पृथिवी चलती है या नहीं ! ऐसा उनके लेख से प्रतीत होता है । अस्तु । ‘ब्रह्माह्वय श्रीधरपद्मनाभबीजानि यस्मादति विस्तृतानि' अपने बीजगणित में भास्कराचार्य की इस उक्ति से मालूम होता है, कि ब्रह्मगुप्त का बहुत बड़ा बीजगणित का ग्रन्थ था, परन्तु वह ग्रन्थ आज प्राप्य नहीं है। ब्रह्मगुप्त हीं औरों की अपेक्षा श्रीपति का श्रेष्ठतर आदर्श है। ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त और सिद्धान्तशेखर की पर्यालोचना से ज्ञात होता है। कि ब्रह्मगुप्त श्रीपति द्वारा द्वारा रचित सार्थक आर्याओं (इस नाम का श्लोक ) का ही ब्रह्मगुप्त का श्रीपति ने बड़-बड़ छन्दों में अनुवाद किया है । वस्तुतः ब्रह्म अनुकरण गुप्तोक्त ग्रहगणित को ही सत्य परन्तु दुरूह समझ कर श्रीपति ने उसे अपनी सुन्दर रचना द्वारा सुगमतर ग्रन्थान्तर ( शेखर) के रूप में हमारे सन्मुख रखा । इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं है । ग्रन्थ रचना के विषय में लल्लाचार्य ही श्रीपति के विशेष रूप से श्रेष्ठ आदर्श है। जो विषय ब्रह्मगुप्त ने नहीं कहा है वह लल्लाचार्य ने कह दिया है । उन सभी विषयों को उसी प्रकार श्लोका ( ६ ) न्तरों से श्रीपति ने कह दिया है । सारांश यह है कि श्रीपति ने दोनों (ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त और शिष्यधीवृद्धिद) ग्रन्थों . का परिशीलन करने के पश्चात् ही सिद्धान्तशेखर की रचना की । ब्रह्मगुप्त ने एक बहुत विलक्षण विषय को अपनी रचना में स्थान दिया है । यह है ‘नतकर्म' । मन्दफल शीघ्रफल भुजान्तरादि संस्कार करने से जो स्पष्टग्रह आते हैं वे स्वगोलीय (ग्रहगोलीय) स्पष्ट ग्रह होते हैं । उन स्वगोलीय स्पष्ट ब्रह्मगुप्त का ग्रहों को हम लोग जहां देखते हैं वे हम लोगों के लिए स्पष्ट ग्रह ‘नतकर्म' होते हैं । स्वगोलीय स्पष्टग्रह में जितना संस्कार करने से हम लोगों के स्पष्टग्रह होते हैं उसी संस्कार का नाम ‘नतकर्म' है । ब्रह्मगुप्त से पूर्व किसी भी अन्य प्राचीनचार्य ने कुछ भी नहीं लिखा । नतकर्म साधन की बात तो दूर रही, उसके नाम तक का भी किसी ने उल्लेख नहीं किया । भास्कराचार्य ने सिद्धान्तशिरोमणि (गणिताध्याय) के स्पष्टाधिकार में इस नतकर्म के साधन का प्रकार लिखा है । ‘मुहुः स्फुटाऽतो ग्रहणे रवीन्द्वोस्तिथिस्त्विदं जिष्णुसुतो जगाद’ भास्कर का इस उक्ति से स्पष्ट ज्ञात होता है-कि इस ‘नतकर्म' के आविष्कत्त ब्रह्मगुप्त ही हैं । सिद्धान्त शिरोमणि (गणिताध्याय) के स्पष्टांधिकार में भास्कराचार्य ने ‘भोग्धखण्डस्पष्टीकरण' में जो लिखा है उसका मूल भी ब्रह्मगुप्तकृत ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त के ध्यान ग्रहोपदेशाध्याय में ही है । और प्राचार्यो ने इस विषय में कुछ नहीं लिखा है। सिद्धान्त तत्व विवेक में कमला कर ने भास्करोक्त भोग्यखण्ड स्पष्टीकरण प्रकार का खण्डन किया है। वस्तुत: यह खण्डन कमलाकर का दुराग्रह ही है। अत: यह खण्डन ठीक नहीं है। ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त के त्रिप्रश्नाधिकार में दिक्साधन में पूर्वापरयोविन्दू तुल्यच्छायाग्रयोर्दिगपराद्यः । पूर्वान्यः क्रान्तिवशात् तन्मध्याच्छङ्कुतलमितरे ।। यहाँ क्रान्तिवश से दिक्साधन में कैसे भेद उत्पन्न होता है इसके लिए चतुर्वेदाचार्य ने कर्णवृत्ताग्रान्तर का जो साधन किया है उसी को ‘छाया निर्गमन प्रवेश समयार्कक्रान्ति जीवान्तरं’ आदि द्वारा श्रीपति ने कहा है । उसके पश्चात् ‘तत्कालापमजीवयोस्तु विवरात् इत्यादि से सिद्धान्तशिरोमणि में भास्काचार्य ने कहा है । सूर्यसिद्धान्त आदि प्राचीन ग्रन्थों म् इस विषय का उल्लख नहा है । ‘मन्दफलानयन' के लिए मन्दकर्णानुपात ही आवश्यक साधन है। यद्यपि इस विषय में भास्कराचार्य ने अपना कुछ भी मत व्यक्त नहीं किया है, तथापि चन्द्रग्रहणाधिकार में स्फुट रवि चन्द्रकर्णसाधन में ‘मन्दश्रुतिद्रक् श्रुतिवत्प्रसाध्या' इत्यादि से ब्रह्मगुप्त ही के मत को स्वीकार किया है। यह भी ब्रह्मगुप्त की उक्ति की ही विलक्षणता है । ( ७ ) लल्लाचार्य ने वलन और दृक्कर्म के आनयन को उत्कमज्या द्वारा किया है। ब्रह्मगुप्त की उक्ति में चतुर्वेदाचार्य की ‘अत्रज्याशब्देनोत्क्रमज्या ग्राह्या' व्याख्या को लक्ष्य कर भास्कराचार्य ने ‘ब्रह्मगुप्तकृतिरत्र सुन्दरी साऽन्यथा तदनुगैर्विचार्यते' कहा है । ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त के बहुत से स्थलों में वर्णन की स्थूलता अवश्य है, तथापि इसमें नाना प्रकार के विषयों का अपूर्वं समावेश है। अतएव ‘ाह्मस्फुटसिद्धान्त' सर्वश्रेष्ठ सिद्धान्त ग्रन्थ है, इस कथन में किसी प्रकार की विप्रतिपत्ति (विरोध) प्रतीत नहीं होती है। इस ग्रन्थ में ‘छन्दश्चित्युत्तराध्याय' नाम का एक अध्याय है। इसके अन्तर्गत श्लोकों की उपपति तो दूर की बात है, आज तक किसी विद्वान् ने इनकी व्याख्या तक नहीं की । प्रश्नाध्याय का जैसा क्रम इस ग्रन्थ में है वैसा अन्य ग्रन्थों में नहीं है। इसमें मध्य गति आदि (मध्यगत्युत्तराध्याय-स्पष्टगत्युत्तराध्याय-त्रिप्रश्नाध्याय-ग्रहणाध्याय तथा शृङ्गो न्नत्युत्तराध्याय) पाच अध्याय म पृथक्-पृथक् उत्तर सहित प्रश्नों प्रश्नाध्याय का विवेचन किया गया है। इसके अभ्यास से छात्रवृन्द सिद्धान्त विषय में निपुणता प्राप्त कर सकते हैं । सिद्धान्त शिरोमणि की भूमिका में ‘जीवा साधनं विनैव यद् भुजज्यानयनं कृतवान् श्रीपतिस्तत्त्वपूर्वमेव स्यात् यथा तत्प्रकारो विदां विनोदाय प्रदश्र्यते दोः कोटि भागरहिताभिहृताः खनागचन्द्रास्तदीयचरणेन शरार्कदिग्भिः । ते व्यासखण्डगुणिता विहृताः फलं तु ज्याभिविनापि भवतो भुजकोटिजीवे । इति केनापि लिखितमस्ति तन्नैव युक्तियुक्तम् ।। कहने का भाव यह है कि शिद्धान्त शिरोमणि की भूमिका में जीवासाधन विना ही श्रीपति ने जो भुजज्यानयन किया है वह अपूर्व ही है, उनके प्रकार को पंडितों के बिनोद के लिए दशतेि हैं ‘दोः कोटि भागरहिताः’ इत्यादि ही उनका सिद्धान्त शिरोमणि प्रकार है । भूसिका लेखक का यह उक्त लेख ठीक नहीं हैं, तथा सिद्धान्तशेखर क्योंकि ज्याविना भुजज्या और भुजकोटिज्या का आनयन और ज्या द्वारा चापानयन सर्वप्रथम ब्रह्मगुप्त ही ने किया है । ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त में कथित प्रकार अधोलिखित है भुजकोटय'शोनगुणा भार्धाशास्तच्चतुर्थभागोनैः । पञ्चद्वीन्दुखचन्द्रविभाजिता व्यासदलगुणिता ।। तज्ज्ये परमफलज्या सङ्गुणिता तत्फले विना ज्याभिः । इष्टोच्चनीचवृत्तव्यासार्ध परमफलजीवा ।। इष्टज्या से चापानयन्न प्रकार इष्टज्या संगुणिताः पञ्चकयमलैकशून्यचन्द्रमसः । इष्टज्या पादयुतव्यासार्धविभाजिता लब्धम् । ( ८ ) नवतिकृतेः प्रोह्य पदं नवतेः संशोध्य शेष भागकलाः । एवं धनुरिष्टाया भवति ज्याया विना ज्याभिः । बहुत पहले से ज्याविना भुजज्या और भुजकोटिज्या का आनयन ‘दोः कोटिभाग रहिताभिहताः' इत्यादि प्रकार से श्रीपति द्वारा कथित है, यह बात ज्योतिषियों में प्रसिद्ध है। इसी का अवलम्बन करके ‘ग्रहलाघव' नामक अपने करणग्रन्थ में विस्तार से लिखा है । परन्तु वस्तुत: यह प्रकार ब्रह्मगुप्त ही का है। उनके उपर्युक्त श्लोकों से यह बात सर्वथा स्पष्ट हो गई है। अब यह सन्देह का निषय नहीं रहा । वटेश्वर सिद्धान्त में वटेश्वराचार्य ने भी ब्रह्मगुप्तोक्त इसी प्रकार को श्लोकान्तरों में लिख दिया है । सिद्धान्तशेखर में सर्वत्र श्रीपति का अपना निजी थोड़ा ही है, उन्होंने भी ब्रह्मगुप्तोक्त प्रकार की ही प्रकार श्लोकान्तरों में वणित किया है। उदाहरण को लिए देखिये सिद्धान्तशेखर के सूर्यग्रहणा तिथ्यन्तात् स्थितिखण्डहीनसहितात् प्राग्वत्ततो लम्बनं । कुर्यात् प्रग्रहमोक्षयोः स्थितिदलं युक्तं विधायासकृत् । तन्मध्यग्रहणोत्थलम्बनभुवा विश्लेषणानेहसा । मदधोंनयुतातिथेरपि तथा संमीलनोन्मीलने ।। अधिकमृणयोराद्य मध्यात्तथाऽन्त्यमिहाल्पकं । भवति धनयोश्चाद्य हीनं यदाऽधिकमन्तिमम् । नमनविवरेणैवं कुर्याद्विहीनमतोऽन्यथा । स्थितिदलमृणस्वस्थे भेदे तदैक्ययुतं पुनः । यह श्रीपत्युक्त प्रकार ब्रह्मगुप्त के अधोलिखित प्रकार के सर्वथा अनुरूप ही है प्राग्वल्लम्बनमसकृत् तिथ्यन्तात् स्थितिदलेन हीनयुतात् । अधिकोनं तन्मध्यादृष्णयोरूनाधिकं धनयोः ।। यद्यधिकं स्थित्यर्ध तदाऽन्तरेणान्यथीनमृणमेकम् । अन्यद्धनं तदैक्येनाधिकमेवं विमदधे । इसी प्रकार प्रकारान्तर से कहा गया श्रीपत्युक्त स्फुटस्थिति दल साधन प्रकार स्थित्यधनयुतात् परिस्फुटतिथेः स्याल्लम्बनं पूर्ववत् । तन्मध्यग्रहव च मध्यमतिथो ततस्तु तिथौ ।। स्थित्यर्धेन परिस्फुटेषु जनितेनोनाधिकाद्वाऽसकृत् । तत्तिथ्यन्तरनाडिकाः स्थितिदलेस्तः स्पर्शमुक्त्योः स्फुटे । ( ९ ) इस श्लोक का द्वितीयचरण शुद्ध नहीं है। यह प्रकार ब्रह्मगुप्त के अधोलिखित प्रकार के अनुरूप ही है । स्फुटतिथ्यन्ताल्लम्बनमसकृत् स्थित्यर्धहीनयुक्ताद्वा । तत्स्फुटविक्षेपकृतस्थित्यधनयुततिथ्यन्तात् । तत्स्पष्टतिथिछेदान्तरे स्फुटे दिनदले विहीनयुतात् । स्वविमर्दाधनासकृदेवं स्पष्टे विमदधे ॥ सिद्धान्तशिरोमणि में भी भास्कराचार्य ने अधोलिखित शब्दों में तिथ्यन्ताद् गणितागतात् स्थितिदलेनोनाधिकाल्लम्बन तत्कालोत्थनतीषु संस्कृतिभवस्थित्यर्धहीनाधिके । दशन्तेि गणितागते धनमृष्णं वा तद्विधायासकृज्ज्ञेयौ प्रग्रहमोक्षसंज्ञसमयावेवं क्रमात् प्रस्फुटौ ॥ ब्रह्मगुप्तोक्त प्रकार का ही वर्णन किया है। इसी प्रकार सिद्धान्तशेखरे के सूर्यग्रहणा ध्याय के उपसहार म स्फुटं भवति पञ्चजीवया लम्बनं न हि यतस्ततः कृतम् । युक्तियुक्तमिति जिष्णुसूनुना तन्मयाऽपि कथितं परिस्फुटम् ।। कथित आशय ब्रह्मगुप्त की अधोलिखित उक्ति के सट्टश ही है दृग्गणितैक्यं न भवति यस्मात् पञ्चज्यया रविग्रहणे । तस्माद्यथा तदैक्य तथा प्रवक्ष्यामि तिथ्यन्ते । मध्यगत्यध्याय से ग्रन्थसमाप्ति पर्यन्त सादृश्य की यही स्थिति है । यह बात दोनों ग्रन्थों (ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त और सिद्धान्तशेखर) के अवलोकन से स्पष्ट हो जाती है। केवल श्रीपति ने ही अपने पूर्ववर्ती आचार्यो के ग्रन्थों से उनके कथित विषयों को श्लोकान्तरों द्वारा अपने ग्रन्थ में अपनी उक्ति के रूप में लिखा है, सो नहीं है अपितु उनके पूर्ववर्ती प्राचार्यो की भी यही रीति रही है । श्रीपति के परवर्ती भास्कराचार्य आदि विद्वानों ने भी उसी रीति को अपनाया है । उदाहरणार्थ भास्कराचार्य द्वारा-गणिताध्याय के मध्यमाधिकार में सिद्धान्त लक्षण-वेद के अंग ज्योति:शास्त्र का निरूपण-वेदांगों में ज्योतिःशास्त्र की प्रधानता-वेद वेदांग पढ़ने का द्विजों (ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य) का ही अधिकार-शूद्रादिकों का नहीं-भचक्रचलन-कालप्रवृत्ति-कालमानों की परिभाषाए -ग्रहों का भगणपाठ-युगों तथा मन्वादि के नाम-तथा ब्रह्मा के गत वर्षादि के प्रयोजनाभाव इत्यादि मंध्यमाधिकारोक्त सब विषयों का निरूपण श्रीपति कृत साधनाध्यायोक्त श्लोकों का श्लोकांतर मात्र है। ज्यौतिष शास्त्र के पाठकों को दोनों ग्रन्थों का अवलोकन करना ( १० ) चाहिए जिससे उनके सादृश्य की जानकारी हो सके । प्राचीनोक्त विषयों का आश्रय लेकर अनेक विशिष्ट विषयों को कहने के लिए श्रीपति ने प्रथम साधनाध्याय, तथा ग्रहभगणा ध्याय की रचना की । उसके पश्चात् मध्यमाध्याय में-सात प्रकार से अहर्गणानयन-वार प्रवृत्ति के विषय में विभिन्न आचार्यो के मत का प्रतिपादन-तद्गत दोष निरूपण करके अपने मतानुसार वार प्रवृत्ति का प्रतिपादन-मध्यम ग्रह साधन के लिए नाना प्रकार का नूतन प्रकारान्तर वर्णन-तथा रवि आदि सब ग्रहों के राश्यादिमन्दोच्च का प्रतिपादन आदि नाना प्रकार के विषयों का दिग्दर्शन श्रीपति के सिद्धान्तशेखर में मिलता है । ब्राह्म स्फुट सिद्धान्त में अहर्गणानयन बहुत प्रकार से किया गया है, उन प्रकारों का अनुकरण श्रीपति ने किया है। प्राचार्य ने लघ्वहर्गणानयन भी किया है परन्तु श्रीपति ने उसकी चर्चा नहीं की । अहर्गण से अभीष्ट वार ज्ञान के लिए अहर्गण में एक जोड़ना चाहिए यह बात ब्रह्मगुप्त ने लिखी हैं। उसके पश्चात् सिद्धान्तशेखर में भी श्रीपति ने उनका अनुकरण किया है । सिद्धान्तशिरोमणि में भास्कराचार्य ने अहर्गण से अभीष्टवार ज्ञानार्थ अहर्गण में सैक निरेक करना लिखा है यथा अभीष्टवारार्थमहर्गणश्चेत्सैको निरेकस्थितयोऽपि तद्वत् । ब्रह्मगुप्त ने अहर्गण में निरेक करण की चर्चा क्यों नहीं की, नहीं कहा जा सकता । वटेश्वर सिद्धान्त में भी नाना प्रकार से अहर्गणानयन और लघ्वहर्गणानयन किया गया है । ब्रह्मगुप्त द्वारा अनेक प्रकार से किये गये अहर्गणानयन को देख कर वटेश्वराचार्य ने भी उन्हीं के मार्ग का अवलम्बन किया है । अर्वाचीन आचार्यो (भास्कराचार्य-कमलाकर आदि) के ग्रन्थों में अनेक प्रकार से साधित अहर्गणानयन देखने में नहीं आता है । यद्यपि लघ्वहर्गणानयन में स्थूलता है, तथापि एक अपूर्वं वस्तु का प्रतिपादन किया गया है। वटे श्वराचार्यकृत लघ्वहर्मणानयन भी स्थूलरूप में कहा गया है। इन आचायों के अतिरिक्त और किसी प्राचार्य के ग्रन्थ में लध्वहर्गणानयन के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं लिखा गया है। सिद्धान्त तत्व विवेक में कमलाकर ने भास्करोक्त लध्वहर्गणानयन में वार गणना का खण्डन किया है। स्फुटगत्यध्याय में आर्यभट-ब्रह्मगुप्त-लल्ल आदि आचायों ने वृत्त परिधि के चतु थांश (नवत्यंश) में दो सौ पच्चीस कलावृद्धि से चौबीस क्रमज्या और उत्क्रमज्याँ का साधन किया है। आर्यभट और लल्ल की त्रिज्या=३४३८, ब्रह्मगुप्त मत स्फुटगत्यध्याय में त्रिज्या ३२७०, इन सर्वोों से भिन्न श्रीपति की त्रिज्या=३४१५, ब्रह्मगुप्तोक्त भूपरिधि=५००० । ‘पादोन गोऽक्षधृतिभूमितयोजनानि' इन भास्करोक्ति से ग्रहों की योजनात्मक गति=११८५८॥४५, ‘गतियोजनतिथ्यंशः कुदलस्य ( ११ ) यतो मितिः’ से भूव्यांस=१५८१, भू परिधि=४९६७ । यही बात ‘प्रोक्तो योजनसंख्या कुपरिधिः सप्ताङ्गनन्दाब्धयस्तद्व्यासः कुभुजङ्गसायकभुवः’ से भास्कराचार्य ने कही है । भास्कराचार्य ने बहुत से स्थलों में ब्रह्मगुप्त के मत का ही अनुसरण किया है । परन्तु ब्रह्मगुप्तोक्त त्रिज्या से भिन्न त्रिज्या स्वीकार करने में उनका क्या अभिप्राय है सो नहीं कह सकते हैं । ब्रह्मगुप्तोक्त भुजान्तर कर्म के अनुसार ही सिद्धान्तशेखर और सिद्धान्त शिरोमणि में भी कहा गया है। इसके अतिरिक्त ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त के स्फुटगत्यध्याय में और भी अनेक विषय वणित हैं जो दर्शनीय और पढ़ने के योग्य हैं । त्रिप्रश्नाधिकार में रवि के मध्याह्न कालिक नतांश जान कर, उसके आधार पर रवि के आनयन के लिए पहले क्रान्तिज्या का ज्ञान होता है। तव त्रिप्रश्नाधिकार अनुपात से रवि के भुजांश का ज्ञान होता हैं । भुजांश से राश्यादि रवि का ज्ञान पदाधीन है। किसी भी प्राचीनाचार्य ने पदज्ञान के लिए विधि नहीं लिखी है । यहाँ प्राचार्य ने क्रान्तिव्यसार्धगुणा जिनभागज्याहृता धनुरजादौ कक्र्यादौ चक्राधत्प्रोह्य तुलादौ स चक्रार्धम् । चक्रार्धात् प्रोह्य मृगादौ स्फुटो सकृत् व्यस्तमृष्णं धन मध्यम् । अर्कोऽस्मात्’ इत्यादि से रवि का आनयन किया है । लेकिन यह सावित रवि किस पद का है इसके ज्ञान के लिए कोई युक्ति नहीं लिखी है। सिद्धान्तशेखर में श्रीपति ने ‘अजतुलादिगतस्य विवस्वतो दिनदल प्रभयोयुतिरधिता । भवति वैषुती निजदेशजेति से पलभा के मान का पता लगाकर आद्ये पदेऽपचयिनी पलभाऽल्पिका स्यात् छायाल्पिका भवति वृद्धिमती द्वितीये । छायादिका भवति वृद्धिमती ततीये तुर्ये पुनः क्षयवती तदनल्पिका च । वृद्धि प्रयान्ती यदि दक्षिणाग्रच्छाया तथापि प्रथमं पदं स्यात् । हासं ब्रजन्तीमथ तां विलोक्य रचेविजानीहि पदं द्वितीयम् ।। से गोल युक्ति िसद्ध पद का ज्ञान किया है यहाँ भास्कराचार्य ने कान्तिज्या त्रिज्याघ्नी जिनभागज्योद्धृता दोज्य । तद्धनुराद्ये चरणे वर्षस्यार्कः प्रजायतेऽन्येषु । भार्धाच्युतः सभाध भगणात्पतैितोऽब्द चरणानाम् । ऋतुचिह्नज्ञानं स्याहतु चिह्नान्यग्रतो वक्ष्ये । ( १२ ) से आचार्योक्तवत् ही कहा है। केवल ‘ऋतुवर्णनम्’ नामक एक अधिकार सिद्धान्त शिरोमणि के गोलाध्याय में लिखा है । भास्काराचार्य के पश्चवतीं और कमलाकर के पूर्व वतीं सब आचार्यो ने ऋतुवर्णन को ज्यौतिष सिद्धान्त का एक अङ्ग समझकर अपने अपने सिद्धान्तग्रन्थ में निशिचित रूप से ‘ऋतुवर्णनाध्याय' नाम देकर लिखा हैं । सिद्धान्त नत्व विवेक में—‘प्राद्ये पदेऽपचयिनी पलभाल्पिका स्यात्' इत्यादि श्रीपत्युक्त पदज्ञानबोधक श्लोकः द्वय को लिख कर कमलाकर ने ऋतुचिह्नरिदं पूर्वेरुक्त सर्वत्र तन्नहि । केवलं कूकविप्रीत्यै पदज्ञप्त्यै न तद्रवेः ।। से भास्करोक्त ऋतुवर्णन की निन्दा की है । वस्ततः कमलाकर का कथन ठीक है । भिन्न भिन्न देशों में ऋतु भिन्न भिन्न होती है; इसलिए ऋतुचिह्न से पदज्ञान ठीक नहीं हो सकता है। परन्तु-आद्य पदेऽपचयिनी पलभाल्पिका स्यात्' इत्यादि पदज्ञानबोधक पद्य ठीक सिद्धान्तशेखर में हैं। इसको कमला कर ने अपने नाम से लिखा है । जब तक सिद्धान्त शेखर उपलब्ध नहीं था, तब तक लोग यही समझते थे कि यह पदज्ञान प्रकार कमलाक रोक्त ही है। परन्तु अब वह बात नहीं रही । वस्तुत: यह प्रकार श्रीपत्युक्त ही है। कमला कर को अपनी रचना में यह मानना चाहिए था कि यह प्रकार श्रीपति कथित है । वास्तविक बात यह है कि प्राचीन आचार्य ने पदज्ञान के लिए कोई प्रकार नहीं लिखा है । इस स्थिति में श्रीपति ही इस प्रकार को लिखने के कारण ज्योतिषियों के प्रशंसापात्र हैं, यह बात अवश्य ही नि:सन्दिग्ध है। आश्चर्य की बात तो यह है कि झीपतिकृत गोलयुक्ति युक्त पद ज्ञान को छोड़कर भास्कराचार्य ने जो काव्यमय ऋतुवर्णन किया है वह बिल्कुल असंगत है । आचार्य ब्रह्मगुप्त ने चन्द्र ग्रहणाध्याय में रवि, चन्द्र औरपृथिवी का योजनबिम्ब, रवि और वन्द्र के योजनात्मक कर्ण का स्पष्टीकरण, भूभा बिम्बानयन, ग्रासभानाद्यानयन तथा परिलेख प्रकार लिखा है। श्रीपति और भास्कराचार्य चन्द्रग्रहणाध्याय ने भी कथनक्रम को लेकर विशेष रूप से वैसा ही अनुवाद किया है। ब्रह्मगुप्तकृत सम्पूर्ण सूर्यग्रहणाध्याय को श्रीपति ने प्राय: अपने श्लोकान्तरों द्वारा किया है, उदयास्तमयाध्याय में प्राचार्य ने आयन दृक्कमनियन किया है, परन्तु वह ठीक नहीं है । श्रीपति ने आयन दृक्कर्मानयन करके खनभोधृतिभिः समाहतं प्रथमं दृक्फलमायनाह्वयम् । द्युचराश्रितभोदयासुभिर्विहृतं स्पष्टमिह प्रजायते ॥ से उनका स्पष्टीकरण किया हैं। इसको देख कर भास्कराचार्य ने 'आयनं वलनम स्फुटेषुणा संगुणम्' इत्यादि से उसके अनुसार ही कहा है । चन्द्राध्याय में आचार्य ने अनेक विषयों का प्रतिपादन किया है । परन्तु श्रीपति ने केवल वराह ब्रह्मगुप्त तथा लल्लाचार्य के वहुत से श्लोकों का अनुवादमात्र ही किया है। अपनी ओर से कोई विशेष बात नहीं लिखी । केवल चन्द्र के स्पष्ट चरानयन में तथा परिलेख सूत्र प्रमाणानयन में बहुत ही प्रकारान्तर से प्रतिपादन किया है । आचार्ये वराह ब्रह्मगुप्त और लल्लाचार्य ने ग्रहयुत्यध्याय (ग्रहयुद्धाध्याय ग्रहयुत्यध्याय या ग्रहयोगाध्याय) में उदयान्तर कार्य के बिषय में कुछ भी नहीं कहा है । परन्तु ( १३ ) अन्त्यभ्रमेण गुणिता रविबाहुजीवाऽभीष्टभ्रमेण विहृता फलकार्मुकेण । बाहोः कलासु रहिता रहितास्ववशेषकं ते यातासवो युगयुजोः पदयोर्धनर्णम् ।। तथा के द्वारा श्रीपत्युक्त दृग्गणितैक्यकारक कर्म ही को भास्कराचार्य ने 'उदयान्तर कर्म' नाम से कहा है । जब तक सिद्धान्तशेखर उपलब्ध नहीं था तब तक आधुनिक गणकों को यही विश्वास था कि यह उदयान्तरकर्म सर्वप्रथम भास्कराचार्य ने ही लिखा है।. परन्तु इस उदयान्तर को दृष्टि में रख कर सर्व प्रथम श्रीपति ने ही अपने विचार व्यक्त किये थे । त्रिभविरहितचन्द्रोच्चेन भास्वद् भुजज्या गगननपविनिघ्नी भत्रयज्याविभक्ता । भवति चर फलाख्यं तत् पृथक्स्थं शरघ्नं हृतमुडुपतिकर्णत्रिज्ययोरन्तरेण ॥१॥ परमफलमवाप्तं तद्धनर्ण पृथक्रस्थे तुहिनकिरणकरणे त्रिज्यकोनाधिकेऽथ । स्फुटदिनकर हीनादिन्दुतो या भुजज्या स्फुट परमफलघ्नी भाजिता त्रिज्ययाऽऽप्तम् ।।२॥ शशिनि चरफलाख्यं सूर्यहीनेन्दुगोलात् तदृणमुत धनं चेन्दूच्चहीनार्क गोलम् । यदि भवति हि साम्यं व्यस्तमेतद्विधेयं स्फुटगणितदृगैक्य कत्तुमिच्छभिरत्र ।॥३॥ इन तीनों श्लोकों के द्वारा श्रीपति ने द्वग्गणितैक्य के लिए चन्द्र में संस्कार विशेष को कहा है । किसी भी प्राचीन ग्रन्थ में यह संस्कार नहीं लिखा है । यद्यपि इन्दूच्चोनार्ककोटिघ्ना गत्यंशा विभचा विधोः । गुणो व्यर्केन्दुदोः कोटयोरूप पञ्चाप्तयोः क्रमात् ।। फले शशाङ्कतद्गत्योलिप्ताद्य स्वर्णयोर्वधे । ऋणं चन्द्र धतं भुक्तौ स्वर्णसाम्यवधेऽन्यथा ।। के द्वारा इसी प्रकार (श्रीपत्युक्त चन्द्रसंस्कार की भांति) के चन्द्रसंस्कार का उल्लेख ‘लघुमानस' नामक करण ग्रन्थ में मुञ्जालाचार्य ने किया है। परन्तु इन दोनों में सादृश्या भाव के कारण, श्रीपति ने वेधद्वारा देख कर उस (लघुमानसोक्त ) से भिन्न कहा है, ऐसा ज्ञात होता है। भास्कराचार्य ने इस श्रीपत्युक्त संस्कार को बार-बार देख कर विचार करने से उपलब्ध ज्ञान के विस्तार पूर्वक प्रतिपादन के लिए सिद्धान्त शिरोमणि ग्रन्थ की रचना की । इस रचना के एक वर्ष पश्चात् ५९ श्लोकों का ‘बीजोपनय ' नामक ग्रन्थ सिद्धान्त शिरोमणि की भांति ‘वासना भाष्य' सहित बनाया । जैसा कि निम्नोक्ति मे सिद्ध है ( १४ ) मयाथ बीजोपनये यदन्ते सूर्योक्तमाद्य परमं रहस्यम् । प्रकाशये गोप्यमपीह देवं प्रणम्य बीजं जगतां हितार्थम् ॥१॥ यद्यपि पूर्वमपीदं संक्षेपादुक्तमागमोक्तदिशा । नैतावतैव कश्चित् दृङ्करणैक्याय कल्पते गणक ॥२॥ इकूरणैक्यविहीनाः खेटाः स्थूला न कर्मणामहः । अत इह तदर्हतायै तात्कालिकबीजविस्तरं वक्ष्ये ॥३॥ पाता रवेस्तामसकीलकाख्यास्तेषां समाकर्षणतः शशाङ्कः । तत्तुङ्गशक्तिश्च निजस्वभावं विहाय नित्यं विषमत्वमेति ॥४॥ चद्राच्च तद्योगवियोगतश्च साध्यं हि भाद्य विषमं यतः स्यात् । तस्माद्विधोरत्र विशुद्धिशुद्धघ विस्तार्यते बीजफलक्रियेयम् ॥५॥ एकेन पुसा निखिलग्रहाणामन्तं प्रबोधो न हि शक्यतेऽतः । व्यासात्समासाच्च यथोपलब्धं प्रोक्त भयेत्यादरणीय मेतत् ॥६॥ भग्रहयोगाध्याय 1 । भग्रहृयोगाध्याय में कृत्वापि दृष्टिकर्म श्रीषेणार्यभटविष्णुचन्द्रोक्तम् । प्रतिदिनमुदयेऽस्ते वा न भवति दृग्गणितयोरैक्यम् ॥१॥ भमुनिमृगव्याधानां यतस्ततो दृष्टिकर्म वक्ष्यामि । दृग्गणितसमं देयं शिष्याय विरोषितायेदम् ॥२॥ ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त के उत्तरार्ध में-परिकर्म विंशति (सङ्कलित, व्यवकलित, गुग्न, भागहार, वर्ग, वर्गभूल, पञ्चजाति, त्रैराशिक, व्यस्तत्रराशिक, सप्तराशिक, नवराशिक, एकादशराशिक, भाण्डप्रतिभाण्ड (अदला बदली)-आदि ब्राह्मस्फुटसिद्धांत का विषयों का उल्लेख है । प्रत्येक स्थान में चतुर्वेदचार्योक्त उदाहरण हैं। सिद्धान्त शेखर में भी परिकर्म विशति (भिन्नाङ्कों के छः गुणन, भजन, वर्ग, वर्गमूल, धन तथा घनमूल; भिन्नाङ्कों के योग, अन्तर, गुणन, भजन, वर्ग, वर्गमूल छ:; भाग, प्रभाग, भागानुबंध, भागापवाह जातिचतुष्टय; विलोमकर्म, त्रराशिक, व्यस्तत्रराशिक और उत्तर ( १५ ) पञ्चराशिक) । ब्रह्मगुप्त और श्रीपति के बीस कर्मो के विषय वर्णन में बहुत भेद है । उन बीस परिकमों के नामों में भी बहुधा भिन्नता है । भास्कर द्वारा प्रकीर्ण विषय (योगान्तर से लेकर भाण्ड प्रतिभाण्ड पर्यन्त) जिस स्पष्टता के साथ प्रतिपादित हैं। वैसी स्पष्टता ब्रह्मगुप्त और श्रीपति द्वारा प्रतिपादित परिकर्म विशति में नहीं पाई जाती । जहां तक विषयों का सम्बन्ध है वहां तक तीनों आचार्य-ब्रह्मगुप्त, श्रीपति तथा भास्कर समान हैं। केवल विषयों के प्रतिपादन की रीति में भिन्नता है। इसके अतिरिक्त मिश्रक व्यवहार, श्रेढी व्यवहार, क्षेत्र व्यवहार, खात व्यवहार , चितिव्यवहार, क्राकचिक व्यवहार राशिव्यवहार, और छाया व्यवहार ये आठ व्यवहार ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त, सिद्धान्त शेखर तथा भास्करीय लीलावती में वर्णित हैं । इन आठों व्यवहारों के प्रतिपादन में असादृश्य पाया जाता है। इन' व्यवहारों में से ब्रह्मगुप्त और श्रीपति की अपेक्षा भास्कर ने अधिक विषयों का प्रतिपादन किया है, और अपेक्षा कृत अधिक स्पष्टता के साथ । यह बात उक्त तीनों को देखने से स्फुट हो जाती है । इसके पश्चात् प्रश्नाध्याय में मध्यमगत्युत्तराध्याय, स्पष्टगत्युत्तराध्याय, त्रिप्रश्नो त्तराध्याय, ग्रहणोत्तराध्याय, शृगोन्नत्युत्तराध्याय-इन पांचवीं उत्तराध्यायों में सोत्तर प्रश्न समूह का समावेश है । प्रश्न सभी विलक्षण हैं। इनके अभ्यास से पाठक लोग ज्यौतिष के सिद्धान्त ग्रन्थों में प्रतिशय निपुण हो सकते हैं । ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त के प्रत्येक अध्याय में प्रदर्शित इस प्रकार के सोत्तर प्रश्नक्रम का लेखै कुछ-कुछ सिद्धान्त शेखर और बटेश्वर सिद्धान्त में भी दृष्टिगोचर होता है । सिद्धान्त शिरोमणि आदि ग्रन्थों में यह क्रम नहीं है । ब्रह्मगुप्तोक्त कुट्टाकाराध्याय में बहुत से ऐसे प्रश्न हैं जिनके उत्तरों से चित्त प्रसन्न हो जाता हैं। श्रीपति और भास्कर की अपेक्षा ब्रह्मगुप्त ने कुट्टाध्याय में अधिक विषयों का समावेश किया है । किन्तु विषय के प्रतिपादन की स्फुटता भास्करोक्ति में ही है। धन ऋण आदि के सङ्कलित व्यवकलितादि विषय भास्करोक्ति के सदृश ही ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त और सिद्धान्त शेखर में भी विद्यमान हैं। उसके पश्चात् एक समीकरण बीज है। यह भास्करोक्त एक वर्ण समीकरण बीज की अपेक्षा छोटा है । तत्पश्चात् ब्रह्मगुप्तोक्त अनेक वर्ण समीकरण बीज है । यह बहुत ही विलक्षण है। इसमें विषय भी बहुत अधिक है। भास्करोक्त अनेकवर्ण समीकरण बीज में भी बहुत विषय हैं । परन्तु सिद्धान्तशेखर में बहुत कम विषयों का उल्लेख है। ब्रह्मगुप्त की अपेक्षा भास्कर ने भावितबीज का अपने ग्रन्थ में अधिक समावेश किया है परन्तु श्रीपति ने कुछ कम । तो भी इन सवके विषयों में कोई विशेष अन्तर नहीं है, केवल भास्करोक्ति में अधिक वैशद्य है। इसके पश्चात् वर्ग प्रकृनि का वर्णन है, यहाँ ब्रह्मगुप्त ते कनिष्ठ, ज्येष्ठ और क्षेप की योग भावना और अन्तरभवना का प्रतिपादन किया है । सिद्धान्तशेखर में श्रीपति ने तथा भास्कराचार्य ने अपने बीजगणित में यहीं से लैकर केवल श्लोकान्तरों में रख दिया ( १६ ) है। गणित क्रिया एक ही हैं। श्रीपति ने भावना का स्वरूप नहीं कहा है। वर्गात्मक प्रकृनि में कनिष्ट और ज्येष्ठ के आनयन को ब्रह्मगुप्त ही से लेकर भास्कराचार्य ने अपने बीज गणित में ‘इष्टभक्तो द्विधाक्षेप इष्टोनाढयो दलीकृत:’ आदि श्लोकों द्वारा कहा है । परन्तु श्रीपति ने इसके विषय में कुछ भी नहीं लिखा है । ब्रह्मगुप्तोक्त ‘शङ्कुच्छायादि ज्ञानाध्याय अपूर्व है। इस अध्याय में जो विषय प्रतिपादित है वह सिद्धान्त शेखर और भास्करीय सिद्धान्तशिरोमणि में नहीं है। वस्तुतः यह अध्याय दर्शनीय और पठनीय है । छन्दश्चिन्यु त्तराध्याय ऐसा विचित्र है; कि इसमें लिखित श्लोकों की उपपत्ति की बात तो अलग रही उनकी तो साधारण व्याख्या भी अभी तक किसी ने नहीं की। गोलाध्याय में भूगोन्न संस्थान, देवासुरसंथान, चक्रभ्रमणव्यवस्था देवादिकों की रविभ्रमण स्थिति, देों और दैत्यों का राशि संस्थान, देवादिकों का रवि दर्शन काल, भूगोल में लङ्का और अवन्ती का स्थान, आदि आदि विषय वणित हैं । भूपरिधि तुर्यभागे लङ्का भूमस्तकात् क्षितितलाच्च । लङ्कोत्तरतोऽवन्ती भूपरिधेः पञ्चदश भागे ।। . के द्वारा लङ्का से भूपरिधि के पञ्चदशांश पर अवन्ती की स्थिति को आचार्य ने बतलाया हैं । परन्तु आचार्य के अनुयायी भास्कराचार्य ने सिद्धान्त शिरोमणि के गोलाध्याय में ‘निरक्षदेशात् क्षितिषोडशांशे भवेदवंतीं गणितेन यस्मात्' कहा है । चतुर्वेदाचार्य सम्मन पाठ ‘पञ्चदशभागे' ही है । सिद्धान्त शेखर में ‘सत्र्यंशरामाग्निगुणैरवन्त्याः स्याद्योजनैर्द क्षिणतो हि लङ्का' कहा गया है । श्रीपति के मत से उज्जयिनी (अवन्ती) का अक्षांश= २४° तथा भूपरिधिमान = ५००० है, अत: ३३३ एतत्तुल्य लङ्का और १५ अवन्ती के मध्य में योजनात्मक दूरी हुई । यहां भूपरिधेरष्टयशेऽवन्ती स्यात् सौम्यदिग्भागे' लल्ल की इस उक्ति से तथा भास्कर की पूर्वोक्ति से उज्जयिनी का अक्षांश =२२।३०' है, वराहमिहिराचार्य के मत से अक्षांश परमक्रान्त्यंश के बराबर = २४ है । पञ्च सिद्धान्तिका में प्रोद्यद्रविरमराणां भ्रमत्यजादौ कुवृत्तगः सव्यम् । उपरिष्टाल्लङ्कायां प्रतिलोमश्चामरारीणाम् ।। मिथुनान्ते च कुवृत्तादंश चतुर्विशतिं विहायोच्चैः । भ्रमति हि रविरमराणां समोपरिष्टात्तदाऽवन्त्याम् ।। श्रीपति के मत से अवन्ती का अक्षांश =२४, इसके आधार पर योजमान = ३३३३ योजना होता है। आचार्योक्त के अनुसार ही श्रीपति के मत से भी लङ्का, उज्जयिनी के दक्षिण में परिधि के पञ्चदशांश पर स्थित है । लल्लाचार्य और भास्कराचाय के मत से लङ्का, अवन्ती के दक्षिण में भूपरिधि के षोडशांश पर स्थित सिद्ध होती है। इस अध्याय के बहुत से विषय सूर्यासिद्धान्त के गोलाध्याय में वणित विषयों के सदृश ही हैं। बीच बीच में दोनों ब्राह्मस्फुटीय गोल अध्याय तथा सूर्य सिद्धान्तीय भूगोलाध्याय में कुछ विषायान्तर भी है। सिद्धान्त शेखर के गोलाघ्याम में श्रीपति ने भी कितने ही विषय आचार्योक्त विषयों के सदृश ही कहे हैं। ‘यन्मूलं तद्व्यासो मण्डललिताकृतेर्दशहृतायाः द्वारा श्रीपति ने भी ‘व्यासः स्यात् परिधेर्वर्गाद् दिग्भक्ताच्च पदंत्विह प्रकार के अनुकूल ३४१५ त्रिज्या स्वीकार की है । भास्कराचार्य ने ‘व्यासे भनन्दाग्निहते विभक्त खवा सूर्यः” के द्वारा परिध्यानयन का विस्तार से प्रतिपादन किया है। इसके विलोम द्वारा परिधि से व्यासानयन होता है। परन्तु व्यास से परिध्यानयन या परिधि से व्यासानयन किसी का भी ठीक नहीं है। क्योंकि व्यास और परिधि का सम्बन्ध स्थिर नहीं है । ज्या प्रकरण में जैसे चापार्धांशज्या आदि का आनयन आचार्य ने किया है वैसे ही सिद्धान्त शेखर में और सिद्धान्त शिरोमणि के गोलाध्याय में किया गया है। ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त में चापार्धांशज्यानयनप्रकार ( १७ ) सिद्धान्तशेखर में तुल्यक्रमोत्क्रमज्यासमखण्डक वर्ग युति चतुर्भागम् । व्यासार्धवर्गतस्तत्पदे प्रथमम् ।। तद्दलखण्डानि तदूनजिनसमानि द्वितीयमुत्पत्तौ । कृतयमलैक दिगीशेषु सप्तरसगुणनवादीनाम् । उत्क्रमक्रमसमानसमज्या खण्डवर्गयुतिवेदविभागम् । व्यासखण्डकृतितस्तमनष्टं शोधयेदथ पदे भवतो ये ।। सिद्धान्तशिरोमणि में श्राद्यमूलमिह तद्दलसंख्यं तद्विहीन जिनसम्मितमन्यत् । ज्यार्धमेवमपराणि समेभ्यो ज्यादलानि न भवन्त्यसमेम्यः ॥ क्रमोत्क्रमज्या कृतियोगमूलाद्दलं तदर्धाशकशिञ्जिनी स्यात् । इस प्रकार प्रकारान्तर से भी चापाधfज्यानयन प्रकार तीनों ग्रन्थों (ब्राह्मस्फुट तसिद्धान्त-सिद्धान्तशेखर-सिद्धान्तशिरोमणि ) में समान ही है। भास्करीय अन्त्यज्योत्पत्ति में अनेक विषयों का विशिष्ट प्रतिपादन देखने में प्राता है । मन्द फल साधन में भी कणनुपात से जो फल होता है वही स्फुटगतिवासना समीचीन होता है, तब कर्णानुपात न करने का कारण क्या है ? यह बात अधोलिखित उक्ति से प्रकट होती है त्रिज्याभक्तः परिधिः कर्णगुणो बाहुकोटिगुणकारः । असकृन्मान्दे तत्फलमाद्यसमं नात्र करणोंऽस्मात् ।। सिद्धान्त शेखर में ( १८ ) त्रिज्याहृतः श्रुतिगुणः परिधिर्यतो दोः कोटयोगुणीमृदुफलानयनेऽसकृत्स्यात् । स्यान्मन्दमाद्यसममेव फलं ततश्च कर्णः कृतो न मृदुकर्मणि तन्त्रकारैः ।। यह श्रीपत्युक्त श्लोक आचार्योक्त श्लोक का ही अनुवाद है । भास्कराचार्य ने भी स्वल्पान्तरत्वान्मृदुकर्मणीह कर्णः कृतो नेति वदन्ति केचित् । त्रिज्योद्धृतः कर्णगुणः कृतेऽपि करणे स्फुटः स्यात्परिधिर्यतोऽत्र । तेनाद्यतुल्यं फलमेति तस्मात् कर्णः कृतो नेति च केचिदूचुः । नाशङ्कनीयं न चले किमित्थं यतो विचित्रा फल वासनाऽत्र । यहाँ कर्ण से जो फल आता है वही समीचीन है । मन्द कर्म में स्वल्पान्तर से करण नुपात नहीं किया गया है, यह कहते हैं मन्दकर्म में मन्दकर्ण तुल्य व्यासार्ध से जो वृत्त होता वह कक्षावृत्त है। जो पाठ पठित मन्द परिधि है वह त्रिज्या परिणत है। अत: उसको कर्ण व्यासार्ध में परिणामन करते हैं, यदि त्रिज्यावृत्त में यह पाठ पठित परिधि पाते हैं, तो कर्णवृत्त में क्या इससे स्फुट परिधि होती है। ‘तत्र स्वेनाहते परिधिना भुजकोटिजीवे' इत्यादि से जो फल होता है उसको त्रिज्या से गुणा कर कर्ण से भाग देने जो उपलब्ध होता है तो वह पूर्व फल के तुल्य ही होता है। यह आचार्य ब्रह्मगुप्त का मत है । यदि इस कणनुपात से परिधि की स्फुटता होती है तो शीघ्रकर्म में क्यों नहीं किया जाता है ? यहाँ चतुर्वेदाचार्य कहते हैं कि ब्रह्मगुप्त ने औरों को ठगने के लिग ऐसा कहा है, परन्तु यह ठीक नहीं है। शीन्नकर्म में क्यों नहीं किया जाता, यह आशंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि फल की उपपत्ति विचित्र है । छादक का निर्णय करके राहुकृत ग्रहण नहीं होता हैं । यह आचार्य ने प्रथम वराह मिहिरादिकों के मत का प्रतिपादन किया फिर संहितामत ग्रहणवासना का अवलम्बन कर, उस (वराहमिहिरादिक) मत का निराकरण किया है । राहुकृतं ग्रहणद्वयमागोपालाङ्गनादिसिद्धमिदम् । बहुफलमिदमपि सिद्धं जपहोमस्नानफलमत्र । इसे लोक प्रथा बताकर राहुकृत ग्रहण के समर्थन में आचार्य ने वेद और स्मृति के बाक्यों का उल्लेख किया है । युक्ति से राहुकृत ग्रहण सिद्ध नहीं होता है, परन्तु वेदों में, ( १९ ) स्मृतियों में और युराणों में राहुकृत ग्रहण का प्रतिपादन विद्यमान है। अत: दोनों मतों का समन्वय करते हुए प्राचार्य ने कहा है राहुस्तच्छादयति प्रविशति यच्छुक्लपञ्चदश्यन्ते । भूछाया तमसीन्दोर्वरप्रदानात् कमलयोनेः । चन्द्रोऽम्बुमयोऽधःस्थो यदग्निमयभास्करस्य मासान्ते । छादयति शमिततापो राहुश्छादयति तत् सवितुः । सिद्धान्तशिरोमणि के गोलाध्याय में भी अधोलिखित भास्करोक्ति दिग्देशकालावरणादि भेदान्न छादको राहुरिति ब्रवन्ति । यन्मानिनः केवलगोलविद्यास्तत्संहिता वेदपुराणबाह्यम् । राहुः कुभामण्डलगः शशाङ्क शशाङ्कगश्छादयतीव बिम्बम् । शम्भुवरप्रदानात् न् । से समन्वय किया गया है। सिद्धान्तशेखर में राहुकृत ग्रहण के खण्डनार्थ ‘राहुनिरा करणाध्याय' नाम का एक अध्याय रक्खा गया है । इसमें श्रीपति ने भी निम्नलिखित श्लोकों ने समन्वय क्रिया है विष्णुलूनशिरसः किल पङ्गोर्दत्तवान् वरमिमं परमेष्ठी । होमदानविधिना तवतृप्तिस्तिग्मशीतमहसोरुपरागे ।। भूमेश्छायां प्रविष्टः स्थगयति शशिनं शुक्लपक्षावसाने । राहुब्रह्मप्रसादात् समधिगतवरस्ततमो व्यासतुल्यः । ऊध्र्वस्थं भानुबिम्बं सलिलमयतनोरप्यधोवति बिम्बम् । संसृत्यैवं च मासव्युपरतिसमये स्वस्य साहित्यहेतोः ।। गोलबन्धाधिकार में मह दृवृत्तों (पूर्वापरवृत्त, याम्योत्तरवृत्त, क्षितिजवृत्त आदि) की रचना तथा लघुवृत्तों (मेषादिक द्वादश राशियों के अहोरात्रवृत्त) की रचना करके परमलम्वन-नति का स्वरूप प्रतिपादन कर प्राचार्य ने टङ्कर्म का प्रानयन किया गोलाध्याय है । ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त में प्राचार्य ने जैसे गोलबन्ध कहा है वैसे ही सिद्धान्त शेखर में श्रीपति और सिद्धान्त शिरोमणि के गोलाध्याय में भास्कराचार्य ने कहा है । ग्रहगोल और नक्षत्रगील में पांच स्थिरवृत्त (पूर्वोपरवृत्त, क्षितिजवृत्त, याम्योत्तरवृत्त,उन्मण्डल, विषुवद्वृत्त) कहे हैं। ये सब कक्षा मण्डल के बराबर हैं । तथा ग्रहों के चलवृत्त मन्दनीचोच्छवृत्त-=७, भौमादि ग्रहों के शीघ्र नीचोच्चवृत्त=५ । मन्दप्रतिवृत्त =७ , शीघ्रप्रतिवृत्त=५ । सात ग्रहों के दृग्मण्डल दृकक्षेप मण्डल, कक्षामण्डल=२१ चन्द्रादि ग्रहों के विमण्डल= ६, सबों का योग ५१ एकावन् चलवृत्तों की संख्या है। सिद्धान्तशेखर में भी ऐसा ही है मन्दोचनीचवलयानि भवन्ति सप्तशैघ्रयाणि, पञ्च च तथा प्रतिमण्डलानि । दृक्क्षेप दृष्टयपमजानि च खेचराणामर्क विनैव खलु पट् च विमण्डलानि । पञ्चाशदेकसहितानि च मण्डलानि पूर्वापरं वलयमुत्तरदक्षिग्गं च । क्ष्माजं तथा विषुवदुद्वलयाभिधाने पञ्चस्थिराणि कथितान्युडुखेचराग्गाम् ।। यन्त्राध्यायः ( २० ) सप्तदश कालयन्त्राण्यतो धनुस्तुर्यगोलक चक्रम् । यष्टिः शङ्कुर्घटिका कपालक कर्तरी पीठम् ।। सलिलं भ्रमोऽवलम्बः कर्णश्छायादिनार्धमकॉऽक्षः । नतकालज्ञानार्थ तेषां संसाधनान्यष्टौ ।। इससे घनुर्यन्त्र, तुरीयूयन्त्र, चक्रयन्त्र, यष्टियन्त्र, शङ्कुयन्त्र, घटी यन्त्र, कपालयन्त्र, कर्तरीयन्त्र, पीटसंज्ञक (प लक) यन्त्र, सलिल (जल), भ्रम (शाण), अवलम्बसूत्र, छाया कर्ण, शङ्कुछाया, दिनार्धमान, सूर्य, श्र क्षर (अक्षांश), ये नतकाल के लिए सत्रह काल यन्त्र हैं । इन यन्त्रों में सलिल आदि आठ यन्त्र रचना के उपकरण हैं ! सिद्धान्त शेखर में गोलश्चक्रे कार्मुकं कर्तरी च कालज्ञाने यन्त्रमन्यत्कपालम् । पीठं शङ्कुः स्याद्घटी यष्टिसंज्ञ गन्त्री यन्त्राण्यत्र दिक्संमितानि । इससे गोलयन्त्र, चक्रयन्त्र, धनुर्यन्त्र, कर्तरी नामक यन्त्र, कपालयन्त्र, पीठ (फलक) यन्त्र, शङ्कुनामक यन्त्र, घटी नामक-यन्त्र, यष्टियन्त्र, गन्त्री (शकट) ये श्रीपति द्वारा वणित दस यन्त्र हैं। शिष्यधीवृद्धिदतन्त्र में अधो लिखित बारह यन्त्रों का उल्लेख है गोलो भगणश्चक्र धनुर्घटी शङ्कुशकटकत्र्तर्यः । पीठकपालशलाका द्वादशयन्त्राणि सहयष्टंया । कर्णश्छाया द्युदलं रविरक्षो लम्बको भ्रमः सलिलम् । स्युर्यन्त्रसाधनानि प्रज्ञा च समुद्यमाश्चैवम् ।। भास्कराचार्य ने गोलाध्याय में केवल दस यन्त्र कहे हैं गोलो नाडीवलयं यष्टिः शङ्कुर्घटीचक्रम् । चापं तुर्यं फलकं धीरेकं पारमार्थिक यन्त्रम् । सूर्य सिद्धान्त में अधो लिखित यन्त्र विवरण है मानाध्याय ( २१ ) तुङ्गबीजसमायुक्तं गोलयन्त्रं प्रसाधयेत् । गोप्यमेतत्प्रकाशोक्तं सर्वगम्यं भवेदिह ।। कालसंसाधनार्थाय तथा यन्त्राणि साधयत् । एकाकी योजयेद्बीजं यन्त्रे विस्मय कारिणि । शङ कुयष्टि धनुश्चकैश्छायायन्त्रैरनेकधा । गुरुपदेशाद्विज्ञेयं कालज्ञानमतन्द्रितै तोययन्त्रकपालाचैर्मयूरनरवानरै ससूत्ररेणुगभैश्च सम्यक्कालं प्रसाधयेत् ।। परदाराम्बुसूत्राणि शुल्वतैलजलानि च । बीजानि पांसवस्तेषु प्रयोगास्तेऽपि दुर्लभाः ।। ताम्रपात्रमधाश्छद्र ' न्यस्त कुण्डऽमलाम्भास । षष्टिर्मज्जत्यहोरात्रे स्फुटं यन्त्र' कपालकम् ।। नरयन्त्र' तथा साधु दिवा च विमले रवौ । छाया ससाधनः प्रोक्तं कालसाधनमुत्तमम् । मानानि सौरचान्द्राक्षसावनानि ग्रहानयनमेभिः । मानैः पृथक् चतुर्भिः संव्यवहारोऽत्र लोकस्य । इससे सौरमान, चान्द्रमान, नाक्षत्रमान और सावनमान, ये चार प्रकार के मान कहे गये हैं। इन्हीं चारों मानों से लोगों के सब व्यवहार होते हैं। किस किस मान से कौन कौन पदार्थ ग्रहण किये जाते हैं यह सब प्रति पादित है। ब्राह्म, दिव्य, पित्र्य, श्राजापत्य बार्हस्पत्य, सौर, सावन, चान्द्र, नाक्षत्र ये नौ मान हैं। इन मानों में से मनुष्यलोक में केवल सौर, चान्द्र, सावन और नाक्षत्र इन चार मानों की ही प्रधानता है । क्योंकि इन्हीं मानों से मनुष्यों के सब व्यवहार सम्पन्न होते हैं। सूर्यसिद्धान्त, सिद्धान्तशेखर, सिद्धान्त शिरोमणि आदि सब ग्रन्थों में मानों के विषय में समान रूप से कहा गया है। ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त के इस अध्याय में भूभादैध्र्य के भी साधन है । संज्ञाध्याय में संज्ञा कहने के कारण दशयेि हैं । सिद्धान्त इसका एक ही है । किस अंश में सूर्यसिद्धान्तादि भिन्न हैं। इसका प्रतिपादन कर आचार्य ने अपने सिद्धान्त के उत्तरार्ध में अनुक्रमणिका कही है । सूर्यसिद्धान्त, सिद्धान्तशेखर आदि संज्ञाध्याय अन्य सिद्धान्तग्रन्थों में संज्ञाध्याय नहीं हैं वस्तुतः इसकी आवश्यकता भी नहीं है । अध्याय के उपसंहार से पूर्व एक विशेष प्रश्न ( २२ ) आग्नेये नैऋत्ये वेष्टदिने संस्थितस्य योऽर्कस्य । शङ्कुच्छाये कथयति वर्षादपि वेत्ति सूर्य सः ।। रक्खा हुआ है । इसका उत्तर कोणशङ्कु के आनयन से स्फुट है । ध्यान ग्रहोपदेशाध्याय-मूल ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त का अंग नहीं है। ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त तो चौबीसवें (संज्ञाध्याय) अध्याय पर समाप्त हो जाता ध्यानग्रहोपदेशाध्यात्र है। ध्यान ग्रहोपदेशाध्याय भी ब्रह्मगुप्त की ही एक कृति हैं । अतः परिशिष्ट के रूप इसे यहाँ संलग्न कर दिया गया है। इसके चैत्रादि में मासगणानयन, चैत्रादि में दिनादिक, तिथिाध्रुवसाधन, इद्रमासादि में रवि के आनयन प्रकार, प्रतिमास में चन्द्रकेन्द्र, तिधि घ्रवक्षेप के आनयन का प्रतिपादन है । प्रतिदिन चालन, चन्द्रसाधन, औदयिक रविसाधन, ज्याखण्ड तथा केन्द्रज्या साधन का वर्णन है त्रिंशत्सनवरसेन्दुजिनतिधिविषयागृहार्धचापानाम् । अर्धज्याखण्डानि ज्याभुक्तैक्यं स गतभोग्यखण्डकान्तर दलविकलवधाच्छतैर्नवभिराप्तैः । तद्युतिदलं युतोन भोग्यादूनाधिकं भोग्यम् । यह प्राचार्योक्त भोग्यखण्ड स्पष्टीकरण है। भास्कराचार्य ने इसी को सिद्धान्तशिरो मणि के स्पष्टाधिकार में “यातैष्ययोः खण्डकयोविशेषः शेषांशनिघ्नः' इत्यादि द्वारा लिग्वा है । भास्कराचार्य ने १२० त्रिज्या ग्रहण की हैं । यहाँ आचार्य ब्रह्मगुप्त ने १५० त्रिज्या ग्रहण को हैं । यहाँ यह बात बड़ी चित्रित्र लगती है कि प्राचार्योक्त विषयों को ही सिद्धान्त शेखर में श्रीपति ने सर्वत्र श्लोकान्तरों में लिखा है, परन्तु पता नहीं क्यों उन्होंने आचार्योक्त इस अपूर्व भोग्य खण्ड स्पष्टीकरण की चर्चा तक नहीं की । चन्द्र में भुजफल संस्कार, तिथि फलसंस्कार आदि सभी विषय विलक्षण है। प्राचार्य ने इस अध्याय में जो विषय लिख दिये हैं, सूर्यसिद्धान्त-सिद्धान्तशेखर-तथा सिद्धान्त शिरोमणि में वे नही हैं । ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त में जिन आचार्यो के नाम आये हैं। उनके सम्बन्ध में कुछ विचार करते हैं। सव सिद्धान्तों में आदिम या सबसे प्राचीन सिद्धान्त ब्रह्मसिद्धान्त ही है । इसी को लोग पितामह सिद्धान्त के नाम से भी कहते हैं । पञ्चसिद्धान्त में वराहमिहिर ने का बारहवें अध्याय को जिसमें केवल पांच आर्याएँ हैं, पैतामह सिद्धान्त के नाम से पुकारते हैं, रविशशिनोः पञ्चयुग वर्षाणि पितामहोपदिष्टानि । अधिमासस्त्रिशदुभिर्मासैरवमस्त्रिषष्टयाऽलुम् ॥१॥ ( २३ ) द्वयन शकेन्द्रकालं पञ्चभिरुद्धृत्य शेषवर्षाणाम् । द्विगुणमाद्यसिताद्य कुर्याद् द्युगणं तदह्वयुदयात् ॥२॥ सैकषष्टय'शे गणे तिथिर्भमार्क नवाहतेऽक्ष्यकैः । दिग्रसभागैः सप्तभिरूनं शशिभ धनिष्ठाद्यम् ॥३॥ द्वयग्निनगेषत्तरतः स्वमितमेष्यदिनमपि याम्यायनस्य । द्विघ्नं शशिरसभक्त द्वादशहीनं दिनसमानम् ॥५॥ इसके अनुसार एक युग में सौर वर्ष=५, सौरमाह ५X १२=६०, अधिमास =२, चान्द्रमास ='६२, इसे तीस से गुणा करते से तिथि= १८६०, अवम=३०, तिथियों में से इसे घटाने पर अहर्गण=१८३० ॥ आचार्य वराहमिहिर विक्रमादित्य के प्रसिद्ध नव रत्नों में से एक थे । इनके द्वारा बने ग्रन्थ ‘लघुजातक, बृहज्जातक, विवाहपटल, बृहद्योगयात्रा, बृहत्संहिसा, समास संहिता और पञ्चसिद्धान्तिका है । पौलिश सिद्धान्त, रोमक सिद्धान्त, वासिष्ठ सिद्धान्त, सौर (सूर्य) सिद्धान्त, और पैतामह सिद्धान्त, इन पाञ्च सिद्धान्तों के सार का संकलन रूप ‘पञ्चसिद्धान्तिका' है । इस ग्रन्थ को को वराहमिहिराचार्य ‘ताराग्रह कारिका तन्त्र' के नाम से पुकारते हैं। इस ग्रन्थ (पञ्चसिद्धान्तका) में ‘पौलिश सिद्धान्त'नाम का एक अध्याय है। पौलिश सिद्धान्त के रचयिता के सम्बन्ध में बहुत मतमतान्तर हैं । वराहोक्त पौलिशसिद्धान्त में यवनपुर से उज्जयिनी का और वाराणसी का देशान्तर उल्लिखित है, जैसे यवनाचरजा नाडयः सप्तावन्त्यां त्रिभागसंमिश्राः । वाराणस्यां त्रिकृतिः साधनमन्यत्र वक्ष्यामि । शाकल्य सैहितोक्त ब्रह्मसिद्धान्त में पौलिश सिद्धान्त का उल्लेख तथा पुलिशाचार्य के उज्जयिनी रोहीतक कुरुयमुना हिमनिवासमेरूणाम् । देशान्तरं न कार्य तल्लेखामध्यसंस्थदेशेषु । आदि विचार से ‘पौलिश सिद्धान्त' सर्वमान्य था । परन्तु यह सिद्धान्त अभी उप लब्ध नहीं है । सूर्य सिद्धान्त ही प्राचीनतम सिद्धान्त ग्रन्थ है, यह बहुत विद्वानों का मत है ।

  • प्रागधे पर्व यदा तदोत्तराऽतोऽन्याय तिथिः प्रव ।

अर्कध्ने व्यतिपाताद्युगणे पञ्चाम्बरहुताशैः ॥४॥ ( २४ ) केचित् प्रत्यक्षसूर्याच्च भिन्नोऽयमिति यद्वलात् । वदन्ति मूढवादस्याप्रामाण्यात्तदसद्ध्रुवम् ।। कमलाकर की इस उक्ति से स्वयं भगवान् सूर्य ही इस के रचयिता सिद्ध होते हैं । आश्चर्य तो इस बात का है कि ‘सूर्यसिद्धान्त में त्रिंशत्कृत्यो युगे भानां चक्र प्राक् परिलम्बते । तद्गुणाद्भूदिनैर्भक्ताद् द्युगणाद्यदवाप्यते । तद्दोस्त्रिध्ना दशाप्तांशा विज्ञेया अयनाभिधाः । तत्संस्कृताद् ग्रहात् क्रान्तिच्छायाचरदलादिकम् ।। आदि से अयांशानय किया गया है, परन्तु सूर्य सिद्धान्त के पश्चात् ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त के रचयिता आचायं ब्रह्मगुप्त ने उसकी कोई चर्चा ही नहीं की । इस चर्चा न करने का कोई कारण भी समझ में नहीं आता है। सूर्यसिद्धान्त के उदयास्ताधिकार में “अभिजिद् ब्रह्म हृदयं स्वाती वैष्णव वासवाः ” इत्यादि से भगवान् सूर्य को सदोदित नक्षत्र बतलाया गया हैं। इस श्लोक की सुधार्वार्षिणीं टीका में जी देशज्ञानं बिना सदोदितनक्षत्राणां ज्ञानं न भवति, निरक्षे च सौम्य श्रवोऽप्य दृश्योऽतः केनचिदू गोलानभिज्ञेनायं श्लोक प्रक्षिप्त इति लिखा गया है, सो ठीक नहीं है । श्राद्यन्तकालयोर्मध्यः कालोज्ञ योऽतिदारुणः । प्रज्वलज्ज्वलनाकारः सर्वकर्मसु गर्हितः ।। यावदर्केन्द्वोर्मण्डलान्तरम् । सम्भवस्तावदेवास्य सर्वकर्म विनाशकृत् स्नानदानजपश्राद्धव्रतहोमादिकर्मभि प्राप्यते सुमहच्छयस्तत्कालज्ञानतस्तथा । इत्यादि से पातस्थितिकाल सब कमों का विनाशकारक कहा गया है। प्रातकाल में स्नान, दान, जप,श्राद्ध, ब्रत, होम आदि कायों से लोग कल्याण लाभ करते हैं। तथा-- रवीन्द्वोस्तुल्यता कान्त्योर्विषुवत्सन्निधौ यदा । द्विर्भवेद्धि तदा पातः स्यादभावो विपर्ययात् ।। से अपूर्व विषयों का प्रति पादन हुआ है । अर्थात् रविगोल-संधि सभीप में जब रवि और चन्द्र का क्रान्तिसाम्य हो तब अल्प समय में ही दो बार पात होता है । जब रवि की अयनसन्धि समीप में क्रान्ति साम्याभाव होता तब बहुत कालपर्यन्त क्रान्ति साभ्याभाव होता है, ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त में भी पालस्थिति काल फल सूर्य सिद्धान्त में कथित के अनु ( २५ ) ही कहा गया है । श्रीषेण, आर्यभट तथा विष्णुचन्द्र के विषय में संक्षेरूप से पहले लिख चुके हैं ! इलाहाबाद विश्वविद्यालय के रसायन विभाग के अध्यक्ष डाक्टर सत्य प्रकाश जी डी. एस. सी महोदय का मैं अत्यन्त अनुगृहीत हूं, जिन्होंने आंगल भाषा में इस ग्रन्थ की प्रस्तावना लिख कर कृतार्थ किया । सम्पादक मण्डल के अन्य सहयोगी ज्योतिषाचार्य श्री मुकुन्दमिश्र, श्री विश्वनाथ झा, श्री दयाशंकर दीक्षित एवं श्री ओोंदत्तशम शास्त्री एम. ए. एम. ओील. भी धन्यवाद के पात्र हैं जिनके सहयोग के बिना इस महान् ग्रन्थ का सम्पादन अति कठिन था । नव प्रिंटर्स पद्म श्री प्रकाशन के स्वामी श्री रमेशचन्द्र जी का परिश्रम भी सराहनीय है। इसके अतिरिक्त उन सभी लोगों के प्रति मैं अपना हार्दिक आभार प्रदर्शन करता हूं जिन्होंने अल्पमात्र भी सहयोग देकर मुझे कृतार्थ किया । भृगु-आश्रम ३०-३-१९६६ } विदुषामनुचर १७. श्रृंगोन्नत्युत्राध्यायः विषयानुक्रमणिका प्रश्नकथनम् परिलेखकथनम् प्रकारान्तरेण परिलेखकथनम् फलके परिलेखकथनम् विशेषकथनम् १८• कुट्टकाध्यायः कुट्टकारंभप्रयोजनम् कुट्टकादीनां प्रशंसाकथनम् कुट्टककथनम् कुट्टके विशेषकथनम् भगणादिशेषतोऽहर्गणानयनम् विशेषकथनम स्थिरकुट्टककथनम् स्थिरकुट्टकादहर्गणकथनम् स्थिरकुट्टके विशेषकथनम् लोमगणितकथनम् प्रश्नकथनम् अन्यप्रश्नकथनम् अन्य प्रश्नकथनम् पूर्वप्रश्नोत्तरकथनम अपरप्रश्नकथनम् पूर्वप्रश्नस्योत्तरकथनम् ११३६-४६ ११४९१-२९.१ ११३९. ११३९. ११४३ ११४४ ११४५ ११४६ ११४९. ११४९ ११५० ११५५ ११५६ ११५९ ११६१ ११६३ ११६९ ११७१ ११७२ ११७४ ११७५ ११७६ ११७६ ११७७ ११७७ विशेषकथनमा अन्यप्रश्नकथनम् पूर्वप्रश्नस्योत्तरकथनम् अन्यप्रश्नकथनम् अन्यप्रश्नकथनम् धनर्णशून्यानां सङ्कलनम् गुणने करणसूत्रकथनम् भागहारे करणसूत्रद्वयकथनम् समद्विबाहुत्रिभुजे भुजयोर्वर्णनम् करणीयोगान्तरे गुणनकथनम् करणभागहारे करणसूत्रकथनम् करण ीमूलानयनार्थकथनम् अव्यक्तसंकलित यवकलि तयोः करणसूत्रकथनम् अव्यक्तगुणने सूत्रकथनम् वर्गसमीकरणकथनम् वर्गसमीकरणेऽयक्तमानानयनम् अन्यप्रश्नकथनम् अन्यप्रश्नकथनम् अनेकवरणेसमीकरणम् प्रश्नकथनम अन्यप्रश्नकथनम् अन्यप्रश्ननिरूपणम् अन्यप्रश्नकथनम् अन्यप्रश्नद्वयस्थापनम् प्रन्यप्र अन्यप्रश्नकथनम् ११८० ११८१ ११८६ ११८९ ११९० ११९२ ११९३ ११९४ ११९६ ११९८ १२० १ १२०२ १२०४ १२०५ १२०७ १२०८ १२०९ १२११ १२१२ १२१३ १२१४ १२१५ १२१७ १२१८ १२२१ १२२३ १२२४ ६२२५ १२२७ १२३१ भावितविषये सूत्रम् प्रश्ननिरूपणम् भाविते प्रकारान्तरकथनम् वज्त्राभ्यासतोऽनेककनिष्ठज्येष्ठानयनम् भाविते विशेषकथनम् चतुःक्षेपकनिष्ठज्येष्ठाभ्यां रूपक्षेपे कनिष्ठज्येष्ठानयनमः ऋणात्मकचतुःक्षेपकनिष्ठज्येष्ठाभ्याँ रूपक्षेपे कनिष्ठज्येष्ठानयनम् वर्गात्मकप्रकृतौ कनिष्ठज्येष्ठानयनम् प्रश्नविशेषस्योत्तरकथनम प्रश्नान्तरविशेषस्योत्तरकथनम प्रश्नान्तरविशेषस्योत्तरकथनम अन्यप्रश्नकथनम अन्यप्रश्नद्वयनिरूपणम प्रश्नद्वयनिरूपणम उद्दिष्टाहर्गणे ये ग्रहयोर्भगणादिशेषे ते पुनः कस्मिन्नहर्गणे इत्यस्योत्तरकथनम् अन्यप्रश्नकथनम प्रथम प्रश्नस्योत्तरकथनम अवमशेषात् तिथ्यानयनम सोत्तरं प्रदनान्तरकथनम सोत्तरं प्रश्नान्तरकथनम शेषयोर्वर्गयोगकथनमः योगाम्यां च तयो रानयनम प्रश्नान्तरस्योत्तरकथन १२३२ १२३५ १२३६ १२३८ १२४० १२४१ १२४३ १२४५ १२४८ १२५२ १२५३ १२५५ १२५८ १२६ १२६३ १२६४ १२६५ १२६७ १२६८ १२६8 १२७१ १२७३ १२७४ १२७४ १२७७ १२७८ १२८० १२८२ १२८४ १२८५ १२८७ १२८७ १२८८ अध्यायोपसंहारः कुच्छायादिज्ञानाध्यायः प्रथमप्रश्नकथनम अन्यप्रश्नस्थापनम् अन्यप्रश्ननिरूपणम अन्यप्रश्नस्थापनम. प्रश्न न्म २०० छन्दश्चित्युचाराध्यायः १२8५-१३१५ १२ && प्रथमप्रश्नस्योत्तरकथनम् उदयान्तर-प्रस्तान्तरघटिकाभिरितिप्रश्नद्वयस्योत्तरकथनम १३०१ मध्यगतेरन्तरसाधनं तदुत्तरकथनंच १३०२ रविशशाङ्कमाननिरूपणम १३०२ दीपशिखौच्याच्छंकुतलांतरभूमिज्ञाने छायानयनस्योत्तरकथनमः १३०४ छाया द्वितीयभाग्रान्तरविज्ञानेनेत्यादिप्रश्नोत्तरकथनम् १३०५ छायातो गृहादीनामौच्यानयनम् १३०८ इष्टगृहौच्यज्ञो यइतिप्रश्नस्योत्तरसम्पादनम . गृहपुरुषान्तरसलिले यो दृष्ट्वेत्यादि प्रश्नोत्तरकथनम् १३१ बीक्ष्य गृहाग्रं सलिले प्रसार्थेति प्रश्नोत्तरकथनम् १३११ १३१४ १३१8-२० १२९०७ १२९१ १२९९५. १३०९ गोलाध्याय १३२३-१४१६ १३२४ भूगालसस्थानकथनम् देवासुरसंस्थानवर्णनम् देवदैत्ययोर्भचक्रभ्रमणव्यवस्थापनम् १३२७ चक्रभ्रमरणव्यवस्थाकथनम् दैवादीनां रविभ्रमणस्थितिवर्णनम् १३२८ देवदैत्ययोः राशिसंस्थानम १३२६. देवदैत्ययो: पितृमानवयोश्च दिनप्रमाणनिरूपणम् भूगोले लङ्कावन्त्योः संस्थानम् १३३४ निरक्षस्वदेशान्तरयोजनाकथनम् १३३६ १३३७ १३२५ १३२८ १३३० कियद्योजनभ्रमणमितिकथनम् शनैश्चराद्यानां शीघ्रत्वकारणकथनम् परिधेव्यसानयनम वृत्तपरिधेव्यसस्य प्रतिपादनम् गणितेन ज्याधनियनम् अधशज्यानयनम् विशेषकथनम् प्रकारान्तरेणार्धाशज्यानयनम् स्पष्टीकरणे छेद्यककथनम् नीचोच्चवृत्तभङ्गिकथनम् नीचोच्चवृत्तभङ्गया शीघ्रफलसाधनम् ग्रहणे राहोरदर्शनकथनम् अत्र निर्गलितार्थकथनम् पूर्वापरयाम्योत्तरक्षितिजवृत्तकथनम् उन्मण्डलसंस्थाननिरूपणम् विषुवन्मण्डलससंस्थानकथनम् अक्रान्तिमण्डलसंस्थानदर्शनम् विमण्डलानां कथनम् डग्मण्डलाभिनिवेशकथनम् टक्क्ष पवृत्तकथनम् ३: , १३४० १३४४

  • १३४५

१३४८ १३५२ १३५३ १३५५ १३५९ विशेषकथनम् १३७१ स्फुटयोजनात्मककरणनियनम् भूरविचन्द्राणां योजनव्यासकथनम् १३७३ भूभाबिम्बानयनम् कलात्मकबिम्बकथनम् १३८० छादकनिरूपणम् १३८२ राहुकृतं रवीन्द्वोर्नग्रहणमिति वराहमिहिरादीनां मतप्रतिपादनम् १३८५ संहितामतेन वराहादीनां निराकरणम् १३८६ लोकप्रथाप्रतिपादनम् १३८७ राहुकृतं ग्रहणमित्यत्र स्मृतिवाक्यम् १३८७ राहुकृतग्रहणे वेदवाक्यम् १३८८ स्वोक्तिप्रदर्शनम् १३८८ १३६६ १३९१ १३९१ १३९४ चराग्रयोः संस्थानकथनम् शंकुदृग्ज्ययोः संस्थानकथनम् प्रकारान्तरण तयाः सस्थान २ाकुतलस्य च कथनम् दृग्गोलस्य दृश्यादृश्यत्वं लम्बनावनत्युत्पत्तौ च कारणदर्शनम् क्षगोलयोः स्थिरवृत्तकथनम् ग्रहाणां चलवृत्तकथनम अध्यायोपसंहार २२. यन्त्राध्यायः गोलप्रशंसाकथनम् स्वगोलग्रथने कारणाम गणितगोलयोः प्रशंसाकथनम् यन्त्रारम्भप्रयोजनकथनम् तन्त्रारणा प्रातपादनम् सलिलादीनां प्रयोजनकथनम् धनुयन्त्रकथनम् सूर्याभिमुखे यन्त्रधारणम् इष्टघटिकायाः धनुषश्चस्वरूपकथनम् यन्त्रेरणा नृतोन्नतकालज्ञानम यन्त्रादेव नतोन्नकालज्ञानम् धनुर्यन्त्रे विशेषकथनम् तुर्यगोलप्रतिपादनम् यष्ट्या शंक्वादिकथनम् प्रकारान्तरेण घटिकानयनम् यष्टियन्त्रेण वेधेन रवि चन्द्रान्तररांशकथनम् प्रकारान्तरेणांशानयनम् यष्टियन्त्रेण दिक्साधनम् भुजकोटिसाधनकथनम् यष्टियन्त्रेण पलभाज्ञानम् भुजद्वयतः पलभाज्ञानम् १४०० १४०२ १४०६ १४०६ १४०७ १४०९ १४१० १४१२ १४१५ १४१५ १४१६ १४१९ १४२ १४२० १४२१ १४२३ १४२६ १४२७ १४२८ १४३० १४३१ १४३२ १४३३ १४३५ १४३८ १४४२ १४४६ १४४६ १४४९ १४५० १४५२ १४५३ १४५४ . रविज्ञानकथनम् यष्टया गृहाद्यौच्यानयनम् प्रकारान्तरेण गृहादौच्यानयनम् गृहादिमूलभेदेन भूमिज्ञानम् भूमिज्ञाने वंशौच्यज्ञानम् प्रकारान्तरेण भूम्यौच्चानयनम् प्रकारान्तरेण गृहौच्यानयनम् परमतस्य खण्डनम् शकुयन्त्ररण कालज्ञानम् घटीयन्त्रकथनम् कपालयन्त्रकथनम् पीठयन्त्रकथनम् यन्त्रान्तरकथनम् पुनयन्त्रान्तरकथनम विशेषकथनम् पुनर्विशेषकथनम स्वयवहयन्त्रवरणनम् पुनर्विशेषकथनमः अध्यायोपसंहार २३. मानाध्यायः पदार्थानां मानकथनम् मानानां नामकथनम् विशेषकथनम् नक्षत्रसावनप्रशासनम नवमानवणनम् ऋतुवर्णनम् भूभादध्य भूभामानकथनम् प्रकारान्तरेण तत्साधनमः प्रकारान्तरेण भूभामानकथनम् अध्यायोपसंहार १४५५ १४५७ १४५७. १४६२ १४६२ १४६५ १४७० १४७१ १४७२ १४७४ १४७६ १४७७ १४८० १४८२ १४८४ १४८५ १४८७ १४९१ १४९५ '१४९६ १५७३ १५०४ १५०५ १५०७ १५०८ २४. साध्यायः प्रारम्भप्रयोजनकथनम एकसिद्धान्तवर्णनम् सूर्यसिद्धान्तादीनां भिन्नत्वकथनम सिद्धान्तस्योत्तराधेऽध्यायसंख्यावर्णनम करणग्रन्थवत् गणितलाघवेन फलसाधनं नेति कारणवर्णनम ग्रन्थे श्लोकसंख्याकथनमम् सूर्यग्रहणे चन्द्रशङ्कोरभावप्रतिपादनम अध्यायोपसंहार ध्यानग्रहोघदेशाध्यायः चैत्रादौ मासगणानयनम चैत्रादौ दिनादिकं तिथिश्ध्रुवसाधनकथनम् चन्द्रकन्द्रसाधनम इष्टमासादौ रव्यानयनमः प्रतिमासं शशिकेन्द्र तिथिाध्रुवक्षेपयोः कथनम प्रतिदिनचालनकथनमः चन्द्ररव्योः साधनम रविचन्द्रकेन्द्राणां राशिमानुकथनम. ज्याखण्डकेन्द्रज्यासाधनयोः कथनम रविचन्द्रयोः मन्दफलानयनमः चन्द्र भुजफलसंस्कारकथनम तिथौ फलसंस्कारकथनमः केन्द्रत एव तिथिसंस्कारयोग्यमन्दफलकथनम भौमसाधनम बुधशीघ्रानयनम १५१५ १५१६ १५१८ १५१८ १५१९ १५२० १५२१ १५२१ १५२१ १५२३ १५२७-१५8.८ १५२७ १५२९ १५३० १५३२ १५३३ १५३५ १५३५ १५३७ १५३६ १५४० १५४४ १५४७ १५४९ १५५ १५५० १५५२ गुरोरानयम ग्रहानयने विशेषकथनम प्रकारान्तरेण भौमानयनम् बुधानयनम गुरुशनिराह्वानयनम भौमादीनां मन्दोच्चांशकथनमः भौमादीनां मन्दफलानयन्म स्फुटग्रहार्थ संस्कारकथनम विश्वमिते गतपिण्डे विशेषकथनमः भौमस्य चतुर्दशपिण्डकथनमः बुधपिण्डकथनम् गुरोः पिण्डकथनम् शुक्रस्य पिण्डकथनम शनिपिण्डकथनम भौमादीनां मध्यमृदुगतिवर्णनम चरखण्डवर्णनम् दिनरात्रिमानकथनम् इष्टकालिकग्रहवर्णनम् १५५५ १५५८ १५६ १५६२ १५६४ १५६६ १५६८ १५७० १५७१ १५७२ १२७३ १५७३ १५७४ १५७५ १५७८ १५८० १५८५ १५९२ १५8३ इष्टकाले स्थूलछायाकर्णयोश्च वर्णनम. अध्यायोपसंहारः कस्मै न दातव्यमितिकथनम परिशिष्ट ध्यानग्रहोपदेशाध्याये क्षेपसाधनम् गोलाध्यायः-वासनाभाष्यम् अकारादिक्रमेण श्लोकानुक्रमणिका १५९५ १५९६ १५९७ १८५९७ १५६८ १५९८-१६०८ १६०९-१६५१ १६५२-१६६७ ब्रहस्टभिडन्तः अन्नन्दुराध्यः ब्राह्मरुपफटसिद्धान्तः अथ शृङ्गोन्नत्युत्तराध्यायः प्रारभ्यते । अथ प्रश्नमाह । भुजकोटिकर्णशशिमानशुक्लसितसूत्रपरिलेखात् । प्रतिदिवसं प्रतिघटिक यो वेत्ति स तन्त्रहृदयज्ञ ॥१॥ सु. भा-शृङ्गोन्नतौ प्रतिदिवसं वा प्रतिघटिक यो भुजं कोटिं कर्ण शशि माने चन्द्रबिम्बे शुल्क सितसूत्रं स्वभासूत्रं परिलेखं च वेत्ति स एव तन्त्रहृदयज्ञः सिद्धान्तग्रन्थमर्मज्ञ इति ।। १ ।। वि. भा-प्रतिदिनं प्रतिघटिकं भुज कोटिं कर्ण चन्द्रबिम्बे शुक्लं सितसूत्र (स्वभासूत्रं) परिलेखं च शृङ्गोन्नतौ यो जानाति स सिद्धान्तग्रन्थमर्मज्ञ इति । शृङ्गोन्नत्यधिकारे पूर्व भुजादयः साधिता एवातः परिलेखमत्र कथयूति ॥१॥ अब शृङ्गोन्नत्युत्तराध्याय प्रारम्भ किया जाता है। अब प्रश्न को कहते हैं । हेि. भा-प्रत्येक दिन में प्रत्येक घटी में भुज-कोटि-करणों को चन्द्रबिम्ब में शुक्ल को, स्वभा सूत्र को, परिलेख को, शृङ्गोन्नति में जो जानते हैं वे सिद्धान्तग्रन्थ के मर्मज्ञ हैं इति । शृङ्गोन्नत्यधिकार में पहले भुजादि साधित ही हैं। इसलिये यहां परिलेख ही को कहते हैं ।१।। इदानीं परिलेखमाह । प्राच्यपरा विगभिमुखं शुक्लेतरपक्षयोर्लिखे भूमौ । अपवत्यैकेनेष्टेन राशिना कोटिभुजेकणन् ॥२॥ ११४० ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते परिकल्प्यार्क बिन्दु तस्माद्वाहुं यथादिशं दत्त्वा । बाह्वागूत् प्राच्यपरां कोटिं तिर्यक् स्थितं कर्णम् ॥३॥ करणग्रि चन्द्रमसं परिलिख्य सितं प्रवेश्य करणेन । शशिबिम्बे शुक्लागूात् परिलेखसमेन सूत्रेण ॥४॥ कर्णभतिस्थे नैशेो शुक्ले परिलिख्य पश्चिमाभिमुखम् । राशिषु मेषतुलादिषु संशोध्य दिवाकरं चन्द्रात् ॥५॥ पूर्वाभिमुखं कर्कटमकरादिषु भवति शुक्लसंस्थानम् । एवं वा संस्थानं परिलिख्येन्दु प्रसाध्य दिशिः ॥६॥ पु. मा.-एकेनेष्टेन राशिना प्रथमं कोटिभुजकणनपवत्र्य भूमौ शुक्लकृष्ण पक्षयोः प्राच्यपरादिगभिमुखं लिखेत् । कथं लिखेदित्याह-परिकल्प्यार्क बिन्दु मिति-इष्टं बिन्दुमर्क परिकल्प्य तस्माद्यथादिशं बाहु बाह्वग्राद्यथादिशं प्राच्यपरां कोटिं तयोर्मध्ये तिर्यक् करणं च दत्त्वा कर्णाग्रे चन्द्रमसं परिलिख्य तत्र करणेन करणैमार्गेण शशिबिम्बे सितं शुक्लं प्रवेश्य दत्त्वा ततः शुक्लाग्रात् परिलेखसमेन सूत्रेण स्वभासमेन मानेन कणऽङ्कनं कृत्वा तत् केन्द्रात् स्वभया वृत्तं परिलिख्य कर्णगतिस्थे नैशे रात्रिसम्बन्धिनि शुक्ले शुक्लसंस्थानं भवति । शुक्लागू कस्यां दिशि कर्णसूत्रे दत्त्वा परिलेखं कुर्यादित्याशङ्कयाह राशिषु मेषतुलादिष्विति । चन्द्राद्दिवाकरं विशोध्य शेषं कार्यम् । मेषादिराशित्रये तुलादिराशित्रये च शेषे पश्चिमाभिमुखं कर्कटादिरराशित्रये मकररादिरराशित्रये च शेषे पूर्वाभिमुखं शुक्लं देयमिति । एवं वा संस्थानमित्यस्याग संबंधः । अत्रोपपत्तिः । ‘यद्याम्योदकतपनशशिनोरन्तरं सोऽत्र बाहुः’-इत्यादिना ‘सूत्रेण बिम्बमुडुपस्य षडङ्गुलेन'-इत्यादिना च भास्करविधानेन ज्ञेया । यदा ऽन्तरं राशित्रयाल्पं तदा शुक्लमानं च चन्द्रबिम्बाधदिल्पमतः शुक्लाङ गुलं पश्चिमाभिमुखं कर्णसूत्रे दत्त्वा तस्मात् स्वभासूत्रेण परिलेखवृत्ते कृते शुक्लेन्दु खण्डाकृतिरुत्पद्यते । यदा तदन्तरं तुलादित्रये तदा कृष्णं बिम्बाधदल्पं तद्वशेनापि पश्चिमाभिमुखं युक्तम् । एवं कर्कटादित्रयेऽपि कृष्णेन्दुखण्डाकृतिर्मकरादिषु च मासस्य तुर्यचरणे शुक्लश्शृङ्गोन्नतिरुत्पद्यते तत्र पूर्वाभिमुखं शुक्ल संस्थानं भवति । अत्र का का स्थलता वास्तवपरिलेखसाधनं च कथमित्येतदर्थ मत्कृता वास्तवचन्द्र शृङ्गोन्नतिद्रष्टव्या ।। २-६ ।। वि. भा-एकेनेष्टेन राशिना कोटिभुजकणनिपवत्र्य भूमौ शुक्लकृष्ण पक्षयोः पूर्वापरदिगभिमुखं लिखेत्, कथं लिखेदिति कथयति । इष्ट बिन्दुरविं परि कल्प्य तस्माद्भुजं दत्वा भुजाग्राब्रथा दिशं पूर्वोपरां कोटिं तयोर्मध्ये तिर्यक् कर्णच दत्वा कर्णाग्रे चन्द्रबिम्बं विलिख्य तत्र कर्णमार्गेण चन्द्रबिम्बे शुक्लं दत्वा शुक्ला शृङ्गोन्नत्युत्तराध्याय स्या सम्बन्धः । ग्रात् परिलेखतुल्येन सूत्रेण (स्वभा) समेन मानेन करणेऽङ्कनं कृत्वा तत्केन्द्रात् स्वभया वृत्तं परिलिख्य कर्णगतिस्थे रात्रिसम्बन्धिनि शुक्ले शुक्ल संस्थानं भवति शुक्लाग्र कस्यां दिशि कर्णसूत्रे दत्वा परिलेखं कुर्यादित्याह। चन्द्रात्सूर्य विशोध्य शेष ग्राह्यम् । मेषादिराशित्रये तुलादिराशिन्नये व शेषे पश्चिमाभिमुखं कर्कटादिराशित्र ये मकरादिराशित्रये च शेषे पूर्वाभिमुखं शुक्लं देयमिति । एवं वा संस्थान मित्य ११४१ यदा रविचन्द्रयोरन्तरं राशित्रयाल्पं तदा शुक्लमानं च चन्द्र बिम्बाधदिल्पमत शुक्लाङ्गुलं कर्णसूत्रे पश्मिाभिमुखं दत्वा तस्मात् स्वभासूत्रेण परिलेखवृत्ते कृते शुक्लचद्र खण्डाकृतिजयिते । यदा तदन्तरंतुलादिराशित्रये तदा कृष्णं बिम्बाधदल्पं तद्वशेनापि पश्चिमाभिमुखं युक्तम् । एवं कर्कटादित्रयेऽपि कृष्णचन्द्रखण्डाकृति मकरादिषु मासस्य चतुर्थचरणे शुक्लश्रृंङ्गोन्नतिरुत्पद्यते तत्र पूर्वाभिमुखं शुक्ल संस्थानं भवतीति । सिद्धान्तशेखरे “आदशदरसोदरेऽवनितले बिन्दु प्रकल्योष्णगु स्वाशायां भुजमुत्तरेतरदिशं कोटिं तदग्रात्तत प्राकचन्द्रोऽपरदिङ्मखीमपरगे पूर्वायतां दापयेत् दोः कोट्यग्रगतां श्रुति शशिवपुः कोटिश्रवः संयुतौ । शुक्लं च श्रुति सूत्रगाम्यपरतः शुक्लेऽसिते पूर्वतः कृष्णं व्यत्ययतोऽल्पकेन कृतयोः कार्य परी लेखनम् । शुक्लाग्रात् परिलेखसूत्रविहिते वृत्तम्रमे जायते संस्थानं नभसः स्थले प्रतिदिशं चण्डीशचूड़ामणेः ॥” अस्यार्थ :-आनीतं शुक्लमानं शुक्लपक्षे पश्चिम ' मध्ये न्यूनपरिमाणेन परिलेखनं कार्यम् । शुक्लकृष्णयोर्मध्ये योऽल्पस्तेनैव शृङ्गोन्न तिज्ञानार्थ परिलेखः कर्तव्य इति । शुक्लाग्रात् परिलेखसूत्रेण कृते वृत्ते चन्द्रस्य प्रतिदिशमाकाशस्य संस्थानं भूमौ ज्ञायते । शिष्यधीवृद्धिद तन्त्रे “यचिह्न समभुवि भानुमान् स तस्मात् दातव्यः स्वदिशि भुजस्ततोऽपि कोटिः। प्रागिन्दावपरककुप्मुखी प्रतीच्यां प्रागग्रा दिनकरचिह्नतश्च कर्णः । श्रवणकोटियुतौ शशिमण्डलं श्रवणसूत्र मिहापरपूर्वकम् । झषवशेन च शेषदिशौ ततः खटिकया सुपरिस्फुटमालिखेत् ।। अपरतः श्रवणेन सितं नयेदसितमप्यसिते सितदीधितौ । धनददिग्भवदक्षिण दिग्भवैः परिधिभिर्जनयेच्च झषद्वयम् ॥ तिमिभवमुखपुच्छसक्तरज्ज्वोर्भवति च यत्र समागमः प्रदेशे । तत उडुपतिशुक्लचिन्हलग्नं समभिलिखेत् सितसिद्धये सुवृत्तम् ।।' लल्लोक्त प्रकार ईदृशोऽस्ति । सर्वेषां ब्रह्मगुप्त-लल्ल-श्रीपति-भास्करा चार्याणां शृङ्गोन्नति परिलेखः समान एव । सूर्य सिद्धान्ते “दत्वाऽर्क संज्ञितं बिन्दु ततो बाहु स्वदिङ्मुखम् । ततः पश्चान्मुखीं कोटिं कर्ण कोट्यग्रमध्यगम् ।। कोटिः कर्ण युताद्विन्दोबिम्बं तात्कालिकं लिखेत् । कर्णसूत्रेण दिक् सिद्धिं प्रथमं परिकल्प ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते येत् । शुक्लं कर्णेन तद्विम्बयोगादन्तमुखं नयेत् । शुक्लाग्रयाम्योत्तरयोर्मध्ये मत्स्यौ प्रसाधयेत् । तन्मध्यसूत्रसंयोगाद्विन्दुत्रिस्पृग् लिखेद्धनुः । प्रागुबिम्बं यादृगेव स्यात् तादृक् तत्र दिने शशी । कोट्यादिक् साधनात् तिर्यक् सूत्रान्ते शृङ्ग मुन्नतम् । दर्शयेदुन्नतां कोटिं कृत्वा चन्द्रस्य साकृतिः ॥ कृष्णेषड्भयुतं सूर्य विशो ध्येन्दोस्तथा सितम् । दद्याद्वामं भुजं तत्र पश्चिमं मण्डलं विधोः ।।” ईदृशः परिलेख विधिरस्ति । अत्रोपपत्तिः । रविकेन्द्राद्याम्योत्तरवृत्तधरातले लम्बं कृत्वा लम्बमूले रविः कल्पितः । एवं चन्द्रकेन्द्राद्याम्योत्तरवृत्तधरातले यो लम्बस्तन्मूले चन्द्रः क्रल्पितः। ततो याम्योत्तर वृत्तधरातले कल्पितरविचन्द्रयोर्याम्योत्तरमन्तरं तद् भुजयोः संस्कारात् स्पष्ट भुजतुल्यम् । सूर्यस्यास्तकाले क्षितिजे स्थितत्वात् कल्पितरवियाम्योत्तरवृत्तधरातले याम्योत्तररेखायामेव भविष्यत्यतस्तयोरूध्र्वाधरमन्तरं कोटिरूपं चन्द्रशङ्कुसमम् । तत्र परिलेखे लाघवार्थ शङ्कुद्वादशांशेन शङ्कुभुजस्तद्वर्गयोगमूलसमः कर्णश्चा पबत्तितः । अतो रविबिन्दुतो भुजं दत्वा तदग्रादूध्र्वाधररूपां कोटिं दत्वा कोटयग्र रविबिन्दुगतं कर्णसूत्र दत्तम् । कोटयग्रे कल्पितचन्द्रबिम्बं तत्र कल्पितरविः कणमागरण शुक्लं ददाति । अतस्तत्सूत्रे शुक्लं दत्तम् । कर्णरेखोपरि या याम्योत्तरा तिर्यग्रेखा तया छिन्नमर्ध बिम्बं रविणा शुक्लं भवति । अतो दृश्यवृत्ते तत्प्रान्तयोश्च शुक्लम् । अतस्तद्विन्दुत्रयोपरिगतेन वृत्तखण्डेन चन्द्रखण्डाकृतिरुत्पद्यते । अत्र कोट्यूध्वर्वाधररेखोपरि या तिर्यग्रेखा तद्वशतो भुजान्यदिशि शृङ्गमुन्नतं भवति । एवमेव परिलेखो' भास्कराचार्यस्याप्यस्ति । परन्तु केषामपि प्राचीनाचार्याणां शृङ्गोन्नतिपरिलेख: समीचीनो नास्तीति॥२-६॥ अब परिलेख को कहते हैं । हेि. भा.-एक किसी इष्ट राशि से भुज कोटि और कर्ण को अपवर्तन देकर भूमि में शुक्ल पक्ष और कृष्णपक्ष में पूर्व पश्चिम दिशा की तरफ लिखना चाहिये । कैसे लिखना चाहिये सो कहते हैं। इष्ट बिन्दु को रवि कल्पना कर उससे भुज देकर भुजाग्र से यथादिक् पूर्वापर कोटि देकर उन दोनों के मध्य में तिर्यक् कर्ण को देकर कर्ण में चन्द्र को लिखकर वहाँ कर्णमार्ग से चन्द्रबिम्ब में शुक्ल देकर शुक्लाग्र से परिलेख तुल्य सूत्र (स्वभातुल्यसूत्र) से कर्ण में अङ्कित कर उस बिन्दु को केन्द्रमान कर स्वभाव्यासार्ध से वृत्त लिखकर कर्णगतिस्थ रात्रि सम्बन्धी शुक्ल में शुक्ल संस्थान होता है । . कर्ण सूत्र में शुक्लाग्र को किस दिशा में देकर पंरिलेख करना चाहिये सो कहते हैं। वन्द्र में सूर्य को घटा कर जो शेष रहे उसको ग्रहण करना चाहिये । मेषादि तीन राशियों में और तुलादि तीन राशियों में शेष में पश्चिमाभिमुख शुक्ल देना चाहिये । तथा कर्कटादि तीन राशियों में और मकररादि तीन राशियों में शेष में पूर्वाभिमुख शुक्ल देना चाहिये ।। इति । शृङ्गोन्नत्युत्तराध्याय उपपत्ति । ११४३ जब रवि और चन्द्र का अन्तर तीन राशि से अल्प होता है तब शुक्लमान भी चन्द्र बिम्बार्ध से अल्प होता है अत: कर्ण सूत्र में शुक्लाङ्गुल को पश्चिमाभिमुख देकर वहां से स्वभासूत्र व्यासार्ध से परिलेख वृत्त करने से शुक्ल चन्द्रखण्डाकृति बनती है । जब वह अन्तर तुलादि तीन राशि में हो तब कृष्ण बिम्बर्धाल्प होता है उसके वश से पश्चिमाभिमुख युक्त है। एवं कक्यदि तीन राशियों में भी कृष्णचन्द्र खण्डाकृति होती है। मकररादि तीन राशियों में मास के चतुर्थचरण में शुक्ल शृङ्गोन्नति बनती है। वहां पूर्वाभिमुख शुक्ल संस्थान होता है। सिद्धान्त शेखर में ‘श्रादशदर सोदरेऽवनितले बिन्दु प्रकल्प्योष्णगु स्वाशायां' इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित श्लोक से श्रीपति ने परिलेख प्रकार लिखा है । शिष्यधीवृद्धिद तन्त्र में ‘यच्चिह्न समभुवि भानुमान् स तस्मात् दातव्यः स्वदिशि भुजः’ इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित श्लोकों से लल्लाचार्योक्त प्रकार भी आचार्यो (ब्रह्मगुप्त)क्त प्रकार और श्रीपत्युक्त प्रकार तथा भास्करोक्त शृङ्गोन्नति प्रकार के समान ही है । सूर्य सिद्धान्त में ‘दत्वाऽर्क संज्ञितं बिन्दु ततो बाहु स्वदिङ मुखम्' इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित श्लोकों से सूर्य सिद्धान्तकार ने परिलेख प्रकार लिखा है इसी तरह के परिलेख भास्करोक्त भी हैं लेकिन कोई भी प्राचीनाचार्योक्त प्रकार समीचीन नहीं है इति ॥२-६॥ इदानीं प्रकारान्तरेण परिलेखमाह । बाहुज्येन्दुदलगुणा कर्णबिभक्ता भुजान्यदिक् चन्द्र । करणभुजाग्रतश्चन्द्रमध्यतः पूर्ववच्छेषम् ॥७॥ सु. भा.-वा एवं वक्ष्यमाणं संस्थानं शुक्लसस्थानं ज्ञेयं । अभीष्टस्थाने केन्द्र प्रकल्प्य चन्द्रबिम्बं परिलिख्य दिशश्च प्रसाध्य ततः पूर्वश्ङ्गोन्नत्यध्यायविधिना बाहुज्या भुजा साध्या सा चन्द्रदलेन चन्द्रबिम्बाधेन गुणा कर्णेन विभक्ता सा चन्द्र चन्द्रबिम्बेऽन्यदिक् भुजा भवति । ततश्चन्द्रमध्यतश्चन्द्र केन्द्राद्भुजायतश्च कर्णसंस्थानं ज्ञेयम् । ज्ञाते कर्ण'संस्थाने शेषं पूर्ववत् ज्ञेयम् । अत्रोपपत्तिः । अत्र रवेर्यद्दिक् चन्द्रः स प्रथमं भुजः साधितो भुजाग्राञ्चन्द्र केन्द्रगता रेखा कोटिः । कोटिसूत्रमेव चन्द्रबिम्बे पूर्वापररेखा । कर्णसूत्रं च चन्द्र बिम्बपरिधौ कोटिसूत्राद् भुजविपरीतदिशि लग्नं तत्स्थानज्ञानार्थ चन्द्रबिम्बाधे भुज परिणीतस्ततः कर्णसंस्थानज्ञान सुगमम् ॥ ७ ॥ वि. भा-पूर्वोक्तपरिलेखश्लोकानामन्ते ‘एवं वा संस्थानम्’ इत्यस्ति एतस्यार्थ वा एवमग्रे कथितं शुक्लसंस्थानं बोध्यम् । इष्टस्थाने कमपि बिन्दु केन्द्र' मत्वा चन्द्रबिम्बं विलिख्य दिक्साधनं कृत्वा शृङ्गोन्नत्यध्यायोक्तविधिना भुजज्या (भुजा) साध्या सा चन्द्रबिम्बाधेन गुणा कर्णेन भक्ता तदा चन्द्र बिम्बेऽन्यदिक् ११४४ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते भुजा भवति । ततश्चन्द्रकेन्द्राद् भुजाग्रतश्च कर्णसंस्थानं ज्ञेयम् । अवशिष्टं पूर्ववदेव बोद्धव्यम् । रवेर्यस्यां दिशि चन्द्रस्तत्र प्रथमंभुजः साधितः । भुजाग्राञ्चन्द्रबिम्बकेन्द्रग्रता रेखाकोटिः । इयमेव कोटिरेखा चन्द्रबिम्बे पूर्वापररेखा । कर्णसूत्रं च चन्द्रबिम्ब परिधौ कोटिसूत्राद् भुजविपरीतदिशि लग्नं तत्स्थानज्ञानार्थ चन्द्रबिम्बाधं भुजः परिणतः कृतस्ततः कर्णसंस्थानज्ञानं सुलभम् ॥७॥ अब प्रकारान्तर से परिलेख को कहते हैं । हेि. भा.-अभीष्ट स्थान में केन्द्र मान कर चद्र बिम्ब को लिखकर दिशाओं का ज्ञान करना चाहिये तब पूर्वश्ङ्गोन्नत्यध्यायोक्त विधि से भुजज्या साधन करना उसका चन्द्र बिम्बार्ध से गुणाकर कण से भाग देने से फल चन्द्र बिम्ब में अन्य दिशा की भुजज्या होती है। तब चन्द्र केन्द्र से और भुजाग्र से कर्ण संस्थान समझना चाहिये। अवशिष्ट विषय पूर्ववत् समझना चाहिये इति । रवि से जिस दिशा में चन्द्र है वहाँ पहले भुज साधित है। भुजाग्र से चन्द्रकेन्द्र गत रेखा कोटि है। कोटि रेखा ही चन्द्रबिम्ब में पूर्वापर रेखा है । कर्णसूत्र चन्द्रबिम्ब परिधि में कोटिसूत्र से भुज विपरीत दिशा में लगता है उस स्थान के ज्ञान के लिये बन्द्र बिम्बार्ध में भुज को परिणत किया गया, तब कर सस्थानज्ञान सुलभ ही है इति ॥७॥ इदानीं फलके परिलेखमाह । प्राच्यपरे विपरीते फलकेऽन्यत् सर्वमुक्तबच्छेषम् । शृङ्गोन्नतिपरिलेखाश्चत्वारः शीतकिरणस्य ॥८॥ सु. भा-फलके गृहणपरिलेखवत् प्राच्यपरे दिशौ विपरीते कायें । अन्य त्सर्वं शेषमवशिष्टं कर्मोक्तवत् कार्यम् । एवं शीतकिरणस्य चन्द्रस्य शृङ्गोन्नति परिलेखाश्चत्वारो भवन्ति । भूमौ प्रकारद्वयं तद्वशतः फलके प्रकारद्वयमिति चत्वार परिलेखप्रकारा भवन्तीति । अत्रोपपत्तिः । ग्रहण परिलेखवत् फलक परिवत्र्याकाशे संस्थाप्य सर्वा दिशो वास्तवा बोध्या इति ।। ८ ।। वि. भा.-फलके पर्वापरे दिशौ विपरीते कायें । अन्यत् सर्वं शेषं कमॉक्तवत् कर्त्तव्यम् । एवं चन्द्रस्य शृङ्गोन्नति परिलेखाश्चत्वारो भवन्ति । प्रकारद्वयं भूमौ तद्वशतः प्रकारद्वयं फलके इति परिलेखस्य चत्वारः प्रकारा भवन्तीति ॥ ११४५ पूर्व २-६ श्लोकोक्तपरिलेखोपपत्तौ सूर्यसिद्धान्तोक्तप्रकारो योऽस्ति स फलके परिलेखप्रकारोऽस्ति तेनैव फलके परिलेखचमत्कतिज्ञतव्येति ॥८॥ अब फलक में परिलेख को कहते हैं । हेि. भा.-फलक में पूर्वदिशा और पश्चिम दिशा को विपरीत करना चाहिये। अन्य सब अवशिष्ट कर्म पूर्ववत् करना चाहिये। इस तरह चन्द्र का शृङ्गोन्नतिपरिलेख चार प्रकार का होता है। दो प्रकार भूमि पर और उसके वश से दो प्रकार फलक पर ये चार प्रकार परिलेख के होते हैं इति । इदानीं विशेषमाह । ग्रहयोगेन्दुच्छायाग्रहोदयांमयभग्रहमुनीनाम् तत्क्रान्तिज्याप्रश्नोत्तराणि भग्रहयुतौ न पृथक, ॥९॥ सु. भा.-अत्र मध्यगति-स्पष्टगति-त्रिप्रश्न-ग्रहण-शृङ्गोन्नत्यध्यायेषु पंचस्वे वोत्तराधिकारा प्राचार्येणोक्ता अन्येषु किमु नेत्याशङ्कयाह-ग्रहयोगेन्दुच्छायेति ग्रहयोगो ग्रहयुतिः । इन्दुच्छाया चन्द्रच्छायासाधनम् । ग्रहोदयास्तमयाधिकारः । भानां गृहस्य लुब्धकस्य मुनेरगस्त्यस्य चोदयास्तादिसाधनम् । एतेषां तथा भगृह युत्यधिकारे च मया पृथक्-पृथक् तत्क्रान्तिज्या प्रश्नोत्तराणि तेषां क्रान्तिज्या दिभिर्ये प्रश्नास्तथोत्तराणि च नोक्तानि तत्प्रश्नोत्तराणां पूर्वप्रतिपादितपञ्चाध्याय प्रश्नोत्तरान्तर्गतत्वादित्याचार्याशय इति ॥ ९ ॥ वि. भा.-ग्रहयुतिः । चन्द्रच्छायासाधनम् । ग्रहाणामुदयास्ताधिकारः । नक्षत्राणां ग्रहस्य लुब्धकस्य मुनेरगस्त्यचोदयास्तादि साधनम् । एतेषां तथा भग्रह युत्यधिकारे पृथक् पृथक् तत् क्रान्तिज्या प्रश्नोत्तराणि तेषां क्रान्तिज्यादिभिर्ये प्रश्नास्तथोत्तराणि च न कथितानि, अधोलिखितपञ्चाध्यायप्रश्नोत्तरान्तर्गतत्वात् मध्यगति-स्पष्टगति-त्रिप्रश्न-ग्रहण-श्रृंङ्गोन्नत्यध्यायेषु पञ्चस्वेवोत्तराधिकारा प्राचार्येण कथिताः ॥९॥ अब विशेष कहते हैं। हेि. भा.-ग्रहयुति, चन्द्रच्छाया साधन, ग्रहों के उदयास्ताधिकार, नक्षत्रों के ग्रह के ११४६ लुब्धक मुनि, अगस्त्य के उदयास्तादि साधन । इन सबों के तथा भग्रहयुत्यधिकार में पृथक् पृथक् क्रान्तिज्यादि से प्रश्न और उत्तर नहीं कहा गया है, क्योंकि वे अधो लिखित पांच अध्यायों के प्रश्नोत्तरान्तर्गत है । मध्यगति-स्पष्टगति-त्रिप्रश्न-ग्रहण-शृङ्गोन्नति इन पांच अध्यायों में ही उत्तराधिकार को प्राचार्य ने कहा है इति ॥९॥ इदा नीमध्यायोपसंहारमाह । इति परिलेखाध्यायः श शशिशृङ्गोन्नत्युत्तरमार्यादशकेन सप्तदशः ॥१०॥ सु. भा.-इति भुजाद्येषु साधनेषु शशिशृङ्गोन्नत्युत्तरं नाम शशिशृङ्गोन्नते: परिलेखाध्याय आयदशकेन सप्तदशो जात इति ।। १० ।। मधुसूदनसूनुनोदितो यस्तिलकः श्रीपृथुनेह जिष्णुजोक्त । हृदितं विनिध्याय नूतनोऽयं, रचितः शृङ्गविधौ सुधाकरेण । इति श्रीकृपालुदत्तसूनुसुधाकरद्विवेदिविरचिते ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तनूतनतिलके शृङ्गोन्नत्युत्तराध्यायः सप्तदश ।। १७ ।। वि. भा-इति भुजाद्येषु साधनेषु चन्द्रशृङ्गोन्नत्युत्तरं नाम चन्शृङ्गोन्नतेः परिलेखाध्याय आर्यादशकेन सप्तदशः समाप्तो जात इति ॥१०॥ इति ब्राह्मस्फुट सिद्धान्ते चन्द्रश्शृङ्गोन्नत्युत्तराध्यायः सप्तदशः ॥१७॥ अब अध्याय के उपसंहार को कहते हैं। हेि. भा.-भुजादि साधनों में चन्द्रशृङ्गोन्नति का चन्द्रश्ङ्गोन्नत्युत्तरनामक दश आर्याओं से युक्त सत्रहवां अध्याय समाप्त हुआ इति ।॥१७॥ इति ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त में चन्द्रशृङ्गोन्नति का उत्तराध्याय (सत्रहवा श्रध्याय) समाप्त हुआ । ब्रह्मस्पटसन्तः कुलह यः ब्राह्मस्फटसिद्धान्तः अथ कुट्टकाध्यायः कुट्टकाध्यायः प्रारभ्यते । तदारम्भप्रयोजनं कथ्यते । प्रायेण यतः प्रश्नाः कुट्टाकारादृते न शक्यन्ते । ज्ञातु वक्ष्यामि ततः कुट्टाकारं सह प्रश्नैः ॥१॥ सु. भा-कुट्टाकारादृते विना यः प्रायेण बाहुल्येन गणकैः प्रश्ना ज्ञातुं न शक्यन्ते ततः प्रश्नैः सह कुट्टाकारं वक्ष्यामीति।। १ ।। वि. भा.-यतः प्रायेण (बाहुल्येन) कुट्टाकारं (कुट्टक) बिना गाणितिकैः प्रश्ना ज्ञातु न शक्यन्ते ततः (तस्मात्कारणात्) प्रश्नैः सह कुट्टाकारं कथया मीति ॥१॥ अब कुट्टकाध्याय प्रारम्भ किया जाता है । उसके आरम्भ करने के प्रयोजन को कहते हैं । हेि. भा.-क्योंकि प्रायः कुट्टाकार बिना गणक प्रश्नों को समझने में समर्थन नही होते हैं इसलिये प्रश्नों के साथ कुट्टाकार (कुट्टक) को कहता हूं इति ॥१॥ इदानीं कुट्टकादीनां प्रशंसामाह । कुट्टकखर्णधनाव्यक्तमध्यहरणैकवर्णभावितकैः । प्राचार्यस्तन्त्रविदां ज्ञातैर्वगप्रकृत्या च ॥२॥ सु. भा.-कुट्टकेन । खेन शून्यसङ्कलनादिना । ऋणधनयोः सङ्कलनादिना । अव्यक्तसङ्कलनादिना । मध्यहरणेन. मध्यमाहरणेन वर्गसमीकरणेन । एकवर्ण समीकरणेन । भावितेन । एतैज्ञतैर्वर्गप्रकृत्या व ज्ञातया तन्त्रविदां मध्ये गणक श्राचार्यो भवत्यतस्तेषां ज्ञानमावश्यकमिति ॥ २ ॥ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते वि. भा-कुट्टकेन गणितेन, खेन (शून्ययोगान्तरादिना) ऋणधनयोयों गान्तरादिना, अव्यक्तानां योगान्तररादिना, मध्यमाहरणेन, एकवर्णसमीकरणेन, भावितसंज्ञकगणितेनएतैज्ञतैिर्वर्गप्रकृत्था चज्ञातया ज्योतिर्विदां मध्ये गणक आचार्यो भवतीति । सिद्धान्तशेखरे “वस्वर्णकुट्टककृतिप्रकृति प्रभेदानव्यक्तवर्णसदृशे च बीजे । ते मध्यमाहरणभावितके च बुद्ध वा निःसंशयं भवति दैवविदां गुरुत्वम् ।” श्रीपतिनाऽप्यव्यक्तगणितभेदास्तत्प्रशंसा च कृतेति ॥२॥ ११५० अब कुट्टक आदियों की प्रशंसा को कहते हैं। हिं. भा.-कुट्टकगणित, शून्य के सङ्कलनादि, ऋण और धन के सङ्कलनादि, अव्यक्तों के सङ्कलनादि, मध्यमाहरण, एक वर्णसमीकरण, भवितगणित, वर्ग प्रकृति इन सबों के समझदार गणक ज्योति:शास्त्रज्ञों के मध्य में आचार्य होते हैं । सिद्धान्तशेखर में ‘वस्वरणे कुट्टककृतिप्रकृतिप्रभेदान्’ इत्यादि वि. भा. में लिखितश्लोक से श्रीपति ने अव्यक्त गणित के भेद और उनकी प्रशंसा की हैं इति ॥२॥ इदानीं कुट्टकमाह । अधिकाग्रभागहारादूनाग्रच्छेदभाजिताच्छेषम् । यत्तत् परस्परहृतं लब्धमधोऽधः पृथक् स्थाप्यम् ॥३॥ शेषं तथेष्टगुणितं यथाग्रयोरन्तरेण संयुक्तम् । शुध्यति गुणकः स्थाप्यो लब्धं चान्त्यादुपान्त्यगुणः ॥४॥ स्वोध्र्वोऽन्त्ययुतोऽग्रान्तो हीनाग्रच्छेदभाजितः शेषम् । अधिकाग्रच्छेदहृतमधिकाग्रयुतं भवत्यग्रम् ॥५॥ सु. भा.--यत्र कोऽपि राशिरेकेन हरेण हृतोऽयं शेषः स एव राशिरपरेण हरेण हृतोऽयं शेष इति छेदद्वयं शेषद्वयं चोद्दिश्य तं राशि कोऽपि पृच्छति तत्राधिः कागूभागहारादधिकशेषसंबंधिहारात् किं विशिष्टादूनागूच्छेदभाजितादल्पशेषसंबं धिहारहृताच्छेष यत् यत् परस्परहृतं लब्धं च पृथगधोऽधः स्थाप्यम् । एतदुक्त भवति । अधिकागूभागहारेऽल्पागूभागहारेण हृते यच्छेषं तेनाल्पागूभागहारो विभक्तो यदत्र शेषं तेन प्रथमशेषं. भक्त पुनरत्र यच्छेषं तेन द्वितीयशेषं भक्तमेवं यथेच्छं कर्म कर्तव्यम् । फलानि चाधोऽधः स्थाप्यानि । एवमभीष्टं शेषं तथा केना पीष्टेन गुणितं यथाऽगूयोरन्तरेण संयुक्त तद्भाजकेनोपान्तिमशेषेण हृतं शुध्यति । एवं सति स गुणकः पूर्वस्थापितफलानामधः स्थाप्यो लब्धव च गुणकस्याध स्थाप्यम् । ततोऽन्त्यात् कर्म कर्तव्यम् । कथमित्याहोपान्त्यगुण इति स्वोध्र्व उपा न्त्यगुणोऽन्त्ययुतस्ततस्तदन्त्यं त्यजेदेवमगूान्तोऽन्ये य ऊध्र्वरराशिः स हीनागृच्छेद भाजित ऊनशेषसम्बन्धिहरेण भक्तस्तत्र यच्छेषं तदधिकशेषहरेण गुणितमधिकशेष युतं सराशिर्भवति । स एव छेदवधस्यागू भवति इति-अग्मिसूत्रेण सम्बंधः । अत्रैतदुक्त भवति । यदि स राशिश्छेदयोर्वधसमेन हरेण भक्तस्तदा तद्धराल्पत्वात् स राशिरेव शेषं भवतीति । यथा मदुक्तमुदाहरणम् चतुस्त्रिशद्धतो द्वयः पंक्तयगूो विश्वभाजित तं राशि शीघ्रमाचक्ष्व यदि जानासि कुट्टकम् ।। अत्र ३४ छेदस्य शेषम् २॥१३ छेदस्य शेषम् १० । अतोऽधिकागूभागहारः ३४ ॥ अनेनाधिकागूभागहारे हृते शेषम् । ततः परस्परहृते १३)३४(२ २६ ८) १३(१ ५) ८(१ ११५१ ३)५(१ १४ अत्रैतावत् कर्मकृत्वा प्राप्तं शेषं २ यदीष्टद्वयेन गुण्यते तदा गुणनफलम्=४। इदमगृान्तरेणा ८ नेन युक्तम् =१२ । इदं तद्धरेणा ३ नेन भक्त लब्धं निरगृम्=४ अतः फलानामधो गुणकस्तदधो लब्धं च संस्थाप्योपान्तिमेन स्वोध्र्वे हतेन्त्येन युते तदन्त्यं त्यजेदित्यादिनाऽग्रान्तः=३६ । अग्र' हीनाग्रच्छेदेना ३४ नेन भाजितो जातं शेषम्=२ । इदमधिकाग्रभागहारहतमधिकाग्रयुतं जातो राशिः=३६ । अयं यदि हारेणा-३४X१३=४४२नेन विभज्यते तदा शेषं राशिसममेव भवति । यदि वल्ली समा स्यात् तदैवं कर्म कर्तव्यं यदि विषमा तदा गुणकाधो यल्लब्धं स्थापितं तट्टणं प्रकल्प्य बीजप्रक्रियया योगान्तरन्तादि कर्म कर्तव्यम् इदं वक्ष्यति चाचार्योऽग्रे १३ सूत्रेणेति । अभीष्टशेष केन गुणमगूान्तरयुतं तद्धरभक्त शुध्यतीत्यत्र यदि शेषं रूपसमं भवेत् तदा तच्छेषमग्रान्तरसमेन गुणकेन गुणमगूः न्तरमेवातस्तत्रागूान्तरशोधनेन तद्धरभक्तन लब्धं निरगू शून्यं लाघवेन विदितं भवेदतो भास्कराचार्येण ‘मिथो भजेत् तौ दृढ़भाज्यहारौ यावद्विभाज्ये भवतीह रूपम्’-इत्युक्तमिति सर्वं मत्कृतकुट्टकोपपत्त्या स्फुटम् । (द्रष्टव्ये मच्छोधिते अत्रोपपत्तिः । कल्प्यतेऽधिकागूम्=शे, तद्धरश्च=ह. । ऊनागूम्=शे. । ११५२ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते तद्धरश्च=ह । अथ यथाऽधिकागूतद्धाराभ्यामालापो घटते तथा कल्पितं राशि मानम्=हा, का+-शे, । इदमूनागूहारेण भक्त लब्धं नीलकं तद्गुणितहरस्तच्छेष युतो जातः पूर्वराशिसमः । ह. नी+-शे=ह, का+-शे, । ह, का + (शे,-शे) समशोधनादिना नीलकमानमभिन्नम्= नी= अत्र ह१, हर भाज्यहाराभ्यां यदि कुट्टकक्रिया क्रियते तदा यद्राशियुग्मं स्यात् तत्रा धरो राशिरेवाचार्यस्यागूान्तः स ह अनेनोनागूहरेण तष्टः शेषं कालकमानं ‘ते भाज्यभाजकमाने भवतः' इति भास्करबीजेन कालकमानमूनागूहराल्पं जातं तद धिकागूहारेण हतं तच्छेषयुतं राशिमानं स्यादिति । अथ परमं कालकमानम्=ह. १ । इद-ह, मनेन गुणं शे, युतं जातम्=ह, ह-ह.+-शे,=ह, ह (ह,-शे,) । अत्र प्रश्नानुसारेण ह,>शे, । अत ह,–शे, इदं धनात्मकं तेन पूर्वागतं राशिमानं सर्वदा-ह, ह१ ऽस्मादल्पमतश्छेदवधहरेण भक्त राशिमानं शेष राशि मानसममेवेत्युपपन्नं छेदवधस्य भवत्यगृमिति ।। ३-५ ।। वि. भा-कश्चित् भाज्यः केनचिद्धरेण भक्तोऽयं शेषः स एव भाज्योऽपरेण हरेण भक्तश्चायं शेष इति हरद्वयं शेषद्वयं चोक्त्वा स भाज्यः क इति प्रश्ने जायमाने अधिकशेषसम्बन्धिहरमल्पशेषसम्बन्धिहरेण विभज्यावशेषं परस्परं विभजेत्। अयमर्थः-अधिकशेष हरेऽल्पशेषहरेण भक्त यच्छेषं तेनाल्पशेषहरे भक्त यच्छेषं तेन प्रथम शेषे भक्त यच्छेषं तेन द्वितीयशेषं भजेदिति क्रिया वारंवारं कार्या फलानि चाधोऽधः स्थाप्यानि । एवमभीष्टं शेषं तथा केनापीष्टेन गुणितं यथा शेषयोरन्तरेण युतं तद्धरेणोपान्तिमशेषेण भक्त शुध्यति । एवं सति स गुणकः पूर्वस्थापितफलानामधः स्थाप्यः । लब्धं च गुणकस्याधः स्थाप्यम् । ततोऽन्त्यात्कर्म कर्तव्यम् । स्वोध्र्व उपान्त्यगुणोऽन्त्ययुतस्तदन्त्यं त्यजेत् । एवमन्ये य ऊध्र्वराशिः स हीनशेषसम्बन्धिहरेण भक्तो यच्छेषं तदधिकशेषेण गुणितं—अधिकशेषयुतं तदा स राशिर्भवति । स एव छेदवधस्याग्र' भवतीत्यस्याग्रिमसूत्रेण सम्बन्धः । अत्रोदाहरणं म. म. सुधाकरद्विवेद्युक्तम् । चतुस्त्रिशद्धतोद्वयग्रः पङ्क्तयग्रो विश्वभाजितः । तं राशि शीघ्रमाचक्ष्व यदि जानासि कुट्टकम् । अत्र ३४ हरस्य शेषम्=२ । तथा १३ हरस्य शेषम्=१० अतोऽधिकशेषहरः=१३ । अल्पशेषहरः=३४ । अनेनाधिकशेषहरे भक्त शेषम् =१३, ततः परस्परभजनेन जाता वल्ली उपान्तिमेन स्वोध्र्वे हतेऽन्त्येन युते तदन्त्यं २ । ३६ त्यजेदित्यादिनाऽग्रान्तः=३६ प्रयं हीनाग्रच्छेदेना (हीनशेषहरेण) ऽनेन १ | १४ भक्तो जातं शेषम्=२ । इदमधिकाग्रभागहार (अधिक शेषहर) गुणित १ | ८ मधिकशेषयुतं जातो राशिः=३६ अयं यदि हरयोघांतसमेन हरेरणा २ । ६ ३४x १३=४४२ नेन विभज्यते तदा शेष राशिसममेव भवति । एवं वल्ली' यदि समा स्यात् तदैवं कर्म कर्तव्यम् । यदि च विषमा तदा गुणकाधो यल्लब्धमस्ति तद्दणं प्रकल्प्य बीजक्रियया योगान्तरादि कर्म कर्तव्यम् । अभीष्ट शेषं केन गुणमग्रान्तर (शेषान्तर) युतं तद्धरभक्त शुध्यतीत्यत्र यदि शेष रूपसमं भवेत् तदा तच्छेष शेषान्तरसमेन गुणकेन गुणं शेषान्तरमेवातस्तत्र शेषान्तर शोधनेन तद्धरभक्त न लब्ध निरग्र' शून्यं विदितं भवेदतो मिथो भजेत्तौ दृढ़भाज्य हारौ यावद्विभाज्ये भवतीह रूपम्’ भास्कराचार्येण कथितम् । सिद्धान्तशेखरे ‘अल्पाग्रहृत्या बृहदग्रहारं छित्वाऽवशेषं विभजेन्मिथोऽतः । अग्रान्तरं तत्र युर्ति प्रकल्प्य प्राग्वद्गुणः स्यादधिकाग्रहारः । तेनाहृतः स्वाग्रयुतस्तदग्र' छेदाहृतिः । श्रीपत्युक्तप्रकारोऽयमाचायक्तप्रकारानुरूप एव । बीजगणिते लीलावत्यां च “भाज्यो हारः क्षेपकश्चापत्र्य' इत्यादिना आचार्योक्तापेक्षयाऽतीवस्पष्टरूपेण भास्कराचार्येण प्रदिपादितोऽस्तीति । कल्प्यतेऽधिक शेषम्=शे । तद्धरश्च=ह । अल्पशेषम्=शे । तद्धरश्च= ह, यदाऽधिकशेषतद्धराभ्यामालापो घटते तथा कल्पितं राशिमानम्=ह. क-+शे इदमल्पशेषहरेण भक्त लब्ध' न तद्गुणितहरस्तच्छेषयुतो जातः पूर्वराशिसमः । ह. न+-शे=ह. क-+-शे समशोधनादिना न मानमभिन्नम्=न = ह. क+(शे-शे) अत्र ह, ह भाज्यहाराभ्यां यदि कुट्टकक्रिया क्रियते तदा यद्राशिद्वयं तत्राधो हैं अनेन अल्पशेषहरेण भक्तः शेषं गुणकरूपं क मानमल्पशेषहराल्पं जातं तदधिक शेषहरेण गुणं तच्छेषयुतं राशिमानं भवति । अथ परमं क मानम्=ह-१ इदं-ह अनेन गुणितं शे युतं जातम्=ह. ह-ह--शे=ह. ह--(ह-शे) । अथ प्रश्नानु सारेण ह>शे अतः ह-शे इदं धनात्मकं तेन पूर्वागतं राशिमानं सर्वदा -ह, हँ अस्मादल्पमतो हरघातहरेण भक्त राशिमानंशेष राशिमानसममेव ।'अधिग्रकाभागः हारं छिन्द्यादूनाग्रभागहारेण । शेषपरस्परभक्त मतिगुणमग्रान्तरे क्षिप्तम् ।। अध उपरिगुणितमन्त्ययुगूनाग्रच्छेदभाजिते शेषम् । अधिकाग्रच्छेदगुणं द्विच्छेदाग्र मधिकाग्रयुतम् ।।' इत्यार्यभटोक्तप्रकारस्यैव ब्रह्मगुप्तश्रीपत्योः प्रकारश्धपुनरूपा दनांमात ॥३-५॥ ११५४ ब्रास्फटसिद्धान्ते अब कुट्टक को कहते हैं। हेि. भा.-किसी राशि को एक हर से भाग देने से जो शेष रहता हैं वही उसी राशि को दूसरे हर से भाग देने से रहता है। तब यह राशि क्या है। अधिक शेष सम्बन्धी हर में अल्पशेष सम्बन्धी हर से भाग देने से जो शेष रहता है उसको परस्पर भाग देने से लब्ध को पृथक् अधोऽधः स्थापन करना। अधिकशेष सम्बन्धी हर में अल्पशेष सम्बन्धी हर से भाग देने से जो शेष रहता है उससे अल्पशेष सम्बन्धी हार को भाग देने से जो शेष रहता है उससे प्रथम शेष को भाग देना । फिर यहां जो शेष रहे उससे द्वितीय शेष को भाग देना। इस तरह बराबर कर्म करना चाहिये । फलों को अघोऽधः स्थापन करना। इस तरह अभीष्ट शेष को किसी इष्ट से गुणा कर दोनों शेषों को जोड़ना जिससे वह भाजक (हर) उपान्तिम शेष से शुद्ध हो । इस तरह वह गुणक पूर्वस्थापित फलों के अधः स्थापन करना । तब अन्त से कर्म करना चाहिये । कैसे सो कहते हैं। ऊध्र्वाङ्क को उपान्त्य से गुणाकर अन्त्य को जोड़ देना चाहिये, उस अन्त्य को त्याग देना चाहिये । इस तरह अन्त्य में जो ऊध्र्व राशि होता है उसको अल्प शेष सम्बन्धी हर से भाग देने से जो शेष रहे उसको अधिक शेष सम्बन्धी हर से गुणाकर अधिक शेष को जोड़ने से राशि होता है। यहां म. म. सुधाकर द्विवेदी का उदाहरण है। हेि. भा.- किसी राशि को चौंतीस से भाग देने से दो शेष रहता है और तेरह से भाग देने से दश शेष रहता है उस राशि को कहो । यहाँ ३४ हर का शेष=२ है। १३ हर का शेष = १० हैं । इसलिये अधिक शेष सम्बन्धी हर=१३ अल्प शेष सम्बन्धी हरः= ३४ है। इससे अधिक शेष सम्बन्धी हर को भाग भाग देने से शेष= १३ तब परस्पर भाग देने से वल्ली | ३६ ‘उपान्तिमेन स्वोध्र्वे हतेऽत्येन युतं तदन्त्यं त्यजेत्' इत्यादि से अग्रान्त=३६ इसको १ १४ | अल्प शेष सम्बन्धी ३४ इस हर से भाग देने से शेष =२, इसको अधिक शेष २ | ६ सम्वन्धी हर से गुणाकर अधिक शेष को जोड़ने से राशि =३६, इसकी यदि दोनों हरों के घात के बराबर हर ३४x १३=४४२ से भाग देने से शेष राशि के बराबर होता है। यदि वल्ली सम रहे तब ही इस तरह कर्म करना । यदि वल्ली विषम रहे तब गुणक के नीचे जो लब्ध स्थापित है उसको ऋण कल्पना कर बीज़ क्रिया से योग अन्तर आदि कर्म करना चाहिये । इष्ट शेष को किस से गुणाकर दोनों शेषों के अन्तर को जोड़कर हर से भाग देने से शुद्ध होता है यहां यदि शेष रूप १ के बराबर हो तब शेष को शेष द्वय के अन्तर तुल्य गुणक से गुणा करने से शेषद्वय का अन्तर ही रहता है इसलिये उसमें शेषान्तर को घटाकर हर से भाग देने से लब्ध निःशेष शून्य होता है अतः लीलावती में ‘मिथो भजेत्तौ दृढ़भाज्य हारौ' इत्यादि भास्कराचार्य ने कहा है। अभिन्नात्मक-ह. क+(-शे) कुट्टकाध्याय --- उपपत्ति । कल्पना करते हैं अधिक शेष =शे । उसका हर=ह । अल्प शेष =शे, इसका हर

ह जिस तरह अधिक शेष और उसके हर से आलाप घटे वैसे कल्पित राशिमान[सम्पाद्यताम्]

ह. क-+-शे इसको अल्प शेष सम्बन्धी हर से भाग देनेसे लब्ध न तद्गुणित हर में शेष जोड़ने से पूर्व राशि के समान हुआ ह. क+-शे= ह. न-+-शे समशोधन आदि करने से न मानं ११५५


८ यहाँ ह, ह इन भाध्य और हर से यदि कुट्टक क्रिया की

जाती है तो जो राशिद्वय होता है उनमें नीचे की राशि ही आचार्य का अग्रान्त है उसको ह इस अल्प शेष हार से भाग देने से शेष क मान होता है ते भाज्य तद् भाजक वर्णमाने' इस भास्करोक्ति से क मान अल्प शेष सम्बन्धी हर से अल्प हुआ । उसको अधिक शेष सम्बन्धी हर से गुणाकर शेष जोड़ने से राशिमान होता है। परम क मान=ह-१ इसको-ह से गुणाकर शे जोड़ने से ह. ह -ह-+शे=ह ह-(ह-शे) । यहाँ प्रश्न के अनुसार ह>शे इसलिये ह-शे यह धनात्मक है । अतः पूर्वागत राशिमान सदा-ह, ह इससे अल्प होगा इसलिये शेष घात तुल्य हर से राशि मान को भाग देने से शेष राशिमान के बराबर ही होता है इति ॥३-५॥ इदानीं विशेषमाह छेदवधस्य द्वियुगं छेद्वधो युगगतं द्वयोरग्रम् । कुट्टाकारेणैव त्र्यादिग्रहयुगगतानयनम् ॥ ६ ॥ सु. भा-छेदबधस्य पूर्वेश्लोकेन सम्बन्धः पूर्वं प्रतिपादितः । द्वियुगं द्वयोग हयोर्योगश्छेदयोर्वधो भवति तथा युगगतमन्तिमयोगाद्यद्गतं तदुद्वयोश्छेदयोरगू शेषं भवति । एवं कुट्टाकारेण त्र्यादिगृहयुगतानयनं कार्यम् । अत्रैतदुक्त भवति । यथैको गृहो दिन चतुस्त्रिशता ऽन्यश्च त्रयोदशदिनैरेकं भगणं भुक्त । तयोरन्तिम युतेर्दशदिनानि व्यतीतानि तदा कल्पात् कियन्ति दिनानि व्यतीतानीति प्रश्ने को राशिश्चतुस्त्रिशद्धतो दशशेषस्त्रयोदशाहृतंश्च दशशेष इति प्रश्नोत्तरेणैवोत्तरसिद्धिः । अत्रागृयोः समत्वादधिकागूहरश्चतुस्त्रिशदेव कल्पितस्ततः पूर्वप्रकारेणागूयोरन्तरं शून्यं गृहीत्वा गुणकार शून्यं प्रकल्प्यागूान्तः शून्यसमो वा ि द्वितीयहारसमस्तदा राशिः=ह, ह+-शे, अयमगृश्छेदवधश्च छेदं इत्येकस्य प्रकल्प्यान्यस्यैक भगण कालस्तद्धरस्तदगूश्च पूर्वशेषसमः=शे, इति प्रकल्प्य पुनः कुट्टाकारेणैव विधिना ११५६ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते ‘गूहत्रयान्तिमयुतेर्दशदिनानि व्यतीतानि तदा कल्पगतं कि' मिति प्रश्नोत्तरमा नेयम् । एवं त्र्यादिगृहयुगगतानयनं कार्यम् ।। ६ ।। वि. भा-छेदवधस्यैतस्य पूर्वेश्लोकेन सम्बन्धः । द्वियुगं (द्वयोग्रहयोर्योगः) छेदवधो भवति । युगगतं (अन्तिमयोगाद्यद्गतं) तत् द्वयोश्छेदयोरग्र' (शेषं) भवति, एवं कुद्दाकारेण त्र्यादिग्रहयुगगतानयनं कार्यम् । यथैको ग्रहो दिनचतुस्त्रिंशता ऽन्यच्च त्रयोदशदिनैरेकं भगणं भुङ्क्त तयोरन्तिमयुतेर्दशदिनानि व्यतीतानि तदा कल्पात् कियन्ति दिनानि व्यतीतानीति प्रश्ने को राशिश्चतुस्त्रिशद् भक्तो दशशेषस्त्रयोदशभक्तश्त्र दशशेष इति प्रश्नोत्तरेणैव तदुत्तरसिद्धिः । अत्र शेषयोः समत्वादधिकशेषसम्बन्धिहरश्चतुस्त्रिशदेव कल्पितः । ततः पूर्वप्रकारेण शेष योरन्तरं शून्यं गृहीत्वा गुणकारं शून्यं प्रकल्प्याग्रान्तः शून्यसमो वा द्वितीयहार समस्तदा राशिः=ह. ह--श अय शषा हरघातश्च हर इत्यकस्य प्रकल्प्यान्यस्यक भगणकालस्तद्धरस्तच्छेषश्च पूर्वशेषसमः=शे इति प्रकल्प्य पुनः , कुट्टाकारेणैव ग्रहान्तिमयुतेर्दशदिनानि व्यतीतानि तदा कल्पगतं किमिति प्रश्नोत्तरमानेयम् । एवं त्र्यादिग्रह युगतानयंनं कर्तव्यमिति ।। ६ ।। अब विशेष कहते हैं । हेि. भा.-दो ग्रहों का योग छेदवध (हर घात) होता है अन्तिम योग से जो गत है वह दोनों हर का शेष होता है। एवं कुट्टाकार से व्यादि ग्रहयुगगतानयन करना चाहिये । जैसे एक ग्रह चौंतीस दिन में अन्य ग्रह तेरह दिन में एक भगण को भोग करता है। दोनों का अन्तिम योग से दश दिन का समय व्यतीत हुआ तब कल्प से कितने दिन व्यतीत हुए इस प्रश्नमें कौन राशि है-जिस को चौंतीस से भाग देने से दस शेष रहता है। तेरह से भाग देने से दस शेष रहता है इस प्रश्न के उत्तर ही से उसकी उत्तर सिद्धि होती है। यहां शेषद्वय के समत्व से अधिक शेष सम्बन्धी हर चौंतीस ही कल्पना किया गया । तब पूर्व प्रकार से दोनों शेषों के अन्तर को शून्य मानकर गुणकार को शून्य कल्पना करं एक भगण काल-उसका हर और शेष पूर्वशेष शे के बराबर कल्पनाकर पुन: कुट्टक से ग्रह के अन्तिम योगसे दश दिन व्यतीत हुए तब कल्पगत क्या है इस प्रश्न का उत्तर लाना चाहिये । इस तरह तीन आदि ग्रहों का युग गतानयन करना चाहिये ।। ६ ।। इदानीं भगणादिशेषतो ऽहर्गणानयनमाह । भगणादिशेषमग्र' छेदहृतं खं च दिनजशेषहृतम् । अनयोरग्र' भगणादि दिनजशेषोद्धतं थुगणः ॥ ७ ॥ सु. मा-भगणादिशेषं छेदहृतमगू भवति । खं शून्यं दिनजशेषहृतमेकदिन संबन्धि यद्भगणादिशेषं तद्दिनजशेषं तेन हृतं द्वितीयमगू कल्प्यम् । भगणादिशेष मेकमगू तच्छेदो दृढ़कुदिनादि । शून्यमपरमगू तच्छेदो दिनजशेषमिति प्रकल्प्यान योश्छेदयोर्वधसमे छेदे पूर्वोक्तकुट्टाकारेणागू साध्यं तद्भगणादि दिनजशेषोद्धतं द्युगणोऽहर्गणः स्यादिति । अत्रोपपत्तिः । अहर्गणप्रमाण या । इदं कल्पभगणगुणं कुदिनहृतं लब्धं गतभगणाः का। शेषं कल्प्यते भशे । ततो जातं समीकरणम् । कभ. या= ककु. का-+-भशे । ककु. का+-भशे

या =

भ ११५७ अत्र ककु, कभ भाज्यहाराभ्यां यौ राशी तत्राधरः कभ तष्टः शेषं कालकमा नम् । परन्तु यद्यधिकागूम्-भशे, तच्छेदः=ककु । ऊनागूम्=० तच्छेदश्च दि जभगणशेषम्=कभ । तदाऽऽचार्योक्त कुट्टाकारेण छेदवधच्छेदेऽगृमानम्=का. ककु +-भशे । अत इदमगू दिनजशेषहृतं लब्धं यावत्तावन्मानमहर्गणः स्यादिति एवं राश्यादिशेषेऽपि तत्तच्छेदाभ्यां छेदवधच्छेदेऽगूमानीय तदगू' तद्दिनजशेषहृतं लब्धमहर्गणो भवतीत्युपपन्नमिति । अत्र कोलबू कानुवादानुसारेण प्रश्नरूपार्यायास्त्रुटिः सा च (इष्टभगणशेषाद्वा राश्यंशकलाविलिप्तिकाशेषात् । आनयति द्युगणं यः कुट्टाकारं स जानाति ॥ ९ ॥ एवं भवितुमर्हति । इयमार्या च स्पष्टार्था ।। ९ ।। वि. भा:- भगणादिशेषं (भगणशेषम्। राशिशेषम् । कलाशेषम्। विकला शेषम् । तत् षष्ट्यशादि शेषं छेदहृतं (छेदेन कुदिनात्मकेन भक्त) अग्र' (शेषं) भवति । दिनजशेषेण (एकदिनसम्बन्धिभगणदिशेषेरण) खं (शून्यं) भक्त द्वितीय शेषं कल्प्यम् । अत्रायमर्थः-भगणादिशेषमेकमग्र (शेषं) तच्छेदो (हरः) दृढ़ कुदिनानि । शून्यं द्वितीयमग्र' तच्छेदो दिनजशेषमिति. प्रकल्प्य अनयोश्छेदाहृति तुल्ये छेदे पूर्वोक्तकुट्टकरीत्याऽग्र (शेष) साध्यं तद्भगणशेषेण भक्त लब्धमहर्गणो भवेदिति । अत्रोपपत्तिः । अत्र कल्प्यते ऽहर्गणमानम्=य । तदा ऽनुपातो यदि कल्पकुदिनैः कल्प भगणा लभ्यन्ते तदाऽहर्गणेन किमित्यनुपातेन समागच्छन्ति गतभगणाः, भगण शेषं च, तदाऽनुपातस्वरूपम् x य ककु =भशे पक्षौ (कल्पभ) भक्तौ तदा य= ककु x गभगण +भशे ककुxगभगण-+- अत्र ककु, कल्पभ भाज्यहाराभ्यां यौ राशी तत्राधरः कल्पभभक्तः शेषं गतभगण मानम् । परन्तु यद्यधिक् शे=भशे, तद्धरः=ककु, अल्पशेषं = ०, तद्धरः=कभगण तदा कुट्टकविधिना छेदवध (हरघात) समे हरे शेष मानम्=गतभगण. ककु+-भशे अत इदं शेषमानं कल्पभगणभक्त लब्ध य मानं भवेद्राश्यादिशेषेऽपि तत्तच्छेदाभ्यां छेदघातसमे छेदेऽग्र (शेष) मानीय तत्कल्पभगणभक्तमहर्गणो भवतीति । सिद्धान्त शेखरे “चक्रक्षभागकलिका विकलादिशेषमग्र ' स्वहारविहृतं भगणादि भक्तम् । न्यूनाग्रमत्र हि फलं भगणादिनाप्तं लब्धं भवेद्दिनगणस्त्वपवर्त्तिते स्यात् ।” श्रीपत्युक्तोऽयं प्रकार प्राचार्योक्तिप्रकार सम एवेति ॥७॥। अत्र कोलजू कानुवादानुसारेण प्रश्नरूपार्यायास्त्रुटिर्वतते सा च ‘इष्ट भगणशेषाद्वा राश्यंश कलाविलिप्तिकाशेषात् । आनयति द्युगणं यः कुट्टाकारं स जानाति एवं भवि तुमर्हतीति ॥९॥ अब भगणादि शेष से अहर्गणानयन कहते हैं । हेि. भा.-भगणादि शेष (भगण शेष,राशिशेष, कलाशेष, विकलाशेष, उसके षष्टय' (६०) शादि शेष) को छेद (दृढ़कुदिन) से भाग देने से अग्र (शेष) होता है। एक दिन सम्बन्धी भगणादिशेष (दिनज शेष) से शून्य को भाग देने से द्वितीयशेष होता है। अर्थात् भगणादि शेष एक अग्र (शेष) उसका छेद (हर) दृढ़ कुदिन । और शून्य द्वितीय अग्र उसका छेद दिनज शेष कल्पना कर दोनों छेदों के घात तुल्य छेद में कुट्टक रीति से अग्र(शेष)साधन करना उसको भगणशेष से भाग देने से लब्ध अहर्गण होता है। यहां कोलब्रक साहब के अनुवादानुसार प्रश्नरूप प्रार्था की त्रुटि है वह संस्कृतोपपत्ति में लिखित श्लोक के सदृश होना चाहिये ॥९॥ उपपत्ति । कल्पना करते हैं अहर्गण प्रमाण=य तब अनुपात करते हैं यदि कल्प कुदिन में कल्प भगण पाते हैं तो अहर्गण में क्या इस अनुपात से आते हैं गतभगण और भगणशेष ! तब = गतभ-+ ':' , छेदगम से कल्पभ. य=ककु. गतभ-- भशे, दोनों पक्षों को कल्पभ भाग देने से य = ककु. गतभ +-भशे कम और हार से जो दो राशिप्रमाण होता है उसमें अघर (नीचे की) राशि को ‘कल्पभ' से भाग देन से शेष गतभगण का मान होता है। परन्तु यदि अधिकाग्र =भशे, उसकी हर=ककु, अल्पाग्र=०, उसका हर= कभगण । तब कुट्टक विधि से छेदवध तुल्य छेद में शेषमान=गत कुट्टाध्यायः ११५९ भगण. ककु+-भशे इसलिये इस शेषमान को कल्पभगण से भाग देने से लब्ध य मान होता है। राश्यादिशेष में भी तत् तत् शेष के छेदद्वय से छेदद्वय घात तुल्य छेद में अग्र (शेष) को लाना चाहिये, उसको कल्पभगण से भाग देने से प्रहर्गण होता है। सिद्धान्तशेखर में “चक्रक्षभाग कलिका विकलादिशेष' इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित श्लोक से, श्रीपति ने आचार्योक्त प्रकार के सदृश ही कहा है इति ।। ९ ।। इदानीं विशेषमाह । दिनजभगणादि शेषं येन गुणं मण्डलादिशेषकयोः । सदृशाच्छेदोद्धतयोस्तद्धातमहर्गणाद्यमतः ॥८॥ सु.भा.-उद्दिष्टं मण्डलादिभगणादिशेषं यदि येन केनापीष्टेन गुणं भवेत्। तदा द्वे शेषे सदृशच्छेदे च कृत्वा ततस्तयोः शेषकयोः सदृशच्छेदोद्धतयोश्च कृत्वा ‘भगणादिशेषमगू छेदहृत'मित्यादिविधिना तद्घातसम्बन्ध्यगू साध्यं तदा तदगू तज्जातीयं कल्पगतं भवेदतोऽहर्गणाद्य भवति । यथा कस्मिन् घटिकात्मके कल्पगते चन्द्रस्य भगणशेष ४१०५ भवेत् । यदि १३७ ि देदनैश्चन्द्रभगणाः पञ्च ५ भवन्ति । अत्र यदि दिनानि १३७ षष्टिगुणानि कृत्वा १३७-६०=८२२० अयं हरः कल्प्यते तदा सच्छेदमुद्दिष्टभगणशेषम् =***५. । िदनजभगणशेषं पूर्ववत् ५ । ततः ‘खं ८२२० च िदनजशेषहृत' भित्यादिनोनागू सच्छेदम्= । अथ सच्छेदे शेषे ४ *५ - । अत्र शेषयोः सच्छेदयोः पञ्चभिरपवत्र्य जाते नूतने सच्छेदे शेषे – ३१ १६४४ ९ । अधिकागूभागहारा दूनागूछेदभाजिताच्छेषमित्यादिना प्रथमशेषम् = ० । तच्छेदः=१ । शून्येनेष्टेन गुणकारेण गुणितं प्रथमशेषं लब्धमगुान्तरेण युतं ८२१ तच्छेदेन १ हृतं लब्धं निरगूम्=८२१ । अत्र पूर्वलब्ध्यभावाद्वल्ली छ३ } अगूान्तः ० । ऊनायूच्छेदभाजितः शेषम्=० । अधिकागुच्छेदहतमिदमधिकागूयुतं जातो राशिः ८२१ । इदं घटयात्मक कल्पगतं तत् षष्टिहृतं जातं कल्पगतं दिनादि १३ ॥ ४१ ॥ अत्रोपपत्तिः । ‘भगणादिशेष'मित्यादि पूर्वसूत्रान्तर्गतैव ।। ८ ।। वि. भा.-मण्डलादि (भगणादि) शेषं येन केनापीष्टेन यदि गुणं भवेत्तदा। द्वेशेषे सदृशच्छेदे च कृत्वा तयोः शेषयोः सद्दशच्छेदभक्तयोः कृत्वा ‘भगणादिशेष मग्र ' छेदहृत'मित्यादिना तद्धातसम्बन्ध्यग्रसाध्यं ब्रदा तदग्र तज्जातीयं कल्पगतं भवेत्ततो ऽहर्गणाद्य भवतीति । ११६० ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते यथा कस्मिन् घटिकात्मके कल्पगते चद्रस्य भगणशेष ४१०५ भवेत् । यदि १३७ दिनैश्चन्द्रभगणाः पञ्च ५ भवन्ति । अत्र यदि दिनानि x६०= १३७x६० ४१०५ =८२० कृत्वा हरः कल्प्यते तदा सच्छेदमुदृिष्टभगणाशेषम्= , पूर्ववत् दि ८२२ नज भगणशेषम्=५। ततः खेच दिनज शेषहृत' मित्यादिना ऽल्पाग्र' सच्छेदम् = ६ । अथ सच्छेदे शेषे ४१०५ , ६ अत्र शेषयोः सच्छेदयोः पञ्चभिरपवत्र्य जाते ८२२० ५ नवीने सच्छेदेशेषे ८२१ अधिकाग्रभागहारादूनाग्रच्छेद भाजितादित्या दना प्रथमशेषम्=० । तच्छेदः=१, शून्येनेष्टेन गुणकारेण गुणितं प्रथमशेषं लब्धं शेषान्तरेणयुतं ८२१ तच्छेदेन १ हृतं लब्धं निरग्रम् =८२१ अत्र पूर्वलब्ध्यभावात् इदं घटयात्मकंकल्पगतं तत् षष्टिभक्त कल्पगतं दिनादि ।॥१३॥४१॥ अत्रोपपत्तिः । ‘भगणादिशेषमग्र' छेदहृतं खं च दिनजशेषहृत'मित्यादेरुपपत्तिदर्शनस्फुटेति ।८।। अब विशेष कहते हैं। हेि. भा-भगणादि शेष को यदि जिस किसी इष्ट से गुणा करते हैं तो दो शेष और (सदृशच्छेदों) को करके सदृशच्छेद से भक्त उन दोनों शेषों को करके ‘भगणादि शेष मग्र' छेदहृतं’ इत्यादि से उसका घात सम्बन्धी अग्र (शेष) साधन करना चाहिये तब वह अग्र तज्जातीय कल्पगत होता है उससे अहर्गणादि होता है जैसे किसी घटिकात्मक कल्पगत में चन्द्र का भगण शेष ४१०५ होता है। यदि १३७ दिनों में चन्द्र भगण ५ होता है। यहां यदि इनको दिन १३७x६०=८२२० करके हरकल्पना की जाय तब सच्छेद (छेदसहित) ४१०५ उद्दिष्ट भगण शेष = , पूर्ववत् दिनज भगण शेष =५ तब ‘खं च दिनजशेषहृतं ’ .८२२० इत्यादि से सच्छेद अल्पाग्र= ८२२० ५ ८२१ पांच से अपवत्र्तन देने से नवीन छेद सहित शेषद्वय .. * - ‘ अधिकाग्रभागहारा दूनाग्र च्छेद भाजितात्’ इन्यादि से प्रथम शेष= १० । उसका छेद =१, शून्य इष्ट गुणकार से गुणित प्रथम शेष में शेषान्तर ८२१ को जोड़ देने से जो होता है उसको छेद से भाग देने से लब्ध निरग्र = ८२१, यहां पूर्वलब्धि के प्रभाव के कारण वल्ली --, यह ८२१ घटयात्मक कल्प गत है इसको साठ से भाग देने से कल्पगत दिनादि ।॥ १३॥४१ इति । है ॥८॥ कुट्टकाध्यायः “भगणादि शेषमग्र छेदहृतं खं च दिनजशेषहृतम्’ इत्यादि की उपपति देखने से स्फुट इदानीं स्थिरकुट्टकमाह । हृतयोः परस्परं यच्छेषं गुणकारभागहारकयोः । तेन हृतौ निश्छेदौ तावेव परस्परं हृतयोः ॥९॥ लब्धमधोऽधः स्थाप्यं तथेष्टगुणकारसङ गुण शेषम् । शुध्यति यथैकहीनं गुणकः स्थाप्यः फलं चान्त्यात् ।।१०।। अग्रान्तमुपान्त्येन स्वोध्व गुणितोऽन्त्यसंयुतोभक्तम् । निःशेषभागहारेणैवं स्थिरकुट्टके शेषम् ॥११॥ सु. भा-यो राशिः केनचिदुद्दिष्टेन गुणकेन गुणित एकहीन उद्दिष्टभाग हारेण भक्तः शुध्यति स क इति प्रश्नोत्तरार्थं प्रथमं गुणभागहारयोर्महत्तमा पवर्तनमानीयते । परस्परं हृतयोर्गुणकारभागहारकयोरन्ते यच्छेषं तेन हृतौ तौ गुणभागहारौ निश्छेदौ दृढ़ौ भवत इति । ततस्तयोढयोर्गुणभागहारयोः परस्पर हृतयोर्लब्धमधोऽधः स्थाप्यं पूर्वप्रतिपादितकुट्टाकारविधिना । एवमिदं कर्म यथे च्छशेषपर्यन्तं कर्तव्यम् । ततस्तच्छेषं तथा केनापीष्टगुणकारेण गुणितं रूपेण हीनं तच्छेषसम्बन्धिच्छेदेन हृतं यथा शुध्यति । एवं सतीष्टगुणकारः पूर्वाधोऽधः स्थापित फलानामधः स्थाप्यस्तदन्त्याच फलं स्थाप्यम् । एवं सम्पन्नायां वल्ल्यामुपान्त्येन स्वोध्व गुणितोऽन्त्येन संयुत एवं कुट्टाकारविधिनैवागूान्तं कर्म कर्तव्यम् । तत् निःशेषभागहारेण दृढभागहारेण भक्त शेषमेवं स्थरकुट्टकां भवतात । अत्र प्रथम गुणकारेण भागहारो विभाज्यः । अत्रोपपत्तिः । ‘परस्पर भाजितयोर्ययोर्यः शेषस्तयोः स्यादपवर्तनं स : इत्यादि भास्करविधिना स्फुटा इहाचार्येण रूपबिशुद्धौ गुण एव साधितोऽतो ऽत्राधरराशिरेवागूान्तो दृढभागाहारेण तष्ट इति सर्व भास्करकुट्टकप्रकरणेन स्फुटम् ।। ९-११ ।। अत्रकोलबू कानुवादानुसारेण प्रश्नरूपाययास्त्रुटिः सा च । (भगणादिशेषतोऽर्कस्यान्येषां वा दिवागणार्थं त्वम् । स्थिरकुट्टक प्रचक्ष्व कुट्टार्णव पारगोऽसि यदि ।। १४।।) एवं भवितुमर्हति । वि. भा-यो राशिः केनचिदुद्दिष्टेन गुणकेन गुणितः, एकहीनः, उद्दिष्ट ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते हरेण भक्तः शुध्यति स राशिः कः । प्रथमं गुणहरयोर्महत्तमापवर्तनमानीयते । परस्पर भक्तयोगुणहरयोरन्ते यच्छेषं तेन भक्तौ तौ (गुणहरौ भवतः) दृढ़ौ गुण हरौ भवतः । ततो दृढ़योगुणहरयोः परस्परं भक्तयोर्लब्धान्यधोऽधः स्थाप्यानि, पूर्वप्रदर्शिातकुट्टकनियमेन । इदं कर्म तावत्पर्यन्तं कर्तव्यं यावदन्ते रूपं शेषं तिष्ठेत् । तच्छेषं तथा केनापि गुणकेन गुणितं रूपेण हीनं तच्छेषसम्बन्धिहरेण भक्त शुध्यति । सत्येवं गुणकः पूर्वाधोऽधः स्थापितकलानामधः स्थाप्यः, तदन्तात्फल स्थाप्यम् । एवं जातायां वल्यां उपान्तिमेन स्वाध्व गुणितोऽन्त्येन युत इति कुट्टक विधिना शेषान्तं यावत्कर्म कर्तव्यम् । तत् दृढ़भागहारेण (दृढ़हरेण) भक्त शेषमेव स्थिरकुट्टको भवतीति । अथ महत्तमापवर्तनार्थ कल्प्यते । भाज्यः=य ।. भाजकः=क, भाजकेन भक्तभाज्ये लब्धं= न शेषम्=प । पुनः प अनेन स्वहारे क भक्त लब्धं=ल, शेषम्=ह, पुनरनेन शेषेण स्वहारे प भक्त लब्ध=र, शेषम्=० तदाऽवश्यमेव य, क माने ह अनेन निः शेषौ भवेताम् । हरलब्ध्योघतः शेषयुतो भाज्यसभी भवतीति तेन. य=क. न+-प । क=प. ल+ह। प=ह. र एतत् समीकरणत्रयाव लोकनेन स्फुटमवसीयते यत् प अयं ह अनेन निः शेषः स्यात् । ततः क अयमपि तेनैव निः शेषो भवेत् । एवं क, प अनयोनिःशेषत्वात् य अयमपि ह अनेन निः शेषो भवेदेवेति । एतावता 'हृतयोः परस्पर यच्छेषं गुणकार भागहारकयो' रित्या चार्योक्तमुपपन्नम् । सिद्धान्तशेखरे “परस्पर भाजितयोस्तु शेषकं तयोद्वयोरप्यप वर्तनं भवेत् । तदुद्धतच्छेदविभाजकौ क्रमादभीष्टनिघ्नौ तु गुणाप्तयोः क्षिपेत् श्रीपत्युक्तमिदमाचार्योक्तानुरूपमेवास्ति, तथा लीलावत्यां “परस्पर भाजितयोर्य योर्यः शेषस्तयोः स्यादपवर्तनं सः तेनापवत्र्तेन विभाजितौ यौ तौ भाज्यहारौ दृढ़संज्ञकौ स्तः ।' इति भास्करोक्तमपि-प्राचीयक्तानुरूपमेवास्ति । प्राचार्येणात्र रूपशुद्धौ गुणक एव साधितोऽतोऽत्राधरराशिरेवाग्रान्तो दृढ़भागहारेण भक्त इति ॥९-११॥ कोलबू कानुवादानुसारेण प्रश्नरूपार्यायास्त्रटिरस्ति सा च ‘भगणादिशेष तोऽर्कस्यान्येषां वा दिवा गणार्थ त्वम् । स्थिरकुट्टकं प्रचक्ष्व कुट्टार्णवपारगोऽसि यदि' ,॥१४॥ एवं भवितुमर्हति । अथ स्थिर कुट्टक को कहते हैं। हेि. मा.–जिस राशि को किसी उद्दिष्ट गुणक से गुणाकर एक धटा कर उद्दिष्ट हर से भाग देने से शुद्ध होता है वह राशि क्या है। पहले गुणक और हर का महत्तमाप वर्तन लाते हैं। परस्पर गुणक और हर को भाग देने से अन्त में जो शेष रहता है उससे कुट्टकाध्याय गुणक और हर को भाग देने से दृढ़ संज्ञक गुणक और हर होता है तब दृढ़ गुणक और हर को परस्पर भाग देने से जो लब्धियाँ हो उन्हें अधोऽधः स्थापन करना चाहिये । पूर्वं प्रदर्शित कुट्टक नियम से इस कर्म को तब तक करना चाहिये जब तक अन्त में रूप शेष रह जाय । उस को किसी गुणक से गुणाकर रूप को घटा कर उस शेष सम्बन्धी हर से भाग देने से शुद्ध हो जाय । इस तरह पूर्वाधोऽधः स्थापित फलों के नीचे गुणक को स्थापन करना चाहिये । अन्त में फल स्थापन करना चाहिये । इस तरह वल्ली सम्पन्न होने पर उपान्त्य से ऊध्र्वाङ्क को गुणाकर अन्त्य को जोड़ना । इस कुट्टक विधि से अग्रान्तपर्यन्त कर्म करना चाहिये । उसको दृढ़ भाग हार से भाग देने से शेष ही स्थिर कुट्टक होता है। उपपत्ति । महत्तमापवर्तन के लिये कल्पना करते हैं भाज्य-=य । भाजक=क, भाज्य में भाजक से भाग देने से लब्ध=न, शेष=प । पुनः प इससे अपने हर क को भाग देने से लब्ध=ल, शेष=ह । पुनः इस शेष से अपने हर प में भाग देने से लब्ध=र, शेष=० तब अवश्य ही य, क, का मान ह इससे निः शेष होगा, हर और लब्धि के घात में शेष को जोड़ देने से भाज्य के के बराबर होता है इसलिये य=क. न +-प। क=प. ल+-ह। प=-ह. र इन तीनों समीकरणों को देखने से स्फुट समझ में आता है कि प यह ह इससे निः शेष होगा, तब क यह भी उसी से निः शेष होगा इस तरह क, और प के निःशेषत्व से य यह भी ह इससे निःशेष होगा ही । इससे 'हृतयोः परस्परं यच्छेषं भाग-भागहारकयोः' इत्यादि आचार्योक्त उपपन्न हुआ । आचार्य ने रूप शुद्धि में गुणक ही साधन किया है इसलिये यहां अधर राशि ही को दृढ़ भाग हार से भाग दिया गया है। सिद्धान्तशेखर में ‘परस्पर भाजितयोस्तु शेषकं तयोर्द्धयोरप्य पवर्तनं भवेत्' इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित श्लोक से श्रीपति ने आचार्योक्त के अनुरूप ही कहा है । तथा लीलावती में ‘परस्परं भाजितयोर्ययोर्यः शेषः' इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित पद्य से भास्कराचार्य ने भी प्राचार्योक्त के अनुरूप ही कहा है ॥९-११॥ कोलजूक साहिब के अनुवाद के अनुसार प्रश्नरूप आर्या की त्रुटि है वह संस्कृतोपपत्ति में लिखित पद्य के अनुसार होना चाहिये ॥१४॥ इदानीं स्थिरकुट्टकादहर्गणमाह । इष्टभगणादिशेषात् स्वकुट्टकगुणात् स्वभागहारहृतात् । शेषं छुगणो गतनिरपवत्तगुणभागहारयुतः ॥१२॥ सु. भा:-यदि भगणशेषमिष्टं तदा कल्पभगणा गुणकारः । यदा राशि शेषमिष्टं तदा द्वादशगुणाः कल्पभगणा गुणकारः । भागहारस्तु सर्वदैव कल्प कुदिनानि ज्ञेयानि । एक गुणकारभागहाराभ्यां स्थिर स्वकुट्टकं विधाय तत इष्टभगणादिशेषात् किं विशिष्टात् स्वकुट्टकगुणात् पुनः किं विशिष्टात् स्वभागहार ११६४ हृताद्यच्छेषं स द्युगणोऽहर्गणो भवति स गत निरपवर्त्तगुणभागहारयुतोऽनेकधा भवति । गतः प्राप्तो निरपवत्र्तेन येनापवत्र्तेन गुणसम्बन्धी यो भागहारस्तेनार्थाद् दृढभागहारेण युतोऽनेकधा भवतीति । अत्रोपपत्तिः । ‘क्षेपं विशुद्धि परिकल्प्य रूपं पृथक् तयोर्ये गुणकारलब्धी' इति भास्करविधिना स्फुटा ।। १२ ।। वि. भा.--यदि भगणशेषमिष्टं तदा कल्प भगणा गुणकारः । यदि च राशि शेषमिष्ट तदा द्वादशगुणाः कल्पभगणा गुणकारः । भागहरस्तु सदैव कल्पकुदिनानि ज्ञातव्यानि । एवं गुणकहाराभ्यां स्थिरं स्वकुट्टक विधाय स्वकुट्टकगुणात्-स्वभाग हारभक्तादिष्टभगणाद्विशेषाद्यच्छेषं सोऽहर्गणो भवति । निरपवत्र्तन गुणसम्बन्धी गतः (प्राप्तः) यो भागहारस्तेनार्थाद् दृढ़भागहारेण युतोऽनेकधा भवतीति ॥ भाज्य. गु-१ ल अत्र कुट्टकयुक्तया ये गुणलब्धी ते ऋणात्मकक्षेपे । ततः ऋणात्मकरूपक्षेपे यदि समागतगुणलब्धी तदेष्ट ऋणात्मकक्षेपे किं ये गुणलब्धी ते स्वहारभक्त तदा वास्तवगुणलब्धी भवेताम् । लीलावत्यां ‘क्षेपं विशुद्धि परिकल्प्य रूपं पृथक् तयोर्ये गुणकारलब्धी' इत्यादि भास्करोक्तमप्येतादृशमेव सर्वत्रैव भास्करोक्तौ यादृशीं विषयप्रतिपादने स्पष्टता न तादृशी-श्राचार्योक्ताविति अब स्थिर कुट्टक के लिये अहर्गण को कहते हैं । हेि. भा.-यदि भगण शेष इष्ट है तो कल्प भगण गुणकार होता है। यदि राशि शेष इष्ट है तो बारह गुणित कल्प भगण गुणकार होता है। भाग हार सदा कल्प कुदिन होता है। इस तरह गुणकार और भाग हार से स्थिर स्वकुट्टक करके स्वकुट्टक गुणित और स्वभाग हार से भक्त इष्ट भगणादि शेष से जो शेष हो वह अहर्गण होता है दृढ़ भाग हार को जोड़ने से अनेकधा होता है इति । भाज्य-*=ल । यहाँ कुट्टक नियम से जो गुणक और लब्धी आती है वे गु ऋणात्मक रूपक्षेप में । तब अनुपात करते हैं यदि ऋणात्मक रूपक्षेप में ये गुणक और लब्धि तौ इष्ट ऋणात्मक क्षेप में क्या इससे जो गुणक और लब्धी ही उन्हें अपने हर से भाग देने से वास्तव गुणक और लब्धि होती हैं। लीलावती में 'क्षेपं विशुद्धिं परिकल्प्य रूपं’ इत्यादि भास्करौक्त भी इसी तरह है इति ॥१२॥ कुट्टकाध्याय ११६५ स्थिरकुट्टकेन विकलादिशेषाद् गृहाहर्गणयोरानयनं ब्रह्मगुप्तेन भास्करा चार्येण चोक्त, प्राचीनैः प्राधान्येन विकलादिशेषादहर्गणानयनार्थमेव कुट्टकविधि रुक्तः । भास्कराचार्येण च लीलावत्यां ‘अस्य गणितस्य ग्रहगणिते महानुपयोग स्तदर्थ किञ्चिदुच्यते' इत्युक्त्वा तद्विधिश्च “कल्प्याथशुद्धिर्विफलावशेषं षष्टिश्च भाज्यः कुदिनानि हारः । तज्जं फलं स्युर्विकला गुणस्तु लिप्ताग्रमस्माच्च कलालवाग्रम् । एवं तदूध्वं च तथाधिमासावमाग्रकाभ्यां दिवसा रवीन्द्वोः ॥” विधिरुक्त: । ग्रहस्य विकलाशेषाद्ग्रहाहर्गणयोरानयनम् । तद्यथा । तत्र षष्टिभज्यः । कुदिनानि हारः । विकलावशेषं शुद्धिरिति प्रकल्प्य गुणलब्धी साध्ये तत्र लब्धिर्विकलाः स्युः । गुण कलाशेषम् । एवं कलावशेष शुद्धिः । षष्टिर्भाज्यः । कुदिनानि हारः । लब्धिः कलाः गुणो भाग (अंश) शेषम् । भागशेषं शुद्धिः । त्रिंशद्भाज्यः । कुदिनानि हारः फलं भागाः । गुणो राशिशेषम् । एवं राशिशेषं शुद्धिः । द्वादशभाज्यः । कुदिनानि हारः । फलं गतराशयः । गुणो भगणशेषम् । कल्पभगणा भाज्यः । कुदिनानि हारः । भगण शेषं शुद्धिः । फलं गतभगणाः । गुणोऽहर्गणः स्यात् । अहर्गणज्ञानेन ग्रहज्ञानं सुगम मेव । यद्यपि श्रीपतिना कुट्टकाध्यायेऽयं विषयो (विकलादि शेषाद्ग्रहाहर्गणयोरान यनं) नोक्तस्तथापि प्रश्नाध्याये-एतद्विषयक प्रश्नो विलिखितो यथा “यो राशिशे षादथ भागशेषाल्लिप्ताविलिप्तोद्भवशेषतो वा । अहोगतं तत्परशेषतोऽपि जानाति खेटं च स कुट्टकज्ञः ॥” अर्थात् भगणादि ग्रहानयने यो राशिशेषस्तस्मात् । भागशेषात् भगणादि ग्रहानयन एव योंऽशशेषस्तस्मात् । भगणादिगृहानयने कलाशेषाद्वि कलाशेषाद्वा । खेटं (गृहं) तत्परशेषतोऽपि कला विकलादीनां पष्टयशेषु मुहुर्वर्धि तेषु तत्परतोऽपि यः शेषस्तस्मादपि च यो गणको गतमहर्गणं जानाति स कुट्टकज्ञो स्तीति । अस्योपपत्तिः । कल्पकुदिनैः कल्पभगणा लभ्यन्ते तदाऽहर्गणेन किमिति त्रैरा शिकेनाऽभीष्टदिने भगणादिगृहानयनं क्रियते । तत्र पूर्वोक्तानुपातेन लब्धा भगणाऽव शिष्ट भगणशेषम् । तच्च भगणशेषं द्वादशगुणं कल्पकुदिनैर्भक्त लब्धा राशयः । शेष राशिशेषं भवति । पुना राशिशेषं त्रिंशद्गुणितं कल्पकुदिनैर्भक्त लब्धा अंशाः शेषं चांशशेष भवति । तदंशशेषं षष्ट्या गुणितं कल्पकुदिनैर्भक्त लब्धाः कलाः शेषं च कलाशेषम् । कलाशेषमपि षष्ट्या गुणितं कल्पकुदिनैर्भक्त लब्धा विकला भवन्ति शेषं विकलाशेषमिति भगणादिशेषाणां परिभाषा । अतोऽत्रराश्यादिशेषात् गृहानयने कुट्टकगणितानुसारेण सम्भवे सति भाज्यहारक्षेपाः केनाप्यङ्कनापवत्त नीयाः । ततः पूर्वकथितरीत्या कलाशेषस्य गुणकः षष्टिः हारो दृढ़कुदिनानि । अथ येन गुणकेन गुणितश्छेदो विकलाशेषयुतः स्वगुणकेन षष्ट्या भक्तो निः शेषो भवति स गुणको गृहविकला भवन्ति फलं च कलांशेषम् । एवं कलाशेषात् कला अंशशेषं च भवति । एवमन्ते भगणशेषज्ञानं भवेत् तस्मादहर्गणज्ञानं च भवति । ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते यथा कलाशेषं षष्टिगुणं दृढ़कुदिनभक्त लब्धं गृहविकलाः शेषं च विकलाशेष मिति । हरलब्ध्योघतः क्षेपयुतो भाज्यराशिसमः ६०x कशे=गृविx दृकु+विशे कशे-गुविxदृदृकु +विशे अतो दृढ़कुदिनमानं येन गुण विकलाशेषयुतं षष्टि भक्त निरगू भवति । स गुणको गृहविकलाः । फल च कलाशेषमिति । एवं स्वस्वशेषगुरच्छेदाभ्यां तत्तच्छेषमाने भवत इति । भगणादिशेषादहर्गणानयन विधिरार्यभटीये महासिद्धान्ते भगणाद्यगूाणि स्युः क्षेपा ऋण संज्ञकाः क्वहाश्छेदः । भगणादीनां भाज्याभगणायंखा' गना तना तेना ।। विकलाशेषोत्पन्नं फलं विलिप्ता गुणः कलाशेषम् । लिप्तागूोत्पन्न फलं लिप्तागुणकोंऽशशेषं स्यात् । लवशेषजफलमंशा गुणको राश्यगूकं भवति । राश्यगूोत्पन्नफलं गृहाणि गुणको भवेद् भगणशेषम् । मण्डलशेषप्रभवं फलं च चक्राण्यहर्गणो गुणकः ।।' इति । स्थिर कुट्टक से ग्रहानयन और विकलादिशेष से अहर्गणानयन ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्यने किया है। विकलादिशेष से अहर्गणानयन को ही प्राचीनाचार्य प्रधानरूप से कुट्टक विधि कहते हैं। भास्कराचार्य ने लीलावती में ‘अस्य गणितस्य ग्रहगणिते महानुपयोग स्तदर्थं किञ्चिदुच्यते’ यह कहकर उसकी विधि “कल्प्याथ शुद्धिर्विकलावशेष षष्टिश्च भाज्यः कुदिनानि हारः” तज्जं फलं स्युर्विकला गुणारतु लिप्ताग्रमस्माच्च कलालवाग्रम् । एवं तदूध्र्व च तथा इत्यादि से भास्कराचार्य ने विधि कही है। ग्रह के विकलाशेष से ग्रहानयन अहर्ग रणानयन करते हैं । जैसे-साठ भाज्य । कुदिन हर, विकलावशेष शुद्धि ये कल्पना कर गुणक और लब्धि साधन करना चाहिये, यहाँ लब्धि विकला होती है। और गुणक कलाशेप । एवं कलाशेष शुद्धि । साठ भाज्य । कुदिन हर इससे लब्धि कला होती है और गुणक भाग (अंश) शेष होता है । भागशेष शुद्धि, तीस भाज्य, कुदिनहर इससे लब्धि गतराशि प्रमाण होता है । गुणक भगणशेष होता है। कल्पभगण भाज्य । कुदिन हर, भगणशेष शुद्धि इससे लब्धि गतभगण होता है। गुणक अहर्गण होता है । अहर्गण ज्ञान से ग्रहानयन सुगम ही है। यद्यपि श्रीपति ने कुट्टकाध्याय में इस विषय को (विकलादिशेष से ग्रहानयन और अहर्गणा नयन) नहीं कहा है । तथापि प्रश्नाध्याय में एतद्विषयक प्रश्न लिखे हैं जैसे ‘यो राशिशेषादथ भागशेषा'दित्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित श्लोक से स्पष्ट किया है । अर्थात् भगणादि ग्रहानयन में जो राशि शेष है उससे, भगणादिग्रहानयन में ही जो अंश शेष है उससे भगणादि ग्रहानयन में कलाशेष से या विकलाशेष से ग्रह को और अहर्गण को जो गणक जानते हैं वे कुट्टकज्ञ हैं । (१) यंखा-१२ । गना= ३० । तना=६० । तेना= ६० द्वितीयार्यभटकृते महा

सिद्धान्ते एवमेव केरलमतानुसारी सवत्रैव संख्यापाठोऽस्तीति ।

इसकी उपपत्ति ।

यदि कल्प कुदिन में कम्पभगण पाते हैं तो अहर्गण में क्या इस त्रैराशिक से अभीष्ट दिन में भगणादि ग्रहानयन करते हैं । उपर्युक्तानुपात से लब्ध भगण होता है और शेष भगण शेष है । इस भगण शेष को बारह से गुणा कर कल्प कुदिन से भाग देने से लब्ध राशिप्रमाण होता है । शेष राशि शेष है । रात्रि शेष को तीस से गुणाकर कल्प कुदिन से भाग देने से लब्ध अंश होता है । शेष अंश शेष होता है। इस अंश शेष को साठ से गुणा कर कल्पकुदिन से भाग देने से लब्धि कला होती है । और शेष कला शेष होता है । कला शेष को साठ से गुणाकर कल्पकुदिन से भाग देने से लब्धि विकला होती है । शेष विकला शेष होता है । यही भगणादिशेषों की परिभाषा है । अतः यहां राश्यादि शेष से प्रहानयन में छुट्टक गणितानुसार सम्भव रहने पर किसी अङ्क से भाज्य हार-क्षेपों को अपवर्तन देना चाहिये । तब पूर्वकथित रीति से कलाशेष के गुणक साठहार दृढ़कुदिन, जिस गुणक से गुणित छेद में विकलाशेष जोड़कर अपने गुणक साठ से भाग देने से नि:शेष हो वह गुणक ग्रहविकला होती है । लब्धिकला शेष होता है । कलाशेष से कला अ श शेष होता है । इस तरह अन्त में भगणशेष ज्ञान होता है । उससे अहर्गणानयन भी होता है । जैसे कलाशेष को साठ से गुणाकर दृढ़ कुदिन से भाग देने से लब्धि ग्रहविकला होती है और शेष विकला शेष होता है । हर और लब्धि के घात में होप को जोड़ने से भाज्य के बराबर होता है।

∴ ६० x कशे = ग्रवि. दृकु + विशे ∴ ग्रवि. दृकु + विशे = कशे अतः दृढ़कुदिन मानं

जिस गुणक से गुणाकर विकला शेष को जोड़कर साठ से भाग देने से निरग्र (नि:शेष) हो वह गुणक ग्रहविकला होती है । और लब्धि कलाशेष होता है । भगणादि शेष से अहर्गाणा नयन की विधि आर्यभटीय महासिद्धान्त में है जैसे-

'भगणाद्यग्राणि स्युः क्षेप ऋण संज्ञकाः कुट्टाछेदः ।
भगणादीनां भाज्या भगणा यंखा[१] गना तना तेन ।'

इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित श्लोकों से स्फुट है इति ।।

भास्कराचार्येण ‘कल्प्याथ शुद्धिविकलावशेषमित्यादौ कथ्यते यदस्य गणितस्य ग्रहगणिते महानुपयोगस्तदुपयोगित्वसम्बन्धे विचार्यते । यथा भगणादिशेषतो ऽहर्गणानयनार्थं दृढ़भगणशेषं चक्रविकलाभिर्गणितं दृढकुदिनैर्भक्त लब्धं विकलात्मकग्रहः शेषं विकलाशेषं तत्स्वरूपम् = विग्र + छेदगमेन दृभशे x चवि = इकृदि. विग्र + विशे अतः दृभशे

दृभशे xचवि

दृकुदि खेद ११६८ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते = दृकुदि. विग्र-+विशे , विग्र=विकलात्मकगृह । विशे = विकलाशेष । चवि चवि =चक्रविकला। अत्र यदि चक्रविकलातो विकलाशेषमल्पं तदाऽस्मिन् दृकुदि. विग्र स्वरूपेऽपि शेषेणावश्यं भवितव्यम् यतो दृढभगणस्वरूपे दृढ़कुट्टकावसरः । कुट्टकस्य सार्वदिक दृढ़त्वमस्त्येवातो विकलाशेषस्य शेषस्य च योगश्चक्रविकलासमः । अन्यथा दृढत्वाभावापत्तिः । अथ यदि लब्धिः=ल तदा भशे= - ल. चवि + शे -- विशे अर्थात् ल-+- विशेो - च,ि िवशे परन्त्वत्र शे < <चविपरञ्च दृढभगणशेषं शे-+-विशे निरवयवमतः शे-+विशे=चवि अतः –= १ । तेन ल+१= दृभशे चवि अन्यथा दृढ़त्वाभावात्कुट्टकस्याव्याप्तिः । अतः चवि-शे=विशे, यदि शे=० तदा विशे=चवि । यदि चवि-शे> दृकु स्यात्तदा ‘येनच्छिन्नौ भाज्यहारावित्यादि युक्तया खिलोद्दिष्टत्वात् दृढभगणशेषमपि खिलम् । अखिलोदाहरणसत्वे ‘कल्प्याथ शुद्धिर्विकलावशेष'मित्यादिना ऽहर्गणः साध्यः । अथ पूर्वानीतभगणशेषस्वरूपे छेदगमादिना दृभशे:विविशे = विगू अत्र कुट्टकयुक्तया ऽहर्गणज्ञानं सुलभम् । परञ्चोक्तस्वरूप एव भशे. चवि-विगू. दृकुः=विशे, अस्मिन् इ. चवि योजनेन तुल्य गुणक पृथक् करणेन च (दृभशे. इ) चवि-विगृ=विशे-+इ. चवि अत्र यदि विशे-+इ. चवि-इकु तदा दृभगशे.+इ.=भगशे-विशे-+इ. चवि =विशे अस्मादपि कल्प्याथ शुद्धिर्विकलावशेषमित्यादिना ऽहर्गणः साध्य इति । भास्कराचार्य लीलावती में ‘कल्प्याथ शुद्धि विकलावशेषं' इत्यादि कहते हैं कि ‘अस्य गणितस्य ग्रहगणिते महानुपयोगः' अर्थात् इस गणित के ग्रहगणित में बहुत उपयोगिता है । उसकी उपयोगिता के सम्बन्ध में विचार करते हैं। यथा भगणादिशेष से अहर्गणानयन के लिये दृढ़भगणशेष को चक्र विकला से गुणाकर दृढ़कुदिन से भाग देने से लब्ध विकलात्मक ग्रह होता है शेषविकला शेष रहता है उसका स्वरूप := **************–= विग्र +- दृकुदि छेदगम से दृभशे. चवि=दृकुदि.विग्र-+विशे । अतः इकुदि. विग्र-+विशे =विकलात्मकग्र, विशे=विकलाशेष, चवि=चक्रविकला, यहाँ यदि चक्रविकला से विकला शेष अल्प है तब दृकु.िवि.इस स्वरूप में भी शेष अवश्य होना चाहिये, क्योंकि दृढ़भगः रणस्वरूप में दृढ़ कुट्टक का अवसर है । कुट्टक का सार्वदिक दृढ़त्व है ही इसलिये विकलाशेष कुट्टकाध्यायः और शेष का योग चक्र विकला के समान है। अन्यथा दृढ़त्वाभाव रूप आपत्ति होगी । यदि लब्धि = ल तब भशे = ल. चवि+शे+विशे अर्थात् ल +- शे-+विशे परन्तु यहां शे <चवि, विशे < चवि लेकिन दृढ़ भगण शेष निरवयव है इसलिये शे + विशे = चवि शे –+ विशे १, इसलिये ल + १ = दृभशे अन्यथा दृढ़त्व के अभाव से कुट्टक की अव्याप्ति होगी, अतः चवि-शे = विशे, यदि श =० तब विशे = चवि, यदि चविः शे > दृकुदि तब येनच्छिन्नौ भाज्यहारौ' इत्यादि युक्ति से उदाहरण के खिलत्व से दृढ़भग णशेष भी खिल होगा । अखिल उदाहरण के रहने से ‘कल्प्याथशुद्धिर्विकलावशेषं' इत्यादि भास्करोक्त से अंहर्गण साधन करना, पूर्वानीत भगणशेषस्वरूप में छेदगमादि से द्वभशे. चवि-विशे = विग्र । यहाँ कुट्टक की युक्ति से अहर्गणज्ञान सुलभ है। परञ्च उक्त स्वरूप ही में भशे. चवि-विग्र. दृकु=विशे इसमें इ. चवि जोड़ने से और तुल्य गुणक पृथक् करने से (दृभश.इ) चवि-विग्र = विशे + इ. चवि । यहां यदि विशे-+इ. चवि-दृकुदि तब द्वभश +- इ = भगशे x विशे + इ. चवि=विशे, इससे भी ‘कल्प्याथ शुद्धि विकलावशेष' इत्यादि से अहर्गण साघन करना चाहिए इति ।। १२ ॥ इदानीं स्थिरकुट्टके विशेषमाह । एवं समेषु विषमेष्वृणं धनं धनमृण्यं यदुक्त तत् । ऋणधनयोव्र्यस्तत्वं गुण्यप्रक्षेपयोः कार्यम् ॥१३॥ सु. भा-एवं पूर्वागतवल्लीस्थफलेषु समेषु कर्म भवति । विषमेषु फलेषु च। यदिष्टगुणकारतो लब्धं भवेत् तत्तत्र यद्धन वा ऋणमुक्त स्यात् तत् क्रमेण ऋण धनं कार्यम् । एवमृणधनयोर्गुण्यप्रक्षेपयोश्च व्यस्तत्वं कार्यम् । अत्रैतदुक्त भवति । यदि गुणो धनः क्षेपश्च क्षयस्तत्र धनगुणक्षेपाभ्यां कर्म कर्तव्यम् । यत्र च गुणो ऽधनः क्षेपश्च धनस्तन्न धनेन गुणेन ऋणक्षेपे कुट्टकः कर्तव्य इति । अत्रोपपत्तिः । एवं तदैवात्र यदा समास्ताः' इत्यादिभास्करविधिना स्फटा । इहाचार्येण प्रथमं गुणकारेण भागहारो विभाजितोऽतोऽत्र द्वितीय लब्धितौ वल्ली सम्पन्ना तेन समायां वल्ल्यामृणक्षेपेऽन्यथा धनक्षेपे भवतीति । ऋणभाज्ये धनक्षेपे' इत्यादिविधिना शेषोपपत्तिः स्फुटेति ॥ १३ ॥ वि. भा.–विषमेषु फलेषु यदिष्टगुणकारतो लब्धं भवेत्तत्तत्र यद्धनं वा ऋण मुक्त तत् क्रमेण ऋणं धन कार्यम् । एवमृणधनयोगुण्यप्रक्षेपयोश्च व्यस्तत्वं कार्यम् । यदि गुणो घनः क्षेपश्चर्ण तत्र धनगुणक्षेपभ्यां कर्म कार्यम् । यत्र च गुणो ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते ऋणात्मकः क्षेपश्च धनात्मकस्तत्र घनात्मकगुणेन ऋणक्षेपे कुट्टकः कर्तव्य इति । ११७० अत्रोपपत्तिः । भा. गु+-क्षे भा. गु-+-क्ष=हा. ल इ. भा. हा-=इ. भा. हा************(ख) (ख) अत्र समीकरणे (क) समीकरणं विशोध्यते तदा इ. भा. हा (भा. गु+-क्षे)=इ. भा. हा-हा. ल =इ. भा. हा-भा. गु-क्षे=भा (इ. हा -गु)-क्षे=हा (इ. भा-ल) । अत्र यदि इ= १ तदा भा (हा-गु)-क्षे=हा (भा-ल) अतः भा (हा-गु)-क्षे भा—ल अत्र यदि हा-गु=गु । भा-ल भा. ग-क्षे ल तदा ल, लीलावत्यां ‘यदा गतौ लब्धिगुणौ विशोध्यौ स्वतक्ष णाच्छेमितौ तु तौ स्त’ इति भास्करोक्तमप्याचार्योक्त सदृशमेव । अथ भा. गु+-क्षे =हा. ल, उभयत्रापि इ. भा. हा योजनेन भा. गु+क्षे-+ह. भा. हा=हा. ल+इ. भा. हा=भा (गु+इ. हा)+क्षे=हा (ल+इ. भा) अत्र यदि गु+इ. हा=गु, ल-+इ. भा=ल तदा भा. गु-+ क्षे=हा. ले एतावताऽऽचार्योक्तमुपपन्नम् । सिद्धान्त शेखरे “तदुद्धतच्छेदविभाज्यकौ क्रमादभीष्टनिघ्नौ तु गुणाप्तयोः क्षिपेत्” श्रीपत्यु क्तमिदमाचार्योक्तानुरूपमेवेति ॥१३॥ अब स्थिर कुट्टक में विशेष कहते हैं । हिं. भा.-इस तरह पूर्वागत वल्लीस्थ फल में कर्म होता है। विषम फल में इष्ट गुणकार से जो लब्ध हो वह वहां जो धन वा ऋण कथित है वह क्रम से ऋण और धन करना चाहिये । एवं ऋण गुण्य और धन क्षेप को विलोमत्व करना चाहिये । यदि गुणक घन हो और क्षेप ऋण हो वहाँ घनात्मक गुणक और क्षेप से कर्म करना चाहिये । जहां गुणक ऋण हो और क्षेप घन हो वहां धनात्मक गुणक से ऋण क्षेप में कुट्टक करना चाहिये इति । ल. अतः भा. गु-+क्षे=हा. ल ३. भा. हा==इ. भा. हा ******************(ख) (ख) समीकरण में से (क) समीकरण को घटाने से इ. भा. हा-(भा. गु-+क्षे) = इ. भा. हा-हा. ल=इ. भा: हा-भा. गु-क्षे=भा (इ. हा-गु)-क्षे=हा (इ. भा-ल ) । यहां यदि इ=१ तब भा (हा-गु) -क्षे=हा (भा-ल) अतः भा (हा-गु)-क्षे =भा-ल, यहां यदि हा-गु=गु । भा-ल=ल तब भा. गु-क्षे =ल, लीलावती में ‘यदा गतौ लब्धिगुणौ विशोध्यौ' इत्यादि भास्करोक्त इससे उपपन्न होता है जो कि आचार्योक्त के सदृश ही है। भा. गु-+क्षे=हा. ल दोनों में इ. भा. हा जोड़ने से भा. गु-+-क्षे-+इ. भा. हा=हा. ल-+इ. भा. हा=भा (गु-+इ. हा) +-क्षे=हा (ल-+इ. भा) यहां यदि गु-+इ. हा =गु । ल+इ. भा=ल तब भा. गु-+क्षे=हा. ल इससे आचा यक्त उपपन्न होता है। सिद्धान्तशेखर में ‘तदुद्धतच्छेदविभाजकौ क्रमादभीष्टनिघ्नौ' इत्यादि श्रीपत्युक्त भी उपपन्न हुआ जो कि आचार्योक्त के अनुरूप है इति ॥१३॥ इदानीं विलोमगणितमाह। गुणकश्छेदो छेदो गुणको धनमृणमृणं धनं कार्यम् । वर्गः पदं पदं कृतिरन्त्याद्विपरीतमाद्य' तत् ॥१४॥ ११७१ सु. भा.-अन्त्याद् दृश्याद्विपरीतं कार्य तदाऽऽद्यमाद्यराशिमानं भवेत् । शेषं स्पष्टाथम् । ‘छेद गुण गुण छेद वग मूल पद कृतिम्-इत्यादि भास्करोक्त मेतद नुरूपमव ॥ १४ ॥ वि. भा-अन्त्यात् (दृश्यात्) गुणको हरः । छेदोहरः गुणकः । धनं ऋणं, ऋणं धनं, वगों मूलं, मूलं वर्गः, इति सर्व दृश्ये कार्य तदाऽऽद्यराशिमानं भवेत् । सिद्धान्तशेखरे “गुणो हरो हरो गुणः पदे कृतिः कृतिः पदम् । क्षयो धनं धनं क्षयः प्रतीपकेन दृश्यके ।” श्रीपत्युक्तमिदं “गुणकारा भागहरा भागहरा ये भवन्ति गुणकाराः । यः क्षेपः सोऽपचयोऽपचयः क्षेपश्च विपरीते ।।'इत्यार्यभटोक्तस्यानुरूप मेव आचार्यो (ब्रह्मगुप्त) क्तमप्यार्यभटोक्तानुरूपमेव । गुणकारा भागहरा इत्यादे गणितार्थमार्यभटीयटीकाकारस्य परमेश्वरस्योदाहरणम् । कस्त्रिघ्नः पञ्चभि भर्भक्तः षड्भिर्युक्तः पदीकृतः । एकोनो वर्गितो वेदसंख्यः स गणक उच्यताम् ।। छेदं गुणं गुणं छेदं वर्ग मूलं पदं कृतिम् । ऋणं स्वमित्यादि भास्करोक्तमाचार्योक्तानु रूपमेवास्ति । गणेशदैवज्ञोक्तमुदाहरणम् । राशेर्यस्य कराहतस्य च पदं स्वाष्टांश युग्वर्गितं रामाप्तं च निजैस्त्रिभिर्नवलवैरूनं स नूनः पुनः। शिष्टं वेदमितं विलोम विधिना तं ब्रहि राशि सखे चेत् पाटीगणिताटवीप्रकटितं शार्दूलविक्रीड़ितम् ।। ' अब विलोम गणित को कहते हैं। हेि. भा.-अन्त्य (दृश्य) से गुणक को हर, हर को गुणक, धन को ऋण, ऋण ११७२ को धन, वर्ग को मूल, मूल को वर्ग यह सब कर्म दृश्य में करना चाहिये तब प्राद्यराशि मान होता है ॥१४॥ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते राशि में जिन कर्मों को करने से दृश्य के बराबर हौ, दृश्य में उन्हीं कम की विलोम क्रिया से इष्ट राशि मान होता है। सिद्धान्तशेखर में ‘गुणो हरो हरो गुणः पदं कृतिः' इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित श्लोक से श्रीपति ने आचार्य के अनुरूप ही कहा है। ‘गुणकारा भाग हरा भागहरा ये भवन्ति गुणकारा' इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित आर्यभटोक्त प्रकार के अनुरूप ही आचार्यो (ब्रह्मगुप्त) क्तप्रकार भी है । लीलावती में ‘छेदं गुणं गुणं छेदं वर्ग मूल पदं कृतिम्’ – इत्यादि भास्करोक्त भी प्राचायक्त के अनुरूप ही है इति ।॥१४॥ उपपत्ति । र. इदानीं प्रश्नमाह । यो जानाति युगादिग्रहयुगयातैः पृथक् पृथक् कथितैः । द्वित्रिचतुःप्रभृतीनां कुट्टाकारं स जानाति ॥१५॥ सु. भा.-द्विचतुःप्रभृतीनां पृथक्-पृथक् कथितैग्रहयुगयातैय युगादि जानाति स कुट्टाकार जानातीत्यहं मन्ये । अस्योत्तर’ ‘छेदवधस्य द्वियुग’ मिति षष्ठसूत्रेण स्फुटम् । कोलबकसाहबेन यत्पुस्तकादस्याङ्गलभाषायामनुवादः कृतस्त स्मिन्नयं सप्तमः श्लोकः ॥ १५ ॥ अत्रोदाहरणं चतुर्वेदाचार्येण कल्पे रविभगणाः ३० ! चन्द्रभगणाः ४०० । कुजभ. १६ । बुभ. १३० । गुभ. ३ । शुभ. ५० । शभ. १ । चै. उ. भ* ४ । व. पाः भ.२ । भदिनानि १०९९० । सौरमासाः ३६० । चान्द्रमासाः ३७० । अधिमासाः १० । सौरदिनानि १०८०० । चान्द्रदिनानि १११०० । क्षयाहाः १४० । सावनदिनानि १०९६० ! एकस्मिन् दिनै भगणात्मिका गतिश्च । चं. भौ. बु. उ. गु. शु. उ. श. च. उ. कल्पिता । इति सर्व कोलङ्गकानुवादतो ज्ञायते । चतुर्वेदटीकाऽस्याध्यायस्य नोपलब्धाऽस्माभिः ।। १५ ।। च. पा. वि. भा.-द्वित्रिचतुः प्रभृतीनां (द्वित्र्यादीनां) पृथक् पृथक् कथितैग्रहयुग-. यातैर्यो युगादि जानाति स कुट्टाकारं (कुट्टकगणितं) जानातीति । पूर्वोक्त ‘अधिकागूभागहारादूनागृच्छेद भाजिताच्छेषम् । यत् तत् परस्पर हृतं लब्धमधोऽधः पृथक् स्थाप्यम्, इत्यादिश्लोकेषु श्रीमतां म. म. सुधाकरद्विवेदिम होदयानामुदाहरणम् । चतुस्त्रिशद्धतोद्वयग्रः पंक्तयग्रोविश्वभाजितः । तं राशि शीघ्रमाचक्ष्व यदि जानासि कुट्टकम्। एतदनुसारेण “यद्येको ग्रहो दिनचतुस्त्रिंश ताऽन्यश्च त्रयोदशदिनैरेकं भगणं भुक्त तयोरन्तिमयुतेर्दश दिनानि व्यतीतानि तदा कल्पात् कियन्ति दिनानि व्यतीतानीति” प्रश्ने को राशिश्चतुस्त्रिशद्धतोदशशेष स्त्रयोदशाहृतश्च दशशेष इति प्रश्नोत्तरेणैवोत्तरसिद्धिः । एवं त्र्यादिग्रहाणामपि युगतानयनं भवति । अत्रोदाहणार्थ चतुर्वेदाचार्येण कल्पे रविभगंणाः=३०, चन्द्रभगणाः=४००, कुजभगणाः=१६, बुधभगणाः = १३०, गुरुभगणाः=३, शुक्र भगणाः=५० । शनि भगणाः=१, चन्द्रोच्च भगणाः=४, चन्द्रपातभगणौ=२ भदिनानि =१०९९०, सौरमासाः=३६०, चान्द्रमासाः=३७०, अधिमासाः=१०, सौरदिनानि=१०८००, चान्द्रदिनानि=१११००, क्षयाहाः=१४०, सावन दिनानि =१०९६०, एकस्मिन् दिने भगणात्मिका गतिश्च । राशौ येन कर्मणा द्वश्यतुल्यो भवेत्तद्विलोमेनैव तेनैव कर्मणा दृश्ये ि क्रियाकरणेनेष्टराशिर्भवेत्। र ३ | || च ५ | || म १ | || बुञ्ज | कुट्टकाध्याय १३ || गु ३ | शुउ : २ा १०९६ | १३७ || ६८५ | १०९६ | १०९६० | १०९६ | १०९६० | २७४० ! ५४८० उपपत्ति । | चउ | चपा कल्पिता, इतिसर्व कोलब्र कानुवादतो ज्ञायत इति ॥१५॥ अब प्रश्न को कहते हैं । हेि. भा-दो तीन आदि ग्रहों के अलग-अलग कथित ग्रह गतयुग से जो युगादि को जानते हैं वे कुट्टक को जानते हैं। इसके उत्तर के लिये पूर्वोक्त ‘अधिकाग्रभागहारादूनाग्रच्छेद भाजिताच्छेषम्' इत्यादि श्लोकों में म. म. श्रीमान् सुधाकर द्विवेदी जी के उदाहरण हैं, जैसे किसी राशि को चौंतीस से भाग देने से दो शेष रहता है, तथा तेरह से भाग देने से दस शेष रहता है उस राशि को कहो । इसके अनुसार यदि एक ग्रह चौंतीस दिनों में और अन्य ग्रह तेरह दिनों में एक भगण को भोग ११७४ करते हैं दोनों की अन्तिम युति (योग) से दश दिन व्यतीत हुए तब कल्प से कितने नि व्यतीत हुए ? इस प्रश्न में ‘कौन राशि है जिसको चौंतीस से भाग देने से दस शेष रहता है, तथा उसी राशि को तेरह से भाग देने से भी दस शेष रहता है इस प्रश्न के उत्तर ही से उत्तर सिद्धि होती है। इस तरह तीन आदि ग्रहों का भी युगगतानयन होता है। यहां उदाहरण के लिये चतुर्वेदाचार्य ने, कल्प में रवि भगण=३०, चन्द्रभगण =४००, कुजभगण = १६ , बुधभगण=१३०, गुरुभगण=३, शुक्रभगण=५०, शनिभगण=१, चन्द्रोचभगणः=४, चन्द्रपातभगण=२, भदिन=१०९९०, सौरमास=३६०, चान्द्रमास ३७०, अधिमास = १०, सौरदिन=१०८००, चान्द्रदिन = १११००, क्षयाह = १४०, सावनदिन= १०९६०, तथा एक दिन में भगणात्मक गति की संस्कृतोपपत्ति में लिखित (क) के अनुसार कल्पना की । यह सब कोलब्रक साहेब के अनुवाद से विदित होता हैं इति ॥१५॥ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते भगणाद्यमिष्टशेषं कदेन्दुदिवसे रवेगुरुदिने वा । ज्ञदिने राशीन् कथयति कुट्टाकारं स जानाति ॥१६॥ सु. भा.-रवेर्भगणाद्यमिष्टशेषं भगणादिशेषमिष्टं कदा चन्द्रदिने वा गुरुदिने ज्ञदिने भवतीति विज्ञाय यश्च रवे राशीन् राश्यादिरविं कथयति स कुट्टाकार जानातीत्यहं मन्ये । प्रथद्भिगणशेषादहर्गणमानयेति प्रश्नः । इदानीमन्यं प्रश्नमाह । अस्योत्तरं १२ सूत्रेण स्फुटम् । अत्रकुट्टके तावद्धरएकादिगुणः क्षेप्यो यावद भीष्टो वारो भवेदिति ॥ १६ ॥ वि. भा-रवेरिष्टं भगणादिशेषं कदा चन्द्रदिने वा गुरुदिने वा बुधदिने भवतीति ज्ञात्वा राश्यादिरविं यः कथयति स कुट्टाकारं जानातीति, अर्थाद् भगण शेषादहर्गणमानयेति प्रश्नः । उपपत्तिः पूर्वं प्रदर्शिताऽपि सौकर्यार्य विलिख्यते । कल्प्यतेऽहर्गणमानम्=य, तदा कल्पकुदिनैः कल्पभगणा लभ्यन्ते तदा ऽहगैणेनकिं लब्धगतभगणाः शेषं कल्प्यते छेदगमेन कल्पभ . य ककु. गभ+-भशे। ततः ककु. गभ-+भश= य । अत्र ककु, कल्पभ भाज्यहाराभ्यां यौ राशी तत्राधरः कभ भक्तः शेषं गभमानम् । परन्तु यद्यधिकाग्रम् =भशे । तच्छेदः ककु । ऊताग्रम्=०, तच्छेदः-कभ तदाऽऽचार्योक्तकुट्टकप्रकारेण' छेदवधच्छेदेऽ (१) अधिकाग्रभागहारादूनाग्रच्छेदभाजिताच्छेषमित्यादिना कल्पभ ग्रमानम्=गभ. ककु+-भशे, अत इदमगू’ कल्पभगणभक्त लब्धं य मानं स्यादर्थाद हर्गणो भवेत् । ततो रविज्ञानं सुगममेव ॥१६॥ अब अन्य प्रश्न को कहते हैं। हेि. भा.-रवि के इष्ट भगणादिशेष कब चन्द्रदिन में वा गुरुदिन में वा बुधदिन में होता है इसको जानकर जो राश्यादिरवि को कहते हैं वे कुट्टक को जानते हैं। अर्थात् भगणशेष से अहर्गणानयन के लिये प्रश्न है । कल्पना करते हैं अहर्गणमान=य । तब अनुपात करते हैं कल्पकुदिन में कल्पभगण पाते हैं तो अहर्गण में क्या इससे लब्ध गतभगण, शेष भगणशेष होता है इसका स्वरूप=**** ११७५ गभ ककु . गाभ + भश ककु = य । यहां ककु, कभ भाज्य, हारों से जो राशिद्वय होता है उसमें अधरराशि को कल्प भगण से भाग देने से शेष गत भगणमान होता है । लेकिन यदि अधिकाग्र = भशे उसका छेद = ककु । ऊनाग्र = ० । उसका छेद = कभ तब आचार्योक्त कुट्टक प्रकार से छेद घात तुल्य छेद में अग्र (शेष ) मान = ककु . गभ + भशे । इस अग्र को कल्पभगण से भाग देने से लब्ध य मान होता है वही श्रहर्गण है । अहर्गण ज्ञान से रवि का ज्ञान सुलभ ही है इति ।। १६ ।। इदानीमन्यं प्रश्नमाह ज्ञदिने यदंशशेषं विकलाशेषं कदा तदिन्दुदिने । भानोरथवा शशिनो यः कथयति कुट्टकज्ञः सः ।। १७ ।। सु. भा.-भानोरथवा शशिनश्चन्द्रस्य यदंशशेषं वा विकलाशेषे बुधदिने दृष्टं तदेव कदा चन्द्रदिने भवतीत्यस्योत्तर यः कथयति स एव कुट्टकज्ञ इत्यहं मस्ये । अस्योत्तरं १२ सूत्रेण स्फुटम् ।। १७ ।। वि. भा-भानोः (सूर्यस्य) शशिनः (चन्द्रस्य) यदंशशेष विकलाशेषं वा बुधदिने दृष्टं तचन्द्र दिने कदा भवतीत्यस्योत्तरं यः कथयति सः कुट्टक पण्डित इति ॥ विशेषात् वास्तीति ॥ १७ स्वकुट्टकगुणात् स्वभागहारहृतादित्यादिना स्फुटै ११७६ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते अब अन्य प्रश्न को कहते हैं । हिं. भा.-सूर्य और चन्द्र का जो अंशशेष वा विकलाशेष बुधदिन में देखा गया वही चन्द्रदिन में कब होता है इसका उत्तर जो जानते हैं वे कुट्टक के पण्डित है । इति । उपपत्ति । ‘इष्ट भगणादिशेषात् स्वकुट्टकगुणात्' इत्यादि १२ सूत्र से स्फुट है इति ॥१७॥ इदानीमन्यं प्रश्नमाह । तिथिमान दिनेष्विष्टा ये ऽकर्काद्यास्ते पुनः कदा तेषु । इष्टगृहवारेषु यः कथयति कुट्टकज्ञः सः ॥ १८ ॥ सु. भा.-तिथिमानदिनेषु चान्द्रसौरसावनदिनेष्वर्थादुद्दिष्टाहर्गणे येऽभीष्टा अकर्काद्यास्त एव पुनः कदेष्टग्रहवारेषु तेषु चान्द्रसौरसावनदिनेषु भवन्ति । इति यः कथयति स एव कुट्टकज्ञ इत्यहं मन्ये । यस्मिन्नहर्गणे येऽभीष्टा गृहा आगतास्तत्समा एव कदेष्टवारेऽन्यस्मिन्नहर्गशे ते भवन्तीति प्रश्नः । अस्योत्तर च १२ सूत्रेण स्फुटम् ॥ १८ ॥ वि. भा.-तिथिमानदिनेषु (चान्द्रसौरसावनदिनेष्वर्थादुद्दिष्टाहर्गणै ) ये इष्टा रव्यादयस्त एव पुनःकर्देष्टग्रहवारेषु चान्द्रसौरसावनदिनेषु भवन्तीत्य थर्थाद्यस्मिन्नहर्गणे ये ऽभीष्टा गुहा समागतास्तत्तुल्या एव कदैष्टवारे ऽन्यस्मिन्न हर्गणे ते भवन्तीति यः कथयति सः कुट्टकपण्डितोऽस्तीति । ‘इष्टभगणादिशेषादि'. त्यादि १२ सूत्रेणाऽस्योपपत्तिः स्फुटैवास्तीति ॥ १८ ॥ अब अन्य प्रश्नों को कहते हैं। हेि. भा.-चान्द्र सौर सावन दिनों में अर्थात् उद्दिष्टाहर्गण में जो इष्ट रवि आदि ग्रह हैं वही पुनः कब इष्टग्रह वारों में उन चान्द्र सौर सावन दिनों में होते हैं अर्थात् जिस अहर्गण में जो अभीष्टग्रह आये हैं उनके बराबर ही कब इष्टवार में अन्य अहर्गण में वे होते हैं यह प्रश्न है इसको जो कहते हैं वे कुट्टक के पण्डित है। इसकी उपपत्ति ‘इष्ट भगणादि शेषात्' इत्यादि १२ सूत्र से स्पष्ट ही है इति ।। १८ ।। इदानीं बालावबोधार्थ पूर्वप्रश्नोत्तरं कथयति । इष्टभगणादिशेषाद् द्यगणस्तत् कुट्टकेन संयुक्तः । तच्छेददिनैस्तावद्दिनवारो यावदिष्टः स्यात् ॥ १९ ॥ सु. भा.-इष्टभगणादिशेषात् तत्कुट्टकेन १२ सूत्रविधिना प्रथमं द्युग्गणोऽह र्गणः साध्यः स तावत् तच्छेददिनैः संयुक्तो यावदिष्टो वारः स्यादिति स्पष्टम् ॥१९॥ वि. भा-इष्टभगणादिशेषात् पूर्ववत् ( इष्टभगणादिशेषादित्यादि १२ सूत्रानुसारेण ) अहर्गणः साध्यः स तावत्तच्छेददिनैः संयुक्तः कार्यो यावदिष्टो दिनवारः स्यादिति ॥ १९ ॥ अब बालकों के बोध के लिये पूर्व प्रश्न के उत्तर को कहते हैं । हैि. भा-इष्टभगणादिशेष से पूर्ववत् (इष्टभगणादि शेषात्' इत्यादि १२ सूत्र के अनुसार) अहगरण साधन करना चाहिये उसमें तब तक उन् छेददिनों को जोड़ना चाहिये जब तक इष्ट दिनवार हो इति ।। १९ ।। इदानीमन्यान् प्रश्नानाह । यो राश्यादीन् दृष्टवा मध्यस्येष्टस्य कथयति छगणम् । द्वयादिगृहसंयोगात् गृहान्तराद्वा स कुड्ज्ञः ॥ २० ॥ ११७७ सु. भा.-य इष्टगृहस्य मध्यस्य राश्यादीन् दृष्ट्वा द्युगणं कथयति । वा यादिग्रहसंयोगाद् द्युगण कथयति वा द्वयोगूहृयोरन्तरादुद्युगण कथयति स कुट्टज्ञ कुट्टकज्ञ इत्यहं मन्ये ॥ २० ॥ वि. भा-इष्टयूहस्य मध्यस्य राश्यादीन् दृष्टवा योऽहर्गरणं कथयति । वा द्वयादिगृहसंयोगादहर्गणं कथयति । वा ग्रहान्तरात् (द्वयोगूहयोरन्तरत्) अह गरणं कथयति स कुट्टकपण्डितो ऽस्तीति ॥ २० ॥ अब अन्य प्रश्नों को कहते हैं। हेि. भा.-मध्यम इष्ट ग्रह के राश्यादि को देखकर जो अहर्पण को कहते हैं । वा दो आदि। ग्रहों के संयोग से अहर्गण को कहते हैं। वा दो ग्रहों के अन्तर से अहर्गण को कहते हैं वे कुट्टक के पण्डित हैं इति ।। २० ।। इदानीं पूर्वप्रश्नस्योत्तरमाह । नश्छेदभागहारराद्राश्यादिकलादिना हता भक्त भमणकलाभिर्लब्धं मण्डलशेष दिनगणोऽस्मात् ॥ २१ ॥ सु. भा.-निश्छेदभागहाराद् दृढकुदिनमानात् किं विशिष्टाद् राश्यादिकला दिना गृहकलात्मकप्रमाणेन हताचक्रकलाभिर्भक्ताद्यल्लब्ध तद्भगणशेषं स्यादस्मात् पूर्वोक्तविधिना दिनगणो भचतीति । ११७८ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते अत्रोपपत्तिः । दृढभगणशेषं चक्रकलागुणं दृढकुदिनभक्त कलात्मकगूहो भवत्यतस्तद्विपरीतेन कलात्मकग्रहो दृढकुदिनगुणश्चक्रकलाभक्तो दृढभगणशेषं स्यात् । ततो दृढभगणा भाज्यं दृढभगणशेषं ऋणक्षेपं दृढकुदिनमानं हार च प्रकल्प्य कुट्टाकारेण गुणमानमहर्गणः स्यात् । गृहयोगकलातो वाऽन्तरकलातो यद्दृढभगणशेषं स्यात् तत्र दृढभगणयोग वा दृढभगणान्तर भाज्यं प्रकल्प्य पूर्ववत् कुट्टकेनाहर्गणः साध्यः । वि. भा-निश्छेदभागहारात् ( दृढ़कुदिनात् ) राश्यादिकलादिना, (गृहक लात्मकमानेन) गुणितात्, भगणकला (चक्रकला) भिर्भक्तात् लब्धं मण्डलशेष (भगणशेषं) भवति, अस्मात्पूर्ववदहर्गणो भवतीति । दृढ़भगणशे xचक्रकला - = कलात्मकगृह छेदगमेन दृढ़भगण शे X चक्रकला = दृढ़कृदिन x कलात्मकग्र, अत दृढ़कुदिन x कलात्मकगृह = दृढभगण भाज्य = द्वढ़भगरण - दृढ़भगणशे = क्षेप कुट्टकेन यो गुणः स एवाहर्गणो भवति । गृहयोगकलातोऽन्तरकलातो वा यद् दृढ़भगणशेषं भवे त्तत्र दृढभगरणयोगं दृढ़भगणान्तर' वा भाज्यं प्रकल्प्य पूर्ववत् कुट्टकेनाहर्गणः साध्य इति ॥२१॥ चक्रक अब पूर्वप्रश्न के उत्तर को कहते हैं। प्र हेि. भा -निश्छेदभागहार (दृढ़कुदिन) को ग्रहकलात्मक मान से गुणाकर भगण कला (चक्रकला) से भाग देने से लब्ध मण्डल (भगण) शेष होता है इससे पूर्ववतु अहर्ग ण होता है इति । दृढ़भगणशे x चक्रकला दृढ़कुदिन कलात्मकग्रह । छेदगम से दृढ़भगणशे X चक्रकला = ' = कलात्मकग्रह x दृढ़कदिन कलात्मकग्र x दृढ़कुदिन, अतः । ततः भाज्य = दृढ़भगण --- दृढ़भगणशै = क्षेप यहां कुट्टक से जौ गुणक होता है वही दृढ़कुदिन अहर्गण होता है । ग्रह यौगकलासे वा अन्तर कला से जो दृढ़भगण शेष होता है वहां दृढ़ २ ] ११७९ भगण योग को वा दृढ़भगणान्तर को भाज्य कल्पनाकर पूर्ववत् कुट्टक से अहर्गण साधन करना चाहिये इति ।। २१ ।। इदानीं विशषमाह । एवं राश्यंकला विकला शेषादहर्गणः प्राग्वत् । नष्टस्थेष्विष्टान् तान् कृत्वा भक्त्वोक्तवच्छेषम् ।। २२ ।। सु. भा--एवं राशिशेषात् अंशशेषात् कलाशेषात् विकलाशेषाच प्राग्वदह र्गणः स्यात् । किं कृत्वा नष्टस्थेषु विकलाकलादिमानेषु भक्त्वा विभज्येष्टान् तान् विकलादीन् कृत्वा शेषं भगणशेषमहर्गणं चोक्तवत्कार्यम् । अत्रैतदुक्तं भवति । षष्टिर्भाज्यो विकलाशेषमृणक्षेपो दृढकुदिनानि हार इति प्रकल्प्य यः कुट्टकः सकला शेषस्तेन षष्टिर्हता विकलाशेषोना दृढकुदिनहृता फलं विकला अभीष्टा स्युस्ततः कलाशेषमृणक्षेपं षटिं भाज्यं दृढकुदिनानि हार प्रकल्प्य यः कुट्टकः स चांशशेष स्तेन षष्टिर्गुणा कलाशेषोना दृढकुदिनभक्ता फलं कला अभीष्टाः स्युः । एवं राखि शेषानयने त्रिंशद्भाज्यो भगणशेषानयने च द्वादशभाज्यकल्प्यः । भगणशेषतः पूर्व विधानेनाहर्गणो गतभगणाश्च साध्याः । ‘कल्प्याथ शुद्धिर्विकलावशेषम्'-इत्यादि भास्करोक्तमेतदनुरूपमेव ॥ २२ ॥ वि. भा-एवं राशिशेषात्-अंशशेषात् कृलाशेषात् विकलाशेषात् पूर्ववदह गर्गणः स्यात् कथं तदुच्यते । नष्टस्थेषु विकला कलादिमानेषु भक्त्वा (विभज्य) इष्टान् तान् विकलादीन् कृत्वा शेषं (भगणशेष) अहर्गणंच पूर्ववत्कार्यम् । यथा षष्टिभाज्धः । दृढ़ कुदिनानि हारः । विकलाशेषं शुद्धिरिति प्रकल्प्य कुट्टकविधि ना गुणाप्ती साध्ये तत्र लब्धिविकला:स्युः । गुणस्तु कलावशेषम् । ततः कलावशेष शुद्धिः । षष्टिर्भाज्यः । दृढ़कुदिनानि हार इति प्रकल्प्य कुट्टकेन गुणाप्ती साध्ये तत्र लब्धिः कलाः । गुणोंऽशशेषम् । अंशशेषं शुद्धिः । त्रिंशद् भाज्यः । दृढकदिनानि हारः । अत्र कुट्टकेन लब्धिरंशाः । गुणो राशिशेषम् । एवं राशिशेष शुद्धिः । द्वादश भाज्य: । क्दिनानि हारः । अत्र कुट्टकेन लब्धिर्गतराशयः । गृणोभगणशेषम् । कल्पभगणा भाज्यः । कुदिनानि हारः । भगणशेषं शुद्धिः । अत्र लब्धिर्गतभ गणाः । गुणोऽहर्गणः स्यादिति । लीलावत्यां ‘कल्प्याथ शुद्धिर्विकलावशेषं षष्टिश्च भाज्यः कुदिनानि हार' इत्यादि भास्करोक्तमेतदनुरूपमेवेति ॥ २२ ॥ अब विशेष कहते हैं। हि. भा--एवं राशिशेष से, अंश शेष से, कलाशेष से, विकलाश ष से अहर्गण होता है। कैसे होता है सो कहते हैं। विकला-कलाद्वि मानों में भाग देकर इष्टविकलादि करके भगणशष और अहर्गण पूर्ववत् करना चाहिये । जैसे-साठ को भाज्य, दृढ़कुदिन को ११८० ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते हार, विकलाशेष को ऋणक्षेप कल्पना कर कुट्टक विधि से गुणक और लब्धि साधन कर ना, उनमें लब्धि विकला होती है, और गुणक कलाशष होता है । इसके बाद साठ को भाज्य, दृढकुदिन को हार, कलावशष को ऋणक्षेप कल्पना कर कुट्टक से गुणक और लब्धि साधन करना चाहिए, उनमें लॉब्धकला होती है। गुणक प्रश शेष होता है। एवं तीस को भाज्य, दृढ़कुदिन को हार, अंशशेष को ऋणक्षेप कल्पना कर कुट्टक से जो गुणक और लब्धि होती है उनमें लब्धि अंश होता है। गुणक राशिशेष होता है। एवं द्वादश को भाज्य, दृढ़कुदिन को हार, राशिशष को ऋण क्षेप मान कर कुट्टक से लब्धिगत्त राशिमान होता है, गुणक भगणशोष होता है। एवं कल्प भगण को भाज्य, कुदिन को हार, भगणशेष को ऋणात्मक क्षेप क्षेपकल्पना कर कुट्टक से लब्धि गतभगण होता है, गुणक अहर्गण होता है, लीलावती में ‘कल्प्याथ शुद्धिर्विकलावशेषं' इत्यादि भास्करोक्त इसके अनुरूप ही है इति ॥ २२ इदानीमन्यं प्रश्नमाह । राश्यंशकला विकलाशेषात् कथितादभीष्टतो नष्टान् । सु. भा.-अभीष्टतः कथितान्निर्दिष्टात् राशिशेषत् वांऽशशेषात् वा कला शेषादथवा विकलाशेषाश्च यो नष्टान् विकलादीन् तथोपरितनानुपरिशेषान् विक लाशेषतः कलाशेष कलाशेषादंशाशेषमित्यादीन् समध्यमान् मध्यमग्रहसहितान् साधयति स एव कुट्टकज्ञः । निर्दिष्टादेकशेषात् मध्यमग्रहं य आनयति स एव कुट्टकज्ञ इत्यर्थः । अस्योत्तरं पूर्वसूत्रेण स्फुटमपि बालावबोधार्थमग्रे वक्ष्यति वि. भा.– अभीष्टतः कथितान्निर्दिष्टात् राशिशेषादंश शेषाद्वा कलाशेषा द्विकलाशेषाद्वा नष्टान् ( विकलादीन्) उपरितनान् ( उपयुक्तशेषान् ) मध्यम ग्रहसहितान् यः साधयति सः कुट्टकज्ञः । निर्दिष्टादेकशेषान्मध्यग्रहानयनं यः करोति सः कुट्टकज्ञ इति । अस्योत्तरं यद्यपि पूर्वसूत्रेण स्पष्टमप्यस्ति तथाप्याचा येणाऽग्रे कथ्यते ।। २३ ।। अब अन्य प्रश्न को कहते हैं। हेि. भा.- अभीष्ट से कथित राशिशेष से अथवा अंशशष से, कलाशष से अथवा विकलाशेष से विकलादि कौ तथा उपयुक्त शेष मध्य ग्रह सहित को जो व्यक्ति साधन करता है अर्थात् निर्दिष्ट एकशेष सैभध्यम ग्रहानयन करता है वह कुट्टकज्ञ है, यद्यपि इसका उत्तर २२ सूत्र से स्पष्ट है तथापि आचार्य आगे कहते हैं इति ॥ २३ ॥ इदानीमुत्तरमाह । येन गुणः शेषयुतश्छेदः शुध्यति हृतः स्वगुणकेन । तद्भुक्तशेषं फलमेवं शेषात् ग्रहद्यगणौ ॥ २४ ॥ सु. भा.-छेदो दृढकुदिनमानं येन गुणः शेषयुतः स्वगुणकेन हृतः शुध्यति स गुणश्च तद्भुक्तं तस्य ग्रहस्य भुक्तं भवति स्वगुणकेन हृतं यत् फलं प्राप्तं तच्छेषमुपरिशेषं भवति । एवं शेषात् ग्रहार्हगणौ द्वावेव भवतः । अत्रैतदुक्तं भवति । यथा कलाशेषस्य गुणकः षष्टिश्छेदो दृढकुदिनानि । तत्र येन गुणेन गुणितश्छेदो विकलाशेषयुतः स्वगुणकेन षष्टिमितेन हृतः शुध्यति स गुणो ग्रहविकला भवन्ति फलं च कलाशेषं ज्ञेयेमेवं कलाशेषात् कला अंशशेषं च सिध्यति । एवमन्ते भगण शेषज्ञानं तस्मादहर्गणज्ञानं च भवति । अत्रोपपत्तिः । यथा कलाशेषं षष्टिगुणं दृढकुदिनहृतं लब्धं ग्रहविकलाः शेषं च विकलाशेषम् । अतो हरो लब्धिगुणः शेषयुतो भाज्यराशिसमः । ६०xकशे=ग्रविx दृकु+विशे ग्रविx दृकु+विशे .. कशे – – अतो दृढकुदिनमानं येन गुणं विकलाशोषयुतं षष्टिभक्तं शुध्यति स गुणो ग्रहविकलाः फलं च कलाशषम् । एवं स्व स्वशषगुणकच्छेदाभ्यां तत्तच्छेषमाने भवत इत्युपपद्यते ॥ २४॥ वि. भा-छेदो (दृढ़कुदिनमानं) येन गुणः शेषयुतः स्वगुणकेन भक्तः शुध्यति स गुणस्तस्य गृहस्य भुक्त भवात स्वगुणकन भत्तं सद्यत्फल लब्ध तदुपरि शोषं भवति । एवं शषात् गृहाहर्गणौ भविष्यतः । यथा कलाशोषस्य गुणकः षष्टिदृढ़ कुदिनानि हरः । तत्र येन गुणकेन गुणितो हरो विकलाशेषयुतः स्वगुणकेनं षष्टि तुल्येन भक्तः शशुध्यति स गुणो गृहविकलाः स्युः फलं कलाशषमेवं कलाशोषात् कला अंशशेषं सिध्यति । एवमन्ते भगण-शेषज्ञानं भवेत्तस्मादहर्गणो भबेदिति । अत्रोपपत्ति । कलाशेषं षष्टिगुण दृढ़कुदिनभक्त लब्धं गृहविकलाः शेषं विकलाशेषम् तत्स्वरूपम्==विकलाशे ६०xकलाशे गृहविकला-+ छेदगमेन ६०xकलाशे = दृढुकxगृहविकला+विकलाशे, पक्षौ षष्टिभक्तौ तदादृढ़कुxगृहविकला+विकलाशे ६० ब्राह्यस्फुटासद्धान्त =कलाशे, अतो दृढ़कुदिनं येन गुणं विकलाशेषयुतं षष्टिभक्त शुध्यति स गुणो गृहविकलाः । फलं कलाशेषम् एवं स्वस्वशेषगुणकहराभ्यां तत्तच्छेषमाने भवत इत्युपपन्न भवतीति ॥२४॥ अब उत्तर कहते हैं । हेि. भा.-दृढ़कुदिन (हर) को जिस से गुणा कर शेष जोड़कर अपने गुणक से भाग देने से शुद्ध हा तब वह गुणक उस ग्रहका भुक्त हाता ह । अपने गुणक से भाग देने से जो फल होता है वह उपरिशेष होता है इस तरह शेष से ग्रह और अहर्गण होता है, जैसे कलाशेष का गुणक साठ है, दृढ़ककुदिन हर है वहां जिस गुणक से गुणित हर में विकला शेष को जोड़ कर साठतुल्य अपने गुणाक से भाग देने से शुद्ध होता है तब वह गुणकग्रह विकला होती है और फल कलाशेष होता है, एवं कलाशेष से कला और अशशेष सिद्ध होता है। इस तरह अन्त में भगण शेष ज्ञान होता है उससे अहर्गणज्ञान होता है इति ॥ उपपत्ति । कला शेष को साठ से गुणा कर दृढ़कुदिन से भाग देने से लब्ध ग्रह विकला और शेष ६०xकलाशे विकला शेष । उसका स्वरूप =---=ग्रह विकला-- छेदगम से ६०X कलाशे=दृढ़कुX ग्रह विकला--विकलाशे । दोनों पक्षों को साठ से भाग देने से, कलाशे= दृढ़कुxग्रह िविकला+विकलाशे अतः दृढ़कुदिन . को जिससे गुणाकर विकला शेष को जोड़कर साठ से भाग देने से शुद्ध होता है वह गुणक ग्रह विकला है और फल कला शेष है एवं अपने अपने शेष गुणक हरों से अपने अपने शेष मान होते हैं, इससे उपपन्न हुआ ॥२४॥ प्रश्नानाह । जानाति यो युगगतं कथितादधिमासशेषकादिष्टात् । अवमावशेषतो वा तद्योगाद्वा स कुट्टज्ञः ॥२५॥ सु. भा-इष्टादधिमासशषाद्वा कथितादधिमासशषाद्यो युगगतं जानाति । वा कथितादवमावशषात् क्षयशषाधो युगगतं जानाति । वा तयोरधिशषक्षयशष योर्योगाद्यो युगगतं जानाति स एव कुट्टकज्ञ इत्यहं मन्ये । श्रत्र ‘तथाऽधिमासावमाग्रकाभ्यां दिवसा रवीन्द्वो'-इत्यादिभास्करविधिना ऽद्य प्रश्नद्वयोत्तरं स्फुटम् । तृतीये चान्द्रेभ्यो येऽधिमासा यच्च तच्छेषं सौरेभ्योऽपि त एवाधिमासास्तच्च शोषम् । अतो गतेन्दुदिनप्रमाणं या १ गताधिमासप्रमाणं च का १ । तदाऽधिशषप्रमाण' च=क अधिमा x या-कचादिx का==अधिशे । ११८३ एवं यदि गतक्षयाहमानं नी १ तदा कक्ष x या-कचादिxनी=क्षशे । द्वयोयोंगेन या (कअधिमा-+-कक्ष) – कचादि (का+-नी) = अधिशे+ क्षशे = यो : का + नी = या (कअधिमा-कक्ष) -यो अतः कल्पाधिमासक्षयाहयोगं भाज्यमधिमासक्षयशेषयोगमृणक्षेपं कल्प चान्द्रदिनं हारं प्रकल्प्य यः कुट्टकः स एव गतेंदुदिनानि तेभ्यः सौरसावनदिनानि च स्फुटानि भवन्ति । इत्यनेन तृतीय प्रश्नोत्तरं स्फुटम् ॥ २५ ॥ वि. भा.-इष्टादधिमासशेषात् वा कथितादधिमासशेषाद्यो युगगतंजानाति । वा कथितादवमावशेषतो युगगतं जानाति । वा तद्योगात् (अधिशेषावमशेषयो यगात्) युगगतं जानाति स कुट्टकज्ञ इति । कल्पाधिमासा भाज्यः । रविदिनानि हारः। अधिमासशेषं शुद्धि । अत्र कुट् टकविधिना गुणाप्ती साध्ये तत्र लब्धिर्गताधिमासाः । गुणो गतरविदिवसाः । एवं युगावमानि भाज्यः । चान्द्रदिवसा हारः । प्रवमशेषं शुद्धिः । अत्रापि कुट्टक विधिना गुणलब्धी साध्ये तत्र लब्धिर्गतावमानि गुणो गतचान्द्रदिवसा इति, लीला वत्यां ‘तथाधिमासावमाग्रकाभ्यां दिवसा रवीन्द्वो' रिति भास्करेण स्पष्टमेवोक्तम् एतावता प्रथमप्रश्नद्वयोत्तरं जातम् । प्रवम अथ तृतीयप्रश्नोत्तरम् । अत्रेष्टचान्द्रप्रमाणम्=य । अस्मादधिमासावमयोस्तच्छेषयोश्च माने ज्ञात्वा स्वस्वशेषोने कृते तयोः स्वरूपे. क अम्मा यू-आधश-गताधिमासाः । . कअवम.य-अवशे=गअवम, अत्रको हरश्चेद् गुणकौ विभिन्नौ'तदा गुणैक्य मित्यादि संश्लिष्टकुट्टक युक्त्या कल्पाधिमासावमयोगतुल्ये भाज्ये तयोरेव शेष योगतुल्ये ऋणक्षेपे यो गुणः स एवेष्टचान्द्रसमस्तस्मात्सौरसावनदिनानि स्फुटानि भवन्तीति । एतेन तृतीयप्रश्नोत्तरं स्फुटं जातम् ॥ २५ ॥ अब तृतीय प्रश्न के उत्तर को कहते हैं। हेि. भा-यहाँ कल्पना करते हैं इष्ट चान्द्र प्रमाण=य । इस से अधिभास और तथा उन दोनों का शेष जानकर अपना अपना शेष घटाने से उन दोनों के स्वरूप ११८४ क अमा. य-अधिशे कचा ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते . क अवम. य-अवमश- गताधिमा ग अवम, यहां ‘एको हरश्चेद्गुण कौ विभिन्नौ' इत्यादि भास्करोक्त संश्लिष्ट कुट्टक युक्ति से कल्पाधिमास कल्पावम योगतुल्य भाज्य में उन्हीं दोनों के शष योगतुल्य ऋण क्षेप में जो गुणक होगा वही इष्ट चान्द्र (य) के बराबर होगा उस से सौर सावन दिन स्फुट होते हैं। इस से तृतीय प्रश्न का उत्तर स्फुट हो गया, इति ।। २५ ।। इदानीमन्यान् प्रश्नानाह । इष्टेषु मानदिवसेष्वधिमासन्यनररात्रशेषे वा । भूयस्ते यः कथयति पृथक् पृथग्वा स कुट्टज्ञः ॥ २६ ॥ सु. भा.-इष्टेषुमानदिवसेषु सौरचान्द्रसावनदिनेषु ये अधिमासन्यूनरात्र शषे स्तस्ते एव भूयः कदा भविष्यत इति यः पृथक्-पृथक् कथयति स एव कुट्टज्ञः कुट्टकज्ञ इत्यहं मन्ये । इष्टदिने यदधिशषषं तदेव पुनः कदावेष्टदिने यदवमशेषं तदेव पुनः कदा वेष्टदिने योऽधिमासक्षयशषयोगः स एव पुनः कदा भविष्यतीति प्रश्न त्रयम् । पूर्वमधिशोषात् क्षयशषाद्वा तयोयोगाद्यथा कुट्टकविधिना गतेन्दुदिनराशि रानीतः स ‘इष्टाहतस्वस्वहरेण युक्तो'ऽनेकधा भवति यत्रापि तदेवाधिमासशषा दिकं भवतीत्युत्तरं स्फुटम् ॥ २६ ॥ (इयमार्या कोलब्रकानुवादे नास्ति) वि. भा.-इष्टेषु मानदिवसेषु (सौरचान्द्रसावनदिनेषु) ये अधिमासावम शेषे भवतस्तं एव भूयः कदा भविष्यत इति पृथक् पृथक् यः कथयति स कुट्टकज्ञो ऽस्तीति । इष्टदिने यदधिशेष तदेव पुनः कदा वेष्टदिने यदवमशेषं तदेव पुनः कदा वेष्टदिने योऽधिमासावम शेषयोगः स एव पुनः कदा भविष्यतीति प्रश्नत्रयः मस्ति । पूर्वमविशेषादवमशषात्तयोर्योगाच्च कुट्टकविधिनायथागत चान्द्रदिनप्रमाण मानीतं तदेव.'इष्टाहृतस्वस्वहरेण युक्ते' इत्यादिनाऽनेकधा भवति, अत्रापि तदेवा धिमासशेषादिकं भवतीति ॥ २६ ॥ अब झान्य प्रश्नों को कहते हैं। हैि. भा.-सौर चान्द्र सावन दिनों में जो अधिशष और अवम शष है वही बार बार कब होगे इसको पृथकू पृथक् जो कहते है वे कुट्टक के पण्डित है। इष्ट दिन में जो अधिशेष है वही फिर कब होगा वा इष्ट दिन में जो अवमशष योग है वही फिर कब होगा वा इष्ट दिन में अधिमासावमशेषयोग है वही फिर कब होगा ये तीन प्रश्न ह । पूर्व में अधिशष से अवम शोष से और उन दोनों के योग से जैसे कुदृक विधि से गत चान्द्र कुट्टकाध्यायः दिन प्रमाण लाये गये । वही ‘इष्टाहत स्वस्वहरेण युक्ते' इत्यादि से अनेक प्रकार होते हैं । यहां भी वही अधिमास शषादिक होते हैं इति ॥ २६ ॥ अंशकशेषात् त्र्यूनात् सप्तहृतान्मूलमूनमष्टाभिः । नवभिर्गुणं सरूपं कदा शतं बुधदिने सवितुः ॥ २७ ॥ सु. भा-सवितुः सूर्यस्यांशकशषात् त्र्यूनात् सप्तहृद्यन्मूलं तदष्टाभिन्न नवभिर्गुणमेकेनाढ्य बुधदिने कदा शतं भवति । इदानीमन्यं प्रश्नमाह । ऋ-३ ह-७ गु-९ ध-१ टश्यम्=-१०० ऋ-३ध ह-७गु भू-० व शु-९ ह ध-१ ऋ ऋ ३ दृश्यम्= १०७ भा ७ विलोमगणितेन । ३ ७ ० ८ ९ १ १०० लब्धमंशषम्=५७० । अस्मादहर्गणो बुधदिने पूर्ववत् सिध्यति ।। २७ ।। मू ७ वि. भा-सवितुः (सूर्यस्य) अंशक शेषात् त्रिभिहनात् सप्तभक्तान्मूलं यत् दष्टाभिहींनं नवभिगुणमेकेन युतं बुधदिने कदाशतं भवतीति । ऋ ८ गु ९ अब अन्य प्रश्न को कहते हैं। च १ ११८५ ६ १०० छेदं गुणं गुणं छेदं वर्गे मूलमित्यादिना विलोमगणितेनांशशेषम् = ५७० अस्मादह परणो बुधदिने सिध्यतीति ॥ २७ ॥ हेि. भा.-सूर्व के अंश शेष में तीन घटाते हैं । सात से भाग देते हैं। उसका मूल जो होता है उसमें से आठ घटाते हैं, फिर उसको नौ से गुणा करते हैं, एक जोड़ते हैं धुंध दिन में कब सौ होता है इति । ११८६ न्यास ३ - ध ह-७ ह-७-गु मू-० मू-०-व ऋ-८-ध ध-१ दृश्य-१०० दृश्य-१०० विलोमगणितेन । यूनाधिमासशेषान्मूलं द्वयधिकं विभाजितं षड्भिः । द्वयूनं वर्गितमधिकं नवभिर्नवतिः कदा नवर्तिः ॥ २८ ॥ सु. मा.-अधिमासशेषात् यूनाद्यन्मूलं तद्द्वाभ्यां युतं षड्भिर्विभाजितं फलं यूनं वर्गितं नवभिरधिकं कदा नवतिर्भवति । ऋट मू घ भा ऋ व च द्व न्यासः । अधिशे । ३ ८० २ ६ २ ० ९ ९० इदानीमन्य प्रश्नमाह । छेदगुणं गुणं छेदं वर्ग मूलं इत्यादि भास्करोक्त विधि से इस विलोम गणित से अंश शेष=५७० इससे बुधदिन में अहर्मर सिद्ध होता है इतिं ।। २७ ।। ऋ--३ ० घ-२ ह-६ ऋ-२ व-० ९, ऋ-३-ध मू-०-व ध-२-ऋ ह-६-गु ऋ-२-घ क्--७-मू ध-९-ऋ ३ ० २ ६ २ ० अधिमासशेषम्=४०९६ कोलबूकानुवादे षड्भिः’ स्थाने 'द्वाभ्यां' इति पाठः । अधिशेषात् पूर्वप्रकारेणाहर्गणानयनं सुगममिति ॥ २८ ॥ ९ , वि. भा.-अधिमास शेषात् त्रिभिहनात् मूलं यत्तद् द्वाभ्यां युतं षड्भिर्भक्तं लब्ध द्वाभ्यां हीनं वर्गितं नवभियुतं कदा नवतिर्भवतीति । ९० छेदंगुणं गुणं छेद मित्यादि भास्करों क्त्या इति विलोमगणितेनाधिमास शेषम् = ४०९६ अधिशेषात् पूर्वोक्त प्रकारेणाहर्गण ज्ञानं सुखेन भवतीति । कोलक कानुवादे षड्भिः स्थाने द्वाभ्याम् पाठोऽस्तीति ।। २८ ।। ० ध-२ ह-६ हेि. भा.-अधिमास शेष में तीन घटाकर मूल जो होता है उसमें दो जोङते हैं छ: से भाग देते हैं लब्ध जो होता है उसमें दो घटाते हैं उसके वर्ग में नौ जोड़ते हैं तो कब नव्वे होता है, इति । व–० न्यस् दृश्य-९० अब अन्य प्रश्न को कहते हैं। मू-०-व ध-२-ऋ ह-६-गु व–०-मू दृश्य-९० ११८७ छेद गुणं गुणं छेद इत्यादि भास्करोक्ति से इस विलोम गणित से अधिमास शेष =४०९६ अघिशेष से पूर्वोक्त प्रकार से प्रहर्गण ज्ञान सुगमता से होता है इति ॥२८॥ इदानीमन्यं प्रश्नमाह । अवमावशेषवगों व्येको विशतिविभाजितो द्वयधिकः ।। अष्टगुणो दशभक्तो द्वियुतोऽष्टादश कदा भवति ॥ २९ ॥ सु. भा-स्पष्टार्थम् । व ऋ भा ध गु भा ध ट ० १ २० २ ८ १० ३ १८ मू घ गु ऋ भा गु ऋ विलोमगणितेन । ० १ २० २ ८ १० २ १८ क्षयशेषम्=१९ । अस्मात् पूर्वप्रकारेणाहरणानयनं सुगमम् ॥ २९ ॥ इति कुट्टाकारः । वि. भा-अवमशेषवर्ग एकहीनो विंशत्या भाज्यते, तल्लब्धिः अङ्कद्वयेन संकलय्य अष्टाभिर्गुण्यते, तदा दशभिः पुनः विभज्य द्वयधिकः क्रियते, एवं प्रकारेण अष्टादशसख्या कदा भवतीति । (अवशे) घ-२ ६- २ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते (अवशे) ह-२०-गु घ-२-ऋ गु-८-ह ‘छेद गुणं गुणं छेद' र्मित्यादिना इति विलोम गणि ध-२-ऋ इति कुट्टकाध्यायः । अब अन्य प्रश्न को कहते हैं। ' हिं. मा.-अवम शैष वर्ग में एक घटाकर बीस से भाग देते हैं जो लब्धि होती हैं उसमें दो जोड़ते हैं आठ से गुणा करते हैं दश से भाभ देते हैं दो जोड़ते हैं तो कब अठारह होता है। २६ । (३०) इति कुट्टकाध्याय । अस्मात्पूर्वप्रकारेणा हर्गणानयनं स्फुट मेवेति ॥ २९ ॥ व-७-मू ‘छेदं गुणं गुणं छेदं' इत्यादि से इस विलोम गणित से ह-२०-गु , अवम शेष=१९ ध-२--ऋ इससे पूर्व प्रकारानुसार गु-८-ह अहर्गणानयन स्पष्ट हैं ह- १० -गु इति ।। २६ ।। अथ धनर्णादीनां सङ्कलितव्यवकलितादि इदानीं धनर्णशून्यानां सङ्कलनमाह । धनयोर्धनमृणमृणयोर्धनर्णयोरन्तरं समैक्यं खम् । ऋणमैक्यं च घनमृणधनशून्ययोः शून्ययोः शून्यम् ॥ ३० ॥ सु. भा-घनयोरैक्य ' धनमृणयोरैक्यमृणं भवति । धनर्णयोरन्तरमेवैक्य भवति । समयोर्धनर्णयोरैक्यं खं शून्यं भवति । ऋणशून्ययोरैक्यमृणं धनशून्ययो रैक्च'च शून्यं भवति । अत्रोपपत्त्यर्थ मन्मुद्रिता भास्करबीजटिप्पणी द्रष्टव्या ।। ३० ।। वि. भा-धनात्मकयोरङ्कयोयगो धनं भवति । ऋणात्मकयोर्योगश्च ऋरणं भवति । धनर्णयोरन्तरमेव योगो भवति । तुल्ययोर्धनर्णयोर्योगः शून्यं भवति । ऋणाशून्ययोर्योगो ऋणं धनशून्ययोर्योगश्व धनं भवति, शून्ययोर्योगः शून्यं भवतीति। यद्येकस्य पुरुषस्य प्रथमं रूप्यकपञ्चवक धनमासीत्, कालान्तरेण तेन रूप्य कचतुष्टयमर्जितं तयोयगे तस्य नवरूप्यकाणि धनानि भविष्यन्ति । एवं तस्यै व यदि रूप्यकपञ्चकमृणं पुना रूप्यकचतुष्टयमृणं कृतं तदा तयोर्योगे तस्य नव रूप्यकाणि ऋणं भविष्यति । यदि च रूप्यकचतुष्टयं धनमस्ति तेन रूप्यकपञ्चकमृणं कृतं तदा रूप्यकचतुष्टयदानेन तस्य निकटे रूप्यकमेकमृण मेव स्थास्यति । यदि रूप्यकपञ्चकं घनमस्ति, तेन पुना रूप्यकपञ्चकमृणं कृतं तदा रूप्यकपञ्चकदानेन तन्निकटे शून्यमेव स्थास्यति। सिद्धान्त शेखरे । ऐक्यां युतौ स्यात् क्षयोः स्वयोश्च धनर्णयोरन्तरमेव योगः, श्रीपत्युक्तमिदं, बीजगणि ते ‘योगे युतिः स्यात् क्षययोः स्वयोर्वा धनर्णयोरन्तरमेव योग: भास्करोक्तमिदं चाऽऽचार्योक्तानुरूपमेवेति ।। ३० ।। अब घनाङ्क ऋणाङ्क और शून्य के सङ्कलन को कहते हैं । हेि. भा-धनात्मक अङ्कों का योग धन होता है । ऋणात्मक अङ्कों का योग ऋण होता है । घनाङ्क और ऋणाङ्क का अन्तर ही योग होता है । सुल्य घन और ऋण अङ्कों का योग शून्य होता है । ऋणात्मक दो शून्यों का योग ऋण होता है। धनात्मक दो शून्यों का योग धन होता है। दो शून्यों का योग शून्य होता है इति । ११९० यदि किसी एक पुरुष के पास पहले पांच रुपये घन था, कालान्तर में उसने चार रुपये उपार्जन किया । तब दोनों का योग नौ रुपये उसके निकट धन होगा । यदि उसी को पहले पांच रुपये ऋण था फिर उसने चार रुपये ऋण लिया तब दोनों मिलकर उसके पास नौ रुपये ऋण होंगे । यदि उसके निकट चार रुपये धन है और पांच रुपया लिया तब चार रुपये सधाने से उसके निकट एक रुपया ऋण रहा । यदि उसके पास पांच रुपये धन है और पांच रुपये ऋण लिया तो पांच रुपये सधाने से उसके पास शून्य (कुछ नहीं) रहा । इससे आचायक्त उपपन्न हुआ । सिद्धान्तशेखर में ‘ऐक्य युतौ स्यात् क्षययोः' इत्यादि संस्कृती पपत्ति में लिखित श्लोक से श्रीपति तथा बीजगणित में ‘योगे युतिः स्यात् क्षययोः स्वयोव इत्यादि से भास्कराचार्य ने आचार्योक्त के अनुरूप ही कहा है इति ।। ३० ॥ ऊनमधिकाद्विशोध्यं घनं घनादूरणमृणादधिकमूनम् व्यस्तं तदन्तरं स्यादृणं घनं धनमृष्णं भवति ॥ ३१ ॥ शून्यविहीनमृष्णमृणं धनं धनं भवति शून्यमाकाशम् । शोध्यं यदा घनमृणादृणं घनाद्वा तदा क्षेप्यम् ।। ३२ ।। सु. भा-अधिकाद्धनादूनं धनं विशोध्यं शेषं धनं भवति । अधिकाट्टणादून मृणां विशोध्यं शेषमृणं भवति । ऊनाद्धनादधिक धन वोनाहरणादधिकमृणं विशोध्यं तदा तदन्तरं व्यस्तं विपरीतं स्यात् । अर्थादधिकं धनं विशोध्यं तंदा शेषमृष्णं भवति। अधिकमृणं विशोध्यं तदा शेषं धनं भवति । कथं विपरीतं भवतीत्याह । ऋण धनं भवति धनं चरणं भवतीति । चेदृष्णं शून्यविहीनं शून्येनं विहीनं तदा ऋरणं धनं च शून्यविहीन धनं शून्यं च शून्यविहीनमाकाशं शून्यं भवति । यदि ऋणाद्धनं शोध्यं वा घनाहरणं शोध्यं तदा क्षेप्यमर्थात् तदा तयोर्योग एवान्तरं अत्रोपपत्त्यर्थ मन्मुद्रिता भास्करबीज टिप्पणी विलोक्या ।। ३१-३२ ।। वि.भा.-अधिकाद्धनादूनं (अल्पं ) धनं विशोध्यं तदा शेष धनं भवति । अधिकादृणादूनमृणं विशोध्यं तदा शेषमृणं भवति । ऊना ( अल्पात्) द्धनादधि कं धनं वा ऊनादृणादधिकमृणं विशोध्यं. तदा तदन्तरं विपरीतं स्यादर्थादधिक धनस्य शोधनेन शेषमृणं भवति । तथाधिक-ऋणशोधनेन शेषं धनं भवतीति । कथं व्यस्तं (विपरीतं ) भवतीति कथ्यते । ऋण धनं भवति, घनं चवणं भवति, चेटंणं शून्येन विहीनं तदा ऋणम् । धनंच शून्यविहीनं तदा धनं, शून्यं च शून्य विहीनं तदा शेष शून्यं भवति । यदि ऋणात् धनं शोध्यं वा धनादृष्णं शोध्यं तदा तयोर्योग एवान्तरं भवतीति । घनर्णशून्यानां व्यवलनम् ११९१ अत्रोपपत्तिः। यदि धनरूप्यकपञ्वकद्र पकत्रयं घनं विशोध्यते अर्थादल्पं क्रियते तदा रूप्यक द्वयं घनमवशिष्यते । यदि ऋणरूप्यकपञ्चकादृणरूप्यकत्रयमल्पं क्रियते तदा रूप्यकद्वयमृणं स्थास्यति । अथ यस्य रूप्यकपञ्वकं धनमस्ति रूप्यकत्रय मृणमस्ति तदा तदृणस्याधुना विशोधनं जातमर्थाद्येन तदृणं दत्तं तेन न गृह्यते कथ्यते च यदहं तदप्यकत्रयं भवते दत्तवान् तदा तस्य अष्टौ रूप्यकाणि धनं भविष्यति । यदि च रूप्यकपञ्चकमृणं रूप्यकत्रयं च धनं स्यात्तदा तद्प्यकत्रयस्य विशोधनेऽर्थादल्पीकरणे तदप्यक्रत्रयं ऋणात्मकं भविष्यति । तदानीं तस्याष्टौ रूप्य काणि ऋणात्मकानि भविष्यतीति । शेषं स्पष्ट मैवास्ति । सिद्धान्तशेखरे संशोष्य मानं स्वमृणं धनणं धनं भवेदुक्तवदत्र योगः औपत्युक्तमिदं, बीजगणिते ‘सशोध्य मानं स्वमृणत्वमेति स्वत्वं क्षयस्तद्युतिरुक्तवच्च भास्करोक्तमिदंचाऽऽचार्योक्ता नुरूपमेवास्तीति ॥ ३१-३२॥ अब व्यवकलन को कहते हैं। हि. भा–अधिक घन में से अल्प धन को घटाने से श ष घन होता है अचिक ऋण में से अल्प ण को घटाने से शोष ऋण होता है। अल्प धन में अधिक धन को वा अल्पऋण में से अधिक ऋण को घटाने से वह अन्तर विपरीत होता है अर्थात् अधिक धन के घटाने से श ष ऋण होता है । तथा अधिक ऋण के घटाने से श ष वन होता है । क्यों विपरीत होता है सो कहते हैं । ऋण घन होता है, धन ऋण होता है यदि ऋण में से शून्य को घटाते हैं तो ऋण ही रहता है अर्थात् उस ऋणाङ्क में किसी तरह का विकार नहीं होता है । धन में से शून्यको घटाने से शेष घन होता है । शून्य में से शून्य को घटाने से श ष शून्य होता है । यदि ऋणाङ्क में से धनाडू को घटाय जाय वा घनाडु में से ऋणाङ्क को घटाया जाय तब उन दोनों का योग ही अन्तर होता है इति । उपपत्ति । यदि धनात्मक पांच रुपये में से धनात्मक तीन रुपयों को घटाते हैं अर्थात् अल्प करते हैं तो दो रुपये धन शेष रहता है यदि ऋणात्मक पांच रूपयों में से ऋणात्मक तीन रुपयों को अल्प करते हैं तो दो रुपये ऋण रहता है । जिसके पास पांच रूपये वन है और तीन रूपये ऋण है उसके उन तीन रुपयों को घटजाना है लेकिन जिसने तीन रुपये दिये थे वह नहीं लिये कहा कि वह तीनों रुपये आप ही को दे दिये तब उस व्यक्ति के पास आठ रुपये घन हो गया । यदि पांच रुपये ऋण है और तीन रुपये वन है तब उन तीनों रुपयों को विशोधन करने से वे तीनों रुपये ऋण होंगे तब उसको कुल आठ रुपये ऋण होग। शेष विषय स्पष्ट ही है । सिद्धान्त शेखर में ‘संयोज्यमानं स्वमृणं धनर्णामित्यादि' श्रीपयुक्त तथा बीजगणित में ‘संशोध्यमानं स्वगृणत्वमेति’ इत्यादि आस्करोक्त आचयक्त के अनुरूप ही है ।। ३१-३२ ॥ ब्राह्मस्फ़ुटसिद्दान्ते

                                 इदानीं गुराने कररासूत्रमाह ।                                                                           
                        ऋरामृराघनयोर्धातो धनमृसयोर्धनवषो धनं भवति।
                      शून्यसयो: खधनयो: सशून्ययोर्वा वध: शुन्यम् ॥३३॥
  सु भा - ऋसाघनयोर्घात ऋसं भवति। ऋसयोवंवो घनवधो धनयोवंवस्च घनं भवति। शून्यसौयो: खधनयो: शून्यघनयोर्वा खशून्ययोश्व्व वध: शन्यं भवति ॥३३॥
  वि भा - ऋसघनयोर्घातऋसं भवति । ऋसयोवंवो धनं भवति; धनयोर्वधश्च धनं भवति । शून्यशसशायो: , शून्यघनयो: , शून्यशून्ययोर्वावघ: शून्यं भवतीति ॥
                               श्चत्रोपपत्ति:।
  कल्प्यते गुप्य:=न-प गुसाक:=य-क तदा "इष्टोनयुक्त न गुसेन निघ्नोsभीष्टघ्न गुण्यान्वित वर्जितो वे" तिभास्करोक्तरीत्या गुसनाय क सममिष्ष्टं युक्तं तदा गुसक:=य श्चनेन गुण्ये गुसिते तदा जातम् य.न - य. प श्चस्मात् क गुसित गुन्योsयं क.न - क.प  विशोष्यस्तदा विशोघ्नप्रकारेण विशोघनेन जातं गुसनफलम् = य.न-य.प-क.न+क.प अत्रान्तिखण्डे क, प ऋसयोर्घातो घनात्मको जातस्था घनयोर्घातो घनम्रूण घनयोस्च घात ऋसमित्यपि सुगममुपधते ॥


  गुण्यो यदि रुवालगुणकेन गुण्यते तदा गुणनफलं गुण्यादल्पमं भवतीति पाटीगसितरीत्या प्रसिद्धम्। एवं यथा यथा गुसको रुपाल्पस्तथा तथा गुसन फलमल्पंभवति तदिह गुणकपरमे हासेsर्थात् शून्यसमत्वे गुसनफलमपि परमाल्पं शून्यसमं भवतीति, एतावताssचार्योक्तमुपपन्नम्। सिद्धान्तशेखरे 'वधे धनं स्याट्टण्यो: स्वयोश्चा घनसंयो: संगुसने क्षयशचेति श्रीपत्युक्तमं बीजगणिते 'स्वयोरस्वयोर्वा वध: स्वर्णघाते' इत्त्यादि भास्करोक्तंचाssचार्योक्तानुरुपमेवेति ॥३३॥
                     श्वङ गुसन के लिये विधि कहते हे । 
  हि .भा. -ऋसात्मक भङ्क भौर घनत्मक भङ्क का घात करने से गुरगनफल ऋरग होता  है,

दो ऋरगात्मक भन्को का घात घन होता है, दो घनात्मक भन्को का घात भी घन होता है । शून्य भ्रोर ऋण का वात शून्य होता है । शून्य भ्रोर घन का घात तथा शून्य-शून्य का घात शून्य होता है इति ॥


                                 उपपत्ति।

कल्पना करते हैं गुण्य = न - प, गुणक = य - क तव इष्टोनयुक्तेन गुणेन धनर्णशून्यानां सन्कलनम्

निध्नो‌'भीष्टध्न गुण्यान्वितवजितो वा' इस भास्करोक्त रीति से क समन इष्ट को जोडने से गुनक= य इससे गुण्य को गुनने से य न-----य प इसमें क गुनत गुण्य 'क न------क प' को घटाने से गुनन फल = य न ----य प ----क न+क प इसके अन्तिम खण्ड में क, प दोनों ऋनों का घात धनात्मक हुआ । तथ दो धनों का घात धन, धन और ऋन क घात ऋन यें भि सुगमता ही से उत्पन्न होता है । गुण्य को यदि रूपाल्प गुनक से गुना करते हैं तो गुनन फल गुण्य से भल्प होता है यह पाटी गनित से प्रसिध है। एवं जैसे जैसे गुनक रूपाल्प है वैसे वैसे गुननफल अल्प होता है । गुनक के परम हान्स में अर्थत् शुन्यसभत्व में गुननफल भी परमाल्प शुन्य के समान होता है। इससे आचार्योक्त उपपन्न हुआ । सिधान्तशेखर मैं 'वधे धनं स्याद्रनायो: स्वयोश्च' इत्यादि श्रीपत्युक्त तथा बीज गनित मैं 'स्वस्योरस्वयोर्वा वध: स्वर्न गाते' इत्यादि भस्करोक्त भी आचार्योक्तानुरूप ही अहै इति ||३३||

                       इदानीं भगहारे करनसूत्रद्वयमाह । 
     
              धनभक्तं धनम्रनह्रतम्रनं घनं भवति स्वभकक्तं खम् । 
              भक्तम्रनेन धनम्रनं धनेन ह्रतम्रानम्रनं भवति ||३४||
              खोध तम्रनं धनं वा तचेदं खम्रनधनविभक्तं वा । 
              ऋनधनयोर्वर्ग: स्वं खं स्वस्य पदं क्रतिर्यत् तत् ||३५||

सु भा ----धनं धनभक्तं वा ऋनं ऋनभक्तं फलं धनं भवति । स्वभक्तं खं फलं खं भवति । ऋनेन धनं भक्तं फलम्रनं स्यात् । धनेन ऋनं ह्रतं फलम्रणं भवति । ऋणं वा धनं खेनोधतं तचेदं त्स्य शून्यस्य चेदो यस्मिन्न्रने वा धने तचेदं भवति । एवं खं शुन्यम्रनधम विभक्त (शुन्यं) वा तचेदं भवति । फलं शुन्यं भवति वा शुन्यं तधरं स्यादित्यर्थ: । ऋनधनयोर्वर्ग: स्वं भवति । स्वस्य वर्ग: खं भवति । तदेव वर्गस्य पदं भवति । यक्तुति: स एव वर्गो भवेदिति । भास्करबीजेप्येतदेव सर्वम् । अत्र स्वभक्तम् खमर्थत् % इदं सर्वदा शुन्यसमं नेत्येतदयं चलनकलनं विलोक्यम् ||३४-३५||

वि भा----धनं धनभक्तं ऋनं ऋनभक्त फलं धनं भवति, खं(शुन्यं) स्वभक्तं (शुन्येन भक्तं) फलं शुन्यं भवति । ऋनेन भक्तं धनं फलम्रं भवति, धनेन भक्तम्रं फलम्रनं भवति, ऋणं धनं वा शुन्येन भक्तं तचेदं त्स्य शुन्यस्य चेदो यस्मिन्न्रने धने वा तचेदं भवति । तथा शुन्यम्रनधनभक्तम् फलं शून्यं वा तचेदं भवति । ऋनधनयोर्वर्ग: धनं भवति । शुनस्य वर्ग:शुन्यं भवति । तदेव वर्गस्य पदं भतिव । यक्तुति: स एव वर्गो भवतीति ॥

                          अत्रओपपत्ति:

गुननोपपत्तिवैपरीत्येन भागहारोपपत्तिरपि सुगमैव । शुन्यं शुन्येन भक्त । ११९४ ब्राह्म स्फुटसिद्धान्ते ३-३=*= ३ (१- १) फलं शून्यं न भवतीति प्रदश्र्यते । यथा .३ एतावता शून्ये ६-६ ० ६ (१-१) ६ न्यूनाधिकत्वं स्पष्टमेव दृग्गोचरीभूतं भवत्यर्थात्सर्वाणि शून्यानि न समानानि भवन्ति तस्मात् शून्येन शून्यं भक्त फलं शून्यं न भवितुमर्हति, प्राचार्येण यदस्य मानं शून्यं कथ्यते तत्समीचीनं नास्ति । समयोर्द्धयोधतस्य वर्ग इत्यभिधानात् धनयोघतस्य ऋणयोघतस्य च धनत्वात् वर्गस्य सर्वथैव धनत्वमेव । ऋणं धनं वा शून्येन विभक्तं तच्छेदं भवतीत्याचार्योक्तौ िवचार्यते। यथा - अत्र र मानं यथा यथाऽल्पं भवेत्तथा तथा लब्धिरधिका स्यात्, र मानस्य परमाल्पत्वेऽर्थाच्छून्यसमत्वे लब्धिः परमाधिकाऽनन्तसमा भवेदत एव बीजगणिते - खहरराशिसम्बन्धे तथा - 'अस्मिन् विकारः खहरे न राशावपि प्रविष्टेष्वपि निः सृतेषु । वहुष्वपि स्याल्लयः सृष्टिकालेऽनन्तेऽच्युते भूतगणेषु यद्वत्, भास्करेण कथितम् । अनेन खहरराशे रविकारिता दृष्टान्तप्रसङ्गन भगवतोऽनन्तस्याच्युतस्य साम्यं प्रतिपादयति । अथ ऋणात्मक राशिसम्बन्धे किञ्चिद्विचार्यते । ०>-य , * = अनन्त, -य>अनन्ताधिक । इति ऋणा ऽत्मकराशेवैचित्र्यमाश्चर्यकारकमस्ति, यतः शून्यादल्पो भूत्वाऽनन्ततोऽपि महान् भवतीति ॥३४-३५॥ अब भाग हार के लिये कहते हैं। हेि. भा- धन को धन से वा ऋण को ऋण से भाग देने से फल धन होता है । शून्य को शून्य से भाग देने से फल शून्य होता है। धन को ऋण से भाग देने से फल ऋण होता है। धन से ऋण को भाग देने से फल ऋण होता है। ऋण वा धन को शून्य से भाग देने से उस ऋण वा धन में शून्य छेद (हर) होता है। शून्य को ऋण वा धन से भाग देने से फल शून्य होता है। ऋण और धन का वर्ग धन होता है। शून्य का वर्ग शून्य होता है। शून्य का पद (मूल) भी शून्य होता है इति ॥ गुणनोपपत्ति वैषरीत्य से भागहारोपपत्ति भी सुगम ही है। शून्य को शून्य से भाग देने से फल शून्य नहीं होता है। जैसे ३-३= ० --३ (१-१-३ इससे शून्यों में ६-६ ० ६ (१- १) ६ न्यूनाधिक्य स्पष्ट ही देखने में आता है। अर्थात्, सब शून्य बराबर नहीं होते हैं अतः शून्य से धनर्णशून्यानां सङ्कलनम् शून्य को भाग देने से फल शून्य नहीं हो सकता है। आचार्य 8 इसका मान शून्य कहते हैं सो ठीक नहीं है। यहां र का मान ज्यों ज्यों अल्प होगा त्यो त्यों लब्धि अधिक होगी । र मान के परमाल्प में अर्थात् शून्य समत्व में लब्धि परमाधिक अर्थात् अनन्त के बराबर होती है। भास्कराचार्य ने बीजगणित में खहर -- राशि के सम्बन्ध में ‘अस्मिन् विकारः खहरे न राशावपि प्रविष्टेष्वपि निःसृतेषु । बहुष्वपि स्याल्लयसृष्टिकालेऽनन्तेऽच्युते भूतगणेषु यद्वत्' कहा है । अब ऋणात्मक राशि के वैचित्र्यको दिखलाते हैं। ० > -य, यू=अनन्त तथा ११९५ --"=—.. -" = --य> अनन्त यह ऋणात्मक राशि की य परन्तु ०>-य विचित्रता आश्चर्य कारक है। क्योंकि शून्य से भी अल्प होकर अनन्त से भी अधिक होला है इति ॥३४-३५॥ इदानीं संक्रमणविषमकर्माह । योगोऽन्तर युतहीनो द्विहृतः संक्रमणमन्तरविभक्त वा । वर्गान्तरमन्तरयुतहीनं द्विहृतं विषमकर्म ॥३६॥ सु. भा-योगो राश्योर्योगोऽन्तरेण राश्यन्तरेण युतो हीनश्च द्विहृतो दलितो राशी स्तः । इदं संड क्रमरणं नाम गणितम् । वा राश्योर्वर्गान्तरं राश्यन्तरेण विभक्त फलमन्तरेण युतं हीनं द्विहृतं च राशी स्तः । इदं विषमकर्म नाम गणि तम् । ‘योगोऽन्तरेणोनयुतः’-इत्यादि तथा ‘वर्गान्तरं राशिवियोगभक्त'-इत्यादि च भास्करोक्त चैतदनुरूपमेव ।। ३६ ।। वि. भा-द्वयो राश्योर्योगस्तयोरन्तरेण युतो हीनश्च कार्यः । अर्धितस्तदा राशी भवेताम्, इद' सक्रमणं नाम गणितम् । वा राश्योर्वगन्तरं राश्यन्तरेण विभक्त लब्धमन्तरेण युतं हीनं द्वाभ्यां भक्त तदा राशी भवेताम् । इदं विषमकर्म नाम गणितम ।। कल्प्येते राशी य, र अनयोर्योगः=य+-र, अंन्तरम्=य-र, योगोऽन्तरेण युतः य+ र+य-र-२ य अर्धितः--योग-+अन्त=य । योगोऽन्तरेण हीनः

११९६ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तें

य+र-(य-र)=य+र-य+र=२ र श्रर्धितः=योग-श्रन्तर/२=र इदं संक्रमरगसंझकं गरिगतम्। तथा राश्योर्वर्गान्तरम् = य^२-र्^२ राश्यन्तरेरग य-र भक्त य^२-र^२/य-र=य+र ततः पूर्ववत्। योग+श्रन्तर/२=य। योग+श्रन्तर/२=र। इदं विषमकमं नाम गणितम्। एतावताऽऽचार्योक्तमुपपन्नम् । लीलावत्यां 'योगोऽन्तरेणोनयुतोऽर्धितस्तौ राशी स्मृतं संक्रमरगाख्य' मिति तथा वर्गान्तरं राशिवियोगभक्तं योगस्ततः प्रोक्तवदेव राशी' इती च भास्करोक्तमाचार्योक्तानुरूपमेवास्ति ॥३६॥

                श्रब संक्रमरग श्रौर विषम कमं कहते है ।
    हि.भा.- दो राशीयों के योग में दोनों राशीयों के श्रन्तर को युत श्रोर हीन कर दो  से भाग देने से दोनों राशीयों का प्रमारग होता है इसका नाम संक्रमरग है । वा दोनों राशीयों के वर्गान्तर को राश्यन्तर से भाग देकर जो लब्धि हो उसमें राश्यन्तर को युत श्रौर हीनकर दो से भाग देने से राशीद्वय का मान होता है इसका नाम विषम कमं है ॥
                            उपपत्ति ।
    प्रथम राशि=य । द्वितीय रशि=र, प्ररा+द्विरा=य+र=योग । प्ररा-द्विरा=य-र=श्रन्तर,

योग+श्रन्तर=य+र+य-र=२य . . योग+श्रन्तर/२=य । योग--श्रन्तर=य+र-(य-र)=य+र- य+र+र+२र । श्रतः योग-श्रन्तर/२=र । यह संक्रमरग गरिगत है । वा राशिद्वय का वर्गान्तर=य^२-र^२, राश्यन्तर (य-र) से भाग देने से य^२-र^२/य-र = य+र=योग तब पूर्ववत्यो योग+श्रन्तर/२=य । योग-श्रन्तर/२=र,इसका नाम विषमकप्रं गरिगत है । इससे न्न्प्राचार्योक्त उपपन्न हुआ । लीलावती में 'योगोऽन्तरेरगोनयुत' इत्यादि से तथा 'वर्गान्तरं राशिवियोगभक्त' इत्यादि से भास्कराचायं ने श्राचार्याक्त के श्रनुरूप ही कहा है इति ॥३६॥

         इदानीं समद्विबाहुविभुजे लम्बग्नानादकररगीगतौ भुजावाह ।
            कररगी लम्बस्तत्कृतिरिष्ठह्यतेष्टोनसंयुताऽल्पा मूः ।
            श्वधिको द्विह्यतो बाहुः संक्षेप्यो यद्वधो वर्गः ॥३७॥
       सु.भा.-यो लम्बस्तस्य कररगी संग्न्या ग्नेया । तस्याः करण्याः कृतिरिष्टेन हृता। 

इष्टोनसंयुता कार्या श्वनयोर्योऽल्पा सा समद्विबाहोर्भूः कल्प्या । यश्चाधिकः स दिहृतः समद्वि- बाहोर्बाहुर्ग्नेयः । 'संक्षेप्यो यद्वधो वर्गः' इत्यस्याग्र' सम्बन्धः । Kim ^PT %*&f TO":, ^dlH^fcfi - ^ptT 5f;rzftofs?qT ?mfg^7f- fowTfe^r 55 — — — -^^'-- r — = —J — — srer ft^r *f shrift % ■fffT ^ 1 1

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                  धनर्णशून्यानां सङ्कलनम्

श्रत्रोपपतिः। समद्विबाहो य: शिर: कोरगादाघारोपरि लम्बस्तद्वशाज्जात्यद्वयं समानमुत्पद्यते। तत्र लम्बः कोटिः। आघाराघं भ्रुज:। समद्विबाहोर्बाहुः करर्गाः।भ्रुजकरर्गान्तरमिष्टं प्रकल्प्य तद्वर्गान्तरात् कोटिवर्गाद्विषमकर्मरगाऽनन्तरप्र्तिपदितेन द्विगुरगाभुजो भूः। करर्गो बाहुश्चाकररगीगत श्रानीत हति॥ ३७॥

वि.भा.-समद्विबाहो शिर: कोणदाधारोपरि यो लम्ब: सा कररगी संन्यका न्येया, तस्या वर्ग इष्टेन भक्तः, कार्यो श्रनयोयार्याऽल्पा सा समद्विबाहुत्रिभुजस्य भू: कल्पनीया। योऽधिक: स द्वाभ्यां भक्तः समद्विबाहुत्रिभुजस्य् भुजो न्येय:।' सक्षेप्यो यद्वघोवर्ग्स्' इत्य्स्याग्रे सम्बन्ध:।

                   श्रत्रोपपति:।

अ क ग समद्विबाहु त्रिभुजम्। श्र् शिर: कोण बिन्दुत: क ग श्राघारोपरि लम्ब:= श्र र एतल्लम्ववशेन श्रकर , श्रगर जात्य्त्रिभ्रुजद्वयं तुल्य्ं समुत्पघते, श्रर लम्ब: कोटि:, कर ग्राधराघं भुज:। श्रक= कर्ण:। श्रत्र भुजकरर्गायोर्वर्गान्तरं कोटिवर्गमिष्टं प्रकल्प्य वर्गान्तरं राशिवियोगभक्तमित्यादिना करर्गा-भुज/करर्गा-भुज=कोटि/करगां-भुजा=इ/करर्गा-भु = कर्ण+ भुज तत: करगांभुजयोर्योगान्तराभ्यां संक्रमरागारिगातेन भुजाकरर्गा भवेत्। भ्रुजो द्विगुणितस्त्दा भूर्भवेत्। करर्गा भ्रुजश्चाकररगीगतः समागत इति ॥३७॥

श्रब समाद्विबाहु त्रिभुज में लम्बण्यान से श्रकररगीगत भुजद्वय को कहते हें।

हि.भा. -सम द्विबाहु में शिर.कोगा से श्राघार के ऊपर को लम्ब होता है वह कररगी संन्यक हे। उस के वर्ग को इष्ट से भाग देकर जो लब्धि हो उस में इष्ट को हीन ओर युत करना चाहिये। इन दोनों में जो श्रल्प है उसको समद्विबाहु त्रिभुज की भू कल्पना करना। भाषिक जो हे उस को दो से भाग देने से जो हो वह समद्विबाहु का भुज होता है इति ॥

                    उपपति।

यहां संस्क्रुतोपपति में लिखित (१) क्षेष को देखिये। श्रकग समद्विबाहुक त्रिभुज है। श्र शिरः कोरगाबिन्दु से कग श्राषार के ऊपर लम्ब= भर इस लम्ब के वश से श्रकर, श्रगर दो तुल्यः जात्म त्रिभुज उत्पन्न होता है । श्रर लम्ब= कोटि,कर श्राघाराषं=भुज,अक=करर्गा यहां भुज ओर करर्गा के वर्गान्तर कोटि (लम्ब) वर्ग को इष्ट कल्पना कर 'वर्गान्तरं राशि वियोग भक्त' इत्यादि से करगां-भुज/करगां-भु=कोटि/कर्गा-भु= इ/ करगां-भु= क+भु तव करगां ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते

 और भुज के योगान्तर से संक्रमण गणित से भुज और कर्ण का प्रमाण आजायगा, द्विगुणित भुज समद्विबाहुक की भू है। इस तरह प्रकरणीगत भुज और कर्ण लाया गया है इति ।॥३७॥
            इदानीं करणीयोगान्तरे गुणनं चाह।
        इष्टोद्धतकरण पदयुतिकृतिरिष्टगुणिताऽन्तरकृतिर्वा ।
        गुण्यस्तिर्यगधोऽधो गुणकसमस्तद्भगणः सहितः ॥ ३८ ॥
   सु. भा.--यद्वधो ययोः करेण्योर्वधो वगों भवति तयोरेव संक्षेप्यो योगोऽन्तरं

च भवतीति ज्ञेयम् । इष्टोद्धतयोः करण्योः पदे ग्राह्य तद्युतिकृतिर्वा तदन्तरकृति रिष्टगुणिता तदा तयोः करण्योर्योगान्तरे स्तः । गुणकसमो गुण्यस्तिर्यक् पङ्क्ता वधोऽधः स्थाप्यस्ततस्तद्गुणस्तैः खण्डकैर्गुणः सहितो गुणनफलं स्यात् ।

      अत्रोपपत्तिः । मत्कृतभास्करबीजटिप्पणीतः स्फुटा ।
 यदा इ, १V क, इ. */ के एतादृश्यौ करण्यौ तदैव गणितयुक्त्या
  योग:=(इ,+इ.) १/ क = ५/(इ,+इ.) क।
  अन्तरम्= (इ.-इ.)५/ क = *// (इ.-इ)* क ।
  अथ तदा द्वयोर्वधः=इ.५/ कxइ. ५/ क
 अस्य मूलचिह्नान्तर्गतस्य मूलं निरग्रम्=इ, इ. क। अतो यदा द्वयोर्वधो
 वगॉभवति तदैव तयोर्योगान्तरे उत्पद्येते ।। ३८ ।।
 
     वि. भा.-ययोः करण्योर्वधो वग भवति तयोरेव संक्षेप्योऽर्थात् योगोऽन्तरं च  भवतीति । इष्टोद्धतयोः करण्योः पदे (मूले) ग्राह्य तद्युतिः कृतिर्वा तदन्तरवर्ग
 इष्टगुणितस्तदा तयोः करण्योर्योगान्तरे भवतः । गुणकसमो गुण्यस्तिर्यक् पंक्ता  वधोऽधः स्थाप्यः, ततस्तैः खण्डकैर्गुणः सहितो गुणन फलं भवेदिति ।

प्रत्रोपपतिः ।

  अधुना नवीनैमूलचिन्हेन यत् प्रकाश्यते प्राचीनैस्तदेव करणी पदेन व्यव

ह्रियते । यथा/३=क ३ १/५ =क ५ इत्यादि, अथ१/य + vर इदं स्वव र्गमूलसममतस्तद्वर्गः य-+-र+२५/य. र अस्य यन्मूलं वा करणी स एव योगो य, ५/ र चानयोरिति । अथ w/य + ५/र ददं ५/र अनेन गुणनेन भजनेन च vर x (Vर */, )पूर्वागतरूपस्य यो वर्गस्तस्य धनणंशून्यानां सङ्कलनम्

       मूलमेव √य, √र अनयोर्युत्यन्तरं भवेदतो √र X (√य/र +- √र/√र)sस्यवर्गः र(√य/र +- √र/√र)¹ अस्यमूलम् वा कररी √य √र अनयोतर्योगोSन्तरं भवतीति। सिध्दान्तशेखरे 'ग्रह्य' न मूलं खलु यस्य राशेस्तस्य प्रदिष्टं करणीति नाम। विभाजको वा गुणकोSथवाSस्याः कृतिर्नियुक्ता कृतिभिः करण्याः, अनेन करणीपरिभाषां तथा गुणनभजनयोओविशेषं कथयति। करणीयोगवियोगसम्बन्धे च, 'योगे वियोगे करणीं स्वबुध्या सन्ताडयेतेन यथा कृतेः स्यात्। तन्मूमसंयोगवियोगवर्गो विभाजयेदिष्ट गुणेन तेन।' उदाहरणायं 'द्विकाष्टमित्योस्त्रिभसंख्ययो' रित्यादि भास्करोक्तः प्रश्नः।
       श्रीपत्युक्तौ 'संताडयेतेन यथा कृतिः स्यादिति तथा विभाजयेदिष्टगुणेन तेनेति पदद्वयं परिवर्त्यते चेतथव ते एव योगान्तरे भवतः। तथा च तत्सूत्रमेतादृशं भवितुमर्हति।
       'योगे वियोगे करणीं स्वबुध्या विभाजयेतेन यथा कृतिः स्यात्। तन्मूलसंयोगवियोगवर्गो सन्ताडयेदिष्टगुणेन तेन' एतादृशं सूत्रमेव परम्परया प्रसिद्धमस्ति ज्योतिर्वित्समाजेषु।
       'आदौ करण्यावपवर्तनीये तन्मूलयोर्योओगवर्गो। इष्टापवर्ताङ्कहतौ भवेता क्रमेण विश्लेषयुती करण्योः' इदमेव सूत्रं श्री जीवनायदैवज्नेन स्वकृत भास्करबीजगणितटीकायाम्।
    
       'आदौ करण्यावपवर्तनीये तन्मूलयोर्योओगवर्गो इष्टापवर्ताङ्कहतौ मते ते क्रमेण विश्लेषयुती करण्योः'। एवं कथितम्। भास्कराचार्येण लघुकरणीम् तुल्यमपवर्तनाङ्क प्रकल्प्य "लघ्व्या हृतायास्तु पदं महत्याः सक निरेक स्वहतं लघुघ्नम्। योगान्तरे स्तः कमरास्तयोर्वा पृथक् स्थितिः स्याद्यपि बनास्ति मूलम्" इति सूत्रमुपनिबद्धम्॥ यदि इ√य,इ√य एताद्ऱुश्यो करण्यो तदैव गणितयुक्तया योगः = (इ+इ)√य=√[(इ+इ)य], अन्तरम् = (इ-इ)√य=√[(इ+इ)¹Xय] तदा द्वयोर्घातः = इ√यXइ√य = √इ¹X√इ¹ = √इ¹Xइ¹Xय  अस्य मूलचिह्नान्तर्गतस्य मूलं निरग्रम् = इ.इ.य  अतो यक्ष द्वयोवधो वर्गो भवति तदैव तयोर्योगान्तरे भवितुमर्हत इति॥३८॥ 
                         ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते

हेि.भा-जिन दो करणियों का वध वर्ग होता है, उन दोनों का ही योगान्तर होता है । इष्टाङ्क से भाग देकर दोनों करणियों का मूल लेना चाहिए ।

दोनों का योग या वर्ग तथा अन्तर वर्ग इष्टगुणित हो तब दोनों करणियों का योगा न्तर होता है। गुणक के तुल्य गुण्यखंड को अधोऽधः पंक्ति में तिर्यक् स्थापना करें, उसके बाद उन खण्डों से गुणक को गुणाकर सबों का योग गुणनफल होता है ।

                           उपपत्ति ।

इस समय मूलचिह्न से जो प्रकट होता है उसी को पुरातन समय में करणी नाम से प्रकट किया जाता था । ‘विभाजको वा गुणाकोऽथवाऽस्याः कृतिभिर्नियुक्ता कृतिभिः करण्याः इस पद से करणी की परिभाषा एवं गुणन, भजन के लिए विशेष बात कही गई है ।

करणीयोगान्तर के सम्बन्ध में ‘योगे वियोगे करणीं स्वबुद्धया सन्ताडयेत्तन यथा कृतिः स्यात् तन्मूलम्' इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में कहा गया है । उदाहरण के लिए द्विका ष्टमित्योस्त्रिभसंख्ययोः' इत्यादि भास्करोक्त है । श्रीपति की उक्ति में ‘स्न्ताडयेत्तेन यथाकृतिः स्यात्' इत्यादि और विभाजयेदिष्टगुणेन तेन' इत्यादि दोनों पदों के परैिवर्तन से उसी प्रकार योगान्तर होता है। तब यह सूत्र इस प्रकार होना चाहिए “योगे वियोगे करणीं स्व बुद्धच्या विभाजयेत्तेन यथाकृतिः स्यात्” इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित परम्परा ज्योतिषियों में प्रचलित है ।

इसी प्रकार जीवनाथ दैवज्ञ ने भी अपनी भास्करबीजगणित की टीका में लिखा है ‘आदौ करण्यापवर्तनीये तन्मूलयोरन्तरयोगवगौ' इत्यादि भास्कराचार्य ने लघुकरणी के बराबर अपवर्तनाङ्क मानकर ‘लघ्व्या हृतायास्तु पद्म' इत्यादि सूत्र लिखा है । उदाहरण के लिए यदि इ√य, इ√य यह दोनौं करणी हैं। गणित की भांति योग = (इ+ इ) १/ य = १/(इ+इ). य, अन्तर= (इ-इ) √य = √(इ+इ). य, तब दोनों का घात = इ √य x इ √य =√इ.य * √इ.य = √इ. इ . य इस स्वरूप में मूलचिह्नान्तर्गत का मूल निरग्र=इ. इ. य हैं । इसलिए जिन दौ का वध वर्ग होता है वहीं पर उन दोनों का योग तथा अन्तर होता है। ३८ ।। धनर्णशून्यानां सङ्कलनम् इदानीं करणीभागहारे वर्गे च करणसूत्रमाह । स्वेष्टर्णच्छेदगुणौ भोज्यच्छेदौ पृथक् युजावसकृत् । छेदैकगतहृतो वा भाज्यो वर्गः समद्विवधः ॥ ३९ ॥ १२०१ सु. भ.-भाज्यच्छेदौ स्वेष्टर्णच्छेदगुणौ छेदे या काचिदिष्टा करणी तामृणं प्रकल्प्य तादृक्छेदेन भाज्यहरौ द्वावेव गुणौ पृथक् सम्भवे सति गुणितभाज्ये गुणितच्छेदे च द्वयोर्द्धयोः करण्योर्युजौ योगौ साध्यौ । पुनः स्वेष्टर्णच्छेदगुणौ भाज्यच्छेदौ कार्यावेवमसकृद्वयावच्छेदगतैकैव करणी स्यात् । ततो भाज्यो हरैक गतकरण्या हृतो वा फलं स्यात् । अत्र वा पदेन साधारणभागहारविधिश्च यद्गुणश्छेदो भाज्याच्छुध्यति स गुण एव लब्धिरित्यप्याचार्येण सूचितः । सम द्विवधो वगों भवतीति स्फुटम् । अत्रोपपत्त्यर्थं मत्कृतभास्करबीजटिप्पण्यां ‘धनरर्णताव्यत्ययमीप्सितायाश्छेदे' इत्यादि सूत्रोपपत्तिर्विलोक्या ।। ३९ ।। वि. भा.-भाज्यहरौ हरे या काचिदिष्टा करणी त ऋणं मत्वा तादृशेन हरेण गुणनीयौ, सम्भवे सति गुणितभाज्ये गुणितहरे च द्वयोर्द्धयोः करण्योर्योगौ साध्यौ । पुनः स्वेष्टर्णभाज्यहरौ कार्यावेिवमसकृद्यावद्धरगतैकैब करणी स्यात् । ततो भाज्यो हरैकगतकरण्या भक्तो वा फलं स्यात् । यो गुणो हरो भाज्याच्छुध्यति स गुण एव लब्धिरिति साधारणभागहाररीतिरपि वा पदेनाचार्येण सूचितः समद्विघातो वग चतीति ।। अत्रोपपत्तिः । भाज्यभाजकयोः समेनाङकेन संगुण्य यदि भजेत्तदा लब्धिरविकृतैवातो भाजकगतकरणीनामेकां व्यस्तधनर्णरूपां प्रकल्प्य तादृशा भाजकेन भाज्यभाजका चुभौ यदि गुण्येते तदा नूतनभाजके योगान्तरघातस्य वर्गान्तरसमत्वे नैका करणी न्यूना भविष्यति पुनस्तथैव कृते प्रायो नूतनभाजकेऽप्येका करणी न्यूना भविष्यति, एवमसकृत्कृतेऽन्त्ये सम्भवे भाजके भविष्यति ह्यकैव करणीत्युपपन्नमाचार्योक्तम् । सिद्धान्तशेखरे “छेदे करण्याः समभीप्सितायाः कृत्वा विपर्यासमृणास्वयोश्च । गुण्यौ पृथक् भाज्यहरौ युतौ तौ छेदेऽसकृत् स्यात् करणीयथैका । तया भजेदूध्र्वग भाज्यराशिमेवं करण्याः खलु भागहारः । समानराश्योरुभयोश्च घाते कृते करण्याः कृतिमप्युशन्ति' श्रीपत्युक्तमिदं, बीजगणिते ‘धनर्णता व्यत्ययमीप्सितायाश्छेदे करण्या असकृद्विधाय । तादृक् छिदाः भाज्यहरौ निहन्यादेकैव यावस्करणी हरे स्यात् । भाज्यास्तया भाज्यगता करण्यः’ भास्करोक्तमिदं चाऽऽचार्योक्तानुरूपमे

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                            ब्राह्मस्पुटसिद्धान्ते

वास्ति। परन्तु यदि हरे धनकरणी भवेत्तदाऽऽचार्याक्तश्रीपत्युक्तभास्करोक्ता 'हरे यवदेकंव करसी स्यात्' नां व्यभिचारो भवेदिति||३९||

            श्रब करगी भागहार श्रोर वर्ग को कहते है ।
  हि मा - हरे मे जो कोइ इष्ट करगी हो उसको ॠरग मानकर भाज्य श्रोर हर को गुरा देना चहिये।सम्भव रहने से गुरिगत भाज्य में ओर गुरिगत हर में , दो दो कररगी के योग साधन करना पुनः उपयुक्त क्रिया के श्रनुसार क्रिया करनी चहिये। इस तरह बार वार तब तक क्रिया करनी चाहिए जब तक हर में एक ही कररगी हो। तब् भाज्य को भाजकगत एक कररगी से भाग देने से फल होता है। वर्गं की परिभाषा कहते है समान दो श्रङ्कों का घात उसका वर्ग कहलाता है॥
                               उपर्पात्त।
  भाज्य श्रोर भाजक को सामान श्रङ्क से गुरगा कर यदी भाग दिया जाय तो लब्धि ज्यों की त्यों रहती है। झ्मर्यात् लब्धि में किसी तरह का विकार नहीं होता है। इसलिये भाजक गत कररिगयों में एक को व्यस्त (उल्टा) धन,ॠरगा कल्पना कर उस भाजक से यदी भाज्य झ्मौर भाजक को गुरगा करते है तब नवीन भाजक में योगान्तर धात के वर्गान्तर के समान होने के काररग एक कररगी न्युन होगी। पुनाः उसी तरह क्रिया करने से पिर भी नवीन भाजक में एक कररगी न्युन होगी। एवं श्रसक्रुत्(बार-बार) करने से हर में एक ही कररगी होगी , इस से व्लाचार्योत्त उपपन्त हुश्रा। सिद्धान्तशेखर में 'छेदे करण्याः सममीप्सिताया' इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित श्लोकों से श्रीपति ने तथा दीजगरिगत में 'धनरगाता व्यत्ययमीप्सिताया' इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित श्लोक से भास्कराचायं ने भी श्राचार्योत्त्क के श्रनुरुप ही कहा है। परन्तु भाजक धनकररगी रहेगी तब 'यावध्दरे येकंव कररगी भवेत्' इसका व्यभिचार होगा इती॥३९॥
                     इदानीं कररगीमूलानयनार्यमाह।
           इष्टकरण्यूनाया रुपकृतेः पदयुतोनरुपाध्रे।
           प्रयमं रुपाण्यन्यत्ततो ततो द्वितीयं करण्यसकृत्॥४०॥
        सु भा - रुपकृतेः कि विशिष्टकरण्यूनायाः। इष्टा यैका तया वेष्टयोर्द्वयोर्यो रुपवद्योगस्तोन वेष्टानामनेकासां यो रुपवद्योगस्तोनोनाया यत्पदं तेन रुपारिग पृयक् युतोनितानि तदर्धे च कार्ये। तत्र प्रथममर्धाद्योगाधं रुपारिग कल्प्यानि। ततोऽन्यदन्तरार्ध द्वितीयं मूलस्योका कररगी भवती। एवमसकृन्मूलानयनं कार्यम्।
     श्रत्रोपपत्तिः। 'वर्गे करप्या यदि वा करन्योः' इत्यादि भास्करसूत्रस्य या भहिप्पण्यामुपपत्तिस्तया स्पुटा। तत्रान्ये बहवो विरोषारच निरीक्षरगीयाः॥४०॥ R % v ^ 

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                            धनरर्पर्शून्यानां सङ्कलनम्                     १२०३
          वि.भा.-रूपक्रुतेः इष्टकरण्यूनायाः इष्टायैका तया ,इष्ट योद्वयोर्वा रुपवधो योगस्ते, इष्टानामनेकासां यो रुपवद्योगास्तेनोनाया यत्पदं तेन रुपारिप पृथक्-युतोनितानि तदर्धे च कार्ये।तत्र प्रथमं 

योगार्धरुपारिप कल्प्यानि,ततोअसन्यदन्तरार्ध द्वितीयं मूलस्य एका करगी भवती।एवमसक्कृन्मूलानयनं कार्यमिति।

                             श्रत्रोपपत्तिः।
      
श्रथ श्र  ± √न  = व ±  √म इत्येकं समीकरणं यत्र   श्र, व संख्याद्वयं संभवं न,म इति संख्याद्वयं 

चावर्गाङ्करुपं तदाअत्र श्र = व,न =म भविष्यति।यद्येवं न तर्हि कल्प्यते श्र = व + इ ष्रतः व+इ ±

  √न=व ±  √म समश्ःऑधनेन इ  ±  √न  = ±  √म वर्गीकरऍन इX^2 ±१इ √न + न = म सम्षोधनादिना    इX^2 ͠ (म-न)X/2 २इ == √न श्रनेन न मूलं  भिन्न वाअभिन्नं संभवसंख्यासमं जातं परन्तु क मानमवर्गीङ्करुपं पूर्वं प्रकल्पितमवर्गस्य मूलं न सावयवं न निरवयवं च भिन्नवर्गे भिन्नत्वान्तिरवयवाङ्कवर्गे वर्गाङ्कत्वादतः पूर्वकल्पना न समीचीना। ततोअवश्यं श्र = व,न = म इति सिध्यति। श्रय कल्प्यते श्र+√न अस्य मूलं √य+√र वर्गकरऍन य + र+√४य.र=श्र+  √न पूर्वसमीकरएयुत्तया य+र=अ। ४य.र=न,वर्गकरणॅन यX^2+२य.र+रX^2=श्रX^2, ४य. र=न सम्षोधनेन यX^2 -२य. र+रX^2 =श्रX^2 - न मूलेन य - र=√अX^2-न ततः संक्रमऍन य, र श्रनयोमनिं भवेदिति। सिद्धान्तषेखरे 'रुपक्कृतेः करणी रहिताया मूलयुतोनितरुपगुरार्धे। रुपगुराः प्रथमं हि तदन्यत् स्यात् कररीपकदमित्यसक्कृच्च,श्रीपत्युक्तमिदमा वार्योक्तानूरुपमेवास्ति । भास्कराचार्येण श्रीपत्युक्तमिदं करणीमलानयनं "वर्गेकरण्या यदि वा करण्योस्तुल्यानि रुपाण्यथवा बहूनाम्। विश्ःऑधयेद्रूप्रक्कृतेः पदेन श्ःऍषस्य रुपाणी युतोनितानि॥ प्पृथक् तदधे करणीद्वयं स्यान्मूलेअथबह्ही करणी तयोर्या । रुपाणी तान्येव क्कृतानि भूयः श्ःऑषाः करण्य्यॉ यदि सन्ति वर्गे॥" इत्यनेन स्पष्टीकरणापुर्वकं सम्यक् कथितमिति, करणीमूलानयनेअन्येअपि बहवो नियमाः स्वबीजगणीते प्रतिपादिनताः ॥४०॥
                          
                            श्रव करणी मूलनयन को कहते है।
           हि.भा - इष्ट एक करणी, वा इष्ट दो. करणीथों का रुपवत् जो योग हो उससे
   वा श्रनेक करणीयों के रुपवत् योग से रहित रुपवर्ग का जो मूल हो उससे रुप को प्पृथक् युत ष्रोर हीन करना, दोनों का श्रावा  करना, उसमें प्रथम तोगाधं की रुप कल्पना करना, ष्रोर  श्रन्य  श्रन्तरार्ध के द्वितीय मूल्य की एक करणी होती है। एवं श्रसक्कृत् मूलानयन करना चाहिये॥ 
   अ+१/ न =व + 'w/म यह एक समीकरण है जिस में प्र, ब ये दोनों संख्याए

संभव हैं, न, म, ये दोनों संख्याएँ प्रवर्गाङ्क रूप हैं तब अ=व, न=म होगा । यदि ऐसा नहीं होगा तो कल्पना करते हैं अ=व+इ अतः व+इ+ १vन = व + '/म समशो धन से इ.+ ५/न = + ५/म वर्ग करने से इ+२ इ५/न+न=म समशोधनादि से = */न इससे सिद्ध होता है कि न का मूल भिन्न हो कर अभिन्न संभव संख्या २ इ के बराबर हुआ, लेकिन क का मान पहले अवर्गाङ्क रूप प्रकल्पित है, अवर्गाङ्क का मूल भिन्न वर्ग में भिन्नत्व के कारण और निरवयवाङ्क के वर्ग में वर्गाङ्कत्व के कारण नसावयव होता है, न निरयव, इसलिये पूर्व कल्पना समीचीन नहीं हैं । अतः अ=व, न=म सिद्ध होता है। कल्पना करते हैं अ+ Vन इसका मूल= */य-+ */र वर्ग करने से य-+-र+१/४ य. र=अ + ५/ न पूर्व समीकरणयुक्ति से य+ र= अ । ४ य. र=न वर्ग करने से य'+२ य. र+-र=अ' । ४ य. र=न समशोधन से य'-२य. र-+-र=अ'—न मूल लेने से य-र= १/ अ-न, अन्तर ज्ञान से संक्रमण गणित से य र इन दोनों का मान विदित हो जायगा । इस से प्राचार्योक्त उपपन्न हुआ । सिद्धान्त शेखर में ‘रूपकृतेः करणी रहिता वा' इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित श्लोक से श्रीपति ने आचा यक्त के अनुरूप ही कहा है, भास्कराचार्य ने बीज गणित में ‘वर्गे करण्या यदि वा करण्योः इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित पद्यों से श्रीपत्युक्त करणीमूलानयन को स्पष्टी करण पूर्वक कहा है । ४० ।।

    इदानीमव्यक्तसङ्कलितव्यवकलितयोः करणसूत्रमाह ।
    अव्यक्त वर्गघनवगवर्गपञ्चगत षड्गतादीनाम् ।
    तुल्यानां संकलितव्यवकलिते पृथगतुल्यानाम् ।। ४१ ।।
    सु. भा-अव्यक्तानां तद्वर्गाणां चनानां वर्गवर्गाणां पञ्चगतानां पञ्च

घातानां षड्गतादीनां षड्घातादीनां तुल्यानां समानजातीनां सङ्कलितव्यवकलिते भवतोऽतुल्यानां भिन्नजातीनां च पृथक् स्थापनमेव तेषां सङ्कलितव्यवकलिते भवत इति । ‘योगोऽन्तरं तेषु समानजात्योविभिन्नजात्योश्च पृथक् स्थितिश्ध ' इति भास्करोक्तमेतदनुरूपमेवातो ऽस्योपपत्तिश्च तद्वत् ॥ ४१ ।।

वि. भा-अव्यक्तानां वर्गाणां घनानां वर्गवर्गाणां पञ्चघातानां षड् घातादीनां तुल्यानां (समानजातीनां) योगोऽन्तरं भवति, अतुल्यानां (भिन्नजा तीनां) पृथक् स्थितिरेव “तद्योगोऽन्तरं भवतीति । नारायणीये बीजगणितावतंसे ‘वणषु च समजात्योर्योगः कार्यस्तथा वियोगश्च । असदृशजात्योर्योगे पृथक् स्थितिः

                          धनशून्यानाम् सन्कलनम्
 स्याद्वियोगे च इति योगोन्तरं तेषु समानजात्योर्विभिन्न्नजात्योस्च प्रुथक् स्थितिश्च भास्करोक्तमिदम् चाचार्योक्तानुरूपमेव । समद्विधातो वर्ग: । त्रिधातो धन: । चतुर्धातो वर्गवगर्ग इत्यादियथेष्टघाता भवितुमहमंति । पासश्चात्यगणिते यस्य घातोSपेक्ष्यते तन्मस्तकोपरि तद्घातज्नापनाय तदाङ्का रक्ष्यन्त् यथा य श्र्यस्य द्विघात: = य¹=य¹*य¹=य¹+¹। त्रिघातो घन: = य¹*य¹=य¹*य¹*य¹=य¹+¹+¹ ऊर्ध्वरूपदर्शनादवगम्यते यद्वारज्नापका द्वित्र्यादय: । यदि द्विघाते विचार: क्रियते तदा य¹*य¹ अत्रैकघात एकघातेन गुण्यतेSत्र कैकैयोर्योगो द्रयम् य¹*य¹=य¹+¹=य², एवं यथेष्टघातेषु य¹*य¹=य¹+¹=य³=वर्गवर्ग:। य*य*य*य*य = य¹+¹+¹+¹+¹= य²+³= पण्चघात: इति ॥ ४२ ॥
           त्र्य्रब श्य्रव्यक्तों के संकलित त्र्य्रोरा व्यवकलित को कहते हैं ।
    हि.भा. -  श्र्यव्यक्तों के वगं, घन, वर्गवर्ग, पण्चघात, षड् घात भ्रादि समान जातियों का योग क्ष्योर श्य्रन्तर होता है । भिन्न जातियों की प्र्थक् स्थिति ही योग श्य्रोर श्य्रन्तर होता है ॥ नारायणीय बीजणितावनंस में 'वणैषुत्व समजात्योर्योग: कार्य' इत्यादि विज्नान भाष्य में लिखित भास्करीय श्लोक विषय श्य्राचार्योक्त के त्र्य्र्नुरूप ही है । समान दो श्य्रान्कों का घात वर्ग है, त्रिघात धन है चतुर्धात वर्गवर्ग इत्यादि यथेष्टघात होते है । पाश्चात्य गणित में जिसका घात श्य्रोपेक्षित है उसके मस्तक के ऊपर उस घात के ज्नानार्थ उस त्र्य्रन्क को रक्खा जाता है । जैसे य इसका द्विघात = य²=य¹*य¹=य¹+¹=य का वर्ग त्रिघात घन है । य³= य का घन + य²*य¹ = य¹*य¹*य¹= य¹+¹+¹ एवं यथेष्टघात होते है । समान जातिक त्र्य्रन्कों का योग श्य्रोर श्र्य्रन्तर होता है जैसे ३य² +२य² + ५य² = य² (३+२+५) = १० य² एवं १० य² - २य² - ५य² =य² (१०-२-५) = य² (१०-७) = ३य² ।
    यदि १२ य², इसमें ५ य³ इसको जोडते है वा घटाते है तो प्रथक् स्थापन ही होता है यथा १२य³ +- ५य³ एवं सर्वत्र समक्त्मना चाहिये इति ॥४१॥


                         इदानीमव्यक्तगुणेने सूत्रमाह ।
                सद्रशद्विवधो वर्गस्त्र्यादिवधस्तद् गतोशSन्यजातिवघ: ।
                 श्य्रन्योSन्यवर्णघातो भावितक: पूर्ववच्चेषम् ॥४२॥


    सू.मा. - सद्रशयोर्द्वयोरव्यक्तयोर्वधो वर्गा भवति । त्र्यादीनां समजातीनां

वधस्तद्वतस्त्त्र्यादिघातोSर्थाद् धनवर्गवर्गादिको भंवति । त्र्य्रन्यजात्योर्विभिन्नजात्योर्वधोSन्योSन्यवर्णघातो भवति स च भावितको भावित इत्युच्यते । ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः


  गुरगनभजनादिकम् कर्म पूर्ववदिति । स्याद्र पवरार्गाभिहतौ तु वरर्गो द्वित्र्यादिकानाम् समजातिकानाम् 
  इत्यादिभास्करोक्तमेतदनुरुपमेव ॥
                   इति धनरर्गादीनाम् सङ्कलितव्यवकलितादि ।
  वि.भा.- समानयोर्द्वयोरव्यक्तयोर्घातो वगो भवति। समानाव्यक्तत्रयारगाम् घातस्तद घनोभवति ।
   एवम् समानानाम् चतुरर्गामव्यक्तानाम् घातो वर्गवर्गो भवति एवम् पञच घातादावपि ।
  विभिन्न जात्योर्वघो Sन्योSन्यवरर्गाघातो भवति स च भावित सम्ज्ञक:। शेषम् गुरगानभजनादिकम्        पुर्ववच्छौघ्यमिति । श्रत्रत्यविषया: पुर्वहश्लोकस्य विज्ञानभाष्ये प्रदशीर्ता:सन्ति। तत्र व ते द्र्ष्टव्या इति ॥ 
                 इति घनरगादीनाम् सङ्कलितव्यवकलितादि ॥


    हि भा  समान दो व्ययक्तो का घात उसका वर्ग होता है । समान तीन श्रव्यक्तो का धात धन   होता है समान चार श्रव्यक्तो का घात वर्गवर्ग होता है । एवम् पञचधातादि होता है । विभिन्न जातिक श्रव्यक्तो के धात भावित सम्ज्ञक है । शेष गुरगान भजन आदि कर्म पूर्ववत् समत्भना चाहिये । यहा के विषय पुवश्लोक के हि.भा. मे दिखलाये गये हे वे वही द्र्ष्टव्य है इति ॥ 
        इति धन श्रौर भादि का सङ्कलित श्रौर व्यवकलित समाप्त हुआ।
   स्याद्र पवरर्गाभिहत तु वरर्गा द्वित्र्यादिकाना समजातिकानाम् ।
   वधे तु तद्वर्गधमादय:स्युस्तदूभावित चासमजातिधाते ॥
   भागादिकम् रुपवदेव शेष व्यक्त यदुक्तम् गरिगते तदत्र भास्करोक्तमिदमा भोक्तानुरुपमेवेति ॥                        मथैकवणसमीकरणबीजम्
                      तत्राव्यक्तमानानयनार्थमाह ।

प्रव्यक्तान्तरभक्तं व्यस्तं रूपान्तरं समेऽठयक्तः । वर्गाव्यक्ताः शोध्या यस्माद्रपाणि तदधस्तात् ।। ४३ ।। सु. भां-समे एकवणसमीकरणे व्यस्तं रूपान्तरमव्यक्तान्तरभक्तमव्यक्त मानं व्यक्तं भवेत् । यत्पक्षादव्यक्तमानादन्यपक्षाव्यक्तमानं विशोध्याव्यक्तान्तरं साध्यते तत्पक्षस्थरूपाण्यन्यपक्षरूपेभ्यो विशोध्य यच्छेषं तद्वयस्तं रूपान्तरमित्यर्थः । अव्यक्तः । वर्गाव्यक्ता'-इत्यादेरग्रे सम्बन्धः । ‘एकाव्यक्तं शोधयेदन्यपक्षात् इत्यादि भास्करोक्तमेतदनुरूपमेव ॥ ४३ ॥ वि .भा.-समे (एकवर्णसमीकरणे ) व्यस्त रूपान्तरमव्यक्तान्तरभक्त मव्यक्तमानं व्यक्त जायते । यत्पक्षादव्यक्तमानादन्यपक्षाव्यक्तमान विशोध्यायः क्तान्तरं साध्यते तत्पक्षस्य रूपाण्यन्यपक्षरूपेभ्यो विशोध्य यच्छेषं तद्वयस्तं रूपान्तरम् । अव्यक्तः । वगव्यक्ता इत्यादेरग्रे सम्बन्धः । सिद्धान्तशेखरे ‘अव्यक्त विश्लेषहृते प्रतीपरूपान्तरेऽव्यक्तमिती भवेताम् । स्याद्वा युतोनाहतभक्तमि च्छेत्तदाऽन्यपक्षे विहिते तथैव, श्रीपत्युक्तमिदं बीजगणिते “यावत्तावत् कल्प्यमव्य क्तराशेर्मान तस्मिन् कुर्वतोद्दिष्टमेव । तुल्यौ पक्षौ. साधनीयौ प्रयत्नात्यक्तवा क्षिप्त्वा वाऽपि संगुण्य भक्तचा । एकाव्यक्तं शोधयेदन्यपक्षाद्र पाण्यन्य स्येतरस्माच्च पक्षात् शेषाव्यक्तनोद्धरेद्र पशेष व्यक्त मानं जायतेऽव्यक्तराशेः अब एक वर्ण समीकरण बीज प्रारम्भ होता है । उस में पहले अव्यक्त मानानयनार्थ कहते हैं ।

हैि. भा-एकवर्ण समीकरण में विपरीत रूपान्तर की प्रव्यत्तान्तर से भाग देने से अव्यक्तमान व्यक्त होता है। जिस पक्ष के अव्यक्तमान में से अन्यपक्ष के अव्यक्त मान की घटाकर अव्यक्तान्तर साधन करते हैं उस पक्ष के रूप को अन्य पक्ष के रूप में से घटाकर जो शेष रहता है वही विपरीत रूपान्तर है । सिद्धान्त शेखर में ‘अव्यक्तविश्लेषहृते प्रतीप रूपान्तरे' इत्यादि विज्ञान भाष्य में लिखित श्रीपतिपद्य तथा बीजगणित में यावत्तावत्क ल्प्यमव्यक्तराशेः' इत्यादि वि. भा. लिखित भास्करोत्क्ति प्रावार्योक्त के अनुरूप ही है इति ॥ ४३ ॥ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त

                             इदानीं वर्गसमीकरणमाह ।


         वर्गचतुर्गुणितानां रूपाणां मध्यवर्गसहितानाम् ।
         मूलं मध्येनोनं वर्गद्विगुणोद्धतं मध्यः ।४४ ॥
   सु. भा.--यस्मात्पक्षादव्यक्तो वर्गाव्यक्ता अव्यक्तवर्गश्च विशोध्यस्तदध
   स्तादितरपक्षाद्रपाणि बिशोध्यानि । एवमेकपक्षेऽव्यक्तवगों ऽव्यक्तश्च । अपरपक्षे
   च व्यक्तानि रूपाणि । तत्राव्यक्तमानं कथं भवेदित्येतदर्थमाह वर्गचतुर्गुणिता
   नामित्यादि । रूपाणां व्यक्ताङ्कानां किंविशिष्टानां वर्गचतुर्गुणितानां
   चतुर्गुणिताव्यक्तवर्गगुणकगुणितानाम् । पुनः किं विशिष्टानां मध्यवर्गसहितानां ।
   मध्योऽव्यक्तस्तस्य गुणकश्चात्र मध्येन गृहीतस्तस्य गुणकस्य यो वर्गस्तेन
   सहितानां यन्मूलं तन्मध्येनाव्यक्तगुणकेनोनं वर्गद्विगुणोद्धतं द्विगुणाव्यक्तवर्ग
   गुणकेनोद्धतं तदा मध्योऽव्यक्तोऽथर्थादव्यक्तमानं स्यादिति ।
   अत्रोपपत्त्यर्थ मत्कृतभास्करबीजटिप्पण्यां ‘चतुराहतवर्गसमै रूपैः’–
   इत्यादि सूत्रोपपत्तिद्रष्टव्या ।। ४४ ॥
   वि. भा.-यस्मात् पक्षादव्यक्तो वर्गाव्यक्तोअव्यक्तवर्गश्च विशोध्य
   स्तदधस्तादितरपक्षाद्रपाणि विशोध्यानि । एवमेकपक्षेऽव्यक्तवगर्योऽव्यक्तश्च
   भवति । इतरपक्ष रूपाणि भवन्ति । तत्राव्यक्तमानज्ञानं कथं भवेत्तदर्थ कथ्यते
   रूपाणां (व्यक्ताङ्कानां) चतुर्गुणिताव्यक्तवर्गगुणकगुणितानां मध्यवर्गसहि
   तानां मध्योऽव्यक्तस्तस्य गुणकश्चात्र मध्येन गृहीतस्तस्य गुणकस्य यो वर्गस्तेन
   सहितानां यन्मूलं तन्मध्येनाव्यक्तगुणकेन हीनं वर्गद्विगुणभक्तं (द्विगुणाव्यक्त
   वर्गगुणकेन भक्तं ) तदा मध्योऽव्यक्तोऽथदव्यक्तमान भवेदिति ॥
                 स्ऱत्रोपपत्तिः।
 
      कल्प्यते य' . गु + य . गु=व्य पक्षौ गु भक्तौ तदा य' + य . गु
   *५ - पुनः पक्षयो - अस्य वर्गयोगेनावश्यमेवाव्यक्तपक्षो मूलदो भवति
    २
   “द्वयोर्द्धयोश्चाभिहर्ति द्विनिघ्नीम् '-इत्यादिना तेन य' + य. -गु -
   एतौ वर्गेण गुणितौ वर्गत्वं न त्यजतोऽतो
   वर्गेणचतुर्गुणेन गुणितौ जातौ ४ गु'. य'+४गु . गु. य+गु=गु'+४ गु: व्य एकवर्णसमीकरण बीजम्

१२०९ = ४ गु ( गु य'+गु य ) + गु = गु' + ४ गु व्य एतेनाचार्योक्त तथा चतुराहतवर्गे समै रूपैः पक्षद्वयं गुणयेत् । अव्यक्तवर्णरूपैर्युक्तौ पक्षौ ततो मूलमिति श्रीधराचार्योक्तसूत्रं चोपपद्यत इति ॥ ४४ ॥ । अब वर्गसमीकरण को कहते हैं । हि- भा.--जिस पक्ष में अव्यक्त और अव्यक्त वगं घटाते हैं उससे इतर पक्ष में रूप को घटाना चाहिये । इस तरह एक पक्ष में अव्यक्तवर्ग और अव्यक्त होता है, इतर पक्ष में रूप होते हैं, वहां अव्यक्त मान ज्ञान कैसे होता है उसके लिए कहते हैं । चतुर्गुणित अव्यक्त वर्ग के रूप से दोनों पक्ष को गुणा.हें। दोनों पक्षों में अव्यक्त वर्ग रूप को जोड़कर दोनों पक्ष का मूल लें। तब अन्योन्य पक्षानयन भागादि क्रिया करने पर श्रब्यक्त राशि मन आ जाता है । उपपत्ति । कल्पना करते हैं य.गु+य . गु=व्य दोनों पक्षों को गु भाग देने से य'+य. छ == पुनः दोनों पक्षों में शु इसका वर्ग जोड़ने से अवश्य ही अव्यक्त पक्ष मूलद होता है। २ श्रे ‘द्वयोर्दूयोश्चाभिहति द्विनिघ्नीं' इत्यादि से, अतः य'+य.गुं+- शु’ =ग्र'+४ गु . व्य इन दोनों को वर्गीक से गुणा करने से वर्गत्व नहीं हटता है इसलिए चतुर्गुणित गुणबर्ग से गुणा करने से ४ गृ. य'+४ गु गुय+गु'=भु'+४ गु. व्य=४ गु (गु. य' गु. य)+ऍ=Q* +४ गु . व्य, इससे आचार्योंक्त तथा ‘चतुराहतवर्गसमै रूपैः पक्षद्वयं गुणयेत्’ इत्यादि श्रीधरा चार्य सूत्र भी उपपन्न हुआ इति ।। ४४ ।। इदानीं प्रकारान्तरेण वर्गसमीकरणेऽव्यक्तमानमानयति वर्गाहतरूपाणामव्यक्तार्धकृतिसंयुतानां यत् । पदमव्यक्ताङ्गनं तद्वर्णविभक्तमव्यक्तः ।४५।। सु० भा०--वर्गेणाव्यक्तवर्गगुणकेन हतानां रूपाणां किंविशिष्टानामव्यक्तार्थ कृतिसंयुतानामव्यक्तगुणकाञ्चवर्गसहितानां यत् पदं तदव्यक्तगुणकाधनं तदव्यक्त- वर्गगुणकविभक्तमव्यक्तोऽव्यक्तमानं स्यादिति । अत्रोपपत्तिः । चतुभिरपवत्यै पूर्वसूत्रविचिना स्फुटा ।। ४५ ।।

१२१०              ब्राह्नस्फुटसिद्धान्ते
      वि-भा,-वर्गेरणव्यक्तवर्गगुरगकेन गुरिगतानां रुपारगां (व्यक्ताङ्कानां) अव्यक्तगुरगकार्धवर्गसंयुतानां  युन्मुलं   तदव्यक्तगुरगकार्धेन हिनं तदव्यक्तवर्गगुरगकविभक्त   तदाऽव्यक्तराशिमानं भवेदिति ॥
     
             श्रत्रोपपत्तिः ।
   पूर्वसूश्रोपपत्तौ ४ गु (गु.य^२+गु.य )+गु^२=गु^२+४ गु.व्य पक्षौ चतुर्भिरपवत्तितौ गु.(गु.य^२+गु.य)+गु/४=गु/४+गु.व्य=गु^१.य^२+गु.गु.य+गु/४=गु/४+गु.व्य पक्षयोमुल ग्रहरगेन गु.य+गु/२=√गु/२+गु.व्य पक्षयो गु/२ हीनौ तदा गु.य=√गु/२+गु.व्य-गु/२ पक्षौ गु भक्तौ तदा य=√गु/२+गु.व्य-गु/२/गु एतेनाचार्योक्तनमुपपन्नभ् ॥४५॥

श्रब प्रकारान्तर से वगं समीकररग में श्रव्यक्त मान लातें हैं ।

 हि.भा.-श्रव्यक्त वर्ग गुरगक से गुरिगत रुपमें श्रव्यक्त गुरगकार्ध 

वर्ग जोडकर जो मूल हो उसमें से श्रव्यक्त गुरगकार्ध को घटाकर श्रव्यक्त वर्ग गुरगक से भाग देने से राहि मान होता है इति ।

               उपपति ।
 पूवं सुत्रोपपति में ४ गु (गु.य^२+मु.य)+गु^२=गु^२+४ गु.व्य दोनों पक्षों
को श्र्वार से श्रपवर्त्तन देने से मु (गु.य^२+गु.य)+ गु^२/४=गु^२/४ +गु.व्य=मु^२.य^२ + गु.गु.य + गु/४=गु/४+गु. व्य दोनों पक्षों के मूल ग्रहरग करनेसे गु.य+गु/२=√गु/२+गु.व्य दोनों पक्षों में गृ/२ घटाने से गु.य=√गु/२+गु.व्य-गु/२ दोनों पक्षों । एकवर्गसमीकरण बीजम्

१२११ Aईई. + . व्य ° २ इससे आचार्योंक्त उपपन्न हुआ । ४५।। कौ ग से भाग देने से य== इदानीं प्रश्नमाह । सैकादंशकशेषाद् द्वादशभागश्चतुर् णोऽष्टयुतः । सैकांशशेषतुल्यो यदा तदाऽहर्गणं कथय ॥४६॥ सु. भा7. -अंशकशेषात् द्वादशभागः चतुर्गुणोऽष्टंयुतस्तदा सैके संकाद्यो स नांशशेषेण यदा तुल्यो भवति तदाहऍणं कथयेति । अत्रशशेषप्रमणं या १। तदा प्रश्नालापेन ४ (या+१). +८= या+१+८=या+२५ =या+१, अतश्छेदगामिनार १२ या+२५ = ३ या+३ . या=११ अस्मादंशशेषाव रव्यादीनामुद्दिष्टात् पूर्ववदहर्गणः स्यादिति ।। ४६ ।। वि. भा–एकेन सहितादंशकशेषाद्यो द्वादशांशः स चतुगुणोऽष्टयुतस्तदा सैकेनांशशेषेण यदा तुल्यो भवति तदाऽहर्गणं कथयेति ।। * अत्रोपपत्तिः । अत्रांशशेषप्रमाणं कल्प्यते=य तदा सूत्रोक्तालापेन ४ (य+१) ८ -+ १२ =य+१ -, +८+य+२५. य+१ छेदगमेन य+२५ = ३ य+३ समशोधनेन २ ष २२ =-२२ अतः य =ीर = ११ अस्मादंशशेषद्रव्यादीनामुद्दिष्टात् पूर्ववदहळूणोरे भवेदिति ॥४६॥ अब अन्य प्रर्बन को कहते हैं । हि. भा–एक समीहत अंश शोष के द्वादशांश को चार से गुणा कर आठ जोड़ने के यदि एक सहित अंश काष के बराबर होता है तबं अहर्ष प्रमाण को कहो इति ॥ उपपत्ति । यह कल्पना करते हैं अंश कोष प्रमाण=य, तब सूत्रोक्त आलोप से ४ (य+१ )

१२१२ ब्राह्मस्पुटसिद्धान्ते

    +प ={(य+१)/३}+प=[(य+२५)/३]=य+१ छेदगम से य +१५=३य+३ समशोधन से
     २ य= २२ स  य=२२/२=११ इस अंश शेष से पूर्ववत् अहर्गरा होता हॅ इति॥४६॥


                    इदानीमन्यं प्रश्नमाह ।
             द्वयूनमधिमासशेषं त्रिहुतं सप्ताधिकं द्विसङ्गुखितम्।
             श्वधिमासशेषतुल्यं यदा तदा युगगतं कथय  ॥४७॥
          सु.मा.‌-स्पष्टार्थम् ।अत्र प्र्श्नालापेन यदि अधिशेषमानं या १ ।  
          २{[(या‌-२)/३]+७}=(२या-४)/३+ १४=(२या +३८)/३ =या
          या=३८। भ्रस्मादधिमासशेषात् कुट्टकेन युगगतानयनं सुगममू ॥४७॥
       वि.भा.-भ्रधिमासशेषं द्विगुरिगतं तदाधिभासशेषतुल्यं भवति तदा युगगतं कथयेति ॥
                        भ्रत्रोपपत्तिः।
       अत्र कल्प्यते भ्र्धिशेषमानमू=य,तदा प्रश्नोक्त्या २{[(य-२)/३]+७}=(२य-४)/३+१४
   [(२य-४+४२)३]=[(२य+३८)/३]=भ्रस्मादधिमासशेषात् कुटटकयुक्त्या युगगतानयनं स्फुटमिति ॥४८॥
                     श्रब भ्रन्य प्रश्न को कहते हॅ ।
     हि.मा.-भ्रधिमास शेष में से दो घटाकर तीन से भाग देने से जो लब्ध हो उसमें सात जोडकर द्विगुरिगत करने से यदि भ्रषिमास्र शेष के 
       बराबरहोता हॅ तव युगगत को कहो इति ॥
                       उपपत्ति
       यहां कल्पना करते हॅ भ्रधिशेषमान = य, तव प्रश्नानुसार २{[(य-२)/३+७]} =   
       (२य -४)/३ + १४ = (२य-४+४१)/३= (२य + ३६)/३ एकवर्णसमीकरण बीजम्

१२१३ = अविशेष = य छेदगम से २ य4 ३८ = ३ य अतः य = ३८ इस अघिमास शेष से कुट्टक युक्ति से युगगतानयन स्फुट है इति ॥ ४७ ॥ इदानोमन्यप्रश्नमाह । व्येकमवमावशेषं षड द्धतं त्रियतमवमशेषस्य । पञ्चविभक्तस्य समं यदा तदा युगगतं कथय ॥ ४८ ॥ सु. भा. –स्पष्टार्थम् । अत्र प्रश्नालापेन यद्यवमावशेषं या १ । या-१+३३ः =या+१७= या_ छेदगमादिना =८५ । या अस्मात् क्षयशेषात् पूर्वप्रकारेण युगगतानयनं सुगममिति ॥ ४८ ॥ । वि. भा.-अवमशेषमेकेन हीनं षडभक्त ' त्रियुतं यदा पञ्चभक्तस्यावम- शेषस्य तुल्यं भवति तदा युगगतं कथयेति । अत्रोपपत्तिः अत्र कल्प्यते अवमशेषमानम् = य, तदा प्रश्नोक्तया यज१- + ३ य = १+ १८ = य + १७ = अवमलै = -- छंदग ५ मैन ५ य+८५ = ६ य अत: य = ८५ अस्मादवमशेषत् पूर्ववथुगगतानयनं स्फुटमिति ॥ ४८ ॥ अब अन्य प्रश्न को कहते हैं। हि. भा-अवशेष में से एक घटाकर छ: से भाग देने से जो लब्ध हो उसमें तीन बोड़ने से यदि पांच से विभक्त अवशेष के बराबर हो तब युगगत प्रमाण को कहो इति । उपपत्ति । यहाँ कल्पना करते हैं अवमशेषमान = य, तब प्रश्नानुसार - ५ -४ + ३ – य→ १ + १८ = य + १७ _ = + ३ = ==

=[सम्पाद्यताम्]

= = = = = =

==[सम्पाद्यताम्]

==[सम्पाद्यताम्]

छेदगम से ५ य + ८५८६ य अतः य = ८५ इस अवमशे’ से पूर्ववत् युगगतानयन स्फुट है इति ।। ४८ ॥ §. 977 — 3rT?faf<JS*r5raT^ WU^TFj; I 5PT CTBPT^ I ^ST^HI^ STcT: iTT-K= ±V /. VI =% 3T •¥prtaT^nTT?l^ =<i ^ 3T, 3 I Sm - ^pcfTC M^l^ I ii n ii ( v + ^ — i — ? ) 1° + ^ = ( t — ? ) ?o + ^ =?o IT — ?o + r = ?o it — <s = ^rw^r — ? =q"' + ^ — ? = 2r"+ $ = R< — % = W Wfr *f — - ± v ?Rr: zr = ^ ± v ^fTTcT J ^^TS5^S^"t WcT tfrstfrssf^T ?TfTcT5^ ?fcT II V |»

                    इदनीम्न्यप्रषन्माह् ।
         
           मन्दल्षोषद् द्नन्मलम् वय्क् दसाह्त् दियुत्म् ।
           मन्दल्षोष व्येक् भानोग्य्दिने क्दा भवति ॥ ॥
    
        सु.भा.-भनोमन्षोषद् भगरग्षोषत् । षोष् सम्प्रष्तम् । अत्र् प्रषनाल यदि बगन्षेस्प्र्मरगम् या +।
       (या‌-२)+२=२० या -८=या+२-१=या+१ पक्षान्त्रन्यनेन् या -२० या=९
                  वगस्मिकरनम्विधिना या-२० य=२५=९=१६
                  अत: या-५=+४      या = ९ वा १,
      
                  येव्मत्र बीज्युकित्त्तो द्विविध मान्मुत्प्प्ध्ते यावताव्तस्त्द्र्षोनोत्थाप्न्
               भगन्न्न्षोष्मन्त्म्=८३ वा, ३ । चतुवदाचाय्ग् प्रषमान्मव् ग्रहीतम् ।
                क्स्माद्ग्र्ग्न्षोसत् प्र्व्कहक्विधिना नेक्धा भवति स चाभीस्त्दवरे ग्राह्:
                ॥४९॥
                         
                        
        सत्र् कल्प्य्ते भ्ग्र्ग्षोष्प्रमर्ग्म् = य् + २ तदा प्रष्नोथ्या (य + २ - २ - ९)२० + २ = (य् - २)२० + २ =२० य-२० + २ = २० य-८=भगरगषो-२=य्+२-१=य+१ स्म्षोधनादिना य -२० य= -९ पम्यो:२५ योजनन य्-२० य्=२८=२५-९=२६ मूल् ग्रह्गेन् य्-५= + ४ ष्क्थ्म् य्=५ + ४ अथात् य्=९,य्=१आभ्या ८३,४ गहिथव्य् इति ॥
                          उप्प्त्ति।

         य्हा कल्पना करतै है बग्रङ् षोष् प्रमर्ग्=य् + २ तब् प्रसह्नुनसर् 
                           एकवणंसमीकरखबीजम्

(/य + २ - २ - १) १० + २ = ( य - १ ) १० + २ = १० य -१० + २ = १० य - ए = भगनाशे - १ = य + २ - १ = य + १ सम शोधनादि से य - १० य = -६ दोनों पक्षों में २५ जोडने से य - १० य + २५ = २५ - ६ = १६ मूलग्रहना से य - ५ = ± ४ भ्रातः य = ५ ± ४ ग्रर्यात् य = ६, य = १ इन दोनों से भगना शेष को उत्थापन देने से ३, ३ इस भगनाशेष से कुद्द्क युक्ति से धनेकघा भ्रहर्गना होता है बह ग्रभीष्ट दिन में ग्रहख करना चाहिये इति||४६||

                          इधानीमन्यप्रश्नमाह|
             श्रधिमासशेषपादात् न्यूनाद्वर्गो Sधिमासशेषसमः |
             श्रवमावसशेषतो वाsवमशेषसमः कदा भवति ||५०||
     सु. भा. --स्यष्टार्थम् | यध्यधिमासशेषस्य क्षयशेषस्य च प्रमानां या १ तदा प्रश्नालापेन |

(या/४ - ३)२ = (या - १२/४)२ = या-२४या+१४४/१३= या तत उक्तवत् या-४० या= -१४४,

      या- ४० या+४००=४००-१४४=२४६
      ∴ या - २०=± १६ ततः या = ३६ वा ४
  श्रत्र यदि रूपत्रयतोSधिशेषस्य क्षयशेषस्य वा पादः शोध्यते शेषश्च धनात्मकोSपेक्षितस्तदा द्वितीयं मानमेव ग्राह्यम् | ततोSधिशेषादवमावशेषाच्च कुद्दकविधिना क ल्पागतानयनं सुगमामिति ||५०||
      वि.भा. - श्रधिमासशेषचतुर्थाशात् त्रिहीनीत् वर्गोSधिशेष समः । वा श्रवमावशेषतोSवमशेषतुल्यः कदा भवतीति ॥
                               भ्रत्रोपपत्तिः।

कल्प्यते श्रधिमासशेषस्य मानम् = य, तदा प्रश्नोक्तचा ( या/४ -३) = श्नधिशेष = य = ( य - १२/ ४) = य - २४य + १४४/ १३= छेदगमेन य - २४य + १४४=१३ य समशोधनेन य - ४० य = -१४४ पक्षयोः ४०० योजनेन य - ४० य + ४०० = ४००-१४४= २४६ मूलग्रहनेन य - २०=

                           एकवणंसमीकरखबीजम्

(/य + २ - २ - १) १० + २ = ( य - १ ) १० + २ = १० य -१० + २ = १० य - ए = भगनाशे - १ = य + २ - १ = य + १ सम शोधनादि से य - १० य = -६ दोनों पक्षों में २५ जोडने से य - १० य + २५ = २५ - ६ = १६ मूलग्रहना से य - ५ = ± ४ भ्रातः य = ५ ± ४ ग्रर्यात् य = ६, य = १ इन दोनों से भगना शेष को उत्थापन देने से ३, ३ इस भगनाशेष से कुद्द्क युक्ति से धनेकघा भ्रहर्गना होता है बह ग्रभीष्ट दिन में ग्रहख करना चाहिये इति||४६||

                          इधानीमन्यप्रश्नमाह|
             श्रधिमासशेषपादात् न्यूनाद्वर्गो Sधिमासशेषसमः |
             श्रवमावसशेषतो वाsवमशेषसमः कदा भवति ||५०||
     सु. भा. --स्यष्टार्थम् | यध्यधिमासशेषस्य क्षयशेषस्य च प्रमानां या १ तदा प्रश्नालापेन |

(या/४ - ३)२ = (या - १२/४)२ = या-२४या+१४४/१३= या तत उक्तवत् या-४० या= -१४४,

      या- ४० या+४००=४००-१४४=२४६
      ∴ या - २०=± १६ ततः या = ३६ वा ४
  श्रत्र यदि रूपत्रयतोSधिशेषस्य क्षयशेषस्य वा पादः शोध्यते शेषश्च धनात्मकोSपेक्षितस्तदा द्वितीयं मानमेव ग्राह्यम् | ततोSधिशेषादवमावशेषाच्च कुद्दकविधिना क ल्पागतानयनं सुगमामिति ||५०||
      वि.भा. - श्रधिमासशेषचतुर्थाशात् त्रिहीनीत् वर्गोSधिशेष समः । वा श्रवमावशेषतोSवमशेषतुल्यः कदा भवतीति ॥
                          श्रत्रोपपत्तिः।

कल्प्यते श्रधिमासशेष्स्य मानम् = य, तदा प्रश्नोक्तया (य/४-३) = ग्रधिशेष = य = (य -१२/४) = य -२४य+१४४/१३= य छेदगमेन य-२४ य +१४४=१३ य समशोधनेन य -४० य = -१४४ पक्षयोह् ४०० योजनेन य - ४० य + ४०० = ४००-१४४=२४६ मूलग्रहनेन य - २० = ± १३ ∴ य = २० ± १३ भ्रथति य = १३, य = ४ १२१६ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते एवमेवावमावशेषतः क्रिया कार्या तदा ऽवमशेषज्ञानं भवेत् । अत्र यदि रूपत्रयतो ऽधिशेषस्यावमशेषस्य वा चतुर्थाशः शोध्यते शेषश्च धनात्मकोऽपेक्षितस्तद द्वितीयमानमेव ग्राह्यम् । ततोऽधिशेषादवमशेषाच्च कुट्टकेन कल्पगतानयनं स्फुटं मेवेति ।। ५० ।। इत्येकवर्णसमीकरणम् अब अन्य प्रश्न को कहते हैं । हि. भा.-अधिमास शेष चतुर्थांश में से तीन घटाकर वर्ग करते हैं वह अधिश ष के बराबर होता है वा अवमशेष चतुर्थांश में से तीन घटाकर वर्ग करते हैं वह अवमशेष के बराबर कब होता है इति । उपपत्ति । कल्पना करते हैं अधिमास शेष प्रमाण = य, तब प्रश्नानुसार =अचि =य=( य - १२ );= य-२४ य+*१४४ =य छेदगम से य. १६ २४ य+१४४== १६ य समशोधन से य' -–-४० य=~~ १४४ दोनों पक्षों में ४०० जोड़ने से य’–-४० य +४०० = = ४०० - १४४ मूलग्रहण से य – २०== अतः = १६ य = २० + १६ अर्थात् य = ३६, य = ४, इसी तरह अवसावशे ष ज्ञान होता है । यहां यदि तीन में से अविशेष के चतुर्थांश वा अवम शेष के चतुर्थांश को घटाते हैं तथा शेष धनात्मक अपेक्षित हो तब द्वितीय मान ही ग्रहण करना चाहिये। तब अविशष अवमशेष से कुट्टक युक्ति से कल्पगतानयन स्फुट ही । है इति ।। ५० ।। इति एक-वर्णा-समीकरण समाप्त हुआ । श्रनेकवर्णसमीकरणबीजम्

     इदानीमनेकवरर्गसमीकररगमाह ।
       
    श्राद्याव्दरर्गादन्यान् वरर्गान् प्रोह्याद्यमानमाद्यहृ तम् ।
    सहशच्छेदावसकृद्र् द्वौ व्यस्तौ कुद्दको बहुषु ॥५१॥
            
       सु.भाः -श्राद्याद्वरर्गाद्येsन्ये वर्णास्तानितरस्मात् पक्षात् प्रोह्य शेषमाद्येनाssद्यवर्णगुरगकेन हृतमाद्यमानमाद्योन्मितिः स्यात् । एकस्य वरर्गस्योन्मितीनां बहुत्वे द्वौ द्वौ पक्षौ        व्यस्तावन्योन्यहरगुरगनोद्भू तौ सदृशच्छेदौ कृत्वाsसकृत् तदन्यवरर्गोन्मिति: साध्या । एकपक्षस्य हरेरगापरपक्षीयौ लवहरौ सङ्गुण्य छेदगमं च विधाय 'श्राद्याद्वरर्गादन्यान्' इत्यादिना तदन्यवर्णमानेयम् । एवमसकृत् कर्म कार्यम् । श्रन्ते बहुषु वरर्गेष्वग्न्यातेषु कुदृको भवति । तत्र कुदृकोन्मितिः साध्येत्यर्थः । भास्करानेकवर्णसमीकररगमेतदनुरूपमेव ॥ ५१ ॥
     भ्राद्याद्वरर्गादन्ये ये वरर्गास्तनितरस्मात् पक्षात् प्रोह्य शेषमाघ-

चरर्गगुकेन भक्तमाद्यमानं भवति एकस्य वरर्गस्योन्मितीनो बहुत्वे द्वौ द्वौ पक्षो व्यस्तौ (परस्परहरगुरगनोदभूतौ) सदृशहरौ कृत्वाSसकृत् तदन्यवरर्गोन्मितिः साध्या । एकपक्षस्य हरेरगापरपक्षीयावंशहरो संगुण्य क्षेदगमं च कृत्वा 'श्राद्य- द्वरर्गदन्यान्'इत्यादिन तदन्यवरर्गमानेतव्यम्। एवमसकृत्कर्मकार्यम्। श्रेन्ते बहुषु द्वरर्गेष्वजातेषु कुदृको भवति। तत्र कुदृकेन मानं साध्यमिति॥ सिद्धान्तशेखरे' 'आद्यं वरर्ग प्रोह्य पक्षात्कुतोSपि त्यक्त्वा शेषानन्यतश्चाद्यभक्ते। प्राहुस्तज्ग्ग्न्यास्तामिती- राहुरेवं कार्यातुल्यच्छेदनाभिश्च भूयः॥ एकोन्माने कुदृकः स्यात् प्रमारगं तान्यान्यानि स्युः प्रतीपात्ततश्च । कुद्दाकारे भाज्यवर्णस्य मानं तस्मिन् लब्धं हारबरर्गस्य चाहुः" श्रीपत्युक्तमिदमनेकवरर्गसमीकररगमाचार्योनुक्तारूपमेवास्ति, बीजगणिते "आद्यं वरर्ग शोधयेदन्यपक्षादन्यान् रूपाण्यन्यतश्चाद्यभक्त । पक्षेsन्यस्मिन्नाद्य वरर्गोन्मितिः स्याद्वरर्गस्यैकस्योन्मितीनां बहुत्वे ॥ समीकृतच्छेदगमे तु ताभ्यस्तदन्यवरर्मोन्मितय: प्रसाध्याः । श्रन्त्योन्मितौ कुदृविघेर्गुरगाप्तो ते भाज्य तद् भाजक वरर्ग माने ॥ श्रन्येsपि भाज्ये यदि सन्ति वरर्गास्तन्मानमिष्टं परिकल्प्य साध्ये । विलोमकोत्थापनतोsन्यवरर्गमानानि भिन्नं यदि मानमेवम् "भूयः कार्यः कुदृकोsत्रान्त्यवरर्ग तेनोत्थाप्योत्थापयेद् व्यस्तमाद्यान् ॥" श्रनेन भास्कराचार्येरगाचार्योक्त श्री पत्युक्त वा स्पष्टीकृत्योक्त व्याख्यातं चेति ॥ ५१ ॥ १२१८ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते

         श्रब  श्रनेक वरर्ग समीकरग को कहते हैं ।

    हि. भा.-प्रथम वरर्ग से श्रन्य जो वरर्ग है उनको इतर (दूसरे) पक्ष में से घटा कर शेष को प्रथम वरर्ग

गुरगक से भाग देने से प्रथम वरर्ग का भाना होता है । एक वरर्ग के श्रनेक माग रहने से दो दो पक्षों के समान हर कर के श्रसकृत् (बार बार) श्रन्व वरर्ग का मान साघन करना चाहिए । एक पक्ष के हर से दुसरे पक्ष के श्रंश श्रौर हर को गुरगा कर श्रौर छेदगम कर के 'श्राद्याद्वरर्गादन्यान्' इत्यादि श्राचार्योक्ति से श्रन्य वरर्ग का मान लाना चाहिये । एव श्रसकृत् कर्म करना चाहिये । श्रन्त में बहुत वरर्गो के श्रग्न्यात रहने से कुदृक होता है श्रर्थात् वहां हुद्दक से मान साधान किया जाता है ॥ सिद्धान्त शेखर में "श्राद्यं वरर्ग प्रोह्य पक्षात्कुतोsपि इत्यादि विग्न्यान भाष्य में लिखित श्रीपतिप्रकार श्राचार्योक्त प्रकार के श्रनुरूप ही है । तथा बीजगरिगत में "श्राद्यं वरर्ग शोधयेदन्यपक्षादन्यान् रूपाण्यन्यतश्चाद्यभक्त" इत्यादि विग्न्यान भाष्य में लिखित पद्यों से भास्कराचार्य ने श्राचार्योक्त प्रकार को वा श्रीपत्युक्त प्रकार को स्पष्टीकररगपूर्व क कहा हैं श्रौर व्याख्या की हैं इति ॥

  इदानीं प्रश्नानाह ।
                            
   गतभगरगयुताद् द्युगखात् तच्छेषयुतात् तदैक्यसंयुक्तात् ।
    तद्योगाद्र द्यु गरगं वा यः कथयति कुद्दकग्न्यः  सः ॥ ५२ ॥
         
    सु.भा.‌-श्रहर्गरगादिष्टग्रहस्य गतभगरगयुताद्योsहर्गरगं कथयति । वाsहर्गणात् तस्य गतभगरगस्य शेषयुताद्योsहर्गणं कथयति । वाsहर्गरगात् तयोर्गतभगरगभगरगशेषयोर्यदैक्यं तेन संयुक्ताद्योsहर्गणं कथयति । वा तयोर्गतभगरगभगरगशेषयोर्योगाद्योsहर्गरगं कथयति स एव कुद्दकग्न्य: ।
    प्रथमप्रश्नसsहर्गरगमानं या १ । भगरगशेषमानं का १
           
   ततो sनुपातेन गतभगरगाः = ग्रभ. या‌-का / ककु      
         
   गभ+या= या (ग्रभ+ककु)-का / ककु = यो ।
        
   ततः का= या (ग्रभ+ककु)-ककु. यो / १
   कुद्दकेन यावत्तावन्मानं सुगमम् ।
   द्वितीय प्रश्नेsहर्गरगः = या १ । गतभगरगाः = का ।
   भगरगशेषस् = ग्रभ‌+या-ककु. का
   भशे+या=या (ग्रभ+१)-ककु.का=यो
   का = या (ग्रभ+१)-यो / ककु । श्रतः  कुद्दकेन यावत्तावन्मानं सुगमम् । 
                श्नेकवरर्ह्गसमीकरगबीजम्
तृतीय प्रशने Sहगंरग:= या १| गतभगरगा:=का| ततो गतभगरगशेषम् = प्रभ.या‌--ककु.का

भ्रत: भशे + या + ग्रभ = या( ग्रभ +१)-का(ककु-१)= यो


अत: का=[या(ग्रभ + १)-यो]/ ककु--१ । कुहकेन याक्तावन्मानम् सुगमम् ।

चतुर्थ् प्रशनेSह्गर्रग:= या। गतभगए॥:=का। भगरगशेषभ्र्=ग्रभ.या-ककु.का अत: गभ+भशे=ग्रभ. या-ककु. का + का= ग्रभ. या--का (ककु--१) = यो। अत: का= ग्रभ.या-यो/ ककु-१| कुहकेन यावत्तावन्मानम् सुगमम||५२||


वि.भा.- द्युगरगात् (भ्र्हर्गरगात्) इष्टग्रहस्य गतभगरगयुताद्योश्हर्गनण्ं कथयति। वा योSहर्गरात् गतभगरगस्य शेषयुतादहर्गणं कथयति। वा योSहगं रात् भतभगरग भगरशषयोर्यदेक्यं तेन संयुक्तादहग रगं कथयति । वा यो गतभगरा भगरगशेषयोयोगाद हग रग कथयति स कुहकन्य इति॥

                 श्नत्रोपपत्ति:।
प्रथमप्रशने कल्प्यते भ्रहर्गरग:= य। भगरगशेषमानभ्= क ततोSनुपातेन ग्रभ*य/ककु=गभरया+भगराशे/ककु भ्रत: ग्रभ*य/ककु-भगराशे/ककु=ग्रभ*य-क/ककु=गतभगरग 
         

पक्षयो: य थोजनेन गतभ+य= ग्रभ*य-क /ककु + य=ग्रभ*य+ककु*य-क/ककु =य(ग्रभ+ककु)-क/ककु=यो,

छेदगमेन य (ग्रभ+ककु)-क=यो*ककु समशोघनेन य(ग्रभ+ककु)-यो*ककु=क भत्र कुट्ट्केन य मानं सुखेन भ्यक्तं भवेदिती॥

  .द्वितीयप्रशने कम्प्यते भ्रहर्गरगा:=य। गतभगरा:= क तदा ग्रभ*य/ककु= गतभ+  भगराशे/ककु 
                                               
 अत: ग्रभ*य= ककु*गतभ+भगराशे समशोघनेन

ग्रभ*य-ककु*गतभ=भगराशे=ग्रभ*य-ककु*क पक्षयो: य योजनेन भगराशे + य=यो=ग्रभ*य+य-ककु*क=(ग्रभ+१)-ककु*क पुमशोघनादिना य (ग्रभ+१)-यो/ककु = क भ्रत्र

                                                              कुद्ट्केभ य मानं ट्यक्तं भवेदिती॥ १२२०

ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते तृतीयप्रश्ने कल्प्यते अहर्गणः=य, गतभगणः=के, ततः शुक्ल .=गतभ +भtश अतः प्रभxय=ककृxगतभ+भगणशे समशोधनेन प्रभxय–कक xगतभ=भगणो =ग्रभxय–ककुxक पक्षयोः य योजनेन भगणश+य=यो =प्रभxय+य-ककुxक=य (ग्रभ+१)ककुxक समयोजनेन य (प्रभ+१) =यो+ककुxक समशोधनेन य (प्रभ+१)–यो =ककुक पक्षौ ककुभक्तौ । य (अभ+१) व्यायो =क अत्र कुट्टकेन य मान व्यक्त भवेदिति । । तदा चतुर्थाप्रश्ने कल्प्यते अहर्गणः=य। गत भगणः=क तदा पूर्ववद्भगणशेष =प्रभxय- ककु कैक पक्षयोः गतभगणयोजनेन भगणो+गतभ=ग्रभxय कॐ ॐक+क=ग्रभ xय–क (क--१)=यो समयोजनेन ग्रभ xय= यो+क (ककु-१) समशोधनेन ग्रभxययो=क (ककु–१) पक्ष ककु–१ भक्तौ सदा ग्रभx ययो ध्या=कुट्टकेन क अत्र य मानं सखेन व्यक्त भवेदिति ॥५२॥ ककु–१ अब प्रश्नों को कहते हैं । हि- भा.—जो व्यक्ति इष्ट ग्रह के गत अगदा युत अहर्गाण से अहर्गण को कहता है । वा गतभगण के शेष युत अहमीण से अहर्गण को जो कहता है, वा गतभगण और भगण शेष के ऐक्य से युत अहमीण से अहर्गण को जो कहता है । वा गत भगण और भगण शेष के योग से अहर्गण को जो कहता है वह छुट्टक का पण्डित है । उपपत्ति । के प्रथम प्रश्न में कल्पना करते हैं अहर्गणमान=य । भगणशेषमान==क, तब ग्रभ. य ग्रभ. य _भगणशे_ग्रमक. य-- क अनुपात से ---- =गतभ+भगणशे समशोधन से ककु ककु = गत भगण, दोनों पक्षों में य जोड़ने से गतभ + य = प्रभ- य-+ य प्रभ.यकळे. य +–र – य (प्रभ+)==पो वेदगम करने से य (प्रम + ह्) -क= कछ. यो, समशोधन से य (ग्रभ+कळे)-कनु. य=क, यहाँ छुट्टक से य मान सुगमता से विदित हो जायगा । द्वितीयप्रश्न में कल्पना करते हैं अहर्गणयगतभगण=क, तब अभ. य =गतभ E = = = = श्रनेकवर्ग्गसमीकरग्गबीजम् १२२१

+भगगशे/ककु ष्रतः ग्रभ.य=ककु. गतभ+भमशोधन से ग्रभ. य-ककु. गतभ=भगग्गशे=ग्रभ. य-ककु. क दोनों पक्षों में य जोङने से भगग्गशे+य=यो ग्रभ. य+ककु. क=य(ग्रभ+१)-ककु। क समशोषनादि से य(ग्रभ+१)-यो/ककु=क यहां कुट्टक से य मान ब्यक्त हो जायगा।

तृतीय प्रश्न में कल्पना करते है। गत भगगा=क, तब , य/ककु=गतभ+भशे/ककु श्रतः ग्रभ य = ककु गतभ+भगशे समशोधन से ग्रभ य-ककु गतभ = भगग्गशे दोनों पक्षों में य जोडने से ग्रभ य +य-ककु गभ=भगग्गशे +य=यो=य(ग्रभ+१)=यो+ककु क समशोधन से य (ग्रभ+१)-यो=ककु क श्रतः व(ग्रभ+१)-यो/ककु=क यहां क्रुट्टक से य मान व्यक्त हो जायगः इति।

चतुथ प्रश्न में कल्पना करते हैं श्रहगग्ग=य, गत भगग्ग=क तब पूर्ववत भगग्गशेष=ग्रभ य-ककु क दोनों पक्षों में गत भगग्ग जोडने से भगग्गहे+गतभ=ग्रब्ग य-ककु क+क=ग्रभ य-क (ककु-१)=यो समयोजन से ग्रभ य=यो+क(ककु-१) समशोधन से ग्रभ य-यो=क (ककु-१) दोनों पक्षों को ककु-१ भग देने से ग्रभ य-यो/ककु-१=क यहां क्रुट्टक से य मान सुगमता से ही श्राजायगा॥५२॥

इदानीमन्यन् प्रश्नानाह।

गतभगग्गनाढू ध्युगग्गात तच्छेषोनात् तदैक्पहीनाद्दा।

तदिवराढू ध्युगग्गं वा यः कथयति कट्टकज्नः सः॥५३॥

सु भा-श्रनन्तरप्रश्नेषु योगस्थाने वेयोगः कृत इति स्पष्टार्थम्। उत्तराय च पूर्वश्नोत्तरे योगस्थाने वियोगंक्रुत्वा कर्म कर्त्तव्यमिति ॥५३॥

अन्य प्रश्नों को कहते हैं।

हि भा- पूर्व प्रश्नोत्तर में योय स्थान में वियोग(श्रन्तर) करके किया करनी चाहियेऽ॥५३॥ १२२२ इदानीमन्यान् प्रश्नानाह । राश्याद्यस्तच्छेषैश्चैवं भुक्ताधिमासदिनहीनैः तच्छेषैश्च युगगतं यः कथयति कुट्टकज्ञः सः ॥५४॥ सु. भा.-एवं राश्याचैस्तच्छेषैश्च युताद्धीनाद्वा ऽहर्गणात् । गतराश्यादि तच्छेषयोगान्तराद्धा । भुक्ताधिमासक्षयाहैश्च युतोनितादहर्गणात् तच्छेषयुतो नितादहर्गणाञ्च वा गताधिमासाधिशेषयोगान्तराद्वा गतक्षयाहतच्छेषयोगान्तराद्वा यो युगगतं कथयति स एव कुट्टकज्ञः । अत्र यदि गतराशिदिनगणयोग उद्दिष्टस्तदाऽहर्गणः =या । गतभगणाः = का । भगणशेषम्=ग्रभ. या-ककु. का। इदं द्वादशगुणं राशिशेषमानं नीलकम पास्य कल्पकुदिनहृतं गतराशय = १२ ग्रभ. या-१२ ककु. का-नी .. गरा + अह = या (१२ ग्रभ+-ककु)-१२ ककु. का—नी = यो या=१२ ककु, का+नी-यो. ककु + । ‘अन्येपि भाज्ये यदि सन्ति वणस्तन्मानमिष्ट परिकल्प्य साध्ये' इत्यादि भास्करविधिना कुट्टकेन यावत्ता वन्मानं सुगमम् । एवमालापानुसारेण समौ पक्षौ विधाय कट्टकादिना ऽव्यक्तमान मन्येषु प्रश्नेष्वप्यानेयमिति ॥ ५४ ॥ । वि. भा.-राश्याचैस्तच्छेषैश्च युतोनादहर्गणात् । भुक्ताधिमासावमैश्च युतोनितादहर्गणात् । तच्छेषयुतोनितादहर्गणाच्च, वा गताधिमासाधिशेषयोगा न्तराद्वा गतावमतच्छेषयोगान्तराद्वा युगगतं यः कथयति स कुट्टकज्ञोऽस्तीति । अत्र यदि गतराश्यहर्गणयोग उद्दिष्टस्तदा कल्प्यते अहर्गणः=य, गत भगणः = क तदा ग्रभ. य=ककु. गभ+-भशे समशोधनेन ग्रभ . य-ककु . गतभ=भशे=ग्रभ . य-ककू . क । इदं द्वादश गुणितं राशिशेषमानं (न) त्यक्तवा कल्पकुदिनभक्त तदा गतराशयः । .. . .. १२ प्रभ. य- १२ ककु. क्र- न पक्षयोः य योजनेन -- य कक श्रनेककरर्रासमीकरएवीजम्

= य (१२ य्रभ + ककु )- १२ ककु क-न /ककु = यो चेदगमेन य (१२ प्रभ +ककु ) - १२ ककु क-न +ककु यो समयोजनेन य (१२ प्रभ +ककु ) +१२ककु क +न+यो ककु पक्षौ १२ प्रभ +ककु भक्तौ तदा १२ ककु क +न +यो ककु /१२ प्रभ + ककु =य श्रेन्येपि भग्ये यदि सन्ति वर्नास्तन्मानमिसष्टमित्यादि भस्करोक्त्या य मानं कुट्टकेन सुसेन विदितं भवेदिति ॥ एवमालापानुसारेए पक्षद्वयं समानं वैधाय कुट्ट्कादिनान्येषु प्रश्नेष्वपि व्यक्तमानमानेतव्यमिति ॥

        भ्रबं भन्य प्रश्नों को कहते हैं ।
हि बा राश्यादि से शौर उसके शेष से , यतहीन श्रहर्गरए से , भुक्तादिमास भ्रोर बवम से युत भौर हीन ब्रहगंए से , उसके शेष से, युत भ्रौर हीनरहर्गए से भी वा गताधिमास भ्रौर श्रशेष के योग-श्रन्तर से वा गतवम श्रवम शेष के योग-श्रतर से युगगत को जो कहता है वह कुट्टक पन्डित इति ॥
                     उपपत्ति ।

यहो यदि गतराशि और श्रहर्गये का योग उद्दिष्ट है तो कल्पन करते है भ्रहर्गए = य गतभगए = क तब ( प्रभ * य /ककु न) = गतभ + भशे / ककु छेदगम से गभ य=कुक । गभ+भशे समघोषन से प्रभ*य-कुक *गतभ*भसे। ग्रभ य कुक क इसको वारह से गुए कर राशि शेषमान को घटकर कल्पकुदिनम् से भग देने से गत राशि प्रमाए होता है । १२ प्रभ*य-१२ ककु * क-न / ककु =गत राशि । यहौ राशी से = न दोनों पक्षो में य जोद्ने से १२ प्रभ*य -१२ ककु*क-न/ककु+ य = गत राशि +य = यो =१२ प्रभ*य+ककु*य-१२ककु*क-न/ककु =य (१२ प्रभ + ककु ) - १२ ककु*क-न/ककु =यो * छेदगम से य (१२ प्रभ + ककु ) *क-न = ककु* यो समयोजन से य ( १२ प्रभ + ककु ) =१२ ककु*क+न+यो *कुक । १२ ककु*क+न+यो*ककु /१२प्रभ+ककु = य ' धन्वेएपि भाज्ये यदि सन्ति वर्णा इत्यादि भास्करोक्ति से कुट्टक योक्ति से य मान सुगमता हि से विदित होगा । एवं श्रालापानुसार दोनों पक्षों को समान कर कुट्टकादि से श्रन्य प्रश्नों में भि व्यक्तमान लाना चाहिये

                                                                 ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते
                                                             इदानीमन्यप्रश्नद्वयमाह ।
                                                  अंशकशेषेणयुतात् लिप्ताशेषात्तदन्तरादथवा ।
                                                  भानोर्जेदिने द्युगरणं कथयति कुट्टकज्ञः सः ॥५॥

सु. भा-भानोर्लिप्ता शेषादंशकशेषयुताद्वा योलिप्तांशशेषयोरन्तराद्यो बुधवारे ऽहर्गणं कथयति स एव कुट्टकज्ञः । कल्प्यते ऽहर्गणः=या । रविभगण भागाः=च भा.रभ=अ । गतभागाः=का । ततोंऽशशेषम्=आ. या-ककु. का । इदं षष्टिगुणं कल्पकृदिनहृतं लब्धं नीलकमानं नी १ । तद्गुणितं हरं भाज्यादपास्य जातं कलाशेषम्=६० अ. य -६० ककु . का-ककु . नी। अतः भाशे+-कशे=६० अ.या-६० ककु.का-ककु. नी+अ.या—ककु.का =या (६० अ + अ ) – ककु (६१ का+नी ) == यो ततः ६१ का + नी – या (६१ श्र)-यो । कुट्टकेन यावत्तावन्मानं सुगमम् । यदि योगमानम्=५३६ । कल्पकुदिनानि=१०९६ । रविभगणाः =३ । । तदा अ= चक्रभा • रभ= ३६० X ३=१०८० ॥ ६१ अ=६५८० । ततः पूर्वसमीकरणरूपम् । ६१ का +-नी-.६५८० या-५३६-१६४७० या-१३४-८२३५ या-६७ १०९६ २७४ १३७ १५ या-६७ ६० य-- १३७ रूपविशुद्धौ गुणः=६४ । अभीष्ट ६७ विशुद्धौ गुण:=४१ यावत्तावन्मानं सुखेन भवति । चतुर्वेदाचार्यमतं यच्च कोलकेनानुवादितं महागौरवमप्रयोजकं च । एवमन्तरतोऽपि कर्म कर्तव्यम् ॥ ५५ ।। वि. मा-भानोः (सूर्यस्य) लिप्ता (कला) शेषात् अशकशेषेण युतात् वा कलांश शेषयोरन्तराद्बुधवारे योऽहर्गणं कथयति सः कुट्टकपण्डितोऽस्तीति । अत्रोपपत्ति: । क कल्प्यते अहर्गणप्रमाणम्=य । रविभगणांशाः=चभा . रविभ=र, गतभगरगा:= क तदा रविभगराश * य/ ककु = गतभगए + छेदगमेन अनेकवर्गसमीकरणबीजम् १२२४ रविभगणांश xय=xय= ककु . गतभगण+अ शशे = ककु : क + अ शशे समशोधनेन अ शशे=र xय–कछु . क इदं षष्टिगुणितं कल्पदिनभक्त तदा ६० (र. य-कसु. )—न खेदगमेन ६० . य-६० ककु, क= कर्. न एत प्रथमपके विशोध्य जातं कलाशेषस्=६० र.य-६० ककुक-ककु, न, अतः अंशो + कलाशे =६० र. य–६० ककु . कककु . न+र यककु . क=य (६० र+र)-ककु (६१ क+न)=यो समयोजनेन यx६१ र=यो+ककु (६१ क+न) समशोधनेन य. ६१ र यो यx६१ र – योकैककु (६१ क+न) पक्षौ ककुभक्तौ तदा = ६१ क+न अत्र कुट्टक युक्त्या य मानं सुगमतया विदितं भवेत् । एवमन्तरतोऽपि कर्म कर्तव्यमिति ॥५५॥ अब अन्य दो प्रश्नों को कहते हैं । हि. भा.-सूर्य के कलाशेष में अंश शेष जोड़ने से जो होता है उससे वा कलाशेष और अ' शोष के अन्तर से बुधदिन में शो अङ्गंण को कहता है वह कूट्टक का पण्डित है इति । उपपत्ति । कल्पना करते हैं अहर्गण प्रमाण=य। रविभगणांश=चभा+विभ ==र, गतभगण रविभगणांश. थ=रं• य =गतभगण+अशशे==क+अशरा छेदगम से == कं तब र. य=कृ. क+अ शशी समशोधन करने से र. य-कु. क=अ शशे, इसको साठ से गुणा कर कल्पकुदिन देने से र. =-न, वेदगम से ६० (र. य–कृ. क) से भाग यकझ) ६० (. क

६०४र . य–६० ककु . क=ककु . न इसको प्रथम प्रक्ष में से घटाने ' से कलाशे[सम्पाद्यताम्]

६०४रय–६० ककु • क–कंकु • न, अतः अ शो+कलाच ==यो== ६०४र य-६० ककु . क-ककु. न+र. य-वङ. क८य (६० र+२)- ककु (६१ क+न)=यो=य. ६१ –कछु (११ क+) दोनों पक्षों में की (६१ क+न) जोड़ने से य. ६१= द्+कंकु (६१ क+न) समशोधन से य. ६१रयोकचु (६१ क+न) दोनों पक्षों को ककु से भाग देने से . ६१ क+-, पहाँ कुट्टक से य मान सुगमता ही से विदित हो य६१ र-थ्यो जायगा इति ॥५५॥ इदानीमन्या प्रश्नानाह । अंशकशेषं त्रियुतं लिप्ताशेषं कवा रवेलैंदिने । षट्सप्ताष्टौ नव वा । कुर्वन्नावत्सराश्च गणकः ।५६। १२२६ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते सु० भा०-रवेरंशकशेषं त्रियुतं कदा बुधदिने लिप्ताशेषं भवति । वांशकशेषं षड्भिः सप्तभिरष्टभिर्वा नवभिर्युतं कदा बुधदिने लिप्ताशेषं भवति । अस्योत्तरमा वत्सरादेकवर्षाभ्यन्तरे कुर्वन्नपि गणक इत्युच्यते ऽस्माभिरिति । अनन्तरप्रश्नोत्तया कलाशेषम्=६० अया-६० ककु. का—ककु . नी ततः प्रश्नालापेनः अ. या-ककु. का-+३=६० अ. या-६० ककु. का-ककु. नी समशोधनेन ५९ ककु. का-+-ककु. नी=५९. प्र. या-३ । अतः कुट्टकन यावत्तावन्मान सुग मम् । एव रूपत्रयस्थान षट्, सप्ताद्याः स्थाप्याः । अत्रापि चतुर्वेदगौरवं न बुद्धिमद्भिरादृतम् ।। ५६ ।। ५९ का+-नी-५९ अ. या-३ वि. भा.-रवेरंशकशेषं त्रियुतं बुधदिने कदा कलाशेषं भवति । वा षड्भिः सप्तभिरष्टभिर्नवभिर्वा- अशकशेषयुतं कदा बुधदिने कलाशेषं भवति, एतदुत्तरं बर्षाभ्यन्तरे कुर्वन्नपि गणकः कथ्यते इति । कल्प्यते अहर्गणप्रमाणम् =य । रविभगणांशाः =र । गतभगणाः = क र. या तदाऽनुपातेन - छेदगमेन र . य = गतभ . ककु ककु + अंशशे = क . ककु+-अंशे समाशोधन अंशशे = र. य – क . ककु इदं ६० (र. य-क. ककु) । षष्टिगुणितं कल्पकुदिनभक्त लब्धं न मानम् ६० र • य-६० क • ककु=ककु • न एत द्यदि प्रथमपक्षे शोध्यते तदा कलाशेषम् = ६० र. य-६० क. ककु -ककु. न ततः प्रश्नोक्तया अंशशे-+३ = कलाशे = ६०र. य -६० क . ककु - ककु. न ==र. य-क. ककु+३ पक्षयोः क. ककु योजनेन ६०र. य—६०क. ककु+-क. ककु ककु . न=र. य + ३, ६०र . य – (५९ क . ककु + ककु . न ) पक्षौ ५९ क . ककु+ककु . न योजनेन ६०र . य=र. य + ३+५९क. ककु+ककु. न पक्षौ र. य + ३ हीनौ तंदा ६०र x य - र. य – ३ = ५९र. य - ३ ५९र. य

५९ क. ककु + ककु. न पक्षौ ककुभक्तौ तदा - - ३[सम्पाद्यताम्]

-५९क-+-न अनेकवर्णसमीकरणबीजम् १२२७ अत्र कुट्टकेन य मानं सुखेन विदितं भवेत् । एवं रूपत्रयस्थाने षट् सप्तादीन् संस्थाप्योपयुक्तक्रिययाऽभीष्टसिद्धिरिति .॥ ५६ ॥ अब अन्य प्रश्नों को कहते हैं। हेि. भा.-रवि के अंश शेष में तीन जोड़ने से बुध दिन में कब कला शोष होता है। वा अंशशेष में छः सात आठ नौ जोड़ने से कब बुध दिन में कला शष होता है इसके उत्तर को एक वर्षाभ्यन्तर में करते हुए व्यक्ति गणक कहलाते हैं। उपप्पत्ति। कल्पना करते हैं अहर्गणप्रमाण=य । रविभगणांश= र । गतभगण=क तब अनुपात से र,य/ककु= गतभ + श्र्ंशशो छेदगम से र. य = ककु. गतभ + अंशशे = ककु . क-+अंशशे समशोधन से र. य-क. कक् = अंशशे इसको साठ से गुणाकर कल्प कुदिन से भाग देने से लब्धि = न =६०(र/ य- क. ककु)/ककु= (६०र. य -६० कृ . कक)/ककु छेदगम से ६० र. य–६० क. ककू ==ककु . न, अतः कलाशे=६०र. य-६० क . ककु ककु. न प्रश्नोक्ति से अंशशे +३ =कलाशे =६० र. य –६० क. ककु-ककुन = र. य - क. कक + ३ दोनों पक्षों में क. कक् जोड़ने से ६०र. य - ६०क. ककु + क . ककु-ककु . न=र . य + ३=६० र . य - (५६ क . ककु+-ककु • न ) दोनों पक्षों में ५६ क . ककु-+-ककु . न जोड़ने से ६० र • य=र. य+३५९ क. ककु +ककु . न दोनों पक्षों में र. य +३ हीन करने से ६० र. थ-र. य-३=५६र.य-३=५६ ककु. क+-ककु. न दोनों पक्षों को ककु से भाग देने से (५६ र,य)/ ककु= ५६क + न यहां कुट्टक से सुगमता से य मान विदित हो जायगा । एवं तीन के स्थान में छः सात-आठ नौ को रखकर उपर्युक्त क्रिया से अभीष्ट सिद्धि होती है इति ॥ ५६ ॥ इदानीं प्रश्नद्वयमाह । अज्ञासममंशशेषं कलासमं वा कलाशेषम् । दिवसकरस्येष्टदिने कुर्वन्नावत्सराद् गणकः ॥५७॥ सु. भा.-कस्मिन्निष्टदिने दिवसकरस्य रवेरंशमानसममंशशेषं वा कृलासम कलाशेषं भवति । अस्योत्तरमावत्सरात् कुर्वन्नपि गरणकः । अहर्गणः=या १ । गतभगणाः=का १ । तदा भगणशेषम्=ग्रभ . या-ककु . का । इदं द्वादशगुण कल्पकदिनैर्विभज्य १२२८ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते लव्धं राशिमानं नी १ । तद्गुणहर भाज्यादपास्य जात राशिशेषम्=१२ ग्रभ. या-१२ ककु. का—ककु. नी । इदं त्रिंशद्गुणं कल्पकुदिनैर्विभज्य लब्धमंशमानम् पा १ । तद्गुणहर भाज्यादपास्य जातमशशषम्=३६० ग्रभ. या-३६० ककु का-३० कक. नी-कक. पी =पी

       ततः या= ३६०ककु. का-+-ककु. नी+पी (ककु+१)
              -------------------------------
                          ३६०
  अत्र भाज्ये वर्णत्रयमतो वर्णद्वयस्येष्टमाने प्रकल्प्य कुट्टकेन यावत्तावन्मानं ज्ञेयम् । एवमंशशेषं षष्टया संगुण्य कल्पकुदिनैर्विभज्य लब्धं कलामानं लोहितक प्रकल्प्य तद्गुणहरं भाज्यादपास्य कलाशेषतः समीकरणं कृत्वा तत्र भाज्ये वर्णत्रयमानानीष्टानि प्रकल्प्य यावत्तावन्मानं ज्ञेयम् ।। ५७ ।।

वि. भा.-दिवसकरस्य (सूर्यस्य) प्रशसममंशशेषं वा कलासमं कलाशेषं कस्मिन्निष्टदिने भवति, एतदुत्तरमावत्सराद्वर्षाभ्यन्ते कुर्वन्नपि गणक उच्यते इति ।

                        अत्रोपपत्तिः ।

कल्प्यते अहर्गणमानम् =य । गतभगणाः=क तदा पूर्ववद् भगणशेषम् =ग्रभ . थ-ककु . क इदं द्वादशगुणं कल्पकुदिनैर्भक्त लब्धं==न तद्गुणं हरं भाज्यादपास्य जात राशिशेषम्=१२ ग्रभ. य-१२ ककु. क—ककु. न इदं त्रिंशद्गुणितं कल्पकुदिनैर्भक्त लब्धमंशमानम्=प तदुगुणं हरं भाज्यादपास्यांश शषम् =३६० ग्रभ. य-३६० ककु . क-३० ककु . न-ककु . प=प ततः समयोजनेन ३६० ककु . क + ३० ककु . न + प ( ककु + १)=३६० ग्रभ. य भ्रात:

३६० क. ककु+३० ककु. न+प (ककु+१

= य
          ३६० ग्रभ
 अत्र भाज्ये वर्णत्रयमस्ति वर्ण ३६० ग्रभ द्वयस्येष्टमाने प्रकल्प्य कुट्टकेन य मानं सुखेन विदितं भवेत् । एवमंशशेषं षष्ट्या सगुण्य कल्पकुदिनैर्भक्त लब्धं कलामानं ल प्रकल्प्य तद्गुणं हरं भाज्याद्विशोध्य

कलाशेषात् समीकरणं कृत्वा तत्र भाज्ये वर्णत्रयमानानीष्टानि प्रकल्प्य य मानं ज्ञातव्यमिति ॥५७॥

                अब अन्य दो प्रश्नों को कहते हैं ।

वि. भा.- किसी इंष्ट दिन में रवि का प्रशमान अशशेष के बराबर होता है वा कलातुल्य कलाशेष होता है इसका उत्तर वर्ष पर्यन्त. कंरते हुए व्यक्ति गणक कहलाते हैं इति ॥५७॥

                             उपपत्ति ।

कल्पना करते हैं अहर्गण 'प्रमाण=य, गत भगण=क, तब पूर्ववत् भगणशे= अनेकवर्णसमीकरणबीजम् ग्रभ. य-ककु. क इसको बारह से गुणा कर कल्पकुदिन से भाग देने से लब्धि=न तदूगुणित हर को भाज्य में से घटाने से राशिशेष = १२ ग्रभ. य-१२ ककु . क-ककु. न इसको तीस से गुणाकर कल्पकुदिन से भाग देने से लब्धि=प, तदूगुणित हर को भाज्य में से घटाने से अशशेष=३६० ग्रभ . य-३६० ककु . क-३० ककु . न-ककु . प=प समयोजन से ३६० ककु. क+-३० ककु. न+-प (ककु+१) = ३६० ग्रभ . य, अतः ३६० ककु. क+३० ककु. न+-प (ककु+१) –य । यहां भाज्य में तीन वर्ण हैं, दो वरण ३६० ग्रभ का मान इष्ट कल्पना कर कुट्टक से य मान सुगमता ही से होता है। एवं अंश शेष को साठ से गुणाकर कल्पकुदिन से भाग देने स लब्ध कलामान ल कल्पना कर तदूगुणित हर को भाज्य में से घटाकर कला शेष से समीकरण कर वहां भाज्य में तीनों वणों के मान को इष्ट कल्पना कर य मान जानना चाहिये इति ॥५७॥

. या== - -

इदानीमन्यान् प्रश्नानाह । अवमावशेषमवमैरधिमासकशेषमधिमासैः। इष्टयुतोनं तुल्यं कुर्वन्नावत्सराद् गणकः ॥५८॥ सु. भा.-इष्टाङ्कन युतमूनं वाऽवमावशेषमवमैस्तुल्यं तथेष्टाङ्कन युतमूनं वाऽधिमासशेषमधिमासैस्तुल्यमस्तीत्यस्योत्तरमावत्सरात् कुर्वन्नपि गणकः । अत्राहर्गणमानम्=या १ । गतावमानि=का १ । तदा ऽवमावशेषम्=क्षदि या-ककू. का । ततः प्रश्नालापेनक्षदि. या-ककु. का+इ=का । अतः कुट्टकेन यावत्तावन्मानं सुगमम् । द्वितीयप्रश्ने गतसौरमानम्=या १ । गताधिमासाः = का ? तदाऽधिमास शेषम्=अधिमा. या–कसौदि. का । ततः प्रश्नालापेन अधिमा. या–कसौदि. का:+इ=का (कसौदि-+१) का इ । अतो यावत्तावन्मानं सुगमम् । अधिमा अस्योत्तरं गतेन्दुदिनमानं यावत्तावत्कल्प्यते तदाऽपि भवतीति ॥ ५८॥ वि. भा.-इष्टाङ्कन युतं. हीनमवमावशेषमवमैस्तुल्यं तथेष्टाङ्कन युतं हीनमधिमासशेषमधिमासैस्तुल्यमस्तीत्येतदुत्तरमावत्सरात् (वर्ष पर्यन्तं) कुर्वन्न पि गरणकोऽस्तीति । १२२९ कल्प्यते अहर्गणप्रमाणम्-य। गतावमानि= र तदाऽनुपातेन अवम • य १२३० ब्रह्मास्पुटसिद्धान्ते

=गतावम-+-अमश-= र+- अवश-छेदगमेन अवम . य = कक् . र+-अवमशे ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते समशोधनेन प्रवम. य-र. ककृ=अवमशे, ततः प्रश्नोक्त्या अवम . य-र. ककु +इ=र पक्षयोः र. ककु योजनेन अवम . य+इ=र-+ र. ककु=र (१+ककु) समशोधनेन अवम. यः-=र (१+-ककु) इ अत र (१+-ककु) +:इ कुट्टकेन य मानं सुखेन विदितं भवेत् ॥ द्वितीय प्रश्ने कल्प्यते गतसौरप्रमाणम्=य । गताधिमासः=र, तदाऽनु अधिमास . य गताधिमास-1- र-+-अधिशे, छेदगमेन अधिमा य=कसौ. र+-अधिशे, समशोधनेन अधिमा. य–कसौ. र=अधिशे प्रश्नोक्त्या अधिमा. य–कसौ. र+इ=र पृक्षयोः कसौ• र योजनेन अधिमा. य+इ=र +कसौ. र=र (१+-कसौ) सभशोधनेन अधिमा . य=र (१+-कसौ) इ अतः य अत्र कुट्टकेन य मानं सुखेन विदितं भवेदिति ॥५८॥

                       अब अन्य प्रश्नों को कहते है।

हि. भा.--इष्टाङ्क से युत वा हीन अवम शष अवम के बराबर है तथा इष्टाङ्क से युत वा हीन अविमास शष अधिमास के बराबर है इसका उत्तर वर्ष पर्यन्त करते हुए व्यक्ति गणक है इति । कल्पना करते हैं अहर्गण प्रमाण =य । गतावम=र, तब अनुपात से , अवम. य-र. ककु= अवभश, तब प्रश्नालाप से अवम. य—र . ककु+इ=र दोनों पक्षों में र. ककु जोड़ने से अवम. य+इ=र+-र. ककु=र (१+-ककु) समशोधन से अवम. य र (१+ककु)+इ= इ अतः य, यहां कुट्टक से सुगमता से यं मान विदित हो जायगा। द्वितीय प्रश्न में कल्पना करने हैं गत और प्रमाण=य । गताधिमास=र तब अधिमा . य अधिश अधिश अनुपात से र-+- छेदगम से अधिमा . य छेदगम से प्रवम. य=ककू. र+-अवश समशोधन से ==कसौ . र+-अधिशे, समशोधन से अधिशे= अघिमा . य-कसौ . र अब प्रश्नालाप से 50000 = « T— 2 I $0000 W— WRt: (^^) Pt^TT 1 ^: (^feJTrfJT) UW^i:, sr sr^r ai^liW ^pf<r, q^n: *pM^ ^ W^ts ^.0000 ^0000

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                         अनेकवर्णसब्भीकरणबीजम्                 १२३१
      श्रधिमा . य‌—कसौ . र±इ=र दोनों पक्षों में ककु—र जोड़ने से  श्रधिमा. य±इ=र
      +कसौ . र=र (१+कसौ) समशोधन से  श्रधिमा. य=र(१+कसौ)±इ अश्र:
      र(१+कसौ)±इ/श्रिधिमा= य यहां कुट्टक से सुगमता पूर्वक य मान विदित होगा इति ॥५८॥
                        
                          इदानीम्न्यं प्रश्नमाह्।
                 निश्छेभागहरो भानोः सप्ततिगणोऽसशशेषोनः।
                 शुध्यत्ययुतविभक्तः कुर्वन्नावत्सरद् गणकः॥५६॥
          सु.भा.—निश्छेभागहरो ह्रढ़कुदिनानि। शेषं स्पष्टर्थम्। ५५ श्रर्या-
      प्रश्नोत्तरे यदि श्र=चक्रभा.इक्रभ, तदा तनैव विधिनांशशोषम्=अ . या—ह्रककु.
      का=नि। ततः प्रश्नालापेन ७० ह्रककु श्र.या+ह्रककु.का/१०००० श्रयं निरग्र:।
      =७० ह्रककु—नि/१००००।
          ततः कुह्रकेन ऋणभाज्यविधिना नीलकमानं सुगमम्॥५१॥
                        इत्यनेकवर्णसमीकरणबीजम्।
          बि.भा.—भानोः (सूयंस्य)निश्छेभागहरः(ह्रढ़कुदिनानि)सप्ततिगणः,
     श्र शशोषेण हीनः, अयुतविभक्तः शुध्यति, एतदुत्तरं वर्षपर्यन्तं कुर्वन् गणकोऽ
     स्तीति॥ 
                             श्रत्रोपपत्तिः।
          ५५ सूत्रोपपत्तौ रविभगणांशाः=चभा. रविभ= र तेनैव विधिनांऽशशेषम्
     = र . म— ह्रककु . क = न ततः प्रश्नोक्त्या ७०xह्रकक—श्रं शशो/१००००
     = ७०xह्रककु—र.य+दृककु—.क/१००००=७०xदृककु—न/१०००० श्रयं निःशेषः। ततः
     कुट्टकेन ऋणभाज्यरीत्या न मानज्ञानं सुलभम्॥५१॥
                          
                       इत्यनेकवर्णसमीकरणबीजम्
                     श्रब श्रन्य प्रश्न को केहते हैं।
         हि.भा.— सूर्य के ह्रदंकुदिन को सत्तर से गुणाकर श्रं श शेष वटाकर एक श्रयुत से
     भग देने से नि:शेष होता है इसका उत्तार वर्ष पर्यन्त करते हुऐ व्यक्ति गणक है इति॥ १२३१                       ब्राम्हास्फुटसिद्धान्ते
                            उपपति।
        ५५ सुत्र कि उपपति में रवि भगरगांश == चभा  रविभ == र, उसी विधि से 
        
        यं शशेष == र , य ‌-- द्र्ककु , क = न, तव प्रश्नोक्ति से ७०दृककु - यंशश/१००००
 
        ७० दृककु - रा। य+दृककु, क/१०००० = ७०दृककु - न/१०००० यह निशोष हौ तब  
        कुट्टक से रऋरग भाज्य विधि से न मान ग्नान सुगम ही हौ इति ॥५६॥
                     भनेकवरर्गसमीकररगबीज समाप्त हुश्ऱा।

» भावितबीजम् अथ भावितमुच्यते तत्र सूत्रम् । भावेतकरूपगुणना साव्यक्तवचेष्टभाजितेष्टप्त्योः । अल्पेऽधिकोऽधिकेऽल्पः क्षेप्यो भावितहृत व्यस्तम् ॥ ६० ॥ सु. भा–भावितकस्य भावितगुणकस्य रूपाणां च गुणना वधः किंविशिष्टा साव्यक्तवधाऽव्यक्तगुणकयोर्वधेन सहिता तत इष्टेन भाजिता लब्धिग्रंह्या । अनयोरिष्टाप्त्योर्मध्ये योऽधिकः सोऽल्पेऽव्यक्तगुणकेऽल्पश्चाधिकेऽव्यक्तगुणके क्षेप्यः । एवं यौ द्वौ राशी भवतस्तौ भावितकहृतो भावितगुणकेन हृतौ व्यस्तमव्य क्तमानं स्यात् । यावत्तावद्गुणके क्षेप्येण यन्मानं तत्कालकमानं कालकगुणके क्षेप्येण यन्मानं तद्यावत्तावन्मानं ज्ञेयमिति । एकस्मिन् पक्षे भावितमन्यस्मिन्नव्यक्तौ रूपाणि च कृत्वा तदोपरि लिखितं कर्म कर्तव्यमिति । अत्रोपपत्तिः । पक्षान्तरादिना कल्प्यते समौ पक्षौ प्र. या. का== क. या+ख • का+ग . याका= क या+ ख क+ ग विधिना ततो ‘भावितं पक्षतोऽभीष्टात् त्यक्तवा वण सरूपक’ इत्यादि भास्कर कख

  • इतीष्टं प्रकल्प्य = . +अ. ।

फलं ग यतः केवलं संयोजनेन अ. इ या - ख +क. खअग = १ (+क ख+अ. ग)=ख+आप्ति ख. का=त । अत उपपन्नम् । क + इ =क+इ अ ' अ विशेषरच भास्करबीजतोऽवगम्याः । तत्र मत्कृतोपपत्तिश्च तद्विपण्यां विलोक्या ।। ६० ॥ वि. भ-भावितकस्य (भावित गुणकस्य) रूपाणां च गुणना (वध:) ऽव्य क्तगुणकयोर्वधेन सहिता, इष्टेन भक्ता लब्धिभ्रह्मा, इटलब्ध्योर्मध्ये योऽधिकः सो ऽल्पेऽव्यक्तगुणकेऽल्पश्चाधिकेऽव्यक्तगुणके क्षेप्यः, एवं द्वौ राशी भवतःतौ भावि तकभक्तो (भावितगुणकेन भक्तौ) तदा विपरीतमव्यक्तमानं स्यात् । अत्रोपपत्तिः ।

यदि इ य+इ. क+रू=य. क, यत्र य, क माने अभिन्न स्तः । अत्र यदि य=न+इ, क=प=इ तदा य.क = (न+इ)(प+इ) = इ(न+इ)+इ(प+इ)+रू वा न. प+इ. न+इ. प+इ. इ = इ.न+इ. इ+इ. प+इ.इ+रू सम्शोधनेन न. प = इ. इ+रू श्रतः इ.इ+रू/प, अत्रा (न) स्य तथाऽभिन्नं मानं कल्प्यं यथा प मानमभिन्नं स्यात् । ततो न, प मानाभ्यामुत्थापनेन य, क माने भवेताम् । यदि इ.इ+रू इदं धनात्मकं भवेत्तदा (न) ऽस्य ऋणमानकल्पने (प) ऽस्यापि ऋणमानमागमिष्यति तदा य= इ—न क=इ-प, एतेनोपपन्नमाचार्योक्तम् । सिद्धान्तशेखरे "जह्यात् पक्षादेकतो भावितानि वर्णों रूपाण्यन्यतो वर्णघातः । क्षिप्तोरूपैस्ताड़िते भाविते च भक्तवेष्टेन प्राप्तिहारो नियोज्यौ । ज्येष्ठाल्पाभ्यां वर्णकाभ्यां यथेच्छं व्यत्यासाद्वा भाविताप्तौ च वर्णौ । स्यातामेवं स्वस्व वणौं त्वभीष्टैर्मानैः कर्मतत्प्रमाणस्य कुर्यात्' श्री पत्युक्त च समुपपद्यते । श्रीपत्युक्तमेव भास्करेण बीजगणिते “भावितं पक्षतोऽभीष्टात्यक्त वा वणौ सरूपकौ । अन्यतोभाविताङ्केन ततः पक्षौ विभज्य च । वर्णाङ्काहतिरूपैक्य भक्तवेष्टेनेष्ट तत्फले । एताभ्यां संयुतावूनौ कर्तव्यौ स्वेच्छया च तौ ॥ वर्णाङ्को वर्णयोमनेि ज्ञातव्ये ते विपर्ययात्' इत्यनेन स्फुटमुक्तमिति ।। ६० ।।

अब भावित बीज को कहते हैं।

   हेि. भा.-भावित के गुणक और रूपों के घात में अव्यक्त गुणकद्वयवध को जोड़कर इष्ट से भाग देकर लब्धिग्रहण करना चाहिए । इष्ट और लब्धि में जो अधिक हो उसको अल्प अव्यक्त गुणक में जोड़ना और अल्प को अधिक अव्यक्तगुणक में जोड़ना और, इस तरह दो राशिमान होता है उन दोनों राशियों को भावित गुणक से भाग देने से विपरीत अव्यक्तमान होता है अर्थात् प्रथम अव्यक्त गुणक में जोड़ने से जो होता हैं वह द्वितीय अव्यक्त का मान होता है , तथा द्वितीय अव्यक्त गुणक में जोड़ने से जो होता है वह प्रथम अव्यक्त का मान होता है इति ।

उपपति । यदि इ.य + इ.क + रू = य.क जिसमें य, ओर क का मान अभिन्न है, यदि य = न+इ, क=प+इ तब य.क=(न+इ)(प-+इ) = इ(न+इ) + इ(प+इ) + रू वा न . प+इ . न+इ . प+ई.इ=इ. न+इ . इ+इ . प+इ. इ रू समशोधन से भावितबीजम १२३५ इ. इ-+रू मए=इ.+अत:: ६=, यहां ‘न' का ऐसा अभिन्न मान कल्पना करना चाहिए इरू जिससे ‘प' मान अभिन्न हो; तब न, प मानों से उत्थापन करने से य, क, के मान होंगे । यदि इ. इ+ यह धनात्मक है तब ‘' की ऋणात्मक मानकल्पना करने से ‘५' का भी ऋणात्मक मान आयगा। तब य=इ“न, क==इ-प इससे आचार्योंक्त उपपन्न हुआ । सिद्धान्तशेखर में ‘जटल पक्षादेकतो भावितानि’ इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित श्रीपत्युक्त भी उपपन्न होता है । बीज गणित में ‘भावितं पक्षतोऽभीष्टाब्' इत्यादि संस्कृतोपपति में लिखित पद्यों से भास्कराचार्य ने श्रीरपयुक्त ही को स्फुट कहा है इति ॥ ६० ॥ इदानीं प्रश्नमाह । भानोराश्यंशवधात् त्रिधतुर्गुणितान् विशोध्य राक्षयंशान् । नवत इष्टवा सूर्यं कुर्वन्नावत्सरान् गणकः ॥ ६१ ॥ सु० भा०–भानोः सूर्यस्य यद्राशिमानं यच्चांशमानं तयोर्वेधात् त्रिगुणान् राशीन् चतुर्णानंशांश्च विशोध्य शेषं नवत दृष्ट्वाऽऽवत्सराव सूर्यं कुर्वन्नपि स शणक इति । अत्र राशिमानम् = या १ । अंशमानम् =का १। ततः प्रश्नालापानुसारेण था. क-३ या--४ का=९० १ बा, का ३ या+४ कॉ+९०

  • वर्णाझाहतिरूपैक्यम्= =३४४+९०=१०२ । इष्टम्=६ ।।

फलम् == १७ । ततो या=१० । का=२० ॥ ६१ ॥ वि. भा.-भानोः (सूर्यंस्य ) राश्यंशयोर्वधात् त्रिगुणिताचे राशीच चतुर्गुणा नंशांश्व विशोध्य शेषं नवतं दृष्ट वा सूर्यमचत्सरात् (वर्षपर्यन्तं) कुर्वन्नपि स गणक इति । अत्र कल्प्यते शशिप्रमाणस्य, अंश प्रमाणम् =र तदा प्रश्नोक्तथा य. र -३ य८४र=९० समयोजनेन य . र=९०+३ य+४ र, ततो वंणझाहति- रूपैक्चन = ३४४+९०=१०२ इष्टम् =६ १०२ +१७=फल्म । अतो य= १%, र=२० ॥ १ ॥ = अब प्रश्न को कहते हैं। हि- भा---सूर्य की राशि और अंश के घात में से त्रिगुणतं राशि चतुशृणित अंश ^ ^ST^ % ^tcTT | ^ ^ 7^ *FT PFT gtr tft 5^ | S% II W W= .*. ^ =*V9=<pr I T=?o, T=^«> 5fa II ^? II -4^Pd 3Tf?r ^rr% sERHTftr i ^2Frf *<JjmuiiHf *uf*ww ^TffT fa;r^#TgTfa f^rr d^Riici^Mr" ^rr% i nwr ^rrRir (oAitbiHi) ^rafNr i fSRf ^TsrcntuHt ^rrf^r^^^R 52-

  • rtc^ "^F?r * ftW*f TOffafafa" sfanrW '^^if

१२३६ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते

   को घटाने से नव्वे होता है तब एक वर्ष पर्यन्त सूर्य का साधन करते हुये भी वह गणक है इति ॥ ६१
     यहां कल्पना करते हैं राशि प्रमाण = य। अंश प्रमाण = र, तब प्रश्नानुसार य.र‌-३ य-४ र=९० दोनों पक्षों में ३ य+४ र जोङने से य.र=९०+३ य+४ र तब 'वर्णाङ्काहतिरूपॅक्य' मित्यादि भास्करोक्त सूत्र से वर्णाङ्काहतिरूपॅक्य =३*४+९० =१०२, इष्ट =६ ∴ १०२/६ = १७ = फल। अत: य=१०, र=२० इति ॥ ६१॥
                     इदानीं भाविते प्रकारान्तरमाह ।
           भावितके यदूघातो विनष्टवर्णोन तत्प्रमाणानि ।
           कृत्वेष्टानि तदाहतवर्णोक्यं भवति रूपाणि ॥ ६२॥
           वर्णप्रमाणभावितघातो भवतीष्टवर्णासङ्ख्यॅवम् ।
           सिध्यति विनाऽपि भावितसमकरणात् किं कृतं तदत: ॥६३॥
      सु. भा. - भावितके भावितसमीकरणो येषां वर्णोनां घातो (यद्घात:) ऽस्ति। तत्प्रमाणानि विनष्टवर्णोनेष्टानि कृत्वा तदाहतवर्णोक्यं रूपाणि भवति। एकवर्णमपहाय परेषां मानानीष्टानि प्रकल्प्य तदाहतानां वर्णगुणकानामॅक्यं यद्र्वति तानि रूपाणि व्यक्तानि भवन्ति। इष्टानां वर्णप्रमाणानां भावितस्य

भावितगुणकस्य च घात इष्टविमुक्तवर्णसंख्या भवति। एवं भावितसमकरणाद्र भावितसमीकरणाद्विनापि वर्णमानं सिध्यति। अतस्तत् पूर्वं कृतं भावितं किं किमर्थं कार्यमिति रोष:। 'मुक्त् वेष्टवर्णं सुधिया परेषां कल्प्यानि मानानि तथेप्सितानि' इत्यादिभास्करोक्तमेतदनुरूपमेव।

      अत्रोपपत्तिश्चेष्टकल्पितमानानामुत्थापनेन स्फुता ॥६२-६३॥
      वि.भा.‌- भावितके (‌भावितसमीकरणो) येषां वर्णानां घातोऽस्ति तत्प्रमाणानि विनष्टवर्णोनेष्टानि कृत्वा तद् गुणितवर्णोक्यं रूपाणि भवति। एकवर्णं त्यक्त् वा परेषां मानानीष्टानि प्रकल्प्य वर्णगुणानामॅक्यं यद् भवति तानि रूपाणि (व्यक्तानि) भवन्ति। इष्टानां वर्णप्रमाणानां भावितगुणकस्य घात इष्ट विमुक्तवर्णसङ्ख्या भवति। एवं भावितसमीकरणाद्विनाऽपि वर्णमानं सिध्यति, अतस्तत् "पूर्वं कृतं भावितं किमर्तं करणीयमिति" बीजगणिते 'मुक्त् वेष्टवर्णंसुधिया परेषां कल्प्यानि मानानि यथेप्सितानि। तथा भवेद् भावितंभङ्ग एवं स्यादाद्दबीजक्रिययेष्टसिद्धि:' भास्करोक्तमिदमाचार्योक्तानुरूपमेवास्तीति॥६३॥
  
                      इति भावितबीजम् भावितबीजम्

१२३७ अब भावित में प्रकारान्तर कहते हैं। । हि. भा.-भावित समीकरण में जिन वर्णों का घात है उसके प्रमाणतुल्य विनष्ट वर्गों से इष्ट कर वर्णाक्य को उससे गुणा करने से रूप होते हैं । एक वर्गों को छोड़ कर अन्यों के मान इष्ट.कल्पना कर वर्णगुणकों का ऐक्य जो हो वे रूप होते हैं । इष्टवर्षे प्रमाण और भावित गुणक का घात इष्टविमुक्त वर्णसंख्या होती है । एवं भावित समी करण विना भी वर्णमान सिद्ध होता है। अतः पूर्व में किया हुआ भावित क्यों किया जाय । बीज गणित में ‘मुक्तू वेष्टवर्ण सुबिया परेषां’ इत्यादि भास्करोक्त आचार्योंक्त के अनुरूप ही है इति ।।६३।। इति भावित बीज समाप्त हुआ ।

                           वर्गप्रकृतिः
                  बज्त्राभ्यासतोऽनेककनिष्टयुतविहोनाच्च ।
              मूलं द्विधेष्टवर्गाद् गुरगकगुराहादिष्टयुतविहोनाच्च ।
              श्राद्यवधो गुरगकगुरगःसहान्त्यधातेन कृतमन्त्यम् ॥६४॥
              वज्त्रवधैक्यं प्रथमं प्रक्षेपः क्षेपवधतुत्न्यः ॥
              प्रक्षेपशोधकह्र्ते मूले प्रक्षेपके रूपे ॥६४॥

सु० भा०‌-इष्टवर्गाद्दगुरगकगुरगादन्येनेष्टेन केनचिद्यताद्वोनाच्च यन्मूलं तदन्त्यसंज्न्यमवोऽधो द्विधा स्थाप्यम्। यस्येष्टस्य वर्गः कृतः स चाद्यसंज्नोऽप्यधोऽवो द्विधा स्थाप्यः। येन युतेनोनेन वा मुलं प्राप्तं स क्षेपसंज्न्यः शोधकसंज्न्यो वा ऽधो ऽवो द्विधा स्थाप्यः। एवं तिर्यकपत्तिकद्वये द्विधा कनिष्ठज्येष्ठक्षेपारगां विन्यासो जातः नत्रेष्टवर्गो येन गुरगकेन गुरिगतस्तस्य संज्य्न प्रकृतिः। आद्ययोः कनिष्ठयोर्वधो गुरगकेन प्रकृत्या गुरगोऽन्त्ययोज्येष्ठयोर्धातेन सह सहितः। एवमन्त्यमन्यज्ज्येष्ठं कृतमाचार्यैरिति शेषः। कनिष्ठज्येष्ठयोर्वज्त्रववैक्यं चान्यत् प्रथमं कनिष्ठसंज्न्यं भवति। तत्र क्षेपयोर्वधेन तुल्यः प्रक्षेपो भवतीति। एवं प्रक्षेपे वा शोधके ऋरगक्षेपे तुल्यभावनया ये मूले कनिष्टज्येष्ठे ते प्रक्षेपकेरग वा शोधकेन ह्रते रूपे प्रक्षेपके रूपक्षेपे कनिष्टज्येष्ठे भवत इति सर्व भास्करवर्गप्रकृतितः स्फुटम्।

नत्रोपपत्त्यर्थं मत्कृतभास्करबिजटिप्पण्यां वर्गप्रकृत्युपपत्तिविलोक्या ॥६४-६५॥

वि.भा.-इष्टवर्गात् गुरगकगुरगात् केनचिदन्येष्टेन युतात् हीनाच्च यन्मूलं तदन्त्यसंज्ञं (ज्येष्ठं) अवोऽघो द्विवा स्थाप्यम्। यस्येष्टस्य (कनिष्ठस्य) वर्गकृतः स भ्राद्यसंज्ञ (कनिष्ठ)ऽप्यवोऽवो द्विवा स्थाप्यः। येन युतैन हीनेन वा मूलं लब्धं स क्षेपसंज्ञः शोधकसंसो वाऽवोऽवो द्विधा स्थाप्यः। एव पत्त्किद्वये कनिष्ठज्येष्ठक्षेपारगा द्विवास्थापनं जातम्। नत्रेष्टवर्गो येन गुरगकेन गुरिगतस्वस्य नाम प्रकृतिः। कनिष्ठयोर्वधः प्रकृत्या गुरगो ज्येष्ठयोवतिन यतु एतदन्यज्ज्येष्ठम्। कनिष्ठज्येष्ठयोर्वज्त्रववैक्यमन्यत् कनिष्ठम्। तत्र क्षेपयोर्धातः क्षेपो भवति। एवं प्रक्षेपे वा शोघके ऋरगक्षेपे तुल्यभावनया ये कनिष्ठज्येष्ठे ते प्रक्षेपकेरग शोधकेन वा भवते तदा रूपक्षेपे कनिष्ठज्येष्ठे भवत इति॥ वर्गप्रकृतिः

                        अत्रोपपत्तिः    

सूत्रोक्स्त्या प्र क+क्षे = ज्ये, ज्ये - प्र क = क्षे । एवमेव ज्ये - प्र क = क्षे प्रनयोर्घातः क्षे = ज्ये इति धनमृरगमृरग धनं च क्रियते तदा ज्ये ज्ये २ प्र क क ज्ये ज्ये + प्र क क + २ प्र क क ज्ये ज्ये-ज्ये प्र क - ज्ये = (ज्ये + प्र क क) -- प्र {(ज्ये क + ज्ये क)} पक्षान्तारेग प्र {( ज्ये क + ज्ये क)} + क्षे क्षे = (ज्ये ज्ये + प्र क क) प्रतः क्षेपघाते क्षेपे ज्ये क + ज्ये क इदं कनिष्ठं, ज्ये ज्ये + प्र क क इदं ज्येष्ठं भवितुमर्हतीति । एतावताचार्योत्तमुपपन्नम् । सिध्दान्तशेखरे " कृतेर्गुरगोः यः पकृतिर्हि प्रोत्ता क्षिप्तिस्तथैवर्राघनात्मिकास्यात् । रूपं कनीयः पदमस्य वर्गे हते प्रकृत्या वियुते युते वा । क्षिप्यत्या पदं यच्च बृहत्यदं तत् ताभ्यां पदे भावनया त्वनन्ते " क्ष्री पत्युक्तमिदमाचार्योक्तानुरूपमेव । भावना विधिश्च ।

           वज्राभ्यासॉ ह्रस्वज्येष्ठकयोस्तद्यतिर्भवेगदध्रस्वम् ।
           लघुघातः प्रकृतिहतो ज्येष्ठवधेनान्वितो ज्येष्ठम् ॥
           क्षिप्त्योर्घातः क्षेपः स्याद्वजाभ्यासयोर्विशेषो वा ।
           तद्विवरंज्यष्ठपदं क्षेपः क्षिप्त्योः प्रजायते घातः ।
           ईप्सितवर्गेरग हृतःक्षे पः पदे तदेष्टाप्ते ॥

बीजगरिगते " इष्टं ह्रस्वं त्स्य वर्गः प्रकत्या क्षुण्ररगे युक्तो वर्गितो वा सयेन । मूलं दद्यात् क्षेपकं तं घनरग मूलं तत्र ज्येष्ठक्षेपकान्नयस्य तेषां तानन्यान् वाघो निवेश्य क्रमेरग । साध्यान्येभ्यो भावनाभिर्बहूनि मलान्येषां भावना प्रोच्यतेतः ॥ वज्राभ्यासॉ ज्येष्ठालघ्वोस्तदैक्यं ह्रस्वं लघ्वोराहतिश्च प्रकृत्या । क्षुण्रगा ज्येष्ठाभ्यासयुग् ज्येष्ठमूलं तत्राभ्यासः क्षेपयोः क्षेपकःस्यात् " भास्करोक्तमिदं सर्वमाचार्योक्तानुरूपमेवास्तीति ॥

              भब वर्ग प्र्कृति भाराम्म किया जाता है । f%TT m | jtft sTfftr 1 1 trrro % to ^ sr^r % i^r ^s- 

s^r ^trt 3ft?% % ?rt ^tciT | ^r"ss ?ik ^ ^rrRrrer ^pt to sn*r sptTO ^r?TT I ^WSq- «f>T TO $7 ^TT | I ^ ST&q (sifted) % %<T $ sr— sifft, *=spft<s5, 5%=^, #r= #rq- <m p-rprre sr. sfH&=^ sra: ^—sr. ^ = ^ sr. 4* = i, w ?>^f % to ^ % Sr. ^-^sh. sr. sp' 1 -^ 54 . sr. ^H-sr. 4. ^ ^ sr. sp. 4. wpt ^ ?fa ww^l <flr*. ^=tR sr. *f. 4.+**. sp 4* T ^ sr. i. W— sr. i**— sr. = (^-. 4-±sr. ^. i.) * — sr {(i. fr±^r. i)*} «rtt?5r % sr {(^. ^r±^r. 4)*}+$r. i=(^r. 4 ±ST. ff. 4)* SRT: ^TTO 5f Tdz^T. i *f?T55 fftT | ?fk 5%. *%±sr. if ffcrT 1 1 srrrofa; tot wr^r jttit 1 11 fireM ^rnr *f 'f&jf # 1: srffaf? sftw fafc^^IfcM i foH i s^rcfe

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१२४० ब्राह्मस्फ़्उटसिद्धान्ते

वा शोधक संज्ञक है । उसको भी श्रधोSधः दो स्थानों में स्थापन करना । इस तरह दो पंक्तियों में कनिष्ठ ज्येष्ठ और क्षेप का स्थापन हुआ । इष्टवर्ग को जिस गुरगक से गुरगा किया गया है उसका नाम प्रकृति है । कनिष्ठ द्वय के घात को प्रकृति से गुरगा कर ज्येष्ठद्वय घात को जोडने से अन्य ज्येष्ठ होता है कनिष्ठ और ज्येष्ठ के वज्राभ्यास क योग अन्य कनिष्ठ होत है वहां क्षेपद्वय का घात क्षेप होता है । एवं प्रक्षेप (शोधक) के ॠरग क्षेप में तुल्य भावना से जो कनिष्ठ और ज्येष्ठ होते हैं उन्हें प्रक्षेप से भाग देने से रूप क्षेप में कनिष्ठ और ज्येष्ठ होते हैं ॥


                                उपपत्ति ।                                                  

प्र =प्रकृति, क् =कनिष्ठ, ज्ये =ज्येष्ठ, क्षे =क्षेप तब सुत्रानुसार प्र.क+क्षे=ज्ये अतः ज्ये-प्र. क=क्षे, एवं ज्ये-प्र. क=क्षे, इन दोनों के घात करने से क्षे. क्षे=ज्ये. ज्ये-ज्ये. प्र. क-ज्ये.प्र.क+प्र.क. क. इसमें २ प्र.क.क. ज्ये-ज्ये इसको धन ॠरग और ॠरग धन करने से ज्ये. ज्ये+-२ प्र.क.क.ज्ये.ज्ये.+प्र.क.क+२ प्र.क.क.ज्ये.ज्ये.-ज्ये. प्र.क-ज्ये. प्र.क. =(ज्ये.ज्ये+-प्र.क. क.) -प्र{(ज्ये.क+-ज्ये.क)} पक्षान्तर से प्र {(ज्ये.क+-ज्ये.क)} + क्षे.क्षे=(ज्ये.ज्ये+-प्र.क.क) अतः क्षेपचात तुल्य क्षेप में ज्ये. क+-ज्ये. क यह कनिष्ठ होता है और ज्ये. ज्ये+-प्र.क.क यह ज्येष्ठ होता है । इससे भ्राचायोक्त भावना उपपन्न होती है ॥ सिद्धान्त शेखर में 'कृतेर्गुरगओ यः प्रकृतिर्हि प्रोक्ता क्षिप्तिस्तथैवरर्गघनात्मिका स्यात' इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित, श्रीपयुक्त आचार्योक्त अनुरूप ही है; भावना विधि 'वज्राभ्यासौ ह्रस्व्ज्येष्ठकयोस्तद्युतिर्भवेद्धस्वम्' इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित, भावना आचार्योक्त भावना के अनुरूप ही है । बीजगरिगत में 'इष्टं ह्रस्वं तस्य वर्गः प्रकृत्या क्षुण्रगो युक्तो वर्गितो वा स येन' इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित पद्यों से भास्कराचार्य ने भी आचर्योक्त के अनुरूप ही कहा है ॥ ६४-६५ ॥


                             इदानीं विशेषमाह ।
                   रूपप्रक्षेपपदे पृथगिषृक्षेप्यशोध्यमूलाभ्याम ।
                   कृत्वाSSन्त्याद्यपदे ये प्रक्षेपे शोधनेवेष्टे  ॥६६॥
    सु.भा. - रूपप्रक्षेपे ये पदे आद्यान्त्यपदे ते पृथक् स्थाप्ये । तत इष्टक्षेपे वेष्टशोधके ये मूले ताभ्यां भवनयाSन्ये अन्त्यद्यपदे ज्येष्ठकनिषेठे कृत्वा ते इष्ठे प्रक्षेपे वेष्टे शोधनेSन्ये अन्त्याद्यपदे ज्ञेये इति   ॥६६॥ ff. ^T. — ^TOT ^ 5ft 3^5, WfiPZ | fTO PTO SRTTT, ^ 3ft 

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                                                                                वर्गप्रकृतिः                                                                               १२४१
     
                वि.भा. --- रूप  प्रक्षेपे  ये  अन्त्याद्यपदे  ( ज्येष्ठ  कनिष्ठे )  ते पृथक्  स्थाप्ये,  इष्टक्षेपे  ( इष्टशोधके  वा )  ये मूले  ( कनिष्ठ  ज्येष्ठे )  ताभ्यां  भावनया  ज्येष्ठकनिष्ठे  कृत्वा  ते  इष्टक्षेपेSन्ये  ज्येष्ठ  कनिष्ठे  ज्ञातव्ये इति ।    
                                                               यत्रोपपत्तिः  स्पष्टैवास्तीति ॥ ६६ ॥
                                                                        यब  विशेष  कहते  हैं  । 
                 हि. भा.  --- रूपक्षेप  में  जो  ज्येष्ठ,  कनिष्ठ  है  उन्हें  पृथक् स्थापन  करना,  इष्टक्षेप  में  जो कनिष्ठ,  ज्येष्ठ  है  उस्के  साथ  भावना  से  इष्टक्षेप  में  मन्य  ज्येष्ठ,  कनिष्ठ  होते  हैं  इति । 
                                                                   उपपत्ति  स्पष्ट  हो  है  ॥ ६६ ॥ 
                            इदानीं  चतुःक्षेपकजनिष्ठज्येष्ठाभ्यां  रूपक्षेपे  कनिष्ठज्येष्ठानयनमाह । 
                            चतुरधिकेSन्त्यपदकृतिस्न्यूना  दलिताSन्त्यपदगुराSन्यपदम् ।
                            प्रन्त्यपदकृतिव्येका  द्विहृताSSद्यपदाहताSSद्य  पदम्  ॥ ६७ ॥

                  सु. भा. --- चतुरधिके  चतुःक्षेपेSन्त्यपदकृतिस्त्रिभिरूनाSधिताSन्त्यपदगुरा  फलं  रूपक्षेपीयमन्त्यपदं  ज्येष्ठं  भवेत् ।  श्रन्त्यपदकृतिरेकेन  हीना  द्विहृताSSद्यपदेन  हता  फलं  रूपक्षेपीयमद्यपदं  कनिष्ठं  भवेत् ।


                     श्रत्रेपपत्तिः ।  यदि  चतुःक्षेपे  कनिष्ठम्  === क,  ज्येष्ठम्  === ज्ये ।  तदा  इष्टवर्गहृतः  क्षेपः  क्षेपः  स्यात्' -- इत्यादिभास्करविधिना  रूपक्षेपे  कनिष्ठम्  =  क / २ । ज्येष्ठम्  =  ज्ये / २ ।  तथा  विलोमेन  प्रकृतिः= (ज्ये^१ - ४) / क^१ समासभाषनया  क / २,  ज्ये / २,  श्राभ्यामन्ये  कनिष्ठज्मेष्ठे  रूपक्षेपे  साध्येते  तदा  कनिष्ठम् = (क*ज्ये) / २,  ज्येष्ठम्  =  (ज्ये^२ - २) / २  आभ्यां  क / २,  ज्ये / २  एतभ्यां  च पुना  रूपक्षेपे  यदि  कनिष्ठज्येष्ठे साध्येते  तदा कनिष्ठाम्  =  [क (ज्ये^२ - १)] / २ ।  ज्येष्ठम् = ज्ये ( ज्ये^२ - ३)  श्रत  उपपद्यते  ॥ ६७ ॥
                     वि. भा. ---  चतुरधिके  ( चतुः  क्षेपे )  Sन्त्यपद  ( ज्येष्ठ )  वर्गस्त्रिभिर्हीनोSधितो  ज्येष्ठगुरितस्तदा  रूपक्षेपे  ज्येष्ठं  भवेत्,  ज्येष्ठवर्ग  एकेन  हीनो  द्वाभ्यां  भक्त:  कनिष्ठगुरितस्तदा  रूपक्षेपीयं  कनिष्ठं  भवेदिति ॥ 

कल्प्यते चतु: क्षेपे कनिष्ठ्म् = क । ज्येष्ठम् = ज्ये, तद 'इष्टवर्गह्यत: क्षेपे'

इतयादिना इष्टम् द्वयं प्रकल्प्य रूपक्षेपे कनिष्ठम् = क.ज्ये/२, ज्येष्ठम्= ज्ये/२ तथा

प्र.क^२ + ४ = ज्ये^२ समसशोधनेन् प्र . क^२ = ज्ये^२‌----४ अत: प्र = ज्ये^२ - ४/ क^२, क्/२,

ज्ये/२ आभ्यां तुल्यभावनया रूपक्षेपे कनिष्ठम् = क.ज्ये/२ , ज्येष्ठम् = ज्ये^२-२/२

आभ्यां क्/२ , ज्ये/२ एताभ्यां भावनया रूपक्षेपे कनिष्टम् = क(ज्ये^२ - १)/२

ज्येष्ठम् = क( ज्ये^२ -१)/२, ज्येष्ठम् = ज्ये(ज्ये^२-३)/२ एथनाचार्यौक्तमुपपत्रम्

॥६७॥

अब प्वर क्षेप के कनिष्ठ् और ज्येष्ट से रूप क्षेप में कनिष्ट और ज्येष्ठ 

             के आनयन को कहते है। 
 

हि. मा. ----- चर क्षेप में से जो ज्येष्ठ है उसके वर्ग में से तीन घटाकर दो से भाग देने

से जो फम हो उसके ज्येष्ट से गुरा करने से रूपक्षेप में ज्येष्ट होता है। ज्येष्ट वनं में एक

घटाकर दो से भाग देने से जो फल होता है उसके कनिष्ठ् से गुरा करने से रूपक्षेप में

कनिष्ठ् होता है इति ॥  
                                    उपपत्त्ति।

कल्पना करते है चार क्षेप ।में कनिष्ठ = क । ज्येष्ठ = ज्ये, तब ' इष्तवगंहत:

क्षेप' इत्यदि भास्करोक्त प्रकार से दो इष्ट कल्पना करने से रूपक्षेप में कनिष्ठ = क/२, ज्येष्ठ

= ज्ये/, वगं प्रक्रुति लक्षरा से प्र। क^२+४= ज्ये^२ समशोधन से प्र. क^२= ज्ये^२ --- ४ अथ:

प्र = ज्ये^२ ---४ / क^२ , क/२ , ज्ये/२ इसकि तुल्य भावना से रूपक्षेप में कनिष्ठ = क.ज्ये/२ , ज्येष्ठ

= ज्ये^२-२/२, इसको क/२, ज्ये/२ इसके साथ भावना से रूपक्षेप में कनिष्ठ = क(ज्ये^२-१)/२

ज्येष्ठ = ज्ये(ज्ये^२-३)/२ इससे आचार्यौक्त उपपन्न हुआ इति ॥६७॥

                            वर्गप्रकृतिः

इदानीमृखात्मकचतुःक्षेपकनिष्ठज्येष्ठाभ्यां रूपक्षेपे कनिष्ठज्येष्ठयोरानयनमाह।

         चतुरूनेऽन्त्यपचकृती श्र्येकयुते वधदलं पृथग्व्येकम्।
         व्येकाद्याहतमन्त्यपदवधगुखमाद्यमन्त्यपदम्॥

सु.भा.-चतुरूनेऽन्त्यपदस्य कृतिर्द्विघा स्थाप्या एकत्र त्रियुता ऽन्यत्रैकयुता। श्रनयोर्वघदलं पृथक्स्थाप्यमेकत्र व्येकं कायं तद्वयोकाद्याहतम्।श्रन्यपदकृतिस्त्रियुता प्रथमं या साधिता तद्वयोकेना ज्ये^२ +२ नेन हतमित्यर्थः। फलं रूपक्षेपेन्त्यं ज्येष्ठपदं स्यात्।पृथक् स्थापितं पदयोः कनिष्ठज्येष्ठयोर्वधेन गुणं फलमान्त्यपदं पूर्वागतान्त्यपदसम्बन्धि श्राद्यं पदं भवेदिति। श्रत्रोपपत्तिः।कल्प्यते चतुरूने कनिष्ठम् = क।ज्येष्ठम् = ज्ये। तदा विलोमेन प्रकृतिः = (ज्ये^२+४)/क^२। रूपशोधके च कनिष्ठम् = क/२। ज्येष्ठम् = ज्ये/२। श्राभ्यां स्रमासभावनया रूपक्षेपे कनिष्ठम् = (कxज्ये)/२। ज्येष्ठम् = (ज्ये^२+२)/२। श्राभ्यां पुनः समासभावनया रूपक्षेपे कनिष्ठं = [क.ज्ये^२(ज्ये^२+२)]/२। ज्येष्ठम्=(ज्ये^४+४ज्ये^२+२)/२। श्राभ्यां पूर्वसाधिताभ्याम् (कxज्ये)/२। (ज्ये^२+२)/२ एताभ्यां च पुनः समासभावनया रूपक्षेपे कनिष्ठम् =[क.ज्ये(ज्ये^४+४ज्ये^२+३)]/२ =क.ज्ये(ज्ये^२+१)(ज्ये^२+३)/२। ज्येष्ठम् = (ज्ये^२+२)[(ज्ये^४+४ज्ये^२+१)/२]=(ज्ये^२+२)[(ज्ये^४+४ज्ये^२+३)/२ - १]={ज्ये^२+२}{[(ज्ये^२+३)(ज्ये^२+१)]/२ - १} श्रत उपपद्यते॥ वि.भा.- चतुरूने (ॠखात्मकचतुःक्षेपे) ऽन्त्यपद (ज्येष्ठ) कृतिर्द्विधास्थाप्या एकत्र त्रियुताऽन्यत्रैकयुता, तयोर्घाताधं पृथक् स्थाप्यम्। एकत्रैकहीनं कार्यं तदेकहीनकनिष्ठगुखम्।श्रन्त्यपद(ज्येष्ठ) कृतिस्त्रियुता प्रथमं या साधिता तद्व्येकेना ज्ये^२+२ नेन गुखितमित्यर्थः। तदा रूपक्षेपे ज्येष्ठं भवेत्। पृथक् स्थापितं कनिष्ठज्येष्ठयोर्घातेन गुखं फलं पूर्वागतज्येष्ठसम्बन्धिकनिष्ठं भवेदिति॥

                         श्रत्रोपपत्तिः।

कल्प्यते ॠखात्मकचतुः क्षेपे कनिष्ठम्=क, ज्येष्ठम्=ज्ये,वर्गप्रकृतिलक्षखेन १२४४ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते प्र. क'~४=ज्ये' समयोजनेन प्र. क८ ज्ये२+४ अतः ज्ये२+४ =प्र। 'इष्टवर्ग ज्यै+२ ज्येष्ठम्= =------ समास भावनया हृतक्षेप' इत्यादिनेष्टम् =२ प्रकल्प्य ऋणात्मकरूपक्षेपे कनिष्ठम्= के, ज्येष्ठम् आभ्यां तुल्यभावनया रूपक्षेपे कनिष्ठस्=, क. ज्ये आभ्यां पुनः समासभावनया रूपक्षेपे कनिष्ठम् _क. ज्ये (ज्ये' +२), ज्येष्ठम् ज्ये+४ ज्ये+२ क. ज्ये ज्ये२+२ आभ्यां पूवंसाधिताभ्यां रूपक्षेपे कनिष्ठम्= क. ज्ये (ज्ये'+४ ज्ये' +३) =क. ज्ये. (ज्ये'+१)(ज्ये'+३) ज्येष्ठम्=(२('+=(ज्ये २+२)(ज्ये+४ज्ये'+३) ज्ये२+)ज्ये४ ज्ये२+१) = (ज्यै+२){) ज्ये'२)-५ {'}('#'+} अत उपलमचायत मिति ॥६८ अब ऋणात्मक चार क्षेप के कनिष्ठ और ज्येष्ठ से रूपक्षेप में कनिष्ठ भौर ज्येष्ठ के आनयन को कहते हैं। हि. भा–ऋणात्मक चार क्षेप में ज्येष्ठ वर्ग को दो स्थानों में स्थापन करना, एक स्थान में तीन जोड़ना दूसरे स्थान में एक जोड़ना, इन दोनों के घातार्ध को पृथक् स्थापन करना, एक स्थान में एक हीनकर जो हो उसको एक हीन कनिष्ठ से गुणा करना चाहियेतब रूप क्षेप में ज्येष्ठ होता है। पूर्वं स्थापित को कनिष्ठ और ज्येष्ठ के धात से गुणा करने से पूर्वागत ज्येष्ठ सम्बन्धी कनिष्ठ होता है इति । उपपत्ति । कल्पना करते हैं ऋणात्मक चारक्षेप में कृनिष्ठ=क। ज्येष्ठ=ज्ये । वर्गे प्रकृति लक्षण से प्र. क२-४=ज्ये २ दोनों पक्षों में चार जोड़ने से प्र. क२ = ज्ये२+४ अतः श्र =ज्य++४ ‘इष्ट वगं हृतः क्षप’ इत्यादि से इष्ट=२ कल्पना करने से ऋणात्मक रूपक्षेप में कृनिष्ठः = क , ज्य ठ- = ये तुल्य भावना से रूपकेप में कनिष्ठः = क. न्ये ज्येष्ठ कज्ये +२ज्येष्ठ ज्यै२+२ ="T भावना में = - (म्य), इनसे समस से रूपक्षेप कनिष्ठः हुआ ॥६८॥ =ज्येष्ठ+४ ज्ये*+२ इनके साथ पूर्वसाधित क. ज्ये, ज्ये*+२ इनकी समास भावना से रूपक्षेप में कनिष्ठ -क. ज्ये (ज्ये'+४ज्ये'+२)=(ज्ये'+१) (ज्ये'+३) क. ज्ये ज्येष्ठ=(ज्ये,+२). -(ज्ये'+४ज्ये'+१) =(ज्ये +२).(ज्ये +४ ज्ये -३-१) ={(व्ये '+२)} . { (ये*+३) (ज्ये*+१)-१ ? इससे आचार्योक्त उपन्न वर्गप्रकृतिः इदानीं वर्गात्मकप्रकृतौ कनिष्ठज्येष्ठयोरानयनमाह । वर्गे गुणके क्षेपः केनचिदुद्धृतयुतोनितो दलितः । प्रथमोऽत्यमूलमन्यो गुणकारपदोद्धृतः प्रथमः ॥६९॥ सु. भा.-गुणके प्रकृतौ वर्गे वर्गात्मके सति क्षेपः केनचिदिष्टेनोद्धतः फलं तेनैवेष्टेन युतमूनितं दलितं च कार्यम् । एवं राशिद्वयं भवेत् तत्र प्रथमो राशिरन्त्य मूलं ज्येष्ठं भवेत् । अन्यो गुणकारपदोद्धतो गुणकारः प्रकृतिस्तत्पदेनोद्धतः फलं प्रथम आद्योऽर्थात् कनिष्ठं पदं भवेदिति । ‘इष्टभक्तो द्विधाक्षेप' इत्यादि भास्क रोक्तमेतदनुरूपमेव । १२४५ अत्रोपपत्त्यर्थ मत्कृतभास्करबीज टिप्पण्याम्-इष्टभक्तोद्विधाक्षेपः इत्यस्योप पत्तिद्रष्टव्या ॥ ६९ ।। वि.भा.-गुणके (प्रकृतौ) वर्गे (वर्गात्मके) सति क्षेपः केनचिदिष्ठेन भक्तो लब्धं तेनैवेष्टेन युतं हीनं दलितं च कार्यम् एवं राशिद्वयं भवति । तत्र प्रथमो राशि रन्त्यमूलं (ज्येष्ठ) भवति , गुणकारः (प्रकृतिः) तन्मूलेन भक्तो द्वितीयराशि स्तदा लब्ध कनिष्ठ भवेदिति । +-प्र. क पक्षौ इ हीनौ तदा वर्गप्रकृत्या प्र२ . क२-1-क्षे=ज्ये२ समशोधनेन क्षे=ज्ये९-प्र२. क९ वर्गा न्तरस्य योगान्तरघातसमत्वा त् (ज्ये+-प्र. क) (ज्ये-प्र. क)=क्षे, अत्र यदि ज्ये -प्र. क इष्ट कल्प्यते तदा क्षे=(ज्ये--प्र • क) . इ पक्षौ इ भक्तौ तदा =ज्ये


-इ=ज्ये+-प्र . क–(ज्ये-प्र.क)=ज्ये+-प्रक ब्राह्मस्फुटसिद्दान्ते

                                       क्षे
                                       ‌--  ‌-इ
                                       ‌इ                 क्षे     

---ज्ये + प्र.क= २ प्र.क पक्षौ २ प्र भक्तौ तदा ------------ = क । --- अत्रैवेष्टुयोजनेन

                                       २प्र                इ   
                                     
                                            क्षे
                                           --- +इ  

क्षे इ


+ इ = ज्ये + प्र.क + ज्ये -- प्र.क =२ ज्ये श्र​तः ------- = ज्ये , एतावता s
इ                                           २

चार्योक्तमुपपन्नम् ॥ बीजगरिगते 'इष्ट्भक्थो द्विघाक्षेप' इत्यादि भास्करोक्तमेतदनुरूपमेवेति ॥ ६९ ॥

            भव वर्गात्मक प्रक्रुति में कनिष्ट श्रोर​ ज्येष्ठ का श्रानयन करते  है  ।
   
     हि.मा. - वर्गात्मक प्रक्रुति में क्षेप को किसी इष्ट से भाग देकर जो फल हो उसमें उसी इष्ट को युत श्रौर हीन कर श्राघा करना चाहिये इस तरह दो राशीयों का मान होता है , उनमें प्रथम राशि ज्येष्ठ होता है , द्वितीय राशि को प्रक्रुति के मूल से भाग देने से कनिष्ठ होता है इति ।


                                उपपत्ति   ।
           २  २         २                  २    २  २ 

वर्गं प्रक्रुति से प्र .क + क्षे = ज्ये समशोधन से क्षे = ज्ये --प्र. क वर्गान्तर योगान्त्रर घात के बराबर होता है इसलिये क्षे =(ज्ये+प्र.क) (ज्ये--प्र.क) यहां यदि ज्ये -- प्र.क = इष्ट माना जाय तव क्षे = (ज्ये + प्र.क) इ। क्षे = प्रथमराशि = ज्ये । क्षे ___ इ = द्वितीयराशि =

                    ----+इ                  -----     
                     इ                        इ
                ------------              ----------------   
                      २                       २            

द्वितीयराशि = प्र.क क्षे ‌__ इ क इससे श्राचार्योक्त उपपन्न हुश्रा ।

               -----      = 
                 इ

बीज गरिग्रत में ' इष्ट भक्तौद्विधाक्षेपः ' इत्यादि भास्करोक्त इसके घनरूप ही

               है इति  ॥ ६६ ॥

श्रतोSग्रै चैकाSर्यां नष्टा सा कोलब्रू कानुवादानुसारेण ।

वर्गच्चिन्मै गुखके प्रथमं तम्मूल भाजितं भवति । वर्गच्चिन्ने क्षेपे तत्पदगु रिपते तदा भूमै ॥ ७० ॥

       एवं भवितुमर्हति । सु. भा-यदि गुणकः प्रकृतिः केनचिद्वर्गेण निःशेषो भवति तदा तं तद्वणण

संहृत्य लब्धसमे गुणके मूले साध्ये तत्र प्रथममाद्यमर्थात् कनिष्ठं तस्य वर्गस्य मूलेन भाजितं फलमभीष्टे गुणके कनिष्ठं भवेत् । ज्येष्ठं त्वत्रापि तदेव । क्षेपे वगैच्छिन्ने सति वर्गेण क्षेपं विभज्य लब्धसमे क्षेपे ये मूले ते तद्वर्गपदेन गुणिते अभीष्टगुणके मूले भवत इति । ‘वर्गच्छिन्ने गुणे ह्रस्वं तत्पदेन विभाजयेदिति भास्करप्रकारः प्रथमप्रकारानुरूपः । ‘क्षुण्णः क्षुण्णे तदा पदे' इति भास्करप्रकारश्च द्वितीयप्रका वर्गप्रकृति अत्रोपपत्त्यर्थ मत्कृतभास्करबीजटिप्पणी विलोक्या ॥ ७० ॥ कनिष्ठज्येष्ठे भवेतामिति । वि. भा.-यदि गुणकः (प्रकृतिः) केनापि वर्गाङ्कन भक्तः सन् निःशेषो भवेत्तदा तदगुणक तद्वर्गाङ्कन भक्त वा लब्धतुल्ये गुणके (प्रकृतौ) कनिष्ठज्येष्ठे साध्ये तत्र प्रथम (कनिष्ठं) तस्य वर्गाङ्कस्य मूलेन भाजितं तदा तद्गुणके (नवीन प्रकृतौ) कनिष्ठं भवेत् । ज्येष्ठं तदेव, क्षेपे वर्गाङ्कन छिन्ने सति वर्गाङ्कन क्षेप गु. प्र वर्ग प्रकृति लक्षणेन प्र. क^2 + क्षे^2 = ज्ये = गु. प्र (क ग)^2 अत्र यदि गु.प्र इयमन्या प्रकृति=प्र तदा तत्सम्बन्धि कनिष्ठं (क/ग)

  1. स्यादेतेन पूर्वार्ध 'मुपपन्नम् । अथ प्र. क२+-क्षे=ज्ये पक्षौ इ गुणितौ तदा।

प्र.(क.गु) *+-क्षे-गु*=(ज्ये.गु) * यदि क्षे-गु ==क्षे तदा तत्सम्बन्धि कनिष्ठम्=क.गु= क, ज्येष्ठ=ज्ये • गु= ज्ये तदा प्र.क.+-क्षे'=ज्ये२ एतेनोत्तरा धैमुपपद्यत इति ॥७०॥ ६९ सूत्र से आगे की एक आय नष्ट है वह कोलब्रक साहेब के अनुवादानुसार निम्नलिखित आशय की है ।


(१) वर्गच्छिन्ने गुणे ह्रस्वं तत्पदेन विभाजयेदिति भास्करोक्तमेतत्सदृशमेव । (२) क्षेपः क्षुण्णः क्षुण्णे तदा पदे भास्करोक्तमिदमेतत्सदृशमेवेति । हेि. भा.-यदि प्रकृति किसी वर्गाङ्क से भाग देने से निः शेष हो तब प्रकृति को ब्राह्मस्प्फुटसिदान्त

वर्गाङ्क से भग देने से जो लब्धि हो ततुल्य नवीन प्रकृति में कनिष्ठ श्रीर ज्येष्ठ साधन करना, उस कनिष्ठ् को वर्गाङ्क के मुल से भाग देने से नवीन प्रकृति में कनिष्ठ होता है, ज्येष्ठ् यहा भी वही रहता है। यदि क्षेप किसी वर्गाङ्क से भाग देने से निशेष हो तव वर्गाङ्क से क्षेपि को भाग देने से जो लब्धि हो ततुल्य नवीन क्षेप में कनिष्ट श्रैर ज्येष्ठ हो उनको उस वर्गाङ्क मूल से गुएए करने से नवीन क्षेप में कनिष्ठ् श्रैर ज्येष्ठ होते है इति॥

                             उपपति।

वर्गप्रकृति लक्षिऐ से प्र.क^२ + क्षे= ज्य्ये^२. प्र. क^२/गु^२ = गु^२.प्र.(क/गु)^२ यहा यदि गु^२.ञ् यह श्रन्य प्रकृति= प्र, है तव तरसम्भन्धी कनिषह्ठ क/गु होगा, ज्येष्ठ वही रहेगा,इससे पुर्वघै उपपशृ हुमा। बीज गरिगत में 'वर्गबिक्षिले गुए ह्र्सवं तत्पदैन विबभायेत्' यह भास्करोत कोलव्रु क को शृनुरुप हि है। प्र.क^2.ह^२+ क्षे. इ^२= ज्ये^२ वोनों पक्षों को इ^२ से गुऐ करने से प्र.क^२.इ^२+ क्षे.इ^२= ज्ये^२. इ^२= (क.गु)^२+ क्षे.गु^२ =(ज्ये.इ)^२ यदि क्षे.गु^२ = क्षे तब तत्सम्बन्धी कनिष्ठ = क. गु= क तथा ज्येष्ठ =ज्ये. गु. हससे कोलबुक सहेव के श्रीनुवाद का उतराघि उपपत्र हुश्रा। 'क्षेपः क्षणाः क्षए पदे' यह भास्करोत उसी के सहश् है||१०||

                          इदानिं प्रशनविशेषस्योनतरमाह।

गुखकयुतितरष्टगुरिगता गुरकान्त्रभाजिता राशिः। गुरगकै त्रैगुरगौ व्यस्पाधिकै हतावन्तरेरग पदे ||७१||

सु. भा ‌- (गुरगकगदुयेत गुरिगतः प्रुथक् प्रुरगराशिरेकयुतस्च।

        यदि तत्पदे निरग्र कुवननावत्सराद् गरगजकः॥)

इति प्रष्नस्योतरायं गुरगकयोयुतिरष्टगुरिगता गुरगकयोरान्तरवगैरग भाजिता राशिः स्यात्। गुरकै द्वो त्रिगुरगै कायै तै व्य्स्यतगुरगका धिको गुरगकान्तरेरग तो हता तदा ते एव निरग्र पदे भवतः। श्रात्रोपपतिः। कल्प्यते गुरगकद्दयं क्रमेरग गु, गु,। तथा राशिमान या^६-१/गु।

                                                                      वर्गप्रकृति ः                                          १२४९
                                      भत्रैकालापः स्वयं घटतेऽतोऽमुं द्वितीयमुणकेन सड् गुण्य रूपं प्रक्षिप्य कालकवर्गेण समंकृत्वा पक्षॉ 
                         गु, या^२- गु,+गु,\ गु, =का^२।
                       : गु, का^२=गु, या^२‌-गु, +गु, ।
                 गु, गुणितॉ तथा प्रथमपक्ष्य मूलम्+= गु, का। द्वितीयपक्षस्यास्य गु, गु, या^२- गु, गु,+गु^२, वर्ग प्रकृत्या।
                             क                                        ज्य                                      क्षे
                             १                                         गु,                                   गु^२,-गु, गु,
                           २ इ\ गु, गु,  इ^२           गु, गु,+इ^२\ गु, गु,  इ^२          १
             समासभावनया क                                                                                ज्ये
     १ गु, इ+गु, गु,+इ^२\ गु, गु,  इ^२                         १ गु, गु, इ+गु^२, गु,+ गु, इ^२\ गु, गु,  इ^२
   प्रथ यदि इ+ गु, तदोत्थपनेन राशिः।
   + या^२-१\ गु,  + [{ ३गु^२+गु, गु,\ गु, (गु^२  गु,)}^२ - १] \ गु,
   {(३गु,+गु,gउ, गु,)^२-१}\ गु,= (९गु^२,+६गु, गु,+गु^२,\ गु^२,-२गु, गु,+गु^२, -१) \ गु,
 = ८गु^२, +८गु, गु, \(गु,  गु,)^२ \ गु, =८(गु,+गु^२,)\(गु, गु,)^२ । तत श्रालापेन 
  प्रथमपदम् = ™∞¡ गु^२,+८गु, गु,\ गु^२,- २गु, गु,+गु^२, + १=३गु,+गु,\ गु, गु, ।
   एवं द्वितीयपदम्= ३ गु‌-गु, \ गु,  गु, ।श्रत उपपन्नं सर्वम् ॥७१॥
    वि. भा .- गुणकयोर्योग  श्रष्टगुणितो गुणकयोरन्तरेण भक्तस्तदा राशिर्भवेत्। द्वॉ गुणकॉ त्रिगुणितॉ तॉ व्यस्तगुणकाधिकॉ गुणकान्तरेण भक्तॉ     तदा ते एव विरग्र पदे भवेतामिति ॥ १२५०    
                         ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते
                           अत्रोपपत्तिः।                             

कल्प्यते गुणकद्वयं क्रमेण गु, गु, तथा राशिप्रमाणम् = (य^२-१)/गु एतत् गु अनेन सङगुण्यैक क्षिप्त्वा र वर्गेण समं (य^२.गु-गु)/गु + १=(य^२.गु‌-गु+गु)/गु = र^२ छेदगमेन यः. गु-गु+-गु=गु:.र^२ पक्षौ 'गु' गुणितौ तदा गु. र^२=य^२. गुगु-गुगु + गु^२ प्रथम पक्षस्य मूलम्=गु.र द्वितीय पक्षस्यास्य य^२.गु.गु-गु.गु +गु^२ वर्गप्रकृत्या प्रकृतिः=गु.गु, क्षेपः=गु^२-गु.गु । अत्र कल्प्यते कनिष्ठम् =क=१ तदा ज्येष्ठम्=ज्ये=गु । क्षेपः=गु^२ -गु . गु इष्टवर्गप्रकृत्योर्यद्विवरं तेन वा भजेदित्यादिना रूपक्षेपे कनिष्ठम् २इ/(गु.गु ् इ^२), ज्येष्ठम् = (गु.गु+इ^२)/(गु.गु ् इ^२), क्षपः = १ समासभावनया (२ गु.इ + गु.गु+ इ^२)/(गु गु ् इ^२)= क। (२ गु.गु.इ + गु^२ गु + गु.इ^२)/(गु गु ् इ^२)= ज्ये। अत्र कनिष्ठं प्रतमपक्षस्या (गु.र) स्य समम्। यदि इ = गु तदोत्थापनेन राशिः= (य^२-१)/गु = [{(३गु^२ +गु.गु)/गु(गु ् गु)}^२-१] / गु= {((३गु+गु)/(गु ् गु))^२-१} / गु = =( (९गु^२+६गु.गु+गु^२)/(गु^२ - २गु.गु + गु^२) - १ ) / गु = (( गु^२+८गु.गु)/ (गु-गु)^२ )/गु= (( गु+गु)/(गु ् गु)^२ ) अत आलापेन प्रथम पदम् = √(८गु^२+८गु.गु)/(गु^२-२गु.गु+गु^२) + १ = (३गु+गु)/ (गु ् गु), द्वितीय पदम् = (३गु-गु)/(गु ् गु) इति ॥७१॥

                   अब प्रश्न विशेष का उत्तर कहते हैं ।
   हेि.भा़-राशि को पृथक् पृथक् गुणकद्वय से गुणाकर एक जोड़ने से यदि उनके                                                                                                    वर्गप्रकृति: 
   को एक वर्ष् पर्यन्त्  नि: करवे हुए व्यक्ति गरगक है यह प्र्शन है | तो 
                                                                                              इसका उत्तर
                 गुणाकद्वय योग को  पाठ से गूरागकर गुणाकद्व्य के  गुणाकर के     वर्ग् से भाग देने से राशिमान होता हैं  | दोनों गुरगकों को तीन से गुरग कर  दोनों  में  विपरीत   गुरगक  जोड  कर  गुरकान्तर से  भाग   देने   से   दोनों   निःशोष   पद द्वय   होते   हैं  इति |
                                                                                         उपपत्ति |
                 कल्पना करते हैं दोनों गु         क्रम से गु, गु तथा राशिमान = य-१/गु  इसको  गु से   गुणाकर   एक जोडकर र वगं के बराबर करने से गु-य- गु+गु/गु=र चोदगम से गु र=गु .य - गु + गु दोनों पक्षों को (गु) गुणा करने से गु  र = गु गु य - गु य - गु गु +गु  प्रथम पक्ष का मूल = गु र, द्वितीय पक्ष गु. गु य - गु गु +य  इसकी वगंप्रकृति से प्र्कृति = गु. गु , क्षेप= गु  - नु .गु, यहां कनिष्ट् = १, ज्येष्ट् = गु, क्षेप=गु .- गु .गु 'इष्टवगंप्रकृत्योयंद्विवरं ' इत्यादि भास्करोक्त्  सूत्र से क = २ ड/ गु.गु इ, ज्ये = गु.गु + इ/ गु.गु इ, क्षेप= १ समास भावना से क= २ गु.इ+गु.गु+इ/गु.गु इ , ज्ये= २ गु.गु.इ+गु.गु +गु.गु इ यहां कनिष्ट् (य) का मान होता हे यदि इ = नु तव उत्थापन से राशि =  य-१/गु                       =[{३ गु.+गु.गु }^२ - १]/गु .(गु गु)/गु ={ (३ गु +गु)^२/गु गु -१}/गु = (६ गु^२+६ गु.गु +गु^२/गु^२-२ गु.गु +गु^२-१)/गु= गु^२ +गु.गु/(गु मु ^२)/गु = (गु+गु)/ गु मु प्रब पालाप से प्रथम पद = i 

— v f " *pf 1 ^ ( *rr* + to* ) + ( «n* — ) . .-. ^ ^ = » TO" j fo^+TO^-H'TT*--^) J * ?tct Winter ffqTq>r^^TT^% ^TcBt q^sr ?tw#t s#far> 5T^7%: I sp?*qt ^# ^ ^ (^-fT'), ^ 5* («T*— T*) ^TT ^ft#TF^ — ^ q* — ? fl^W— V ^ q* qWPRHT fc^T ^TTcft l T8fft — V

द्वितीय पद = (३ गु^१ - गु/ गु ~ गु) इससे श्राचार्यात्त उपपन्न हुश्रा इति।


इदानीम् प्रश्नान्तरविशेषस्योत्तरमाह।

वग्रोऽन्यकृतियुतोनस्तत्संयोगान्तराधंकृतिभक्तः। तद्गुरीगातौ युतिवियुतौ वर्गे घाते रूपयुते॥

सु० भा० - ययो राश्योर्युतियुतौ वर्गो भवतस्तथा घाते रूपयुते च वर्ग स्यात् तत्र राश्योरानयनाय कश्चिदिष्टो वर्गः कल्प्यः। स चान्येष्टवर्गेरा युत ऊनश्च् कार्यः। एव्ं राशिद्वयं यद्भवेत् तल्संयोगस्तदन्तराधंवर्गेरा भक्तो यत् फलमागच्छेत् तेन पूर्वसाधितौ द्वौ राशी गुरितात्रभीप्सितौ राशी भवतः। अत्रोपपत्तिः। कम्प्येते राशी -- २ इ^२ (या^२ + का^२)। २ इ^२ (या^२ - का^२) श्रत्र राश्योर्योगवियोगौ भवतोऽत श्रालापद्वय्ं घटते। श्रथानयोर्घातः सैकः = ४ इ^४ या^४ - ४ इ^४ का^४ + १ श्रयं वर्गः। श्रत आद्यन्तयोः पदयोः - २ इ^२ या^२, -१ श्रनयोद्विघ्नहतिं -४ इ^२ या^२ मध्यपदसमां कृत्वा पक्षौ - ४ इ^२ या^२ = -४ इ^४ का^४।

अतः २ इ^२ = २ या^२/का^४ = [(या^२ + का^२) + (या^२ - का^२)/{(या^२ + का^२) + (या^२ - का^२)}^२/२^२]

श्रत उपपद्यते यथोक्तम्॥

वि भा - ययो राश्योर्युतिवियुतौ वर्गो भवेतां, घाते रूपयुते च वर्गः स्यात् तत्र तयो राश्योर्ज्ञानार्थ कोपीष्टो वर्गः कम्पनीयः। सोऽन्येष्टवर्गेरा युतो हीनश्र्व कार्यः, तदा यद्राशिद्वय्ं भवेत् तयोर्योगस्तदन्तरार्धवर्गेरा भक्तो यल्लब्धं भवेत्तेन पुर्वानीतौ राशी गुरितौ तदाऽभीप्सितौ राशी भवेतामिति॥

                                       श्रत्रोपपत्तिः।

कम्प्येते राशी २ इ^२ (य^२+र^२), २ इ^२ (य^२-र^२) श्रत्र राश्योर्योगान्तरे त्रर्गौ भवतस्तेनाऽऽलापद्वयं घटत्ते। श्रनयोर्घातः ४ इ^४ (य^४-र^४)=४इ^४.य^४ - ४ इ^४.र^४ रूपयुतः ४ इ^४.य^४ - ४ इ^४.र^४ + १ तदा वर्गः स्यात्। तेनाऽऽद्यन्तयोमुं लयोः -२ इ^२.य^२ - १ द्विघ्नघातं -४ इ^२.य^२ मध्यपदससं कृत्वा जातौ पक्षौ -४ इ^२.य^२ = -४ इ^४.र्^४ पक्षौ र्^४ भक्तौ तदा -(४ इ^२.य^२/र्^२) = ४ इ^४ srw ^ ?fk srffgrr w % ( — 3 V*. *r*— ?) % feafiw to gtff * f » HPT » *■ V ^ —V 3* ^ rr w % ( — 3 V*. *r*— ?) % feafiw to gtff * f » HPT » *■ V ^ —V 3* ^ -२इ².२य²/र² पषो‌ ‌--२ इ² बक्तो तदा २ इ² = २य²/र² = {(य²+र²)+(य²+र²)/(य²+र²)/२}² एतावता सर्वमुपपन्नमाचाय्रोक्तमिति॥७२॥ हि भा- जिन दो राशइयोमं का योग ऋओर भन्तर करनए से वग्र होता है,तथा घात एक जोडने से वग्र होता है वहां दोनों राशियों के ॠआनयन के लइए कोई इष्ट्वग्र कल्पना रनी चहइए। उसमें ॠन्य इष्टवग्र को युत शोर हिन करना चाहिए।इस तरह जो राशिद्वय होता हेए उनके योग भें उन्हीं कै ॠन्तरघ्र वग्र से भाग देने से जो फल हो उससे पूव्र साघित राशिदय को गउरा करने से राशिद्वय होत इति। उपपत्ति। कल्पना करते हे राशिद्व्यय २ इ² (य²+ र²),२ इ² (य²‌ ‌-र²) यहां इन दोनों यों का योग शोर वग्र हओता हे इसलियए दो शालाप घटित होते हें।दोनों के घात में रुप जोड्ने से ४ इ² (य²-र²) + १=४ इ².य²-४ इ²-र²+ १ वम्र् होता हे इसलिए प्रथम खण्ड शोर शन्तिम खण्ड के मुल (-२ इअ²,य²-१) के द्विगुरित भात ( -४ इ².य²) को म्घय पद के समान करने से -४ इ².य²=-४ इ².र² दोनों पषों को र² से भाग देने से - ४ इ².य²/र²=-४ इ²=-२ इ².२य²/र² पुनः दोनों पषों को र² से भाग देने से -४ इ².य²/र²= -४ इ²= -२ इ².२ य²/र² पुनः दोनों को -२ इ² इससे भाग देने से २ इ²= २ य²/र²= (य²+र²)+(य²+र²)/{(य²+र²)-(य²-र²)/२} इससे शाचायोर्क्त उपपन्न हुथा इति॥७२॥ इदानीं पुनः प्र्शनान्तान्तरविशेषस्योत्तरमाह। यरुनो यंशच युतो रुपेएच्रग्रस्त्देक्यमिष्टह्रतम्। इष्टोनं तसशलक्रतिरुनाSम्यधिका भवति राशिः॥७३॥ सु भा-को राशिरेतावदि रुपयुतस्तथेतावदि रुपेरुनशच वगो भवसीता प्र्शनोतराथं यं रुपेरुन्नो ययुं तशच वगो भवति तेषानमेक्यं केनचिदिष्टएन ह्रत्ं TifinW trafc ctt^tw% frriroPreT TrRnN^mf : i 3*ff SRfTFTT^^— ^r , =TT+?r, 'ft'^IT-^, sNfanrftr: i g^cii% TT%: = ^ I m T ^5 eft Tftfffn^ Wf TOtfe 5PRT- +T=2r «^taM^MR"fd>pHfcl II ^ II१२५४

  == 'ब्राह्यस्फुटसिद्धानते ==

  फलमिष्टोनं कार्यम् ।तस्य शोषस्य दलस्यर्धीकृतस्य कृतिरुनाऽभ्यधिका । यै रुपैरुनो 
  राशिर्वर्गो भवति तान्यूनरुपारि तंरुनंरभ्यधिका राशिर्भवतीत्यर्यः।
अत्रोपपत्तिः। कल्प्यते राशिमानम् =या १ । श्रत्र श्र्त्र-रुपैरुनरच
वर्गो भवतीति प्ररनालापेन- का² =या +श्र्त्र, नी² =या-क,
∵का‌²-नी² =श्र्त्र+क । श्र्त्रथ कल्प्यते का‌-नी=इ।
∵ का+नी=अ+क/इ, ततः सङ्क्र्मरोन नी=१/२{(श्र्त्र+क/इ‌)}
 श्र्त्रतः नी²=[१/२{(श्र्त्र+क/इ‌)}]२=या- क
  ततः या=[१/२{(श्र्त्र+क/इ‌)}]२=या+ क
 अत उपपद्यते यथोत्तुम् ॥७३॥
   वि•भा•− को राशी रुपैर्युतोऽन्यरुपैर्युर्हीनश्र्च वर्गो भवति तदैक्चं केनचिदिष्टेन भत्तुं लब्धमिष्टेन हीनं शोषस्यास्यार्धीकृतस्य कृतीर्हीनाऽभ्यधिकाऽर्थात् यैरुपैर्हीनो राशिवर्गो भवति तानि हिनरुपारि तैर्हीनैरभ्यषिका राशिर्भवतीति ॥
          श्र्त्रत्रोपपत्तिः।

कल्प्यते राशिः=य। ग रुपैर्यु तो हर् मरुपैर्हीनरश्र्च वर्गो भवतीति प्ररानालापेन का² =य+ग, ना²=य-म। श्र्त्रतः क² -न²=ग+म श्र्त्रत्र यदि क-न=इ तदा वर्गान्तरं राशिवियोभत्तुमित्यादिना क+न=ग+म /इ ततः संक्रमरोन न={(ग+म /इ/२)} ततः{(ग+म /इ/२)}²=य-म पक्षो मयुतो तदा {(ग+म /इ/२)}²+म=य एतेनोपपन्नमाचार्योत्तुमिति ॥७३॥

  श्र्त्रब पुनः प्ररानान्तरविशोष का उतर् कहते है।

हि·भा ·- कोन राशि है जिसमें रुप जोङने तथा श्र्त्रन्य रुप को हीन करने से न वर्ग होता है उन दोनों वर्गाङ्कों के योग को किरस्रि इष्ट से भग देने से जो फल होता है उस्रमें ST — ^

              वर्गप्रकृति:

से इष्ट को से जो शेष रहता हॅ उसके भ्राधे का वर्ग हीन रूप हॅ उसको जोडने से राशि प्रमारग होता हॅ इति।

                   उपपत्ति।

कल्पना करते हॅ राशिप्रमारग=य। इसमे ग रूप को जोडने से वर्ग होता हॅ तथा म रूप को धटाने से वर्ग होता हॅ इस प्रश्नालाप से क२ =य + ग। न२=य-म ,भ्रत: क२-न२=ग+म्, यदि क-न =इ तव वर्गान्तरं राशिवियोगभक्तं इत्यादि भास्करोक्ति से क+न=ग+म/इ भ्रत: संक्रमरग से १/२{(ग+म/इ)-इ}=न वर्ग करने से [१/२{(ग+म/इ)-इ)}]२=य-म दोनो पक्षो मे भ जोडने से [१/२{(ग+म/इ)-इ}]२+म=य इससे श्राचार्योक्त उपपन्न हुश्रा॥७३॥

          इदानीं प्रश्नान्तरस्योत्तरमाह्।

थाभ्यां कृतिरधिकोनस्तदन्तरं हृतयुतोनमिष्टेन। तद्दलकृतिरधिकोना२धिक्योरधिकोनयो राशि:॥७४॥ सु.मा.-को राशिरुद्दिष्टराशिभ्यां युक्ति:कृतिर्भवति।वा को राशिरुद्दिष्टराशिभ्यामून: कृतिर्भवतीति प्रश्ने याभ्यामुद्दिष्टाभ्यामधिको वोन:कृतिर्भवति लदन्तरमिष्टेन हृतं योगप्रश्न इष्टेनॅव युतमूनप्रश्न इष्टेनॅवोनं कार्यम्।यन्तिष्पन्नं तद्दलस्य कृतिरधिकोद्दिष्टराशिना कार्या श्रधिकयोरुद्दिष्टराश्यो:।उददिष्टराश्योश्चाधिका कार्या। एवं राशिर्भवति। भ्रत्रोपपत्ति:।कल्प्यते राशिमानम्=या।यश्च श्र-क-राशिभ्यां युतो।तथा अ>क तदा प्रश्नानुसारेरग- का२=या+श्र नी२=य+क का२-नी२=श्र-क } सङ्कमरगेन

             का=ल+इ/२
           तत:या=का२-अ

का-नी=इ

का+नी=श्र-क/इ=ल   
                      ब्राह्मस्पुटसिद्धान्ते
                  

एवमून प्रनमून प्रश्ने का = या - त्र्य नी २ = या - क } नी २ - का २ =श्न - क् } सङ्क्रमऐन

                                           का = ल - इ/२

नी + का = श्न- क/इ = ल } ततः या

                     अत उपपद्यते ||७४||
 वि.भा.- स को राशिर्य उद्दिष्टराशिभ्यां युक्तो हीनो वा कृति (वर्गः) र्भवति, श्नत्र याभ्यामुद्दिष्टराशिभ्यमं युत्त्को हीनो वा वर्गो भवति तदन्तरमिष्टेन भत्त्क योगप्रश्ने इष्टेन हीनं विघेयम् तदा यद् भवति तदर्घस्य वर्गोSघिकोद्दिष्टराशिना हीनः कार्यः, -श्नचिकयोरुद्दिष्टराश्योः | उद्दिष्टराश्योरल्प्योरघिकः (युत्त्कः) कार्यः,-तदा राशिर्भवति ||
                    श्नत्रोपपत्तिः |
 कल्प्यते राशिः = य,यो हि न,म उद्दिष्टराशिसभ्यां युतो वर्गः स्यात् | भत्र न > म तदा प्रश्नानुसारेरा य + न = क^2 , य + म = ब^2 ततः क^2-व^२= न - म  श्नत्र यादि क - व = ह तदा वर्गान्तरं राशिवियोगभत्तमित्यादिना न - म/ह = क^२/इ = क + व = र तदा संक्रमएन र+इ/२ = क , अतः य = क^२ - ना तथा राशिरुद्दिष्टाभ्यां हीनो वर्गा भवतीति प्रश्ने क^२ = य - न | य ‌- न | य ‌- म = व^२ ततः व^२- क^२/व - क = व+क =    न -म/इ = र ततः संक्रमएन र-इ/२क = क| य = क^२ + न श्नत्र आचार्याक्त्तमुपपन्नम् ||७४ ||
                      श्नब पुनः प्रश्नान्तर का उत्तर कहते है|
  हि.भा.-कौन राशि है जिसमे उद्दिष्ट राशिद्वय को जोडने से वा घटने से वर्ग होता है,यहां जिन उद्दिष्टराशिद्वय को जोडने वा घटाने से वर्ग होता है उन दोनों  उद्दिष्टराशियों के श्नन्तर को इष्ट से भाग देने से जो लब्धि हो उसमें इष्ट को  जोडने योग प्रश्न में | हीन प्रश्न में इष्ट को हिन करना तव जो हो उसके श्नधिक उद्दिष्टराशि को घटाना चाहिए,श्नल्प  उद्दिष्टराशि को जोडना चाहिए तव राशि प्रमारा होता है इति |                        


                            वर्गप्रकूतिः                                १२५७
                            उपपत्ति । 


  कल्पना करते है राशि = य , इसमें उद्दिष्टराशिद्वय को जोडने से वर्ग होता है , न , म
       उद्दिष्टराशिद्वय है , तथा न > म तब प्रश् न  के भनुसार य+न = क^२
                                                  य+म = व^२

भतः क^२-व^२ = न-म, यदि क-व = इ तब (क^२-व^२/इ) = (न-म/इ) = क+व = र, तब संक्रमरग से (र+इ/२) = क :. य = क^२-न, हीन प्रश्ने में य-न = क^२, य-म= व^२

:. व^२-क^२ = न-म । यदि व-क= इ तब (व^२-क^२/इ) = (न-म/इ) = व+क = र,
:.संक्रमरग से (र-इ/२) = क :. य = क^२+न इससे चार्योत्त् उपपन्न ह्रुश्रा इति ॥ ७४॥ 


                          इति वर्गप्रकूतिः। उदाहरणानि

तत्र प्रथमं वर्गप्रकृत्युदाहरणम् । राशिकलाशेषकृतं द्विनवतिगुणितां यशीतिगुणितां वा । सैकां नदिने वगं कुर्वन्नावत्सराद् गणकः ॥७५॥ सु. भा--राषिशेषकृतिं द्विनवति-९२ गुणितां सैकां वा कलाशेषकृति त्र्यशीति-८३ गुणित सेकां बुधदिने आवत्सराद्वर्णं कुर्वन्नपि स गणकोऽस्तीत्यहं मन्ये। प्रथमप्रश्ने प्र ६२ को १ ततो वर्गप्रकृतिसूत्रतः। क १ ज्ये १० क्षे = क १ ज्ये १० झे ८ भावनया, क २० ज्ये १८२ क्षे ६४ क ईं ज्ये २४ को १ क ईं ज्ये २४ क्षे भावनया, क १२० ज्ये ११५१ को १ अतो राशिशेषस्=१२० । एवं भावनया बहुधा राशिसेषं स्यादतः कुट्टक विधिनाऽभीष्टाहेऽहंगणः स्यात् । द्वितीय प्रश्ने गु ८३ क्षे १ ततः क १ ज्ये ६ क्षे २ क १ ज्ये ३ २ कं १८ ज्ये १६४ क्षे ४ क ईं ज्ये ८२ को १ भावनया कनिष्ठज्येष्ठयोरानन्त्यम् । ततः कलाशेषम् = & । कलाशेषात् कुट्टकविधिनाऽभीष्टदिनेऽहर्गणः स्यात् ।। ७५ ॥ वि. आ-- राशिशेषवणं द्विनवति (९२) गुणितं सैकं वा कलाशेषवर्ग यशी तिगुणितं सैकं बुधदिने वर्षपर्यन्तं वर्णं कुर्वन् स गणकोऽस्तीति । प्रथमप्रश्ने प्रकृतिः=९२, क्षेपः=१, तदा 'इष्टं हवं तस्य वर्गाः प्रकृत्या क्षुण्ण' इत्यादि भास्करोक्तसूत्रेण कनिष्ठम्=क+१, ज्येष्ठम्=ज्ये=१०, क्षेपः= क्षे== arc ^rrf^r i feNsr^ s$f?r:=^, £q- : = ? , <?rts % f>w «rra- ^ I fr=?, g#=?o, ^=c % tnr iftvm star 1 1 <rsr fpr fifa *r stfte if ?^%OTTO r ^

                                  उदाहरणानि

ततो भावनाथं न्यासः क=१, ज्ये= १०, क्षे=८

              क=१, ज्ये= १०, क्षे=८
      वत्राभ्यासौ ज्येष्टलध्वोस्तदैक्यम्य्त्यादि भास्करोत्त्क या कनिष्टम्=२०, ज्येष्ठम्=१९२, क्षे=६४, तत् इष्टवगंह्रुत: क्षेप इत्यादिनेष्टं = प्रकल्प्य जाता: कनिष्ठज्येष्ठक्षेपाः, कनिष्ठम्=४, ज्येष्ठम्=२४, क्षेपः=१, भावनार्थं न्यासः क= ४, ज्ये =१४, क्षे =१
          क= ४, ज्ये = १४, क्षे=१ ततः समासभावनाय क= १२०, ज्ये-११५१, क्षे=१,

ततः कुट्टकेनेष्ट्दिनेहगण: स्यादिति । द्वितीयप्रशने प्रकृतिः = १३, क्षेपः=१, 'तदेष्टं हस्वं तस्य वर्गं' इत्यादि भास्करोक्त्या कनिज्येष्ठक्षेपाः=क=१, ज्ये= ९, क्षे = -२, भावनार्थं न्यासः क्=१, ज्ये= ९, क्षे= -२ क= १, ज्ये= ९, क्षे= -२ ततः समासभावनया कनिष्ठज्येष्ठ क्षेपाः क= १८, ज्ये= १६४, क्षे = ४ अत्रेष्टं = २ प्रकल्प्य 'इष्टवर्गह्रुतः क्षेप' इत्यादिना रूपक्षेपे कनिष्ठज्येष्ठक्षेपाः क=१, ज्ये=८२, क्षे =१ एवं भावनयाऽ नेकवा कनिष्ठज्येष्ठे भवतः । स्रुतः कलाशेषमानम्=१, ततः कुट्टकेनेषटदिनेवऽहगंयए भवेदिति ॥७५॥

                     श्रब उदाहरणे को कहते हैं।
                     पहले वगं प्रकृति हके उदाहरण कहते हैं ।
 हि: भा : - राशिशेषवर्गं को ६२ से गुणा कर एक जोडने से जो होता है उसको वा कला शेष वर्गं को तिरासी ८६ से गुणाकर एक जोडने से जो जो होता है उसके वर्गं को बेधदिन में वर्षं पर्यन्तं करते हुए व्यक्ति गणक हैं इति ॥ १६५ ॥


प्रथमप्रश्ण में प्रकृति = ३२, क्षेप = १, तव 'इष्ठं हृस्वं तस्य वर्ग: प्रकृत्या क्षुणः' इत्यादि भास्करोक्त सूत्र से कनिष्ठ क=१, ज्येष्ठ= ज्ये=१०, क्षपं = क्षे= ८ श्रव भावना के लिये न्यास करते हैं

                     क= १ , ज्ये= १०, क्षे=८
                      क=१, ज्ये= १०, क्षे=८


'वज्राभ्यासे ज्येष्ठमध्वोस्तदेवयं' इत्यादि भास्करोक्त सूत्र से क्=१०, ज्ये= १९२, क्षे=६५, श्रव इष्ट =८ कल्पना कर 'इष्टवर्गं हृतः क्षेपः' इत्यादि भास्क्रोक्त सूत्र से क=१०, ज्ये=१६२, क्षे = ६४, श्रव इष्ट =८ कल्पना कर 'इष्टवर्गं हृतः क्षेपः' इत्यादि भास्करोक्त सूत्र से क= ५, ज्ये=२४, क्षे=१, पुनः भावना के लिये न्यास क=५,ज्ये= १४, क्षे=१

       क=५, ज्ये=१४, क्षे=१

समास भावना से क= १२०, ज्ये=११५१, क्षे=, श्रतः राशि शेष मान = , भावना से राशि शेष श्रनेकधा होता हैं। तव कुट्टक विधि से श्रभीष्ट दिना में श्रहगणा सुगमता ही से होता हैं। द्वितीय प्रश्ण में प्रकृति = ८३म, क्षे=१, तव 'इष्टं हृस्वं तस्य वर्गः' इत्यादि १२६० ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते से क=१, ज्ये==e, क्षे =-२। भावना के लिये न्यास क= १, ज्ये=&, क्षे = -२ क= १, ज्ये=e, क्षे =–२ समास भावना से क=१८, ज्ये=१६४, क्षे=४, अब इष्ट=२ कल्पना कर ‘इष्टवर्गाहृतः क्षपः इत्यादि से क= e, ज्येः -८२, ३ = १ एवं भावना से कनिष्ठ और ज्येष्ठ का आनन्त्य होता है । अतः कलाशेष=€ तब कुट्टक विधि से अभीष्ट दिन में सुगमता ही से अहगं ण होगा इति ॥७५॥

  • इदानीमन्यप्रश्नद्वयमाह ।

सूर्यविलिप्तांशेषं पञ्चभिरूनाहतं तया दशभिः । वगं बृहस्पतिदिनं कुर्वन्ना वत्सराद् गणकः ॥७६॥ सु. भा. -सूर्यविलिप्ताशेषं पञ्चभिरूनं पञ्चाहतं च बृहस्पतिदिने वग भवति । वा विलिप्ताशेषं तथैव दशभिरूनं दशभिराहुतं च वर्गो भवतीति प्रश्न मावत्सरात् कुर्वन्नपि स गणकोऽस्तीति । प्रथमप्रश्ने विलिप्ताशेषम् =या । ततः प्रश्नानुसारेण ५ या—२५ अयं वर्ग इष्टवर्गेण समः कृतः। ततः ५ या—२५=इ : या = इ'+२५ । यदि इ८५ तदा या= १० एवं द्वितीयप्रश्ने १० या = १००=इ' :. या= इ'+१०० । यदि इ१० तदा या=२०। विलिप्ताशेषात् कुट्टकेनाहर्गणानयनं सुगं- भम् ।। ७६ ।। वि.भा-सूत्रैविलिप्ताशेषं पञ्चभिर्हीनं पञ्चभिर्णितं व बृहस्पतिदिने वग भवति, वा विलिप्ताशेषं दशभिर्दानं दशभिगुणितं च वर्गा भवतीति प्रश्नोत्तर मावत्सरात कुर्वन् स गणकोऽस्तीति ॥ प्रथमप्रश्ने कल्प्यते विलिप्ताशेषम्=य, तदाऽऽलापानुसारेण ५ (य-५) इष्टवर्गेण समोऽयं वर्गः कृतः ५ (य-५)==इ२=५ य८२५ समयोजनेन ५ य=इ" +२५ पक्षौ पञ्चभिर्भक्तौ तदा य= = इ२+२५ , अत्र यदि इ८५ तदा २५५२५ य । =य८५° =१० । अस्मादहर्गुणज्ञानं सुगमम् । द्वितीयप्ररने आलापानुसारेण १० (य–१०) अयं वर्गे इष्टवर्गेण समः कृतः १० (य-१०)=इकु १०य - १०० उदाहरणानि १२६१ =इ’ समयोजनेन १० य=इ२+१०० अतः य= —इ२+१०० अत्र यदि इ= १० तदा य=१००+१००–२०० = २०, विलिप्ताशेषाऽकुट्टकविधिनाऽहर्गुणज्ञानं सुखेन भवेदिति ।।७६॥ १० अब अन्य दो प्रश्नों को कहते हैं । हि. भा.- सूर्य के विलिप्ता शेष में से पांच घटा कर पांच से गुणा करने से वृहस्पति दिन में वगं होता है । वा उसी तरह विलिप्ता चैष में से दस घटा कर दस से गुणा करने से बृहस्पति दिन में वर्ग होता है इन प्रश्नों के उत्तर एक वर्ष तक करते हुए व्यक्ति गणक हैं इति । प्रथम प्रश्न में कल्पना करते हैं विलिप्ता शेष मान=य । तब प्रश्न के आलापानुसार ५ (य-५) यह वर्ग है, इसको इष्ट वर्गों के बराबर करने से ५ (य-५)=५ य-२५=इ, दोनों पक्षों में २५ जोड़ने से ५ य=इ२+२५ अतः यः —:इ- +२५ , यहां यदि इ८५ तब य=२५ + २५५० = १० इससे कुट्टक विधि से अहर्गणानयन सुगम है । इसी तरह द्वितीय प्ररन में विलिप्ता शेष मान= य, तब प्रश्न के आलपानुसार १० (य-१०)=इ* इ२+१

= १० य-१००, दोनों पक्षों में १०० जोड़ने से १० य=इ२+१०० : य[सम्पाद्यताम्]

. यदि इ=१० तब य९०°२००-३००–२० इससे कुट्टक विधि से प्रहर्गण न सुगम है इति ।।७६। इदानीमन्या प्रश्नानाह भगणविशोषवर्ग त्रिभिर् णं संयुतं शतैर्नवभिः। कृतिमष्टशतोनं वा कुर्वन्नावत्सराद् गणकः ।।७७।। सुः भा–भगणादीनां भगण-राशि-कला-विकलानां शेषवणं त्रिभिर्गुणं नवभिः शतैः संयुतं चाऽष्टशतोनं वर्णमावत्सरात् कुबन्लॅपि स गणकोऽस्तीति । अत्र भगणादिशेषमानम्=:या। ततः प्रश्नालापेन प्रथमप्रश्ने ३ या'+&०० अयं वर्गः । अतः ७० सूत्रेण 5^ $f %00 5 «t t 500 v mfr imimf ^wrs^rfq <wikMt*m i ^cftf% II sf^r q% ^nft^as^o sr^r war. ^ffrs^s^iT: ^=^o, ^=^o, S^=^oo W=H*U ^S^S^TT^T^T^ I cleft f|. 5?T. - wjjTfe ( 5^-TT%-jRr-^rT-f^rT) tr*r tffrr I pr wmmyiK 3 »r*+io« «mnf | I «T|f 515fa=3, t 1^ *W *f 1 jrw^TT a^j:' tsmft % ^=?, w=? w

   ब्राह्मस्फुटसिध्दान्ते
         १२६२
            क १ ज्ये २ क्षे १
            क ३० ज्ये ६० क्षे ९००
            भावनया कनिष्ठज्येष्ठयोरानन्त्यम्।
            श्रतो भगरगादिशेषमानम्==३०। द्वितीयप्रश्नेप्येवम् ।
           ३ य२--८०० श्रयं वर्गः ।
           श्रतः क १ ज्ये १ क्षे २ 
               क २० ज्ये २० क्षे ८००
           रूपक्षेपपदाभ्यां भवनयात्रापि पदयोरानन्त्यम्।
           श्रतो भगरगादिशेषम्=२०॥७७॥
           वि.भा.--भगरगादि(भगरग-राशि-श्रंश-कला-विकला) शेषवर्ग त्रिभिर्गुणं
         नवभिः शतैः संयुतं वाSष्टशतोनं वर्गः स्यादित्यावत्सरात् कुर्वन् स गरगकोS-
         स्तीति ॥
              प्रथमप्रश्ने कल्प्यते भगरगादिशेषप्रमारगम्==य,तदाSSलापेन ३ य२+९००
         अयं वर्गः । श्रत्र प्रकृतिः==३ कल्प्यते कनिष्ठम्==१,तदा ज्येष्ठम्==२,क्षे==१,तदा
         क्षुणरगः क्षुणरगे तदा पदे इत्यादिनेष्टम्==३० प्रकल्प्य जाताः कनिष्ठज्येष्ठक्षेपाः
         क==३०, ज्ये==६०, क्षे==९०० श्रत्र भावनया कनिष्ठज्येष्ठयोरानन्त्यम् । ततो
         भगरगादिशेषमानम्==३० ।
                  द्वितीयप्रश्ने श्रालापानुसारेरग ३ य२--८०० श्रयं वर्गः । श्रत्र प्रकृति==३,
         क्षेपः==--८०० कम्प्यते कनिष्ठम्==१,तदा ज्येष्ठम्==१,क्षेपः==--२ श्रत्रापि 'क्षेपः
         क्षुणरगः क्षुणरगे तदा पदे, इत्यादिना इष्टम्==२० प्रकल्प्य जाताः कनिष्ठज्येष्ठक्षेपाः
         क==२०, ज्ये==२०,क्षे==--८०० रूपक्षेपीयकनिष्ठज्येष्ठाभ्यां तयो (कनिष्ठ-
         ज्येष्ठयोः) रानन्त्यम् । ततो भगरगादिशेषमानम्==२०॥७७॥
                        श्रब श्रन्य प्रश्नों को कहते हैं ।
              हि.भा.--भगरगादि (भारग-राशि-श्रंश-कला-विकला) शेष वर्ग कौ तीन से गुरगा 
       कर नौ सौ जौडने से वर्ग होता है वा श्राठ सौ को घटाने से वर्ग होता है इसको एक वर्ष
      पर्यन्त करते हुए व्यत्ति गरगक है । यहां भगरगादिशेष प्रमारग==य, है । तब प्रथम प्रश्न के
      श्रतः भगरगादि शेष==३०। 
                            उदाहररगान
      
           द्वितीय प्रश्न में प्रश्न के श्रालापानुसार ३ य २--८०० यह वर्ग है,श्रातः क ==१
            ज्ये==१,क्षे==--२।यहां भी 'क्षुणरगे तदा पदे' इस भास्करोक्ति से इष्ट==२०
          कल्पना करने से क==२०,ज्ये=२०,क्षे==--८००,यहां भी रूप क्षेपीय पदों से भावना
       द्वारा कनीष्ठ श्रौर ऊयेष्ठ श्रनन्त होगा,इसलिये भगरगादि शेष==२० इति॥७७॥
                            इदानीमन्यं प्रश्नद्वयमाह ।
                भगरगादिशेषवगं चतुगुरगं पञ्चषष्टिसंयुक्तम् ।
                षष्टचूनं वा वगं कुर्वन्नावत्सरादू गरगकः॥७८॥
          सु.भा.--स्पष्टार्यम्।प्रथमप्रश्ने भगरगादिशेषमानम् =या । ततः प्रश्नानु-
                   सारेरगा ४ या२+६५ श्रयं वर्गः।
               श्रत्रेष्टम्==२।६०/२=३०।३०+२=३२।३२/२=१६।
                १३--८।८/२==४।४/४=२।श्रतो भगरगादिशेषम्==२ रुपक्षप-
          पदाभ्यां भावनयाSSनन्त्यम्।
                द्वितीयप्रश्नेSप्येवं ४ या२--६० श्रयं वर्गः,
                 श्रत्रेष्टम्==२।६०/२=३०।३०+२=३२।३२/२=१६।
                     १६ २/४=८।श्रतोSत्र भगरगादिशेषम्==८। एवं बुध्दिमता ॠरगक्षेपे
                गुरगके वर्गे चाधिकसंख्यातः कनिष्ठानयनं कार्यमिति॥७८॥
                वि भा --भगरगादिनां (भगरग-राशि-भग-कला-विकलानां) शेषवगं 
            चतुर्गुणं पञ्चषष्टच युतं वर्गो भवति वा षष्टचा हीनं वर्गो भवतीति-श्रावत्सरात्
             कुर्वन् स गरगकोSस्तीति ।
                 प्रथमप्रश्ने कल्प्यते भगरगदिशेषप्रमारगम्==या, तदा प्रश्नामापानुसारेरग
                 ४य२+६५ श्रयं वर्गः स्यात् । श्रत्र प्रकुतिः=४, क्षेपः=६५, वर्गात्मकप्रकुतौ
                 कनिष्ठज्येष्ठयोरानयनार्थ 'इष्टभत्त्को द्विधाक्षेप' इत्यादि भास्करोत्त्कसूत्रेरगेष्टं 
                  ==५ कल्पनेन जातं कनिष्ठम्==२, रूपक्षेपीयकनिष्ठज्येष्ठाभ्यां भावनवा 
                SSनन्त्यम्, ततो भगरगादिशेषमानम्==२। द्वितीयप्रश्ने प्रश्नालापानुसारेरग ४य२
                --६० श्रयं वर्गः स्यात् । श्रत्रापि 'इष्ट भत्त्को द्विधक्षेप' इस्यादि भास्करोत्तचा
                कनिष्ठम्==८, श्रतो भगरगादिशेष मानम्==८ एवं वर्गात्मकप्रकुतोॠरगक्षेपेSधि-
                कसंख्यातः कनिष्ठज्ञानं कार्यमिति ॥७८॥
                            श्रब श्रन्य दो प्रश्नों को कहते है।
              हि.भा.--भगरगादि शेष वर्ग को चार से गुरगा कर पैंसठ जोडने से वर्ग होसा है, 5fh SR^cT jffaT |, ^B&Jf W5rrft^THH = ^ |5TT I ff#T SRff SRrT % 

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१२६४ ब्राह्मस्फुटसिध्दान्ते

वा साठ घटाने से वगं होता ह्ं इसको करते हुए व्यक्ति गएक हैं । प्रयम प्र२न में कल्पना करते हैं भगएदि शेषमान=य, तब प्र२न के आलापानुसार ४य२+६२ यह वर्ग है, यहां वर्गात्मक प्रकृति=४ है, क्षेप=६२ तब 'इष्टभक्ते द्विधाक्षेपः' इस भास्करोक्त सूत्र से इष्ट=२ कल्पना करने से कनिष्ठ=२, रूपक्षेपीय कनिष्ठ ऑर उयेष्ठ से भावना द्वारा कनिष्ठ ऑर ज्येष्ठ अनन्त होता है, इसनिये भगाएदिशेषमान=२ हूआ । द्वितीय प्र२न मैं प्र२न के थालापानुसार ४ य२-६० यह वगं है यहां भी 'इष्टभक्ते द्विधाक्षेपः' इत्यादि भास्करोक्त सूत्र से कनिष्ठ=६, अतः भगराएदिशेषमान=६ हूआ । एवं वर्गात्मक प्रकृति मैं ऑर ऋराक्षेप मैं अधिक संख्या से कनिष्ठानयन करना चाहिये इति ||७६||

                         इदानीमन्यं प्र२नमाह ।

इष्टभगरएदिशेषं द्विनवत्यूनं उयशीतिसन् गुरिएतम् । रूपेराए युतं खगं कुर्वन्नावत्सराड् गराएकः ||७६|| सु भा --इष्टभगराएदिशेषं द्विनवतिभि ६२ रूनं कार्यं शेषं न्न्यशीति ८३ संगुरिएतं रूपेरा युतं च वर्गभावत्सरात् कुर्वन्नपि स गराकोअस्तीति । इस्ष्टभगरादिशेषमानम्=या । ततः प्र२नालापेन- ६३ (या-६२)+१=६३ या-६३*६२+१ =८३ या --७६३६+१=८३ या --७६३५ =इ२ या = (इ२+७६३५)/८३ अत्र यदि इ=१ तदा या=६२ इदमेव भगरादिशेषमानम् ||७६||

वी भा इष्टभगरएदिशेषं द्विनवत्या १२ हीनं शेषं न्नयशीति ८३ गुरिएतमेकेन युतं वर्गः स्यादित्वावत्सरात् कुर्वन् स गराकोअस्तीति । कल्प्यते इस्ष्टभगरादिशेषमानम्=य, तदाआलापानुसारेरए ६३ (य-६२)+१=८३ य ८३*६२+१=८३य-७६३६+१=८३य-७६३५ श्रयं वर्गः स्यात् कल्प्यते ८३य-७६३५=इ२ पक्षो ७६३५ युतो तदा ८३य=इ२+७६३५ पक्षो ८३ भक्तो तदा (इ२+७६३५)/६३=य, अत्र यदि इष्टम्=१ तदा य=७६३६/८३=१२ इत्येव भगरादिशेषप्रमानम् ||७९||

                  अव अन्य प्र२न को कहते हैं । 

हि भा इष्ट भगरादिशेष मैं ६२ घटाने से जो शेष रहता है उसको ८३ से गुरएकर एक जोडने से वर्ग होता हैं एसको करते हुए व्यक्ति गरएक हैं । यहां कल्पना करते हैं भगरादिशेषप्रमानम् =य, तब प्र२न के भालापानुसार् ८३ (य-६२)+१=८३य-७३२६ prr ff?r ihss.ii ^ $0 ' 5^ Yo ^00 ^^ m = «.*(«*+0(«M-l) = srsnfr ^t^t q^TT vrrawssr^ ^p^t i

                     उदाहरएनि

+१=३य-७६३५ यह वगं है, कल्पना करते है ३य-७६३५=इ^२, दोनों पक्षों में ७६३५ जोड्ने से ३य=इ^२+७६३५, दोनों पक्षों को ३ से भाग देने से (इ^२+७६३५)/३ =य, यहां यदि इ=१ तब १+७६३५/३ = ७६३६/३ = ६२ = य यही भगसादिधेष-मान ह्रुप्रा इति ||७६||

                    इदानीं प्रश्नद्वयमाह|
           पधिमासशेषवगं त्रयोवशगुरपं त्रिभिः शतैर्युक्तम् |
           त्रिघनोनं वा घगं कुवंन्नावत्सरावू गरपकः ||८०||
  सु भा -त्रिघनेन सप्तविंशत्योनम् । शेषं स्पष्टार्थम् ।
  अत्राघिमासशेषमानम्=या । ततः प्रश्नालापेन
 प्रत्र वर्गप्रकृत्या, क १ ज्ये ४ क्षे ३
              क १० ज्ये ४० क्षे ३००
 अत्र रूपक्षेपपदाभ्यां भावनयाऽऽनन्यं कार्यम् । अत्र कनिष्ट-१० मघिमास शेषमानम् ।
 अत्र यदि क १ ज्ये ३ क्षे ४ । ततः ६८ सूत्रेरा। |
 रूपक्षेपे कनिष्टम् = (क ज्ये(ज्ये + १)(ज्ये + ३))/२ = (१*३(३^२ +१)(३^२ +३))/२

=(३*१०*१२)/२ = १८० ज्येष्टम् = {ज्ये+२}{((ज्ये+३)(ज्ये+१))/२ -१}

     = {३^२+२}{((३^२+३)(३^२+१))/२ -१}
     = ११*५६ = ६४६।
 एवं रूपक्षेपे पदे प्रसाध्य भावनयाऽऽनन्त्यं कार्यम्।द्वितीयप्रश्नेप्येवम् १३ या - २७ पयं वर्गः। 
 श्रत:    क १ ज्ये ४ क्षे ३
        क १ ज्ये २ क्षे ३
 भावनया क ६ ज्ये २१ क्षे २७
 प्रत्रापि रूपक्षेप पदाभ्यां भावनयाऽऽनन्त्यं कार्यम् ।
 प्रत्राधिशेषमानं व्यक्तम् = ६ ||८०|| १२६६

ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते वि. भा.-स्पष्टार्थम् । त्रिघनेन सप्तविंशत्या हीनम् । कल्प्यतेऽधिमास शेषप्रमाणम् =य, तदा प्रथम प्रश्ने प्रश्नोत्तया १३ य२+३०० अयं वर्गः स्यात्। अत्र प्रकृतिः= १३, क्षेपः=३००, इष्टं ह्रस्वं तस्य वर्गाः प्रकृत्येत्यादिना क=१, ज्ये=४, क्षे=३ ततः 'झुण्णः क्षुण्णे तदा पदेइति भास्करोत्तये ष्ट=१० प्रकल्प्य जाताः कनिष्ठज्येष्ठक्षेपाः क= १०ज्ये=४०, क्षे=३०० रूपक्षेपीय कनिष्ठ ज्येष्ठाभ्यां भावनया कनिष्ठज्येष्ठयोरानन्त्यम् । अत्र कनिष्ठम्=१०= अधिमासशेषप्रमाणम्=य । अत्र यबि क८१, ज्ये=३, क्षेक्षेः =-४ तदा ‘चतुरूनेऽन्त्य पदकृती येकयुते वधदल’ मित्याचार्योक्त सूत्रेण रूपक्षेपे कनिष्ठम् क.ज्ये (ज्ये२+१) (ज्ये२+३) _१४३ (३२+१) (३२+३) ३४१०x१२ =१८०, तथा ज्येष्ठम् ={ज्ये२+२} (ज्ये२+३) (ज्ये२+१)- }={२ } ३२+ (३+३॥(३२+१) -१ \ =११४५९=*६४९ एवं रूपक्षेपे कनिष्ठ- ज्येष्ठसंसाध्यभावनयाऽऽनन्त्यं कुर्यादिति द्वितीयप्रश्ने प्रश्नालापेन १३ य२-२७ अयं वर्गः स्यात् । अत्र प्रकृतिः=१३, क्षेपः =--२७ इष्टं ह्रस्वमित्यादिना क८१, ज्ये =४, क्षेपः= ३, तथा कनिष्ठम्=१, ज्येष्ठम्=२, क्षेपः =-९ अनयोर्भावनया क८६, ज्ये=२१, क्षेपः =--२७ रूपक्षेपकनिष्ठज्येष्ठाभ्यां भावनयाऽऽनन्यं कार्यम् अत्र कनिष्ठमधिशेषमानम् =६==य ॥८०॥ अब अन्य दो प्रश्नों को कहते हैं । हि- भा." अधिमास शेष वर्ग को तेरह से गुणा कर तीन सौ जोड़ने से वर्ग होता है, वा अघिमास शेष वर्ग को तेरह से गुणा कर सताइस घटाने से वर्ण होता है इसको करते हुए व्यक्ति गणक है इति ॥८०॥ = यहां कल्पना करते हैं अघिमास शेषमान=य, तब प्रथम प्रश्न में प्रश्नालाप से १३य२+ ३०० यह वगं है यहां प्रकृति=१३, क्षेप= ३००, ‘इष्टं ह्रस्वं तस्य वर्गः’ इत्यादि से क–१, ज्ये=४, ३= ३, तब ‘राणः सुराणे तदा पदे’ इस्र भास्करोक्ति से इष्ट=१० कल्पना करने से क= १०, ज्ये=४०, क्षे= ३०० रूपक्षेपीय कनिष्ठ और ज्यैष्ठ से भावना द्वारा कनिष्ठ और ज्येष्ठ की अनन्तता करनी चाहिये। यहां कनिष्ठ=१०=अधिमास शेष प्रमाण=य, हुआ, यहां यदि क-१, ज्ये= ३, क्षेः =-४ तब 'चतुरूनेऽन्त्य पदकृती येक युते’ आचायोंक्त में = क.ज्ये (ज्ये२+१)(ज्ये२+३) इत्यादि ६८ सूत्र से रूपक्षेप कनिष्ठः = २x३(३^२+२)(३^२+३)=३x२०x१२=१o,ज्ये={ज्ये+२} {(ज्ये^२+१)(ज्ये+३)-१}={३^२+२} {(ज्ये^२+)(३^२+३)-१}=११x२६=६४६,एवं रुपक्षेप मे कनिष्ट और ज्येष्ट साषन कर भावना से कनिष्ट की भनन्तता करनी चाहिये| एत्रं द्वितीय प्रष्न मे २३ य^२ - २७ यह् वर्गम् हे, " इष्टम् ह्रस्वम् तस्य वर्गः" इत्यादि से क=१, ज्ये=४, के=३, तथा क=१, ज्ये=२, क्षे=-६ इन् दोनो की समास भावन से क=६, ज्ये=२१, क्षे=-२७ यहा भी रूपक्षेपीय कनिष्टा भ्रोरा ज्येष्टा से भावना द्वारा कनिष्टा भ्रोर ज्येष्टा की प्रनन्तता करनी चाहिये यहां भ्रविमास शोष प्रमाणा=६=य, क्रुष्ट ||एo||

                  इदानीमन्यप्रष्नद्वयमाह् | 
          इन्द्रविलिप्ता शोषं सप्तवश मुखं त्रयोदषा मुखं चापि |
          पृथगेकयुतं यमं कुर्वन्नावत्सराधु मखकः ||

सु.भा.- स्पष्टाथेमू | ष्रुथ्र ७१ सूथ्रतः | गु=१७ | गु=१३, ततो विलिप्तशेषम् = १५ | वि.भा. - चन्द्रस्य विलिप्ताशोषं पृथक् सप्तदशगुरिथं, थयोदशरिथं च एकयुतं वर्गं आवत्सरात् कुर्वन् स गएको स्तीति| अत्र मुएक=गु=१७| गुएक:==गु=१३ तदा "गुएकयुतिरिष्टगुरिता गुराकान्तरवर्यभाजिते" त्याध्याचार्योक्तुत्रेए चिमिप्ताषोषम् = १४ १२६८ उदाहरणानि गुणक=गृ=१३, तब ‘शुणकयुतिरिष्टगुणिता गुणकान्तरभाजिता' इत्यादि आचयक्त सूत्र से विलिप्ताशेष= = = =हुँचें ८ (गु+गु) ८ (१७+१३)_८४३० - ८X३० - १७-१३) १६ गग ३० =१५, इति ॥ ८१ ॥ इदानीमन्यं प्रश्नद्वयमाह । अवमावशेषवणं द्वादशगुणितं शतेन संयुक्तम् । त्रिभिरूनं वा वगं कुर्वन्नावत्सराट् गणकः ॥ ८२ ॥ सु. भा.स्पष्टार्थम् । प्रथमप्रश्ने क्षयशेषमानस=या । ततः प्रश्नानुसारेण १२ या' +१०० अयं वर्गः । वर्गप्रकृत्या, क १ ज्ये ४ थे ४ क ५ ज्ये २० क्षे १०० अथ चतुः क्षेप पदाभ्यां ६७ सूत्रेण । रूपक्षेपे क = क (ज्ये'- १) _१ (४- -१)- १५ ज्ये= ज्ये (ज्ये'—३)_ = ¥ (४-३ )=-२६ । आभ्यां भावनयाऽऽनन्त्यं कार्यम् । अत्र क्षयशेषम्=५ । द्वितीय प्रश्नेऽप्येवम् । १२ या'-३ वर्गः । अतः क १ ज्ये ३ को ३ रूपक्षेप पदाभ्यामत्राप्यानन्त्यं कार्यम् । अत्र क्षयशेषम्=१ ४ ८२ ।। वि. आ.-स्पष्टार्थम् । कल्प्यते अवमशेषप्रमाणम् =य, तदा प्रथम प्रश्नाला- येन १२ य'+१०० अयं वर्गेः स्यात् । अत्र प्रकृतिः== १२, क्षेपः= १०० तदाकनिष्ठ १ प्रकल्प्य ‘इष्ट हस्वं तस्य वर्गे’ इत्यादि भास्करोक्तथा ज्येष्ठम् = ज्ये=४, क्षेप:==४ ततः क्रमेण न्यासः क=१,ज्ये=४, क्षेपः =४.अत्रेष्ट'=५ प्रकल्प्य 'क्षुण्णः क्षुण्णं तदा पदे’ इति भास्करोक्तश्च जाताः कनिष्ठज्येष्ठक्षेपाः क=५, ज्ये=२०, क्षे=१००, चतुःक्षेपीय कनिष्ठ ज्येष्ठाभ्यां ‘चतुरधिकेऽन्त्यपदकृतिरित्यादि आचार्योक्तसूत्रेण रूपक्षेपे कनिष्ठम = क (ज्ये२–१) – १४ (४२-१) – १६-१ X १५ उदाहरणानि १२६९ ज्ये (ज्ये–३)_४ (४-) =२ (१६-३)=२४१३=२६ । आभ्यां भावनया कनिष्ठ ज्येष्ठयोरनन्तत्वं विधेयम् । अतोऽवमशेषप्रमाणम् =५=य । द्वितीय प्रश्ने १२ य'—३ अयं वर्गः स्यात् । अत्र प्रकृतिः=१२, क्षेपः==-३ तदेष्ट ट्रस्वमित्यादिना क==१, ज्ये=३, क्ष =-३, रूपक्षपीय कनिष्ठज्येष्ठाभ्यां कनिष्ठज्येष्ठयोरत्राप्यनन्तत्वं विधेयम् । अतोऽवमशेषमानम्=१ ।। ८२ ॥ अब अन्य दो प्रश्नों को कहते हैं। हि- भा.-अवमशेष वर्गों को बारह से गुणा कर एक सौ जोड़ने से वर्ग होता है, वा अवम शेषवगं को बारह से गुणा कर तीन घटाने से वर्ग होता है इनका उत्तर करते हुए व्यक्ति गणक है इति ॥ ८२ ॥ कल्पना करते हैं अबमशेष प्रमाण=य, तब प्रथम प्रश्न के आलापानुसार १२ य'+१०० यह वर्ग है । यहाँ प्रकृति = १२, क्षेप=१०० तब ‘इष्टं हस्वं तस्य वर्ग:’ इत्यादि भास्करोक्त सूत्र से चारक्षेप में क=१, ज्ये=४, २=४, यहाँ इष्ट=५ कल्पना कर ‘सृष्णः कृष्णे तदा पदेइस भास्करोक्ति से क८५, ज्ये=२०, ३=१००, चारक्षेप सम्बन्धी कनिष्ठ और ज्येष्ठ से ‘चतुरधिकेऽन्यपदकृतिः' इत्यादि आचार्योक्त ६७ सूत्र से रूपक्षेप में कनिष्ठ= क (ज्ये११_१x (४-१) १६-११५ ज्ये = ज्येष्ठ — ज्ये (ज्ये'–३)_४ (४९-३) =२ (१६-३)=२४१३= २६ । इन कनिष्ठ और ज्येष्ठ से भावना के द्वारा कनिष्ठ और ज्येष्ठ अनन्त होता है, अतअवमशेषमान= ५= य, हुआ । द्वितीय प्रश्न में १२ य'—३ यह वर्ग है । यहां प्रकृति =१२, क्षेप=--३, 'इष्टं ह्रस्वं तस्य वर्गःइत्यादि से क८१, ज्ये= ३, क्षेः =-३, रूपक्षेपीय कनिष्ठ और ज्येष्ठ से भावना से यहाँ भी कनिष्ठ और ज्येष्ठ की अनन्तता होती है । अत: अवमशेष = १, हुआ इति ।। ८२ ॥ इदानीमन्यं प्रश्नमाह। खदिनेऽर्ककलाशेषं गुरुबिनविकलावशोषयुक्तनम् वर्गे वधं च संकं कुर्वन्नावत्सराद् गणकः ।।८३। सु. भा-बुधदिनेऽर्कस्य यल् कलाशेषं तदुगुरुदिनजेनार्कस्य विकलावशेषेण युक्तसूनं च वगै तथा तयोः कलाविकलाशेषयोर्वधं सैकं च वर्गमावत्सरान् कुर्वन्नपि स गणकोऽस्तीति । १२७० ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते अत्र ७२ सूत्रेण कल्पित एको वर्गः १६ । अन्यश्च ४ । ततः १६+४=२० । १६-४= १२ । २०+१२ ३२ - २ । अनेन गुणितौ २० । १२ जातौ राशी ४०/२४ ।। २०-१२१६ () अत्र प्रथमं ४० कलाशेषं द्वितीयं लघु २४ विकलाशेषम् । कलाशेषोल् कुट्ट केन बुधदिनेऽहर्गणः साध्यः । विकलाशेषाच्च कुट्टकेन गुरुदिनेऽहर्गणः साध्य इति । प्र३ ॥ वि. भा.--बुधदिने रवेः कलाशेषं यत्तद्बृहस्पतिदिनजेन रवेविकलाशेषेण युतं हीनं च वर्गों तथा कलाविकलाशेषयोर्वधं सैकं च वर्गमावत्सरात् कुर्वन् स गणकोऽस्तीति । वर्गाऽन्यकृतियुतोनस्तत्संयोगान्तरार्धकृतिभक्त' इत्यादि सूत्रेणैको वर्गाः = १६ कल्पितः । द्वितीयश्च=४, तदा १६+४८२० । १६-४८१२ २०+१२ ३२ ३२ == ३ = २। अनेन २०, १२ गुणितौ तदा राशी १६ (२९) भवेतास ४०। २४ अत्र प्रथमं =४०= कलाशेषम् । द्वितीयं=२४=विकलाशेषस् । झलासेषात् बुधदिने कुट्टकेनाऽहर्गणः साध्यःविकलाशेषात् कुट्टकविधिना बृहस्पतिदिनंऽहर्गणः साध्य इति ॥८३॥ ४२ अव अन्य प्रश्न को कहते हैं । हि. भा--बुध दिन में रवि के कलाशेष में बृहस्पतिदिनत्पन्न रवि के विकलाशेष को जोड़ने से और हीन करने से जो वर्ग होता है उस वर्ग को तथा कलाशेष और विकलाशेष के घात में एक जोड़ने से जो वगं होता है उस वर्ग को करते हुए व्यक्ति गएक हैं । यहां 'वर्गाऽन्यकृतियुतोनःइत्यादि आचार्योक्त ७२ सूत्र से एक वर्ग =१६ कल्पना किया, और द्वितीय वर्ग =४ तब आचायक्त ७२ सूत्र के अनुसार १६+४-२० । १६-४= १२ २०+१२L ३२ .३२ (२०. १२) =--२ इससे २०। १२ घृणा करने से दोनों १६ राशिमान होते हैं ४० । २४ इनमें प्रथम राशि=४०=कलाशेष, द्वितीय राशि=२४= विकलाशेष, कलाशेष से दुध दिन में कुट्टक विधि से अहर्गणानयन करना चाहिये, विकला शेष से कुट्टक विधिं द्वारा बृहस्पति दिन में अहर्गणानयन चाहिये। करना ^+^, =ill=y | Yo— Y=-^ = ^ | ^=^Y I Y Y ^ =YcRrl±^?=-iSf-=Yo | Yo-Y=^^ | -^-=?=;, ?^ = ^Y s% ii<syii ff. pfcr f«H«»Sm | fgrere% %spt |>m fcft ^TT:' ST^TCfa^ ^ % Y=^ss ^qfn j, ^ + _ _JV» rYo,Vo-V=^, V = ?S ?^=^Y sfRT: H?=fcf*TT trr, w?r fafer & srpqrrm ^ttt =rrf|% sfa 11**11 . १२७२ ब्राह्मस्फटसिद्धान्त स्तीति द्वितीयः प्रश्नः । । अत्र ७४ सूत्रेण । प्रथमप्रश्ने इष्टं ३ प्रकल्प्य । ६३-१२ ५१ १७+३ २०

  • ~= =१७ । ' ' => =१० १० =१०० । १००–६३

३७ इदमेव कलाशेषम् । द्वितीय प्रश्ने इष्टं २ प्रकल्प्य ६०-८ = ५२[सम्पाद्यताम्]

= २६ । २६--२ = - २४ = १२। १२=१४४। १४४+६०=२०४ इदमेव कलाशेषस् ॥८५॥ वि. भा–बुधदिनं रवेः कलाशेषं द्वादशभिः संयुतं वनं कुर्वत्र तथा त्रिषष्टश्च संयुतं च वर्गमावत्सरात्कुर्वन् स गणकोऽस्तीति प्रथमः प्रश्नः। वा तदेव कलाशेषं षष्टया हीनं वगं कुर्वन् तथाऽष्टाभिश्च हीनं वर्णमावत्सरात् कुर्वन् स गणकोऽस्तीति द्वितीयः प्रश्नः । याभ्यां कृतिरधिकोनं तदन्तरं हुतयुतोनमिष्टेनेत्याचार्योक्तसूत्रेण प्रथम प्ररने प्रकलप्य =-–१७, १७+३ = २० ६३-१२ ५१ इष्टं ३


= १०

(१०)'=१००, १००--६३=३७E=कलाशेषम् । द्वितीयप्रश्ने इष्टस्=२ कल्प- यित्वा ६०-८ = ५२ २६ २६२ = = १२। (१२)२=१४४, २४ १४४+६०= २०४८कलाशेषस् ॥८५॥ अब अन्य दो प्रश्नों को कहते हैं । हि- भा–बुध दिन में कलाशेष में बारह जोड़ने से तथा तिरसठ जोड़ने से वर्गको करते हुए व्यक्ति गणक हैं यह प्रथम प्रश्न है । वा कलाशेष में साठ घटाने से तथा आठ घटाने से वर्ग को करते हुए व्यक्ति गणक हैं यह द्वितीय प्रश्न है । याम्यां कृतिरधिकोनं तदन्तरं’ इत्यादि आचायक्त ७४ सूत्र से प्रथम प्रश्न में इष्ट ६३-१२ ५१ १७+३ = ३ कल्पना कर दी = १७, १०, (१०) = १००, १००-६३= ३७=कलाशेष, कलाशेष से खुध दिन में कुद्दक विधि से अहर्गणा ५२ नयन सुगमता ही से हो जायगा । द्वितीय प्रश्न में इष्ट-२ कल्पना कर ६° =- २४ =२६ । २६२८=१२, (१२)= १४४, १४४+६०=२०४८कलाशेष = इससे दुध दिन में कुदृक विधि से अहर्गणनयन करना चाहिये इति ।८५।। उदाहरएनि

इदानीमन्यान् प्ररनानाह ।

इन्दुविलिप्ताशेषाद्रविलिप्ताशेषमंशशेषं वा ।

भ्रथवा मध्यममिष्टं कुर्वन्नावत्सराद् गएकहः ॥८६॥

सु० भा०‌ ‌–––इन्दुविलिप्ताशेषात् रविलिप्ताशेषं वांश़शेषमथवाभीप्टं मध्यमं ग्रहमावत्सरात् कुर्वन्नपि स गएक्क्कोस्तीति प्रश्नक्त्रयम् । प्रक्त्र चन्द्रकलाविकलाशेषात् कुहकविधिनाहर्गएञानं तस्मादभीष्टमध्यमग्रहानयनं रवेः कलांशशेषानयनं च सुगमम् ॥८६॥

वि भा ‌––– चन्द्रस्य विकलाशेषात् रवेः कलाशेषमंश शषं वा,अथवेष्टं मध्यमं ग्रहं,वत्सरत् कुर्वन् स गएकोस्तीति । त्र प्रश्नत्रयमस्ति । चन्द्रस्य विकलाशेषात् कुहकेनाहर्गएनयनं कार्य तस्मादभीष्टमध्यमग्रहानयनं रवेः कलाशेषानयनमशं शेषानयनं च विधेंयमिति ॥८६॥

ब न्य प्रश्नों को कहते हैं ।

हि भा ‌––– चन्द्र के विकलाशेष से रवि के कला शेष् को वा त्र्तंशशेष को थवा इष्ट मध्यम ग्रह को करते हुए व्यक्ति गएक हैं,यहां तिन प्रश्न है । चन्द्र के विकलाशेष से कुहक विधि से हर्गएनयन करना चाहिये । उस से भीष्ट मध्यमग्रहानयन,तथा रवि का कलाशेषानयन, शशेषानयन सुगमता ही से हो जायगा इति ॥८६॥

इदानीमन्यान् प्रश्नानाह । जोवविलिप्ताशेषात् कुजमिन्दुं भौमलीप्तिकाशेषात् । रविमिन्दुभागशेषात् कुर्वन्नावत्सराद् गएकः ॥८७॥

सु० भा० ‌––– गुरुविलिप्ताशेषात् कुजं भौमकलाशेषाच्चन्द्रं चन्द्रभागशेषच्च रविमावत्सरात् कुर्वन्नपि स गएकोस्तीति ।

गुरोविकलाशेषाद्वा भौमकलाशेषादथवा चन्द्रभागशेषात् कुहकेनाहरर्गवएञानं ततोहर्गएदभीष्टग्रहञानं स्फ़्टमेवेति ॥८७॥

वि भा ––– बुहस्पतिविकलाशेषान्मड्५लं,मड्लकलाशेषाच्चन्द्रं,चन्द्रस्यांशशेषाद्रविमावत्सरात् कुर्वन् स गएकोस्तीति । ब्रुहस्पतेविकलाशेषात्,चा मड्५लस्य कलाशेषत् । वा चन्द्रस्यांशशेषात्कुहकविधिनाहर्गएनयनं कार्यम् । तस्मादिष्टमध्यमग्रहानयनं सुगममेवेति ॥८७॥ १२७४ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते अब अन्य प्रश्नों को कहते है । हि- भा.-वृहस्पति के विकला शेष से मङ्गल को, मङ्गल के कलाशेष से चन्द्र को, चन्द्र के अंश शेष से रवि को करते हुए व्यक्ति गणक हैं इति । बृहस्पति के विकलाशेष से, वा मङ्गल के कलाशेष से, अथवा चन्द्र के ग्रंशशेष से कुट्टक विधि से अहर्गणानयन करना चाहिये, अहर्गण ज्ञान से इष्टमध्यम ग्रहानयन स्पष्ट ही है इति ॥८७॥ इदानीं पूर्वप्रश्नोत्तरमाह । इष्टग्रहेष्टशषाद् घुगणो गतनिरपवत्तं संग णितैः। छेदविनैरधिकोऽस्मादन्यग्रहशेषमिष्टो वा ॥८८॥ सु. भा-इष्टग्रहस्येष्टकलाविकलादिशेषात् कुट्टकविधिना युगणोऽहर्गणः साध्यः । स च गतनिरपवर्तसगुणितैश्छेददिनैरिष्टाहत दृढ़कुदिनैरधिकोऽनेकधा स्यादरमादहर्गणादन्यग्रहस्य कलाविकलादिशेषं वा ऽभीष्टो मध्यमग्रह एव साध्य इति स्फुटमेव सिद्धान्तविदाम् ।८८॥ । वि. भा-इष्टग्रहस्येष्टकलाविकलादिशेषात्कुट्टकरीत्याऽहर्गणः साध्यः स इष्ट गुणितैश्छेददिनैः (दृढ़कुदिनेः) युक्तोऽनेकधा स्यात् । अस्मादहर्गणादन्यग्रहस्य कलाविकलादिशेषं साध्यं वा ऽभीष्टो मध्यम ग्रहः साध्य इति ॥८८॥ अब पूर्व प्रश्न के उत्तर को कहते हैं । हि. भा.- इष्टग्रह के इष्टकलाशेष, विकला शेष आदि से कुट्टक विधि से अह्गेण साघन करना चहिये, उसमें इष्ट गुणित दृढ़कुदिन को जोड़ने से अनेक प्रकार होते हैं । इस अहर्गण से अन्यग्रह के कलाशेष विकलादिश ष साधन करना चाहिये वा अभीष्ट मध्यमग्रह ही । साधन करना चाहिए ।।८८।। इदानीमुद्दिष्टाहुर्गणे ग्रहयोमॅगणदिशेषे ये ते एव पुनः कस्मिन्नहर्गणे भवेतामित्यस्योत्तरमाह । निश्छेदभागहारो ग्रहयोविपरीतौ प्रहयोश्च गणाः। यस्मात् तन्निश्छेदेनोद्धतयोर्लब्धसङगुणितौ ॥८em निश्छेवभागहारो विपरीतौ तद्युतात् पुनस्तस्मात्। शेषे घुगणावेवं श्यादीनां प्राग्वविष्टदिने ॥|०॥ उदाहरणानि १२८४

                   सु भा-(निश्छेदभागहारौ  ग्रहयोर्भगणादिशेषयोर्ध्युगणात्। यस्मात्  तन्निश्छेदेनोद्ध्रतयोर्लब्धसंगुणितौ ॥८३॥)

यस्माद् ध्युगणादहर्गणाद् ग्रहयोर्ये भगणादिशेषे भवतस्तयोर्यो निश्छेदभागहार्ौ स्वस्वदृढकुदिनसंज्ञौ तयोनिश्छेदेन महत्तमापवर्त्तेनोद्ध्ृ तयोस्तयोहंढकुदिनसंज्ञौ: सतोर्ये लब्धे ताभ्यां विपरीतौ निश्छेदभागहार्ौ गुणितौ । महत्त मापवर्त्तभक्त्त्तात् प्रथमदृढकुदिन संज्ञाद्यल्लब्धं तेन द्वितीयदृढकुदिनमानं गुण्यंद्वितीयलब्धेन च प्नथमदृढकुदिनमानं गुण्यमित्यर्थ: । एवं समच्छेदौ भवत:। तध्युतात् तस्मात् पूर्वसाधितसमच्छेदेन युतस्तदा योगसमेsहर्गणो पुनस्ते एव ग्रहयोर्भगणादिशेषे भवत इत्यर्थ:। एवं त्र्यादीनां ग्रहाणामिष्टदिने यानि भगणादिशेषाणि तानि पुन: कदेति प्रशनोत्तरं प्राग्वत् कार्यम् । द्वयोनिश्छेदभागहाराभ्यां पूर्ववत् समच्छेदं विधाय नूतनो निश्छेदभागहार: कल्प्य: । पुनरस्य तृतीयदृढकुदिनस्य च लधुतमापवत्त्योsन्वेषणीय: । एवमग्रेsपि कर्म कार्यम् । अंते सर्वदृढकुदिनानां यो लघुतमापवर्त्त्यस्तेन युतोsहर्गणा: कार्य: । योगसमेsहर्गनणो' च पुनस्तान्येव शेषाणि भवन्ति ।


                                                अत्रोपपत्ति:।

यदि ग्रहाणां हढभगणा: भ१,भ२,भ३, हढकुदिनानि च कु१,कु२,कु३,कल्प्यन्ते तथा हढकुदिनानां लधुतमापचर्त्त्यश्च अ ।तदा अ+अह अस्मिन्नहर्गणो हढभगणागुणो हढकुदिनह्रते प्रथमखण्डे निरवयवभगणा लभ्यन्ते ते प्रयोजनाभावाद्यदि त्यज्यन्ते तदोहिष्टाहर्गणाद्यद्भगणाशेषं तदेव अ+ अह अस्मादपि ।आचार्येणात्र द्वयोर्द्वयोनिश्छेदभागहारयोर्महत्तमापवर्त्तनविभक्तयो: सतोर्ये लब्धे ताभ्यामन्योन्यहारौ सङगुण्य लघुतमापवत्त्र्ये एवोत्पादित इति गणितविदां प्रसिद्धमेचेति ॥ ५१-१०॥

वि भा-यस्मात् घुगणात् (अहर्गणात्)ग्रहयोर्ये भगणादिशेषे स्तस्तयोनिश्छेदभागहारौ (स्वस्वहढकुदिनसंज्ञकौ) यौ तयोनिश्छेदेन (महत्तमापवर्त्तनेन) भक्त्तयोर्ये लब्धे ताभ्यां निश्छेदभागहारौ गुणितावर्थात् महत्तमापवर्त्तनभक्तात् प्रथमदृढ़कुदिनसंज्ञकाद्यल्लब्ध तेन द्वितीयहढकुदिनप्रमाणां गुणनीयं,द्वितीयलब्धेन प्रथमदृढ़कुदिमानं गुणनीयमेवं समच्छेदौ भवत: । त्तध्युतात् (पूर्वसाधितादहर्गणात्) पुनस्ते एव ग्नहयोर्भगणादिशेषे भवत:। I पूर्वसाधितसमच्छेदेनोहिष्टाहर्गणौ युतस्तदा योगसमेsहर्गणो पुनस्ते एव भगणादिशेषे भवत:। एवमिष्टदिने त्र्यादीनां ग्रहाणां यानि भगणादिशेषाणि तानि पुन: कदेतिप्रस्श्नोत्तरं पूर्ववत्कार्यम् । द्वयोनिश्छेदांशहाराभ्यां पूर्ववत् समच्छेदं विधाय नवीनोनिश्छेदभागहार: कल्पनीय:। १२७६ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते पुनरस्यतृतीयदृढकुदिनस्य च लघुतमापवर्त्यो गवेषणीयः। अग्रेऽप्येवमेव कर्म कार्यम्।अन्ते सर्वेषां दृढकुदिनानां यो लघुतमापवर्त्यस्तेनाहर्गणो युतस्तदा योगतुल्येऽहर्गणे पुनस्तान्येव शेषाणि स्युरिति ॥८९-९०॥

                अत्रोपपत्तिः।

यदि ग्रहाणां दृढकुदिनानि क,ख,ग,दृढभगणाः य,र,ल,कल्प्यन्ते,तथा दृढकुदिनानां लघुतमापवर्त्यश्च=प, तदा 'प+अहर्गण' ऽयमहर्गणो दृढभगणगुणो दृढकुदिनभक्तः प्रथमखण्डे निःशेषभगणाः समागच्छन्ति,प्रयोजनभावाते यदि न गृह्यन्ते तदोद्दिष्टादहर्गणाध्यद् भगणशेषं तदेवा 'प+अहर्गण'स्मादपि,द्वयोर्द्वयोदृढकुदिनसंज्ञयोर्महत्तमापवर्त्तनेन विभक्तयोर्ये लब्धी ताभ्यां परस्परं हारौ सङ्गुण्य लघुतमापवर्त्य एव सम्पादित आचार्येणेति॥८९-९०॥ अब उद्दिष्ट में अहर्गण दो ग्रहों के भगणादि शेष जो है वे ही पुनः किस अहर्गण में होंगे इस प्रश्न के उत्तर कोकहते हैं। हि.भा- जिस अहर्गण से दो ग्रहों के जो भगणादि शेष हैं उन दोनों के अपने अपने दृढ कुदिन को महत्तमापवर्तन से भाग देने से जो लब्धिद्वय होता है उन दोनों से विपरीत दोनों दृढकुदिन को गुणा करना चाहिए अर्थात् प्रथम दृढकुदिन संज्ञक को महत्तमाकवर्त्तन से भाग देने से जो लब्धि हो उससे दृढकुदिन को गुणना चाहिए और द्वितीय लब्धि से प्रथम दृढकुदिन को गुणा करना चाहिए,इस तरह करने से समच्छेद होता है। उस से युत पूर्व साधित अहर्गण से फिर दोनों ग्रहों के वे ही भगणादि शेष होते है अर्थात् उद्दिष्टाहर्गण में पूर्व साधित समच्छेद को जोडने से योग तुल्य अहर्गण में पुनः वे ही दोनों ग्रहों के भगणादि शेष होते हैं। इसी तरह तीन् आदि ग्रहों के इष्टदिन् में जो भगणादि शेष हों वे पुनः कब होंगे इस्का उत्तर पूर्ववत् करना चाहिए। दो ग्रहों के दृढकुदिन संज्ञकों से पूर्ववत् समच्छेद करके नये दृढकुदिन कल्पना करना फिर इसके और तृतीय दृढकुदिन के लघुतमापवर्त्य अन्वेषण (खोजना) करना चाहिए,एवं आगे भी क्रिया करनी चाहिए। अन्त में सब दृढकुदिनों के जो लघुतमापर्त्य हो उसके अहर्गण में जोड देना चाहिए तब योगतुल्य अहर्गण में पुनः वे ही शेष होंगे इति॥

                         उपपत्ति।

यदि ग्रहों के दृढकुदिन क,ख,ग, और दृढभागण य,र,ल कल्पना करते है तथा दृढकुदिन संज्ञकों के लघुतमापवर्त्य= प,तब प+अहर्गण को दृढभागण से गुणाकर दृढकुदिन से भाग देने से प्रथम खण्ड में निःशेष भगण लब्ध होता है, प्रयोजना भाव से यदि उसको छोड देंते हैं तब उद्दिष्ट अहर्गण से जो भगणादि शेष होता है वही प+अहर्गण,इससे भी,आचार्य ने यहां दो ग्रहों के दृढकुदिन को महत्तमपवर्त्तन से भाग देने से जो लब्धिद्वय उदाहरणानि १२७७ होते हैं उन दोनों से परस्पर हारों को गुणाकर लघुतमापत्यं ही उत्पादित किया इति || ५६ - ६० ||

                      इदानीमन्यान् प्रश्नानाह |
        द्यु गणमवमावशेषाद्नविचन्द्रौ मध्यमौ स्फुटावथवा |
        एवं तिथिं ग्रहं वा कुर्वन्नावत्सराद् गणकः ||६१||

सु.भा. -अवमावशेषात् क्षयशेषाद्द्युगणमहर्गणं वा मध्यमौ रविचन्द्रावथ वा स्फुटौ रविचन्द्रौ वैवं तिथिं वा ग्रहमिष्टग्रहं भौमाद्यन्यतममावत्सरात् कुर्वन्नपि स गणकोsस्तीति पञ्च प्रश्ना अत्र ||६१||

वि.भा. - अवमावशेषादहर्गणं वा मध्यमौ रविचन्द्रौ, अथवा स्फुटौ रविचन्द्रौ, वैवं तिथिं वेष्टग्रहं मङ्गलाद्यन्यतममावत्सरात् कुर्वन् स गणकोsस्तीति | अत्र प्रश्नाः सन्ति ||

हि.भा. - जो व्यक्ति अवमवशे से अहर्गण को कहते हैं व मध्यम रवि और् मध्यम चन्द्र को कहते हैं अथवा स्फुट् रवि और चन्द्र को कहते हैं | वा तिथि को कहते हैं वा इष्ट ग्रह (कुजादि ग्रहों में किसी ग्रह) को कहते हैं वे गणक हैं| यहां पांच प्रश्न है इति ||९१||

                  इदानीमन्यान् प्रश्नानाह|
       एकदिनमवशेषं यद्गुणमेकं रविचन्द्रभगणोनम्|
       शुध्यति भूदिनभक्तं व्येकं चान्द्रैस्तदुक्तिरियम् ||६२||

सु.भा. - एकदिनसम्बन्ध्यवमशेषं यद्गुणं येन गुणमेकोनं भूदिनभक्तं शुध्यति वाsवमशेषं यद्गुणं रविभगणोनम् भूदिनभक्तं शुध्यति| वाsवमशेषं यद्गुणं व्येकं चान्द्रैश्चान्द्रदिनैर्भक्तं शुध्यति| अथेयं वक्ष्यमाणा तेषां प्रश्नानानामुक्तिरुत्तरोक्तिरिति ||६२||

वि.भा. - एकदिनसम्बन्ध्यवमशेषं येन गुणमेकहीनं कुदिन भक्तं शुध्यति| वाsवमशेषं येन गुणं रविभगहीनं कुदिनभक्तं शुध्यति| वाsवमशेषं येन गुणं चन्द्रभगणिन हीनं कुदिनभक्तं शुध्यति, वाsवमशेषं येन गुणमेकहीनं चान्द्रदिनैर्भक्तं शुध्यति| इदं वक्ष्यमाणा तेषां प्रश्नानानामुत्तरोक्तिः| अत्र चत्वारः प्रश्नाः सन्तीति ||९२||

अत्र अन्य प्रश्नों को कहते हैं|

हि.भा.- एक् दिनसम्बधी अवमशेष को जिस गुणक से गुणाकर, एक घटाकर १२७८ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते कुदिन से भाग देने से निःशेष होता है। वा अवमशेष को जिस गुणक से गणाकर रवि भगण को घटाकर कुदिन से भाग देने से निःशेष होता है । अथवा अवमशेष को जिस गणकाङ्क से गुणाकर चन्द्रभगण को घटाकर कुदिन से भाग देने से निःशेष होता है । वा अवमशेष को जिस गणकाङ्क से गणाकर एक घटाकर चान्द्र दिन से भाग देने से निःशेष होता है । आगे के विषय उन प्रश्नों की उत्तरोक्ति है इति ॥६२।। अथ प्रथमप्रश्नस्योत्तरमाह । इषुशरकृताष्टदिग्भिः १०८४५५ सङ गुणितादवमशेषकाद् भक्तात् । रूपाष्टवेदरसशून्यशरगुणं ३५०६४८१ दिनगणः शेषस् ॥॥३॥ सु.भा. -प्रवमशेषादिषु शरकृताष्टदिग्भिः १०८४५५ सशुणितात् रूपाष्ट वेदरसशून्यशरगुणं ३५०६४८१ भक्ताच्छेषं दिगगणोऽहर्गणो भवति । अत्रोपपत्तिः । कल्पदृढावमानि दिनगणगुणानि दृढावमशेषोनानि कल्पदृढकुदिनहृतानि फलं निरग्न' गतावमानि । अतो दृढकल्पावमानि भाज्यं दृढावमशेषमृणक्षेपं दृढकल्प- कुदिनानि हारं प्रकल्प्य यो गुणः सोऽहर्गणः स्यात् । तत्र लाघवार्थमाचार्येण रूपशुद्धौ शरशरवेदाष्टपंक्तिमितः स्थिरकुटकः कृतः । रूपाष्टवेदादिसंख्या कल्प कक्ष २५०८२५५००० ० == दृढकृदिनानि । तदानयनं चककदि१५७७१६४५०००० – ५००००४५०१६५१ = ५००००४९५५७३६ = ५५७३९ ००००४३१५५८३२& ५००००x&x३५०६४८१ ३५०६४८१ इहृदि अथ प्रसङ्गाद् दृढरविभगणकुदिनानयनं प्रदयंते । । ४३२००००००० ५०००x८६४०० ५००००x&xa६०० १५७७६१६४५०००० ००००X३१५५८३२९ ५००००x&x३५७६४८१ – ५००००४९४३X३२०० ~= ३२०० दृग्भ । एवं ८ ५००००x&X ३४११६८८२७ ११६८८२७ - वृकृदि ५७७५३३००००० = ५००००x११५५०६६ ककृदि १५७७६१६४५०००० ५०००० x ३१५५८३२९ – ५००००४३x३८५.०२२ = ३८५०२२ दृचभ ५००००X३४१०५१६४४३ १०५१४४४३ ॥ हृदि । वि. भा-अवमशेषात् १०८४५५ एभिगुणिता ३५०६४८१ एभिर्भक्तात्, यच्छेषं सोऽहणं णः स्यादिति ॥ उदाहरणानि १२७९ यदि कल्पदृढ़कुदिनैर्बढ़कल्पावमानि लभ्यन्ते तदाऽहग णेन किमित्यनुपातेन समागच्छन्ति स शेष गतावमानि तत्स्वरूपम् = दृकल्यावम¥अहगणcगतावम दृढ़ककुदिन इढ़ावमशे पक्षौ हढ़ावमशे एभिर्हनौ तदा दृढ़कल्पावम अहर्गण दृढ़ककुदिन दृढ़कल्पकृदिन दृढ़ककुदिन इढ़ावमशे _ दृढ़कल्पावम x अहर्गण-दृढ़ावमशे =गतावमानि । अत्र यदि इढ़ककुदिन दृढंककुदिन दृढ़कल्पावमं भाज्यं दृड़ावमशेषमृणक्षेपं दृढ़कल्पकुदिनं हारं कल्प्यते तदा कुट्टकेन योग णः समाग मिष्यति स एवाहंर्गणो भवेत् । अत्राचार्येण लाघवाथं रूपशुद्धौ (ऋणात्मकरूपक्षेपे) १०८४५५ गुणकं प्रकल्प्य स्थिरकुट्टकः कृतः । ३५०६४८१ इति दृढ़कुदिनानि सन्ति तदानयनं क्रियते । कल्पाबम = २५०८२५५०००० – ५००००x५०१६५१ ककुदि १५७७९१६४५०००० ५००००४३१५५८३२९ == ००००x&x५५७३३९ = ५५७३९ = दृढवम । ००००४९४३५०६४८१ ३५०६४८१ दृढ़कुदिन । अथ दृढ़रविभगणदृढ़कुदिनयोरानयनं प्रदश्यंते । करभगण __४३२००००००० - ५०००० ४८६४०० | ककुदिन १५७७९१६४५०००० ५०००० ४३१५५८३२९ ५००००x&x&६०० __००००४९४३X३२०० = ३२०० (५०००० x&x३५०६४८१ ५०००० xxxx ११६८८२७ ११६८८२७ । एवमेव च कल्पभगण__ ५७७५३३००००० - ककुदिन १५७७६१६४५०००० ५००००x११५५०६६ -००००X३x३८५०२२ -३८५०२२ ००००X३१५५८३२९ ५००००X३४१०५१९४४३ १०५१९४४३ _दृढ़ रॉ भगण अब प्रथम प्रश्न के उत्तर को कहते हैं। हेि. भा.-अवमशेष को १०८४५५ इससे गुणा कर ३५०६४८१ इससे भाग देने से शेष अहरौण होता है ।।१३।। उपपति। यदि कल्प दृढ़कृदिन में दृढ़ कल्पावम पाते हैं तो अहर्गण में क्या इस अनुपात से (Prefer) *w stmt | to = JE^x^ = gfp^T^T I^^T^T ^ie+'JKff — ■ ■ r = — 1 ■ ■ ■ > : =1crT^T, TfT

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१२६० ब्राहास्पुदसिद्वान्ते

शोष (शोषहित) गतवम प्रमारगा भ्राता है उसका स्वरुप = श्टकल्पवम * भ्रहग्र्रा / हदकल्पाकुदिन = गतावम + हदावमशै / हदककुदिन दोनोम पक्षो मो हदावमशो/हदककुदिन धटानै सै हदकल्पावम *षहगरागा/ हदककुदिन ‌- हदावमशो / हदककुदिन = हदकल्पवम * षहगरग- हदकल्पकुदिन = गतावम्,यहा यदि हदकल्पादम् को भाग्य, हदावमशोष को धोर हदकमल्पकुदिन को हार माना जाय तब कुद्रुक् बिधि सो जो गुराक् भ्रायगा वहि भ्रायगा वहि भ्रहग्ररा होगा , यहाम् शाचायम नै लाधवाय रुपक्षाप मो १०८४९९ कलपना कर् सिधर् कुट्र्क किया है, ३९०३४५९ यह् हदकदिन है, ईसका भ्रानयन करतो है।

    क्लपावम/ कल्पकुदिन = १४०२४४००००/१४७७६१६४४०००० = ४००००*४०१६४१/४००००३१४४३१६

=४००००*६*६*४४७३६/४००००*६*३४०६४१ = ४४७३६/३४०६४५१ = हदावम/हककुदिन हससो भ्रभिष्त सिदि हो हति॥स

     सब हदरविबमगरा हदकुदिन का भ्रानयन करत हो।

कल्परत्रिभगराअ/कल्पकुदिन = ४३२०००००००/२५७७६९६४५०००० = ५००००*५६४००/५००००*३२५५३२६ =४००००*६*६६००/५००००*६*३५०६४९ = २००००*६*३*३२००/५००००*६*३*२२६५५२७ =३२००/११६५५२७

=हदरवि सगरगा/हदककुदिन हसि तरह चं कल्पमगराअ/ कल्प कुदिन = ५७७५०००००/११६५५२७

५००००*११५५०६६/५००००*३१५५३२६= ५००००*३*३४०*२२/५००००*३*२०५२४४३[सम्पाद्यताम्]

३४०२२/२०४२६४४३ ५००००*११५५०६६/५००००*३१५५३२६ = ५००००*३*३४०*२२/५००००*३*१०५२६४४३= हद त्व्म् भगरा/ हद कुदिन ॥

   हदानीमवमशोषाद्रव्यान्य्नमाह।

जिनरसगोनिदरव ३२४६६२४ गुरपात शासिबसुक्रुतरस्ंभुतराम ३५०६५२ हतात। उदाहरणानि १२८१ _ ३२००x१०८४५५ क्षो-३२००४३५०६२८१ इ - ३४७०५६००० क्षो ११६८८२७ ११६८८२७ -३२००X३ इ -१०८३२०८ +९६ क्षो-6६०० इ अतो दृढभगणशेषम् ११६८८२७ =१०८३२०८ क्षो-११६८८२७ इ, । आचार्येण गुणहरौ त्रिभिः सङगुण्य दृढक्षयशेषसम्बन्धिदृढकुदिनहरे रवेर्भगणशेषम् =३२४e६२४क्षो-३५०६४८१ इ, इदं साधितमत इदं सर्वदा त्रिभिरपवर्यं तदा वास्तवमर्कदृढ़भगणशेषं ज्ञेयम् । यद्याचार्यानीतं भगणशेषं त्रिभिर्नापवर्यं तदा प्रश्नः खिलो ज्ञेय इति सुगणकंभृशं विचिन्त्यम् ।६४।। वि. भाः—इष्टावमशेषात् ३२४९६२४ एभिर्गुणात् ३५०६४८१ एभिर्भक्ता च्छेषंरविभगणशेषं भवेदिति ॥ । अथ पूर्वेसाविताहर्गण = १०८४५५xअवमशे - ३५०६४८१ इ, ततः अहर्गेण xदृढ़रविभगण = भगणात्मकरविः = दिन ३२००x१०८४५५ अवमशे-३२००X३५०६४८१ इ_३४७०५६००० अवमशे_ ११६८८२७ ११६८८२७ ३२००X३ इ १०८३२०८ अवमशे +९६ अचमशे–९६०० इ, अतो दृढ़ ११६८८२७ भगण शेषम् = १०८३२०८ अवमशे-११६८८२७ इ, अत्राऽऽचार्येण हरणको त्रिभिः संगुण्य दृढ़ावमशेष सम्बन्ध हरे रवेर्भगणशेषं साधितम् । तद्रविभगण शेषस्=३२४९६२४ अवमशे-३५०६४८१ इ । तेनेदं सर्वदा यदि त्रिभिरपवर्यं तदैव रविभगणशेषं वास्तवं बोध्यं, यद्याचार्योणानीतं भगणशेषं त्रिभिरपवत्र्यं न भवेत्तदा प्रश्न एव खिलो बोध्य इति ॥९४॥ | -= अब अवमशेष से रवि के आनयन को कहते हैं । हि- भा.-इष्टावमशेष को ३२४६६२४ से गुणाकर ३५०३४८१ इससे भाग देने से जो शेष रहता है वह रवि का भगणदोष होता है इति । उपपत्ति । पूर्वं प्रकार से प्रहर्गेण= १०८४५५ अवमशे-३५०६४८१, अतः प्रहर्गण दृढ़रविभगण ॐ _ = भयणात्मकर

                       ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते
 =३२०० * १०८४५५ प्रवमशे- ३२०० * ३५०६४८१ ई  = ३४७०५६००० प्रवमशे
  -------------------------------------   -----------------
                  ११६८८२७                       ११६८८२

- ३२०० *३ इ = १०८३२०८ भवमशे + ६ भवमशे - ६०० इ, प्रतः हढभगराशेष

             -------------
             ११६८८२७
= १०८३२०८ भवमशे - ११६८८२७ इ, यहां प्राचार्य ने गुणकं प्रोर हर को तीन से गुणा 
कर हढप्रवमशेष सम्बन्धी हढकुदिन हर में रवि का भगणशेष =३२४६६२४ प्रवमशे-

३५०६४८१ इ, यह साधन किया हैं इसलिये सर्वदा इसको तीन से प्रपवर्त्तनीय होना चाहिये तब ही रवि के भगण्णशेष को वास्तव स्रमभना चाहिये अन्यया प्रश्न खिल (प्रशुद्ध) समभना चाहिये ||६४||

                  इदानीमवशेषात्तिथ्यानयनमाह |
   
      गोऽगेन्दुखेश ११०१७६ गुणिताद् भक्तान्नख पक्ष यमरसेषु गुणैः |
      शेषमवमावशेषात्तिथयो ऽवमशेषकाद्विकलम् ||६५||
   सु ़ भा ़़ -प्रवमशेषकाद्विकलं वर्त्तमानतिथेर्भुक्तं मानं साध्यम् | शेषं स्पष्टम् |
      
                         अत्रोपपत्तिः |
   चान्द्रेभ्यो यान्यवमानि यच्च तच्छेषं तान्यवमानि तदेव शेषं च सावनेभ्य इति 'सावनान्यवमानि स्युश्चान्द्रेभ्यः साधितानि चेत्' - इत्यादि मिताक्षरायां स्वगोलाघ्याये भास्करेण स्फुटीकृतम् | अतो गतचन्द्रदिनः कल्पावमानि कल्पचन्द्रदिनर्भक्तानि फलं गतावमानि शेष्ं क्षयशेषम् |
 प्रतः  इखादि*कक्षदि | प्रयमभिन्नः |प्रतः क्षयदिनादि भाज्यं क्षयशेषमृणक्षेपं चान्द्रदिनानि हारं प्रकल्प्य
     -----------
        कचादि
यः कुहकः साध्यते तान्येव चान्द्रदिनानि गततिथयो भवन्ति | तत्राचार्येण लाघवार्थं रूपविशुद्धो स्थिरकुहकः साघितः स एवावमशेषगुणकः पठितः |प्रथ हढावमचन्द्रदिनञानार्थं न्यासः |
 कक्षदि = २५०८२५५००००    =५०००० * ५०१६५१
------  ------------    -----------------
 कचादि   १६०२६६६००००००   ५०००० * ३२०५६६८०
= ५०००० *६ * ५५७३६ = ५५७३६  =हक्षदि  प्रतो हढचान्द्रदिनान्येव हर इति सर्वं स्फुटम् |
  -----------------  -------  -----
  ५०००० *६ * ३५६२२०   ३५६२२०  हचादि

गणितागतमवमशेषम् ५००००*१ अनेन विभज्य लब्धमात्र हढावशेषं सुधीभिर्ञेयमिति |९१़ आर्यायामन्ये येऽवशिष्टा प्रश्नास्तेषामुत्तराणि क्षयशेषादहर्गणमानीय ततोऽहर्गणात् कार्याणि |६२ प्रार्यायां च ये प्रश्नस्ते१२८३ षामुत्तराणि कुट्टकविधिना स्फुटानि । आचार्येणापीह स्फुटत्वात् तेषामुत्त राणि नोक्तानीति ।।३५।। वि. भा.--अवमशेषात् ११०१७९ एतैर्गुणितात् ३५६२२२० एतैर्भक्ताच्छेषं तिथयो भवन्ति, अवमशेषकाद्वत्र्तमानतिथेर्भक्त मानं साध्यमिति । । अत्रोपपत्तिः। ‘सावनान्यवमानि स्युश्चान्द्रभ्यः साधितानि चेत् । सावनेभ्यस्तु चान्द्राणि तच्छेषं तद्वशात्तथेति सिद्धान्त शिरोमणौ प्रतिपादितम् । तेन चान्द्रभ्यो यान्यच मानि तच्छेषं च यत्तदेव शेषमवमानि च सावनेभ्यो भवन्ति, ततः कल्पचन्द्रदिनै ऍदि कल्पावमानि लभ्यन्ते तदा गत चान्द्रदिनैः किमित्यनुपातेन लब्धं गतावमानि कल्पावम x गत चान्द्रदि शेषमवमशेषं तत्स्वरूपम् = -ऋतावम+ कल्पैच एभिर्हनौ तदा कल्पावम xगतचान्द्रदि-अवमशे कल्पचांदिदि_=गतावम’ अत्र कल्पावमानि भाज्यं, अवमशेषमृणक्षेपं कल्पचान्द्रदिनानि हारं प्रकल्प्य कुट्टकेन यो गुणस्तान्येव गतचान्द्रदिनानि गततिथयो भवन्ति । तत्राचार्येण ऋणां स्मकरूप झेपे स्थिर कुट्टकः साधितः स एवावमशेष गुणकः पठितः। अथ दृढ़ावम कल्पावमदि – २५०८२५५०००० दृढ़चान्द्रदिनयोरानयनं क्रियते कल्पचोदितैर्वी०२९९०००००० १६०२९९०००००० ॐ ००००x५०१६५१ = ५००००४९x५५७३९ = ५५७३९ ५००००X३२०५९९८० ००००४९४३५६२२ ३५६२२० अतो दृढ़चान्द्रदिनान्येव हरः सिद्धः । गणितागतमवमशेष ५००००४९ मनेन विभक्त लब्धमत्र दृढ़ावमशेषं बोध्यमिति । ९१ लोके-अवशिष्टा अन्ये ये प्रश्नास्तेषामुत्तराण्यवमशेषादहर्गणं संसाध्य तस्मादहर्गणात्कार्याणि । ९२ श्लोके च ये प्रश्नास्तेषामुत्तराणि कुट्टकयुत्तया कार्याणीति ॥९५॥ अब अवमशेष से तिथि के आनयन को कहते हैं। हि. भा.-अवमशेष को ११०१७e इससे गुणाकर ३५६२२२० इन' से भाग देने से जो शेष रहता है वह तिथि होती है । अवमशेष से वर्तमान तिथि का भुक्तमान खाधन करना चाहिये इति ४५॥ उपपत्ति । चन्द्रदन से साबित अवम और जो अवमशेष होता है नही अवम और अबमदोष १२८४ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते सावन से भी होता है ‘गोलाध्याय में सावनान्यवमानि स्युश्चन्द्रभ्यः साधितानि चेद्इत्यादि श्लोक की मिताक्षरा में भास्कराचार्याक्त से स्पष्ट हैअतः कल्प चान्द्र दिन में यदि कल्पा- वम पाते हैं तो गतचन्द्र दिन में क्या इस अनुपात से सशेष (शेष सहित) गतावम आता है। . कल्पावम x गतचांदि। उसका स्वरूप= गतावम+ दोनों पक्षों में कल्पचांदि कल्पचांदि कल्पावम x गतचांदि-अवमशे इसको घटाने से गतावम, यहां यदि कल्पावम को भाज्य, कल्पचादि अवमशेष को ऋणक्षेपकल्पचन्द्र दिन को हार कल्पना की जाय तब कुट्टक विधि से जो गणक होता है वही गतचान्द्रदिन गततिथि होती है। वहां आचार्य ने ऋणात्मक रूप क्षेप में स्थिर कुट्टक साघन किया है वही अवमशेषका गुणक पठित हैं। दृढ़ावम और दृढ़चान्द्र दिन का कल्पावमदि – २५०८२५५०००० ५०००० x५०१६५१ श्रानयन करते हैं कल्पचदि १६०२९६०००००० ५००००X३२०५६८० _५०००० xx५५७३६ - ५५७३६ - दृढ़ावमदि अतः चान्द्रदिन ही हर ५०००० xxx ३५६२२० ३५६२२० दृढ़चांदि सिद्ध हुआ । गणितागत अवमशेष को५००००४९ इससे भाग देने से जो लब्ध होता है वह यहां अवमशेष समझना चाहिये । ११ श्लोक में अवशिष्ट जो अन्य प्रश्न हैं उन सबों के उत्तर अवमशेष से अहर्गण साधन कर उस अहर्गण से करना चाहिये । तथा €२ श्लोक में जो प्रश्न हैं उन सबों के उत्तर कुट्टक विधि से स्पष्ट हैं; आचार्यों ने भी इसी कारण से उनके उत्तर नहीं कहे हैं इति ॥६५॥ इदानीं पुनः प्रश्नान्तरं तदुत्तरं चाह। ए भागकलाविकीयं दृष्ट्वा विकलान्तरं च के दोषे । ऐक्यं द्विधाऽन्तराधिकहीनं च द्विभाजितं शेषे ॥६६॥ सु. भू-भागविकलं भागशेषं । कलाविकलं कलाशेषस् । अनयोरैक्यं तथाऽनयोविकलयोः शेषयोरन्तरं न दृष्ट्वा शेषे ते द्वे के स्त इति प्रश्नः । अथ तदुत्तरमाहैक्यमिति । ऐक्यं द्विधा स्थाप्यमन्तरेणैकत्राधिकमन्यत्र हीनं कार्यं ततो द्विभाजितं दलितं शेषे भवतः । अत्रोपपत्तिः । सङ,क्रमणगणितेन स्टा ।e६। वि. भा–भागविकलो (ग्रंशदोषं) कलाविकलं (कलाओ) एतयोरैक्च (पोगं) तथा विकलान्तरं (शेषयोरन्तरं) दृष्ट्वा ते शेषे के स्त इति प्रश्नः। ऐक्य sfsr%6R"H^==ir, ^mi^r^t, ^fcrfa^+T 33 ~^ — «TRmf5i5^ ^qq^r |tar f 1 m^r^ sNf^ir iftjg - "^fts^prftft fir fa" wfe % ^ t> ^ $t UMwraftT-" fori §t^t arf vnr. hww JT. M W Ri < ?fk 33% 3rTC ^ I I

उदाहरणानि (शेषर्योगं ) स्थानद्वये स्थाप्यमेकत्रान्तरेण युतमन्यत्र हीनं कार्य द्वाभ्यां भक्तं तदा शेषे भवेतामित्युत्तरम् ।

                                         अत्रोपपत्तिः

कल्पयते अंशशेषमानम्=य, कलाशेषमानम्=र, अनयोर्योगः=य+र=यो, तयोरेवान्तरम्=य‌-र= शृं =(य+र) + (यो‌-शृं) = य+र+य = २ य यो-शृं/ २ =य तथा यो - शृं= (य+र) - (य-र) = य+र-य+र = २ यो-श्र्ं/२=र, अत आचार्याक्तमुपपत्रभ्र् ॥१६॥


अब पुनः प्रश्नान्तर और उसके उत्तर को कहते हैं ।


हि भा - अंशशेष और कलाशेष का योग तथा उन्हीं दोनों शेषों का अन्तर जान कर वे दोनों शेष क्या हैं यह प्रश्न है । दोनों शेषों के योग को दो स्थानों में रख कर एक स्थान में अन्तर को जोड कर दूसरे स्थान में अन्तर को घटाकर आया करने से दोनों शेषों के मान होते हैं, यह उत्तर है ।


"योगोऽन्तरयुतहीनो द्विहत" इत्यादि से पहले कह चुके हैं, यहां भी 'ऐक्ध द्विधाऽन्तराधिकहीनं' इत्यादि से उसी संक्रमख की प्रक्रिया का पिष्टपेषख करते हैं, सिद्धान्तशेखर में ' योगोऽन्तरेखोनयुतो द्विभक्तः कर्मोदितं संक्रमखाख्यमेतत्' इससे धीपति तथा लीलावती में ' योगोऽन्तरेखोनयुतोऽधितस्तौ राशी स्मृतं संक्रमखाख्यमेतत्' इससे भास्कराचार्य ने भी आचार्योक्त संक्रमख कर्म के सद्दश ही संक्रमख कर्म कहा है इति ॥६॥


                                       इदानीं पुनः प्रश्नान्तरं तदुत्तरं चाह । 


                       तद्दर्गान्तरमाद्ये तदन्तरं चान्तरोद्धृतयुतोनमृ ।
                       वर्गान्तरं विभक्तं द्वाभ्यां शेषे ततो द्यु गखः ॥७॥


पु भोः - आद्येऽनन्तरोक्ते प्रश्ने यदि तयोः शेषयोवंर्गान्तरं तथा तयोरन्तरं १२८६

ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते चोद्दिष्टं भवेत् तदा वर्गान्तरमन्तरेणोद्धतं लब्धं चान्तरेण युतमूनं च कार्यम् । तत। द्वाभ्यां विभक्त शेषे भवतः। तत भागकलाशेषाभ्यां प्राग्वत् कुट्टकविधिनाऽहर्गणः साध्यः । अत्रोपपत्तिः। विषमकर्मणा स्फुटा ।e७॥ वि. भा.~आधे (अनन्तरोक्त) प्रश्ने यदि तयोः शेषयोर्वर्गान्तरं तथा तयोर न्तरं चोद्दिष्टं भवेत् तदा वर्गान्तरमन्तरेण भक्त लब्धं तयोर्योगो भवेत्, लब्धमन्त रेण युतं हीनं च विधेयं द्वाभ्यां भक्त तदा शेषे भवतः । ततोंऽशकला शेषाभ्यां पूर्ववत् कुट्टकेनाऽहगैणज्ञानं भवेदिति । य कल्प्यते अ शशेषमानम्=य, कलाशेषमान=र, तदा यूरॉ=य+र य–र यो+अ =यो । य-र=अन्तरततः संक्रमणेन :य । = यो-अ =र एतावताऽऽचार्योक्तमुपपन्नम् । अत्रापि ‘वर्गान्तरमन्तरयुतहीनमित्यादि विषमकर्म संज्ञकस्य गणितस्य पिष्टपेषणमेव कृतमाचार्येण ‘वर्गान्तरं स्वान्तर हृद्युतोनं योगो द्विभक्त विषमाख्यकर्म' अनेन श्रीपतिनाऽऽचार्योक्तविषमकर्म सदृशमेव विषमकर्मोक्तम्’ भास्कराचार्येणैतस्य नाम विषमकर्म न कथ्यते; अ शकलाशेषाभ्यां पूर्ववत् कुट्टकेनाहर्गण्णज्ञानं भवेदेवति ॥I९७lt अब पुनः प्रश्नान्तर और उसके उत्तर को भी कहते हैं। हि. भा.–यदि अंशशेष और कलाशेष का वर्गान्तर तथा उन्हीं दोनों का अन्तर उद्दिष्ट है तब वर्गान्तर को अन्तर से भाग देने से जो लब्ध हो उस में अन्तर को युत और हीन कर, दो से भाग देने से अशशेष और कलाशेष होते हैं, इन दोनों शेषों से पूर्ववत् कुट्टक विधि से अहर्गणानयन सुगमता ही से होता है ।।३६। " उपपत्ति । कल्पना करते हैं अथ शशेषमान=य, कलाशोषमान =र, तब य--*==वर्णान्तर, य–र प्र--अन्तर = य+= योग, अब योग और अन्तर ज्ञान से संक्रमण गणित से य, और र विदित हो जायेंगे, तब अ शश ष और कलाश ष ज्ञान से पूर्ववत् कुट्टक विधि से अहर्गेण ज्ञान सुगमता से हो जायगा। यहां आचार्य ने पूर्वोक्त विषम कमॅक्त प्रक्रिया लिख कर विषम कर्म का पिंष्ट पेषण किया हैं ।४७। य-र=अन्तर य



                              उदाहररााानि
                इदानीँ   रोषयोर्वगंयोग-योगाभ्यां तयोरानयनमाह ।
              कृतिसंयोगाद् द्विगुराााद्यु  तिवगं  प्रोह्यमूलं   यत्  ।
              तेन युतोनो योगो दलितः शेषे पृयगभीष्टे  ॥६५॥
          सु. भा.- एवं  भवितुमहंति  ।
          यदाऽनन्तरोक्ते  प्ररने  शेषयोर्वर्गयोगः शेषयोगरचोगः  शेषयोगरचोहिष्टो  भवत् तद            द्विगुरााात् कृतिसंयोगाच्छेषयोर्युतिवगं प्रोह्य शोषस्य थन्मूलं  भवते तबभ्र्दागकलाशेष-            योरन्तरं  भवते  तेन योगो  युतोनो दलितः  पृथगभीष्टे  भागकलयोः शेषे  भवत 
       श्रत्रोपपक्तिः । अत्रप्ररनानुसारेराा ।
       भारो ^+ करो^=वयु
       भारो + करो=यु
          २  भारो^ +२  करो^=२वयु
        भारो^ +२ भारो * करो + करो^=यु^ , द्वयोरन्तरेराा
        भारो^ -२ भारो * करो + करो^
        =( भारो + करो)^ = वयु-यु^
          भारो - करो=     /२ वयु-यु^
       श्रवशिष्टोपपक्तिः सङ् कमराोन स्फुटा ।६८॥
       वि.मा.- यदि पूर्वाेक्तरोषयोर्वर्गयोगः  शेषयोगश्र्वोहिष्टो भवेतदा  शेषयोर्द्वि-
  गुराााद्वर्गयोगाच्छेषयोयु  तिवगं   विशोध्थ  शेषस्य  मूलं   यक्तदंशकलाशेषयोरन्तरं 
  भवेत्  तेन  योगो युतोनोऽघितस्तदा  पृथगभीष्टेंऽशकलयोः  शेषे भवेतामिति  ॥
                           श्रत्रोपपक्ति :
     कल्प्यते  संशशेषप्रमाराास् =म , कलाशेषमानम्=र, य^+र^=वर्गयोगः ।
     य+र=युतिः  = यु, तदा २ वगंयो=२य^+२र^, (य+र)^=यु^=य^+२य.र
     +र^ श्रतः २ वर्गयोः – यु^= २ य^+२ र^ - (य^+र  य.र+र^)= २ य^
     +र  र^ - य^ -२ य.र – र^ = य^ + र^ - २य.र = (य - र)^ मूलग्रहराोन 
        /२ वयो – यु^ = य - र= श्रंसशे - कलाशे, ततो  विदिताभ्यामंशशेषकलाशेषयो-
     र्याेगान्तराभ्यां  संक्रमराोन  ते शेषे  (श्रंशकलयोः  शेषे)  विदिते  भवतः  एतेन  
       (२)  एतस्योक्तरमन्यरीताऽपि  भवति ,  यथा   ` वगं योगस्य  यद्राश्योयंतिवगं स्य चान्त-
  रमि ` स्यादि भास्करोक्त  सुत्रेराा  योग^ - वगं यो = (य+र)^ - (य^+र^)= य^+र  य.र

+र^ - य^ -र^ = २ य.र द्वाम्यां गुराानेन २ (योग^ - वगंयो) = ४ य.र ततश्र्वतुगुं राास्य घातस्य युतिवगंस्य चान्तरमि त्यादि भास्करोक्त सूत्रेराा योग - ४घात= य^ + २ य.र + र^ -४ य.र = य^ - २ य.र + र^ = (य - र)^ मूल ग्रहराोन य - र = भ्रन्तरम् ततः संक्रमराोन य, र भ्रनयो नं भवेदिति ॥

  सूत्रमुपपत्रम् ।
             अब शेषद्वय के वर्ग योग श्वोर शेषद्वय के श्वानयन को कह्ते हैं ।
       हि भा‌ यदि पूवो्रक्त शेषद्वय का वर्गयोग श्वोर शेषयोग उद्दिष्ट हो तव द्विर्गुनात 

वर्गयोग में से शे ष योग वर्ग को घटा कर् जो शे ष हो उसका मूल दोनोम् शेवों का श्वन्तर् होत हैं । योग् में इस् अंतर् को युग् श्वोर हीन कर् श्वाघा कर्ने से दोनों शे षों के प्रमारा होते हैं।

                  उपपत्ति ।
कल्पना कर्ते हैं ।


                                                    तव शेषद्वय

के योग श्वोर अंतर् ज्ञान से संक्रमरा से शे षों का मान विदित हो जायगा ।इस् प्र१न का उत्तर दूसगी रीति से भी हो सक्ता हैं जैसे वर्ग योगस्य यद्रारयोरित्यदि भस्करोत्क सूत्र से योग


इदानी पुन: प्रशनान्तरस्थोत्तरमाह ।

शेषवधाद् द्विक्रूतिगुरागात शेषंतरवर्ग संयुतान्मूलम् ।
शेषांतरोनयुक्तम्ं वलित्ं   शोधो प्रुयुगभीष्टे 

सु भा यदाSनन्तरोथ्क प्र१नै भागकलाशैषयोरंतरं वध्वश्चेति द्वियमुदिप्ट भवेत् सदा द्विक्रुतिगुरात् ।द्वयोर्या क्रुतिवर्गस्तेनाथा्रद्वेदै ग्रुराच्छेषवधाच्छेषांत् रवर्गसम्यु तन्मूलम् ग्र्राह्यम् । तच्छेषान्तरेररोन्ं दलितम् च प्रूथगभीष्टे भागकलाशेषे भवत: । उदहरराानि द्वयोयर्गिनब् भारो +र भारोxकरो=(भारो+कारो)२=(भारो+कारो)२=श्र२+व मुलग्रहराोरन, भारो+ करो= श्र +४व शेषवसना सड क्रमराोन स्पुटा ॥६६॥ चि. भा.--यादि प्र शकलारोषान्तरं घातरचेति द्वयमुहिष्टं भवेत्तदा द्विक्रूतिगुरा।त् (चतुग्रुरा।त्) शेषयोघ्राताछेषान्तरवग॔युतान्मुलं यत्ताच्च्छेषान्तारेरा हिनं युत्तं तदघै प्रुयगभीष्टेंशकला शेषे भदेता मिति ।

                                    श्रत्रोपपत्तिः ।

कल्पयते श्रशशेषभानम्==य, कलाशेषमनम्== र शेषायोरन्तरं=य- र, चतुग्रुरग- घातः == घा श्रन्तर्+४ घात ==(य_र) +४ य.र+ र+४ य.र =य+२ य.र+र==(य+र) मुलग्रहऐन य+र ==योग ।ततःयोग+श्रन्तर।र =य, योग_अन्तर।र=र, बीजगएि।ते चतुगु॔एास्य घातस्य युतिवग॔स्य चान्तरमि त्यादिन भास्कराचाय॔एा रसायोयाैगवघयोञेनाद्रारमन्तरञनायँ विगिः प्रदशितः, श्रत्राचायैएा रास्योरन्तरवघयोञा॔नाद्राशियोगज्जनायँ विघिः प्रदशितः, श्रत्राचायँएा रास्चोरन्तरवघयोजानं क्रुतं वस्तुतोनयोनं कारिचद् भेद् इति ॥९९॥

   श्रब पुनः प्ररनान्तर के उत्तर को कहते है ।
  हि. भा.__यदि पुर्वत्त प्रारन में श्रंश शेष श्रौर का श्रान्तर तया उन्ही दोनों 

का चतुगुँएिात घात उहिष्टा हो तब शेषान्तर वगे में चतुगुँरिएाित घात को जोड़ कर् जो मुल हो उस में से शेषान्तह्र को हीव श्रौर जोड़ कर श्राधा करने से श्रामीष्ट सा षदय का मान होता है इति ॥६०॥

                                उपपति ।

कल्पना करते है । श्रशश॓ ष=य, कलश् षा=,दोनों शे षो का श्रन्तर् =श्रं= य__र,चतुगुँ एाघात==४ घा,श्र+४ वा=(य- र )+४य.र=य__र य.र् +र+४ य.र=य+२ य.र=(य+र) मूल लेने से य+ र =वो, तब यो+श्र।र =य, योग-श्रं।र=र, बीजगएिात में चतुग्रएास्य घतस्य युतिवगँस्य चान्तरम् इत्यादि से भास्कराचायँ ने योग श्रौर घात के जान से रासचन्तर जानायँ विधि दिखलाइ॔ यहां श्राचाय॔ ने श्रन्तर श्रन्तर श्रौर् वध के जान से राशियोग सात्र किया है । वस्तुवः इन दोनों में कुछ भेद नहीं इति ॥६६॥॥ ब्राहाफुटसिद्धा

                इदानीं छात्रान् स्वव-यं कथयति।

ह्म्मत्रममी प्ररना: प्ररनामन्यानू सह्स्ररा: कुर्यात्। धन्येबेअन्तान् प्ररनानुन्तचैवं स्राधयेत कररगौ:

       सु भा‌ -ग्रमी पुवौ-  परनारछात्रारगौ ह्र्मत्रं ह्रदये  बौधाथमात्रमेवमया लिखिता:।एतान्  बुद्र वा बुद्धिमान् सहस्ररौन्यान् प्ररनान् कुयति।एवमुतथा पूवौतथा कराको साधनप्रकारेरचान्यदेतान् प्ररनानपि बुदिमान् साधयेत् प्ररनैअन्तरारग्नि रौष:॥१००॥
 वि भा --- अमी पुव्ंकथिता: प्ररना: छात्रारां हम्नात्रं (हदये ज्ञानाथेमात्रभेब्र)मया कथिता:।एतान्
ज्ञात्वा प्रतिभावान् सहस्ररन्यान्  प्ररनान् कुयत् एवं पुव्रतादा करण:(साधन प्रकार)अन्यिदतान् प्ररनान

प्रतिभावान् साधयेत् (तदुतरारिआ)॥१००॥

           श्रब छात्रों को त्र्प्रपना वक्तव्य् कहते हैं।

हि-भा- ये पूर्व् कथित् प्रश्न् समूह् छात्र्ं के ह्रुदय् मे केवल् बोध् के लिये कहे है।इन् प्रश्नों को मिधावी व्यक्ति समभ्त् कर थन्य् हाजारों प्रश्नो को करे, पूर्वोक्त् साधन् प्रकारों से भन्य् से दिये हुए प्रश्नों को भेए बुद्धिमान् साधन् करे श्रर्थात् उत्तर् करे इति॥१००॥

                          इदानीं प्रश्न्प्रश्ंसामाह्।
   
         जन् स्ंसवि वैवविवां तेजो नारायति भानुरिव भानाम्।
         कुहाकरारप्रश्नैः किं पुन्ः शातशः॥१०१॥

सु-भा-- गराकः कुहाकारप्रश्नैः पठितैरपि जनंसदि गराकजनसभायां दैवविदां तेजो नारायति भानां भानुरिव। पुनः सूत्रैः किं वक्तव्यमस्ति। प्रशनपाठैरेव गराको ज्योतिविदां मध्ये भानुरिव भवति तत्सूत्रज्ञानेन् पुनः किं भवतीति वर्णनातीतमित्यर्थ्ः॥१०१॥

वि-भा- कुहाकारप्रश्नैः पठितैरपि गराको जनसंसदि (ज्योतिवित्स्-भायां) ज्योतिविदां तेजो नारायति यथा सूर्यस्याग्रे नक्षत्रारां।तेजो नष्ट्ं भवति, श्रर्थात्प्रशनपठनमात्रेरौव गराको ज्योतिविदां सँउखे सूर्य् इव भवति तदा पुनःशतश्ः सूत्रादिपाठेव किं भवतीति॥१०१॥ १२९१ अब प्रश्न प्रशंसा करते हैं । हि- भा.-कुट्टाकार प्रश्नों के पठनमात्र से ही गणक ज्यौतिषिकीसभा में ज्यौतिषिकों के तेज को नाशकरते हैं जैसे सूर्य भगवान् नक्षत्रों के तेज (प्रकाश) को नाश करते हैं । अर्थात् प्रश्नों के पठन मात्र ही से गणक ज्यौतिषिकों के मध्य में नक्षत्रों के मध्य में सूर्य की तरह होते हैं तब फिर उन सूत्रों के ज्ञान से क्या होगा अर्थात् उसका वर्णन नहीं हो सकता है इति ॥ १०१ ॥ इदानमध्यायोपसंहारमाह । प्रतिस्त्रसम प्रश्नाः पठितः सोडू शकेषु सूत्रेषु । आर्यायधिकशतेन च कृ दृश्चाष्टादशोऽध्यायः ॥१०२॥ सु. भा–प्रतिसूत्रं मयाऽमी प्रश्नाः पठिताः । एवं सोदाहरणेषु सूत्रेषु आयत्र्यधिकशतेनायं कुट्टक नामाऽध्यायोऽष्टादशः। मधुसूदनसूनुनोदितो यस्तिलकः श्रीपृथुनेह जिष्णुजोक्त । हृदितं विनिघाय नूतनोऽयं रचितः कुट्टविधौ सुधाकरेण । इति श्री कृपालुदत्तसूसँसुधाकरद्विवेदि विरचिते ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त नूतन तिल के कुट्टकाध्यायोऽष्टादशः ॥१८॥ वि. भा--मया प्रतिसूत्रममी पूर्वोक्ताः प्रश्नाः पठिताः । एवमुदाहरण सहितसूत्रेषु आर्यायधिकशतेना (त्र्यधिकशतप्रमिताऽऽय्या) ऽयं कुट्टकनामाऽध्या- थोऽष्टादशोस्तीति । इति श्री ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते कुट्टकाध्यायोऽष्टादशः समाप्तः॥१८॥ अब अध्याय के उपसंहार को कहते हैं। हि. भा-हम ने पूर्वोक्त इन प्रदानों को प्रति सूत्र में पठित किया है । एक स्रौ तीन आर्याओं से जुड़क नाम का यह अठारहवां अध्याय है इति ॥१०२॥ इति ब्राह्म स्फुट सिद्धान्त में अठारहवां (कुट्टक) अध्याय समाप्त हुआ ।१८।। पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/२०१ स्कन्ताः कृच्छछकिचन्नध्य पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/२०३ ब्राह्मस्फटांसंद्धान्तः अथ शंकुच्छायादिज्ञानाध्यायः तत्र प्रथमं प्ररनानाह । दृष्ट्वा विनार्धघटिका योऽर्कज्ञोऽक्षांशकान् विजानाति । उदयान्तरघटिकाभिझतज्ज्ञेयं स तन्त्रज्ञः ॥१॥ सु. भा--योऽर्कज्ञो दिनार्धघटिका दृष्ट्वाऽक्षांशकाल विजानाति। एकग्र हस्योदयाद्यावतीभिर्घटिकाभिरन्यो ग्रह उदेति त उदयान्तरघटिंकास्ताभिर्हयोग ह योर्मध्ये यो ज्ञातो ग्रहोस्ति तस्माज्ज्ञातादपरं ज्ञेयं ग्रहं वा यो विजानाति स एव तन्त्रज्ञः सिद्धान्तविद्याविदित्यहं मन्य इति शेषः ।।१॥ वि. भा--योऽर्कज्ञो दिनार्धघटिका दृष्ट्वाऽक्षांशका विजानाति, उदया- न्तरघटिकाभिः (एकग्रहस्योदयादन्यो ग्रहो यावतीभिर्घटिकाभिरुदेति ता उदयान्तर घटिकास्ताभिः) ग्रहयोर्मध्ये यो ज्ञातग्रहो (विदितग्रहःऽस्ति तस्मादपरं ज्ञेयं ग्रहं वा यो विजानाति स तन्त्रशो (सिद्धान्त शास्त्रवेत्ता) ऽस्तीति ॥१॥ अत्र शछ कुच्छायादि ज्ञानाध्याय प्रारम्भ किया जाता है। उसमें पहले प्रश्नों को कहते हैं। हि- भा.-ओ रवि के ज्ञाता दिनाथं वटी को देख कर अक्षांश को जानते हैं अर्थाव जो व्यक्ति रवि और दिनाउँ घटी से अक्षांश को जानते हैं। वा उदयान्तर घटी (एक प्रह के उदय से दूसरे ग्रह जितनी घटी में उदित होते हैं वे उदयान्तर घटी हैं) से दोनों ग्रहों में जो बिदित ग्रह है उससे शेय ( ज्ञातव्य ) ग्रह को जानते हैं वे सिद्धान्त विद्या के पण्डित हैं इति ॥१॥ इंदानीमन्या प्रश्नानाह । अस्तान्तरघटिकाभिर्यो ज्ञाताज्ज्ञेयमानयति तस्मात् । मध्यगत युगभगणनानयति ततः स तन्त्रज्ञः ॥२॥ sfa iru /£. 977- — 3ft ajfa; TTf-*fa ?fhc ^ % P^HH I H ^ 3fR% | | sfa

                                                               ब्राह्मस्फ़्उटसिद्धान्ते 

सु भा - एकग्रहस्यानन्तरमएयो ग्रहो यावतीभिर्घटिकाभिरस्तं याति ता पस्तान्तरघटिकास्ताभिर्ज्ञाताच्चैकस्माद्ग ग्रहादन्यं ज्ञेयं ग्रहं य पानयति । तस्मात् स्पष्टज्ञेयग्रहात् मध्यमगतिं मध्यमज्ञेयं ग्रहं य पानयति । ततस्तस्मान्मध्यमज्ञे याद्युगभगखान् तस्य य पानयति स एव तन्त्रज्ञ इति ॥२॥

वि भा - एकग्रहस्यास्तानन्तरं यावतीभिर्घटिकाभिर्द्वितीयग्रहो स्तं याति ता पस्तान्तरघटिकास्ताभिर्ज्ञातादेकस्माद् ग्रहाज्ज्ञेयं ( ज्ञातव्यं ) द्वितीयग्रहं य पानयति । वा तस्मात् स्पष्टज्ञेयग्रहात् ज्ञेयं मध्यमग्रहं य पानयति, तस्मान्मध्यमज्ञेयग्रहातस्य युगभगखान् य आनयति स तन्त्रज्ञोऽस्तीति ॥२॥

                                                        पब पन्य प्रश्नों को कहते हैं । 

हि भा - जो व्यक्ति पस्तान्तर घटी ( एक ग्रह के पस्त के बाद द्वितीय् ग्रह् जितनौ घटी में पस्त होता है वह पस्तान्तर घटी है ) से विदित एक ग्रह् से ज्ञेय (ज्ञातव्य) द्वितीय ग्रह को लाते हैं पर्यात् जानते हैं । वा उस स्पष्टज्ञेय ग्रह से मध्यम ग्रह को जानते हैं वा उस मध्यम ग्रह से उसके युग भगख को जानते हैं वे सिद्धान्त विद्या के पण्डित हैं इति ॥२॥

                                                           इदानीमन्यान् प्रश्नानाह ।
                                         पानयति यस्तमोरविशशाड्कमानानि दीपकशिगौच्च्यात् ।
                                              शड्कुतलान्तरभूमिग्याने छायां स तन्त्रग्यः ॥३॥

सु भा - यो राहुरविचन्द्रबिम्बमानान्यानयति । दीपकशिकखौच्च्यात् प्रदीपोच्छ्रितेः शङकुतलान्तरभूमिज्ञाने प्रदीपतलाच्छङ कुमूलान्तरं शङकुतलान्तरम्। तदेव भूमिरिति शङकुतलान्तरभूमिस्तस्या ज्ञाने यश्छायामानयति स एव तन्त्रज्ञः ॥३॥

बि भा - यस्तमोरविशशाक्ङमानानि ( राहुरविचन्द्रबिम्बमानानि ) आनयति, प्रदीपोच्छ्रतेः शङकुतलान्तरभूमिज्ञाने ( प्रदीपतलाच्छङ् कु मूलं यावच्छंकुतलान्तरं तदेव भूमिस्तस्याज्ञाने ) छायामानयति स तन्त्रज्ञोऽस्तीति ॥३॥

                                                          पब पन्य प्रश्नों को केहते हैं । 

हि भा - जो व्यक्ति राहु-रवि और चन्द्र के बिम्बमान को जानते हैं । दीपशिखौच्च्य ( दीप की ऊंचाई ) से दीपतल और् शड्क मूल के अन्तर को जानते हैं । शंकुतलान्तर (दीपतल और शङकु मूल के अन्तर) से छाया को जानते हैं वे सिद्धान्त विश्वा के पण्डित हैं इति ॥३॥ शन्कुच्छायादिज्नानाध्यायः इदानेएमन्यं प्रश्नमाह्।

इष्तगृहौच्च्यज्नो यस्तदन्तरज्नो निरीक्षते तु जले। गृहभित्त्यग्रं दर्श्यति दर्पणे वा स तन्त्रन्यः॥४॥

सु भा-य इष्तग्रहौच्च्यज्न प्रात्मस्थनात् तस्य गृहस्थान्तरज्नश्च जले गृहभित्त्यग्रं निरीक्षते वा दर्पणे तगदग्र दर्शयति स एव तन्त्रज्नः॥४॥

हि भा-य इष्तगृहाउच्च्यज्नाता स्वस्थानात्तस्य गृहस्यान्तरज्नाता च जले गृहभित्त्यग्रं निरीक्षते वा दर्पणे तदग्रऑ दर्शयति स तन्त्रज्नोस्तीति॥४॥

इदानीमन्यं प्रश्नमाह।

छायादितीयभाग्रान्तर विज्नानेन वेति दीपौच्च्यम्। शन्कु च्छायाज्नो वा मूमेश्छयां स तन्त्रज्नः॥५॥

सु भा-यः शन्कुछायाज्नः(शन्कोर्ये द्वे छाये ते जानातीति शन्कुछायज्नः)छायाद्वितीयभाग्रान्तर्विज्नानेन छायायाः प्रथमच्छायाया द्वितीय भाग्रस्य द्वितीयच्छायाया यदन्तरं तस्य विज्नानेन दीपौच्च्यं वेत्ति वा भूमेर्भूमिमानाच्छायां वेत्ति स एव तन्त्रज्नः॥५॥

वि भा-यः शन्कुच्छायाज्नः(शन्कोर्ये छये ते जानातीति शन्कुच्छायाज्नः) प्रथम छायाया द्वितीयच्छायायाश्च यदन्तरं तदिज्नानेन दीपौच्च्यं जानाति वा भूमिमानात् छायां जानाति स तन्यत्रज्नोस्तीति॥५॥

इदानीमन्यं प्रश्नमाह।

गृहपुरुषान्तरसलिले यो द्रष्ट्वाग्रं गृहस्य भूमिज्नः। वेत्ति गृहौच्च्यं द्र्ष्ट्वा तैलस्थं वा स तन्त्रज्नः॥६॥ १२९८ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते सु. भा.-(गृहपुरुषान्तरसलिले यो दृष्ट्वाऽग्र गृहस्य भूमिज्ञः । वेत्ति गृहौच्च्यं दृष्ट्वा तैलस्यं वा स तन्त्रज्ञः ॥६॥ पुरुष द्रष्टा ग्रहपुरुषयोरन्तरे मध्ये स्थापितं यत सलिलं तस्मिन् जल गृह्यस्याग्रं दृष्ट्वा यो भूमिज्ञो जले यद् गृहाग्रस्य प्रतिबिंब तस्माद्गृहान्तरं नरान्तरं च यत् तमिपदेनोच्यन्ते तज्ज्ञो गृहौच्च्यं वेत्ति वा तैलस्थं गृहाग्रं दृष्टवा यो भूमिशो गृहौच्च्यं वेत्ति स एव तन्त्रज्ञ इत्यहं मन्य इति ।६।। वि. भा. -ोहपुरुषयोरन्तरे स्थापितं यज्जलं तस्मिन् गृहस्याग्रं दृष्ट्वा यो भूमिज्ञो (जले प्रतिबिम्बितस्य गृहाग्रस्य गृहस्य च यदन्तरं नरंतरं च यत्तद्भूमि शब्देन कथ्यते तज्ज्ञाता) गृहच्च्यं जानाति, वा तैलस्थं गृहाग्रं दृष्ट्वा यो भूज्ञिो गृहौच्च्यं जानाति स तन्त्रज्ञोऽस्तीति अत्र पुरुषशब्देन द्रष्टा ज्ञयः ) ।।६॥ । अब अन्य प्रश्नों को कहते हैं। हि. ना-गृह और पुरुष (द्रष्ट) के अन्तर में रखे हुए जल में गृह के अग्र को देखकर जो जल में प्रतिबिम्बित गुहाग्र और गृह के अन्तर और नरान्तर को जानने वाले यहौच्च्य को जानते हैं, वा जो जल में प्रतिबिम्बत ग्रहाग्र और गृह के अन्तर और नरान्तर को जानने वाले तेलस्थित गृहाग्र को देखकर हौच्य (ह की ऊंचाई) को जानते हैं वे सिद्धान्त विद्या के ज्ञाता है इति ॥६॥ इदानीमन्यं प्रश्नमाह। वीक्ष्य गृहागं सलिले प्रसार्य सलिलं पुनः स्वभूखाने । आनयति जलाद्भस्म गृहस्य वञ्च्यं स तन्त्रज्ञः । सु. मा-सलिले गृहाग्रं वीक्ष्य सलिलं च तस्मिन्नेव माग स्थानान्तरै प्रसार्य पुनस्तस्मिन् सलिले गृहाग्रं वीक्ष्यात्मसलिलान्तरे ये वेधद्वये ते स्वसंज्ञ तयोसने जलाद्गृहस्यान्तरं भूमि य आनयति वा गृहस्यौच्यं य आनयति स एव तन्त्रज्ञ इत्यहं मन्ये । विभा–जले गृहस्याग्र दृष्ट्वा जलं च तस्मिन्नव माग स्थानान्तरे प्रसार्य .. पुनस्तस्मिन् जले गृहस्याग्रं दृष्ट्वा स्वस्य जलस्य चान्तरे ये वेधस्थानद्वये ते स्वभू संज्ञके तयोर्जीने गृहजलयोरन्तरभूमिं य आनयति वा गृहस्यौच्च्यं य आनयति स तन्त्रज्ञोऽस्तीति | अब अन्य प्रश्न को कहते हैं । हि. आ-जल में ह के अग्र को देखकर जलको उसी मार्ग में स्थानान्तर (दूसरे शन्कुच्छायादिज्ऩानाध्याय: स्थान)मे फेलाकर फिर उसी जल मे गृह के श्रग्र को देखकर श्रोर जल के भन्तर मे जो बेधद्वय हे उसके ज्ऩान से गृह श्रोर जल की भन्तरभूमि को जानते हे वा गृहोच्च्य( गृह की ऊचाई) को जानते हे वे सिद्धान्त विद्ध्या के पण्डित हे इति ||७||

इदानीम् प्रशनान्तरमाह| ज्नातैश्छायापुरुषैविज्नाते तोयकुड्ययोविवरे| कुड्येर्कतेजसो यो चेत्त्यारूढिम् स तन्त्रज्ञ:॥५॥

सु. भा. - तोयकुड्ययोजम्लभित्त्योविवरेन्तरे विज्ञाते छायापुरुषैज्ञार्र्तै: पुरुषस्यच्छ्रित्या जले तच्छायामानेन च य श्रारूढिम् भित्युच्छ्रितिम् वेत्ति वाsर्कतेजसौsर्कप्रकाशतश्छायादिज्ञानम् विज्ञायरूढिं वेति स एव तन्त्रज्ञ इत्यहं मन्ये ||८||

वि .भा.- तोयकुड् (जलभित्त्यो:) विवरे(श्रान्ते) विज्ञाते छायापुरुषैर्ज्ञाते:(पुरुषस्योच्छ्र्त्या जले तच्छायाप्रमाखेन च य श्रारूढि (भित्त्युच्छ्रिति) जानाति, वा कुड्ये (भितौ) रवै: प्रकाशतछायदिज्ञानम् विज्ञाय भित्युच्छ्रिति जानाति स तन्त्रज्ञोस्तीति

अब् प्रशनान्तर को कहते है। हि. भा. - श्रोर भित्ति(दिवाल) के श्रन्तर को जानकर पुरुषि ऊन्चाई भ्रौर जल मे उसके छायाप्रमाख से जो व्यक्ति भित्ति की ऊन्चाई को जानते है वा भित्ति मे रवि के प्रकाश से छायादिज्ञान जानकर भित्ति की उन्चाई जानते है वे सिद्धान्त विद्या के ज्ञाता है इति ॥ ॥

श्रथ प्रशनानामुत्तराखि। प्रथामम् प्रथमप्रश्नस्योत्तरमाह। इष्टदिवसार्धघटिका पन्चचशान्तरप्राखा:। तद्दिवसचरप्राखातैरक्षम् साधयेत् प्राग्वत्॥६॥ सु. भा.- (इष्ट्दिवसार्धघटिकापन्चदशान्तरघटीभधा: प्राखा:। तद्दिवसचरप्राखास्तैरक्ष साधेयेत् प्रग्वत्॥६॥ पन्चदेशेष्टदिनार्धान्तरघटिनाम् ये प्राखास्ते गोलयुक्त्या चरप्राखा भवन्ति। तश्चरासुभिरर्कात् क्रान्तिज्ञानेन च प्राग्वत् त्रिप्रश्नोत्तराध्यायविधिना यखकोsक्षभक्षोशान् साधयेत् ॥६॥ १३०० ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते वि. भा.-इष्टदिनार्धघटी पञ्चदशघट्योरन्तरोत्पन्ना ये प्राणाः (असवः) ते चरासवो भवन्ति, तैः (चरासुभिः) पूर्ववव (त्रिप्रश्नोत्तराध्याय विधिना) असे (अक्षांशा) साधयेद् गणक इति ॥६॥ क्षितिजाहोरात्रवृत्तयोः सम्पाताद्याम्योत्तराहोरात्रवृत्तयोः सम्पातं यावद्दि नार्घम् । उन्मण्डलाहोरात्रवृत्तयोः सम्पाताद्याम्योत्तरवृत्ताहोरात्रवृत्तयोः सम्पातं यावत्पञ्चदश घटिकाः। अनयोरन्तरं क्षितिजाहोरात्रवृत्तयोः सम्पातादुन्मण्डलाहो रात्रवृत्तयोः सम्पातं यावच्चरार्धासवः= दिनार्धघटी० पञ्चदशघटी, अत्र चरार्धा सुरव्योज्ञनेिनाक्षांशज्ञानं क्रियते । रविज्ञानेन जिज्या. रविभुजज्या = क्रांज्या, त्रि अस्याश्चापस्=क्रान्तिः, क्रान्तिज्ञानं जातम्, ततः Vत्रि-क्रांॉज्या' =ञ्च. चरज्याद्य _ =कया, ततः ~=-पलभा, तथा /कज्याक्रांघ्या' कृज्याX १२ ज्या कृज्या. त्रि ==। तदा न=प्रक्षज्या, अस्याश्चापम्=अक्षांशाः, एतेनोत्तरं जात अग्ना अग्न मिति । अब प्रश्नों के उत्तरों को कहते हैं । पहले प्रयम प्रश्न के उत्तर को कहते हैं। हि. भा.-इष्ट दिनाउँ घटी और पञ्चदश (१५) घटी का अन्तर जनित जो असु है वह चरार्धासु है उससे पूर्ववत् (त्रिपदनोत्तराध्यायोक्त विधि से ). अक्षांश साधन करना चाहिए इति । उपपत्ति । यहां किसी इष्ट दिन में रवि और चरासु विदित है, इनसे अक्षांश ज्ञान करते हैं । क्षितिजोहोरात्रवृत्तके सम्पात से याम्योत्तरंवृताहोरात्रवृत्त के सम्पात पर्यन्त दिनाघं घटीहै, तथा उन्मण्डलाहोरात्रवृत्त के सम्पात से याम्योत्तरवृत्ताहोरात्रवृत्त को सम्पात पर्यन्त पञ्चदश (पन्द्रह) घटी है, इन दोनों का अन्तर करने से क्षितिषवृत्त और उन्मण्डल के अन्तर में अहोरात्रा वृत्सीय चाप चरषदी है, यह विदित है, रवि के ज्ञान से . जिज्यारविभुज्या =ांज्या, इसका चाप= क्रान्ति, क्रान्ति ज्ञान से /निळकांड्या' =यु - द्युज्या=तब चरज्या. धु घ्या. १२ ज्य=पलभा, तथा कुर्या'+क्रांज्या'=अग्रा, अतः अग्रा कृज्या त्रि था, शंकुच्छायादिज्ञानाध्यायः १३०१ =अक्षज्या, इसका चाप=अक्षांश, इससे अभीष्ट सिद्धि हो गई इति ।। इदानीमुदयान्तरघटिकाभिस्तथास्तान्तरघटिकाभिरित्यादि- प्रश्नद्वयस्योत्तरमाह । ज्ञातीयग्रहयोरुदयान्तरनाडिकाभिरधिकोनः । उदयैर्जातो ज्ञाताज्ज्ञेयः प्रागपरयोर्जेयः ।।१०।। ज्ञातः सभाधं उदयैरस्तान्तरनाडिकाभिरधिकनः। ज्ञातार्वापरयोर्तेयो भार्बोनके ज्ञेयः ॥११॥ सु. भा. -ज्ञातज्ञेयग्रहयोर्या उदयान्तर घटिकास्ताभिरुदयैः स्वदेशोदयैशंतात् प्रागपरयोः पूर्वपहिचमयोर्जातोऽचिकोनः कार्यः । यदि च यो ज्ञातात् पूर्वदिश्यर्थादन तदा शतमर्की प्रकल्प्य स्वदेशोदयैरुदयान्तरघटीमितेषु क्रमलग्नं ज्ञातात् पश्चिमस्थे च ज्ञेये विपरीतलग्नं यत् स एव स्फुटो ज्ञेयो ग्रहो ज्ञेयः । अस्तान्तरघटीज्ञाने च ज्ञातः सभार्योऽर्कः कल्प्यः अस्तान्तरघटिका इष्टघटिकाः। अत्रापि ज्ञातात् पूर्वंऽग्र ज्ञेये क्रमलग्नं पश्चिमस्थे च विपरीतलग्नं यत् तस्मिन् भाञ्चनके सतिं ज्ञेयो ग्रहो भवतीति । अत्र वासना लग्नानयनवत् सुगमा ॥१०-११ वि. भा.--ज्ञातज्ञयग्रहयोरुदयान्तरघटिकाभिः स्वदेशीयोदयैर्जातात् पूर्व- दिशि स्थिते ज्ञेये तदा शतं रविं प्रकल्प्य स्वदेशीयोदयैः, उदयान्तघटीतुल्ये इष्टकाले क्रमलग्नं यद् भवेत् तथा ज्ञातात् पश्चिमदिशि स्थिते च ये विपरीतलग्नं यद् भवेत् स एव स्फुटो नैयग्रहो वाध्यः । अस्तान्तरघटिकाज्ञाने ज्ञातः षड्राशियुतः कार्यंस्तं रविं प्रकल्प्य, अस्तान्तरघटिकामिष्टकालं प्रकल्प्य ज्ञातात् पूर्वं (नग्न) ज्ञ थे क्रमलग्नं साध्यं ज्ञातात् पश्चिमस्थेज्ञये विपरीतलग्नं साध्यं तत्र षड्राशिहीने सति स्फुटो ज्ञयग्रहो भवतीति ॥ अत्रोपपत्तिर्लग्नानयनवद् बाध्येति ।।१०।। अब ‘उदयान्तर घटिकाभिः’ तथा ‘अस्तान्तर घटिकाभि:’ इत्यादि प्रश्नद्य के उत्तर को कहते हैं । हि- भा–ज्ञात ग्रह से क्षय ग्रह पूर्व (आगे) में हो तब ज्ञात ग्रह को रवि कल्पना कर तथा ज्ञात ग्रह और भय ग्रह का उदयान्तर धटी को इष्ट काल मानकर स्वदेशीय उदय से क्रमलग्न जो हो वही स्फुट लुथ ग्रह होता है, तथा ज्ञात ग्रह से पश्चिम में हो तब विपरीत लग्न जो होता है वही स्फुट सय ग्रह होते हैं । अस्तान्तर घटी के विदित रहने से ज्ञात ग्रह में छः राशि जोड़कर जो हो उसको रवि कल्पना कर अस्तान्तर धटी को इष्टकाल मानकर ज्ञात ग्रह से पूर्व (आगे) में सय ग्रह के रहने से क्रम लग्न जो हो उसमें छः राशि घटाने से १३०२ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते स्फुट ज्ञय ग्रह होते हैं। तथा ज्ञात ग्रह से पश्चिम में ज्ञय ग्रह के रहने से विपरीत लग्न जो हो उसमें छः राशि घटाने से स्फुट ज्ञय ग्रह होते हैं इति । उपपत्ति लग्नानयनवत् समझनी चाहिये ॥१०-११॥ इदानीं तस्मान्मध्यगतिं ततो युगभगणान् साधयति य इत्यस्योत्तरमाह । ज्ञातं कृत्वा मध्यं भूयोऽन्यदिने तदन्तरं भुक्तिः । त्रैराशिकेन भुक्तया कल्पग्रहमण्डलानयनम् ।। १२ ।। सु. भा.- एवं स्फुटज्ञेयग्रहात् स्पष्टीकरणविलोमविधिना मध्य ग्रहं ज्ञातं कृत्वा भूयः पुनरन्यदिने च मध्यं ग्रहं ज्ञातं कृत्वा तदन्तरं तयोरन्तरं कार्यमेवं ग्रहस्य मृध्यमा भुक्तिर्भवेत् । ततो भुक्त्या त्रैराशिकेनैकस्मिन् दिने मध्यमा गतिस्तदा। कल्पकुदिनैः किमिति त्रैराशिकेन कल्पग्रहभगणानयनं सुगममिति ।।१२।। वि. भा.-स्पष्टज्ञेयग्रहात् ‘स्फुटं ग्रहं मध्यखगं प्रकल्प्ये' त्यादि भास्करोक्त सूत्रेण स्पष्टीकरणविलोमक्रियया मध्यमं ग्रहं संसाध्य पुनरन्यस्मिन् दिने तेनैव विधिना मध्यमग्रहसाधन कार्य तयोरन्तरमेकदिनजा ग्रहस्य मध्यमा गतिर्भवेत् । ततोऽनुपातेना ‘यद्येकस्मिन् दिने इयं मध्यमा गतिस्तदा कल्पकुदिनैः किम्' न कल्प ग्रहभगणमानानयनं स्फुटमेवेति ॥१२॥ अत्रोपपत्तिर्विज्ञानभाष्यलिखितस दृश्येवेति।।१२॥ अब ‘तस्मान्मध्यगतिं ततोयुत भगणमानयति यः' इसके उत्तर को कहते हैं । हेि. भा..-स्पष्ट ज्ञयग्रह से ‘स्फुटं ग्रहं मध्यखगं प्रकल्प्य' इत्यादि भास्करोक्त सूत्र से स्पष्टीकरण की विलोम विधि से मध्यम ग्रह ज्ञान करके पुनः अन्य दिन में उसी विधि से मध्यम ग्रह ज्ञान करना चाहिये, दोनों मध्यम ग्रहों के अन्तर एक दिन सम्बन्धी ग्रह की मध्यम गति हुई, तब इस मध्यम गति से अनुपात ‘यदि एक दिन में यह मध्यम गति पाते हैं तो कल्प कुदिन में क्या' से कल्प ग्रह भगणानयन स्फुट ही है इति ॥१२॥ इदानीमानयति यस्तमोरविशशाङ्कमानानीत्यस्योत्तरमाह । स्थित्यर्धाद्विपरीत तमः प्रमाणं स्फुटं ग्रहणे । मानोदयाद्रवीन्द्वोर्घटिकावयवेन भोदयतः ॥१३॥ सु.भा.-स्थित्यर्धाद्विपरीतं विपरीतविधिना ग्रहणे स्फुटं तमः प्रमाणं भूभाबिम्बप्रमाणं भवति । अत्रैतदुक्त भवति । स्थित्यर्घ रविचन्द्रगत्यन्तरकला गुणं षष्टिहृतं स्थित्यर्धकला भवन्ति । तद्वर्गाच्छरवर्गयुतान्मूलं मानैक्यार्धकला ?rrat I Sflif % TO *Pt «t5I% & ^TT f«IHI«i ffaT 1 1 Tfa srfc to % fiFsff^ ti frtiiw % xfk srk to W fawiflH ^rmr ^tFh? sprfg; gffsrf^r


                                शंकुच्छायादिग्यानाध्यायः


 स्ताभ्यश्चन्द्र्बिम्बाघं प्रोह्य भूभाबिम्बार्धम् । एवं विपरीतक्रमेण ग्येयमिति । मानोदयाद् घटिकावयवेन भोदयतः
 स्वदेशराश्युदयतो रवीन्द्वोर्बिम्बमाने ग्येये । यदा प्राकक्षितिजे बिम्बोध्वपालिदर्शनं जातं ततोऽनन्तरं यावता
 घटिकावयवेनाघ: पालिदर्शनं जातं स घटिकावयो: वेधेन ग्येय:। तत:स्वदेशराश्युदयघटीभि-
 रष्टादशशकलास्त्दा वेचोपलब्व्घटिकावयवेन किमेवं बिम्बकला रवेश्चन्द्रस्य च भवन्तीति ।
 रविबिम्बस्योव्वघिरप्रदेशौ यत्र क्रान्तिव्रुत्ते लग्नौ तयोरुदयदशनेनैवैवं बिम्बिकला भवन्ति । चन्द्रस्य विमण्डले
 भ्रमन्ति तेनैवं चन्द्रबिम्बकलाः स्वल्पान्तराद्भवन्ति ।


    स्थित्यधाद्विपरीतविधिना ग्रहाए स्फ़्ट्ं तमः प्रमाणं भवत्यथरात् 'षष्टया विभाजिता स्थितिविमददलनाडिके'
 'स्थित्यर्घनाडि गुरिता स्वभुत्त्किरि' त्यादि भास्करोत्त्कसूत्रे वा विदितं भवेत्तगयुताच्छरवगार्न्मूलं मानैक्या-
 कला भवन्ति, तत्र चन्द्रबिम्बार्धस्य विशोघनेन भूभाबिम्बार्धम भवेदिति, भोदयतः मानोदयाद् घटिकावयवेन
 वेवेन घ्यातव । १३०४

ब्रह्मस्फुटसिद्धान्ते से इस तरह बिम्बकला होती है। परन्तु चन्द्र विमण्डल में रहते हैं इसलिये चन्द्र बिम्बकला इस तरह स्वल्पान्तर से होती है इंति ।।१३।। इदानीं दीपखौच्च्याच्छङ, कुतलान्तरभूमिज्ञाने छायां य आनयतीत्य स्योत्तरमाह । दीपतलशङक तलयोरन्तरमिष्टप्रमाणशङ्कं गुणम् । वीपशिखौच्च्याच्छङकं विशोध्य शेषोद्धतं यया ॥१४॥ सु. भा–गणिताध्यायस्य ५३ आयंयमतस्तत्रेव स्फुटा ॥१४॥ । वि. भा–दीपतलशकुतलयोरन्तरं इष्टशङ्कुगुणं दीपशिखौच्च्य शव- न्तरेण भक्त तदा छाया भवेदिति । अत्रोपपत्तिः। अक=दीपशिखौच्च्यम् । क==दीपतलम्। मन= शङ्कुः। न=शङ्कु- तलम् । नप= छाया। नक=दीपतलशङकुतलयोरन्तरम्=मश, म बिन्दुतः कप रेखायाः समानान्तरा मशरेखाऽस्ति। अक–कश =अक–मन= अश=दीपशिखौच्च्य -शङ्कु । तदा अशम, मनप त्रिभुजयोः साजात्यादनुपातः मश Xभन दीपशड् कुतलान्तरxश दीपशिखौच्च्य-शङ्कु। =छाया। सिद्धान्तशेखरे “विशङ्कुना दीपशिखो च्येण शक्झावभीष्टाङ्गुलके विभक्त। प्रदीप शक्वन्तरमाननिघ्ने प्रभाप्रमाणं प्रवदन्ति सन्तः ” श्रीपत्युक्तमिदं लीलावत्यां ‘शङ्कुः प्रदीपतलशङकुतलान्तरघ्नश्छाया भवेद्विनरदीप शिखौच्यभक्तः भास्करोक्तमिदं च आचार्योक्तानुरूपमेवास्तीति ॥१४॥ अब ‘दीपशिखौच्य्याच्छङ्कुतलान्तरभूमिज्ञाने छायां य आनयति ' इस प्रश्न के उत्तर को कहते हैं । हि- भा–वीपतल और यकृतल के अन्तर को इष्टयंकु से गुणा कर शङ्कुहीन । दीपशिखौच्च्य से भाग देने से आया होती है । उपपत्ति । यह संस्कृतोपपति में लिखित (१) चित्र को देखिये । अक=दीपशिखच्च्य । क दीपतल, मन= शङ्कु, न= शङ्कृतल, नप=छाया, नक==दीपतल और शङ्कृतल का = कुच्छायादिज्ञानाध्यायः १३०५

नप[सम्पाद्यताम्]

-- --- -- अन्तर==मश, म बिन्दु से कप रेखा की समानान्तर रेखा मश है । अक---कश==श्रक-मन =दीपशिखौच्च्य – शङ्कु==अश, तब अशम, मनप दोनों त्रिभुजों के सजातीयत्व से मश दीप अनुपात । X मन - शकुतलान्तरgशक करते हैं। छाया, इसमे दीपशिखौच्च्य-शङ्कु आचायॉक्त उपपन्न हुआ । सिद्धान्तशेखर में ‘विशङ्कुना दीपशिखोच्छेयेण’ इत्यादि संस्कृत पपत्ति में लिखित श्लोक से श्रीपति ने आचायक्त के अनुरूप ही कहा है लीलावती में ‘शंकुः प्रदीपतलशङकुतलान्तरध्नः’ इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित पद्य से भास्कराचार्य ने आचार्योंक्त के अनुरूप ही कहा है इति ॥१४॥ इदानीं छाया द्वितीयभागान्तरविज्ञानेनेत्यादि प्रश्नोत्तरमाह । शङ,क्वन्तरेण गुणिता छाया छायान्तरेण भक्ता भूः । स छायाँ शङ, गुणा दीपच्च्यं छायया भक्ता ॥१५॥ सु. भा–छायेष्टस्य कस्यापि शङ्कोश्छायं शझोरन्तरेण शङ्कुसूला- न्तरेण गुणिता छाययोरन्तरेण भक्ता भूर्भवति । सा सच्छाया छायया सहिता शङ्कुगुणा छायया भक्ता च दीपौच्च्यं भवति । श। है और तशि= दीपौच्च्यम् । अ, श,=अ, श, शङकुप्रमाणम् । श, भा=प्रथमशङकुच्छाया भी श–श,4छाअं । , , भा,, भा श, भा,==द्वितीयशङ्कुच्छाया ४ २६ भा श, भा=शङ,क्वन्तरम्= रामं, भाभा,= छायामान्तरम्= भाग्राभं। =श, भा, (श, भा–श, श) =श, भा,-श, भा, + श, श, =छाउं-+शी । ततो यो गणिताध्यायस्य ५४ सूत्रेण । ब्राह्मस्फूटसिद्धान्ते १३०६

   (छाऋं+शऋं)/छाऋं = तभा |
श, त==तभा-श, भा = (छाऋं+शऋं) श, भा- छाऋं श,भा / छात्र

=शत्रं श भा / छाऋं

 त्रत्राचार्येगा तश मानमेव भूसंग्य कल्पितमित्युपपन्नम् । द्वितीवच्छाया ग्रहगोन द्वितीया भूर्भवति।
इयं भूः सच्छाया तदा छायाव्यवहारस्य ५४ सूत्रीया भूर्भवति ततो दीपौच्च्यं प्राग्वदिति । ऋत उपपन्नम् ॥१५॥
        वि. भा. -- कस्यापीष्टराग्कोरछाया शक् वन्तरेए। 

गुएता छाययोरन्तरेए भक्ता तदा भूर्भवति । सा छायया साहिता ---शकुगुएइता,छायया भक्ता तदा दिपोच्च्यं भबतीति ॥१५॥

            ऋत्रोपपक्तिः ।
    पश=नख=शगकुद्वयम् । 
    शख=शकु मूलान्तरस्=शग् कवन्तरम् । क्षक=दीपोच्च्यस् । पश=प्रथमशकुः ।
    नख= द्वितीयशकुः । राज = प्रथमच्छाया । खल = द्वितीयच्छाया । जल= छायाग्रान्तरस् ।
    खल---राज = छायान्तरस् ।

खल --(राज-राख) =खल----राज+शख=छायान्तर+शकवन्तर ततो गएताघ्यायस्य ५४ सूत्रेए

प्रथमच्छाया (छायान्तर+शकवन्तर)/छायान्तर = कज, क्षतः कज--शज=कश ।

=प्रथमछाया(छायान्तर+शकवन्तर)/छायान्तर--प्रथमच्छाया ।
=प्रथमच्छाया * छायान्तर+प्रथमच्छाया *शकवन्तर --छायान्तर * प्रथमछाया / छायान्तरे
=प्रथमच्छाया*शकवन्तर/ छायान्तरे = कश = भूः । एवमेव द्वितीयच्छाया.शंकवन्तर/छायान्तर
=कख=भूः । कश + राज=भू+प्रथमच्छाया==कज ==(छायाव्यवहारस्य ५४ 
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          शकुंच्छायादिग्नानध्यायः

सूत्रोक्त भू) | कख+खल=भू+द्वितीयछाया=कल=छायाव्यवहारस्य ५४ सूत्रोक्त भू , लीलावत्यां ' छायाग्रयोरन्तर सङगुणा भा छाया प्रमाणान्तरह्द्भ्- वेद् भूरित्यत्र' भास्कराचार्येणा कज,कल इत्येव भू द्वयं ग्रुहीतम् । ततः अकज, पशज त्रिभुजयोः साजात्यादनुपात:। पश x कज / शज = ( ५४ सूत्रोक्त भू ) x प्रथमशं / प्रथमच्छाया = श्वक=दीपौच्च्यम् । एवमेव श्वकल , नखल त्रिभुजयोः साजात्यात् नख x कल / खल =द्वितीयशं ( ५४ सूत्रोक्त भू ) / द्वितीयच्छाया = दीपौच्ध्यम् एतेनाssचार्योक्त सूत्रमुपपन्नम् ॥१५॥

  श्वव 'छाया द्वितीय भाग्रान्तर बिग्नानेन इत्यादि ' प्रश्न के उत्तर को कहते हैं   ।
   हि . भा - किसी इष्ट शङ् कु की छाया को शङ् कुद्वय के  श्वन्तर (शङ् कुद्वय मूलान्तर )
से गुणा  कर छायान्तर से भाग देने से भू होती है  , भू में छाया को जोडने से जो हो उसको 

शङ् कु से गुणा कर छाया से भाग देने से दीपौच्च्य होता है इति ॥ १६ ॥

                                                  उपपत्तिः।
         यहां संस्कुतोपपत्ति में लिखित (१) चित्र को देखिये । पश = नख=दोनों शङ् कु ।
शख=शङ् कुमूलान्तर=शङ् क्वन्तर । श्वक=दीपौच्च्य । पश=प्रथमशङ् कु । नख

=द्वितीयशङ् कु । शज=प्रथमच्छाया=प्रछा,खल=द्वितीयच्छाया=द्विछा जल=छायाग्रान्तर, खल-शज=छायान्तर, खल-( शज-शख )=खल-शज+शख=छायान्तर+शङ् क् वन्तर, तब ग ताष्याय के १४ सूत्र से प्रछा ( छायान्तर + शङ् क् वन्तर )/ छायान्तर =कज श्वत्तः कज-शज=कश=प्रछा (छायान्तर +शङ् क् वन्तर) / छायान्तर - प्रछा= =प्रछा.छायान्तर + प्रछा शङ् क् वन्तर-प्रछा छायान्तर / छायान्तर = प्रछा शङ्कवन्तर / छायान्तर =कश=भू । इसीतरह द्विछा शङ्क्वन्तर / छायान्तर = कख = भू । कश+शज = भू +प्रछा =छायाव्यवहार की २४ सूत्रोक्त भू । कख +खल=भू +द्विछा=कल=छायाव्यवहार की २४ सूत्रोक्त भू , लीलावती में 'छायाग्रयोरन्तर सङ् रभा 'इत्यादि श्लोक में भास्कराचार्य कज, कल इन्ही दोनों की प्रथम भू , श्वौर द्वितीय भू कहते हैं । श्वब श्वकज , पशज दोनों त्रिभुजों के सजातीयत्व से श्वनुपात करते है । पश. कज / शज = श्वक = (२४ सूत्रोक्तभू) x प्रथमशं / प्रछा =दीपौच्च्य। इसी तरह् श्रकल,नखल दोनों त्रिभुजों के सजातीयत्वव् से नखXकल/खल =द्वितीयशं(५४ सूत्रोक्त,भू)/द्विछा = दीपौच्य। इस्से धाचायोंक्तम उपपन्न हुथा इति

इदानीम् छायातो गृहादीनामौच्च्यानयनमाह्।

      ङ्यात्वाशङूकुच्छायामनुपातात् साधयेत् समुच्छ्रायान्।
      गृह्चैत्यतरुनगानामौच्च्यं विङ्याय वा छायाम् ॥१६॥

सु.भा.- शङूकुच्छायां ङ्यात्वाअनुपाताद्गृह्चैत्यतरुपर्वतानां समुच्छ्रायान् गराकै: साधयेत्। वा तेषामौच्च्यं विङ्याय तेषामिष्टकाले छायां साधयेत्। इष्ट्काले गृहादीनां छायाप्रमाणं ङ्यात्वा तदैदवेष्टशङ्कोश्च् छायाप्रमाणं विङ्याय श्ङ्कुच्छायया शङूकुप्रमाणं तादा गृहादिच्छायया किम्। एवं गृहादीनामौच्च्यं भवति। औच्च्याच्चैवेमनुपातेन गृहादीनां छायां साधयेत् ॥१६॥

वि.भा.- शङूकुच्छायां ङ्यात्वा, अनुपातात् गृह्चैत्यतरुपर्वतानां समुच्छ्रायान् साधयेज्ज्यौतिषिक्:। वा तेषामौच्च्यं विङ्यायेष्टकाले तेषां छायां साधयेत्॥१६॥

                      श्रत्रोपपत्ति:।

यदि शङूकुच्छायया शङूकुप्रमारगं लभ्यते तदा गृह्चैत्यवृक्षयवंतानां छायया किमित्यनुपातेन तेषामुच्छ्रिति प्रमारगामागमिष्यति। एवं तेषामौच्च्यङ्यानेन तेषां छायानयनमनुपातेनैव भवति यथा यदि शङूकुनाछाया लभ्यते तदा गृहादीना मौच्च्येन किं समगच्छ्न्ति तेषां छाया प्रमारजगानीति॥१६॥

     भव छाया से गृहादियों का भीच्चया(ऊंचाई) नयन कहते हैं।

वि.भा.-शङूकु की छाया जानकर अनुपात से गृहश्रवैत (माटा) वृक्ष्, पवैत इन सबों प्री उच्छ्रिति(ऊंचाई) को गारगक साधन करे, वा उन सबों की उच्छ्रिति जानकर उन सबों की छाया साधन करे इति ॥१६॥

                     उपपत्ति

यदि शङूकुछाया में शङूकु प्रसारग पाते हैं तो गृह्-वैत्य-वृक्ष-पबंतो की छाया में क्या इस भनुपात से उन सबों की ऊंचाई के मान आजायगा। यदि उन गृहादियों की ऊंचाई शंकुच्छायादिज्ञानाध्यायः १३०९ से उन सब का छायानयन करना हो तो ‘यदि शङकु में इष्टछाया पाते हैं तो गृहादियों के औच्च्य में क्या इस अनुपात से गुडादियों के छायाप्रमाण आते हैं इति ।।१६। इदानीमिष्टगृहौच्च्यज्ञो य इत्यादि प्रश्नोत्तरमाह। युतदृष्टिगृहौच्यहृता ह्यन्तरभूमिट्टी गौच्च्यसङ, गुणिता । फलभूयंस्ते तोये प्रतिरूपाग्नगृहस्य नरात् ।१७। सु. भा.--ण-हस्य नरस्य च मध्ये याऽन्तरभूमिः सा दृगौच्च्येन दृष्टयच्छुित्या सङगुणिता युतदृष्टिग हौच्च्यहृता च्छुितिसंयुतगहोच्छुिट्या दृष्टयं हृता । यत् फलं प्राप्तं तन्मिता भूत्रैराद्गृहाभिमुखी या तत्र तोये जले न्यस्ते तस्मिन् गहस्य प्रतिरूपाग्रमग्रस्य प्रतिबिम्बं दृश्यं भवेदिति । ग न = गहनरान्तरभूमिः । =अक ग उ = गहौच्च्यम् । प्र=जलम् । न दृः = ॐ दृगौब्यम् । तदा ज्योतिविद्यया गहनप्रति बिम्बं चेद् ६ - दृष्ट्या दृश्यं तदा < ग

न प्र उ= <न प्र दृ । अतः ग उ==ग, अअः[सम्पाद्यताम्]

न कं । दृ क= न दृ+ग उ । दृ अ क, दृ प्र ––Jॐ न त्रिभुजे च सजातीये । ततः प्र न । छ झ––– अक X द्वान हुन । अत उपपन्नम् ॥१७॥ । वि. भा. -नरात् (द्रष्टु) गृहस्यान्तरभूमिरर्थाद् गृहनरयोर्मध्ये या भूमिः सा दृष्टघु च्छूित्या गुणिता दृष्ट्युच्छुितियुतहौच्यभक्ता यत्फलं लब्धं भवेत् नराद् गृहाभिमुखं तन्मितभूमौ स्थापिते जले गृहाग्रस्य प्रतिबिम्बं दृश्यं भवेदिति । गृहौच्च्यम् । वश== दृगच्च्यम् । नश म=जलम् । लव= गृहनरान्तरभूमिः= रय, गृहाग्रप्रतिबिम्बं यदि श । दृष्टया दृश्यं भजब भवेत्तदा ज्योतिविद्यायाः पतितपरावतित कोणसाम्यं भवतीति सिद्धान्तात् < लमस c८------------J =<वमश तथा <- रमल = << वमरा, १३१० ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते <मलर=<मलस=६० अतः रमल, लमस त्रिभुजद्वये तुल्ये (र.प्र.ल-२६ क्षे) तेन लस= लर= वय । अत: यश==वश +लस शरय, शमव त्रिभुजयोः साजात्याद रय.श = वम अत उपपन्नमाचार्योक्तमिति ॥१७॥ अब ‘इष्टग्रहौच्च्यशो यः' इत्यादि प्रश्न को उत्तर कहते हैं । हि- भा.-गृह और नर (द्रष्टा) के मध्य में जो अन्तर भूमि है उसको दृष्टि की उच्छिंति (ऊंचाई) से गुणा कर ग्रह की उच्छूितियुत दृष्ट्युच्छिंति से भाग देने से जो लब्ध हो ततुल्य भूमि नर से चूह की तरफ (ग्रहाभिमुख) जो हो वहां जल को स्थापन करने से उस जल में गृह के अग्न के प्रति बिम्ब दृश्य होता है इति ।।१७।। उपपत्ति । यहां संस्कृतोपपत्ति में लिखित (१) चित्र को देखिये । लस=हौच्च्य, वश=दृगौ उच्य, दृष्टि की ऊंचाई, म=जल, लब= गृह और नर की अन्तर भूमि= रय, गृह के अग्र का प्रति बिम्ब यदि श दृष्टि से दृश्य होता है तब ज्योतिविधी के पतित कोण और परातत कोण की तुल्यता सिद्धान्त से ८लमस=Zवमश तथा रमल=<वमश, मलर= मलस=६० । इसलिये रमल, लमस दोनों त्रिभुज सर्वथा तुल्य हुए (ने.है) प्र.अ. २६ अत: लस=लर= वय, तथा यश=वश+लस, शरय, शमव दोनों त्रिभुजों के सजातीयत्व से अनुपात करते हैं यव , =वमअतः आचार्योंक्त उपपन्न हुआ इति ॥१७॥ इदानीं गृहपुरुषान्तरसलिले यो दृष्ट्वेत्यादि प्रश्नोत्तरमाह गृहपुरुषान्तरसलिले वीक्ष्य गृहाणे इंगौच्च्य सङगुणितम् । गृहतोयान्तरमौल्यं गृहस्य नृजलान्तरेण हृतम् ॥१८॥ सु. भाऊ हपुरुषयोर्मध्येयत् सलिलं स्थापितं तस्मिन् ग-हारौ वीक्ष्य यदि गृहौच्च्यमपेक्षितं तदा गहुतोयान्तरं दृगच्च्यसङगुणितं नृजलान्तरेण हृतं फलं ग्रहस्यौच्च्यं भवेत् । अत्रोपपत्तिः । पूर्वश्लोक क्षेत्रे राहतोयान्तरम्गप्र =। नृजलान्तरम्=प्र न। प्र ग्र उ, दृ न प्र त्रिभुजे च सजातीये ततः=ग उ रा, टु अत ।१८। प्रॐ न उपपद्यते । प्र न वि. भा.-गृहपुरुषान्तरे स्थापिते जले गृहाग्रं दृष्ट्वा यदि गृहौच्च्यज्ञानम भीष्टं तदा गृहजलान्तरं दृगौच्च्य (दृष्टयुलुझाय) गुणितं भक्त पुरुषजलान्तरण तदा लब्धं गृहस्यौच्छ यं भवेदिति । बकुछायादिज्ञानाध्यायः १३११ अत्रोपपत्तिः । अत्र पूर्वश्लोको (१७) पपत्तौ लिखितं क्षेत्रं द्रष्टव्यम् । लस= गृहौच्च्यम् । वश= दृगौच्च्यम् । लव-गृहपुरुषान्तर भूमिः, म-जलम् । तदा सलम, शमव त्रिभुजयोः साजात्यादनुपातः वश xलम लसॐ ढंगौच्च्यxगृहजलान्तर = गृहौच्च्यम् । एतेनोपपन्नमाचार्योक्तस् ।।१८॥ अब ‘गृहपुरुषान्तर सलिले यो दृष्ट्वागं' इत्यादि प्रश्न के उत्तर को कहते हैं । हि. भा-गृह और पुरुष के मध्य भूमि में स्थापित जल में गृह के अग्न को देख कर यदि गृहौच्च्यज्ञान अपेक्षित हो तब यह और जल के अन्तर को दृगौच्च्य (दृष्टि की उच्छुिति) से गुणा कर पुरुष और जल के अन्तर से भाग देने से लब्ध ग्रहौच्च्य होता है इति । उपपत्ति । = यहां पूर्वं श्लोक (१७) की संस्कृतोपपत्ति में लिखित (१) क्षेत्र को देखिये । लस= गृहौच्च्य, वश=दृगौच्च्य। लव =गृह और पुरुष का अन्तर, म=जल, तब सलम और शवम दोनों त्रिभुजों में सजातीयत्व से अनुपात करते हैं वशलस

=सल[सम्पाद्यताम्]

हगौञ्च्य.गृहजलान्तर = गृहौच्च्य, इससे आचायाँक्त सूत्र उपपत्र हुआ ।।१८।। पुरुषजलान्तर इदानीं वीक्ष्य गृहाग्नसलिले प्रसार्योटैयादि प्रश्नोत्तरमाह। प्रथमद्वितीय नृजलान्तरान्तरेणोद्धता जलापसृतः । दृगौच्च्य गुणोल्झायस्तोयान्नृजलान्तरगुणा भुः ॥१६॥ सु. भा-–यत्र प्रथमं जले ग-हाग्रप्रतिबिंब नरेण दृष्टं तत्र यन्नृजलान्तरं तत्र प्रथमं ज्ञेयम् । एवं द्वितीयं नृजलान्तरं जानीयात् । ततो जलापसृतिर्जलयोरन्तरे भूमिः सा प्रथमद्वित्तीयनृजलान्तरयोरन्तरेणोद्धता लब्धिद्विध स्थाप्या । एकत्र दृगौच्च्यगुणा तदा गृहोच्छुायः स्यादन्यत्र नृजलान्तरेण गुणा तदा तोयाग हत लपर्यन्तं भूभूमिः स्यात् । ब्राह्यस्फुटसिद्धान्ते

             त्रोपपत्तिः ।
  स्रु ग=ग उ=ग होच्च्यम् । ज ज प्रथम द्वितीय जलस्स्थाने । न न प्रथमद्वितीयनरस्थाने । ग क=न ह=न ह=हगोच्च्यम् । ज ज=जलान्तरम्=जलापसृतिः । न न=ह ह=नरान्तर । द्वयोरन्तरम्=न न-- ज ज=न न--(ज न+न ज)= न न--न ज--ज न=ज न--ज न ।
  स्रु ज ज स्रु ह ह सजातीय त्रिभुजयोः क्रमेए स्र ग स्र क बहिलम्बः ।
   स्र क    ह ह    स्र क-स्र ग    क ग    ह ह-ज ज

तेन ----- - ---- --------- = ----- = ----------

   स्रु ग    ज ज     स्र ग       स्र ग      ज ज 
  न न-ज ज               ह स्रो*ज ज
= --------- । ततः स्र ग = ----------- ।
   ज ज                  ज न-ज न
 ततः ग ज उ ज न ह सजातीयजात्ययोः ।
       ज न ज ज               ज न*ज ज
ग ज = ---------- । एवम् ग ज  ----------
       ज न--ज ज              ज न--ज न
  स्रत उपपद्यते ॥ १६ ॥
 वि। भा-- नरेए गुहाग्रप्रतिबिम्बम् जले प्रथम यत्र हष्टम् तत्र नरजलान्तरम् थत्तत् प्रथम नरजलान्तर बोध्य, एवम् नरेए द्वितीय गृहाग्रप्रतिबिम्ब जले यत्र हष्ट तत्र द्वितीय नरजलान्तरम् ग्नेयम् । जलयोरन्तरे जलापसतिभुमिः प्रथमद्वितीय नरजलान्तरयोरन्तरेए भक्ता लब्धिः स्थानद्वये स्थाप्या, एकत्र हष्टचु च्छायेए गुएता गृहोच्छ्तिभवेत् द्वितीयस्थाने नर जलान्तरेए गुरिएता तदा जलाद् ग्रृह-तलपर्यन्तभुमिमानम् भवेदिति ॥ शंकृछायादिज्ञानाध्यायः

१३१३ उपपत्तिः । प, पं प्रथम द्वितीय जल स्थाने, य, य | प्रथम द्वितीय नरस्थाने, गम=गम=गृहो- (४ *~* च्छुितिः । प प=जलान्तरम् = जलापसुतिः य य=र र=नरान्तरम् । अनयोरन्तरम् = यं पर्प पंय -- पयसजातीययोः - - = , म पप, म र र त्रिभुजयोः क्रमेण मग, म ख बहिर्लम्ब स्तदा मुख= ॥ ॥ । ॥ मग प प म ख--मग _ खग र र–प प उभयत्रैक शोधनेन म ग प प ५ ५ - य य-–प प दृष्टय-च्छिति X जलान्तर

- अतः मग =मग= नरजलान्तरयोरन्तरं

प प =गृहोचितिः । अथ पयq . प गमप, परय सजात्य त्रिभुजयोः साजात्यादनुपातः भ~~=गप=प्रथमजलस्था प –पय प्रथमनरजलान्तरजलान्तर नाद् ग्रहतलपर्यन्त= नरजलान्तरयोरन्तरं द्वितीय नरजलान्तर जलान्तर द्वितीय जलस्थानाद् गृहत पर्यन्तं एतावता नर जलान्तरयोरन्तरं ऽऽचार्योक्तमुपपन्नम् ।१९।। अब ‘वीक्ष्य गृहाग्न सलिले प्रसार्य ‘इत्यादि प्रश्न के उत्तर को कहते हैं । हि. भा-ह के अग्र का प्रतिबिम्ब जल में पहले जहां देखा गया वहां जो नर और जाल का जो अन्तर है उसको प्रथम नर जलान्तर समझना चाहिये। एवं द्वितीय हृन प्रतिबिम्ब मैं जहां देखा गया वहां नर ऑर जल का जो अन्तर है उस को द्वितीय नर जलान्तर समझना चाहिये । दोनों जलस्थानों के अन्तर (जलापति) में जो भूमि है उसको प्रथम द्वितीय नर जलान्तर के अन्तर से भाग देने से शो लब्धि हो उसको दो स्थानों में स्थापित करना एक if Terpen: % g^r ^ % <sr?r 3r ^zmfa ^fa #tdY | sfa i i i _ i 1 1 1 . 1 i iii _ wt य् i — ™' " vn * — - — * r ~~ v - — s ~ II I ! = — j . = — , ?Rr: Tnr=tnr = — — •• - - - — =' l Nfa i m wr, to, snw fafsr^ % ?R'Ml3M % ■ ^ ,yT =^q-==sचै*PT3T5r «TT — *R • $T OTT^T gSTT f% HUH I ( ^RTW^RW ^FTTp*r*r ffg5JT: ) tfj स्थन मे दृष्टि की ऊचाई (दृगीच्च्य) से गुरग्ग करने से गृहोष्ट्च्राय होता हॅ | द्वितीय स्थान मे नरजलान्तर से गुरगा करने से जल से गृहतलपर्यन्त भूमि होती हॅ इति |

                           उपपति |
   यहां संस्कृतोपपत्त्ति में लिखित (१) क्षेत्र को देलिये | प = प्रथम जलस्थान | प = द्वितीय जलस्थान | य + प्रथमनर (द्रष्टा) स्थान, य = द्वितीय नरस्थान, गम = गृहोच्च्रिति, पप = जलान्तर = जलाप़सृति यय = रर = नरान्तर, इन दोनों का अन्तर = यय पप | मपप, मरर सजातीय त्रिभुजद्वये के क्रम से भग, सख बहिर्लम्ब हॅ | तब मख = रर दोनों पक्षों में रुप घटाने से भख - १ = रर - पप = यय - पप भ्रतः मग = मग = नरजलान्तर का भ्रन्तर = गृहो च्च्रिति | भ्रथ गमप, परय, जात्व त्रिभुजद्वय के सजातीयत्व से पय पप = गप = प्रथमजल स्थान से गृह्तलपर्यन्त = प्रथम नर जलान्तर X जलान्तर, इसी तरह् द्वितीयनरजलान्तर X जलान्तर = द्वितीय जल स्थान से गृह्तल पर्यन्त; इससे भ्राचार्योत्क सूत्र उपपृत्र हुग्रा इति |
                    इदानीमुच्च्रितिमाह |
              चायापुरुषच्चिन्नं जलकुडयान्तरमवाप्तमारूढिः |
              भ्रव्यायो विशत्यार्यारगामेकोन विंशोअयमृ |
         सु भु - चायाया यः पुरुषः शङ्कुभागस्तेन जलभित्योरन्तरं भक्तमत्र यदवाप्तं सा भित्तेरारूढिरूच्च्रितिर्भवति | जलाद्यावताअन्तरेरग नरो भित्यग्रपतिबिबब्ं जले पश्यति तदन्तरमेवात्र नरस्य चाया कल्प्या । अर्कतेजसो या भित्तेश्चायाग्यातव्या । शेषं स्पष्टार्थम् ।                शंकुचायादिज्नानाध्यायः
 अथ्रोपपत्तिः ।नरस्य चायया नरप्रमाएसमोकितिस्तदा भित्तेश्चायया किमित्यनुपातेन भित्तेरुचितिः स्पुटा ।

मढुसूदनसूनुनोदितो यस्तिलकः श्रोप्रुथुनेह जिष्गुजोक्त् । ह्रुदि तं विनिधाय नूतनोयं रचितो भादिविधौ सुधकरेए ॥ इति श्रीह्रुपालुदत्तसूनुसुधाकरद्विवेदिविरचिते ब्राह्मस्पुतसिद्धान्तनूतनतिलके शन्कुचायादिज्नानं नामकोनविंशोsध्याय:॥

                 श्रथ्रोपपत्तिः।
  

नरस्य चययया नरतुल्योच्रितिस्तदा भित्तेश्चायया किमिति समागच्चति भित्तेरुच्च्रितिरिति ॥ इति ब्राह्मस्पट सिध्दान्ते शन्कुच्चय्यादिज्नानं नामक एकोनविंशो sध्याय:॥ पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/२२५ ब्राहपटसन्त जुन्छ इल्युराध्यः पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/२२७ त्रुग्वर्गः पर्यायः समुहयोजगावयुक्षु युग्मेषु। सो याः प्राग्वत् प्राप्तादाश्चतुष्ककाः शेषयुक्तचोन्त्यः ॥१॥

एकादियुतविहोनावाद्यन्तौ तद्विपर्यायौ यावत्। वर्गादिषु विषमयुजां क्रमोत्क्रमाद्वर्धयेत् पादान् ॥२॥

एकैकेन द्वया द्वयाः सोप्यधिकेषु तत् प्रतिष्ठेषु। वर्गादिरभीष्टान्तः प्रस्तारो भवति यवमध्यः ॥३॥

सूनोन्तयो द्विपदाग्रं त्रिपदाद्यानामवः प्रुथक् संख्या। तच्छोध्यो व्येकः प्रुथगन्ताद्रू पमूध्र्वयुतम् ॥४॥

यावत् पादाव्योकागच्छाद्वरर्गेष्वथैक वूध्देषु। रूपाधुतद्याते वर्गाद्यानां परा संख्या ॥५॥

रूपाधिकपादार्धो विषमेषूध्र्वः समेषु पादार्धो। त्रर्धाद्विगुरगां व्येकां युस्नान्यध्स्तस्य सर्वेषाम् ॥६॥

माध्यैस्तथार्धहीनैःक्रमपादैर्व्यस्ततुल्यपादाद्यः। विषमे व्येकं मध्ये प्रोह्वाद्यान्यतः कुर्यात् ॥७॥

सैकक्रम तुल्याद्य र्न्यासोअभ्यधिको विशोधिरचाधः। संख्यैक्यं ताट्टक् याट्टक् प्राथमस्त्रिरहितो नष्टे ॥८॥

माध्यैः क्रुतैष्व दलितैः समसंख्यायां क्रमोत्क्रमात्ससक्षेप्यम्। विषमायां व्योकायां दलं क्रमाद्रुत्क्रमात्सैकम् ॥९॥

समसंख्यायां सोपानक्रमोत्क्रमाभ्याः तथैव विषमाभ्याम्। कल्प्यापचिते हष्टे प्रथ्मः शेषाक्षराष्यन्ते ॥१०॥

समदल समविषमारगां संख्या पादार्ध सर्वकल्पवधः। स्वाद्यावधौअन्यैः पादैः स्वपरस्य प्राग्वद्यः सैकैः ॥११॥ १३२० छन्दश्चित्युत्तराध्यायः आद्यादनन्तरोऽधः कल्प्योऽन्यतुल्यमाद्यः प्राक् । न्यासो वर्गोऽन्योनः प्रस्तारोऽसमविषमाणाम् ॥ १२ ॥ नष्टेऽन्त्यात् स्वाधस्थोनकल्पघतोऽर्धतुल्यविषमाणाम् । व्येकः पृथक् स्वबर्नाडुतः फलं तुल्यकल्पान्नाम् ।। १३ । उद्दिष्टे कल्पहृतेऽतीतैः प्रथमः फले स्वरूपेऽन्यः । असकृद्वर्गाशयुते सैके वार्धसमविषमाणाम् ।। १४ ।। कल्पेष पृथक् गुरुलघु संख्यैकाविभाजिता प्राग्वत् । विषमेष्वाद्यलधूनो लघुभिर्मोहः समादीनाम् ॥ १५ ॥ एकद्वितयोः परतो द्विसगुणोऽनन्तराद्विरूपोऽधः । वर्गधराद्योनोवलसमविषमाणां ध्वजो लघुभिः ।। १६ ।। लघुसंख्या पददलिता परतोऽधोऽधश्च शुध्यति हृता यैः। द्विगुणान्तैः शुद्धेर्वर्गपरैर्मन्दरो लघुभिः ।। १७ ।। कृत्वाऽधोऽधः कल्प्यन्येकाद्येकोत्तरानधस्तेषाम् । स्वात्परतोऽन्यैक्यमधः प्रस्तारादुक्तवदिहाडैः ॥ १८ ।। शुरुषष्टचेकानि घटीद्विगुणान्येकांगुलानि संख्या स्यात् । द्वाविशतिरार्याणां छन्दशित्युत्तरोऽध्यायः ॥ १७ ॥ इति श्रीब्राह्मस्फुट सिद्धान्ते छन्दश्वित्युत्तरोऽध्यायो विंशतितमः ।। २० ।। ब्राह्म्स्फुटसिध्दान्तः गोलाध्याथः o g. TrcsTRf ^Frnrf snfa ^^sPTCQf *nr ?r prefer 1 a^w- Jnrqf fwWT ?Tff%, <PT ?f^rf%% il^NHWl fk^Fft ^<?nmt3 ?rf-

ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः अथ गोलाध्यायः व्याख्यायते। तत्र प्रथमं तदारम्भप्रयोजनमाह।

ग्रहनक्षत्रभ्रमणं न समं सर्वत्र भवति भूस्थानाम्। तद्विज्ञानं गोलाद्यतस्ततो गोलमभिधास्ये॥१॥

सु.भा. - भूस्थानां जनानां सर्वत्र ग्रहनक्षत्रभ्रमणं समं न भवति। तद्भ्रमणसंस्थानविज्ञां च यतो गोलादेव भवति ततोsहं गोलमभिधास्ये कथयामीति ॥१॥

वि.भा. - भूगोलनिवासिनां जनानां मद्ये ग्रहाणां नक्षत्राणां च भ्रमणं सर्वत्र समं (एकरूपं) न भवति, तेषां ग्रहनक्षत्राणां भ्रमणवैषम्यस्य विज्ञानं यतो गोलात् (गोलाध्यायात्) भवति, ततोSहं (ब्रह्मगुतः) गोलं (गोलाध्यायं) अभिधास्ये (कथयामि)। प्रायः सर्वेSपि ज्यौतिषसिद्धान्तग्रन्था ग्रहगणितगोलाध्यायाभ्यां विभक्त्ता भवन्ति, तत्र ग्रहगणिते ग्रहसाधनादयो विधयो गोलाध्याये ग्रहसाधनादिविधीनामुपपन्तयश्च वर्णिता भवन्ति, पूर्वं ग्रहसाधनादिविधीनुक्त् वाSधुना तदुपपत्तिं कथयतीति। सिद्धान्तशेखरे "उडुग्रहाणं भ्रमणं न तुल्यं सर्वत्र भूगोलनिवासिनां हि। तत्तत्त्वबोधावगतिस्तु गोलादतः स्फुटं गोलमिहाभिधास्ये" श्रीपतिनाप्याचार्योक्तानुरूपमेव कथ्यत इति ॥१॥

अब गोलाद्याय प्ररम्भ किया जाता है, उसमें पहले आरम्भ करने का प्रयोजन कहते है।

हि.भा. - भूगोल निवासी लोगों के मध्य में ग्रहों का भ्रमण और नक्षत्रों का भ्रमण सब जगह समान (एकरूप) नहीं होता है उनके भ्रमणवैषम्य का ज्ञान गोलाध्याय से होता है इसलिए मैं (ब्रह्मगुप्त) गोलाध्याय को कहता हूं। प्रायः ज्यौतिष के सब सिद्धान्त ग्रन्थ ग्रहगणित और गोलाद्याय से विभक्त होते हैं। ग्रहगणित में ग्रहसाधनादि विधियों का वर्णन् रहता है और गोलाध्याय में उनकी उपपत्तियों का वर्णन् रहता है। पूर्व में ग्रहसाधनादि विधियों को कह कर अब उनकी उपपत्ति कहते हैं इति ॥१॥

                             ब्राह्यस्पुटसिद्वान्ते
                           इदानीं भूगोलसंस्थानमाह ।   
                शशिबुधसिताकं कुजगुरुशनिकक्षावेष्टितो भ कक्षान्तः ।
                भूगोलः सत्वानां शुभाशुभैः कर्मभिरुपात्तः ॥२॥ 
  सु.भा. - अयं भुगोलः सत्वानां प्राणिनां शुभाशुभैः कर्मभिरुपात्तः प्राप्तो भवति। 'भूमेः पिण्डः               शशाङ्कग्नकविरवि-इत्यादि भास्करोक्तमेतदनुरुपमेव्। शेषं स्पष्टम्॥२॥
 वि.भा.-- चन्द्रबुधशुक्ररविकुजगुरुशनीनां कक्षावृत्तैर्वेष्टितः  (आवृतः) नक्षत्रकक्षाया मध्येsयं भुगोलोस्ति यश्च प्राणिनां 'शुभाशुभैः कर्मभिः प्राप्तो भवति। चन्द्रबुधशुक्रादिग्रहकक्षावृत्तानां कथमीदृशी उपर्युपरि स्थितिरस्ति तधुक्तिग्नानार्थ मध्यमाध्यायो द्रष्टव्यो वा मदृकाविभूषितो वटेश्वरसिध्दान्तस्य मध्यमाधिकारो द्रष्टव्यः भुमेः स्वरुपे मतान्तराणि सन्ति यथा "अदर्शोदरसन्निभा भगवती विश्वम्भरा कीर्तिता, कैश्चित् कैश्चन कूर्मपृष्ठसदृशी कैश्चित् सरोजाकृतिः। अस्माकं तु कदम्बपुष्पनिचयग्रन्थेः समा सम्मता सर्वत्रासुमतां चयेन निचिता तोयस्थलस्थायिनाम्" कैश्चित् पौराणिकैः देवतास्वरुपा भगवती पृध्वी मुकुरतलतुल्या कथिता, कैश्चन कूर्मपृष्ठसदृशी उन्नतमध्या, कैश्चित् कमलाकारा कथिता, अस्माकं ज्योतिषिकारणं तु कदम्बपुष्पनिचयग्रन्थेः समा, सर्वत्र जीवानां चयेन निचितानुमतेति सिद्धान्तशेखरे श्रीपत्युक्तिरस्ति,सिद्धान्तशिरोमणौ 'सर्वतः पर्वतारामग्रामचैत्यचयैश्चितः। कदम्बकुसुमग्रन्थिः केसरप्रसरैरिव' भास्करोक्तिरियं श्रीपत्युक्तिसद्दश्येवास्ति, परन्तु नवीनाः पृथिव्या आकृतिं दीर्ध पिण्डाकृतिसदृशीं स्वीकुर्वन्ति। ग्रहनक्षत्रकक्षावृत्तसंस्थानसम्बन्धे सिद्धान्तशेखरे 'विधुबुधसित सूर्योरैज्यपातग्ङिकक्षावलयपरिवृत्तोसावृक्षकक्षोदरस्थ' इत्यादि श्रीपत्युक्तिरियं सिद्धान्तशिरोमणै 'भूमेः पिण्डः शशाङ्कग्न-कविरविकुजेज्यार्किनक्षत्रकक्षावृत्तैवृत्तो वृत्तः सन् मृदनिलसलिलव्योमतेजोमयोsयम्' भास्करोक्तिरियं चाssचार्योक्तिसदृश्येवास्तीति सम्प्रति वेधेन चन्द्रो भुवः समन्ताद् भ्रमणं करोति तथा सूर्यात् परितः क्रमेण बुधशुक्रभूमिभौमगुरुशनि नक्षत्राणि भ्रमन्तीति सिध्यति। अत एव प्राचीनानां भूस्थिरवादिनां भूपरितो ग्रहा म्रमन्तीति  वदतां मते बुधशुक्रकणंयोर्महदन्तरमिति प्रसिद्धम्। पूर्वपश्चिमयोस्तयोर्द्दश्यादृश्यत्वं च तन्मते न धटते। ग्रहाणामूर्ध्वाधरत्वं च तेषां कर्णानां ज्नानेन स्फुटं  विज्नायते। बिम्बीयकर्णानामानयनं पूर्वमेव मध्यमाध्याये मया लिखितं तत्तत एव ज्नातव्यम्। एवं रविग्रहबिम्बान्तरवेधेन सर्वे ग्रहा रविपरितो भ्रमन्तीति स्फुटं सम्प्रति नव्यमतेन विज्नायत इति॥२॥
    अब भूगोल संस्थान को कहते है।  
 हि.भा.-चन्द्र-बुध-शुक्र-रवि-मङ्गल-गुरु (बृहस्पति) शनि इन सवों के कक्षावृत्तों |                  गोलाध्यायः

से वेष्टित (धिराहुआ) नक्षत्र कक्षा के मध्य में यह भूगोल है, जो प्राणियों के शुभ-अशुभ कर्मो से प्राप्त होता है। चन्द्र बुध शुक्रादिग्रह कक्षावृत्तों की क्यों इस तरह उपर्युपरिस्थिति है इस की युक्ति के लिये मध्यगति अध्याय में लिखित उपपत्ति अथवा बटेश्वर सिद्धान्त के मध्यमा धिकार में हमारी लिखी हुई टीका देखनी चाहिये । भूगोल के स्वरूप में बहुत मतान्तर है जैसे पौराणिक लोग देवता स्वरूप भगवती पृथ्वी को अयनक के तल सदृश कहते हैं, कोई कोई कछुए की पृष्ठ के सदृश पृथ्वी के स्वरूप कहते हैं, कोई कोई कमल के आकार के सदृश कहते हैं, हमारे ज्यौतिषिकों के मत से कदम्ब फल के सदृश है और जिस तरह कदम्ब फल में सर्वत्र केसर रहता है उसी तरह इस गोलाकार पृथ्वी के ऊपर सर्वत्र प्राणियों की स्थिति है यह विषय सिद्धान्तशेखर में ‘प्रादशदरसन्निभा भगवती विश्वम्भरा' इत्यादि विज्ञान भाष्य में लिखित श्लोक से श्रीपति ने कहा है, सिद्धान्तशिरोमणि में ‘सर्वतः पर्वतारामग्रामचैत्य चयैश्चित:’ इत्यादि श्लोक से भास्कराचार्य ने भी श्रीपति के कथनानुसार ही कहा है लेकिन नबीन लोग पृथ्वी का आकार दीर्घपिण्डाकार मानते हैं, इसके सम्बन्ध में वटेश्वर सिद्धान्त के मध्यमाधिकार में हमारी लिखी हुई टीका देखनी चाहिये ! ग्रह-नक्षत्र कक्षावृत्तों की स्थिति के सम्वन्ध में सिद्धान्तशेखर में , ‘विधुबुधसितसूर्यारेिज्यपातङ्गिकक्षा' इत्यादि से श्रीपति तथा सिद्धान्त शिरोमणि में ‘भूमेः पिण्डः शशाङ्कज्ञ कविरविकुजेज्याकिं नक्षत्रकक्षावृत्तै: इत्यादि से भास्कराचार्य ने भी अचार्योक्त के अनुरूप ही कहा है । सम्प्रति वेध से चन्द्र पृथ्वी के चारों तरफ भ्रमण करती है तथा सूर्य के चारों तरफ क्रम से बुध-शुक्र पृथ्वी-मङ्गल-गुरु-शनि और परिभ्रमण करते हैं यह सिद्ध होता है, इसलिये प्राचीनों नक्षत्र के ‘पृथ्वी स्थिर है उसके चारों तरफ ग्रह भ्रमण करते हैं। मत में बुध और शुक्र के कर्ण में बहुत अन्तर होता जो नहीं होना चाहिये । तथा उन (प्राचीनों) के मत में बुध और शुक्र का दृश्वाद्दश्यत्व नहीं घटता है । ग्रहों का ऊधधरत्व उन (ग्रहों) के बिम्बीय कर्णज्ञान से समझा जाता है । बिम्बीय कणों का आनयन प्रकार मैं पहले ही मध्यमाध्याय में लिख चुका हूँ। वह वहीं से समझना चाहिये; एवं रवि और ग्रह के बिम्बान्तर वेघ से रवि के चारों तरफ सवग्रह भ्रमण करते हैं यह इस समय नवीनों के मत से समझा जाता है इति ॥२॥

             इदानीं देवासुरसंस्थानमाह ।
       खे भूगोलस्तदुपरि मेरौ देवाः स्थितास्तले दैत्याः ।
               खे भगणाक्षाग्रस्थावुपर्यधश्च ध्रुवौ तेषाम् ॥३॥
 सु. भा-आकाशे भूगोलस्तदुपरि मेरुस्तत्र मेरावुपरि देवाः स्थिताः । तले

मेरुतले कुमेरौ दैत्याः स्थिताः । तेषां दैवदैत्यानां ख आकाशे भगणाक्षाग्रस्थौ भगणाक्षो ध्रुवयष्टिस्तदग्रस्थौ ध्रुवावुपर्यधश्च । देवानामुत्तरो ध्रुव उपरि दक्षि णोऽधो दैत्यानां दक्षिण उपरि उत्तरो ध्रुवश्चाध इति । ‘सौम्यं ध्रुवं मेरुगताः खमध्ये' इत्यादि भास्करोक्तमेतदनुरूपमेव ॥३॥ वि.भा - खे {स्राकाशे} भूगोलोस्ति, भूगोलोपरिमेरुरस्ति, मेरावुपरि भागे देवाः स्थिताः सन्ति, मेरुतले(मेरोरघोभागे)कुमेरॉ दत्याः स्थिताः सन्ति, तेषां(देवानां दत्यानं च) खे ( स्राकाशे ) भगक्शाग्रस्थॉ घ्रुवो उपर्यघशृवार्थात् देवानामुतरो उपरि, दक्षिघ्रुचाधः, द्त्यानां द्क्षिघ्रुव उपरि, उतर घ्रुवक्ष्वाध इति॥ सिद्धान्तरोवरे स्वमूर्घगं मेरुगतास्तमुतरं तथेतरं वाडववा सिनो जनाः, वडवानलवासिनः - दत्याः । स्रीपत्युक्तामिदं सिद्धान्तशिरोमएऑ सॉभ्यं घ्रुवं मेरुगताः खमध्ये याभ्यं च दत्या निजमस्तकोध्र्वे, भास्करोक्तमिदं चाचार्योक्तानुरुपमेवास्तीति ॥ ३ ॥

      स्र्ब देव झॉर दत्य के संस्थान (स्थिति) को कहते हे । 

हि.भा.- भाकाश में भूगोल हे, भूगोल के ऊपर मेरु हे, मेरु के ऊपरी में देवता लोग स्थित हे म्रॉर मेरु के स्रघो भाग (कुमेरु) में द्त्या लोग स्थित हे। देवताभों भॉर द्त्यों के भाकाश में घ्रुवयष्टी के स्रग्रदूय में स्थित दोनों का दक्षिणा ध्रुव हे उतर ध्रुव नीचे में हे ॥ सिद्धान्तशेखर में स्वमूर्चग मेरुगतास्तमुतरं इत्यादि प्राष्य में लिखित पध से स्रीपति तथा सिद्धान्त शिरोमरिग में सॉभ्यं घ्रुवं मेरुगताः इत्यादि वि.भा.लिखित पध से भास्कराचायं ने भी स्राचायोंक्त के स्र्नुरुप ही कहा ॥ ३ ॥

  इदानीं देवानां दैत्यानां च भचक्रभ्रमणव्यवस्थामाह । 
  
  ध्रुवयोर्बद्धं सव्यगममराणां क्षितिजसंस्थमुडुचकम्। 
  अपसव्यगमसुराणां भ्रमति प्रवहानिलाक्षिप्तम् ॥ ४ ॥ 

सु.भा.- स्पष्टम् । सव्यापसव्यं भ्रमदृक्षचक्रम् इत्यादि भास्करोक्तमेतमेव ॥४॥

वि.भा.- प्रवहवायुनाप्रेरितं ध्रुवयष्ट्यधीनं देवानां क्षितिज संसक्तं भचक्रं सव्यगं भ्रमति, दैत्यानामपसव्यगं भ्रमत्यर्थादुतरं क्रान्तिण्डलार्थं देवाः सव्यगं पश्यन्ति, दक्षिणं तदर्धं-अपसव्यगं दैत्याः पश्यन्ति, सव्यगमिति पश्चिमाभिमुखं भ्रमत् अपसव्यगं च पूर्वाभिमुखं भ्रमदित्यर्थः । चलद् भमण्डलं स्वक्षितिजगतं देवा देत्यारच पश्यन्ति, तत्क्षितिजमण्डलेन सह क्रान्तिव्रूसस्य स्थानद्वये योग इति नक्षत्रचक्रंक्षितिजव्रुतमुपचयते । दक्षिण्ं क्रान्तिव्रुतार्ध्ं कदाचिदपि देवर्नावेक्ष्यते उतर्ं कान्तिव्रुतार्घ्ं द्त्यनयिक्ष्यत इति ॥ सिद्धान्तशेखरे सॉम्यं हि मेषाधपमण्डलार्घं पश्यन्त्यमी सव्यगमेव देवाः । तुलादिकं दक्षिएमन्यदर्घं सदेव देत्यास्त्व

                                  गोलाध्यायः

पसव्यवर्त्ति श्रीपत्युक्तमिदं सिध्दान्तशिरोमरगो 'सव्यापसव्य्ं भ्रमहक्षचक्र्ं विलोकयन्ति क्षितिजप्रसक्त्म्' भास्करोक्तमिदं चाऽऽचार्योक्तानुरूपमेवेति ||४||

हि भा- प्रवह् वायु द्वारा प्ररित ध्रुव यष्टी के अधीन( अर्थात् ध्रुव यष्टी के घुमने से घूमने वाला) देवों का क्षितिज व्र्त्त संसक्त भचक्र सव्य घूमता है, और द्वैत्यों का अपसव्य घूमता है, अर्थात् क्रान्तिमण्डल के उत्तरार्ध को देव सव्यग देखते हैं, क्रान्ति मण्डल के दक्षिनार्ध को दैत्य अपसव्यग देखयते हैं,सव्यग से पश्चिमाभिमुख भ्रमन करते हुए और अपसव्यग से पूर्वाभिमुख अमन करते हुए समत्भना चाहिए । सिधान्तशेखर में 'सोम्यं हि मेषाद्यपमण्डलार्ध' इत्यादि विग्नान भाष्य में लिखित श्लोक से श्रीपति तथा सिधन्त शिरोमनि में 'सव्यापसव्यं अमक्षचक्रं' इत्यादि से भास्कराचार्य ने भी आचार्योक्त के अनौरूप ही कहा है इति ||४||

                             इदानीं चक्रभ्रमनव्यवस्थामाह । 
                      अन्यत्र सर्वतो दिशमुन्नमति भपञ्जरो ध्रुवो नमति ।
                       लन्कायामुडुचक्र्ं पूर्वापरगं धुवौ क्षितिजे ||५|| 


सु भा अन्यत्र मेरुतोन्यत्र सर्वतो दिशं भूगोले भपञ्जरो भचक्रमुत्रमति ध्रुवश्च नमति । लङ्कायामुडुचक्रं भचक्रं पूर्वापरगं सममण्डलाकारं ध्रुवौ च क्षितिजे स्त इति । आचार्येन यथा यथा मेरुतो द्रष्टा सर्वतो दिशं याति तथा तथा ध्रुवो नमतीत्युक्तम् । भास्करेन लङ्कमेव् मूलस्थानं प्रकल्प्य स्थिति: प्रतिपादिता 'प्रतो निरक्षदेशे क्षितिमण्डलोपगौ ध्रुवौ नर: प्श्चयति द्क्षिनोत्तरौ' इत्यादि भास्करोक्तमेतदनुरूपमेव ||५||

वि भा -मेरूतोन्यत्र सर्वतो दिशं पृथिव्यां भपञ्जर:(भचक्र)उन्नमति,ध्रुवश्च नमति,लङ्कायां भचक्रं पूर्वापरगं सममण्डलाकार ध्रुवौ च तत्क्षितिजे स्त:। द्रष्टा मेरौतो यथा यथा सर्वतो दिशं याति तथा तथा ध्रुवौ नमतीत्याचार्येनोक्त्म्। लङ्कोमेव मूलस्थानं मत्वा भास्कराचार्येन स्थिति:प्रतिपादिता तेन 'निरक्षगदेशे क्षितिमण्डलोपगौ ध्रुवौ नर: पश्यति दक्षिनोत्तराव' त्यादि भास्करोक्ताऽऽवार्योक्तयोर्न कोऽपि भेद:,अर्थत् मेर्वभिमुखं गच्छतो नरस्योत्तरध्रुवोन्नतिस्तथा भचक्रस्य नतिर्भवति,एवमुत्तरभागतो निरक्षदेशाभिमुखं गच्छतो नरस्य विपरीते नतोन्नते भवतोऽर्थदुत्तरध्रुवस्य नतिर्भचक्रस्योन्नतिर्भवति,'उदग्फ़्इशं याति यथा यथा नर:'इत्यादि भास्करोक्तरिदं स्फुटमस्ति,निरक्षाद्वहुत्रोत्तरदेशेऽपि उत्तरध्रुवदर्शनं न भवत्यतोऽत्र सिधान्तप्रतिपादने भूपृष्ठावरोधनमनङ्गीकृत्य भुगर्भत:सर्व विचर्यम् ध्रुवयोर्बधं भचक्रं प्रवहवायुनाऽऽक्षिप्तं सततं पश्चिमाभिमुखं। १३२८ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त भ्रमति । चन्द्रादीनां ग्रहाणां कक्षाश्च तस्मिन् भचक्र बद्धा भ्रमन्तीति । सूर्यसिद्धान्ते “ध्रुवोन्नतिर्भचक्रस्य नतिर्मेरुं प्रयास्यतः । निरक्षाभिमुखं यातुर्विपरीते नतोन्नते । भचक्र' ध्रुवयोर्बद्धमाक्षिप्तं प्रवहानिलैः । पयत्यजसू ' तन्नद्धा ग्रहकक्षा यथाक्रमम्” इति सूर्याशपुरुषोक्तसदृशमथवाऽऽचार्योक्त चेति ॥५॥ अब चक्रस्रमण व्यवस्था को कहते हैं। हि. भा-मेरु से अन्यत्र सब दिशाओं में भचक्र की उन्नति होती है और उत्तर ध्रुव की नति होती है । लङ्का में भचक्र सममण्डलाकार है और दोनों ध्रुव लङ्का क्षितिज में हैं । द्रष्टा मेरु से ज्यों ज्यों सब दिशाओं में जाते हैं त्यो त्यों ध्रुव की नति होती है यह आचार्य का कथन है, परन्तु लङ्का ही को मूल स्थान मानकर भास्कराचार्य ने स्थिति का प्रति पादन किया है इसलिये निरक्षदेशे क्षितिमण्डलोपगौ' इत्यादि भास्कराचार्योक्ति और आचार्योक्ति में कुछ भी भेद नहीं है। अर्थात् मेंरु की ओर जाते हुए मनुष्य को उत्तर ध्रुव की उन्नति और भचक्र की नति देखने में आती है । एवं उत्तर भागं से निरक्ष देशाभिमुख जाते हुए मनुष्य को नति और उन्नति विपरीत देखने में आती हैं अर्थात् उत्तर ध्रुव की नति और भचक्र की उन्नति देखने में आती है । ‘उदग्दिशं याति यथा यथा नरः' इत्यादि भास्करोक्ति से यह स्फुट है । निरक्षदेश से उत्तर भी बहुत देशों में उत्तर ध्रुव का दर्शन नहीं होता है, इसलिए यहां सिद्धान्त कहने में भूपृष्ठजनित अवरोध को स्वीकार न कर भूगर्भ ही से सब कुछ विचार करना चाहिए ।। सूर्य सिद्धान्त में भी ‘ध्रुवोन्नतिर्भचक्रस्य’ इत्यादि विज्ञान भाष्य में लिखित श्लोकों से इन्हीं बातों को कहा गया है इति ॥५॥ इदानीं देवादीनां रविम्रमणस्थिति कथयति । देवाः सव्यगमसुराः पश्यन्त्यपसव्यगं रवि क्षितिजे । विषुवति समपश्चिमगं निरक्षदेशस्थिताः पुरुषाः ॥६॥ सु० भा०-विषुवति मेषतुलादौ देवाः क्षितिजे रविं सव्यगमसुरा' अपसव्यगं निरक्षदेशस्थाः पुरुषाश्च समपश्चिमगं पश्यन्तीति प्रसिद्धम् ॥६॥ वि. भा.-देवा दैत्याश्च नाडीमण्डलरूपक्षितिजे विषुवति (सायनमेषतुलादौ) क्रमशः सव्यगमपसव्यगं रविं पश्यन्ति । निरक्ष देशवासिनस्तं रविं (सायनमेषादौ सायनतुलादौ च स्थितं सूर्य) पूर्वापरवृत्तानुकारे नाड़ीवृत्ते पश्यन्तीति ॥६॥ अब देवादियों की रवि भ्रमण स्थिति को कहते हैं । हि. भा.-नाड़ी मण्डल रूपक्षितिज में सायन मेषादि में और सायनतुलादि में (१) ‘देवासुरा विषुवति क्षितिजस्थं दिवाकरम् । पश्यन्ति’ इति सूर्य सिद्धान्तेऽप्येव गोलाध्यायः १३२९ सव्यगत रवि को देवता लोग देखते हैं और दैत्य लोग अपसव्यगत देखते हैं । निरक्ष देश वासियों के नाडीवृत्त पूर्वापर वृत हैं इसलिए वे लोग तब (सायन मेषादिस्थित सूर्य को और गायन तुलादि स्थित सूर्य को पूर्वापर वृत्तगत देखते हैं इति ॥। ६॥ इदानीं देवदैत्ययोराशिसंस्थानमाह । सौम्यमपमण्डलार्ध मेषाद्य सव्यगं सदा देवाः । पश्यन्ति तुलाद्यघं दक्षिणमपसव्यगं दैत्याः ॥७॥ सु. भा.- देवः सदा मेषाचं सौम्यमुत्तरं क्रान्तिमण्डलार्ध सव्यगं दैत्याश्च तुलादिक्रान्तिमण्डलाधं दक्षिणमपसव्यगं पश्यन्ति । अत्रोपपत्तिः । गोलसंस्थानेन ‘लम्बाधिका क्रान्तिरुदक् च यावद्'-इत्यादि भास्करवि घिना स्फुटा ।।७। वि. आ-देवाः सर्वदा मेषाद्यमुत्तरं कान्तिवृत्ताख़सव्यगं पश्यन्ति । दैत्याः तुलादिक्रान्तिवृत्ताधं दक्षिणं (अपसव्यगं) पश्यन्तीति । मेरो कुमेरौ चाक्षांशा नवतिः==९०, अतो लम्बांशाः =०, तेनमेषादिषण्ण राशीनां क्रान्तेर्लम्बांशाधिकत्वात्तदहोरात्रवृत्तानां तत्क्षितिजोध्वगतत्वाच्च तत्र स्थितं रैव देवाः सर्वदा पश्यन्ति । एवमेव तुलादिषण्णां राशीनां क्रान्तेरपि लम्बांशाधिकत्वात्तदहोरात्रवृत्तानां तक्षितिजोर्वगतत्वात्तेषु राशिषु स्थितं सूर्ये सर्वदा दैत्यः पश्यन्त्येव । दिनरात्रिसम्बन्धे सिद्धान्तशिरोमणौ ‘लम्बाचिका क्रान्तिरुदक् च यावत्तावद्दिनं संततमेव तत्र। यावच्च याम्या सततं तमिस्रा' इत्येवं भास्करेण यत् कथितं तेनैव स्फुटमस्तीति ॥७७lt अब देवों के और दैत्यों के राशि संस्थान को कहते हैं । • हि. मा--देवता लोग मेषादि उत्तर क्रान्तिवृत्तार्घ को सर्वदा सव्यगत देखते हैं । तथा दैत्य लोग तुलादि क्रान्तिवृत्तार्घ को अपसव्यगत देखते हैं इति ।।७। . उपपति । = मेरु में और कुमेरु में अक्षाश=६९अतः लम्बश शून्य=०, है इसलिये मेषादि (उत्तर गोलीय) छः राशियों की क्रांतियों के लम्बांशाचिक होने के कारण उन राशियों के अहोरात्रवृत्तों के क्षितिजवृत्त से ऊपर होने से उन राशियों में स्थित सूर्य को सर्वदा देखते हैं । ftrsra ^ '^rrfri fegsrfa - 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एवं तुलादि ( दक्षिरगगोलीय ) छाः राशियों की क्रान्तियों के लम्बांशाविक होने के काररग उन राशियों में स्थित सूर्यं को दैत्य लोग सर्वदा देखते है, सिद्धान्त शिरोम में 'लम्बाधिका क्रान्तिरुदक् ' इत्यादि संस्क्रुतोपपन्ति में लिखत भास्करोक्त्त श्लोक से यह स्पष्ट है । सूर्यं सिद्धान्त में ' देवासुरा विषुवति क्षितिजस्थं दिवाकरम् । पश्यन्ति ' इससे सूर्याश पुरुष आचार्योक्त के सद्दश ही कहा है इति ॥ ७ ॥

                                                       इदानीं देवदैत्ययोः पित्रुमानवयोश्च दिनप्रमारगमाह् ।
                                                       पश्यन्ति देवदैत्या रविवर्षार्वमुदितं सकृत् सूर्यम् ।
                                                       शशिगाः  शशिमासाधं पितरो भूस्था नराः स्वदिनम् ॥ 

सु. भा ‌--- देवदैत्याः सकृदुदित्ं सूयं रविवर्षाधं सौरवर्षदलपर्यन्तं शशिगाः शशिपृष्ठस्थाः पितरश्चा शशिमासारधं पर्यन्तं भूस्था नराश्च स्वदिनं स्वदिनमानपर्यन्तं पश्यन्ति । श्रत्रपपत्तिः । भास्करगोलाध्यायतः स्फुटा ॥ ८ ॥ वि. भा. ---- देवा दैत्याश्रान्द्र्मासार्ध रविं पश्यन्ति । पृथिव्यां स्थिता मनुष्याः स्वदिनमानपर्यन्तं रविं पश्यन्तीति। पितृभि


                                                                            त्र्व्यत्रोपपत्तिः ।

उत्तरध्रुवो देवानां खस्वस्तिकम् । दक्षिरगध्रुवश्च दैत्यानां खस्वस्तिकम् । ध्रुवाभ्यां नवत्यंशोन यद्व त्त्ं तन्नडीवृत्तं देवदानवयोः क्षितिजवृत्तम् । नाङीवृत्तक्रान्तिवृत्तयोः सम्पाते सायनमेषादौ सायनमेषादो सायनतुलादौ च रविदर्शनानन्तरं पुनस्तत्सायनमेषादो सायनतुलादौ च रविदर्शनं यावता कालेन भवेत् स रवेरेकभगरगः ( सायनरविभरगः ) देवदैत्ययारहोरात्रप्रमारगं भवति, परन्त्वेकसायनभगरगभोगः सौरवर्षमतो देवदैत्ययोः सायनसौरवर्षाधं ( षण्मासप्रमारगं ) दिनं सिद्धम् । परन्तु देवदैत्ययोर्दिनरात्री विलोमेन भवतोsर्थाद्यदा मेषदावुदितं रविं प्रतिदिनं क्षितिजोपरिगतं देवाः पश्यन्ति तदा देवानामधः स्थितत्वाद्दैत्यस्तं रविं न पश्यन्ति, श्रतो यदा देवानां दिनं तदा दैत्यानां रात्रिः , यदा देवानां रात्रिस्तदा दैत्यानां दिनमिति। सिद्धान्तशेखरे " सकृदुदगतो दिनकरः सुरासुरैरपि वत्सरार्धँअवलोक्चले स्फुटम्। पितृभिश्र्च मासदलमिन्दुगोलगैर्द्युदलं महीतलगतैश्र्च मानवैः " श्रीपतिनाsनेनाक्षररश श्र्पाचार्योत्का नुरूपमेव कथितम् । श्र्पस्योपपत्तिर्दिनरात्रिस्वरूपे च सिद्धान्तशिरोमरगौ ।


                                                  "विषुवदवृत्तं द्दुसदां क्षितिजत्वमितं तथा च दैत्यानाम् ।
                                                    उत्तरयाम्यौ क्रमशो मूर्र्ध्वोर्ध्वगतौ ध्रवौ यतस्तेषाम् ॥                                   गोलाघ्यायः
       उत्तरगोले क्षितिजादूर्ध्वे परितो भ्रमन्तमादित्यम्।
       सव्यं त्रिदशाः सततं पश्यन्त्यसुरा असव्यगं याम्यो॥
      
     सांहितिका उत्तरायरगदक्षिरगायने देवानां दिनरात्री भवत इति कथयन्ति 

एतस्य खण्डनं सेद्धान्तशेखरे।

        दिनप्रवृत्तिर्मरुतामजादॉ च निशप्रवृत्तिः।
        ते कल्पिते यॅर्मृ गकर्कद्योरत्रॉपर्पात न च ते ब्रु वन्ति॥
        द्वन्द्वान्तयातं कनकाद्रियाताः पश्यन्ति पङ्के रुहिरगीपतिं चेत्।
        भ्रपक्रमस्यात्र समानतायां कथं कुलीरे न विलोकयन्ति॥
    
     देवानां मेषादॉ सूर्ये दिनारम्भः,तुलादो च रात्र्यारम्भः, यॅः सांहितिकॅस्ते 

दिनरात्रि मकरकर्काद्योः कल्पिते तेSत्रं युत्त्क न कथयनन्ति। अर्थात् कथमुत्तर- दक्षिरगायने देवानां दिनरात्री भवत इत्यत्र ते सांहितिकाः काञ्चियद्यत्त्किं न वदन्ति। देवा मिधुनान्तस्यितं सूयं यदि पश्यन्ति तदा कर्कराशॉ क्रान्तेः समत्वे कथं न पश्यन्थीति प्रश्नाः। त्रस्य किमप्युत्तरं न तेन 'मत्रोपर्पात्त न च ते ब्रु वन्ति' लथनमिदं युत्त्कम्। श्रीपतिरत्नमालातयाम्-

        "शिशिरपूर्वमृतुत्रयमुत्तरं ह्ययनमाहुरह्श्र्व तदामरम्।
        भवति दक्षिरगमन्य दृतुत्रयं निगदिता रजनी मरुतां च सा॥
        गृहप्रवेशत्रिदशप्रतिष्ठाविवाह चॉलव्रत बन्धपूर्वम्।
        सॉम्यायने कर्म शुभं विधेयं यदृगर्हितं तत्खलु दक्षिरगे च॥"
        इत्यनेन श्रीपातिरपि संहितोकत्त्कफलादेश्थं- उत्तरदक्षिरगायने एव दिनरात्री

कथयित्वाSत्र ज्यॉतिष सिद्धान्ते "म्रत्रोपर्पात्त न च ते ब्रु वन्ती" ति तदुपहासं करोतीति॥

                                  पितृदिनोपपत्तिः।
    चन्द्रस्योर्ध्वभागे पितरो निवसन्ति। भूगर्भज्वन्द्रकेन्द्रगता रेखा पितृररगामूर्ध्व-

यामयोत्तरवऋत्ते यत्र लगति तत्र तेषामूर्ध्वखस्वस्तिकम्, तत्रेव प्रिरगातवन्द्रेSपि, यदि तत्र रविरपि भवेच्चन्द्रस्य शराभावश्चेत्तदा रबिच्न्द्रयोरेकत्र स्थित्वाद्दर्शान्तः, ऊर्ध्वखस्यस्तिकगते रवो दिनाधं भवति तेन दर्शन्ते पितृरगां दिनाघं भवतीति सिध्यति, संव भुगर्भतश्चन्द्रकेन्द्रगता रेखाSघोयाम्योत्तरवृत्ते यत्र लर्गात, तत्र तेषामधः खरस्वस्तिकहम्। तत्र रविच्न्द्रयोः षड्भान्तरत्वात् पुरर्गाः पितृरगामर्धरा- त्रश्र्व, पितृरगाममावास्यां मध्यान्हत्वात् पूरर्गान्ते च रारत्र्यदर्धत्वात्तारतम्येन कृष्रग- पक्षस्य सार्घसप्तम्यां रविरुदेति शुक्लपक्षस्य साघंसप्तमयां चास्तमेतीति सिध्यति। सिद्धान्तरोक्खरे चान्द्रे गोले शिरसि पितर: सान्ति तेषा च पर्व्ष्यौध्वर् भास्वाअन् भवति हि ततस्तत्र तदासराधम् । कुष्र्रगाष्टम्यां सविरुदयोस्तं अत्रैतदुक्तं भवति । षष्टिर्भाज्यो विकलाशेषमृणक्षेपो दृढकुदिनानि हार इति प्रकल्प्य यः कुट्टकः सकला शेषस्तेन षष्टिर्हता विकलाशेषोना दृढकुदिनहृता फलं विकला अभीष्टा स्युस्ततः कलाशेषमृणक्षेपं षटिं भाज्यं दृढकुदिनानि हार प्रकल्प्य यः कुट्टकः स चांशशेष स्तेन षष्टिर्गुणा कलाशेषोना (दृढकुदिनभक्ता) फलं कला अभीष्टाः स्युः । एवं राखि शेषानयने त्रिंशद्भाज्यो भगणशेषानयने च द्वादशभाज्यकल्प्यः । भगणशेषतः पूर्व विधानेनाहर्गणो गतभगणाश्च साध्याः । ‘कल्प्याथ शुद्धिर्विकलावशेषम्'-इत्यादि भास्करोक्तमेतदनुरूपमेव ॥ २२ ॥ वि. भा-एवं राशिशेषात्-अंशशेषात् कृलाशेषात् विकलाशेषात् पूर्ववदह गर्गणः स्यात् कथं तदुच्यते । दृढ़ कुदिनानि हारः । विकलाशेषं शुद्धिरिति प्रकल्प्य कुट्टकविधि ना गुणाप्ती साध्ये तत्र लब्धिविकला:स्युः । तथा च भास्कर:।

      "विधुध्वंभागे पितरो वसान्त: स्वाध: सुधादिधितिमामनान्ति ।
       परयान्ति तेंकं निगमस्तकोष्व देश यतास्माद धादलं तदषाम ।
       भाधाअन्तरत्वान्न विधोरध:स्त्थं इष्टविकलादि करके भगणशष ।
        क्रुषरोर्वाव:  दृढ़भगणान्तर को भाज्य कल्पनाकर पूर्ववत् ।"

इदानीमानयति यस्तमोरविशशाङ्कमानानीत्यस्योत्तरमाह । स्थित्यर्धाद्विपरीत तमः प्रमाणं स्फुटं ग्रहणे । मानोदयाद्रवीन्द्वोर्घटिकावयवेन भोदयतः ॥१३॥ सु.भा.-स्थित्यर्धाद्विपरीतं विपरीतविधिना ग्रहणे स्फुटं तमः प्रमाणं भूभाबिम्बप्रमाणं भवति । अत्रैतदुक्त भवति । स्थित्यर्घ रविचन्द्रगत्यन्तरकला गुणं षष्टिहृतं स्थित्यर्धकला भवन्ति । तद्वर्गाच्छरवर्गयुतान्मूलं मानैक्यार्धकला ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते स्फुट ज्ञय ग्रह होते हैं। तथा ज्ञात ग्रह से पश्चिम में ज्ञय ग्रह के रहने से विपरीत लग्न जो हो उसमें छः राशि घटाने से स्फुट ज्ञय ग्रह होते हैं इति । उपपत्ति लग्नानयनवत् समझनी चाहिये तरह कदम्ब फल में सर्वत्र केसर रहता है उसी तरह इस गोलाकार पृथ्वी के ऊपर सर्वत्र प्राणियों की स्थिति है यह विषय सिद्धान्तशेखर में ‘प्रादशदरसन्निभा भगवती विश्वम्भरा' इत्यादि विज्ञान भाष्य में लिखित श्लोक से श्रीपति ने कहा है, सिद्धान्तशिरोमणि में ‘सर्वतः पर्वतारामग्रामचैत्य चयैश्चित:’ इत्यादि श्लोक से भास्कराचार्य ने भी श्रीपति के कथनानुसार ही कहा है लेकिन नबीन लोग पृथ्वी frT I I TTftfrT Sfft 9FTf%|W % *IHkli^ tlTCTfe *f *fk SWT 311^ $ xfr % ^ gp": fsi^r ^rra - If g-prr 5frnfk ?fH stpr h/tiR If ^r- ^tcTT I I 5lk t^ff EPT OTT sfft^N" (^: Tffr) f^T §3TT I

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गोलाध्यायः १३३३

उपपत्ति।

उत्तरध्रुव देवों का खस्वस्तिक है। दक्षिण ध्रुव दैत्यों का ख स्वस्तिक है । दोनों ध्रुवों को केन्द्र मान कर नवत्यंश से जो वृत्त (नाड़ीवृत्त) होता है वह देव और दैत्यों का क्षितिज वृत्त है । नाड़ीवृत्त और क्रान्तिवृत्त के सम्पातव्दय सायन मेषादि में और सायन तुलादि में रवि दर्शन के बाद पुनः जितने काल में सायन मेषादि और सायन तुलादि में रवि- दर्शन होता है वह एक सायनरविभगण (एक सायन सौरवर्ष) देव और दैत्य का अहोरात्र मान होता है। अतः देवों और दैत्यों का सायन सौरवर्षार्घ (छः महीने) दिन सिद्ध हुआ । परन्तु देवों और दैत्यों का दिन और रात्रि बिलोम से होती है अर्थात् जब मेषादि में उदित रवि को प्रति दिन क्षितिज से ऊपर देव लोग देखते हैं तब देवों से अधः स्थित होने के कारण दैत्य लोग उस रवि को नहीं देखते हैं इसलिये जब देवों का दिन होता है तब दैत्यों की रात्रि होती है। जब देवों की रात्रि होती है तब दैत्यों का दिन होता है। सिद्धान्तशेखर में सकृदुगतो दिनकरः सुरासुरैरपि वत्सरार्धमवलोक्यते स्फुटम्’ वह श्रीपत्युक्त आचार्योक्त के अनुरूप ही है। सूर्य सिद्धान्त में ‘सकृदुद्गतमब्दार्थ पश्यन्त्यर्क सुरासुराः' इस सूर्याश पुरुषोक्ति के अनुरूप ही श्रीपत्युक्त और प्राचार्योक्त है। सिद्धान्तशिरोमणि में ‘रवेश्चक्रभोगोऽर्कवर्ष प्रदिष्टं द्युरात्रं च देवासुराणां तदेव' इस से भास्कराचार्य ने भी प्राचार्थोक्त के अनुरूप ही कहा हैं । इसकी उपपत्ति और दिन रात्रि का स्वरूप सिद्धान्तशिरोमणि में “विषुवद्वत्तं द्युसदां क्षितिजत्वमितं तथा च दैत्यानाम् । उत्तरयाम्यौ क्रमशो मूध्वर्वोध्र्वगतौ' इत्यादि संस्कृतो- पपत्ति में लिखित श्लोक से इस तरह भास्कराचार्य ने कहा है । सांहितिक लोग ‘उत्तरायण देवों का दिन और दक्षिणायन उनकी रात्रि होती है' कहते हैं, इसका खण्डन सिद्धान्तशेखर में दिनप्रवृत्तिर्मरुतामजादौ तुलाघरादौ च निशा प्रवृत्ति:’ इत्यादि से श्रीपति ने किया है। मेषादि में सूर्य के रहने से दिनारम्भ होता है, तुलादि में सूर्य के रहने से रात्र्यारम्भ होता है, जो सांस्कृतिक लोग मकरादि में और कर्कादि में दिन और रात्रि कहते हैं वे लोग इसमें युक्ति कुछ भी नहीं कहते हैं अर्थात् उत्तरायण देवों का दिन होता है और दक्षिणायन रात्रि होती है इसमें कुछ भी युक्ति नहीं कहते हैं । देवता लोग यदि मियुनान्त स्थित सूर्य को देखते हैं तो कर्कराशि में क्रान्ति के समत्व के कारण क्यों नहीं देखते हैं। इस प्रश्न का उत्तर कुछ नहीं है । इसलिये ‘अत्रोपपत्ति न च ते ब्रवन्ति’ यह श्रीपति का कहना ठीक है । श्रीपति रत्नमाला में शिशिरपूर्वमृतुत्रयमुत्तरं’ इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित श्लोकों से श्रीपति भी संहितोक्त फलादेश के लिये ‘उत्तरायण और दक्षिणायन ही को दिन और रात्रि कह कर इस ज्यौतिष सिद्धान्त में ‘अत्रोपपत्ति न च ते ब्रवन्ति' से उनका उपहास करते हैं। पितृ दिनोपपत्ति । चन्द्र के ऊध्र्व भाग में पितर बसते हैं। भूकेन्द्र से चन्द्रकेन्द्र गत रेखा पितरों के ऊध्र्वं याम्योत्तरवृत्त में जहां लगती है वह बिन्दु उनका ऊध्र्व खस्वस्तिक है । वही बिन्दु परिणत चन्द्र भी पितृ त्रिज्या गोल में है। ऊध्र्वखस्वस्तिक गत रेखा अधोयाम्योत्तर वृत्त में जहां

१३३४ ब्राहास्फुटसिद्धान्ते

लगती है बह् पितरोम् भ्रध्र्:खस्वस्तिक है| पितरोम् के ऊध्व् खस्वस्तिक(परिरगतचन्द्र) मे रबि के भाने से पितरोम् का दिनार्ध काल होगा लैकिन वहीम् पर चन्द्र भी है इसलिये यदि चन्द्र का शराभाव हो तो रवि भ्रॉर चन्द्र के एक स्थान मे रहने से दर्शान्त(भ्र्मावास्या) होने के कारर्ग् सिद्ध होता है कि दशन्ति मे पितरोम् का दिनार्ध होता है| एवम् द्वितीय दर्शान्त मे द्वितीय दर्शान्त होता है,दोनोम् दर्शान्त का भ्र्न्त्तर एक चन्द्रमास है वही पितरोम् का दिनार्षान्तर काल भी है परन्तु दिनार्धान्तर काल( एक दिनाधम् से दूसरे दिनाधम् तक ) उदयान्तर काल ( एक सृर्योदय से दुसरेन् सृर्योदय तक) के बराबर होता है, सृर्योदयदूयान्तर काल एक दिन है भ्र्त: दिनार्धान्तर काल भी एक के बराबर हुभ्रा | इसलिये सिद्ध हुभ्रा कि पितरोम् का दिन(भ्रहोरात्र) एकचान्द्रमास के वराबर होता है प्रर्थात् पितर लोग चान्द्र मास के भ्राधे ( एक पक्ष)तक उदित सूर्य को देखते रहते है|

सूर्य सिद्धान्त मे सकृदुदगतमब्दाध पश्यन्त्यक सुरासुरा: |पितर: शशिगा: पक्षम् इस सूर्याश पुरुषोत्त्क के क्षनरूप ही प्राचार्योत्त्क है | सिद्धान्त शिरोमएगि मे रवीन्द्वोयुते: सम्युतिर्यावदन्या विधोर्मास एतच्च पैत्रम् द्युरात्रम् यह् भास्करोत्त्क क्षाचार्योत्त्क के क्षनुरुप ही  है|तथा विघूर्त्रभागे पितरो वसन्त:स्वाध: सुधादीधितिमामनन्ति पश्यन्ति ते: अकम् इत्यादि संस्कृतोपपत्ति मे लिखित श्लोक से गालाध्याय मे भास्कराचार्य ने उसी वात को कहा है इति ||५||
   इदानीम् भूगोले लड्कावन्त्यो: संस्थानमाह्|

भूपरिबि चतुर्भागि लड्कामूमस्तकात् क्षितितलाच्च | लड्कोत्तरतोsवन्ती भूपरिधे: पन्चदशभागे||६||

सु० भा०---भूमस्त्को मेरु: क्षितितलक्ष्च कुमैरुस्तस्मादभूपरिधिचतुर्थभागेsन्त रे दक्षिएगदिशिलक्डानाम नगरी । लक्डोत्तरतक्श्च भूपरिधिपच्चदशभागेsन्ती वर्तते । भास्करश्चाचार्यानुयायी निरक्षदेशात् क्षितिषोडशाम्शे भवेदवन्ती इति कथितवान् ।तेनान्येषाम् मते षोडशे भागे इत्यत्र पाठान्तरम् । चतुर्वेदाचार्यसम्मत: पाठश्च पच्चदशभागे अयमेव ||६||

बि० भा०---भूमस्त्कात् (मेरो:) क्षितितलाज्च(कुमेरोश्च) भूपरिथिचतुर्थाशा(नवत्यम्श) न्तरे-दक्षिएगस्याम् दिशि लक्डा नाम नगरी वर्त्तते । लड्कात उत्तरदिशि भूपरिघिपज्चदशाम्शान्तरेsवन्ती(उज्जयिनी) वर्त्तते। भास्कराचार्येरग गोलाथ्याये निरक्षदेशात् क्षितिषोडशाम्शे भवेदवन्ती गरिगतेन यस्मात् एवम् कध्यते । भूपरिधिथोजनषोडशाम्शान्तरे निरक्षदेशादवन्ती वर्त्तते तदर्थ गरिगतम् । यदि षष्ट्चधिक्-शतत्रयै ३६० रम्शै र्भूपरिघियोजनानि लभ्यन्ते तदा sवन्त्यक्षाम्शेन किमित्यनुपातेन निरक्षदेशावन्त्योरन्तरयोजनान्यागछन्ति तत्स्वरूपम्। (भूपरिधियोजन * श्चवन्त्यक्षाम्श्)/३६०=निरक्ष देशावन्त्योरन्तरयोजनानि । क्षवन्तीदेशे

                               गोलाध्यायः                 १३३५
  
   ऽक्षांशाः = २२ | ३०=२२१/२=४५/२, अतः भूपरिधियोजन x ४५ / ३६० x २
   = भूपरिधियोजन x ४५ / ७२० हरभाज्या (४५) वनेन भक्तौ तदा भूपरिधियोजन/७२०/४५
   = भूपरिधियोजन/१६ = निरक्षदेशावन्त्योरन्तर योजनानि । चतुर्वेदाचार्येण 'पञ्चदशे भागे'इत्येव
   कथ्यते यथा ऽऽचार्येरा कथ्यते,कथं 'पञ्चदशे भागे'कथ्यते तत्र न कारणं किमपि प्रतिभाति।
   लङ्कातः सुमेरुः कुमेरुश्च नवत्यंशान्तरेऽस्ति'यतस्तत्राक्षांशाः = ९० सन्तीति ॥६॥
             अब भूगोल मे लङ्का और अवन्ती की संस्थिति कहते हैं ।

   हि.भा.-मेरु से और कुमेरु से भूपरिधि के चतुर्थाशा (६० अंश) न्तर पर दक्षिण दिशा
   मे लङ्का नामक नगरी है लङ्का से उत्तर दिशा में भूपरिधि के पञ्चदशां १५ शान्तर पर 
   अवन्ती उज्जयिनी है। भास्कराचार्य भपने गोलाध्याय में 'निरक्ष देशात् क्षितिषोड्शांशे'
   इत्यादि से भूपरिधि के षोडशांशान्तर पर गणित करके अवन्ती को कहते है। इसके लिये
   गणित इस तरह है। यदि भांश (३६०) में भूपरिधि योजन पाते हैं तो अवन्ती के अक्षांश
   में क्या इस् अनुपात से निरक्ष देश और अवन्ती के अन्तर योजन आते हैं उसका स्वरुप
   = भूपरिधियो x अवन्ती के अक्षांश / ३६० परन्तु अवन्ती के अक्षांश = २२१/२ = ४५/२अतः
   भूपरिधियो x ४५ / ३६० x २ = भूपरिधियो x ४५ / ७२० = निरक्षदेश और अवन्ती के
   अन्तर योजन,यहां हर भाज्य को (४५) से भाग देने से भूपरिधियो /७२०/४५ =
   भूपरिधियो /१६ = निरक्षदेश और अवन्ती के अन्तर योजन। इसको सोलह से गुण करने 
   से भूपरिधि योजन होता है। भूपरिधियोजन मान के लिये आचार्यों में मतभेद है। अपनी कथित
   भूपरिधि की समीचीनता की द्रढ्ता के लिये बहुत् जोर देकर् गोलाध्याय में कहते हैं           
   "शृङ्गोन्नतिग्रहयुतिग्रहणोदयास्तच्छायादिकं परिधिना धटतेऽमुना हि।नान्येन तेन जगुरुक्तमहीप्रमाण 
    प्रामाण्यमन्वययुजाव्यतिरेकेण" अर्थात् चन्द्र की शृङोन्नति,ग्रहयुति,ग्रहण(चन्द्रग्रहण और 
    सूयंग्रहण)ग्रहों का उदय समय और अस्त समय आदि हमारे ही भूपरिधि मान से ठीक
    समय पर होता है अन्यों के भूपरिधिमान से ठीक समय पर नहीं होता है इसलिये हमारा 
    हि कथित भूपरिधिमान ठीक है अन्याचार्यो का नहीं। आचार्य(ब्रह्मगुप्त) ने 'लङ्कोत्तरतोऽवन्ती
    भूपरिधेः परिधेः पञ्चदश भागे' से 'लङ्का से अवन्ती भूपरिधियोजन के पञ्चदशां १५ श पर
    है' जो कहा है इसमें कुछ युक्ति नहीं मिलती है। चतुर्वेदाचार्य ने आचार्योक्त पाठ ही का
    अनुमोदन किया है इति ॥ ६ १३३६

इदानीं निरक्षस्वदेशान्तर योजनान्याह । अक्षांशकुपरिधिवधान्मण्डलभागाप्त योजनैर्विषुवत् । नतभागयोजनैरेवमुपरि सूर्योऽन्यदनुपातात् ॥१०॥ सु. भा.-अक्षांशानां भूपरिधेश्च वधात् मण्डलभागैश्चक्रांशैर्भक्ताद्यान्यवा प्तानि तैर्नतभागयोजनैः स्वदेशाद्विषुवन्निरक्षदेशो भवति । एवं जिनाल्पाक्षे देशे खस्वस्तिकोपरि यदा सूर्यो भवति तदा कैर्नतभागयोजनैर्विषुवद् देशो भवति । इत्यन्यच मेरुस्वदेशान्तरयोजनादिज्ञानं तत्तदन्तस्भागतोऽनुपातात् कार्यमिति स्फुटम् । अत्र टीकायां चतुर्वेदाचार्यः ‘कान्यकुब्जेऽक्षभागाः’ २६। ३५' ॥१०॥ वि. भा-अक्षांशभूपरिध्योर्धाताद् भांशैर्भक्ताल्लब्धैर्नतभागयोजनैः स्वदे शान्निरक्षदेशो भवति । विषुवच्छब्देनात्र निरक्षदेशो ज्ञेयः । जिनाल्पाक्षांशे देशे यदा सूर्यः खस्वस्तिकोपरि भवति तदा कैर्नतभागयोजनैर्निरक्षदेशो भवति । अन्यच मेरुस्वदेशान्तरयोजनादिज्ञानं तत्तदन्तरांशतोऽनुपातात्कार्यमिति । यदि भांशैर्भूपरिधियोजनानि लभ्यन्ते तदा स्वदेशीयाक्षांशैः किमित्यनुपातेन लब्धयोजनानि स्वदेशनिरक्षदेशयोरन्तरयोजनानि भवन्ति । कृस्मात् कस्माद्देशा न्निरक्षदेशः कियदन्तरेऽस्तीति ज्ञानार्थ तत्तदेशीयाक्षांशवशेन पूर्वोक्तानुपातः कार्य इति ॥१०॥ अब स्वदेश और निरक्षदेश के अन्तर योजन को कहते हैं। हेि. भा-अक्षांश और भूपरिधियोजन के घात में भांश ३६० से भाग देने से जो लब्धि हो उतने योजन पर स्वदेश से निरक्षदेश होता है। जिनाल्पा (चौबीस से कम) क्षांश देश में जब सूर्य खस्वस्तिक के ऊपर होता है तब कितने नतभाग योजन पर निरक्ष देश होता है। मेरू और स्वदेश का अन्तर योजनादि ज्ञान तत्तद्देश के अन्तररांश (अक्षांश) से करना चाहिये, यदि निरक्ष देश से किसी देश का अन्तर योजन ज्ञान करना हो तो पूर्वोक्त अनुपात से करना चाहिये । यदि साक्ष देश में दो देशों का अन्तर योजन करना हो तो दोनों देशों के अक्षांशान्तर से अनुपात (भांश में भूपरिधि योजन पाते हैं तो अक्षांशान्तर में क्या) द्वारा करना चाहिये। यदि भांश ३६० में भूपरिधि योजन पाते हैं तो स्वदेशीयाक्षांश में क्या इस अनुपात से लब्ध योजन निरक्षदेश और स्वदेश का अन्तरयोजन होता है अर्थात् लब्ध योजनान्तर पर गोलाध्यायः १३३७ श्रपने देश से निरक्ष देश है| जिस किसी देश से निरक्ष देश की दूरी ज्नात्त करनी हो तो उस देश के भ्रक्षांश से करना चाहिये इति||१०||

                 इदानीं खकक्षां ग्रह्सकक्षां चाह्|
        स्रम्बरयोजनपरिघिः शशिभगरगाः शून्यखखजिनाग्निगुरगा ३२४०००|
        यस्य भगरगैर्विभक्तास्तत्कक्षार्को भषष्टचंशः||११||

सु० भा०--कल्पे ये चन्द्रभगरपास्ते ३२४००० एतर्गुरगा स्वकक्षा भवति| सा च यस्य ग्रहस्य कल्पभगरगैविभक्ता तत्कक्षा ग्रहस्य कक्षा भवति|व्यर्कश्च भषष्टच्चंशः| च्चर्कक्षा भ्कक्षायाः षष्टिभागः|व्यतोकंकक्षा षष्टिभागः|व्यतोर्ककक्षा षष्टिगुरगा भकक्षा भवतीति|

                        व्यत्रोपयतिः|

कल्पे चन्द्रभगरगाः=५७७५३३'००००)१८७२०६'९२०००'०००००=खक(३२४०००

                  १७३२५९९
                   ‌---------
                  १३८६०७९
                  ११५५०६६
                  -----------
                  २३१०१३२
                  २३१०१३२
                  -------- 
                     X

भ्रतो भास्करेरगाचर्योत्त्क्रव खकक्षा पठिता |शेषोपपत्तिर्भास्करोत्त्कचिधिना स्फटा||११| वि.भा.-कल्पे ये चन्द्रभगरगास्ते ३२४००० एभिर्गुरगास्तदाम्बरयोजनपरिधिः(खकक्षा)भवति।भकक्षायाः षष्टच(६०)शो रविकक्षा भवतीति॥११॥

                  त्र्पत्रोपपत्तिः।

श्राकाशे चतुर्दिक्षु चावत् रवेः किररगानां व्याप्तिः(प्रसारः) तत्परिघेः प्रमारगमेव खकक्षाप्रमाण्यन मान्यम्।वस्तुतो रवेश्र्वलत्वादाकाशे किररगानां सण्चारेरग यावत्तमोहानिस्तदाकारो वृत्तवन्न भवति।भ्रत्र एव कल्पकुदिनग्रहगतियोजनघातसमा पठितखकक्षा कल्पे ग्रहभ्रमरगायोजनैः समेति वक्तुं ब्राह्मस्फुटासहध्दान्ते

शक्चते। वेधेन गतियोजनग्यानं भवितुमर्हति, तत्कल्पकुदिनघातसमेयं पठितखकक्षा संख्या भवति न वेति परीक्षा न भवितुमर्हति। ग्रत एव भास्कराचार्यः। "ब्रह्माण्डमेतन्मितमस्तु नो वा कल्पे ग्रहः क्रामति योजनानि। यावन्ति पूर्वैरिह तत्प्रमाणां प्रोत्क्त खकक्षाख्यमिदं मतं नः।" कल्पे चन्द्र भगरगाः=५७७५३३००००० श्रतः कल्प चन्द्रभx३२४०००=१८७१२०३६२००००००००=खकक्षा भस्कराचार्येरणपि 'कोटिघ्नैर्नखनन्दषट्कनखभूभूभृदभुजड गेन्दुभिर्ज्योतिःशास्त्रविदो वदन्ति नभसः कक्षामिमां योजनै'रित्यनेनाचार्योक्त्तखकक्षा समैव खक क्षामितिः पठिता। खकक्षा तुल्यानि योजनानि कल्पे ग्रहः क्रामति, भगरणाश्च पाठपठितसमाः। एकभगरण्भोगेन ग्रहः स्वकक्षावृत्तयोजनानि भ्रमति ततोनुपातो यदि कल्प ग्रहभगरगैः खकक्षामितयोजनानि लभ्यन्ते तदैकेन भगरगेन किमिति जाता ग्रह कक्षा=खकक्षा/कग्रभ, ग्रर्कोभषष्टचं श इत्यागमप्रामाण्येन भकक्षा/६०=रविकक्षा भकक्षा=६० रविकक्षा, एतैर्योजनैः सर्वेषां ग्रहारगामुपरि दुरे कतिपय नक्षत्रारगां व्रुत्तं भ्रमति, एतेनाअचार्योक्त्तमुपपन्नम्॥११॥

                              गोलाध्याय:
 से आकाश में किरगों के सन्चार से जितनी दूर तक अन्धकार नष्ट होता है उस्की आक्रुति व्रुत्ताकार नहीं होती है। इसलिये कल्प कुदिन और ग्रहगति योजन के चततुल्य यह खकक्षा कल्प में ग्रहों के भ्रमरा योजन अर्थात् कल्प में जितने योजन ग्रह् भ्रमरा करते है के बराबर होती है यह कह सकते हैं। खकक्षा के सम्बन्ध में आचायों का मत भिन्न भिन्न है इसलिये सिध्द्द्न्तशिरोमरि में ब्रह्माण्दमेतन्मितमरतु नो वा कल्पे ग्रह: क्रामरति योजनानि से भस्कराचर्य कहते है कि कल्प में जितने योजन ग्रह् भरमरा करते है ततुल्य ही सकक्षा योजन है मेरा मत है।
  
          कल्प में चन्द्रभगरा=२७७२३३०००० भ्रत:कल्प चंभगरा ३२४०००=*२७१२०६२००००००००=सकक्षा। भास्कराचार्यं ने भी कोतिघ्नैर्नखनन्दषट्कनख भू इत्यादि से आचार्योक्त सकक्षा तुल्य योजन भ्रमरा करते हैं एक भ्रमरा भोग से ग्रह स्वकक्षाव्रुत्त योजन भ्रमरा करथे हैं । तव अनुपात करते है यदि कल्प य्रहभजरा में सकक्षायोजन पाते है तो एक भगरा में क्या इस अनुपात से ग्रह कक्षा आती है सकक्षा/कग्रभ=ग्रहकक्षा,भ्रर्को भपष्ट्यं-श:अर्थात् नक्षत्र कक्षा का साटंबा भाग रवि कक्षा है इस भ्रागमप्रमा से भकक्षा/६०=रविकक्षा । भकक्षा=६०*रविकक्षा । इतने योजने पर सब ग्र्हों से ऊपर दूर में कितने नक्षत्र का व्रुत्त है,सूर्य सिध्दान्त में भवेदुभकक्षा तीक्ष्राशोभ्रँमरां षष्टितञितम् । सर्वोपरिष्टात् भ्र्मति योजननैस्तैर्भमण्ड्लम् सूयीश पुरुष की इस उक्ति के सध्यश ही आचायं ने कहा है यस्य भगरोर्विभक्तास्तत्कक्षा यह आचार्योक्त भी सैव यस्कल्प भगरोर्भक्ता तद्रुभ्रमरां भवेत् इस सूर्याश पुरुषोक्त के अनुरूप ही है॥
                    ग्रहा:कियन्ति योजनानि भ्रमन्तीत्याह ।
                भपरिधिसमानि षष्टया खपरिधितुल्यानि कल्परविवषै:।
              गच्चन्ति योजनानि ग्रहा: स्वकक्षासु तुल्यानि॥
 सु० भा०- षष्टया रविवर्षषष्टया ग्रहा: स्वकक्षासु भूपरिधिसमानि नक्षत्रकक्षसमानि योजनानि  कल्परविवर्षैश्व्व खपरिधितुल्यानि खकक्षासमानि योजनानि गच्चन्ति । तथा सवे ग्रहा: कल्पे तुल्यान्येव योजनानि खकक्षामितानि जच्चन्ति । 
                   अत्रोपपत्ति:।
   भास्करोक्तोन विधिना स्फुटा। नकक्षा=६० रकक्षा= खक/क सौव *६० खक=नक*कसौव/६० । f?. *F&tT (^T^W^T) ^qrj^f^ ^STr^fa 

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१३४० ब्राह्मस्फुतटसद्धान्ते

     कल्पसौरवषै: खकक्षामितयोजनानि तदा सौरवर्षष्टचा किम् । लब्धानि ग्रहभ्रमरगयोजनानि = नक्षत्रकला । ञ्रत उपपन्नं भपरिधिसमानि षष्टचेति । संप्रति वेधेन नवीनानां मते ग्रहारगां योजनात्मिका गतिर्न समानेति सुधीभिशश्चिचन्त्यम् ॥१२॥
     वि भा- षष्टचा (सौरवर्षषष्टचा) कल्परविवर्षैश्च खकक्षातुल्यानि नक्षत्रकक्षासमानि योजनानि ग्रहाः स्वकक्षासु गच्छन्ति । तदा सर्वे ग्रहाः कल्पे तुल्यान्येव योजनानि खकक्षातुल्यानि परिभ्रमन्तीति ।
                        भ्रत्रोपपत्ति:।
   मर्को भषष्टधंश इत्यागमप्रामाण्यात् नक्षत्रकक्षा/६०=रविकक्षा, श्रत: नक्षत्रकक्षा=६०*रविकक्षा=खकक्षा/कल्परविभगरग*६०=खकक्ष/कल्पसौरवषं*६०, ञ्रतः नक्षत्रकं*कल्पसौवर्ष/६०=खकक्षा।
   यदि कल्प्सौरवर्धॅः खकक्षा तुल्यानि योजननि तदा सौरवर्षषष्टाधा किं समागच्छन्ति ग्रहभ्रमरगयोजनानि नक्षत्रकक्षासमानानि ञ्रत उपपत्रमाचार्योत्त् मिति ॥१२॥
          ञ्रख ग्रह कितने योजन भ्रमरग करते है सो कहते है।
   हि मा - ग्रह ञ्रपनि कक्षा मे साठ सौरवषं से नक्षत्र कक्षातुल्य योजन कल्प रवि वर्ष से खकक्षा तुल्य योजन परिभ्रमरग करते है भ्रौर साव ग्रह कल्प में खकक्षा तुल्य ही योजन परिभ्रमरग करते है।
                         उपपत्ति।
    नक्षत्र कक्षा का षष्ट्धशा है इस ञ्रागम प्रमाराप से नक्षत्रकक्षा/६०=रविकक्षा,ञतःनक्षत्रक=६०रविक=खकक्षा/कल्परविभगरग*६०=खकक्ष/कल्पसौरवर्ष*६०  नक्षत्रकक्षा*कल्पसौवषं/६०=खकक्षा।
    यदि कल्प सौरवर्ष में खकक्षा योजन पाते है तो साठ सौरवर्ध में क्या इससे लब्ध भ्रहभ्रमरगयोजन नक्षत्रकक्षा के समान आता है इति ॥१२॥
                    इदानीं ग्रहकक्षाक्रममाह।
        भगरगस्याधः शनिगुरुमुमिजरचिशुक्रसौम्यचन्द्रारगाम्।
        कक्षा क्र्मेरग शीध्राः शनैसश्चराद्याः कलाभुत्तचा ॥१३॥